06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 2021–2030
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2021–2030
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नैतदन्ये करिष्यन्ति भविष्या वसुधाधिपाः ॥ २१ ॥
यत् त्वं कुरुकुलश्रेष्ठ दुष्करं कृतवानसि । ‘ कुरुकुलश्रेष्ठ! आपने जो दुष्कर पराक्रम कर दिखाया है, उसे भविष्यमें होनेवाले दूसरे भूपाल नहीं कर सकेंगे ' ॥ २१ ॥
इत्येवं वदतां तेषां पुंसां कर्णसुखा गिरः ॥ २२ ॥
शृण्वन् विवेश धर्मात्मा फाल्गुनो यज्ञसंस्तरम् । इस प्रकार कहते हुए लोगोंकी श्रवणसुखद बातें सुनते हुए धर्मात्मा अर्जुनने यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया ॥ २२ ॥
ततो राजा सहामात्यः कृष्णश्च यदुनन्दनः ॥ २३ ॥
धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य तंतं प्रत्युद्ययतुस्तदा । उस समय मन्त्रियोंसहित राजा युधिष्ठिर तथा यदुनन्दन श्रीकृष्ण धृतराष्ट्रको आगे करके उनकी अगवानीके लिये आगे बढ़ आये थे ॥ २३३ ॥
सोऽभिवाद्य पितुः पादौ धर्मराजस्य धीमतः ॥ २४ ॥
भीमादींश्चापि सम्पूज्य पर्यष्वजत केशवम् । अर्जुनने पिता धृतराष्ट्र और बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरके चरणोंमें प्रणाम करके भीमसेन आदिका भी पूजन किया और श्रीकृष्णको हृदयसे लगाया ॥ २४ ॥
तैः समेत्यार्चितस्तांश्च प्रत्यर्च्याथ यथाविधि ॥ २५ ॥
विशश्राम महाबाहुस्तीरं लब्ध्वेव पारगः । उन सबने मिलकर अर्जुनका बड़ा स्वागत -सत्कार किया । महाबाहु अर्जुनने भी उनका विधिपूर्वक आदर- सत्कार करके उसी तरह विश्राम किया, जैसे समुद्रके पार जानेकी इच्छावाला पुरुष किनारेपर पहुँचकर विश्राम करता है ॥ २५३ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु स राजा बभ्रुवाहनः ॥ २६ ॥
मातृभ्यां सहितो धीमान् कुरूनेव जगाम ह । इसी समय बुद्धिमान् राजा बभ्रुवाहन अपनी दोनों माताओंके साथ कुरुदेशमें जा पहुँचा ॥ २६३ ॥
तत्र वृद्धान् यथावत् स कुरूनन्यांश्च पार्थिवान् ॥ २७ ॥
अभिवाद्य महबाहुस्तैश्चापि प्रतिनन्दितः ।
प्रविवेश पितामह्याः कुन्त्या भवनमुत्तमम् ॥ २८ ॥
वहाँ पहुँचकर वह महाबाहु नरेश कुरुकुलके वृद्ध पुरुषों तथा अन्य राजाओंको विधिवत् प्रणाम करके स्वयं भी उनके द्वारा सत्कार पाकर बहुत प्रसन्न हुआ । इसके बाद वह अपनी पितामही कुन्तीके सुन्दर महलमें गया ॥ २७-२८ ॥
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इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अर्जुनप्रत्यागमने सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अर्जुनका प्रत्यागमनविषयक सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८७ ॥
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अष्टाशीतितमोऽध्यायः उलूपी और चित्राङ्गदाके सहित बभ्रुवाहनका रत्न - आभूषण आदिसे सत्कार तथा अश्वमेध यज्ञका आरम्भ वैशम्पायन उवाच
स प्रविश्य महाबाहुः पाण्डवानां निवेशनम् ।
पितामहीमभ्यवन्दत् साम्ना परमवल्गुना ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! पाण्डवोंके महलमें प्रवेश करके महाबाहु बभ्रुवाहनने अत्यन्त मधुर वचन बोलकर अपनी दादी कुन्तीके चरणोंमें प्रणाम किया ॥
ततश्चित्राङ्गदा देवी कौरव्यस्यात्मजापि च ।
पृथां कृष्णां च सहिते विनयेनोपजग्मतुः ॥ २ ॥
इसके बाद देवी चित्रांगदा और कौरव्यनागकी पुत्री उलूपीने भी एक साथ ही विनीत भावसे कुन्ती और द्रौपदीके चरण छुए ॥ २ ॥
सुभद्रां च यथान्यायं याश्चान्याः कुरुयोषितः ।
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ददौ कुन्ती ततस्ताभ्यां रत्नानि विविधानि च ॥ ३ ॥
फिर सुभद्रा तथा कुरूकुलकी अन्य स्त्रियोंसे भी वे यथायोग्य मिलीं । उस समय कुन्तीने उन दोनोंको नाना प्रकारके रत्न भेंटमें दिये ॥ ३ ॥
द्रौपदी च सुभद्रा च याश्चाप्यन्याऽददुः स्त्रियः ।
ऊषतुस्तत्र ते देव्यौ महार्हशयनासने ॥ ४ ॥
द्रौपदी, सुभद्रा तथा अन्य स्त्रियोंने भी अपनी ओरसे नाना प्रकारके उपहार दिये ।
तत्पश्चात् वे दोनों देवियाँ बहुमूल्य शय्याओंपर विराजमान हुईं ॥ ४ ॥
सुपूजिते स्वयं कुन्त्या पार्थस्य हितकाम्यया ।
स च राजा महातेजाः पूजितो बभ्रुवाहनः ॥ ५ ॥
धृतराष्ट्रं महीपालमुपतस्थे यथाविधि । अर्जुनके हितकी कामनासे कुन्तीदेवीने स्वयं ही उन दोनोंका बड़ा सत्कार किया । कुन्तीसे सत्कार पाकर महातेजस्वी राजा बभ्रुवाहन महाराज धृतराष्ट्रकी सेवामें उपस्थित हुआ और उसने विधिपूर्वक उनका चरण- स्पर्श किया ॥ ५३ ॥
युधिष्ठिरं च राजानं भीमादींश्चापि पाण्डवान् ॥ ६ ॥
उपागम्य महातेजा विनयेनाभ्यवादयत् । इसके बाद राजा युधिष्ठिर और भीमसेन आदि सभी पाण्डवोंके पास जाकर उस महातेजस्वी नरेशने विनयपूर्वक उनका अभिवादन किया ॥ ६३ ॥
स तैः प्रेम्णा परिष्वक्तः पूजितश्च यथाविधि ॥ ७ ॥
धनं चास्मै ददुर्भूरि प्रीयमाणा महारथाः । उन सब लोगोंने प्रेमवश उसे छातीसे लगा लिया और उसका यथोचित सत्कार किया । इतना ही नहीं, बभ्रुवाहनपर प्रसन्न हुए उन पाण्डव महारथियोंने उसे बहुत धन दिया ॥ ७३ || तथैव च महीपालः कृष्णं चक्रगदाधरम् ॥ ८ ॥
प्रद्युम्न इव गोविन्दं विनयेनोपतस्थिवान् । इसी प्रकार वह भूपाल प्रद्युम्नकी भाँति विनीत भावसे शंख -चक्र- गदाधारी भगवान् श्रीकृष्णकी सेवामें उपस्थित हुआ ॥ ८३ ॥
तस्मै कृष्णो ददौ राज्ञे महार्हमतिपूजितम् ॥ ९ ॥
रथं हेमपरिष्कारं दिव्याश्वयुजमुत्तमम् । श्रीकृष्णने इस राजाको एक बहुमूल्य रथ प्रदान किया जो सुनहरी साजोंसे सुसज्जित,
सबके द्वारा अत्यन्त प्रशंसित और उत्तम था । उसमें दिव्य घोड़े जुते हुए थे ॥ ९ ३ ॥
धर्मराजश्च भीमश्च फाल्गुनश्च यमौ तथा ॥ १० ॥
पृथक् पृथक् च ते चैनं मानार्थाभ्यामयोजयन् ।
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तत्पश्चात् धर्मराज युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेवने अलग- अलग बभ्रुवाहनका सत्कार करके उसे बहुत धन दिया ॥ १०१ ॥
ततस्तृतीये दिवसे सत्यवत्यात्मजो मुनिः ॥ ११ ॥
युधिष्ठिरं समभ्येत्य वाग्मी वचनमब्रवीत् । उसके तीसरे दिन सत्यवतीनन्दन प्रवचनकुशल महर्षि व्यास युधिष्ठिरके पास आकर बोले— ॥ ११ ॥
अद्यप्रभृति कौन्तेय यजस्व समयो हि ते ।
मुहूर्तो यज्ञियः प्राप्तश्चोदयन्तीह याजकाः ॥ १२ ॥
‘ कुन्तीनन्दन! तुम आजसे यज्ञ आरम्भ कर दो । उसका समय आ गया है । यज्ञका शुभ मुहूर्त उपस्थित है और याजकगण तुम्हें बुला रहे हैं ॥ १२ ॥
अहीनो नाम राजेन्द्र क्रतुस्तेऽयं च कल्पताम् ।
बहुत्वात् काञ्चनाख्यस्य ख्यातो बहुसुवर्णकः ॥ १३ ॥
' राजेन्द्र! तुम्हारे इस यज्ञमें किसी बातकी कमी नहीं रहेगी । इसलिये यह किसी भी अंगसे हीन न होनेके कारण अहीन ( सर्वांगपूर्ण) कहलायेगा । इसमें सुवर्ण नामक द्रव्यकी अधिकता होगी; इसलिये यह बहुसुवर्णक नामसे विख्यात होगा ॥ १३ ॥
एवमत्र महाराज दक्षिणां त्रिगुणां कुरु ।
त्रित्वं व्रजतु ते राजन् ब्राह्मणा ह्यात्र कारणम् ॥ १४ ॥
‘ महाराज! यज्ञके प्रधान कारण ब्राह्मण ही हैं; इसलिये तुम उन्हें तिगुनी दक्षिणा देना । ऐसा करनेसे तुम्हारा यह एक ही यज्ञ तीन यज्ञोंके समान हो जायगा ॥ १४ ॥
त्रीनश्वमेधानत्र त्वं सम्प्राप्य बहुदक्षिणान् ।
ज्ञातिवध्याकृतं पापं प्रहास्यसि नराधिप ॥ १५ ॥
' नरेश्वर! यहाँ बहुत- सी दक्षिणावाले तीन अश्वमेध यज्ञोंका फल पाकर तुम ज्ञातिवधके पापसे मुक्त हो जाओगे ॥ १५ ॥
पवित्रं परमं चैतत् पावनं चैतदुत्तमम् ।
यदाश्वमेधावभृथं प्राप्स्यसे कुरुनन्दन ॥ १६ ॥
‘ कुरुनन्दन! तुम्हें जो अश्वमेध यज्ञका अवभृथ-स्नान प्राप्त होगा, वह परम पवित्र, पावन और उत्तम है ' ॥ १६ ॥
इत्युक्तः स तु तेजस्वी व्यासेनामितबुद्धिना ।
दीक्षां विवेश धर्मात्मा वाजिमेधाप्तये ततः ॥ १७ ॥
परम बुद्धिमान् व्यासजीके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा एवं तेजस्वी राजा युधिष्ठिरने अश्वमेध - यज्ञकी सिद्धिके लिये उसी दिन दीक्षा ग्रहण की ॥ १७ ॥
ततो यज्ञं महाबाहुर्वाजिमेधं महाक्रतुम् ।
बह्वन्नदक्षिणं राजा सर्वकामगुणान्वितम् ॥ १८ ॥
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फिर उन महाबाहु नरेशने बहुत- से अन्नकी दक्षिणासे युक्त तथा सम्पूर्ण कामना और गुणोंसे सम्पन्न उस अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान आरम्भ कर दिया ॥ १८ ॥
तत्र वेदविदो राजंश्चक्रुः कर्माणि याजकाः ।
परिक्रमन्तः सर्वज्ञा विधिवत् साधुशिक्षितम् ॥ १ ९ ॥
उसमें वेदोंके ज्ञाता और सर्वज्ञ याजकोंने सम्पूर्ण कर्म किये कराये । वे सब ओर घूम-घूमकर सत्पुरुषों- द्वारा शिक्षित कर्मका सम्पादन करते - कराते थे ॥ १ ९ ॥
न तेषां स्खलितं किंचिदासीच्चाप्यकृतं तथा ।
क्रममुक्तं च युक्तं च चक्रुस्तत्र द्विजर्षभाः ॥ २० ॥
उनके द्वारा उस यज्ञमें कहीं भी कोई भूल या त्रुटि नहीं होने पायी । कोई भी कर्म न तो छूटा और न अधूरा रहा । श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने प्रत्येक कार्यको क्रमके अनुसार उचित रीतिसे पूरा किया ॥ २० ॥
कृत्वा प्रवर्ग्यं धर्माख्यं यथावद् द्विजसत्तमाः ।
चक्रुस्ते विधिवद् राजंस्तथैवाभिषवं द्विजाः ॥ २१ ॥
राजन्! वहाँ ब्राह्मणशिरोमणियोंने प्रवर्ग्य नामक धर्मानुकूल कर्मको यथोचित रीतिसे सम्पन्न करके विधिपूर्वक सोमाभिषव – सोमलताका रस निकालनेका कार्य किया ॥ २१ ॥
अभिषूय ततो राजन् सोमं सोमपसत्तमाः ।
सवनान्यानुपूर्व्येण चक्रुः शास्त्रानुसारिणः ॥ २२ ॥
महाराज! सोमपान करनेवालोंमें श्रेष्ठ तथा शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले विद्वानोंने सोमरस निकालकर उसके द्वारा क्रमशः तीनों समयके सवन कर्म किये ॥ २२ ॥
न तत्र कृपणः कश्चिन्न दरिद्रो बभूव ह ।
क्षुधितो दुःखितो वापि प्राकृतो वापि मानवः ॥ २३ ॥
उस यज्ञमें आया हुआ कोई भी मनुष्य, चाहे वह निम्न से निम्न श्रेणीका क्यों न हो, दीन -दरिद्र, भूखा अथवा दुखिया नहीं रह गया था ॥ २३ ॥
भोजनं भोजनार्थिभ्यो दापयामास शत्रुहा ।
भीमसेनो महातेजाः सततं राजशासनात् ॥ २४ ॥
शत्रुसूदन महातेजस्वी भीमसेन महाराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे भोजनार्थियोंको भोजन दिलाने के कामपर सदा डटे रहते थे ॥ २४ ॥
संस्तरे कुशलाश्चापि सर्वकार्याणि याजकाः ।
दिवसे दिवसे चक्रुर्यथाशास्त्रानुदर्शनात् ॥ २५ ॥
यज्ञकी वेदी बनानेमें निपुण याजकगण प्रतिदिन शास्त्रोक्त विधिके अनुसार सब कार्य सम्पन्न किया करते थे ॥ २५ ॥
नाषडङ्गविदत्रासीत् सदस्यस्तस्य धीमतः ।
नाव्रतो नानुपाध्यायो न च वादाविचक्षणः ॥ २६ ॥
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बुद्धिमान् राजा युधिष्ठिरके यज्ञका कोई भी सदस्य ऐसा नहीं था जो छहों अंगोंका विद्वान्, ब्रह्मचर्य- व्रतका पालन करनेवाला, अध्यापनकर्ममें कुशल तथा वाद - विवादमें प्रवीण न हो ॥ २६ ॥
ततो यूपोच्छ्रये प्राप्ते षड् बैल्वान् भरतर्षभ ।
खादिरान् बिल्वसमितांस्तावतः सर्ववर्णिनः ॥ २७ ॥
देवदारुमयौ द्वौ तु यूपौ कुरुपतेर्मखे ।
श्लेष्मातकमयं चैकं याजकाः समकल्पयन् ॥ २८ ॥
भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् जब यूपकी स्थापनाका समय आया, तब याजकोंने यज्ञभूमिमें बेलके छः, खैरके छः, पलाशके भी छः, देवदारुके दो और लसोड़ेका एक - इस प्रकार इक्कीस यूप कुरुराज युधिष्ठिरके यज्ञमें खड़े किये ॥ २७-२८ ॥
शोभार्थं चापरान् यूपान् काञ्चनान् भरतर्षभ ।
स भीमः कारयामास धर्मराजस्य शासनात् ॥ २ ९ ॥
भरतभूषण! इनके सिवा धर्मराजकी आज्ञासे भीमसेनने यज्ञकी शोभाके लिये और भी बहुत - से सुवर्णमय यूप खड़े कराये ॥ २ ९ ॥
ते व्यराजन्त राजर्षेर्वासोभिरुपशोभिताः ।
महेन्द्रानुगता देवा यथा सप्तर्षिभिर्दिवि ॥ ३० ॥
वस्त्रोंद्वारा अलंकृत किये गये वे राजर्षि युधिष्ठिरके यज्ञ सम्बन्धी यूप आकाशमें सप्तर्षियोंसे घिरे हुए इन्द्रके अनुगामी देवताओंके समान शोभा पाते थे ॥ ३० ॥
इष्टकाः काञ्चनीश्चात्र चयनार्थं कृताऽभवन् ।
शुशुभे चयनं तच्च दक्षस्येव प्रजापतेः ॥ ३१ ॥
यज्ञकी वेदी बनानेके लिये वहाँ सोनेकी ईंटें तैयार करायी गयी थीं । उनके द्वारा जब वेदी बनकर तैयार हुई तब वह दक्षप्रजापतिकी यज्ञवेदीके समान शोभा पाने लगी ॥ ३१ ॥
चतुश्चित्यश्च तस्यासीदष्टादशकरात्मकः ।
स रुक्मपक्षो निचितस्त्रिकोणो गरुडाकृतिः ॥ ३२ ॥
उस यज्ञमण्डपमें अग्निचयनके लिये चार स्थान बने थे । उनमेंसे प्रत्येककी लम्बाई-चौड़ाई अठारह हाथकी थी। प्रत्येक वेदी सुवर्णमय पंखसे युक्त एवं गरुड़के समान आकारवाली थी । वह त्रिकोणाकार बनायी गयी थी ॥ ३२ ॥
ततो नियुक्ताः पशवो यथाशास्त्रं मनीषिभिः ।
तं तं देवं समुद्दिश्य पक्षिणः पशवश्च ये ॥ ३३ ॥
ऋषभाः शास्त्रपठितास्तथा जलचराश्च ये ।
सर्वांस्तानभ्ययुञ्जंस्ते तत्राग्निचयकर्मणि ॥ ३४ ॥
तदनन्तर मनीषी पुरुषोंने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार पशुओंको नियुक्त किया । भिन्न-भिन्न देवताओंके उद्देश्यसे पशु - पक्षी, शास्त्रकथित वृषभ और जलचर जन्तु —इन सबका
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अग्निस्थापन - कर्ममें याजकोंने उपयोग किया ॥
यूपेषु नियता चासीत् पशूनां त्रिशती तथा ।
अश्वरत्नोत्तरा यज्ञे कौन्तेयस्य महात्मनः ॥ ३५ ॥
कुन्तीनन्दन महात्मा युधिष्ठिरके उस यज्ञमें जो यूप खड़े किये गये थे, उनमें तीन सौ पशु बाँधे गये थे । उन सबमें प्रधान वही अश्वरत्न था ॥ ३५ ॥
स यज्ञः शुशुभे तस्य साक्षाद् देवर्षिसंकुलः ।
गन्धर्वगणसंगीतः प्रनृत्तोऽप्सरसां गणैः ॥ ३६ ॥
साक्षात् देवर्षियोंसे भरा हुआ युधिष्ठिरका वह यज्ञ बड़ी शोभा पा रहा था । गन्धर्वोंके मधुर संगीत और अप्सराओंके नृत्यसे उसकी शोभा और बढ़ गयी थी ॥ ३६ ॥
स किंपुरुषसंकीर्णः किंनरैश्चोपशोभितः ।
सिद्धविप्रनिवासैश्च समन्तादभिसंवृतः ॥ ३७ ॥
वह यज्ञमण्डप किम्पुरुषोंसे भरा - पूरा था । किन्नर भी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे । उसके चारों ओर सिद्धों और ब्राह्मणोंके निवासस्थान बने थे, जिनसे वह यज्ञ- मण्डप घिरा था ॥ ३७ ॥
तस्मिन् सदसि नित्यास्तु व्यासशिष्या द्विजर्षभाः ।
सर्वशास्त्रप्रणेतारः कुशला यज्ञसंस्तरे ॥ ३८ ॥
व्यासजीके शिष्य श्रेष्ठ ब्राह्मण उस यज्ञसभामें सदा उपस्थित रहते थे । वे सम्पूर्ण शास्त्रोंके प्रणेता और यज्ञकर्ममें कुशल थे ॥ ३८ ॥
नारदश्च बभूवात्र तुम्बुरुश्च महाद्युतिः ।
विश्वावसुश्चित्रसेनस्तथान्ये गीतकोविदाः ॥ ३ ९ ॥
गन्धर्वा गीतकुशला नृत्येषु च विशारदाः ।
रमयन्ति स्म तान् विप्रान् यज्ञकर्मान्तरेषु वै ॥ ४० ॥
नारद, महातेजस्वी तुम्बुरु, विश्वावसु, चित्रसेन तथा अन्य संगीतकलाकोविद, गाननिपुण एवं नृत्यविशारद गन्धर्व प्रतिदिन यज्ञकार्यके बीच - बीचमें समय मिलनेपर अपनी नाच- गानकी कलाओंद्वारा उन ब्राह्मणोंका मनोरंजन करते थे ॥ ३ ९ -४० ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वमेधारम्भे अष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वमेधयज्ञका आरम्भविषयक अठासीवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ८८ ॥
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एकोननवतितमोऽध्यायः युधिष्ठिरका ब्राह्मणोंको दक्षिणा देना और राजाओंको भेंट देकर विदा करना वैशम्पायन उवाच
श्रपयित्वा पशूनन्यान् विधिवद् द्विजसत्तमाः ।
तं तुरङ्गं यथाशास्त्रमालभन्त द्विजातयः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने अन्यान्य पशुओंका विधिपूर्वक श्रपण करके उस अश्वका भी शास्त्रीय विधिके अनुसार आलभन किया ॥ १ ॥
ततः संश्रप्य तुरगं विधिवद् याजकास्तदा ।
उपसंवेशयन् राजंस्ततस्तां द्रुपदात्मजाम् ॥ २ ॥
कलाभिस्तिसृभी राजन् यथाविधि मनस्विनीम् । राजन्! तत्पश्चात् याजकोंने विधिपूर्वक अश्वका श्रपण करके उसके समीप मन्त्र, द्रव्य और श्रद्धा – इन तीन कलाओंसे युक्त मनस्विनी द्रौपदीको शास्त्रोक्त विधिके अनुसार बैठाया ॥ २३ ॥
उद्धृत्य तु वपां तस्य यथाशास्त्रं द्विजातयः ॥ ३ ॥
श्रपयामासुरव्यग्रा विधिवद् भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! इसके बाद ब्राह्मणोंने शान्तचित्त होकर उस अश्वकी चर्बी निकाली और उसका विधिपूर्वक श्रपण करना आरम्भ किया ॥ ३३ ॥
तं वपाधूमगन्धं तु धर्मराजः सहानुजैः ॥ ४ ॥
उपाजिघ्रद् यथाशास्त्रं सर्वपापापहं तदा । भाइयोंसहित धर्मराज युधिष्ठिरने शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार उस चर्बीके धूमकी गन्ध सूँघी, जो समस्त पापोंका नाश करनेवाली थी ॥ ४३ ॥
शिष्टान्यङ्गानि यान्यासंस्तस्याश्वस्य नराधिप ॥ ५ ॥
तान्यग्नौ जुहुवुर्धीराः समस्ताः षोडशर्त्विजः । नरेश्वर! उस अश्वके जो शेष अंग थे, उनको धीर स्वभाववाले समस्त सोलह ऋत्विजोंने अग्निमें होम कर दिया ॥ ५३ ॥
संस्थाप्यैवं तस्य राज्ञस्तं यज्ञं शक्रतेजसः ॥ ६ ॥
व्यासः सशिष्यो भगवान् वर्धयामास तं नृपम् । इस प्रकार इन्द्रके समान तेजस्वी राजा युधिष्ठिरके उस यज्ञको समाप्त करके शिष्योंसहित भगवान् व्यासने उन्हें बधाई दी – अभ्युदयसूचक आशीर्वाद दिया ॥ ६३ ॥
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ततो युधिष्ठिरः प्रादाद् ब्राह्मणेभ्ये यथाविधि ॥ ७ ॥
कोटीः सहस्रं निष्काणां व्यासाय तु वसुंधराम् । इसके बाद युधिष्ठिरने सब ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक एक हजार करोड़ (एक खर्व) स्वर्णमुद्राएँ दक्षिणामें देकर व्यासजीको सम्पूर्ण पृथ्वी दान कर दी ॥ ७३ ॥
प्रतिगृह्य धरां राजन् व्यासः सत्यवतीसुतः ॥ ८ ॥
अब्रवीद् भरतश्रेष्ठं धर्मराजं युधिष्ठिरम् । राजन्! सत्यवतीनन्दन व्यासने उस भूमिदानको ग्रहण करके भरतश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ८३ ॥
वसुधा भवतस्त्वेषा संन्यस्ता राजसत्तम ॥ ९ ॥
निष्क्रयो दीयतां मह्यं ब्राह्मणा हि धनार्थिनः । 'नृपश्रेष्ठ! तुम्हारी दी हुई इस पृथ्वीको मैं पुनः तुम्हारे ही अधिकारमें छोड़ता हूँ । तुम मुझे इसका मूल्य दे दो; क्योंकि ब्राह्मण धनके ही इच्छुक होते हैं ( राज्यके नहीं) ' ॥ ९ ३ ॥ युधिष्ठिरस्तु तान् विप्रान् प्रत्युवाच महामनाः ॥ १० ॥
भ्रातृभिः सहितो धीमान् मध्ये राज्ञां महात्मनाम् । तब महामनस्वी नरेशोंके बीचमें भाइयोंसहित बुद्धिमान् महामना युधिष्ठिरने उन ब्राह्मणोंसे कहा— ॥ १० ॥
अश्वमेधे महायज्ञे पृथिवी दक्षिणा स्मृता ॥ ११ ॥
अर्जुनेन जिता चेयमृत्विग्भ्यः प्रापिता मया ।
वनं प्रवेक्ष्ये विप्राग्रया विभजध्वं महीमिमाम् ॥ १२ ॥
चतुर्धा पृथिवीं कृत्वा चातुर्होत्रप्रमाणतः ।
नाहमादातुमिच्छामि ब्रह्मस्वं द्विजसत्तमाः ॥ १३ ॥
इदं नित्यं मनो विप्रा भ्रातॄणां चैव मे सदा । ‘ विप्रवरो! अश्वमेध नामक महायज्ञमें पृथ्वीकी दक्षिणा देनेका विधान है; अतः अर्जुनके द्वारा जीती हुई यह सारी पृथ्वी मैंने ऋत्विजोंको दे दी है । अब मैं वनमें चला जाऊँगा । आपलोग चातुर्होत्र यज्ञके प्रमाणानुसार पृथ्वीके चार भाग करके इसे आपसमें बाँट लें । द्विजश्रेष्ठगण! मैं ब्राह्मणोंका धन लेना नहीं चाहता । ब्राह्मणो! मेरे भाइयोंका भी सदा ऐसा ही विचार रहता है ' ॥ ११–१३ ॥ इत्युक्तवति तस्मिंस्तु भ्रातरो द्रौपदी च सा ॥ १४ ॥
एवमेतदिति प्राहुस्तदभूल्लोमहर्षणम् । उनके ऐसा कहनेपर भीमसेन आदि भाइयों और द्रौपदीने एक स्वरसे कहा — ' हाँ, महाराजका कहना ठीक है । ' इस महान् त्यागकी बात सुनकर सबके रोंगटे खड़े हो गये ॥ १४ ॥