श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 2011–2020

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2011–2020

पृष्ठ 2011

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बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरके उस महायज्ञमें बहुत से वेदवेत्ता मुनिगण भी पधारे थे ॥ २२ ॥

ये च द्विजातिप्रवरास्तत्रासन् पृथिवीपते ।

समाजग्मुः सशिष्यास्तान् प्रतिजग्राह कौरवः ॥ २३ ॥

पृथ्वीनाथ! ब्राह्मणोंमें जो श्रेष्ठ पुरुष थे, वे सब अपने शिष्योंको साथ लेकर वहाँ आये । कुरुराज युधिष्ठिरने उन सबको स्वागतपूर्वक अपनाया ॥ २३ ॥

सर्वांश्च ताननुययौ यावदावसथान् प्रति ।

स्वयमेव महातेजा दम्भं त्यक्त्वा युधिष्ठिरः ॥ २४ ॥

वहाँ महातेजस्वी महाराज युधिष्ठिर दम्भ छोड़कर स्वयं ही उन सबका विधिवत् सत्कार करते और जबतक उनके लिये योग्य स्थानका प्रबन्ध न हो जाता, तबतक उनके साथ - साथ रहते थे ॥ २४ ॥

ततः कृत्वा स्थपतयः शिल्पिनोऽन्ये च ये तदा ।

कृत्स्नं यज्ञविधिं राज्ञो धर्मज्ञाय न्यवेदयन् ॥ २५ ॥

तत्पश्चात् थवइयों और अन्यान्य शिल्पियों ( कारीगरों ) ने आकर राजा युधिष्ठिरको यह सूचना दी कि यज्ञमण्डपका सारा कार्य पूरा हो गया ॥ २५ ॥

तच्छ्रुत्वा धर्मराजस्तु कृतं सर्वमतन्द्रितः ।

हृष्टरूपोऽभवद् राजा सह भ्रातृभिरादृतः ॥ २६ ॥

सब कार्य पूरा हो गया । यह सुनकर आलस्य रहित धर्मराज राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ बहुत प्रसन्न हुए ॥ २६ ॥

वैशम्पायन उवाच

तस्मिन् यज्ञे प्रवृत्ते तु वाग्मिनो हेतुवादिनः ।

हेतुवादान् बहूनाहुः परस्परजिगीषवः ॥ २७ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! वह यज्ञ आरम्भ होनेपर बहुत - से प्रवचनकुशल और युक्तिवादी विद्वान्, जो एक- दूसरेको जीतनेकी इच्छा रखते थे, वहाँ अनेक प्रकारसे तर्ककी बातें करने लगे ॥ २७ ॥

ददृशुस्तं नृपतयो यज्ञस्य विधिमुत्तमम् ।

देवेन्द्रस्येव विहितं भीमसेनेन भारत ॥ २८ ॥

भारत! यज्ञमें सम्मिलित होनेके लिये आये हुए राजा लोग घूम- घूमकर भीमसेनके द्वारा तैयार कराये हुए उस यज्ञमण्डपकी उत्तम निर्माण कला एवं सुन्दर सजावट देखने लगे । वह मण्डप देवराज इन्द्रकी यज्ञशालाके समान जान पड़ता था ॥ २८ ॥

ददृशुस्तोरणान्यत्र शातकुम्भमयानि ते ।

शय्यासनविहारांश्च सुबहून् रत्नसंचयान् ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 2012

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उन्होंने वहाँ सुवर्णके बने हुए तोरण, शय्या, आसन, विहारस्थान तथा बहुत - से रत्नोंके ढेर देखे ॥ २ ९ ॥

घटान् पात्रीः कटाहानि कलशान् वर्धमानकान् ।

न हि किञ्चिदसौवर्णमपश्यन् वसुधाधिपाः ॥ ३० ॥

घड़े, बर्तन, कड़ाहे, कलश और बहुत -से कटोरे भी उनकी दृष्टिमें पड़े । उन पृथ्वीपतियोंने वहाँ कोई भी ऐसा सामान नहीं देखा, जो सोनेका बना हुआ न हो ॥ ३० ॥

यूपांश्च शास्त्रपठितान् दारवान् हेमभूषितान् ।

उपक्लृप्तान् यथाकालं विधिवद् भूरिवर्चसः ॥ ३१ ॥

शास्त्रोक्त विधिके अनुसार जो काष्ठके यूप बने हुए थे, उनमें भी सोना जड़ा हुआ था । वे सभी यूप यथासमय विधिपूर्वक बनाये गये थे जो देखनेमें अत्यन्त तेजोमय जान पड़ते थे ॥ ३१ ॥

स्थलजा जलजा ये च पशवः केचन प्रभो ।

सर्वानेव समानीतानपश्यंस्तत्र ते नृपाः ॥ ३२ ॥

प्रभो! संसारके भीतर स्थल और जलमें उत्पन्न होनेवाले जो कोई पशु देखे या सुने गये थे, उन सबको वहाँ राजाओंने उपस्थित देखा ॥ ३२ ॥

गाश्चैव महिषीश्चैव तथा वृद्धस्त्रियोऽपि च ।

औदकानि च सत्त्वानिश्वापदानि वयांसि च ॥ ३३ ॥

जरायुजाण्डजातानि स्वेदजान्युद्भिदानि च ।

पर्वतानूपजातानि भूतानि ददृशुश्च ते ॥ ३४ ॥

गायें, भैसें, बूढ़ी स्त्रियाँ, जल- जन्तु, हिंसक जन्तु, पक्षी, जरायुज, अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज, पर्वतीय तथा सागरतटपर उत्पन्न होनेवाले प्राणी-ये सभी वहाँ दृष्टिगोचर हुए ॥ ३३-३४ ॥

एवं प्रमुदितं सर्वं पशुगोधनधान्यतः ।

यज्ञवाटं नृपा दृष्ट्वा परं विस्मयमागताः ॥ ३५ ॥

इस प्रकार वह यज्ञशाला पशु, गौ, धन और धान्य सभी दृष्टियोंसे सम्पन्न एवं आनन्द बढ़ानेवाली थी । उसे देखकर समस्त राजाओंको बड़ा विस्मय हुआ ॥ ३५ ॥

ब्राह्मणानां विशां चैव बहुमृष्टान्नमृद्धिमत् ।

पूर्णे शतसहस्रे तु विप्राणां तत्र भुञ्जताम् ॥ ३६ ॥

दुन्दुभिर्मेघनिर्घोषो मुहुर्मुहुरताडयत् ।

विननादासकृच्चापि दिवसे दिवसे गते ॥ ३७ ॥

ब्राह्मणों और वैश्योंके लिये वहाँ परम स्वादिष्ट अन्नका भण्डार भरा हुआ था । प्रतिदिन एक लाख ब्राह्मणोंके भोजन कर लेनेपर वहाँ मेघ गर्जनाके समान शब्द करनेवाला डंका बार- बार पीटा जाता था । इस प्रकारके डंके वहाँ दिनमें कई बार पीटे जाते थे ॥

पृष्ठ 2013

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एवं स ववृते यज्ञो धर्मराजस्य धीमतः ।

अन्नस्य सुबहून् राजन्नुत्सर्गान् पर्वतोपमान् ॥ ३८ ॥

दधिकुल्याश्च ददृशुः सर्पिषश्च ह्रदान् जनाः ।

जम्बूद्वीपो हि सकलो नानाजनपदायुतः ॥ ३ ९ ॥

राजन्नदृश्यतैकस्थो राज्ञस्तस्य महामखे । राजन्! बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरका वह यज्ञ रोज- रोज इसी रूपमें चालू रहा । उस स्थानपर अन्नके बहुत - से पहाड़ों जैसे ढेर लगे रहते थे । दहीकी नहरें बनी हुई थीं और घीके बहुत - से तालाब भरे हुए थे । राजा युधिष्ठिरके उस महान् यज्ञमें अनेक देशोंके लोग जुटे हुए थे । राजन्! सारा जम्बूद्वीप ही वहाँ एक स्थानमें स्थित दिखायी देता था ॥ ३८-३९ ३ ॥ तत्र जातिसहस्राणि पुरुषाणां ततस्ततः ॥ ४० ॥

गृहीत्वा भाजनान् जग्मुर्बहूनि भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! वहाँ हजारों प्रकारकी जातियोंके लोग बहुत- से पात्र लेकर उपस्थित होते थे ॥ ४० ॥

स्रग्विणश्चापि ते सर्वे सुमृष्टमणिकुण्डलाः ॥ ४१ ॥

पर्यवेषन् द्विजातींस्तान् शतशोऽथ सहस्रशः ।

विविधान्यन्नपानानि पुरुषा येऽनुयायिनः ।

ते वै नृपोपभोज्यानि ब्राह्मणानां ददुश्च ह ॥ ४२ ॥

सैकड़ों और हजारों मनुष्य वहाँ ब्राह्मणोंको तरह- तरहके भोजन परोसते थे । वे सब- के - सब सोनेके हार और विशुद्ध मणिमय कुण्डलोंसे अलंकृत होते थे । राजाके अनुयायी पुरुष वहाँ ब्राह्मणोंको तरह -तरहके अन्न-पान एवं राजोचित भोजन अर्पित करते थे ॥ ४१-४२ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वमेधारम्भे पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वमेधयज्ञका आरम्भविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८५ ॥

पृष्ठ 2014

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षडशीतितमोऽध्यायः राजा युधिष्ठिरका भीमसेनको राजाओंकी पूजा करनेका आदेश और श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे अर्जुनका संदेश कहना वैशम्पायन उवाच

समागतान् वेदविदो राज्ञश्च पृथिवीश्वरान् ।

दृष्ट्वा युधिष्ठिरो राजा भीमसेनमभाषत ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! वहाँ आये हुए वेदवेत्ता विद्वानों और पृथ्वीका शासन करनेवाले राजाओंको देखकर राजा युधिष्ठिरने भीमसेनसे कहा – ॥ १ ॥

उपयाता नरव्याघ्रा य एते पृथिवीश्वराः ।

एतेषां क्रियतां पूजा पूजार्हा हि नराधिपाः ॥ २ ॥

‘ भाई! ये जो भूमण्डलका शासन करनेवाले राजा यहाँ पधारे हुए हैं, सभी पुरुषोंमें श्रेष्ठ एवं पूजाके योग्य हैं; अतः तुम इनकी यथोचित पूजा ( सत्कार) करो ' ॥ २ ॥

इत्युक्तः स तथा चक्रे नरेन्द्रेण यशस्विना ।

भीमसेनो महातेजा यमाभ्यां सह पाण्डवः ॥ ३ ॥

यशस्वी महाराजके इस प्रकार आदेश देनेपर महातेजस्वी पाण्डुपुत्र भीमसेनने नकुल और सहदेवको साथ लेकर सब राजाओंका युधिष्ठिरके आज्ञानुसार यथोचित सत्कार किया ॥ ३ ॥

अथाभ्यगच्छद्गोविन्दो वृष्णिभिः सह धर्मजम् ।

बलदेवं पुरस्कृत्य सर्वप्राणभृतां वरः ॥ ४ ॥

युयुधानेन सहितः प्रद्युम्नेन गदेन च ।

निशठेनाथ साम्बेन तथैव कृतवर्मणा ॥ ५ ॥

इसके बाद समस्त प्राणियोंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्ण बलदेवजीको आगे करके सात्यकि, प्रद्युम्न, गद, निशठ, साम्ब तथा कृतवर्मा आदि वृष्णिवंशियोंके साथ युधिष्ठिरके पास आये ॥ ४-५ ॥

तेषामपि परां पूजां चक्रे भीमो महारथः ।

विविशुस्ते च वेश्मानि रत्नवन्ति च सर्वशः ॥ ६ ॥

महारथी भीमसेनने उन लोगोंका भी विधिवत् सत्कार किया। फिर वे रत्नोंसे भरे - पूरे घरोंमें जाकर रहने लगे ॥ ६ ॥

युधिष्ठिरसमीपे तु कथान्ते मधुसूदनः ।

अर्जुनं कथयामास बहुसंग्रामकर्षितम् ॥ ७ ॥

पृष्ठ 2015

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भगवान् श्रीकृष्ण युधिष्ठिरके पास बैठकर थोड़ी देरतक बातचीत करते रहे । उसीमें उन्होंने बताया — ‘ अर्जुन बहुत - से युद्धोंमें शत्रुओंका सामना करनेके कारण दुर्बल हो गये हैं ' ॥ ७ ॥

स तं पप्रच्छ कौन्तेयः पुनः पुनररिंदमम् ।

धर्मजः शक्रजं जिष्णुं समाचष्ट जगत्पतिः ॥ ८ ॥

यह सुनकर धर्मपुत्र कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने शत्रुदमन इन्द्रकुमार अर्जुनके विषयमें बारम्बार उनसे पूछा । तब जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण उनसे इस प्रकार बोले— ॥ ८ ॥

आगमद् द्वारकावासी ममाप्तः पुरुषो नृप ।

योऽद्राक्षीत् पाण्डवश्रेष्ठं बहुसंग्रामकर्षितम् ॥ ९ ॥

' राजन्! मेरे पास द्वारकाका रहनेवाला एक विश्वासपात्र मनुष्य आया था । उसने पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुनको अपनी आँखों देखा था । वे अनेक स्थानोंपर युद्ध करनेके कारण बहुत दुर्बल हो गये हैं ॥ ९ ॥

समीपे च महाबाहुमाचष्ट च मम प्रभो ।

कुरु कार्याणि कौन्तेय हयमेधार्थसिद्धये ॥ १० ॥

‘ प्रभो! उसने यह भी बताया है कि महाबाहु अर्जुन अब निकट आ गये हैं । अतः कुन्तीनन्दन! अब आप अश्वमेधयज्ञकी सिद्धिके लिये आवश्यक कार्य आरम्भ कर दीजिये ' ॥ १० ॥

इत्युक्तः प्रत्युवाचैनं धर्मराजो युधिष्ठिरः ।

दिष्ट्या स कुशली जिष्णुरुपायाति च माधव ॥ ११ ॥

उनके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिरने पुनः प्रश्न किया- ' माधव! बड़े सौभाग्यकी बात है कि अर्जुन सकुशल लौट रहे हैं ॥ ११ ॥

यदिदं संदिदेशास्मिन् पाण्डवानां बलाग्रणीः ।

तदा ज्ञातुमिहेच्छामि भवता यदुनन्दन ॥ १२ ॥

‘ यदुनन्दन! पाण्डवसेनाके अग्रगामी अर्जुनने इस यज्ञके सम्बन्धमें जो कुछ संदेश दिया हो, उसे मैं आपके मुँहसे सुनना चाहता हूँ' ॥ १२ ॥

इत्युक्तो धर्मराजेन वृष्ण्यन्धकपतिस्तदा ।

प्रोवाचेदं वचो वाग्मी धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ॥ १३ ॥

धर्मराजके इस प्रकार पूछनेपर वृष्णि और अन्धकवंशी यादवोंके स्वामी प्रवचनकुशल भगवान् श्रीकृष्णने धर्मात्मा युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा— ॥ १३ ॥

इदमाह महाराज पार्थवाक्यं स्मरन् नरः ।

वाच्यो युधिष्ठिरः कृष्ण काले वाक्यमिदं मम ॥ १४ ॥

“ महाराज! जो मनुष्य मेरे पास आया था, उसने अर्जुनकी बात याद करके मुझसे इस प्रकार कहा — ' श्रीकृष्ण! आप ठीक समयपर मेरा यह कथन महाराज युधिष्ठिरको सुना

पृष्ठ 2016

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दीजियेगा ॥ १४ ॥

आगमिष्यन्ति राजानः सर्वे वै कौरवर्षभ ।

प्राप्तानां महतां पूजा कार्या ह्येतत् क्षमं हि नः ॥ १५ ॥

" ( अर्जुन कहते हैं— ) ' कौरवश्रेष्ठ! अश्वमेधयज्ञमें प्रायः सभी राजा पधारेंगे । जो आ जायँ उन सबको महान् मानकर उन सबका पूर्ण सत्कार करना चाहिये । यही हमारे योग्य कार्य है ॥ १५ ॥

इत्येतद्वचनाद् राजा विज्ञाप्यो मम मानद ।

यथा चात्ययिकं न स्याद् यदर्ध्याहरणेऽभवत् ॥ १६ ॥

( “इतना कहकर वे फिर मुझसे बोले – ) ' मानद! मेरी ओरसे तुम राजा युधिष्ठिरको यह सूचित कर देना कि राजसूय - यज्ञमें अर्घ्य देते समय जो दुर्घटना हो गयी थी, वैसी इस बार नहीं होनी चाहिये ॥ १६ ॥

कर्तुमर्हति तद् राजा भवांश्चाप्यनुमन्यताम् ।

राजद्वेषान्न नश्येयुरिमा राजन् पुनः प्रजाः ॥ १७ ॥

“ श्रीकृष्ण! राजा युधिष्ठिरको ऐसा ही करना चाहिये । आप भी उन्हें ऐसी ही अनुमति दें और बतावें कि ‘ राजन्! राजाओंके पारस्परिक द्वेषसे पुनः इन सारी प्रजाओंका विनाश न होने पावे ' ॥ १७ ॥

इदमन्यच्च कौन्तेय वचः स पुरुषोऽब्रवीत् ।

धनंजयस्य नृपते तन्मे निगदतः शृणु ॥ १८ ॥

( श्रीकृष्ण कहते हैं— ) ' कुन्तीनन्दन नरेश्वर! उस मनुष्यने अर्जुनकी कही हुई यह एक बात और बतायी थी, उसे भी मेरे मुँहसे सुन लीजिये ॥ १८ ॥

उपायास्यति यज्ञं नो मणिपूरपतिर्नृपः ।

पुत्रो मम महातेजा दयितो बभ्रुवाहनः ॥ १ ९ ॥

“ हमलोगोंके इस यज्ञमें मणिपुरका राजा बभ्रुवाहन भी आवेगा, जो महान् तेजस्वी और मेरा परम प्रिय पुत्र है ॥ १ ९ ॥

तं भवान् मदपेक्षार्थं विधिवत् प्रतिपूजयेत् ।

स तु भक्तोऽनुरक्तश्च मम नित्यमिति प्रभो ॥ २० ॥

“ प्रभो! उसकी सदा मेरे प्रति बड़ी भक्ति और अनुरक्ति रहती है । इसलिये आप मेरी अपेक्षासे उसका विधिपूर्वक विशेष सत्कार करें " ॥ २० ॥

इत्येतद् वचनं श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः ।

अभिनन्द्यास्य तद् वाक्यमिदं वचनमब्रवीत् ॥ २१ ॥

अर्जुनका यह संदेश सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने उसका हृदयसे अभिनन्दन किया और इस प्रकार कहा ॥

पृष्ठ 2017

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इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वमेधारम्भे षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वमेध यज्ञका आरम्भविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥

पृष्ठ 2018

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सप्ताशीतितमोऽध्यायः अर्जुनके विषयमें श्रीकृष्ण और युधिष्ठिरकी बातचीत, अर्जुनका हस्तिनापुरमें जाना तथा उलूपी और चित्राङ्गदाके साथ बभ्रुवाहनका आगमन युधिष्ठिर उवाच

श्रुतं प्रियमिदं कृष्ण यत् त्वमर्हसि भाषितुम् ।

तन्मेऽमृतरसं पुण्यं मनो ह्लादयति प्रभो ॥ १ ॥

युधिष्ठिर बोले – प्रभो! श्रीकृष्ण! मैंने यह प्रिय संदेश सुना, जिसे आप ही कहने या सुनानेके योग्य हैं । आपका यह अमृतरससे परिपूर्ण पवित्र वचन मेरे मनको आनन्दमग्न किये देता है ॥ १ ॥

बहूनि किल युद्धानि विजयस्य नराधिपैः ।

पुनरासन् हृषीकेश तत्र तत्र च मे श्रुतम् ॥ २ ॥

हृषीकेश! मेरे सुननेमें आया है कि भिन्न-भिन्न देशोंमें वहाँके राजाओंके साथ अर्जुनको कई बार युद्ध करने पड़े हैं ॥ २ ॥

किं निमित्तं स नित्यं हि पार्थः सुखविवर्जितः ।

अतीव विजयो धीमन्निति मे दूयते मनः ॥ ३ ॥

संचिन्तयामि कौन्तेयं रहो जिष्णुं जनार्दन ।

अतीव दुःखभागी स सततं पाण्डुनन्दनः ॥ ४ ॥

इसका क्या कारण है? बुद्धिमान् जनार्दन! जब मैं एकान्तमें बैठकर अर्जुनके बारेमें विचार करता हूँ, तब यह जानकर मेरा मन खिन्न हो जाता है कि हमलोगोंमें वे ही सदा सबसे अधिक दुःखके भागी रहे हैं । पाण्डुनन्दन अर्जुन सुखसे वंचित क्यों रहते हैं? यह समझमें नहीं आता ॥ ३-४ ॥

किं नु तस्य शरीरेऽस्ति सर्वलक्षणपूजिते ।

अनिष्टं लक्षणं कृष्ण येन दुःखान्युपाश्नुते ॥ ५ ॥

श्रीकृष्ण! उनका शरीर तो सभी शुभलक्षणोंसे सम्पन्न है । फिर उसमें अशुभ लक्षण कौन - सा है, जिससे उन्हें अधिक दुःख उठाना पड़ता है? ॥ ५ ॥

अतीवासुखभोगी स सततं कुन्तिनन्दनः ।

न हि पश्यामि बीभत्सोर्निन्द्यं गात्रेषु किंचन ।

श्रोतव्यं चेन्मयैतद् वै तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ६ ॥

पृष्ठ 2019

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कुन्तीनन्दन अर्जुन सदा अधिक कष्ट भोगते हैं; परंतु उनके अंगोंमें कहीं कोई निन्दनीय दोष नहीं दिखायी देता है । ऐसी दशामें उन्हें कष्ट भोगनेका कारण क्या है? यह मैं सुनना चाहता हूँ । आप मुझे विस्तारपूर्वक यह बात बतावें ॥ ६ ॥

इत्युक्तः स हृषीकेशो ध्यात्वा सुमहदुत्तरम् ।

राजानं भोजराजन्यवर्धनो विष्णुरब्रवीत् ॥ ७ ॥

युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर भोजवंशी क्षत्रियोंकी वृद्धि करनेवाले भगवान् हृषीकेश विष्णु बहुत देरतक उत्तम रीतिसे चिन्तन करनेके बाद राजा युधिष्ठिरसे यों कहा ॥ ७ ॥

न ह्यस्य नृपते किंचित् संश्लिष्टमुपलक्षये ।

ऋते पुरुषसिंहस्य पिण्डिकेऽस्याधिके यतः ॥ ८ ॥

‘ नरेश्वर! पुरुषसिंह अर्जुनकी पिण्डलियाँ ( फिल्लियाँ ) औसतसे कुछ अधिक मोटी हैं ।

इसके सिवा और कोई अशुभ लक्षण उनके शरीरमें मुझे भी नहीं दिखायी देता है ' ॥ ८ ॥

स ताभ्यां पुरुषव्याघ्रो नित्यमध्वसु वर्तते ।

न चान्यदनुपश्यामि येनासौ दुःखभाजनम् ॥ ९ ॥

' उन मोटी फिल्लियोंके कारण ही पुरुषसिंह अर्जुनको सदा रास्ता चलना पड़ता है ।

और कोई कारण मुझे नहीं दिखायी देता, जिससे उन्हें दुःख झेलना पड़े ' ॥ ९ ॥

इत्युक्तः पुरुषश्रेष्ठस्तदा कृष्णेन धीमता ।

प्रोवाच वृष्णिशार्दूलमेवमेतदिति प्रभो ॥ १० ॥

प्रभो! बुद्धिमान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर पुरुषश्रेष्ठ युधिष्ठिरने उन वृष्णिसिंहसे कहा -'भगवन्! आपका कहना ठीक है ' ॥ १० ॥

कृष्णा तु द्रौपदी कृष्णं तिर्यक् सासूयमैक्षत ।

प्रतिजग्राह तस्यास्तं प्रणयं चापि केशिहा ॥ ११ ॥

सख्युः सखा हृषीकेशः साक्षादिव धनंजयः । उस समय द्रुपदकुमारी कृष्णाने भगवान् श्रीकृष्णकी ओर तिरछी चितवनसे ईर्ष्यापूर्वक देखा । केशिहन्ता श्रीकृष्णने द्रौपदीके उस प्रेमपूर्ण उपालम्भको सानन्द ग्रहण किया; क्योंकि उसकी दृष्टिमें सखा अर्जुनके मित्र भगवान् हृषीकेश साक्षात् अर्जुनके ही समान थे ॥ ११ ॥

तत्र भीमादयस्ते तु कुरवो याजकाश्च ये ॥ १२ ॥

मुः श्रुत्वा विचित्रां तां धनंजयकथां शुभाम् । उस समय भीमसेन आदि कौरव और यज्ञ करानेवाले ब्राह्मणलोग अर्जुनके सम्बन्धमें यह शुभ एवं विचित्र बात सुनकर बहुत प्रसन्न हो रहे थे ॥ १२३ ॥

तेषां कथयतामेव पुरुषोऽर्जुनसंकथाः ॥ १३ ॥

उपायाद् वचनाद् दूतो विजयस्य महात्मनः ।

पृष्ठ 2020

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उन लोगोंमें अर्जुनके सम्बन्धमें इस तरहकी बातें हो ही रही थीं कि महात्मा अर्जुनका भेजा हुआ दूत वहाँ आ पहुँचा ॥ १३३ ॥

सोऽभिगम्य कुरुश्रेष्ठं नमस्कृत्य च बुद्धिमान् ॥ १४ ॥

उपायातं नरव्याघ्रं फाल्गुनं प्रत्यवेदयत् । वह बुद्धिमान् दूत कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरके पास जा उन्हें नमस्कार करके बोला ——पुरुषसिंह अर्जुन निकट आ गये हैं ' ॥ १४३ ॥

तच्छ्रुत्वा नृपतिस्तस्य हर्षबाष्पाकुलेक्षणः ॥ १५ ॥

प्रियाख्याननिमित्तं वै ददौ बहुधनं तदा । यह शुभ समाचार सुनकर राजा युधिष्ठिरकी आँखोंमें आनन्दके आँसू छलक आये और यह प्रिय वृत्तान्त निवेदन करनेके कारण उस दूतको पुरस्काररूपमें उन्होंने बहुत - सा धन दिया ॥ १५३ ॥

ततो द्वितीये दिवसे महान् शब्दो व्यवर्धत ॥ १६ ॥

आगच्छति नरव्याघ्रे कौरवाणां धुरंधरे । तदनन्तर दूसरे दिन कौरव- धुरंधर नरव्याघ्र अर्जुनके आते समय नगरमें महान् कोलाहल बढ़ गया ॥ १६३ ॥

ततो रेणुः समुद्भूतो विबभौ तस्य वाजिनः ॥ १७ ॥

अभितो वर्तमानस्य यथोच्चैःश्रवसस्तथा । उच्चैःश्रवाके समान वेगवान् और पास ही विद्यमान उस यज्ञसम्बन्धी घोड़ेकी टापसे उड़ी हुई धूल आकाशमें अद्भुत शोभा पा रही थी ॥ १७ ॥

तत्र हर्षकरी वाचो नराणां शुश्रुवेऽर्जुनः ॥ १८ ॥

दिष्ट्यासि पार्थ कुशली धन्यो राजा युधिष्ठिरः । वहाँ अर्जुनने लोगोंके मुँहसे हर्ष बढ़ानेवाली बातें इस प्रकार सुनीं-' पार्थ! यह बड़े

सौभाग्यकी बात है कि तुम सकुशल लौट आये । राजा युधिष्ठिर धन्य हैं ॥

कोऽन्यो हि पृथिवीं कृत्स्नां जित्वा हि युधि पार्थिवान् ॥ १ ९ ॥

चारयित्वा हयश्रेष्ठमुपागच्छेदृतेऽर्जुनात् । ' अर्जुनके सिवा दूसरा कौन ऐसा वीर पुरुष है जो समूची पृथ्वीको जीतकर युद्धमें राजाओंको परास्त करके और अपने श्रेष्ठ अश्वको सर्वत्र घुमाकर उसके साथ सकुशल लौट आ सके ॥ १ ९ ॥ ये व्यतीता महात्मानो राजानः सगरादयः ॥ २० ॥

तेषामपीदृशं कर्म न कदाचन शुश्रुम । ‘ अतीतकालमें जो सगर आदि महामनस्वी राजा हो गये हैं, उनका भी कभी ऐसा पराक्रम हमारे सुननेमें नहीं आया था ॥ २० ॥