श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 201–210
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 201–210
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पिनाकमिति विख्यातमभवत् पन्नगो महान् ॥ २५६ ॥
उन महात्मा रुद्रदेवका इन्द्रधनुषके समान रंगवाला जो पिनाक नामसे विख्यात धनुष है, वह विशाल सर्पके रूपमें प्रकट हुआ था ॥ २५६ ॥
सप्तशीर्षो महाकायस्तीक्ष्णदंष्ट्रो विषोल्बणः ।
ज्यावेष्टितमहाग्रीवः स्थितः पुरुषविग्रहः ॥ २५७ ॥
उसके सात फन थे । उसका डीलडौल भी विशाल था । तीखी दाढ़ें दिखायी देती थीं । वह अपने प्रचण्ड विषके कारण मतवाला हो रहा था । उसकी विशाल ग्रीवा प्रत्यञ्चासे आवेष्टित थी । वह पुरुष शरीर धारण करके खड़ा था ॥ २५७ ॥
शरश्च सूर्यसंकाशः कालानलसमद्युतिः ।
एतदस्त्रं महाघोरं दिव्यं पाशुपतं महत् ॥ २५८ ॥
भगवान्का जो बाण था वह सूर्य और प्रलयकालीन अग्निके समान प्रचण्ड तेजसे प्रकाशित होता था । यही अत्यन्त भयंकर एवं महान् दिव्य पाशुपत अस्त्र था ॥
अद्वितीयमनिर्देश्यं सर्वभूतभयावहम् ।
सस्फुलिङ्गं महाकायं विसृजन्तमिवानलम् ॥ २५ ९ ॥
उसके जोड़का दूसरा अस्त्र नहीं था । समस्त प्राणियोंको भय देनेवाला वह विशालकाय अस्त्र अनिर्वचनीय जान पड़ता था और अपने मुखसे चिनगारियोंसहित अग्निकी वर्षा कर रहा था ॥ २५ ९ ॥
एकपादं महादंष्ट्रं सहस्रशिरसोदरम् ।
सहस्रभुजजिह्वाक्षमुद्गिरन्तमिवानलम् ॥ २६० ॥
वह भी सर्पके ही आकारमें दृष्टिगोचर होता था। उसके एक पैर, बहुत बड़ी दाढ़ें, सहस्रों सिर, सहस्रों पेट, सहस्रों भुजा, सहस्रों जिह्वा और सहस्रों नेत्र थे । वह आग- सा उगल रहा था ॥ २६० ॥
ब्राह्मान्नारायणाच्चैन्द्रादाग्नेयादपि वारुणात् ।
यद् विशिष्टं महाबाहो सर्वशस्रविघातनम् ॥ २६१ ॥
महाबाहो! सम्पूर्ण शस्त्रोंका विनाश करनेवाला वह पाशुपत अस्त्र ब्राह्म, नारायण, ऐन्द्र, आग्नेय और वारुण अस्त्रसे भी बढ़कर शक्तिशाली था ॥ २६१ ॥
येन तत् त्रिपुरं दग्ध्वा क्षणाद् भस्मीकृतं पुरा ।
शरेणैकेन गोविन्द महादेवेन लीलया ॥ २६२ ॥
गोविन्द! उसीके द्वारा महादेवजीने लीलापूर्वक एक ही बाण मारकर क्षणभरमें दैत्योंके तीनों पुरोंको जलाकर भस्म कर दिया था ॥ २६२ ॥
निर्दहेत च यत् कृत्स्नं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।
महेश्वरभुजोत्सृष्टं निमेषार्धान्न संशयः ॥ २६३ ॥
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भगवान् महेश्वरकी भुजाओंसे छूटनेपर वह अस्त्र चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण त्रिलोकीको आधे निमेषमें ही भस्म कर देता है - इसमें संशय नहीं है ॥ २६३ ॥
नावध्यो यस्य लोकेऽस्मिन् ब्रह्मविष्णुसुरेष्वपि ।
तदहं दृष्टवांस्तत्र आश्चर्यमिदमुत्तमम् ॥ २६४ ॥
गुह्यमस्त्रवरं नान्यत् तत्तुल्यमधिकं हि वा । इस लोकमें जिस अस्त्रके लिये ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओंमेंसे भी कोई अवध्य नहीं है, उस परम उत्तम आश्चर्यमय पाशुपतास्त्रको मैंने यहाँ प्रत्यक्ष देखा था । वह श्रेष्ठ अस्त्र परम गोपनीय है । उसके समान अथवा उससे बढ़कर भी दूसरा कोई श्रेष्ठ अस्त्र नहीं है ॥ २६४३ ॥
यत् तच्छूलमिति ख्यातं सर्वलोकेषु शूलिनः ॥ २६५ ॥
दारयेद् यां महीं कृत्स्नां शोषयेद् वा महोदधिम् ।
संहरेद् वा जगत् कृत्स्नं विसृष्टं शूलपाणिना ॥ २६६ ॥
त्रिशूलधारी भगवान् शंकरका सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात जो वह त्रिशूल नामक अस्त्र है वह शूलपाणि शंकरके द्वारा छोड़े जानेपर इस सारी पृथ्वीको विदीर्ण कर सकता है, महासागरको सुखा सकता है अथवा समस्त संसारका संहार कर सकता है ॥ २६५-२६६ ॥
यौवनाश्वो हतो येन मान्धाता सबलः पुरा ।
चक्रवर्ती महातेजास्त्रिलोकविजयी नृपः ॥ २६७ ॥
महाबलो महावीर्यः शक्रतुल्यपराक्रमः ।
करस्थेनैव गोविन्द लवणस्येह रक्षसः ॥ २६८ ॥
श्रीकृष्ण! पूर्वकालमें त्रिलोकविजयी, महातेजस्वी, महाबली, महान् वीर्यशाली, इन्द्रतुल्य पराक्रमी चक्रवर्ती राजा मान्धाता लवणासुरके द्वारा प्रयुक्त हुए उस शूलसे ही सेनासहित नष्ट हो गये थे । अभी वह अस्त्र उस असुरके हाथसे छूटने भी नहीं पाया था कि राजाका सर्वनाश हो गया ॥ २६७-२६८ ॥
तच्छूलमतितीक्ष्णाग्रं सुभीमं लोमहर्षणम् ।
त्रिशिखां भ्रुकुटिं कृत्वा तर्जमानमिव स्थितम् ॥ २६ ९ ॥
उस शूलका अग्रभाग अत्यन्त तीक्ष्ण है । वह बहुत ही भयंकर और रोमाञ्चकारी है, मानो वह अपनी भौंहें तीन जगहसे टेढ़ी करके विरोधीको डाँट बता रहा हो, ऐसा जान पड़ता है ॥ २६ ९ ॥
विधूमं सार्चिषं कृष्णं कालसूर्यमिवोदितम् ।
सर्पहस्तमनिर्देश्यं पाशहस्तमिवान्तकम् ॥ २७० ॥
दृष्टवानस्मि गोविन्द तदस्त्रं रुद्रसंनिधौ ।
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गोविन्द! धूमरहित आगकी ज्वालाओंसहित वह काला त्रिशूल प्रलयकालके सूर्यके समान उदित हुआ था; और हाथमें सर्प लिये अवर्णनीय शक्तिशाली पाशधारी यमराजके समान जान पड़ता था । भगवान् रुद्रके निकट मैंने उसका भी दर्शन किया था ॥ २७० ३॥ परशुस्तीक्ष्णधारश्च दत्तो रामस्य यः पुरा ॥ २७१ ॥
महादेवेन तुष्टेन क्षत्रियाणां क्षयंकरः ।
कार्तवीर्यो हतो येन चक्रवर्ती महामृधे ॥ २७२ ॥
पूर्वकालमें महादेवजीने संतुष्ट होकर परशुरामको जिसका दान किया था और जिसके द्वारा महासमरमें चक्रवर्ती राजा कार्तवीर्य अर्जुन मारा गया था, क्षत्रियोंका विनाश करनेवाला वह तीखी धारसे युक्त परशु मुझे भगवान् रुद्रके निकट दिखायी दिया था ॥ २७१-२७२ ॥
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी येन निःक्षत्रिया कृता ।
जामदग्न्येन गोविन्द रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥ २७३ ॥
गोविन्द! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले जमदग्निनन्दन परशुरामने उसी परशुके द्वारा इक्कीस बार इस पृथ्वीको क्षत्रियोंसे शून्य कर दिया था ॥ २७३ ॥
दीप्तधारः सुरौद्रास्यः सर्पकण्ठाग्रधिष्ठितः ।
अभवच्छूलिनोऽभ्याशे दीप्तवह्निशतोपमः ॥ २७४ ॥
उसकी धार चमक रही थी, उसका मुखभाग बड़ा भयंकर जान पड़ता था । वह सर्पयुक्त कण्ठवाले महादेवजीके कण्ठके अग्रभागमें स्थित था । इस प्रकार शूलधारी भगवान् शिवके समीप वह परशु सैकड़ों प्रज्वलित अग्नियोंके समान देदीप्यमान होता था ॥ २७४ ॥
असंख्येयानि चास्त्राणि तस्य दिव्यानि धीमतः ।
प्राधान्यतो मयैतानि कीर्तितानि तवानघ ॥ २७५ ॥
निष्पाप श्रीकृष्ण! बुद्धिमान् भगवान् शिवके असंख्य दिव्यास्त्र हैं । मैंने यहाँ आपके सामने इन प्रमुख अस्त्रोंका वर्णन किया है ॥ २७५ ॥
सव्यदेशे तु देवस्य ब्रह्मा लोकपितामहः ।
दिव्यं विमानमास्थाय हंसयुक्तं मनोजवम् ॥ २७६ ॥
वामपार्श्वगतश्चापि तथा नारायणः स्थितः ।
वैनतेयं समारुह्य शंखचक्रगदाधरः ॥ २७७ ॥
उस समय महादेवजीके दाहिने भागमें लोकपितामह ब्रह्मा मनके समान वेगशाली हंसयुक्त दिव्य विमानपर बैठे हुए शोभा पा रहे थे और बायें भागमें शंख, चक्र और गदा धारण किये भगवान् नारायण गरुडपर विराजमान थे ॥ २७६-२७७ ॥
स्कन्दो मयूरमास्थाय स्थितो देव्याः समीपतः ।
शक्तिघण्टे समादाय द्वितीय इव पावकः ॥ २७८ ॥
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कुमार स्कन्द मोरपर चढ़कर हाथमें शक्ति और घंटा लिये पार्वतीदेवीके पास ही खड़े थे । वे दूसरे अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ २७८ ॥
पुरस्ताच्चैव देवस्य नन्दिं पश्याम्यवस्थितम् ।
शूलं विष्टभ्य तिष्ठन्तं द्वितीयमिव शंकरम् ॥ २७९ ॥
महादेवजीके आगे मैंने नन्दीको उपस्थित देखा, जो शूल उठाये दूसरे शंकरके समान खड़े थे ॥ २७ ९ ॥
स्वायम्भुवाद्या मनवो भृग्वाद्या ऋषयस्तथा ।
शक्राद्या देवताश्चैव सर्व एव समभ्ययुः ॥ २८० ॥
स्वायम्भुव आदि मनु, भृगु आदि ऋषि तथा इन्द्र आदि देवता- ये सभी वहाँ पधारे थे ॥ २८० ॥
सर्वभूतगणाश्चैव मातरो विविधाः स्थिताः ।
तेऽभिवाद्य महात्मानं परिवार्य समन्ततः ॥ २८१ ॥
अस्तुवन् विविधैः स्तोत्रैर्महादेवं सुरास्तदा । समस्त भूतगण और नाना प्रकारकी मातृकाएँ उपस्थित थीं । वे सब देवता महात्मा महादेवजीको चारों ओरसे घेरकर नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति कर रहे थे ॥ २८१३ ॥
ब्रह्मा भवं तदास्तौषीद् रथन्तरमुदीरयन् ॥ २८२ ॥
ज्येष्ठसाम्ना च देवेशं जगौ नारायणस्तदा ॥ २८३ ॥
ब्रह्माजीने रथन्तर सामका उच्चारण करके उस समय भगवान् शंकरकी स्तुति की ।
नारायणने ज्येष्ठसामद्वारा देवेश्वर शिवकी महिमाका गान किया ॥
गृणन् ब्रह्म परं शक्रः शतरुद्रियमुत्तमम् ।
ब्रह्मा नारायणश्चैव देवराजश्च कौशिकः ॥ २८४ ॥
अशोभन्त महात्मानस्त्रयस्त्रय इवाग्नयः । इन्द्रने उत्तम शतरुद्रियका सस्वर पाठ करते हुए परब्रह्म शिवका स्तवन किया । ब्रह्मा, नारायण और देवराज इन्द्र–ये तीनों महात्मा तीन अग्नियोंके समान शोभा पा रहे थे ॥ २८४३ ॥
तेषां मध्यगतो देवो रराज भगवान् शिवः ॥ २८५ ॥
शरदभ्रविनिर्मुक्तः परिधिस्थ इवांशुमान् । इन तीनोंके बीचमें विराजमान भगवान् शिव शरद् ऋतुके बादलोंके आवरणसे मुक्त हो परिधि ( घेरे ) -में स्थित हुए सूर्यदेवके समान शोभा पा रहे थे ॥ २८५३ ॥
अयुतानि च चन्द्रार्कानपश्यं दिवि केशव ॥ २८६ ॥
ततोऽहमस्तुवं देवं विश्वस्य जगतः पतिम् ।
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केशव! उस समय मैंने आकाशमें सहस्रों चन्द्रमा और सूर्य देखे । तदनन्तर मैं सम्पूर्ण जगत्के पालक महादेवजीकी स्तुति करने लगा ॥ २८६३ ॥
उपमन्युरुवाच नमो देवाधिदेवाय महादेवाय ते नमः ॥ २८७ ॥
शक्ररूपाय शक्राय शक्रवेषधराय च ।
नमस्ते वज्रहस्ताय पिङ्गलायारुणाय च ॥ २८८ ॥
उपमन्यु बोले – प्रभो! आप देवताओंके भी अधिदेवता हैं । आपको नमस्कार है । आप ही महान् देवता हैं, आपको नमस्कार है । इन्द्र आपके ही रूप हैं । आप ही साक्षात् इन्द्र हैं तथा आप इन्द्रका - सा वेश धारण करनेवाले हैं । इन्द्रके रूपमें आप ही अपने हाथमें वज्र लिये रहते हैं । आपका वर्ण पिंगल और अरुण है, आपको नमस्कार है ॥ २८७-२८८ ॥
पिनाकपाणये नित्यं शङ्खशूलधराय च ।
नमस्ते कृष्णवासाय कृष्णकुञ्चितमूर्धजे ॥ २८ ९ ॥
आपके हाथमें पिनाक शोभा पाता है । आप सदा शंख और त्रिशूल धारण करते हैं । आपके वस्त्र काले हैं तथा आप मस्तकपर काले घुँघराले केश धारण करते हैं, आपको नमस्कार है ॥ २८९ ॥
कृष्णाजिनोत्तरीयाय कृष्णाष्टमिरताय च ।
शुक्लवर्णाय शुक्लाय शुक्लाम्बरधराय च ॥ २ ९ ० ॥
काला मृगचर्म आपका दुपट्टा है । आप श्रीकृष्णाष्टमीव्रतमें तत्पर रहते हैं । आपका वर्ण शुक्ल है । आप स्वरूपसे भी शुक्ल ( शुद्ध ) हैं तथा आप श्वेत वस्त्र धारण करते हैं । आपको नमस्कार है ॥ २ ९ ० ॥
शुक्लभस्मावलिप्ताय शुक्लकर्मरताय च ।
नमोऽस्तु रक्तवर्णाय रक्ताम्बरधराय च ॥ २ ९ १ ॥
आप अपने सारे अंगोंमें श्वेत भस्म लपेटे रहते हैं । विशुद्ध कर्ममें अनुरक्त हैं । कभी-कभी आप रक्त वर्णके हो जाते हैं और लाल वस्त्र ही धारण कर लेते हैं । आपको नमस्कार है ॥ २ ९ १ ॥
रक्तध्वजपताकाय रक्तस्रगनुलेपिने ।
नमोऽस्तु पीतवर्णाय पीताम्बरधराय च ॥ २ ९ २ ॥
रक्ताम्बरधारी होनेपर आप अपनी ध्वजा- पताका भी लाल ही रखते हैं । लाल फूलोंकी माला पहनकर अपने श्रीअंगोंमें लाल चन्दनका ही लेप लगाते हैं। किसी समय आपकी अंगकान्ति पीले रंगकी हो जाती है । ऐसे समयमें आप पीताम्बर धारण करते हैं । आपको नमस्कार है ॥ २ ९ २ ॥ नमोऽस्तूच्छ्रितच्छत्राय किरीटवरधारिणे ।
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अर्धहारार्धकेयूर अर्धकुण्डलकर्णिने ॥ २ ९ ३ ॥ आपके मस्तकपर ऊँचा छत्र तना है। आप सुन्दर किरीट धारण करते हैं । अर्द्धनारीश्वररूपमें आपके आधे अंगमें ही हार, आधेमें ही केयूर और आधे अंगके ही कानमें
कुण्डल शोभा पाता है । आपको नमस्कार है ॥ २ ९ ३ ॥
नमः पवनवेगाय नमो देवाय वै नमः ।
सुरेन्द्राय मुनीन्द्राय महेन्द्राय नमोऽस्तु ते ॥ २ ९ ४ ॥
आप वायुके समान वेगशाली हैं। आपको नमस्कार है । आप ही मेरे आराध्यदेव हैं । आपको बारंबार नमस्कार है । आप ही सुरेन्द्र, मुनीन्द्र और महेन्द्र हैं । आपको नमस्कार है ॥ २ ९ ४ ॥
नमः पद्मार्धमालाय उत्पलैर्मिश्रिताय च ।
अर्धचन्दनलिप्ताय अर्धस्रगनुलेपिने ॥ २ ९ ५ ॥
आप अपने आधे अंगको कमलोंकी मालासे अलंकृत करते हैं और आधेमें उत्पलोंसे विभूषित होते हैं । आधे अंगमें चन्दनका लेप लगाते हैं तो आधे शरीरमें फूलोंका गजरा और सुगन्धित अंगराग धारण करते हैं । ऐसे अर्द्धनारीश्वररूपमें आपको नमस्कार है ॥ २ ९ ५ ॥
नम आदित्यवक्त्राय आदित्यनयनाय च ।
नम आदित्यवर्णाय आदित्यप्रतिमाय च ॥ २ ९ ६ ॥
आपके मुख सूर्यके समान तेजस्वी हैं । सूर्य आपके नेत्र हैं । आपकी अंगकान्ति भी सूर्यके ही समान है तथा आप अधिक सादृश्यके कारण सूर्यकी प्रतिमा - से जान पड़ते ॥ २ ९ ६ ॥
नमः सोमाय सौम्याय सौम्यवक्त्रधराय च ।
सौम्यरूपाय मुख्याय सौम्यदंष्ट्राविभूषिणे ॥ २ ९ ७ ॥
आप सोमस्वरूप हैं । आपकी आकृति बड़ी सौम्य है । आप सौम्य मुख धारण करते हैं । आपका रूप भी सौम्य है । आप प्रमुख देवता हैं और सौम्य दन्तावलीसे विभूषित होते हैं । आपको नमस्कार है ॥ २ ९ ७ ॥
नमः श्यामाय गौराय अर्धपीतार्धपाण्डवे ।
नारीनरशरीराय स्त्रीपुंसाय नमोऽस्तु ते ॥ २ ९ ८ ॥
आप हरिहररूप होनेके कारण आधे शरीरसे साँवले और आधेसे गोरे हैं । आधे शरीरमें पीताम्बर धारण करते हैं और आधेमें श्वेत वस्त्र पहनते हैं । आपको नमस्कार है । आपके आधे शरीरमें नारीके अवयव हैं और आधेमें नरके । आप स्त्री- पुरुषरूप हैं । आपको नमस्कार है ॥ २ ९ ८ ॥
नमो वृषभवाहाय गजेन्द्रगमनाय च ।
दुर्गमाय नमस्तुभ्यमगम्यगमनाय च ॥ २ ९९ ॥
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आप कभी बैलपर सवार होते हैं और कभी गजराजकी पीठपर बैठकर यात्रा करते हैं । आप दुर्गम हैं । आपको नमस्कार है । जो दूसरोंके लिये अगम्य है, वहाँ भी आपकी गति है । आपको नमस्कार है ॥ २ ९९ ॥
नमोऽस्तु गणगीताय गणवृन्दरताय च ।
गणानुयातमार्गाय गणनित्यव्रताय च ॥ ३०० ॥
प्रमथगण आपकी महिमाका गान करते हैं । आप अपने पार्षदोंकी मण्डलीमें रत रहते हैं । आपके प्रत्येक मार्गपर प्रमथगण आपके पीछे - पीछे चलते हैं । आपकी सेवा ही गणोंका
नित्य- व्रत है । आपको नमस्कार है ॥
नमः श्वेताभ्रवर्णाय संध्यारागप्रभाय च ।
अनुद्दिष्टाभिधानाय स्वरूपाय नमोऽस्तु ते ॥ ३०१ ॥
आपकी कान्ति श्वेत बादलोंके समान है । आपकी प्रभा संध्याकालीन अरुणरागके
समान है । आपका कोई निश्चित नाम नहीं है । आप सदा स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं ।
आपको नमस्कार है ॥ ३०१ ॥
नमो रक्ताग्रवासाय रक्तसूत्रधराय च ।
रक्तमालाविचित्राय रक्ताम्बरधराय च ॥ ३०२ ॥
आपका सुन्दर वस्त्र लाल रंगका है । आप लाल सूत्र धारण करते हैं । लाल रंगकी मालासे आपकी विचित्र शोभा होती है। आप रक्त वस्त्रधारी रुद्रदेवको नमस्कार है ॥ ३०२ ॥
मणिभूषितमूर्धाय नमश्चन्द्रार्धभूषिणे ।
विचित्रमणिमूर्धाय कुसुमाष्टधराय च ॥ ३०३ ॥
आपका मस्तक दिव्य मणिसे विभूषित है। आप अपने ललाटमें अर्द्धचन्द्रका आभूषण धारण करते हैं । आपका सिर विचित्र मणिकी प्रभासे प्रकाशमान है और आप आठ पुष्प धारण करते हैं ॥ ३०३ ॥
नमोऽग्निमुखनेत्राय सहस्रशशिलोचने ।
अग्निरूपाय कान्ताय नमोऽस्तु गहनाय च ॥ ३०४ ॥
आपके मुख और नेत्रमें अग्निका निवास है । आपके नेत्र सहस्रों चन्द्रमाओंके समान प्रकाशित हैं । आप अग्निस्वरूप, कमनीयविग्रह और दुर्गम गहन (वन) रूप हैं । आपको नमस्कार है ॥ ३०४ ॥
खचराय नमस्तुभ्यं गोचराभिरताय च ।
भूचराय भुवनाय अनन्ताय शिवाय च ॥ ३०५ ॥
चन्द्रमा और सूर्यके रूपमें आप आकाशचारी देवताको नमस्कार है । जहाँ गौएँ चरती हैं
उस स्थानसे आप विशेष प्रेम रखते हैं। आप पृथ्वीपर विचरनेवाले और त्रिभुवनरूप हैं ।
अनन्त एवं शिवस्वरूप हैं । आपको नमस्कार है ॥ ३०५ ॥
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नमो दिग्वाससे नित्यमधिवाससुवाससे ।
नमो जगन्निवासाय प्रतिपत्तिसुखाय च ॥ ३०६ ॥
आप दिगम्बर हैं । आपको नमस्कार है । आप सबके आवास- स्थान और सुन्दर वस्त्र धारण करनेवाले हैं । सम्पूर्ण जगत् आपमें ही निवास करता है । आपको सम्पूर्ण सिद्धियोंका
सुख सुलभ है । आपको नमस्कार है ॥ ३०६ ॥
नित्यमुद्बद्धमुकुटे महाकेयूरधारिणे ।
सर्पकण्ठोपहाराय विचित्राभरणाय च ॥ ३०७ ॥
आप मस्तकपर सदा मुकुट बाँधे रहते हैं । भुजाओंमें विशाल केयूर धारण करते हैं । आपके कण्ठमें सर्पोंका हार शोभा पाता है तथा आप विचित्र आभूषणोंसे विभूषित होते हैं । आपको नमस्कार है ॥ ३०७ ॥
नमस्त्रिनेत्रनेत्राय सहस्रशतलोचने ।
स्त्रीपुंसाय नपुंसाय नमः सांख्याय योगिने ॥ ३०८ ॥
सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि-ये तीन नेत्ररूप होकर आपको त्रिनेत्रधारी बना देते हैं । आपके लाखों नेत्र हैं । आप स्त्री हैं, पुरुष हैं और नपुंसक हैं । आप ही सांख्यवेत्ता और योगी हैं । आपको नमस्कार है ॥ ३०८ ॥
शंयोरभिस्रवन्ताय अथर्वाय नमो नमः ।
नमः सर्वार्तिनाशाय नमः शोकहराय च ॥ ३० ९ ॥
आप यज्ञपूरक ‘ शंयु ' नामक देवताके प्रसादरूप हैं और अथर्ववेदस्वरूप हैं । आपको बारंबार नमस्कार है । जो सबकी पीड़ाका नाश करनेवाले और शोकहारी हैं, उन्हें नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ३० ९ ॥
नमो मेघनिनादाय बहुमायाधराय च ।
बीजक्षेत्राभिपालाय स्रष्ट्राराय नमो नमः ॥ ३१० ॥
जो मेघके समान गम्भीर नाद करनेवाले तथा बहुसंख्यक मायाओंके आधार हैं, जो बीज और क्षेत्रका पालन करते हैं और जगत्की सृष्टि करनेवाले हैं, उन भगवान् शिवको बारंबार नमस्कार है ॥ ३१० ॥
नमः सुरासुरेशाय विश्वेशाय नमो नमः ।
नमः पवनवेगाय नमः पवनरूपिणे ॥ ३११ ॥
आप देवताओं और असुरोंके स्वामी हैं । आपको नमस्कार है । आप सम्पूर्ण विश्वके
ईश्वर हैं । आपको बारंबार नमस्कार है । आप वायुके समान वेगशाली तथा वायुरूप हैं ।
आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ३११ ॥
नमः काञ्चनमालाय गिरिमालाय वै नमः ।
नमः सुरारिमालाय चण्डवेगाय वै नमः ॥ ३१२ ॥
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आप सुवर्णमालाधारी तथा पर्वत- मालाओंमें विहार करनेवाले हैं । देवशत्रुओंके मुण्डोंकी माला धारण करनेवाले प्रचण्ड वेगशाली आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ३१२ ॥
ब्रह्मशिरोपहर्ताय महिषघ्नाय वै नमः ।
नमः स्त्रीरूपधाराय यज्ञविध्वंसनाय च ॥ ३१३ ॥
ब्रह्माजीके मस्तकका उच्छेद और महिषका विनाश करनेवाले आपको नमस्कार है ।
आप स्त्रीरूप धारण करनेवाले तथा यज्ञके विध्वंसक हैं । आपको नमस्कार है ॥ ३१३ ॥
नमस्त्रिपुरहर्ताय यज्ञविध्वंसनाय च ।
नमः कामाङ्गनाशाय कालदण्डधराय च ॥ ३१४ ॥
असुरोंके तीनों पुरोंका विनाश और दक्ष यज्ञका विध्वंस करनेवाले आपको नमस्कार है । कामके शरीरका नाश तथा कालदण्डको धारण करनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ३१४ ॥
नमः स्कन्दविशाखाय ब्रह्मदण्डाय वै नमः ।
नमो भवाय शर्वाय विश्वरूपाय वै नमः ॥ ३१५ ॥
स्कन्द और विशाखरूप आपको नमस्कार है । ब्रह्मदण्डस्वरूप आपको नमस्कार है । भव ( उत्पादक ) और शर्व ( संहारक ) -रूप आपको नमस्कार है । विश्वरूपधारी प्रभुको नमस्कार है ॥ ३१५ ॥
ईशानाय भवघ्नाय नमोऽस्त्वन्धकघातिने ।
नमो विश्वाय मायाय चिन्त्याचिन्त्याय वै नमः ॥ ३१६ ॥
आप सबके ईश्वर, संसार- बन्धनका नाश करनेवाले तथा अन्धकासुरके घातक हैं । आपको नमस्कार है । आप सम्पूर्ण मायास्वरूप तथा चिन्त्य और अचिन्त्यरूप हैं । आपको नमस्कार है ॥ ३१६ ॥
त्वं नो गतिश्च श्रेष्ठश्च त्वमेव हृदयं तथा ।
त्वं ब्रह्मा सर्वदेवानां रुद्राणां नीललोहितः ॥ ३१७ ॥
आप ही हमारी गति हैं, श्रेष्ठ हैं और आप ही हमारे हृदय हैं । आप सम्पूर्ण देवताओंमें ब्रह्मा तथा रुद्रोंमें नीललोहित हैं ॥ ३१७ ॥
आत्मा च सर्वभूतानां सांख्ये पुरुष उच्यते ।
ऋषभस्त्वं पवित्राणां योगिनां निष्कलः शिवः ॥ ३१८ ॥
आप समस्त प्राणियोंमें आत्मा और सांख्यशास्त्रमें पुरुष कहलाते हैं। आप पवित्रोंमें ऋषभ तथा योगियोंमें निष्कल शिवरूप हैं ॥ ३१८ ॥
गृहस्थस्त्वमाश्रमिणामीश्वराणां महेश्वरः ।
कुबेरः सर्वयक्षाणां क्रतूनां विष्णुरुच्यते ॥ ३१ ९ ॥
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आप आश्रमियोंमें गृहस्थ, ईश्वरोंमें महेश्वर, सम्पूर्ण यक्षोंमें कुबेर तथा यज्ञोंमें विष्णु कहलाते हैं ॥ ३१ ९ ॥
पर्वतानां भवान् मेरुर्नक्षत्राणां च चन्द्रमाः ।
वसिष्ठस्त्वमृषीणां च ग्रहाणां सूर्य उच्यते ॥ ३२० ॥
पर्वतोंमें आप मेरु हैं । नक्षत्रोंमें चन्द्रमा हैं । ऋषियोंमें वसिष्ठ हैं तथा ग्रहोंमें सूर्य कहलाते हैं ॥ ३२० ॥
आरण्यानां पशूनां च सिंहस्त्वं परमेश्वरः ।
ग्राम्याणां गोवृषश्चासि भवाँल्लोकप्रपूजितः ॥ ३२१ ॥
आप जंगली पशुओंमें सिंह हैं । आप ही परमेश्वर हैं । ग्रामीण पशुओंमें आप ही लोकसम्मानित साँड़ हैं ॥ ३२१ ॥
आदित्यानां भवान् विष्णुर्वसूनां चैव पावकः ।
पक्षिणां वैनतेयस्त्वमनन्तो भुजगेषु च ॥ ३२२ ॥
आप ही आदित्योंमें विष्णु हैं । वसुओंमें अग्नि हैं । पक्षियोंमें आप विनतानन्दन गरुड और सर्पोंमें अनन्त ( शेषनाग ) हैं ॥ ३२२ ॥
सामवेदश्च वेदानां यजुषां शतरुद्रियम् ।
सनत्कुमारो योगानां सांख्यानां कपिलो ह्यसि ॥ ३२३ ॥
आप वेदोंमें सामवेद, यजुर्वेदके मन्त्रोंमें शतरुद्रिय, योगियोंमें सनत्कुमार और सांख्यवेत्ताओंमें कपिल हैं ॥
शक्रोऽसि मरुतां देव पितॄणां हव्यवाडसि ।
ब्रह्मलोकश्च लोकानां गतीनां मोक्ष उच्यसे ॥ ३२४ ॥
देव! आप मरुद्गणोंमें इन्द्र, पितरोंमें हव्यवाहन अग्नि, लोकोंमें ब्रह्मलोक और गतियोंमें मोक्ष कहलाते हैं ॥
क्षीरोदः सागराणां च शैलानां हिमवान् गिरिः ।
वर्णानां ब्राह्मणश्चासि विप्राणां दीक्षितो द्विजः ॥ ३२५ ॥
आप समुद्रोंमें क्षीरसागर, पर्वतोंमें हिमालय, वर्णोंमें ब्राह्मण और ब्राह्मणोंमें भी दीक्षित ब्राह्मण ( यज्ञकी दीक्षा लेनेवाले ) हैं ॥ ३२५ ॥
आदिस्त्वमसि लोकानां संहर्ता काल एव च ।
यच्चान्यदपि लोके वै सर्व तेजोऽधिकं स्मृतम् ॥ ३२६ ॥
तत् सर्वं भगवानेव इति मे निश्चिता मतिः । आप ही सम्पूर्ण लोकोंके आदि हैं । आप ही संहार करनेवाले काल हैं । संसारमें और भी जो - जो वस्तुएँ सर्वथा तेजमें बढ़ी चढ़ी हैं, वे सभी आप भगवान् ही हैं - यह मेरी निश्चित धारणा है ॥ ३२६३ ॥
नमस्ते भगवन् देव नमस्ते भक्तवत्सल ॥ ३२७ ॥