श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 2211–2220

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2211–2220

पृष्ठ 2211

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मदिरा, आसव, विष, घी, लाख, नमक और तेलकी बिक्री करनेवाले ब्राह्मणको भी चान्द्रायण- व्रत करना आवश्यक है ॥

एकोद्दिष्टं तु यो भुङ्क्ते जनमध्यगतोऽपि यः ।

भिन्नभाण्डेषु यो भुङ्क्ते द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ॥

जो द्विज एकोद्दिष्ट श्राद्धका अन्न खाता है और अधिक मनुष्योंकी भीड़में भोजन करता है तथा फूटे बर्तनोंमें खाता है, उसे चान्द्रायण- व्रत करना चाहिये ॥

यो भुङ्क्तेऽनुपनीतेन यो भुङ्क्ते च स्त्रिया सह ।

कन्यया सह यो भुङ्क्ते द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ॥

जो उपनयन - संस्कारसे रहित बालक, कन्या और स्त्रीके साथ (एक पात्रमें ) भोजन करता है, वह ब्राह्मण चान्द्रायण व्रत करे ॥

उच्छिष्टं स्थापयेद् विप्रो यो मोहाद् भोजनान्तरे ।

दद्याद् वा यदि वा मोहाद् द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ॥

जो मोहवश अपना जूठा दूसरेके भोजनमें मिला देता है अथवा मोहके कारण दूसरेको देता है, उस ब्राह्मणको भी चान्द्रायण व्रतका आचरण करना चाहिये ॥

तुम्बकोशातकं चैव पलाण्डुं गृञ्जनं तथा ।

छत्राकं लशुनं चैव भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥

यदि द्विज तुम्बा और जिसमें केश पड़ा हो, ऐसा अन्न तथा प्याज, गाजर, छत्राक ( कुकुरमुत्ते) और लहसुनको खा ले तो उसे चान्द्रायण व्रत करना चाहिये ॥

उदक्यया शुना वापि चाण्डालैर्वा द्विजोत्तमः ।

दृष्टमन्नं तु भुञ्जानो द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ॥

यदि ब्राह्मण रजस्वला स्त्री, कुत्ते अथवा चाण्डालके द्वारा देखा हुआ अन्न खा ले तो उस ब्राह्मणको चान्द्रायण व्रतका आचरण करना चाहिये ॥

एतत् पुरा विशुद्ध्यर्थमृषिभिश्चरितं व्रतम् ।

पावनं सर्वभूतानां पुण्यं पाण्डव चोदितम् ॥

पाण्डुनन्दन! पूर्वकालमें ऋषियोंने आत्मशुद्धिके लिये इस व्रतका आचरण किया था, यह सब प्राणियोंको पवित्र करनेवाला और पुण्यरूप बताया गया है ॥

यथोक्तमेतद् यः कुर्याद् द्विजः पापप्रणाशनम् ।

स दिवं याति पूतात्मा निर्मलादित्यसंनिभः ॥

जो द्विज इस पूर्वोक्त पापनाशक व्रतका अनुष्ठान करता है, वह पवित्रात्मा तथा निर्मल सूर्यके समान तेजस्वी होकर स्वर्गलोकको प्राप्त होता है ॥ (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त )

पृष्ठ 2212

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* अर्थात् शुक्लपक्षकी प्रतिपदाको एक ग्रास और द्वितीयाको दो ग्रास भोजन करना चाहिये । इसी तरह पूर्णिमाको पंद्रह ग्रास भोजन करके कृष्णपक्षकी प्रतिपदासे चतुर्दशीतक प्रतिदिन एक-एक ग्रास कम करना चाहिये । अमावस्याको उपवास करनेपर इस व्रतकी समाप्ति होती है । यह एक प्रकारका चान्द्रायण है । स्मृतियोंमें इसके और भी अनेकों प्रकार उपलब्ध होते हैं ।

पृष्ठ 2213

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[ सर्वहितकारी धर्मका वर्णन, द्वादशी व्रतका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके द्वारा भगवान्की स्तुति ] युधिष्ठिर उवाच

सर्वभूतपते श्रीमन् सर्वभूतनमस्कृत ।

सर्वभूतहितं धर्मं सर्वज्ञ कथयस्व नः ॥

युधिष्ठिरने कहा - भगवन्! आप सब प्राणियोंके स्वामी, सबके द्वारा नमस्कृत, शोभासम्पन्न और सर्वज्ञ हैं । अब आप मुझसे समस्त प्राणियोंके लिये हितकारी धर्मका वर्णन कीजिये || श्रीभगवानुवाच

यद् दरिद्रजनस्यापि स्वर्ग्यं सुखकरं भवेत् ।

सर्वपापप्रशमनं तच्छृणुष्व युधिष्ठिर ॥

श्रीभगवान् बोले— युधिष्ठिर! जो धर्म दरिद्र मनुष्योंको भी स्वर्ग और सुख प्रदान करनेवाला तथा समस्त पापोंका नाश करनेवाला है, उसका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥

एकभुक्तेन वर्तेत नरः संवत्सरं तु यः ।

ब्रह्मचारी जितक्रोधो ह्यधःशायी जितेन्द्रियः ॥

शुचिश्च स्नातो ह्यव्यग्रः सत्यवागनसूयकः ।

अर्चन्नेव तु मां नित्यं मद्गतेनान्तरात्मना ।

संध्ययोस्तु जपेन्नित्यं मद्गायत्रीं समाहितः ॥

नमो ब्रह्मण्यदेवायेत्यसकृन्मां प्रणम्य च ।

विप्रमग्रासने कृत्वा यावकं भैक्षमेव वा ॥

भुक्त्वा तु वाग्यतो भूमावाचान्तस्य द्विजन्मनः ।

नमोऽस्तु वासुदेवायेत्युक्त्वा तु चरणौ स्पृशेत् ॥

मासे मासे समाप्ते तु भोजयित्वा द्विजान् शुचीन् ।

संवत्सरे ततः पूर्णे दद्यात् तु व्रतदक्षिणाम् ॥

नवनीतमयीं गां वा तिलधेनुमथापि वा ।

विप्रहस्तच्युतैस्तोयैः सहिरण्यैः समुक्षितः ।

तस्य पुण्यफलं राजन् कथ्यमानं मया शृणु ॥

राजन्! जो मनुष्य एक वर्षतक प्रतिदिन एक समय भोजन करता है, ब्रह्मचारी रहता है, क्रोधको काबू में रखता है, नीचे सोता है और इन्द्रियोंको वशमें रखता है, जो स्नान करके पवित्र रहता है, व्यग्र नहीं होता है, सत्य बोलता है, किसीके दोष नहीं देखता है और मुझमें चित्त लगाकर सदा मेरी पूजामें ही संलग्न रहता है, जो दोनों संध्याओंके समय एकाग्रचित्त होकर मुझसे सम्बन्ध रखनेवाली गायत्रीका जप करता है, ' नमो ब्रह्मण्यदेवाय ' *कहकर

पृष्ठ 2214

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सदा मुझे प्रणाम किया करता है, पहले ब्राह्मणको भोजनके आसनपर बिठाकर भोजन करानेके पश्चात् स्वयं मौन होकर जौकी लप्सी अथवा भिक्षान्नका भोजन करता है तथा ' नमोऽस्तु वासुदेवाय ' कहकर ब्राह्मणके चरणोंमें प्रणाम करता है; जो प्रत्येक मास समाप्त होनेपर पवित्र ब्राह्मणोंको भोजन कराता है और एक सालतक इस नियमका पालन करके ब्राह्मणको इस व्रतकी दक्षिणाके रूपमें माखन अथवा तिलकी गौ दान करता है तथा ब्राह्मणके हाथसे सुवर्णयुक्त जल लेकर अपने शरीरपर छिड़कता है, उसके पुण्यका फल बतलाता हूँ, सुनो ॥

दशजन्मकृतं पापं ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपि वा ।

तद् विनश्यति तस्याशु नात्र कार्या विचारणा ॥

उसके जान- बूझकर या अनजानमें किये हुए दस जन्मोंतकके पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं - इसमें तनिक भी अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ युधिष्ठिर उवाच

सर्वेषामुपवासानां यच्छ्रेयः सुमहत्फलम् ।

यच्च निःश्रेयसं लोके तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥

युधिष्ठिरने कहा — भगवन्! सब प्रकारके उपवासोंमें जो सबसे श्रेष्ठ, महान् फल देनेवाला और कल्याणका सर्वोत्तम साधन हो, उसका वर्णन करनेकी कृपा कीजिये ॥ श्रीभगवानुवाच

शृणु राजन् मया पूर्वं यथा गीतं तु नारदे ।

तथा ते कथयिष्यामि मद्भक्ताय युधिष्ठिर ॥

श्रीभगवान् बोले — महाराज युधिष्ठिर! तुम मेरे भक्त हो । जैसे पूर्वमें मैंने नारदसे कहा था, वैसे ही तुम्हें बतलाता हूँ, सुनो ॥ यस्तु भक्त्या शुचिर्भूत्वा पञ्चम्यां मे नराधिप ।

उपवासव्रतं कुर्यात् त्रिकालं चार्चयंस्तु माम् ।

सर्वक्रतुफलं लब्ध्वा मम लोके महीयते ॥

नरेश! जो पुरुष स्नान आदिसे पवित्र होकर मेरी पञ्चमीके दिन भक्तिपूर्वक उपवास करता है तथा तीनों समय मेरी पूजामें संलग्न रहता है, वह सम्पूर्ण यज्ञोंका फल पाकर मेरे परम धाममें प्रतिष्ठित होता है ॥

पर्वद्वयं च द्वादश्यौ श्रवणं च नराधिप ।

मत्पञ्चमीति विख्याता मत्प्रिया च विशेषतः ॥

नरेश्वर! अमावास्या और पूर्णिमा– ये दोनों पर्व, दोनों पक्षकी द्वादशी तथा श्रवण-नक्षत्र — ये पाँच तिथियाँ मेरी पञ्चमी कहलाती हैं । ये मुझे विशेष प्रिय हैं ॥ तस्मात् तु ब्राह्मणश्रेष्ठर्मन्निवेशितबुद्धिभिः ।

पृष्ठ 2215

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उपवासस्तु कर्तव्यो मत्प्रियार्थं विशेषतः ॥ अतः श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उचित है कि वे मेरा विशेष प्रिय करनेके लिये मुझमें चित्त लगाकर इन तिथियोंमें उपवास करें ॥

द्वादश्यामेव वा कुर्यादुपवासमशक्नुवन् ।

तेनाहं परमां प्रीतिं यास्यामि नरपुङ्गव ॥

नरश्रेष्ठ! जो सबमें उपवास न कर सके, वह केवल द्वादशीको ही उपवास करे; इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता होती है ॥

अहोरात्रेण द्वादश्यां मार्गशीर्षेण केशवम् ।

उपोष्य पूजयेद् यो मां सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥

जो मार्गशीर्षकी द्वादशीको दिन- रात उपवास करके ' केशव ' नामसे मेरी पूजा करता है, उसे अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है ॥

द्वादश्यां पुष्यमासे तु नाम्ना नारायणं तु माम् ।

उपोष्य पूजयेद् यो मां वाजिमेधफलं लभेत् ॥

जो पौष मासकी द्वादशीको उपवास करके ' नारायण ' नामसे मेरी पूजा करता है, वह वाजिमेध - यज्ञका फल पाता है ॥

द्वादश्यां माघमासे तु मामुपोष्य तु माधवम् ।

पूजयेद् यः समाप्नोति राजसूयफलं नृप ॥

राजन्! जो माघकी द्वादशीको उपवास करके ' माधव' नामसे मेरा पूजन करता है, उसे राजसूय - यज्ञका फल प्राप्त होता है ॥

द्वादश्यां फाल्गुने मासि गोविन्दाख्यमुपोष्य माम् ।

पूजयेद् यः समाप्नोति ह्यतिरात्रफलं नृप ॥

नरेश्वर! फाल्गुनके महीनेमें द्वादशीको उपवास करके जो ' गोविन्द ' के नामसे मेरा अर्चन करता है, उसे अतिरात्र यागका फल मिलता है ॥

द्वादश्यां मासि चैत्रे तु मां विष्णुं समुपोष्य यः ।

पूजयंस्तदवाप्नोति पौण्डरीकस्य यत् फलम् ॥

चैत्र महीनेकी द्वादशी तिथिको व्रत धारण करके जो ' विष्णु ' नामसे मेरी पूजा करता है, वह पुण्डरीक- यज्ञके फलका भागी होता है ॥

द्वादश्यां मासि वैशाखे मधुसूदनसंज्ञितम् ।

उपोष्य पूजयेद् यो मां सोऽग्निष्टोमस्य पाण्डव ॥

पाण्डुनन्दन! वैशाखकी द्वादशीको उपवास करके ' मधुसूदन ' नामसे मेरी पूजा करनेवालेको अग्निष्टोम यज्ञका फल मिलता है ॥

द्वादश्यां ज्येष्ठमासे तु मामुपोष्य त्रिविक्रमम् ।

अर्चयेद् यः समाप्नोति गवां मेधफलं नृप ॥

पृष्ठ 2216

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राजन्! जो मनुष्य ज्येष्ठमासकी द्वादशी तिथिको उपवास करके ' त्रिविक्रम ' नामसे मेरी पूजा करता है, वह गोमेधके फलका भागी होता है ॥

आषाढे वामनाख्यं मां द्वादश्यां समुपोष्य यः ।

नरमेधस्य स फलं प्राप्नोति भरतर्षभ ॥

भरतश्रेष्ठ! आषाढ़मासकी द्वादशीको व्रत रहकर ‘ वामन ' नामसे मेरी पूजा करनेवाले पुरुषको नरमेध--यज्ञका फल प्राप्त होता है ॥

द्वादश्यां श्रावणे मासि श्रीधराख्यमुपोष्य माम् ।

पूजयेद्यः समाप्नोति पञ्चयज्ञफलं नृप ॥

राजन्! श्रावण महीनेमें द्वादशी तिथिको उपवास करके जो ' श्रीधर' नामसे मेरा पूजन करता है, वह पञ्चयज्ञोंका फल पाता है ॥

मासे भाद्रपदे यो मां हृषीकेशाख्यमर्चयेत् ।

उपोष्य स समाप्नोति सौत्रामणिफलं नृप ॥

नरेश्वर! भाद्रपदमासकी द्वादशी तिथिको उपवास करके ' हृषीकेश' नामसे मेरा अर्चन करनेवालेको सौत्रामणि- यज्ञका फल मिलता है ॥

द्वादश्यामाश्वयुङ्मासे पद्मनाभमुपोष्य माम् ।

अचेयेद् यः समाप्नोति गोसहस्रफलं नृप ॥

महाराज! आश्विनकी द्वादशीको उपवास करके जो ' पद्मनाभ ' नामसे मेरा अर्चन करता है, उसे एक हजार गोदानका फल प्राप्त होता है ॥

द्वादश्यां कार्तिके मासि मां दामोदरसंज्ञितम् ।

उपोष्य पूजयेद् यस्तु सर्वक्रतुफलं नृप ॥

राजन्! कार्तिक महीनेकी द्वादशी तिथिको व्रत रहकर जो ' दामोदर' नामसे मेरी पूजा करता है, उसको सम्पूर्ण यज्ञोंका फल मिलता है ॥

केवलेनोपवासेन द्वादश्यां पाण्डुनन्दन ।

यत् फलं पूर्वमुद्दिष्टं तस्यार्धं लभते नृप ॥

नरपते! जो द्वादशीको केवल उपवास ही करता है, उसे पूर्वोक्त फलका आधा भाग ही प्राप्त होता है ॥

श्रावणेऽप्येवमेवं मामर्चयेद् भक्तिमान् नरः ।

मम सालोक्यमाप्नोति नाज कार्या विचारणा ॥

इसी प्रकार श्रावणमें भी यदि मनुष्य भक्तियुक्त चित्तसे मेरी पूजा करता है तो वह मेरी सालोक्य मुक्तिको प्राप्त होता है, इसमें तनिक भी अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥

मासे मासे समभ्यर्च्य क्रमशो मामतन्द्रितः ।

पूर्णे संवत्सरे कुर्यात् पुनः संवत्सरं तु माम् ॥

पृष्ठ 2217

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उपर्युक्तरूपसे प्रतिमास आलस्य छोड़कर मेरी पूजा करते- करते जब एक साल पूरा हो जाय, तब पुनः दूसरे साल भी मासिक पूजन प्रारम्भ कर दे ॥

एवं द्वादशवर्षं यो मद्भक्तो मत्परायणः ।

अविघ्नमर्चयानस्तु मम सायुज्यमाप्नुयात् ॥

इस प्रकार जो मेरा भक्त मेरी आराधनामें तत्पर होकर बारह वर्षतक बिना किसी विघ्न - बाधाके मेरी पूजा करता रहता है, वह मेरे स्वरूपको प्राप्त हो जाता है ॥

अर्चयेत् प्रीतिमान् यो मां द्वादश्यां वेदसंहिताम् ।

स पूर्वोक्तफलं राजँल्लभते नात्र संशयः ॥

राजन्! जो मनुष्य द्वादशी तिथिको प्रेमपूर्वक मेरी और वेदसंहिताकी पूजा करता है, उसे पूर्वोक्त फलोंकी प्राप्ति होती है, इसमें संशय नहीं है ॥

गन्धं पुष्पं फलं तोयं पत्रं वा मूलमेव वा ।

द्वादश्यां मम यो दद्यात् तत्समो नास्ति मत्प्रियः ॥

जो द्वादशी तिथिको मेरे लिये चन्दन, पुष्प, फल, जल, पत्र अथवा मूल अर्पण करता है उसके समान मेरा प्रिय भक्त कोई नहीं है ॥

एतेन विधिना सर्वे देवाः शक्रपुरोगमाः ।

मद्भक्ता नरशार्दूल स्वर्गलोकं तु भुञ्जते ॥

नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर! इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता उपर्युक्त विधिसे मेरा भजन करनेके कारण ही आज स्वर्गीय सुखका उपभोग कर रहे हैं ॥ वैशम्पायन उवाच

एवं वदति देवेशे केशवे पाण्डुनन्दनः ।

कृताञ्जलिः स्तोत्रमिदं भक्त्या धर्मात्मजोऽब्रवीत् ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णके इस प्रकार उपदेश देनेपर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर हाथ जोड़कर भक्तिपूर्वक उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे – ॥

सर्वलोकेश देवेश हृषीकेश नमोऽस्तु ते ।

सहस्रशिरसे नित्यं सहस्राक्ष नमोऽस्तु ते ॥

' हृषीकेश! आप सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी और देवताओंके भी ईश्वर हैं । आपको नमस्कार है । हजारों नेत्र धारण करनेवाले परमेश्वर! आपके सहस्रों मस्तक हैं, आपको सदा प्रणाम है ॥

त्रयीमय त्रयीनाथ त्रयीस्तुत नमो नमः ।

यज्ञात्मन् यज्ञसम्भूत यज्ञनाथ नमो नमः ॥

‘ वेदत्रयी आपका स्वरूप है, तीनों वेदोंके आप अधीश्वर हैं और वेदत्रयीके द्वारा आपकी ही स्तुति की गयी है । आप ही यज्ञस्वरूप, यज्ञमें प्रकट होनेवाले और यज्ञके स्वामी

पृष्ठ 2218

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हैं । आपको बारंबार नमस्कार है ॥

चतुर्मूर्ते चतुर्बाहो चतुर्व्यूह नमो नमः ।

लोकात्मँल्लोककृन्नाथ लोकावास नमो नमः ॥

‘ आप चार रूप धारण करनेवाले, चार भुजाधारी और चतुर्व्यूहस्वरूप हैं । आपको बारंबार नमस्कार है । आप विश्वरूप, लोकेश्वरोंके अधीश्वर तथा सम्पूर्ण लोकोंके निवासस्थान हैं, आपको मेरा पुनः पुनः प्रणाम है ॥

सृष्टिसंहारकर्त्रे ते नरसिंह नमो नमः ।

भक्तप्रिय नमस्तेऽस्तु कृष्ण नाथ नमो नमः ॥

'नरसिंह! आप ही इस जगत्की सृष्टि और संहार करनेवाले हैं आपको बारंबार नमस्कार है । भक्तोंके प्रियतम श्रीकृष्ण! स्वामिन्! आपको बारंबार प्रणाम है ॥

लोकप्रिय नमस्तेऽस्तु भक्तवत्सल ते नमः ।

ब्रह्मावास नमस्तेऽस्तु ब्रह्मनाथ नमो नमः ॥

‘ आप सम्पूर्ण लोकोंके प्रिय हैं। आपको नमस्कार है । भक्तवत्सल! आपको नमस्कार है । आप ब्रह्माके निवासस्थान और उनके स्वामी हैं । आपको प्रणाम है ॥

रुद्ररूप नमस्तेऽस्तु रुद्रकर्मरताय ते ।

पञ्चयज्ञ नमस्तेऽस्तु सर्वयज्ञ नमो नमः ॥

रुद्ररूप! आपको नमस्कार है । रौद्र कर्ममें रत रहनेवाले आपको नमस्कार है ।

पञ्चयज्ञरूप! आपको नमस्कार है । सर्वयज्ञस्वरूप! आपको नमस्कार है ॥

कृष्ण प्रिय नमस्तेऽस्तु कृष्ण नाथ नमो नमः ।

योगिप्रिय नमस्तेऽस्तु योगिनाथ नमो नमः ॥

' प्यारे श्रीकृष्ण! आपको प्रणाम है । स्वामिन्! श्रीकृष्ण! आपको बारंबार नमस्कार है ।

योगियोंके प्रिय! आपको नमस्कार है । योगियोंके स्वामी! आपको बार- बार प्रणाम है ॥

हयवक्त्र नमस्तेऽस्तु चक्रपाणे नमो नमः ।

पञ्चभूत नमस्तेऽस्तु पञ्चायुध नमो नमः ॥

' हयग्रीव! आपको नमस्कार है । चक्रपाणे! आपको बारंबार नमस्कार है । पञ्चभूतस्वरूप! आपको नमस्कार है । आप पाँच आयुध धारण करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है ' ॥ वैशम्पायन उवाच

भक्तिगद्गदया वाचा स्तुवत्येवं युधिष्ठिरे ।

गृहीत्वा केशवो हस्ते प्रीतात्मा तं न्यवारयत् ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! धर्मराज युधिष्ठिर जब भक्तिगद्गद वाणीसे इस प्रकार भगवान्की स्तुति करने लगे, तब श्रीकृष्णने प्रसन्नतापूर्वक धर्मराजका हाथ पकड़कर

पृष्ठ 2219

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2219 का मूल पृष्ठ
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उन्हें रोका ॥ निवार्य च पुनर्वाचा भक्तिनम्रं युधिष्ठिरम् । वक्तुमेव नरश्रेष्ठ धर्मपुत्रं प्रचक्रमे । नरोत्तम! भगवान् श्रीकृष्ण पुनः वाणीद्वारा निवारण करके भक्तिसे विनम्र हुए धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे यों कहने लगे ॥ श्रीभगवानुवाच

अन्यवत् किमिदं राजन् मां स्तौषि नरपुङ्गव ।

तिष्ठ प्रच्छ यथापूर्वं धर्मपुत्र युधिष्ठिर ॥

श्रीभगवान् बोले— राजन्! यह क्या है? तुम भेद - भाव रखनेवाले मनुष्यकी भाँति मेरी स्तुति क्यों करने लगे? पुरुषप्रवर धर्मपुत्र युधिष्ठिर! इसे बंद करके पहलेके ही समान प्रश्न करो ॥ युधिष्ठिर उवाच

इदं च धर्मसम्पन्नं वक्तुमर्हसि मानद ।

कृष्णपक्षेषु द्वादश्यामर्चनीयः कथं भवेत् ॥

युधिष्ठिरने पूछा- मानद! कृष्णपक्षमें द्वादशीको आपकी पूजा किस प्रकार करनी चाहिये? इस धर्मयुक्त विषयका वर्णन कीजिये ॥ श्रीभगवानुवाच

शृणु राजन् यथा पूर्वं तत् सर्वं कथयामि ते ।

परमं कृष्णद्वादश्यामर्चनायां फलं मम ॥

श्रीभगवान्ने कहा— राजन्! मैं पूर्ववत् तुम्हारे सभी प्रश्नोंका उत्तर देता हूँ, सुनो । कृष्णपक्षकी द्वादशीको मेरी पूजा करनेका बहुत बड़ा फल है ॥

एकादश्यामुपोष्याथ द्वादश्यामर्चयेत् तु माम् ।

विप्रानपि यथालाभं पूजयेद् भक्तिमान् नरः ॥

एकादशीको उपवास करके द्वादशीको मेरा पूजन करना चाहिये । उस दिन भक्तियुक्त मनुष्यको यथाशक्ति ब्राह्मणोंका भी पूजन करना चाहिये ॥

स गच्छेद् दक्षिणामूर्तिं मां वा नात्र विचारणा ।

चन्द्रसालोक्यमथवा ग्रहनक्षत्रपूजितः ॥

ऐसा करनेसे मनुष्य दक्षिणामूर्ति शिवको अथवा मुझे प्राप्त होता है; इसमें कोई संशय नहीं है । अथवा वह ग्रह-नक्षत्रोंसे पूजित हुआ चन्द्रमाके लोकको प्राप्त हो जाता है ॥ (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त )

पृष्ठ 2220

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ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च । जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ॥