06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 2291–2300
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2291–2300
पृष्ठ 2291
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नवमोऽध्यायः प्रजाजनोंसे धृतराष्ट्रकी क्षमा -प्रार्थना धृतराष्ट्रउवाच
शान्तनुः पालयामास यथावद् वसुधामिमाम् ।
तथा विचित्रवीर्यश्च भीष्मेण परिपालितः ॥ १ ॥
पालयामास नस्तातो विदितार्थो न संशयः । धृतराष्ट्र बोले- सज्जनो! महाराज शान्तनुने इस पृथ्वीका यथावत्रूपसे पालन किया था । उसके बाद भीष्मद्वारा सुरक्षित हमारे तत्त्वज्ञ पिता विचित्रवीर्यने इस भूमण्डलकी रक्षा की; इसमें संशय नहीं है ॥ १३ ॥
यथा च पाण्डुर्भ्राता मे दयितो भवतामभूत् ॥ २ ॥
स चापि पालयामास यथावत् तच्च वेत्थ ह । उनके बाद मेरे भाई पाण्डुने इस राज्यका यथावत्रूपसे पालन किया । इसे आप सब लोग जानते हैं । अपने प्रजापालनरूपी गुणके कारण ही वे आपलोगोंके परम प्रिय हो गये थे ॥ २ ॥
मया च भवतां सम्यक् शुश्रूषा या कृतानघाः ॥ ३ ॥
असम्यग् वा महाभागास्तत् क्षन्तव्यमतन्द्रितैः । निष्पाप महाभागगण! पाण्डुके बाद मैंने भी आपलोगोंकी भली या बुरी सेवा की है, उसमें जो भूल हुई हो, उसके लिये आप आलस्यरहित प्रजाजन मुझे क्षमा करें ॥ ३३ ॥
यदा दुर्योधनेनेदं भुक्तं राज्यमकण्टकम् ॥ ४ ॥
अपि तत्र न वो मन्दो दुर्बुद्धिरपराद्धवान् । दुर्योधनने जब अकण्टक राज्यका उपभोग किया था, उस समय उस खोटी बुद्धिवाले मूर्ख नरेशने भी आपलोगोंका कोई अपराध नहीं किया था ( वह केवल पाण्डवोंके साथ अन्याय करता रहा ) ॥ ४३ ॥
तस्यापराधाद् दुर्बुद्धेरभिमानान्महीक्षिताम् ॥ ५ ॥
विमर्दः सुमहानासीदनयात् स्वकृतादथ । (घातिताः कौरवेयाश्च पृथिवी च विनाशिता । ) उस दुर्बुद्धिके अपने ही किये हुए अन्याय, अपराध और अभिमानसे यहाँ असंख्य
राजाओंका महान् संहार हो गया । सारे कौरव मारे गये और पृथ्वीका विनाश हो गया ॥ ५३
|| तन्मया साधु वापीदं यदि वासाधु वै कृतम् ॥ ६ ॥
पृष्ठ 2292
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तद् वो हृदि न कर्तव्यं मया बद्धोऽयमञ्जलिः । उस अवसरपर मुझसे भला या बुरा जो कुछ भी कृत्य हो गया, उसे आपलोग अपने मनमें न लावें । इसके लिये मैं आपलोगोंसे हाथ जोड़कर क्षमा- प्रार्थना करता हूँ ॥ ६३ ॥
वृद्धोऽयं हतपुत्रोऽयं दुःखितोऽयं नराधिपः ॥ ७ ॥
पूर्वराज्ञां च पुत्रोऽयमिति कृत्वानुजानथ । ‘ यह राजा धृतराष्ट्र बूढ़ा है । इसके पुत्र मारे गये हैं; अतः यह दुःखमें डूबा हुआ है और -यह अपने प्राचीन राजाओंका वंशज है ' – ऐसा समझकर आपलोग मेरे अपराधोंको क्षमा करते हुए मुझे वनमें जानेकी आज्ञा दें ॥ ७३ ॥
इयं च कृपणा वृद्धा हतपुत्रा तपस्विनी ॥ ८ ॥
गान्धारी पुत्रशोकार्ता युष्मान् याचति वै मया । यह बेचारी वृद्धा तपस्विनी गान्धारी, जिसके सभी पुत्र मारे गये हैं तथा जो पुत्रशोकसे व्याकुल रहती है, मेरे साथ आपलोगोंसे क्षमा- याचना करती है ॥ ८३ ॥
हतपुत्राविमौ वृद्धौ विदित्वा दुःखितौं तथा ॥ ९ ॥
अनुजानीत भद्रं वो व्रजाव शरणं च वः । इन दोनों बूढ़ोंको पुत्रोंके मारे जानेसे दुःखी जानकर आपलोग वनमें जानेकी आज्ञा दें । आपका कल्याण हो । हम दोनों आपकी शरणमें आये हैं ॥ ९ ३ ॥ अयं च कौरवो राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ १० ॥
सर्वैर्भवद्भिर्द्रष्टव्यः समेषु विषमेषु च । ये कुरुकुलरत्न कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर आपलोगोंके पालक हैं । अच्छे और बुरे सभी समयोंमें आप सब लोग इनपर कृपादृष्टि रखें ॥ १०३ ॥
न जातु विषमं चैव गमिष्यति कदाचन ॥ ११ ॥
चत्वारः सचिवा यस्य भ्रातरो विपुलौजसः ।
लोकपालसमा ह्येते सर्वधर्मार्थदर्शिनः ॥ १२ ॥
ब्रह्मेव भगवानेष सर्वभूतजगत्पतिः । (एवमेव महाबाहुर्भीमार्जुनयमैर्वृतः । ) युधिष्ठिरो महातेजा भवतः पालयिष्यति ॥ १३ ॥
ये कभी आपलोगोंके प्रति विषमभाव नहीं रखेंगे। लोकपालोंके समान महातेजस्वी तथा सम्पूर्ण धर्म और अर्थके मर्मज्ञ ये चार भाई जिनके सचिव हैं, वे भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवसे घिरे हुए महाबाहु महातेजस्वी युधिष्ठिर सम्पूर्ण जीव जगत्के स्वामी भगवान् ब्रह्माकी भाँति आपलोगोंका इसी तरह पालन करेंगे, जैसे पहलेके लोग करते आये हैं ॥ ११–१३ ॥ अवश्यमेव वक्तव्यमिति कृत्वा ब्रवीमि वः ।
पृष्ठ 2293
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
एष न्यासो मया दत्तः सर्वेषां वो युधिष्ठिरः ॥ १४ ॥
भवन्तोऽस्य च वीरस्य न्यासभूताः कृता मया । मुझे ये बातें अवश्य कहनी चाहिये, ऐसा सोचकर ही मैं आपलोगोंसे यह सब कहता हूँ। मैं इन राजा युधिष्ठिरको धरोहरके रूपमें आप सब लोगोंके हाथ सौंप रहा हूँ और आपलोगोंको भी इन वीर नरेशके हाथमें धरोहरकी ही भाँति दे रहा हूँ ॥ १४ ॥
यदेव तैः कृतं किंचिद् व्यलीकं वः सुतैर्मम ॥ १५ ॥
यदन्येन मदीयेन तदनुज्ञातुमर्हथ । मेरे पुत्रोंने तथा मुझसे सम्बन्ध रखनेवाले और किसीने आपलोगोंका जो कुछ भी अपराध किया हो, उसके लिये मुझे क्षमा करें और जानेकी आज्ञा दें ॥ भवद्भिर्न हि मे मन्युः कृतपूर्वः कथंचन ॥ १६ ॥
अत्यन्तगुरुभक्तानामेषोऽञ्जलिरिदं नमः । आपलोगोंने पहले मुझपर किसी तरह कोई रोष नहीं प्रकट किया है । आपलोग अत्यन्त गुरुभक्त हैं; अतः आपके सामने मेरे ये दोनों हाथ जुड़े हुए हैं और मैं आपको यह प्रणाम करता हूँ ॥ १६३ ॥
तेषामस्थिरबुद्धीनां लुब्धानां कामचारिणाम् ॥ १७ ॥
कृते याचेऽद्य वः सर्वान् गान्धारीसहितोऽनघाः । निष्पाप प्रजाजन! मेरे पुत्रोंकी बुद्धि चंचल थी । वे लोभी और स्वेच्छाचारी थे । उनके अपराधोंके लिये आज गान्धारीसहित मैं आप सब लोगों से क्षमा- याचना करता हूँ ॥ १७ ||
इत्युक्तास्तेन ते सर्वे पौरजानपदा जनाः ।
नोचुर्बाष्पकलाः किंचिद् वीक्षांचक्रुः परस्परम् ॥ १८ ॥
धृतराष्ट्रके इस प्रकार कहनेपर नगर और जनपदमें निवास करनेवाले सब लोग नेत्रोंसे
आँसू बहाते हुए एक- दूसरेका मुँह देखने लगे । किसीने कोई उत्तर नहीं दिया ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्रप्रार्थने नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्ट्रकी प्रार्थनाविषयक नवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १ ९ श्लोक हैं )
पृष्ठ 2294
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दशमोऽध्यायः प्रजाकी ओरसे साम्ब नामक ब्राह्मणका धृतराष्ट्रको सान्त्वनापूर्ण उत्तर देना वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तास्तु ते तेन पौरजानपदा जनाः ।
वृद्धेन राज्ञा कौरव्य नष्टसंज्ञा इवाभवन् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! बूढ़े राजा धृतराष्ट्रके ऐसे करुणामय वचन कहनेपर नगर और जनपदके निवासी सभी लोग दुःखसे अचेत से हो गये ॥
तूष्णीम्भूतांस्ततस्तांस्तु बाष्पकण्ठान् महीपतिः ।
धृतराष्ट्रो महीपालः पुनरेवाभ्यभाषत ॥ २ ॥
उन सबके कण्ठ आँसुओंसे अवरुद्ध हो गये थे; अतः वे कुछ बोल नहीं पाते थे । उन्हें मौन देख महाराज धृतराष्ट्रने फिर कहा- ॥ २ ॥
वृद्धं च हतपुत्रं च धर्मपत्न्या सहानया ।
विलपन्तं बहुविधं कृपणं चैव सत्तमाः ॥ ३ ॥
पित्रा स्वयमनुज्ञातं कृष्णद्वैपायनेन वै ।
वनवासाय धर्मज्ञा धर्मज्ञेन नृपेण ह ॥ ४ ॥
सोऽहं पुनः पुनश्चैव शिरसावनतोऽनघाः ।
गान्धार्या सहितं तन्मां समनुज्ञातुमर्हथ ॥ ५ ॥
‘ सज्जनो! मैं बूढ़ा हूँ । मेरे सभी पुत्र मार डाले गये हैं । मैं अपनी इस धर्मपत्नीके साथ बारंबार दीनतापूर्वक विलाप कर रहा हूँ । मेरे पिता स्वयं महर्षि व्यासने मुझे वनमें जानेकी आज्ञा दे दी है । धर्मज्ञ पुरुषो! धर्मके ज्ञाता राजा युधिष्ठिरने भी वनवासके लिये अनुमति दे दी है । वही मैं अब पुनः बारंबार आपके सामने मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ। पुण्यात्मा प्रजाजन! आपलोग गान्धारीसहित मुझे वनमें जानेकी आज्ञा दे दें ' ॥ ३–५ ॥ वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा कुरुराजस्य वाक्यानि करुणानि ते ।
रुरुदुः सर्वशो राजन् समेताः कुरुजाङ्गलाः ॥ ६ ॥
उत्तरीयैः करैश्चापि संच्छाद्य वदनानि ते ।
रुरुदुः शोकसंतप्ता मुहूर्तं पितृमातृवत् ॥ ७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! कुरुराजकी ये करुणाभरी बातें सुनकर वहाँ एकत्र हुए कुरुजांगलदेशके सब लोग दुपट्टों और हाथोंसे अपना - अपना मुँह ढँककर रोने
पृष्ठ 2295
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
लगे । अपनी संतानको विदा करते समय दुःखसे कातर हुए पिता- माताकी भाँति वे दो घड़ीतक शोकसे संतप्त होकर रोते रहे ॥ ६-७ ॥
हृदयैः शून्यभूतैस्ते धृतराष्ट्रप्रवासजम् ।
दुःखं संधारयन्तो हि नष्टसंज्ञा इवाभवन् ॥ ८ ॥
उनका हृदय शून्य - सा हो गया था । वे उस सूने हृदयसे धृतराष्ट्रके प्रवासजनित दुःखको धारण करके अचेत - से हो गये ॥ ८ ॥
ते विनीय तमायासं धृतराष्ट्रवियोगजम् ।
शनैः शनैस्तदान्योन्यमब्रुवन् सम्मतान्युत ॥ ९ ॥
फिर धीरे- धीरे उनके वियोगजनित दुःखको दूर करके उन सबने आपसमें वार्तालाप किया और अपनी सम्मति प्रकट की ॥ ९ ॥
ततः संधाय ते सर्वे वाक्यान्यथ समासतः ।
एकस्मिन् ब्राह्मणे राजन् निवेश्योचुर्नराधिपम् ॥ १० ॥
राजन्! तदनन्तर एकमत होकर उन सब लोगोंने थोड़ेमें अपनी सारी बातें कहनेका भार एक ब्राह्मणपर रखा । उन ब्राह्मणके द्वारा ही उन्होंने राजासे अपनी बात कही ॥ १० ॥
ततः स्वाचरणो विप्रः सम्मतोऽर्थविशारदः ।
साम्बाख्यो बह्वृचो राजन् वक्तुं समुपचक्रमे ॥ ११ ॥
अनुमान्य महाराजं तत् सदः सम्प्रसाद्य च ।
विप्रः प्रगल्भो मेधावी स राजानमुवाच ह ॥ १२ ॥
वे ब्राह्मण देवता सदाचारी, सबके माननीय और अर्थज्ञानमें निपुण थे, उनका नाम था साम्ब । वे वेदके विद्वान्, निर्भय होकर बोलनेवाले और बुद्धिमान् थे। वे महाराजको सम्मान देकर सारी सभाको प्रसन्न करके बोलनेको उद्यत हुए । उन्होंने राजासे इस प्रकार कहा ॥ ११-१२ ॥
राजन् वाक्यं जनस्यास्य मयि सर्वं समर्पितम् ।
वक्ष्यामि तदहं वीर तज्जुषस्व नराधिप ॥ १३ ॥
‘ राजन्! वीर नरेश्वर! यहाँ उपस्थित हुए समस्त जनसमुदायने अपना मन्तव्य प्रकट करनेका सारा भार मुझे सौंप दिया है; अतः मैं ही इनकी बातें आपकी सेवामें निवेदन करूँगा । आप सुननेकी कृपा करें ॥ १३ ॥
यथा वदसि राजेन्द्र सर्वमेतत् तथा विभो ।
नात्र मिथ्या वचः किंचित् सुहृत्त्वं नः परस्परम् ॥ १४ ॥
‘ राजेन्द्र! प्रभो! आप जो कुछ कहते हैं, वह सब ठीक है । उसमें असत्यका लेश भी नहीं है । वास्तवमें इस राजवंशमें और हमलोगोंमें परस्पर दृढ़ सौहार्द स्थापित हो चुका है ॥ १४ ॥
पृष्ठ 2296
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
न जात्वस्य च वंशस्य राज्ञां कश्चित् कदाचन ।
राजाऽऽसीद् यः प्रजापालः प्रजानामप्रियोऽभवत् ॥ १५ ॥
‘ इस राजवंशमें कभी कोई भी ऐसा राजा नहीं हुआ, जो प्रजापालन करते समय समस्त प्रजाओंको प्रिय न रहा हो ॥ १५ ॥
पितृवद् भ्रातृवच्चैव भवन्तः पालयन्ति नः ।
न च दुर्योधनः किंचिदयुक्तं कृतवान् नृपः ॥ १६ ॥
‘ आपलोग पिता और बड़े भाईके समान हमारा पालन करते आये हैं । राजा दुर्योधनने भी हमारे साथ कोई अनुचित बर्ताव नहीं किया है ॥ १६ ॥
यथा ब्रवीति धर्मात्मा मुनिः सत्यवतीसुतः ।
तथा कुरु महाराज स हि नः परमो गुरुः ॥ १७ ॥
‘ महाराज! परम धर्मात्मा सत्यवतीनन्दन महर्षि व्यासजी आपको जैसी सलाह देते हैं, वैसा ही कीजिये; क्योंकि वे हम सब लोगोंके परम गुरु हैं ॥ १७ ॥
त्यक्ता वयं तु भवता दुःखशोकपरायणाः ।
भविष्यामश्चिरं राजन् भवद्गुणशतैर्युताः ॥ १८ ॥
‘ राजन्! आप जब हमें त्याग देंगे, हमें छोड़कर चले जायँगे, तब हम बहुत दिनोंतक दुःख और शोकमें डूबे रहेंगे । आपके सैकड़ों गुणोंकी याद सदा हमें घेरे रहेगी ।
यथा शान्तनुना गुप्ता राज्ञा चित्राङ्गदेन च ।
भीष्मवीर्योपगूढेन पित्रा तव च पार्थिव ॥ १ ९ ॥
भवदुद्वीक्षणाच्चैव पाण्डुना पृथिवीक्षिता ।
तथा दुर्योधनेनापि राज्ञा सुपरिपालिताः ॥ २० ॥
' पृथ्वीनाथ! महाराज शान्तनु तथा राजा चित्रांगदने जिस प्रकार हमारी रक्षा की है, भीष्मके पराक्रमसे सुरक्षित आपके पिता विचित्रवीर्यने जिस तरह हमलोगोंका पालन किया है तथा आपकी देख- रेख में रहकर पृथ्वीपति पाण्डुने जिस प्रकार प्रजाजनोंकी रक्षा की है, उसी प्रकार राजा दुर्योधनने भी हमलोगोंका यथावत् पालन किया है ॥ १ ९ -२० ॥
न स्वल्पमपि पुत्रस्ते व्यलीकं कृतवान् नृप ।
पितरीव सुविश्वस्तास्तस्मिन्नपि नराधिपे ॥ २१ ॥
वयमास्म यथा सम्यग् भवतो विदितं तथा । ' नरेश्वर! आपके पुत्रने कभी थोड़ा- सा भी अन्याय हमलोगोंके साथ नहीं किया । हमलोग उन राजा दुर्योधनपर भी पिताके समान विश्वास करते थे और उनके राज्यमें बड़े
सुखसे जीवन व्यतीत करते थे । यह बात आपको भी विदित ही है ' ॥ २१३ ॥
तथा वर्षसहस्राणि कुन्तीपुत्रेण धीमता ॥ २२ ॥
पाल्यमाना धृतिमता सुखं विन्दामहे नृप ।
पृष्ठ 2297
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
' नरेश्वर! भगवान् करें कि बुद्धिमान् कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिर धैर्यपूर्वक सहस्रों वर्षतक हमारा पालन करें और हम इनके राज्यमें सुखसे रहें ॥ २२ ॥
राजर्षीणां पुराणानां भवतां पुण्यकर्मणाम् ॥ २३ ॥
कुरुसंवरणादीनां भरतस्य च धीमतः ।
वृत्तं समनुयात्येष धर्मात्मा भूरिदक्षिणः ॥ २४ ॥
' यज्ञोंमें बड़ी - बड़ी दक्षिणा प्रदान करनेवाले ये धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर प्राचीन कालके पुण्यात्मा राजर्षि कुरु और संवरण आदिके तथा बुद्धिमान् राजा भरतके बर्तावका अनुसरण करते हैं ॥ २३-२४ ॥
नात्र वाच्यं महाराज सुसूक्ष्ममपि विद्यते ।
उषिताः स्म सुखं नित्यं भवता परिपालिताः ॥ २५ ॥
'महाराज! इनमें कोई छोटे - से -छोटा दोष भी नहीं है । इनके राज्यमें आपके द्वारा सुरक्षित होकर हमलोग सदा सुखसे रहते आये हैं ॥ २५ ॥
सुसूक्ष्मं च व्यलीकं ते सपुत्रस्य न विद्यते ।
यत् तु ज्ञातिविमर्देऽस्मिन्नात्थ दुर्योधनं प्रति ॥ २६ ॥
भवन्तमनुनेष्यामि तत्रापि कुरुनन्दन । 'कुरुनन्दन! पुत्रसहित आपका कोई सूक्ष्म से सूक्ष्म अपराध भी हमारे देखनेमें नहीं आया है । महाभारत - युद्धमें जो जाति- भाइयोंका संहार हुआ है, उसके विषयमें आपने जो दुर्योधनके अपराधकी चर्चा की है, इसके सम्बन्धमें भी मैं आपसे कुछ निवेदन करूँगा ॥ २६ ॥
न तद् दुर्योधनकृतं न च तद् भवता कृतम् ॥ २७ ॥
न कर्णसौबलाभ्यां च कुरवो यत् क्षयं गताः । ‘ कौरवोंका जो संहार हुआ है, उसमें न दुर्योधनका हाथ है, न आपका । कर्ण और शकुनिने भी इसमें कुछ नहीं किया है ॥ २७ ॥
दैवं तत् तु विजानीमो यन्न शक्यं प्रबाधितुम् ॥ २८ ॥
दैवं पुरुषकारेण न शक्यमपि बाधितुम् । ‘ हमारी समझमें तो यह दैवका विधान था । इसे कोई टाल नहीं सकता था । दैवको पुरुषार्थसे मिटा देना असम्भव है ॥ २८३ ॥
अक्षौहिण्यो महाराज दशाष्टौ च समागताः ॥ २ ९ ॥
अष्टादशाहेन हताः कुरुभिर्योधपुङ्गवैः ।
भीष्मद्रोणकृपाद्यैश्च कर्णेन च महात्मना ॥ ३० ॥
युयुधानेन वीरेण धृष्टद्युम्नेन चैव ह ।
चतुर्भिः पाण्डुपुत्रैश्च भीमार्जुनयमैस्तथा ॥ ३१ ॥
पृष्ठ 2298
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
‘ महाराज! उस युद्धमें अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ एकत्र हुई थीं; किंतु कौरवपक्षके प्रधान योद्धा भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य आदि तथा महामना कर्णने एवं पाण्डवदलके प्रमुख वीर सात्यकि, धृष्टद्युम्न, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव आदिने अठारह दिनोंमें ही सबका संहार कर डाला ' ॥ २ ९ –३१ ॥
न च क्षयोऽयं नृपते ऋते दैवबलादभूत् ।
अवश्यमेव संग्रामे क्षत्रियेण विशेषतः ॥ ३२ ॥
कर्तव्यं निधनं काले मर्तव्यं क्षत्रबन्धुना । ‘ नरेश्वर! ऐसा विकट संहार दैवीशक्तिके बिना कदापि नहीं हो सकता था । अवश्य ही संग्राममें मनुष्यको विशेषतः क्षत्रियको समयानुसार शत्रुओंका संहार एवं प्राणोत्सर्ग करना चाहिये ॥ ३२ ॥
तैरियं पुरुषव्याघ्रैर्विद्याबाहुबलान्वितैः ॥ ३३ ॥
पृथिवी निहता सर्वा सहया सरथद्विपा । ' उन विद्या और बाहुबलसे सम्पन्न पुरुषसिंहोंने रथ, घोड़े और हाथियोंसहित इस सारी पृथ्वीका नाश कर डाला ॥ ३३३ ॥
न स राज्ञां वधे सूनुः कारणं ते महात्मनाम् ॥ ३४ ॥
न भवान् न च ते भृत्या न कर्णो न च सौबलः । ‘ आपका पुत्र उन महात्मा नरेशोंके वधमें कारण नहीं हुआ है । इसी प्रकार न आप, न आपके सेवक, न कर्ण और न शकुनि ही इसमें कारण हैं ॥ ३४ ॥
यद् विशस्ताः कुरुश्रेष्ठ राजानश्च सहस्रशः ॥ ३५ ॥
सर्वं दैवकृतं विद्धि कोऽत्र किं वक्तुमर्हति । ' कुरुश्रेष्ठ! उस युद्धमें जो सहस्रों राजा काट डाले गये हैं, वह सब दैवकी ही करतूत समझिये । इस विषयमें दूसरा कोई क्या कह सकता है ॥ ३५३ ॥
गुरुर्मतो भवानस्य कृत्स्नस्य जगतः प्रभुः ॥ ३६ ॥
धर्मात्मानमतस्तुभ्यमनुजानीमहे सुतम् । ‘ आप इस सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं; इसलिये हम आपको अपना गुरु मानते हैं और आप धर्मात्मा नरेशको वनमें जानेकी अनुमति देते हैं तथा आपके पुत्र दुर्योधनके लिये हमारा यह कथन है— ॥ ३६३ ॥
लभतां वीरलोकं स ससहायो नराधिपः ॥ ३७ ॥
द्विजाग्र्यैः समनुज्ञातस्त्रिदिवे मोदतां सुखम् । ‘ अपने सहायकोंसहित राजा दुर्योधन इन श्रेष्ठ द्विजोंके आशीर्वादसे वीरलोक प्राप्त करे और स्वर्गमें सुख एवं आनन्द भोगे ॥ ३७३ ॥
प्राप्स्यते च भवान् पुण्यं धर्मे च परमां स्थितिम् ॥ ३८ ॥
पृष्ठ 2299
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वेद धर्मं च कृत्स्नेन सम्यक् त्वं भव सुव्रतः । ‘ आप भी पुण्य एवं धर्ममें ऊँची स्थिति प्राप्त करें । आप सम्पूर्ण धर्मोंको ठीक- ठीक जानते हैं, इसलिये उत्तम व्रतोंके अनुष्ठानमें लग जाइये ॥ ३८३ ॥
दृष्टिप्रदानमपि ते पाण्डवान् प्रति नो वृथा ॥ ३ ९ ॥ समर्थास्त्रिदिवस्यापि पालने किं पुनः क्षितेः । ‘ आप जो हमारी देख -रेख करनेके लिये हमें पाण्डवोंको सौंप रहे हैं, वह सब व्यर्थ है । ये पाण्डव तो स्वर्गका भी पालन करनेमें समर्थ हैं; फिर इस भूमण्डलकी तो बात ही क्या है ॥ ३ ९ ॥ अनुवर्त्स्यन्ति वा धीमन् समेषु विषमेषु च ॥ ४० ॥
प्रजाः कुरुकुलश्रेष्ठ पाण्डवान् शीलभूषणान् । ‘ बुद्धिमान् कुरुकुलश्रेष्ठ! समस्त पाण्डव शीलरूपी सद्गुणसे विभूषित हैं; अतः भले-बुरे सभी समयोंमें सारी प्रजा निश्चय ही उनका अनुसरण करेगी ॥ ४० ॥
ब्रह्मदेयाग्रहारांश्च पारिबर्हांश्च पार्थिवः ॥ ४१ ॥
पूर्वराजाभिपन्नांश्च पालयत्येव पाण्डवः । ' ये पृथ्वीनाथ पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर अपने दिये हुए तथा पहलेके राजाओंद्वारा अर्पित किये गये ब्राह्मणोंके लिये दातव्य अग्रहारों ( दानमें दिये गये ग्रामों) तथा पारिबह ( पुरस्कारमें दिये गये ग्रामों ) की भी रक्षा करते ही हैं ॥ ४१३ ॥
दीर्घदर्शी मृदुर्दान्तः सदा वैश्रवणो यथा ॥ ४२ ॥
अक्षुद्रसचिवश्चायं कुन्तीपुत्रो महामनाः । ' ये कुन्तीकुमार सदा कुबेरके समान दीर्घदर्शी, कोमल स्वभाववाले और जितेन्द्रिय हैं ।
इनके मन्त्री भी उच्च विचारके हैं । इनका हृदय बड़ा ही विशाल है ॥
अप्यमित्रे दयावांश्च शुचिश्च भरतर्षभः ॥ ४३ ॥
ऋजुं पश्यति मेधावी पुत्रवत् पाति नः सदा । 'ये भरतकुलभूषण युधिष्ठिर शत्रुओंपर भी दया करनेवाले और परम पवित्र हैं । बुद्धिमान् होनेके साथ ही ये सबको सरलभावसे देखनेवाले हैं और हमलोगोंका सदा पुत्रवत् पालन करते हैं ॥ ४३३ ॥
विप्रियं च जनस्यास्य संसर्गाद् धर्मजस्य वै ॥ ४४ ॥
न करिष्यन्ति राजर्षे तथा भीमार्जुनादयः । ' राजर्षे! इन धर्मपुत्र युधिष्ठिरके संसर्गसे भीमसेन और अर्जुन आदि भी इस जनसमुदाय ( प्रजावर्ग) -का कभी अप्रिय नहीं करेंगे ॥ ४४ ॥
मन्दा मृदुषु कौरव्य तीक्ष्णेष्वाशीविषोपमाः ॥ ४५ ॥
वीर्यवन्तो महात्मानः पौराणां च हिते रताः ।
पृष्ठ 2300
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
' कुरुनन्दन! ये पाँचों भाई पाण्डव बड़े पराक्रमी, महामनस्वी और पुरवासियोंके हितसाधनमें लगे रहनेवाले हैं । ये कोमल स्वभाववाले सत्पुरुषोंके प्रति मृदुतापूर्ण बर्ताव करते हैं, किंतु तीखे स्वभाववाले दुष्टोंके लिये ये विषधर सर्पोंके समान भयंकर बन जाते हैं ॥ ४५३ ॥
न कुन्ती न च पाञ्चाली न चोलूपी न सात्वती ॥ ४६ ॥
अस्मिन् जने करिष्यन्ति प्रतिकूलानि कर्हिचित् । 'कुन्ती, द्रौपदी, उलूपी और सुभद्रा भी कभी प्रजाजनोंके प्रति प्रतिकूल बर्ताव नहीं करेंगी ॥ ४६३ ॥
भवत्कृतमिमं स्नेहं युधिष्ठिरविवर्धितम् ॥ ४७ ॥
न पृष्ठतः करिष्यन्ति पौरा जानपदा जनाः । ‘ आपका प्रजाके साथ जो स्नेह था, उसे युधिष्ठिरने और भी बढ़ा दिया है । नगर और जनपदके लोग आपलोगोंके इस प्रजा- प्रेमकी कभी अवहेलना नहीं करेंगे ॥ अधर्मिष्ठानपि सतः कुन्तीपुत्रा महारथाः ॥ ४८ ॥
मानवान् पालयिष्यन्ति•भूत्वा धर्मपरायणाः । ' कुन्तीके महारथी पुत्र स्वयं धर्मपरायण रहकर अधर्मी मनुष्योंका भी पालन करेंगे ॥ ४८ ॥
स राजन् मानसं दुःखमपनीय युधिष्ठिरात् ॥ ४ ९ ॥ कुरु कार्याणि धर्म्याणि नमस्ते पुरुषर्षभ । ‘ अतः पुरुषप्रवर महाराज! आप युधिष्ठिरकी ओरसे अपने मानसिक दुःखको हटाकर धार्मिक कार्योंके अनुष्ठानमें लग जाइये । आपको समस्त प्रजाका नमस्कार है' ॥ ४ ९ ३ ॥ वैशम्पायन उवाच तस्य तद् वचनं धर्म्यमनुमान्य गुणोत्तरम् ॥ ५० ॥
साधु साध्विति सर्वः स जनः प्रतिगृहीतवान् । वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! साम्बके धर्मानुकूल और उत्तम गुणयुक्त वचन सुनकर समस्त प्रजा उन्हें सादर साधुवाद देने लगी तथा सबने उनकी बातका अनुमोदन किया ॥ ५०३ ॥
धृतराष्ट्रश्च तद्वाक्यमभिपूज्य पुनः पुनः ॥ ५१ ॥
विसर्जयामास तदा प्रकृतीस्तु शनैः शनैः ।
स तैः सम्पूजितो राजा शिवेनावेक्षितस्तथा ॥ ५२ ॥
धृतराष्ट्रने भी बारंबार साम्बके वचनोंकी सराहना की और सब लोगोंसे सम्मानित होकर धीरे - धीरे सबको विदा कर दिया । उस समय सबने उन्हें शुभ दृष्टिसे ही देखा ॥ ५१-५२ ॥ प्राञ्जलिः पूजयामास तं जनं भरतर्षभ ।