श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 2281–2290
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2281–2290
पृष्ठ 2281
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
राजेन्द्र! प्रजाजनोंके भीतर जो दीन -दरिद्र ( अन्ध - बधिर आदि ) मनुष्य हों, उनका भी राजा आदर करे । महाबली राजा अपने शत्रुके विपरीत क्रमशः अथवा एक साथ सारा उद्योग आरम्भ कर दे । वह उसे पीड़ा दे । उसकी गति अवरुद्ध करे और उसका खजाना नष्ट कर दे ॥ १३-१४ ॥
कार्यं यत्नेन शत्रूणां स्वराज्यं रक्षता स्वयम् ।
न च हिंस्योऽभ्युपगतः सामन्तो वृद्धिमिच्छता ॥ १५ ॥
अपने राज्यकी रक्षा करनेवाले राजाको यत्नपूर्वक शत्रुओंके साथ उपर्युक्त बर्ताव करना चाहिये; परंतु अपनी वृद्धि चाहनेवाले नरेशको शरणमें आये हुए सामन्तका वध कदापि नहीं करना चाहिये ॥ १५ ॥
कौन्तेय तं न हिंसेत् स यो महीं विजिगीषते ।
गणानां भेदने योगमीप्सेथाः सह मन्त्रिभिः ॥ १६ ॥
कुन्तीकुमार! जो समूची पृथ्वीपर विजय पाना चाहता हो, वह तो कदापि उस ( सामन्त) -की हिंसा न करे । तुम अपने मन्त्रियोंसहित सदा शत्रुगणोंमें फूट डालनेकी इच्छा रखना ॥ १६ ॥
साधुसंग्रहणाच्चैव पापनिग्रहणात् तथा ।
दुर्बलाश्चैव सततं नान्वेष्टव्या बलीयसा ॥ १७ ॥
अच्छे पुरुषोंसे मेल- जोल बढ़ाये और दुष्टोंको कैद करके उन्हें दण्ड दे । महाबली नरेशको दुर्बल शत्रुके पीछे सदा नहीं पड़े रहना चाहिये ॥ १७ ॥
तिष्ठेथा राजशार्दूल वैतसीं वृत्तिमास्थितः ।
यद्येनमभियायाच्च बलवान् दुर्बलं नृपः ॥ १८ ॥
सामादिभिरुपायैस्तं क्रमेण विनिवर्तयेः । राजसिंह! तुम्हें बेंतकी - सी वृत्ति (नम्रता) -का आश्रय लेकर रहना चाहिये । यदि किसी दुर्बल राजापर बलवान् राजा आक्रमण करे तो क्रमशः साम आदि उपायोंद्वारा उस बलवान् राजाको लौटानेका प्रयत्न करना चाहिये ॥ १८ ॥
अशक्नुवंश्च युद्धाय निष्पतेत् सह मन्त्रिभिः ॥ १ ९ ॥ कोशेन पौरैर्दण्डेन ये चास्य प्रियकारिणः । यदि अपनेमें युद्धकी शक्ति न हो तो मन्त्रियोंके साथ उस आक्रमणकारी राजाकी शरणमें जाय तथा कोश, पुरवासी मनुष्य, दण्डशक्ति एवं अन्य जो प्रिय कार्य हों, उन सबको अर्पित करके उस प्रतिद्वन्द्वीको लौटानेकी चेष्टा करे ॥ १ ९ ३ ॥
असम्भवे तु सर्वस्य यथा मुख्येन निष्पतेत् ।
क्रमेणानेन मुक्तिः स्याच्छरीरमिति केवलम् ॥ २० ॥
यदि किसी भी उपायसे संधि न हो तो मुख्य साधनको लेकर विपक्षीपर युद्धके लिये टूट पड़े । इस क्रमसे शरीर चला जाय तो भी वीर पुरुषकी मुक्ति ही होती है । केवल शरीर दे
पृष्ठ 2282
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
देना ही उसका मुख्य साधन है ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्रोपदेशे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्ट्रका उपदेशविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
*- कृषि आदि आठ सन्धान कर्म हैं । बाल आदि बीस असन्धेय हैं । नास्तिकता आदि चौदह दोष हैं और मन्त्र आदि अठारह तीर्थ हैं । उन सबका विस्तारपूर्वक वर्णन पहले आ चुका है ।
पृष्ठ 2283
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सप्तमोऽध्यायः युधिष्ठिरको धृतराष्ट्रके द्वारा राजनीतिका उपदेश धृतराष्ट्रउवाच
संधिविग्रहमप्यत्र पश्येथा राजसत्तम ।
द्वियोनिं विविधोपायं बहुकल्पं युधिष्ठिर ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने कहा–नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिर! तुम्हें संधि और विग्रहपर भी दृष्टि रखनी चाहिये । शत्रु प्रबल हो तो उसके साथ संधि करना और दुर्बल हो तो उसके साथ युद्ध छेड़ना — ये संधि और विग्रहके दो आधार हैं । इनके प्रयोगके उपाय भी नाना प्रकारके हैं और इनके प्रकार भी बहुत हैं ॥ १ ॥
कौरव्य पर्युपासीथाः स्थित्वा द्वैविध्यमात्मनः ।
तुष्टपुष्टबलः शत्रुरात्मवानिति च स्मरेत् ॥ २ ॥
कुरुनन्दन! अपनी द्विविध अवस्था - बलाबलका अच्छी तरह विचार करके शत्रुसे युद्ध या मेल करना उचित है । यदि शत्रु मनस्वी है और उसके सैनिक हृष्ट- पुष्ट एवं संतुष्ट हैं तो उसपर सहसा धावा न करके उसे परास्त करनेका कोई दूसरा उपाय सोचे ॥ २ ॥
पर्युपासनकाले तु विपरीतं विधीयते ।
आमर्दकाले राजेन्द्र व्यपसर्पेत् ततः परम् ॥ ३ ॥
आक्रमणकालमें शत्रुकी स्थिति विपरीत रहनी चाहिये अर्थात् उसके सैनिक हृष्ट - पुष्ट एवं संतुष्ट नहीं होने चाहिये । राजेन्द्र! यदि शत्रुसे अपना मान मर्दन होनेकी सम्भावना हो तो वहाँसे भागकर किसी दूसरे मित्र राजाकी शरण लेनी चाहिये ॥ ३ ॥
व्यसनं भेदनं चैव शत्रूणां कारयेत् ततः ।
कर्षणं भीषणं चैव युद्धे चैव बलक्षयम् ॥ ४ ॥
वहाँ यह प्रयत्न करना चाहिये कि शत्रुओंपर कोई संकट आ जाय या उनमें फूट पड़ जाय, वे क्षीण और भयभीत हो जायँ तथा युद्धमें उनकी सेना नष्ट हो जाय ॥ ४ ॥
प्रयास्यमानो नृपतिस्त्रिविधां परिचिन्तयेत् ।
आत्मनश्चैव शत्रोश्च शक्तिं शास्त्रविशारदः ॥ ५ ॥
शत्रुपर चढ़ाई करनेवाले शास्त्रविशारद राजाको अपनी और शत्रुकी त्रिविध शक्तियोंपर भलीभाँति विचार कर लेना चाहिये ॥ ५ ॥
उत्साहप्रभुशक्तिभ्यां मन्त्रशक्त्या च भारत ।
उपपन्नो नृपो यायाद् विपरीतं च वर्जयेत् ॥ ६ ॥
भारत! जो राजा उत्साह- शक्ति, प्रभु- शक्ति और मन्त्र- शक्तिमें शत्रुकी अपेक्षा बढ़ा- चढ़ा हो, उसे ही आक्रमण करना चाहिये । यदि इसके विपरीत अवस्था हो तो आक्रमणका विचार
पृष्ठ 2284
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
त्याग देना चाहिये ॥ ६ ॥
आददीत बलं राजा मौलं मित्रबलं तथा ।
अटवीबलं भृतं चैव तथा श्रेणीबलं प्रभो ॥ ७ ॥
प्रभो! राजाको अपने पास सैनिकबल, धनबल, मित्रबल, अरण्यबल, भृत्यबल और श्रेणीबलका संग्रह करना चाहिये ॥ ७ ॥
तत्र मित्रबलं राजन् मौलं चैव विशिष्यते ।
श्रेणीबलं भृतं चैव तुल्ये एवेति मे मतिः ॥ ८ ॥
राजन्! इनमें मित्रबल और धनबल सबसे बढ़कर है । श्रेणीबल और भृत्यबल — ये दोनों समान ही हैं, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ ८ ॥
तथा चारबलं चैव परस्परसमं नृप ।
विज्ञेयं बहुकालेषु राज्ञा काल उपस्थिते ॥ ९ ॥
नरेश्वर! चारबल ( दूतोंका बल ) भी परस्पर समान ही है । राजाको समय आनेपर अधिक अवसरोंपर इस तत्त्वको समझे रहना चाहिये ॥ ९ ॥
आपदश्चापि बोद्धव्या बहुरूपा नराधिप ।
भवन्ति राज्ञा कौरव्य यास्ताः पृथगतः शृणु ॥ १० ॥
महाराज! कुरुनन्दन! राजापर आनेवाली अनेक प्रकारकी आपत्तियाँ भी होती हैं,
जिन्हें जानना चाहिये । अतः उनका पृथक् - पृथक् वर्णन सुनो ॥ १० ॥
विकल्पा बहुधा राजन्नापदां पाण्डुनन्दन ।
सामादिभिरुपन्यस्य गणयेत् तान् नृपः सदा ॥ ११ ॥
राजन्! पाण्डुनन्दन! उन आपत्तियोंके अनेक प्रकारके विकल्प हैं । राजा साम आदि उपायोंद्वारा उन सबको सामने लाकर सदा गिने ॥ ११ ॥
यात्रां गच्छेद् बलैर्युक्तो राजा सद्भिः परंतप ।
युक्तश्च देशकालाभ्यां बलैरात्मगुणैस्तथा ॥ १२ ॥
परंतप नरेश! देश- कालकी अनुकूलता होनेपर सैनिक बल तथा राजोचित गुणोंसे युक्त राजा अच्छी सेना साथ लेकर विजयके लिये यात्रा करे ॥ १२ ॥
हृष्टपुष्टबलो गच्छेद् राजा वृद्धयुदये रतः ।
अकृशश्चाप्यथो यायादनृतावपि पाण्डव ॥ १३ ॥
पाण्डुनन्दन! अपने अभ्युदयके लिये तत्पर रहनेवाला राजा यदि दुर्बल न हो और उसकी सेना हृष्ट- पुष्ट हो तो वह युद्धके अनुकूल मौसम न होनेपर भी शत्रुपर चढ़ाई करे ॥ १३ ॥
तूणाश्मानं वाजिरथप्रवाहां ध्वजद्रुमैः संवृतकूलरोधसम् । पदातिनागैर्बहुकर्दमां नदीं
पृष्ठ 2285
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सपत्ननाशे नृपतिः प्रयोजयेत् ॥ १४ ॥
शत्रुओंके विनाशके लिये राजा अपनी सेनारूपी नदीका प्रयोग करे । जिसमें तरकस ही प्रस्तरखण्डके समान हैं, घोड़े और रथरूपी प्रवाह शोभा पाते हैं, जिसका कूल - किनारा ध्वजरूपी वृक्षोंसे आच्छादित है तथा पैदल और हाथी जिसके भीतर अगाध पंकके समान जान पड़ते हैं ॥ १४ ॥
अथोपपत्त्या शकटं पद्मवज्रं च भारत ।
उशना वेद यच्छास्त्रं तत्रैतद् विहितं विभो ॥ १५ ॥
भारत! युद्धके समय युक्ति करके सेनाका शकट, पद्म अथवा वज्र नामक व्यूह बना ले । प्रभो! शुक्राचार्य जिस शास्त्रको जानते हैं, उसमें ऐसा ही विधान मिलता है ॥ १५ ॥
चारयित्वा परबलं कृत्वा स्वबलदर्शनम् ।
स्वभूमौ योजयेद् युद्धं परभूमौ तथैव च ॥ १६ ॥
गुप्तचरोंद्वारा शत्रुसेनाकी जाँच-पड़ताल करके अपनी सैनिक शक्तिका भी निरीक्षण करे । फिर अपनी या शत्रुकी भूमिपर युद्ध आरम्भ करे ॥ १६ ॥
बलं प्रसादयेद् राजा निक्षिपेद् बलिनो नरान् ।
ज्ञात्वा स्वविषयं तत्र सामादिभिरुपक्रमेत् ॥ १७ ॥
राजाको चाहिये कि वह पारितोषिक आदिके द्वारा सेनाको संतुष्ट रखे और उसमें बलवान् मनुष्योंकी भर्ती करे । अपने बलाबलको अच्छी तरह समझकर साम आदि उपायोंके द्वारा संधि या युद्धके लिये उद्योग करे ॥ १७ ॥
सर्वथैव महाराज शरीरं धारयेदिह ।
प्रेत्य चेह च कर्तव्यमात्मनिःश्रेयसं परम् ॥ १८ ॥
महाराज! इस जगत्में सभी उपायोंद्वारा शरीरकी रक्षा करनी चाहिये और उसके द्वारा इहलोक तथा परलोकमें भी अपने कल्याणका उत्तम साधन करना उचित है ॥ १८ ॥
एवमेतन्महाराज राजा सम्यक् समाचरन् ।
प्रेत्य स्वर्गमवाप्नोति प्रजा धर्मेण पालयन् ॥ १ ९ ॥
महाराज! जो राजा इन सब बातोंका विचार करके इनके अनुसार ठीक- ठीक आचरण और प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करता है, वह मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें जाता है ॥ १ ९ ॥
एवं त्वया कुरुश्रेष्ठ वर्तितव्यं प्रजाहितम् ।
उभयोर्लोकयोस्तात प्राप्तये नित्यमेव हि ॥ २० ॥
तात! कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार तुम्हें इहलोक और परलोकमें सुख पानेके लिये सदा ही प्रजावर्गके हित - साधनमें संलग्न रहना चाहिये ॥ २० ॥
भीष्मेण सर्वमुक्तोऽसि कृष्णेन विदुरेण च ।
मयाप्यवश्यं वक्तव्यं प्रीत्या ते नृपसत्तम ॥ २१ ॥
पृष्ठ 2286
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नृपश्रेष्ठ! भीष्मजी, भगवान् श्रीकृष्ण तथा विदुरने तुम्हें सभी बातोंका उपदेश कर दिया है । मेरा भी तुम्हारे ऊपर प्रेम है, इसलिये मैंने भी तुम्हें कुछ बताना आवश्यक समझा है ॥ २१ ॥
एतत् सर्वं यथान्यायं कुर्वीथा भूरिदक्षिण ।
प्रियस्तथा प्रजानां त्वं स्वर्गे सुखमवाप्स्यसि ॥ २२ ॥
यज्ञमें प्रचुर दक्षिणा देनेवाले महाराज! इन सब बातोंका यथोचित रूपसे पालन करना ।
इससे तुम प्रजाके प्रिय बनोगे और स्वर्गमें भी सुख पाओगे ॥ २२ ॥
अश्वमेधसहस्रेण यो यजेत् पृथिवीपतिः ।
पालयेद् वापि धर्मेण प्रजास्तुल्यं फलं लभेत् ॥ २३ ॥
जो राजा एक हजार अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करता है अथवा दूसरा जो नरेश धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करता है, उन दोनोंको समान फल प्राप्त होता है ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्रोपसंवादे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्ट्रका उपसंवादविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥
पृष्ठ 2287
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अष्टमोऽध्यायः धृतराष्ट्रका कुरुजांगलदेशकी प्रजासे वनमें जानेके लिये आज्ञा माँगना युधिष्ठिर उवाच
एवमेतत् करिष्यामि यथाऽऽत्थ पृथिवीपते ।
भूयश्चैवानुशास्योऽहं भवता पार्थिवर्षभ ॥ १ ॥
युधिष्ठिर बोले – पृथ्वीनाथ! नृपश्रेष्ठ! आप जैसा कहते हैं, वैसा ही करूंगा। अभी आप मुझे कुछ और उपदेश दीजिये ॥ १ ॥
भीष्मे स्वर्गमनुप्राप्ते गते च मधुसूदने ।
विदुरे संजये चैव कोऽन्यो मां वक्तुमर्हति ॥ २ ॥
भीष्मजी स्वर्ग सिधारे, भगवान् श्रीकृष्ण द्वारका पधारे और विदुर तथा संजय भी आपके साथ ही जा रहे हैं। अब दूसरा कौन रह जाता है, जो मुझे उपदेश दे सके ॥ २ ॥
यत् तु मामनुशास्तीह भवानद्य हिते स्थितः ।
कर्तास्मि तन्महीपाल निर्वृतो भव पार्थिव ॥ ३ ॥
भूपाल! पृथ्वीपते! आज मेरे हितसाधनमें संलग्न होकर आप मुझे यहाँ जो कुछ
उपदेश देते हैं, मैं उसका पालन करूँगा । आप संतुष्ट हों ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तः स राजर्षिर्धर्मराजेन धीमता ।
कौन्तेयं समनुज्ञातुमियेष भरतर्षभ ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - भरतश्रेष्ठ! बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर राजर्षि धृतराष्ट्रने कुन्तीकुमारसे जानेके लिये अनुमति लेनेकी इच्छा की और कहा ॥ ४ ॥
पुत्र संशाम्यतां तावन्ममापि बलवान् श्रमः ।
इत्युक्त्वा प्राविशद् राजा गान्धार्या भवनं तदा ॥ ५ ॥
' बेटा! अब शान्त रहो । मुझे बोलनेमें बड़ा परिश्रम होता है ( अब तो मैं जानेकी ही अनुमति चाहता हूँ) । ' ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्रने उस समय गान्धारीके भवनमें प्रवेश किया ॥ ५ ॥
तमासनगतं देवी गान्धारी धर्मचारिणी ।
उवाच काले कालज्ञा प्रजापतिसमं पतिम् ॥ ६ ॥
पृष्ठ 2288
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वहाँ जब वे आसनपर विराजमान हुए, तब समयका ज्ञान रखनेवाली धर्मपरायणा गान्धारी देवीने उस समय प्रजापतिके समान अपने पतिसे इस प्रकार पूछा— ॥ ६ ॥
अनुज्ञातः स्वयं तेन व्यासेन त्वं महर्षिणा ।
युधिष्ठिरस्यानुमते कदारण्यं गमिष्यसि ॥ ७ ॥
‘ महाराज! स्वयं महर्षि व्यासने आपको वनमें जानेकी आज्ञा दे दी है और युधिष्ठिरकी
भी अनुमति मिल ही गयी है । अब आप कब वनको चलेंगे? ' ॥ ७ ॥
धृतराष्ट्रउवाच
गान्धार्यहमनुज्ञातः स्वयं पित्रा महात्मना ।
युधिष्ठिरस्यानुमते गन्तास्मि नचिराद् वनम् ॥ ८ ॥
धृतराष्ट्रने कहा – गान्धारि! मेरे महात्मा पिता व्यासने स्वयं तो आज्ञा दे ही दी है, युधिष्ठिरकी भी अनुमति मिल गयी है; अतः अब मैं जल्दी ही वनको चलूँगा ॥ ८ ॥
अहं हि तावत् सर्वेषां तेषां दुर्धूतदेविनाम् ।
पुत्राणां दातुमिच्छामि प्रेतभावानुगं वसु ॥ ९ ॥
सर्वप्रकृतिसांनिध्यं कारयित्वा स्ववेश्मनि । जानेके पहले मैं चाहता हूँ कि समस्त प्रजाको घरपर बुलाकर अपने मरे हुए उन जुआरी पुत्रोंके उद्देश्यसे उनके पारलौकिक लाभके लिये कुछ धन दान कर दूँ ॥ वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा धर्मराजाय प्रेषयामास वै तदा ॥ १० ॥
स च तद् वचनात् सर्वं समानिन्ये महीपतिः । वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्रने धर्मराज युधिष्ठिरके पास अपना विचार कहला भेजा । राजा युधिष्ठिरने देनेके लिये उनकी आज्ञाके अनुसार वह सब सामग्री जुटा दी ( धृतराष्ट्रने उसका यथायोग्य वितरण कर दिया ) ॥ १०३ || ततः प्रतीतमनसो ब्राह्मणाः कुरुजाङ्गलाः ॥ ११ ॥
क्षत्रियाश्चैव वैश्याश्च शूद्राश्चैव समाययुः । उधर राजाका संदेश पाकर कुरुजांगलदेशके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वहाँ आये । उन सबके हृदयमें बड़ी प्रसन्नता थी ॥ ११३ ॥
ततो निष्क्रम्य नृपतिस्तस्मादन्तःपुरात् तदा ॥ १२ ॥
ददृशे तं जनं सर्वं सर्वाश्च प्रकृतीस्तथा । तदनन्तर महाराज धृतराष्ट्र अन्तःपुरसे बाहर निकले और वहाँ नगर तथा जनपदकी समस्त प्रजाके उपस्थित होनेका समाचार सुना ॥ १२३ ॥
समवेतांश्च तान् सर्वान् पौरान् जानपदांस्तथा ॥ १३ ॥
पृष्ठ 2289
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तानागतानभिप्रेक्ष्य समस्तं च सुहृज्जनम् ।
ब्राह्मणांश्च महीपाल नानादेशसमागतान् ॥ १४ ॥
उवाच मतिमान् राजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः । भूपाल जनमेजय! राजाने देखा कि समस्त पुरवासी और जनपदके लोग वहाँ आ गये हैं । सम्पूर्ण सुहृद्- वर्गके लोग भी उपस्थित हैं और नाना देशोंके ब्राह्मण भी पधारे हैं । तब बुद्धिमान् अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने उन सबको लक्ष्य करके कहा- ॥ १३-१४ ॥ भवन्तः कुरवश्चैव चिरकालं सहोषिताः ॥ १५ ॥
परस्परस्य सुहृदः परस्परहिते रताः । ' सज्जनो! आप और कौरव चिरकालसे एक साथ रहते आये हैं । आप दोनों एक-दूसरेके सुहृद् हैं और दोनों सदा एक- दूसरेके हितमें तत्पर रहते हैं ॥ १५३ ॥
यदिदानीमहं ब्रूयामस्मिन् काल उपस्थिते ॥ १६ ॥
तथा भवद्भिः कर्तव्यमविचार्य वचो मम । ‘इस समय मैं आपलोगोंसे वर्तमान अवसरपर जो कुछ कहूँ, मेरी उस बातको आपलोग बिना विचारे स्वीकार करें; यही मेरी प्रार्थना है ॥ १६३ ॥
अरण्यगमने बुद्धिर्गान्धारीसहितस्य मे ॥ १७ ॥
व्यासस्यानुमते राज्ञस्तथा कुन्तीसुतस्य मे । ‘ मैंने गान्धारीके साथ वनमें जानेका निश्चय किया है; इसके लिये मुझे महर्षि व्यास तथा कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिरकी भी अनुमति मिल गयी है ॥ १७३ ॥
भवन्तोऽप्यनुजानन्तु मा च वोऽभूद् विचारणा ॥ १८ ॥
अस्माकं भवतां चैव येयं प्रीतिर्हि शाश्वती ।
न च सान्येषु देशेषु राज्ञामिति मतिर्मम ॥। १ ९ ॥
' अब आपलोग भी मुझे वनमें जानेकी आज्ञा दें । इस विषयमें आपके मनमें कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिये । आपलोगोंका हमारे साथ जो यह प्रेम- सम्बन्ध सदासे चला आ रहा है, ऐसा सम्बन्ध दूसरे देशके राजाओंके साथ वहाँकी प्रजाका नहीं होगा, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ १८-१९ ॥
शान्तोऽस्मि वयसानेन तथा पुत्रविनाकृतः ।
उपवासकृशश्चास्मि गान्धारीसहितोऽनघाः ॥ २० ॥
‘ निष्पाप प्रजाजन! अब इस बुढ़ापेने गरधारीसहित मुझको बहुत थका दिया है । पुत्रोंके मारे जानेका दुःख भी बना ही रहता है तथा उपवास करनेके कारण भी हम दोनों अधिक दुर्बल हो गये हैं ॥ २० ॥
युधिष्ठिरगते राज्ये प्राप्तश्चास्मि सुखं महत् ।
मन्ये दुर्योधनैश्वर्याद् विशिष्टमिति सत्तमाः ॥ २१ ॥
पृष्ठ 2290
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
' सज्जनो! युधिष्ठिरके राज्यमें मुझे बड़ा सुख मिला है । मैं समझता हूँ कि दुर्योधनके राज्यसे भी बढ़कर सुख मुझे प्राप्त हुआ है ' ॥ २१ ॥
मम चान्धस्य वृद्धस्य हतपुत्रस्य का गतिः ।
ऋते वनं महाभागास्तन्मानुज्ञातुमर्हथ ॥ २२ ॥
'एक तो मैं जन्मका अन्धा हूँ, दूसरे बूढ़ा हो गया हूँ, तीसरे मेरे सभी पुत्र मारे गये हैं । महाभाग प्रजाजन! अब आप ही बतायें, वनमें जानेके सिवा मेरे लिये दूसरी कौन- सी गति है? इसलिये अब आपलोग मुझे जानेकी आज्ञा दें ' ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सर्वे ते कुरुजाङ्गलाः ।
बाष्पसंदिग्धया वाचा रुरुदुर्भरतर्षभ ॥ २३ ॥
भरतश्रेष्ठ! राजा धृतराष्ट्रकी ये बातें सुनकर वहाँ उपस्थित हुए कुरुजांगलनिवासी सभी मनुष्योंके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बह चली और वे फूट- फूटकर रोने लगे ॥ २३ ॥
तानविब्रुवतः किंचित् सर्वान् शोकपरायणान् ।
पुनरेव महातेजा धृतराष्ट्रोऽब्रवीदिदम् ॥ २४ ॥
उन सबको शोकमग्न होकर कुछ भी उत्तर न देते देख महातेजस्वी धृतराष्ट्रने पुनः बोलना आरम्भ किया ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्रकृतवनगमनप्रार्थनेऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्ट्रकी वनमें जानेके लिये प्रार्थनाविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥
20