श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 2281–2290

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2281–2290

पृष्ठ 2281

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2281 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

राजेन्द्र! प्रजाजनोंके भीतर जो दीन -दरिद्र ( अन्ध - बधिर आदि ) मनुष्य हों, उनका भी राजा आदर करे । महाबली राजा अपने शत्रुके विपरीत क्रमशः अथवा एक साथ सारा उद्योग आरम्भ कर दे । वह उसे पीड़ा दे । उसकी गति अवरुद्ध करे और उसका खजाना नष्ट कर दे ॥ १३-१४ ॥

कार्यं यत्नेन शत्रूणां स्वराज्यं रक्षता स्वयम् ।

न च हिंस्योऽभ्युपगतः सामन्तो वृद्धिमिच्छता ॥ १५ ॥

अपने राज्यकी रक्षा करनेवाले राजाको यत्नपूर्वक शत्रुओंके साथ उपर्युक्त बर्ताव करना चाहिये; परंतु अपनी वृद्धि चाहनेवाले नरेशको शरणमें आये हुए सामन्तका वध कदापि नहीं करना चाहिये ॥ १५ ॥

कौन्तेय तं न हिंसेत् स यो महीं विजिगीषते ।

गणानां भेदने योगमीप्सेथाः सह मन्त्रिभिः ॥ १६ ॥

कुन्तीकुमार! जो समूची पृथ्वीपर विजय पाना चाहता हो, वह तो कदापि उस ( सामन्त) -की हिंसा न करे । तुम अपने मन्त्रियोंसहित सदा शत्रुगणोंमें फूट डालनेकी इच्छा रखना ॥ १६ ॥

साधुसंग्रहणाच्चैव पापनिग्रहणात् तथा ।

दुर्बलाश्चैव सततं नान्वेष्टव्या बलीयसा ॥ १७ ॥

अच्छे पुरुषोंसे मेल- जोल बढ़ाये और दुष्टोंको कैद करके उन्हें दण्ड दे । महाबली नरेशको दुर्बल शत्रुके पीछे सदा नहीं पड़े रहना चाहिये ॥ १७ ॥

तिष्ठेथा राजशार्दूल वैतसीं वृत्तिमास्थितः ।

यद्येनमभियायाच्च बलवान् दुर्बलं नृपः ॥ १८ ॥

सामादिभिरुपायैस्तं क्रमेण विनिवर्तयेः । राजसिंह! तुम्हें बेंतकी - सी वृत्ति (नम्रता) -का आश्रय लेकर रहना चाहिये । यदि किसी दुर्बल राजापर बलवान् राजा आक्रमण करे तो क्रमशः साम आदि उपायोंद्वारा उस बलवान् राजाको लौटानेका प्रयत्न करना चाहिये ॥ १८ ॥

अशक्नुवंश्च युद्धाय निष्पतेत् सह मन्त्रिभिः ॥ १ ९ ॥ कोशेन पौरैर्दण्डेन ये चास्य प्रियकारिणः । यदि अपनेमें युद्धकी शक्ति न हो तो मन्त्रियोंके साथ उस आक्रमणकारी राजाकी शरणमें जाय तथा कोश, पुरवासी मनुष्य, दण्डशक्ति एवं अन्य जो प्रिय कार्य हों, उन सबको अर्पित करके उस प्रतिद्वन्द्वीको लौटानेकी चेष्टा करे ॥ १ ९ ३ ॥

असम्भवे तु सर्वस्य यथा मुख्येन निष्पतेत् ।

क्रमेणानेन मुक्तिः स्याच्छरीरमिति केवलम् ॥ २० ॥

यदि किसी भी उपायसे संधि न हो तो मुख्य साधनको लेकर विपक्षीपर युद्धके लिये टूट पड़े । इस क्रमसे शरीर चला जाय तो भी वीर पुरुषकी मुक्ति ही होती है । केवल शरीर दे

पृष्ठ 2282

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2282 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

देना ही उसका मुख्य साधन है ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्रोपदेशे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्ट्रका उपदेशविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥

*- कृषि आदि आठ सन्धान कर्म हैं । बाल आदि बीस असन्धेय हैं । नास्तिकता आदि चौदह दोष हैं और मन्त्र आदि अठारह तीर्थ हैं । उन सबका विस्तारपूर्वक वर्णन पहले आ चुका है ।

पृष्ठ 2283

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2283 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सप्तमोऽध्यायः युधिष्ठिरको धृतराष्ट्रके द्वारा राजनीतिका उपदेश धृतराष्ट्रउवाच

संधिविग्रहमप्यत्र पश्येथा राजसत्तम ।

द्वियोनिं विविधोपायं बहुकल्पं युधिष्ठिर ॥ १ ॥

धृतराष्ट्रने कहा–नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिर! तुम्हें संधि और विग्रहपर भी दृष्टि रखनी चाहिये । शत्रु प्रबल हो तो उसके साथ संधि करना और दुर्बल हो तो उसके साथ युद्ध छेड़ना — ये संधि और विग्रहके दो आधार हैं । इनके प्रयोगके उपाय भी नाना प्रकारके हैं और इनके प्रकार भी बहुत हैं ॥ १ ॥

कौरव्य पर्युपासीथाः स्थित्वा द्वैविध्यमात्मनः ।

तुष्टपुष्टबलः शत्रुरात्मवानिति च स्मरेत् ॥ २ ॥

कुरुनन्दन! अपनी द्विविध अवस्था - बलाबलका अच्छी तरह विचार करके शत्रुसे युद्ध या मेल करना उचित है । यदि शत्रु मनस्वी है और उसके सैनिक हृष्ट- पुष्ट एवं संतुष्ट हैं तो उसपर सहसा धावा न करके उसे परास्त करनेका कोई दूसरा उपाय सोचे ॥ २ ॥

पर्युपासनकाले तु विपरीतं विधीयते ।

आमर्दकाले राजेन्द्र व्यपसर्पेत् ततः परम् ॥ ३ ॥

आक्रमणकालमें शत्रुकी स्थिति विपरीत रहनी चाहिये अर्थात् उसके सैनिक हृष्ट - पुष्ट एवं संतुष्ट नहीं होने चाहिये । राजेन्द्र! यदि शत्रुसे अपना मान मर्दन होनेकी सम्भावना हो तो वहाँसे भागकर किसी दूसरे मित्र राजाकी शरण लेनी चाहिये ॥ ३ ॥

व्यसनं भेदनं चैव शत्रूणां कारयेत् ततः ।

कर्षणं भीषणं चैव युद्धे चैव बलक्षयम् ॥ ४ ॥

वहाँ यह प्रयत्न करना चाहिये कि शत्रुओंपर कोई संकट आ जाय या उनमें फूट पड़ जाय, वे क्षीण और भयभीत हो जायँ तथा युद्धमें उनकी सेना नष्ट हो जाय ॥ ४ ॥

प्रयास्यमानो नृपतिस्त्रिविधां परिचिन्तयेत् ।

आत्मनश्चैव शत्रोश्च शक्तिं शास्त्रविशारदः ॥ ५ ॥

शत्रुपर चढ़ाई करनेवाले शास्त्रविशारद राजाको अपनी और शत्रुकी त्रिविध शक्तियोंपर भलीभाँति विचार कर लेना चाहिये ॥ ५ ॥

उत्साहप्रभुशक्तिभ्यां मन्त्रशक्त्या च भारत ।

उपपन्नो नृपो यायाद् विपरीतं च वर्जयेत् ॥ ६ ॥

भारत! जो राजा उत्साह- शक्ति, प्रभु- शक्ति और मन्त्र- शक्तिमें शत्रुकी अपेक्षा बढ़ा- चढ़ा हो, उसे ही आक्रमण करना चाहिये । यदि इसके विपरीत अवस्था हो तो आक्रमणका विचार

पृष्ठ 2284

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2284 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

त्याग देना चाहिये ॥ ६ ॥

आददीत बलं राजा मौलं मित्रबलं तथा ।

अटवीबलं भृतं चैव तथा श्रेणीबलं प्रभो ॥ ७ ॥

प्रभो! राजाको अपने पास सैनिकबल, धनबल, मित्रबल, अरण्यबल, भृत्यबल और श्रेणीबलका संग्रह करना चाहिये ॥ ७ ॥

तत्र मित्रबलं राजन् मौलं चैव विशिष्यते ।

श्रेणीबलं भृतं चैव तुल्ये एवेति मे मतिः ॥ ८ ॥

राजन्! इनमें मित्रबल और धनबल सबसे बढ़कर है । श्रेणीबल और भृत्यबल — ये दोनों समान ही हैं, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ ८ ॥

तथा चारबलं चैव परस्परसमं नृप ।

विज्ञेयं बहुकालेषु राज्ञा काल उपस्थिते ॥ ९ ॥

नरेश्वर! चारबल ( दूतोंका बल ) भी परस्पर समान ही है । राजाको समय आनेपर अधिक अवसरोंपर इस तत्त्वको समझे रहना चाहिये ॥ ९ ॥

आपदश्चापि बोद्धव्या बहुरूपा नराधिप ।

भवन्ति राज्ञा कौरव्य यास्ताः पृथगतः शृणु ॥ १० ॥

महाराज! कुरुनन्दन! राजापर आनेवाली अनेक प्रकारकी आपत्तियाँ भी होती हैं,

जिन्हें जानना चाहिये । अतः उनका पृथक् - पृथक् वर्णन सुनो ॥ १० ॥

विकल्पा बहुधा राजन्नापदां पाण्डुनन्दन ।

सामादिभिरुपन्यस्य गणयेत् तान् नृपः सदा ॥ ११ ॥

राजन्! पाण्डुनन्दन! उन आपत्तियोंके अनेक प्रकारके विकल्प हैं । राजा साम आदि उपायोंद्वारा उन सबको सामने लाकर सदा गिने ॥ ११ ॥

यात्रां गच्छेद् बलैर्युक्तो राजा सद्भिः परंतप ।

युक्तश्च देशकालाभ्यां बलैरात्मगुणैस्तथा ॥ १२ ॥

परंतप नरेश! देश- कालकी अनुकूलता होनेपर सैनिक बल तथा राजोचित गुणोंसे युक्त राजा अच्छी सेना साथ लेकर विजयके लिये यात्रा करे ॥ १२ ॥

हृष्टपुष्टबलो गच्छेद् राजा वृद्धयुदये रतः ।

अकृशश्चाप्यथो यायादनृतावपि पाण्डव ॥ १३ ॥

पाण्डुनन्दन! अपने अभ्युदयके लिये तत्पर रहनेवाला राजा यदि दुर्बल न हो और उसकी सेना हृष्ट- पुष्ट हो तो वह युद्धके अनुकूल मौसम न होनेपर भी शत्रुपर चढ़ाई करे ॥ १३ ॥

तूणाश्मानं वाजिरथप्रवाहां ध्वजद्रुमैः संवृतकूलरोधसम् । पदातिनागैर्बहुकर्दमां नदीं

पृष्ठ 2285

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2285 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सपत्ननाशे नृपतिः प्रयोजयेत् ॥ १४ ॥

शत्रुओंके विनाशके लिये राजा अपनी सेनारूपी नदीका प्रयोग करे । जिसमें तरकस ही प्रस्तरखण्डके समान हैं, घोड़े और रथरूपी प्रवाह शोभा पाते हैं, जिसका कूल - किनारा ध्वजरूपी वृक्षोंसे आच्छादित है तथा पैदल और हाथी जिसके भीतर अगाध पंकके समान जान पड़ते हैं ॥ १४ ॥

अथोपपत्त्या शकटं पद्मवज्रं च भारत ।

उशना वेद यच्छास्त्रं तत्रैतद् विहितं विभो ॥ १५ ॥

भारत! युद्धके समय युक्ति करके सेनाका शकट, पद्म अथवा वज्र नामक व्यूह बना ले । प्रभो! शुक्राचार्य जिस शास्त्रको जानते हैं, उसमें ऐसा ही विधान मिलता है ॥ १५ ॥

चारयित्वा परबलं कृत्वा स्वबलदर्शनम् ।

स्वभूमौ योजयेद् युद्धं परभूमौ तथैव च ॥ १६ ॥

गुप्तचरोंद्वारा शत्रुसेनाकी जाँच-पड़ताल करके अपनी सैनिक शक्तिका भी निरीक्षण करे । फिर अपनी या शत्रुकी भूमिपर युद्ध आरम्भ करे ॥ १६ ॥

बलं प्रसादयेद् राजा निक्षिपेद् बलिनो नरान् ।

ज्ञात्वा स्वविषयं तत्र सामादिभिरुपक्रमेत् ॥ १७ ॥

राजाको चाहिये कि वह पारितोषिक आदिके द्वारा सेनाको संतुष्ट रखे और उसमें बलवान् मनुष्योंकी भर्ती करे । अपने बलाबलको अच्छी तरह समझकर साम आदि उपायोंके द्वारा संधि या युद्धके लिये उद्योग करे ॥ १७ ॥

सर्वथैव महाराज शरीरं धारयेदिह ।

प्रेत्य चेह च कर्तव्यमात्मनिःश्रेयसं परम् ॥ १८ ॥

महाराज! इस जगत्में सभी उपायोंद्वारा शरीरकी रक्षा करनी चाहिये और उसके द्वारा इहलोक तथा परलोकमें भी अपने कल्याणका उत्तम साधन करना उचित है ॥ १८ ॥

एवमेतन्महाराज राजा सम्यक् समाचरन् ।

प्रेत्य स्वर्गमवाप्नोति प्रजा धर्मेण पालयन् ॥ १ ९ ॥

महाराज! जो राजा इन सब बातोंका विचार करके इनके अनुसार ठीक- ठीक आचरण और प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करता है, वह मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें जाता है ॥ १ ९ ॥

एवं त्वया कुरुश्रेष्ठ वर्तितव्यं प्रजाहितम् ।

उभयोर्लोकयोस्तात प्राप्तये नित्यमेव हि ॥ २० ॥

तात! कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार तुम्हें इहलोक और परलोकमें सुख पानेके लिये सदा ही प्रजावर्गके हित - साधनमें संलग्न रहना चाहिये ॥ २० ॥

भीष्मेण सर्वमुक्तोऽसि कृष्णेन विदुरेण च ।

मयाप्यवश्यं वक्तव्यं प्रीत्या ते नृपसत्तम ॥ २१ ॥

पृष्ठ 2286

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2286 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

नृपश्रेष्ठ! भीष्मजी, भगवान् श्रीकृष्ण तथा विदुरने तुम्हें सभी बातोंका उपदेश कर दिया है । मेरा भी तुम्हारे ऊपर प्रेम है, इसलिये मैंने भी तुम्हें कुछ बताना आवश्यक समझा है ॥ २१ ॥

एतत् सर्वं यथान्यायं कुर्वीथा भूरिदक्षिण ।

प्रियस्तथा प्रजानां त्वं स्वर्गे सुखमवाप्स्यसि ॥ २२ ॥

यज्ञमें प्रचुर दक्षिणा देनेवाले महाराज! इन सब बातोंका यथोचित रूपसे पालन करना ।

इससे तुम प्रजाके प्रिय बनोगे और स्वर्गमें भी सुख पाओगे ॥ २२ ॥

अश्वमेधसहस्रेण यो यजेत् पृथिवीपतिः ।

पालयेद् वापि धर्मेण प्रजास्तुल्यं फलं लभेत् ॥ २३ ॥

जो राजा एक हजार अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करता है अथवा दूसरा जो नरेश धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करता है, उन दोनोंको समान फल प्राप्त होता है ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्रोपसंवादे सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्ट्रका उपसंवादविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥

पृष्ठ 2287

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2287 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अष्टमोऽध्यायः धृतराष्ट्रका कुरुजांगलदेशकी प्रजासे वनमें जानेके लिये आज्ञा माँगना युधिष्ठिर उवाच

एवमेतत् करिष्यामि यथाऽऽत्थ पृथिवीपते ।

भूयश्चैवानुशास्योऽहं भवता पार्थिवर्षभ ॥ १ ॥

युधिष्ठिर बोले – पृथ्वीनाथ! नृपश्रेष्ठ! आप जैसा कहते हैं, वैसा ही करूंगा। अभी आप मुझे कुछ और उपदेश दीजिये ॥ १ ॥

भीष्मे स्वर्गमनुप्राप्ते गते च मधुसूदने ।

विदुरे संजये चैव कोऽन्यो मां वक्तुमर्हति ॥ २ ॥

भीष्मजी स्वर्ग सिधारे, भगवान् श्रीकृष्ण द्वारका पधारे और विदुर तथा संजय भी आपके साथ ही जा रहे हैं। अब दूसरा कौन रह जाता है, जो मुझे उपदेश दे सके ॥ २ ॥

यत् तु मामनुशास्तीह भवानद्य हिते स्थितः ।

कर्तास्मि तन्महीपाल निर्वृतो भव पार्थिव ॥ ३ ॥

भूपाल! पृथ्वीपते! आज मेरे हितसाधनमें संलग्न होकर आप मुझे यहाँ जो कुछ

उपदेश देते हैं, मैं उसका पालन करूँगा । आप संतुष्ट हों ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तः स राजर्षिर्धर्मराजेन धीमता ।

कौन्तेयं समनुज्ञातुमियेष भरतर्षभ ॥ ४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - भरतश्रेष्ठ! बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर राजर्षि धृतराष्ट्रने कुन्तीकुमारसे जानेके लिये अनुमति लेनेकी इच्छा की और कहा ॥ ४ ॥

पुत्र संशाम्यतां तावन्ममापि बलवान् श्रमः ।

इत्युक्त्वा प्राविशद् राजा गान्धार्या भवनं तदा ॥ ५ ॥

' बेटा! अब शान्त रहो । मुझे बोलनेमें बड़ा परिश्रम होता है ( अब तो मैं जानेकी ही अनुमति चाहता हूँ) । ' ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्रने उस समय गान्धारीके भवनमें प्रवेश किया ॥ ५ ॥

तमासनगतं देवी गान्धारी धर्मचारिणी ।

उवाच काले कालज्ञा प्रजापतिसमं पतिम् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 2288

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2288 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वहाँ जब वे आसनपर विराजमान हुए, तब समयका ज्ञान रखनेवाली धर्मपरायणा गान्धारी देवीने उस समय प्रजापतिके समान अपने पतिसे इस प्रकार पूछा— ॥ ६ ॥

अनुज्ञातः स्वयं तेन व्यासेन त्वं महर्षिणा ।

युधिष्ठिरस्यानुमते कदारण्यं गमिष्यसि ॥ ७ ॥

‘ महाराज! स्वयं महर्षि व्यासने आपको वनमें जानेकी आज्ञा दे दी है और युधिष्ठिरकी

भी अनुमति मिल ही गयी है । अब आप कब वनको चलेंगे? ' ॥ ७ ॥

धृतराष्ट्रउवाच

गान्धार्यहमनुज्ञातः स्वयं पित्रा महात्मना ।

युधिष्ठिरस्यानुमते गन्तास्मि नचिराद् वनम् ॥ ८ ॥

धृतराष्ट्रने कहा – गान्धारि! मेरे महात्मा पिता व्यासने स्वयं तो आज्ञा दे ही दी है, युधिष्ठिरकी भी अनुमति मिल गयी है; अतः अब मैं जल्दी ही वनको चलूँगा ॥ ८ ॥

अहं हि तावत् सर्वेषां तेषां दुर्धूतदेविनाम् ।

पुत्राणां दातुमिच्छामि प्रेतभावानुगं वसु ॥ ९ ॥

सर्वप्रकृतिसांनिध्यं कारयित्वा स्ववेश्मनि । जानेके पहले मैं चाहता हूँ कि समस्त प्रजाको घरपर बुलाकर अपने मरे हुए उन जुआरी पुत्रोंके उद्देश्यसे उनके पारलौकिक लाभके लिये कुछ धन दान कर दूँ ॥ वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा धर्मराजाय प्रेषयामास वै तदा ॥ १० ॥

स च तद् वचनात् सर्वं समानिन्ये महीपतिः । वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्रने धर्मराज युधिष्ठिरके पास अपना विचार कहला भेजा । राजा युधिष्ठिरने देनेके लिये उनकी आज्ञाके अनुसार वह सब सामग्री जुटा दी ( धृतराष्ट्रने उसका यथायोग्य वितरण कर दिया ) ॥ १०३ || ततः प्रतीतमनसो ब्राह्मणाः कुरुजाङ्गलाः ॥ ११ ॥

क्षत्रियाश्चैव वैश्याश्च शूद्राश्चैव समाययुः । उधर राजाका संदेश पाकर कुरुजांगलदेशके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वहाँ आये । उन सबके हृदयमें बड़ी प्रसन्नता थी ॥ ११३ ॥

ततो निष्क्रम्य नृपतिस्तस्मादन्तःपुरात् तदा ॥ १२ ॥

ददृशे तं जनं सर्वं सर्वाश्च प्रकृतीस्तथा । तदनन्तर महाराज धृतराष्ट्र अन्तःपुरसे बाहर निकले और वहाँ नगर तथा जनपदकी समस्त प्रजाके उपस्थित होनेका समाचार सुना ॥ १२३ ॥

समवेतांश्च तान् सर्वान् पौरान् जानपदांस्तथा ॥ १३ ॥

पृष्ठ 2289

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2289 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तानागतानभिप्रेक्ष्य समस्तं च सुहृज्जनम् ।

ब्राह्मणांश्च महीपाल नानादेशसमागतान् ॥ १४ ॥

उवाच मतिमान् राजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः । भूपाल जनमेजय! राजाने देखा कि समस्त पुरवासी और जनपदके लोग वहाँ आ गये हैं । सम्पूर्ण सुहृद्- वर्गके लोग भी उपस्थित हैं और नाना देशोंके ब्राह्मण भी पधारे हैं । तब बुद्धिमान् अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने उन सबको लक्ष्य करके कहा- ॥ १३-१४ ॥ भवन्तः कुरवश्चैव चिरकालं सहोषिताः ॥ १५ ॥

परस्परस्य सुहृदः परस्परहिते रताः । ' सज्जनो! आप और कौरव चिरकालसे एक साथ रहते आये हैं । आप दोनों एक-दूसरेके सुहृद् हैं और दोनों सदा एक- दूसरेके हितमें तत्पर रहते हैं ॥ १५३ ॥

यदिदानीमहं ब्रूयामस्मिन् काल उपस्थिते ॥ १६ ॥

तथा भवद्भिः कर्तव्यमविचार्य वचो मम । ‘इस समय मैं आपलोगोंसे वर्तमान अवसरपर जो कुछ कहूँ, मेरी उस बातको आपलोग बिना विचारे स्वीकार करें; यही मेरी प्रार्थना है ॥ १६३ ॥

अरण्यगमने बुद्धिर्गान्धारीसहितस्य मे ॥ १७ ॥

व्यासस्यानुमते राज्ञस्तथा कुन्तीसुतस्य मे । ‘ मैंने गान्धारीके साथ वनमें जानेका निश्चय किया है; इसके लिये मुझे महर्षि व्यास तथा कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिरकी भी अनुमति मिल गयी है ॥ १७३ ॥

भवन्तोऽप्यनुजानन्तु मा च वोऽभूद् विचारणा ॥ १८ ॥

अस्माकं भवतां चैव येयं प्रीतिर्हि शाश्वती ।

न च सान्येषु देशेषु राज्ञामिति मतिर्मम ॥। १ ९ ॥

' अब आपलोग भी मुझे वनमें जानेकी आज्ञा दें । इस विषयमें आपके मनमें कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिये । आपलोगोंका हमारे साथ जो यह प्रेम- सम्बन्ध सदासे चला आ रहा है, ऐसा सम्बन्ध दूसरे देशके राजाओंके साथ वहाँकी प्रजाका नहीं होगा, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ १८-१९ ॥

शान्तोऽस्मि वयसानेन तथा पुत्रविनाकृतः ।

उपवासकृशश्चास्मि गान्धारीसहितोऽनघाः ॥ २० ॥

‘ निष्पाप प्रजाजन! अब इस बुढ़ापेने गरधारीसहित मुझको बहुत थका दिया है । पुत्रोंके मारे जानेका दुःख भी बना ही रहता है तथा उपवास करनेके कारण भी हम दोनों अधिक दुर्बल हो गये हैं ॥ २० ॥

युधिष्ठिरगते राज्ये प्राप्तश्चास्मि सुखं महत् ।

मन्ये दुर्योधनैश्वर्याद् विशिष्टमिति सत्तमाः ॥ २१ ॥

पृष्ठ 2290

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 2290 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

' सज्जनो! युधिष्ठिरके राज्यमें मुझे बड़ा सुख मिला है । मैं समझता हूँ कि दुर्योधनके राज्यसे भी बढ़कर सुख मुझे प्राप्त हुआ है ' ॥ २१ ॥

मम चान्धस्य वृद्धस्य हतपुत्रस्य का गतिः ।

ऋते वनं महाभागास्तन्मानुज्ञातुमर्हथ ॥ २२ ॥

'एक तो मैं जन्मका अन्धा हूँ, दूसरे बूढ़ा हो गया हूँ, तीसरे मेरे सभी पुत्र मारे गये हैं । महाभाग प्रजाजन! अब आप ही बतायें, वनमें जानेके सिवा मेरे लिये दूसरी कौन- सी गति है? इसलिये अब आपलोग मुझे जानेकी आज्ञा दें ' ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सर्वे ते कुरुजाङ्गलाः ।

बाष्पसंदिग्धया वाचा रुरुदुर्भरतर्षभ ॥ २३ ॥

भरतश्रेष्ठ! राजा धृतराष्ट्रकी ये बातें सुनकर वहाँ उपस्थित हुए कुरुजांगलनिवासी सभी मनुष्योंके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बह चली और वे फूट- फूटकर रोने लगे ॥ २३ ॥

तानविब्रुवतः किंचित् सर्वान् शोकपरायणान् ।

पुनरेव महातेजा धृतराष्ट्रोऽब्रवीदिदम् ॥ २४ ॥

उन सबको शोकमग्न होकर कुछ भी उत्तर न देते देख महातेजस्वी धृतराष्ट्रने पुनः बोलना आरम्भ किया ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्रकृतवनगमनप्रार्थनेऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्ट्रकी वनमें जानेके लिये प्रार्थनाविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥

20