06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 2301–2310
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2301–2310
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ततो विवेश भवनं गान्धार्या सहितो निजम् ।
व्युष्टायां चैव शर्वर्यां यच्चकार निबोध तत् ॥ ५३ ॥
भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् धृतराष्ट्रने हाथ जोड़कर उन ब्राह्मण देवताका सत्कार किया और गान्धारीके साथ फिर अपने महलमें चले गये । जब रात बीती और सबेरा हुआ, तब उन्होंने जो कुछ किया, उसे बता रहा हूँ, सुनो ॥ ५३ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि प्रकृतिसान्त्वने दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्ट्रको प्रजाद्वारा दी गयी सान्त्वनाविषयक दसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १० ॥
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एकादशोऽध्यायः धृतराष्ट्रका विदुरके द्वारा युधिष्ठिरसे श्राद्धके लिये धन माँगना, अर्जुनकी सहमति और भीमसेनका विरोध वैशम्पायन उवाच
ततो रजन्यां व्युष्टायां धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
विदुरं प्रेषयामास युधिष्ठिरनिवेशनम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर जब रात बीती और सबेरा हुआ, तब अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने विदुरजीको युधिष्ठिरके महलमें भेजा ॥ १ ॥
स गत्वा राजवचनादुवाचाच्युतमीश्वरम् ।
युधिष्ठिरं महातेजाः सर्वबुद्धिमतां वरः ॥ २ ॥
राजाकी आज्ञासे अपने धर्मसे कभी विचलित न होनेवाले राजा युधिष्ठिरके पास जाकर समस्त बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी विदुरने इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥
धृतराष्ट्रो महाराजो वनवासाय दीक्षितः ।
गमिष्यति वनं राजन्नागतां कार्तिकीमिमाम् ॥ ३ ॥
‘ राजन्! महाराज धृतराष्ट्र वनवासकी दीक्षा ले चुके हैं । इसी कार्तिकी पूर्णिमाको जो कि अब निकट आ पहुँची है, वे वनकी यात्रा करेंगे ॥ ३ ॥
स त्वां कुरुकुलश्रेष्ठ किंचिदर्थमभीप्सति ।
श्राद्धमिच्छति दातुं स गाङ्गेयस्य महात्मनः ॥ ४ ॥
द्रोणस्य सोमदत्तस्य बाह्लीकस्य च धीमतः ।
पुत्राणां चैव सर्वेषां ये चान्ये सुहृदो हताः ॥ ५ ॥
‘ कुरुकुलश्रेष्ठ! इस समय वे तुमसे कुछ धन लेना चाहते हैं । उनकी इच्छा है कि महात्मा भीष्म, द्रोणाचार्य, सोमदत्त, बुद्धिमान् बाह्लीक और युद्धमें मारे गये अपने समस्त पुत्रों तथा अन्य सुहृदोंका श्राद्ध करें ॥ यदि चाप्यनुजानीषे सैन्धवापसदस्य च । 'यदि तुम्हारी सम्मति हो तो वे उस नराधम सिन्धुराज जयद्रथका भी श्राद्ध करना चाहते हैं ' ॥ ५३ ॥
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Mikka एतच्छ्रुत्वा तु वचनं विदुरस्य युधिष्ठिरः ॥ ६ ॥
हृष्टः सम्पूजयामास गुडाकेशश्च पाण्डवः । विदुरकी यह बात सुनकर युधिष्ठिर तथा पाण्डुपुत्र अर्जुन बड़े प्रसन्न हुए और उनकी सराहना करने लगे ॥ न च भीमो दृढक्रोधस्तद् वचो जगृहे तदा ॥ ७ ॥
विदुरस्य महातेजा दुर्योधनकृतं स्मरन् । परंतु महातेजस्वी भीमसेनके हृदयमें उनके प्रति अमिट क्रोध जमा हुआ था । उन्हें दुर्योधनके अत्याचारोंका स्मरण हो आया, अतः उन्होंने विदुरजीकी बात नहीं स्वीकार की ॥ ७३ ॥
अभिप्रायं विदित्वा'तुतु भीमसेनस्य फाल्गुनः ॥ ८ ॥
किरीटी किंचिदानम्य तमुवाच नरर्षभम् । भीमसेनके उस अभिप्रायको जानकर किरीटधारी अर्जुन कुछ विनीत हो उन नरश्रेष्ठसे इस प्रकार बोले— ॥ ८३ ॥
भीम राजा पिता वृद्धो वनवासाय दीक्षितः ॥ ९ ॥
दातुमिच्छति सर्वेषां सुहृदामौर्ध्वदेहिकम् ।
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' भैया भीम! राजा धृतराष्ट्र हमारे ताऊ और वृद्ध पुरुष हैं । इस समय वे वनवासकी दीक्षा ले चुके हैं और जानेके पहले वे भीष्म आदि समस्त सुहृदोंका और्ध्वदेहिक श्राद्ध कर लेना चाहते हैं ॥ ९ ३ ॥ भवता निर्जितं वित्तं दातुमिच्छति कौरवः ॥ १० ॥
भीष्मादीनां महाबाहो तदनुज्ञातुमर्हसि । ' महाबाहो! कुरुपति धृतराष्ट्र आपके द्वारा जीते गये धनको आपसे माँगकर उसे भीष्म आदिके लिये देना चाहते हैं; अतः आपको इसके लिये स्वीकृति दे देनी चाहिये ॥ १०३ ॥
दिष्ट्या त्वद्य महाबाहो धृतराष्ट्रः प्रयाचते ॥ ११ ॥
याचितो यः पुरास्माभिः पश्य कालस्य पर्ययम् । ‘ महाबाहो! सौभाग्यकी बात है कि आज राजा धृतराष्ट्र हमलोगोंसे धनकी याचना करते हैं । समयका उलट - फेर तो देखिये । पहले हमलोग जिनसे याचना करते थे, आज वे ही हमसे याचना करते हैं ॥ ११ ॥
योऽसौ पृथिव्याः कृत्स्नाया भर्ता भूत्वा नराधिपः ॥ १२ ॥
परैर्विनिहतामात्यो वनं गन्तुमभीप्सति । 'एक दिन जो सम्पूर्ण भूमण्डलका भरण- पोषण करनेवाले नरेश थे, उनके सारे मन्त्री और सहायक शत्रुओंद्वारा मार डाले गये और आज वे वनमें जाना चाहते हैं ॥ १२३ ॥
मा तेऽन्यत् पुरुषव्याघ्र दानाद् भवतु दर्शनम् ॥ १३ ॥
अयशस्यमतोऽन्यत् स्यादधर्मश्च महाभुज । ‘ पुरुषसिंह! अतः आप उन्हें धन देनेके सिवा दूसरा कोई दृष्टिकोण न अपनावें । महाबाहो! उनकी याचना ठुकरा देनेसे बढ़कर हमारे लिये और कोई कलंककी बात न होगी । उन्हें धन न देनेसे हमें अधर्मका भी भागी होना पड़ेगा ॥ १३३ ॥
राजानमुपशिक्षस्व ज्येष्ठं भ्रातरमीश्वरम् ॥ १४ ॥
अर्हस्त्वमपि दातुं वै नादातुं भरतर्षभ । ‘ आप अपने बड़े भाई ऐश्वर्यशाली महाराज युधिष्ठिरके बर्तावसे शिक्षा ग्रहण करें । भरतश्रेष्ठ! आप भी दूसरोंको देनेके ही योग्य हैं; दूसरोंसे लेनेके योग्य नहीं ' ॥ १४ ॥
एवं ब्रुवाणं बीभत्सुं धर्मराजोऽप्यपूजयत् ॥ १५ ॥
भीमसेनस्तु सक्रोधः प्रोवाचेदं वचस्तदा । ऐसी बात कहते हुए अर्जुनकी धर्मराज युधिष्ठिरने भूरि- भूरि प्रशंसा की। तब भीमसेनने कुपित होकर उनसे यह बात कही - ॥ १५३ ॥
वयं भीष्मस्य दास्यामः प्रेतकार्यं तु फाल्गुन ॥ १६ ॥
सोमदत्तस्य नृपतेर्भूरिश्रवस एव च ।
बाह्लीकस्य च राजर्षेर्द्रोणस्य च महात्मनः ॥ १७ ॥
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अन्येषां चैव सर्वेषां कुन्ती कर्णाय दास्यति । ‘ अर्जुन! हमलोग स्वयं ही भीष्म, राजा सोमदत्त, भूरिश्रवा, राजर्षि बाह्लीक, महात्मा द्रोणाचार्य तथा अन्य सब सम्बन्धियोंका श्राद्ध करेंगे । हमारी माता कुन्ती कर्णके लिये पिण्डदान करेगी ॥ १६-१७३ ॥ श्राद्धानि पुरुषव्याघ्र मा प्रादात् कौरवो नृपः ॥ १८ ॥
इति मे वर्तते बुद्धिर्मा नो निन्दन्तु शत्रवः । ‘ पुरुषसिंह! मेरा यही विचार है कि कुरुवंशी राजा धृतराष्ट्र उक्त महानुभावोंका श्राद्ध न करें । इसके लिये हमारे शत्रु हमारी निन्दा न करें ॥ १८३ ॥
कष्टात् कष्टतरं यान्तु सर्वे दुर्योधनादयः ॥ १ ९ ॥ यैरियं पृथिवी कृत्स्ना घातिता कुलपांसनैः । ‘जिन कुलांगारोंने इस सारी पृथ्वीका विनाश करा डाला, वे दुर्योधन आदि सब लोग भारी- से - भारी कष्टमें पड़ जायँ' ॥ १ ९ ३ ॥ कुतस्त्वमसि विस्मृत्य वैरं द्वादशवार्षिकम् ॥ २० ॥
अज्ञातवासं गहनं द्रौपदीशोकवर्धनम् । 'तुम वह पुराना वैर, वह बारह वर्षोंका वनवास और द्रौपदीके शोकको बढ़ानेवाला एक वर्षका गहन अज्ञातवास सहसा भूल कैसे गये? ॥ २० ॥
क्व तदा धृतराष्ट्रस्य स्नेहोऽस्मद्गोचरो गतः ॥ २१ ॥
कृष्णाजिनोपसंवीतो हृताभरणभूषणः ।
सार्धं पाञ्चालपुत्र्या त्वं राजानमुपजग्मिवान् ॥ २२ ॥
क्व तदा द्रोणभीष्मौ तौ सोमदत्तोऽपि वाभवत् । ‘ उन दिनों धृतराष्ट्रका हमारे प्रति स्नेह कहाँ चला गया था? जब तुम्हारे आभरण एवं आभूषण उतार लिये गये और तुम काले मृगचर्मसे अपने शरीरको ढँककर द्रौपदीके साथ राजाके समीप गये, उस समय द्रोणाचार्य और भीष्म कहाँ थे? सोमदत्तजी भी कहाँ चले गये थे ॥ २१-२२ ॥ यत्र त्रयोदशसमा वने वन्येन जीवथ ॥ २३ ॥
न तदा त्वां पिता ज्येष्ठः पितृत्वेनाभिवीक्षते । ' जब तुम सब लोग तेरह वर्षोंतक वनमें जंगली फल- मूल खाकर किसी तरह जी रहे थे, उन दिनों तुम्हारे ये ताऊजी पिताके भावसे तुम्हारी ओर नहीं देखते थे ॥ किं ते तद् विस्मृतं पार्थ यदेष कुलपांसनः ॥ २४ ॥
दुर्बुद्धिर्विदुरं प्राह द्यूते किं जितमित्युत ।
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‘ पार्थ! क्या तुम उस बातको भूल गये, जब कि यह कुलांगार दुर्बुद्धि धृतराष्ट्र जुआ आरम्भ कराकर विदुरजीसे बार- बार पूछता था कि 'इस दाँवमें हमलोगोंने क्या जीता है? ' ॥ २४ ॥
तमेवंवादिनं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
उवाच वचनं धीमान् जोषमास्वेति भर्त्सयन् ॥ २५ ॥
भीमसेनको ऐसी बातें करते देख बुद्धिमान् कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरने उन्हें डाँटकर कहा — ‘ चुप रहो ' ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि एकादशोऽध्यायः ॥ ११ || इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥
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द्वादशोऽध्यायः अर्जुनका भीमको समझाना और युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रको यथेष्ट धन देनेकी स्वीकृति प्रदान करना अर्जुन उवाच
भीम ज्येष्ठो गुरुर्मे त्वं नातोऽन्यद् वक्तुमुत्सहे ।
धृतराष्ट्रस्तु राजर्षिः सर्वथा मानमर्हति ॥ १ ॥
अर्जुन बोले — भैया भीमसेन! आप मेरे ज्येष्ठ भ्राता और गुरुजन हैं; अतः आपके सामने मैं इसके सिवा और कुछ नहीं कह सकता कि राजर्षि धृतराष्ट्र सर्वथा समादरके योग्य हैं ॥ १ ॥
न स्मरन्त्यपराद्धानि स्मरन्ति सुकृतान्यपि ।
असम्भिन्नार्यमर्यादाः साधवः पुरुषोत्तमाः ॥ २ ॥
जिन्होंने आर्योंकी मर्यादा भंग नहीं की है, वे साधु- स्वभाववाले श्रेष्ठ पुरुष दूसरोंके अपराधोंको नहीं, उपकारोंको ही याद रखते हैं ॥ २ ॥
इति तस्य वचः श्रुत्वा फाल्गुनस्य महात्मनः ।
विदुरं प्राह धर्मात्मा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ३ ॥
महात्मा अर्जुनकी यह बात सुनकर धर्मात्मा कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने विदुरजीसे कहा - ॥ ३ ॥
इदं मद्वचनात् क्षत्तः कौरवं ब्रूहि पार्थिवम् ।
यावदिच्छति पुत्राणां श्राद्धं तावद् ददाम्यहम् ॥ ४ ॥
'चाचाजी! आप मेरी ओरसे कौरवनरेश धृतराष्ट्रसे जाकर कह दीजिये कि वे अपने पुत्रोंका श्राद्ध करनेके लिये जितना धन चाहते हों, वह सब मैं दे दूँगा ॥ ४ ॥
भीष्मादीनां च सर्वेषां सुहृदामुपकारिणाम् ।
मम कोशादिति विभो मा भूद् भीमः सुदुर्मनाः ॥ ५ ॥
‘ प्रभो! भीष्म आदि समस्त उपकारी सुहृदोंका श्राद्ध करनेके लिये केवल मेरे भण्डारसे धन मिल जायगा । इसके लिये भीमसेन अपने मनमें दुखी न हों' ॥ ५ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा धर्मराजस्तमर्जुनं प्रत्यपूजयत् ।
भीमसेनः कटाक्षेण वीक्षां चक्रे धनंजयम् ॥ ६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! ऐसा कहकर धर्मराजने अर्जुनकी बड़ी प्रशंसा की । उस समय भीमसेनने अर्जुनकी ओर कटाक्षपूर्वक देखा ॥ ६ ॥
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ततः स विदुरं धीमान् वाक्यमाह युधिष्ठिरः ।
भीमसेने न कोपं स नृपतिः कर्तुमर्हति ॥ ७ ॥
तब बुद्धिमान् युधिष्ठिरने विदुरसे कहा-' चाचाजी! राजा धृतराष्ट्रको भीमसेनपर क्रोध नहीं करना चाहिये ॥ ७ ॥
परिक्लिष्टो हि भीमोऽपि हिमवृष्ट्यातपादिभिः ।
दुःखैर्बहुविधैर्धीमानरण्ये विदितं तव ॥ ८ ॥
' आपको तो मालूम ही है कि वनमें हिम, वर्षा और धूप आदि नाना प्रकारके दुःखोंसे बुद्धिमान् भीमसेनको बड़ा कष्ट उठाना पड़ा है ॥ ८ ॥
किं तु मद्वचनाद् ब्रूहि राजानं भरतर्षभ ।
यद् यदिच्छसि यावच्च गृह्यतां मद्गृहादिति ॥ ९ ॥
' आप मेरी ओरसे राजा धृतराष्ट्रसे कहिये कि भरतश्रेष्ठ! आप जो -जो वस्तु जितनी मात्रामें लेना चाहते हों, उसे मेरे घरसे ग्रहण कीजिये' ॥ ९ ॥
यन्मात्सर्यमयं भीमः करोति भृशदुःखितः ।
न तन्मनसि कर्तव्यमिति वाच्यः स पार्थिवः ॥ १० ॥
‘ भीमसेन अत्यन्त दुखी होनेके कारण जो कभी ईर्ष्या प्रकट करते हैं, उसे वे मनमें न लावें । यह बात आप महाराजसे अवश्य कह दीजियेगा ' ॥ १० । ।
यन्ममास्ति धनं किंचिदर्जुनस्य च वेश्मनि ।
तस्य स्वामी महाराज इति वाच्यः स पार्थिवः ॥ ११ ॥
‘ मेरे और अर्जुनके घरमें जो कुछ भी धन है, उस सबके स्वामी महाराज धृतराष्ट्र हैं; यह बात उन्हें बता दीजिये ॥ ११ ॥
ददातु राजा विप्रेभ्यो यथेष्टं क्रियतां व्ययः ।
पुत्राणां सुहृदां चैव गच्छत्वानृण्यमद्य सः ॥ १२ ॥
‘ वे ब्राह्मणोंको यथेष्ट धन दें । जितना खर्च करना चाहें, करें । आज वे अपने पुत्रों और सुहृदोंके ऋणसे मुक्त हो जायँ ॥ १२ ॥
इदं चापि शरीरं मे तवायत्तं जनाधिप ।
धनानि चेति विद्धि त्वं न मे तत्रास्ति संशयः ॥ १३ ॥
' उनसे कहिये, जनेश्वर! मेरा यह शरीर और सारा धन आपके ही अधीन है । इस
बातको आप अच्छी तरह जान लें । इस विषयमें मेरे मनमें संशय नहीं है ' ॥ १३ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि युधिष्ठिरानुमोदने द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें युधिष्ठिरका अनुमोदनविषयक बारहवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १२ ॥
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त्रयोदशोऽध्यायः विदुरका धृतराष्ट्रको युधिष्ठिरका उदारतापूर्ण उत्तर सुनाना वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु राज्ञा स विदुरो बुद्धिसत्तमः ।
धृतराष्ट्रमुपेत्यैवं वाक्यमाह महार्थवत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! राजा युधिष्ठिरके इस प्रकार कहनेपर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ विदुरजी धृतराष्ट्रके पास जाकर यह महान् अर्थसे युक्त बात बोले ॥ १ ॥
उक्तो युधिष्ठिरो राजा भवद्वचनमादितः ।
स च संश्रुत्य वाक्यं ते प्रशशंस महाद्युतिः ॥ २ ॥
‘ महाराज! मैंने महातेजस्वी राजा युधिष्ठिरके यहाँ जाकर आपका संदेश आरम्भसे ही कह सुनाया । उसे सुनकर उन्होंने आपकी बड़ी प्रशंसा की ॥ २ ॥
बीभत्सुश्च महातेजा निवेदयति ते गृहान् ।
वसु तस्य गृहे यच्च प्राणानपि च केवलान् ॥ ३ ॥
‘ महातेजस्वी अर्जुन भी आपको अपना सारा घर सौंपते हैं । उनके घरमें जो कुछ धन है, उसे और अपने प्राणोंको भी वे आपकी सेवामें समर्पित करनेको तैयार हैं ॥ ३ ॥
धर्मराजश्च पुत्रस्ते राज्यं प्राणान् धनानि च ।
अनुजानाति राजर्षे यच्चान्यदपि किंचन ॥ ४ ॥
‘ राजर्षे! आपके पुत्र धर्मराज युधिष्ठिर अपना राज्य, प्राण, धन तथा और जो कुछ उनके पास है, सब आपको दे रहे हैं ॥ ४ ॥
भीमश्च सर्वदुःखानि संस्मृत्य बहुलान्युत ।
कृच्छ्रादिव महाबाहुरनुजज्ञे विनिःश्वसन् ॥ ५ ।
‘ परंतु महाबाहु भीमसेनने पहलेके समस्त क्लेशोंका, जिनकी संख्या अधिक है, स्मरण करके लंबी साँस खींचते हुए बड़ी कठिनाईसे धन देनेकी अनुमति दी है ॥ ५ ॥
स राजन् धर्मशीलेन राज्ञा बीभत्सुना तथा ।
अनुनीतो महाबाहुः सौहृदे स्थापितोऽपि च ॥ ६ ॥
' राजन्! धर्मशील राजा युधिष्ठिर तथा अर्जुनने भी महाबाहु भीमसेनको भलीभाँति समझाकर उनके हृदयमें भी आपके प्रति सौहार्द उत्पन्न कर दिया है ॥ ६ ॥
न च मन्युस्त्वया कार्य इति त्वां प्राह धर्मराट् ।
संस्मृत्य भीमस्तद्वैरं यदन्यायवदाचरत् ॥ ७ ॥