06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 351–360
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 351–360
पृष्ठ 351
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वादशाहं निराहारः कल्मषाद् विप्रमुच्यते ॥ ४७ ॥
रामह्रद ( परशुराम-कुण्ड) - में स्नान और विपाशा नदीमें तर्पण करके बारह दिनोंतक उपवास करनेवाला पुरुष सब पापोंसे छूट जाता है ॥ ४७ ॥
महाह्रद उपस्पृश्य शुद्धेन मनसा नरः ।
एकमासं निराहारो जमदग्निगतिं लभेत् ॥ ४८ ॥
महाह्रदमें स्नान करके यदि मनुष्य शुद्ध चित्तसे वहाँ एक मासतक निराहार रहे तो उसे जमदग्निके समान सद्गति प्राप्त होती है ॥ ४८ ॥
विन्ध्ये संताप्य चात्मानं सत्यसंधस्त्वहिंसकः ।
विनयात्तप आस्थाय मासेनैकेन सिध्यति ॥ ४ ९ ॥
जो हिंसाका त्याग करके सत्यप्रतिज्ञ होकर विन्ध्याचलमें अपने शरीरको कष्ट दे विनीतभावसे तपस्याका आश्रय लेकर रहता है उसे एक महीनेमें सिद्धि प्राप्त हो जाती है ॥ ४ ९ ॥
नर्मदायामुपस्पृश्य तथा शूर्पारकोदके ।
एकपक्षं निराहारो राजपुत्रो विधीयते ॥ ५० ॥
नर्मदा नदी और शूर्पारक क्षेत्रके जलमें स्नान करके एक पक्षतक निराहार रहनेवाला मनुष्य दूसरे जन्ममें राजकुमार होता है ॥ ५० ॥
जम्बूमार्गे त्रिभिर्मासैः संयतः सुसमाहितः ।
अहोरात्रेण चैकेन सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ५१ ॥
साधारण भावसे तीन महीनेतक जम्बूमार्गमें स्नान करनेसे तथा इन्द्रिय- संयमपूर्वक एकाग्रचित्त हो वहाँ एक ही दिन स्नान करनेसे भी मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर लेता है ॥ ५१ ॥
कोकामुखे विगाह्याथ गत्वा चाञ्जलिकाश्रमम् ।
शाकभक्षश्चीरवासाः कुमारीर्विन्दते दश ॥ ५२ ॥
वैवस्वतस्य सदनं न स गच्छेत् कदाचन ।
यस्य कन्याहृदे वासो देवलोकं स गच्छति ॥ ५३ ॥
जो कोकामुख तीर्थमें स्नान करके अञ्जलिकाश्रम-तीर्थमें जाकर सागका भोजन करता हुआ चीरवस्त्र धारण करके कुछ कालतक निवास करता है उसे दस बार कन्याकुमारी तीर्थके सेवनका फल प्राप्त होता है तथा उसे कभी यमराजके घर नहीं जाना पड़ता । जो कन्याकुमारी तीर्थमें निवास करता है वह मृत्युके पश्चात् देवलोकमें जाता है ॥ ५२-५३ ॥
प्रभासे त्वेकरात्रेण अमावास्यां समाहितः ।
सिध्यते तु महाबाहो यो नरो जायतेऽमरः ॥ ५४ ॥
महाबाहो! जो एकाग्रचित्त होकर अमावास्याको प्रभास-तीर्थका सेवन करता है उसे एक ही रातमें सिद्धि मिल जाती है तथा वह मृत्युके पश्चात् देवता होता है ॥ ५४ ॥
पृष्ठ 352
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उज्जानक उपस्पृश्य आर्ष्टिषेणस्य चाश्रमे ।
पिङ्गायाश्चाश्रमे स्नात्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५५ ॥
उज्जानकतीर्थमें स्नान करके आर्ष्टिषेणके आश्रम तथा पिङ्गाके आश्रममें गोता लगानेसे मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ ५५ ॥
कुल्यायां समुपस्पृश्य जप्त्वा चैवाघमर्षणम् ।
अश्वमेधमवाप्नोति त्रिरात्रोपोषितो नरः ॥ ५६ ॥
जो मनुष्य कुल्यामें स्नान करके अघमर्षण मन्त्रका जप करता है तथा तीन राततक वहाँ उपवासपूर्वक रहता है उसे अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है ॥ ५६ ॥
पिण्डारक उपस्पृश्य एकरात्रोषितो नरः ।
अग्निष्टोममवाप्नोति प्रभातां शर्वरीं शुचिः ॥ ५७ ॥
जो मानव पिण्डारक तीर्थमें स्नान करके वहाँ एक रात निवास करता है वह प्रातःकाल होते ही पवित्र होकर अग्निष्टोमयज्ञका फल प्राप्त कर लेता है ॥ ५७ ॥
तथा ब्रह्मसरो गत्वा धर्मारण्योपशोभितम् ।
पुण्डरीकमवाप्नोति उपस्पृश्य नरः शुचिः ॥ ५८ ॥
धर्मारण्यसे सुशोभित ब्रह्मसर तीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करके पवित्र हुआ मनुष्य पुण्डरीकयज्ञका फल पाता है ॥ ५८ ॥
मैनाके पर्वते स्नात्वा तथा संध्यामुपास्य च ।
कामं जित्वा च वै मासं सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥ ५ ९ ॥
मैनाक पर्वतपर एक महीनेतक स्नान और संध्योपासन करनेसे मनुष्य कामको जीतकर समस्त यज्ञोंका फल पा लेता है ॥ ५ ९ ॥
कालोदकं नन्दिकुण्डं तथा चोत्तरमानसम् ।
अभ्येत्य योजनशताद् भ्रूणहा विप्रमुच्यते ॥ ६० ॥
सौ योजन दूरसे आकर कालोदक, नन्दि- कुण्ड तथा उत्तरमानस तीर्थमें स्नान करनेवाला मनुष्य यदि भ्रूणहत्यारा भी हो तो वह उस पापसे मुक्त हो जाता है ॥ ६० ॥
नन्दीश्वरस्य मूर्तिं तु दृष्ट्वा मुच्येत किल्बिषैः ।
स्वर्गमार्गे नरः स्नात्वा ब्रह्मलोकं स गच्छति ॥ ६१ ॥
वहाँ नन्दीश्वरकी मूर्तिका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है । स्वर्गमार्गमें स्नान करनेसे वह ब्रह्मलोकमें जाता है ॥ ६१ ॥
विख्यातो हिमवान् पुण्यः शङ्करश्वशुरो गिरिः ।
आकरः सर्वरत्नानां सिद्धचारणसेवितः ॥ ६२ ॥
भगवान् शंकरका श्वशुर हिमवान् पर्वत परम पवित्र और संसारमें विख्यात है । वह सब रत्नोंकी खान तथा सिद्ध और चारणोंसे सेवित है ॥ ६२ ॥
शरीरमुत्सृजेत् तत्र विधिपूर्वमनाशके ।
पृष्ठ 353
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अध्रुवं जीवितं ज्ञात्वा यो वै वेदान्तगो द्विजः ॥ ६३ ॥
अभ्यर्च्य देवतास्तत्र नमस्कृत्य मुनींस्तथा ।
ततः सिद्धो दिवं गच्छेद् ब्रह्मलोकं सनातनम् ॥ ६४ ॥
जो वेदान्तका ज्ञाता द्विज इस जीवनको नाशवान् समझकर उस पर्वतपर रहता और देवताओंका पूजन तथा मुनियोंको प्रणाम करके विधिपूर्वक अनशनके द्वारा अपने प्राणोंको त्याग देता है वह सिद्ध होकर सनातन ब्रह्मलोकको प्राप्त हो जाता है ॥ ६३-६४ ॥
कामं क्रोधं च लोभं च यो जित्वा तीर्थमावसेत् ।
न तेन किञ्चिन्न प्राप्तं तीर्थाभिगमनाद् भवेत् ॥ ६५ ॥
जो काम, क्रोध और लोभको जीतकर तीर्थोंमें स्नान करता है उसे उस तीर्थयात्राके पुण्यसे कोई वस्तु दुर्लभ नहीं रहती ॥ ६५ ॥
यान्यगम्यानि तीर्थाणि दुर्गाणि विषमाणि च ।
मनसा तानि गम्यानि सर्वतीर्थसमीक्षया ॥ ६६ ॥
जो समस्त तीर्थोंके दर्शनकी इच्छा रखता हो, वह दुर्गम और विषम होनेके कारण जिन तीर्थोंमें शरीरसे न जा सके, वहाँ मनसे यात्रा करे ॥ ६६ ॥
इदं मेध्यमिदं पुण्यमिदं स्वर्ग्यमनुत्तमम् ।
इदं रहस्यं वेदानामाप्लाव्यं पावनं तथा ॥ ६७ ॥
यह तीर्थ - सेवनका कार्य परम पवित्र, पुण्यप्रद, स्वर्गकी प्राप्तिका सर्वोत्तम साधन और
वेदोंका गुप्त रहस्य है । प्रत्येक तीर्थ पावन और स्नानके योग्य होता है ॥
इदं दद्याद् द्विजातीनां साधोरात्महितस्य च ।
सुहृदां च जपेत् कर्णे शिष्यस्यानुगतस्य च ॥ ६८ ॥
तीर्थोंका यह माहात्म्य द्विजातियोंके, अपने हितैषी श्रेष्ठ पुरुषके, सुहृदोंके तथा अनुगत शिष्यके ही कानमें डालना चाहिये ॥ ६८ ॥
दत्तवान् गौतमस्यैतदङ्गिरा वै महातपाः ।
अङ्गिराः समनुज्ञातः काश्यपेन च धीमता ॥ ६ ९ ॥
सबसे पहले महातपस्वी अङ्गिराने गौतमको इसका उपदेश दिया । अङ्गिराको बुद्धिमान् काश्यपजीसे इसका ज्ञान प्राप्त हुआ था ॥ ६ ९ ॥
महर्षीणामिदं जप्यं पावनानां तथोत्तमम् ।
जपंश्चाभ्युत्थितः शश्वन्निर्मलः स्वर्गमाप्नुयात् ॥ ७० ॥
यह कथा महर्षियोंके पढ़ने योग्य और पावन वस्तुओंमें परम पवित्र है । जो सावधान एवं उत्साहयुक्त होकर सदा इसका पाठ करता है वह सब पापोंसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें जाता है ॥ ७० ॥
इदं यश्चापि शृणुयाद् रहस्यं त्वङ्गिरोमतम् ।
उत्तमे च कुले जन्म लभेज्जातीश्च संस्मरेत् ॥ ७१ ॥
पृष्ठ 354
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
जो अङ्गिरामुनिके इस रहस्यमय मतको सुनता है, वह उत्तम कुलमें जन्म पाता और पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करता है ॥ ७१ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि आङ्गिरसतीर्थयात्रायां पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें आङ्गिरसतीर्थयात्राविषयक पच्चीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥
पृष्ठ 355
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
षड्विंशोऽध्यायः श्रीगङ्गाजीके माहात्म्यका वर्णन वैशम्पायन उवाच
बृहस्पतिसमं बुद्ध्या क्षमया ब्रह्मणः समम् ।
पराक्रमे शक्रसममादित्यसमतेजसम् ॥ १ ॥
गाङ्गेयमर्जुनेनाजौ निहतं भूरितेजसम् ।
भ्रातृभिः सहितोऽन्यैश्च पर्यपृच्छद् युधिष्ठिरः ॥ २ ॥
शयानं वीरशयने कालाकाङ्क्षिणमच्युतम् ।
आजग्मुर्भरतश्रेष्ठं द्रष्टुकामा महर्षयः ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! जो बुद्धिमें बृहस्पतिके, क्षमामें ब्रह्माजीके, पराक्रममें इन्द्रके और तेजमें सूर्यके समान थे, अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले वे महातेजस्वी गङ्गानन्दन भीष्मजी जब अर्जुनके हाथसे मारे जाकर युद्धमें वीरशय्यापर पड़े हुए कालकी बाट जोह रहे थे और भाइयों तथा अन्य लोगोंसहित राजा युधिष्ठिर उनसे तरह-तरहके प्रश्न कर रहे थे, उसी समय बहुत से दिव्य महर्षि भीष्मजीको देखनेके लिये आये ॥ १–३ ॥
अत्रिर्वसिष्ठोऽथ भृगुः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
अङ्गिरागौतमोऽगस्त्यः सुमतिः सुयतात्मवान् ॥ ४ ॥
विश्वामित्रः स्थूलशिराः संवर्तः प्रमतिर्दमः ।
बृहस्पत्युशनोव्यासाश्च्यवनः काश्यपो ध्रुवः ॥ ५ ॥
दुर्वासा जमदग्निश्च मार्कण्डेयोऽथ गालवः ।
भरद्वाजोऽथ रैभ्यश्च यवक्रीतस्त्रितस्तथा ॥ ६ ॥
स्थूलाक्षः शबलाक्षश्च कण्वो मेधातिथिः कृशः ।
नारदः पर्वतश्चैव सुधन्वाथैकतो द्विजः ॥ ७ ॥
नितम्भूर्भुवनो धौम्यः शतानन्दोऽकृतव्रणः ।
जामदग्न्यस्तथा रामः कचश्चेत्येवमादयः ॥ ८ ॥
उनके नाम ये हैं — अत्रि, वसिष्ठ, भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अङ्गिरा, गौतम, अगस्त्य, संयतचित्त सुमति, विश्वामित्र, स्थूलशिरा, संवर्त, प्रमति, दम, बृहस्पति, शुक्राचार्य, व्यास, च्यवन, काश्यप, ध्रुव, दुर्वासा, जमदग्नि, मार्कण्डेय, गालव, भरद्वाज, रैभ्य, यवक्रीत, त्रित, स्थूलाक्ष, शबलाक्ष, कण्व, मेधातिथि, कृश, नारद, पर्वत, सुधन्वा, एकत, नितम्भू, भुवन, धौम्य, शतानन्द, अकृतव्रण, जमदग्निनन्दन परशुराम और कच ॥ ४–८ ॥ समागता महात्मानो भीष्मं द्रष्टुं महर्षयः ।
पृष्ठ 356
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तेषां महात्मनां पूजामागतानां युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥
भ्रातृभिः सहितश्चक्रे यथावदनुपूर्वशः । ये सभी महात्मा महर्षि जब भीष्मजीको देखनेके लिये वहाँ पधारे, तब भाइयोंसहित राजा युधिष्ठिरने उनकी क्रमशः विधिवत् पूजा की ॥ ९ ३ ॥ ते पूजिताः सुखासीनाः कथाश्चक्रुर्महर्षयः ॥ १० ॥
भीष्माश्रिताः सुमधुराः सर्वेन्द्रियमनोहराः । पूजनके पश्चात् वे महर्षि सुखपूर्वक बैठकर भीष्मजीसे सम्बन्ध रखनेवाली मधुर एवं मनोहर कथाएँ कहने लगे । उनकी वे कथाएँ सम्पूर्ण इन्द्रियों और मनको मोह लेती थीं ॥ १० ॥
भीष्मस्तेषां कथाः श्रुत्वा ऋषीणां भावितात्मनाम् ॥ ११ ॥
मेने दिविष्ठमात्मानं तुष्ट्या परमया युतः । शुद्ध अन्तःकरणवाले उन ऋषि - मुनियोंकी बातें सुनकर भीष्मजी बहुत संतुष्ट हुए और अपनेको स्वर्गमें ही स्थित मानने लगे ॥ ११ ॥
ततस्ते भीष्ममामन्त्र्य पाण्डवांश्च महर्षयः ॥ १२ ॥
अन्तर्धानं गताः सर्वे सर्वेषामेव पश्यताम् । तदनन्तर वे महर्षिगण भीष्मजी और पाण्डवोंकी अनुमति लेकर सबके देखते - देखते ही वहाँसे अदृश्य हो गये ॥ १२३ ॥
तानृषीन् सुमहाभागानन्तर्धानगतानपि ॥ १३ ॥
पाण्डवास्तुष्टुवुः सर्वे प्रणेमुश्च मुहुर्मुहः । उन महाभाग मुनियोंके अदृश्य हो जानेपर भी समस्त पाण्डव बारंबार उनकी स्तुति और उन्हें प्रणाम करते रहे ॥ १३ ॥
प्रसन्नमनसः सर्वे गाङ्गेयं कुरुसत्तमम् ॥ १४ ॥
उपतस्थुर्यथोद्यन्तमादित्यं मन्त्रकोविदाः । जैसे वेदमन्त्रोंके ज्ञाता ब्राह्मण उगते हुए सूर्यका उपस्थान करते हैं, उसी प्रकार प्रसन्न चित्त हुए समस्त पाण्डव कुरुश्रेष्ठ गङ्गानन्दन भीष्मको प्रणाम करने लगे ॥ १४३ ॥
प्रभावात् तपसस्तेषामृषीणां वीक्ष्य पाण्डवाः ॥ १५ ॥
प्रकाशन्तो दिशः सर्वा विस्मयं परमं ययुः । उन ऋषियोंकी तपस्याके प्रभावसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित होती देख पाण्डवोंको बड़ा विस्मय हुआ ॥ १५३ ॥
महाभाग्यं परं तेषामृषीणामनुचिन्त्य ते ।
पाण्डवाः सह भीष्मेण कथाश्चक्रुस्तदाश्रयाः ॥ १६ ॥
पृष्ठ 357
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उन महर्षियोंके महान् सौभाग्यका चिन्तन करके पाण्डव भीष्मजीके साथ उन्हींके सम्बन्धमें बातें करने लगे ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
कथान्ते शिरसा पादौ स्पृष्ट्वा भीष्मस्य पाण्डवः ।
धर्म्यं धर्मसुतः प्रश्नं पर्यपृच्छद् युधिष्ठिरः ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! बातचीतके अन्तमें भीष्मके चरणोंमें सिर रखकर धर्मपुत्र पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने यह धर्मानुकूल प्रश्न पूछा— ॥ १७ ॥
युधिष्ठिर उवाच
के देशाः के जनपदा आश्रमाः के च पर्वताः ।
प्रकृष्टाः पुण्यतः काश्च ज्ञेया नद्यः पितामह ॥ १८ ॥
युधिष्ठिर बोले- पितामह! कौन- से देश, कौन- से प्रान्त, कौन- कौन आश्रम, कौन - से पर्वत और कौन - कौन- सी नदियाँ पुण्यकी दृष्टिसे सर्वश्रेष्ठ समझने योग्य हैं? ॥ १८ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
शिलोञ्छवृत्तेः संवादं सिद्धस्य च युधिष्ठिर ॥ १ ९ ॥
भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! इस विषयमें शिलोञ्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाले एक पुरुषका किसी सिद्ध पुरुषके साथ जो संवाद हुआ था, वह प्राचीन इतिहास सुनो ॥ १ ९ ॥
इमां कश्चित् परिक्रम्य पृथिवीं शैलभूषणाम् ।
असकृद् द्विपदां श्रेष्ठः श्रेष्ठस्य गृहमेधिनः ॥ २० ॥
शिलवृत्तेर्गृहं प्राप्तः स तेन विधिनार्चितः ।
उवास रजनीं तत्र सुमुखः सुखभागृषिः ॥ २१ ॥
मनुष्योंमें श्रेष्ठ कोई सिद्ध पुरुष शैलमालाओंसे अलंकृत इस समूची पृथ्वीकी अनेक बार परिक्रमा करनेके पश्चात् शिलोञ्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाले एक श्रेष्ठ गृहस्थके घर गया । उस गृहस्थने उसकी विधिपूर्वक पूजा की । वह समागत ऋषि वहाँ बड़े सुखसे रातभर रहा । उसके मुखपर प्रसन्नता छा रही थी ॥ २०-२१ ॥
शिलवृत्तिस्तु यत् कृत्यं प्रातस्तत् कृतवान् शुचिः ।
कृतकृत्यमुपातिष्ठत् सिद्धं तमतिथिं तदा ॥ २२ ॥
सबेरा होनेपर वह शिलवृत्तिवाला गृहस्थ स्नान आदिसे पवित्र होकर प्रातःकालीन नित्यकर्ममें लग गया । नित्यकर्म पूर्ण करके वह उस सिद्ध अतिथिकी सेवामें उपस्थित हुआ । इसी बीचमें अतिथि भी प्रातः कालके स्नान- पूजन आदि आवश्यक कृत्य पूर्ण कर लिये थे ॥ २२ ॥
पृष्ठ 358
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तौ समेत्य महात्मानौ सुखासीनौ कथाः शुभाः ।
चक्रतुर्वेदसम्बद्धास्तच्छेषकृतलक्षणाः ॥ २३ ॥
वे दोनों महात्मा एक- दूसरे से मिलकर सुखपूर्वक बैठे तथा वेदोंसे सम्बद्ध और वेदान्तसे उपलक्षित शुभ चर्चाएँ करने लगे ॥ २३ ॥
शिलवृत्तिः कथान्ते तु सिद्धमामन्त्र्य यत्नतः ।
प्रश्नं पप्रच्छ मेधावी यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ २४ ॥
बातचीत पूरी होनेपर शिलोञ्छवृत्तिवाले बुद्धिमान् गृहस्थ ब्राह्मणने सिद्धको सम्बोधित करके यत्नपूर्वक वही प्रश्न पूछा, जो तुम मुझसे पूछ रहे हो ॥ २४ ॥
शिलवृत्तिरुवाच
के देश के जनपदाः केऽऽश्रमाः के च पर्वताः ।
प्रकृष्टाः पुण्यतः काश्च ज्ञेया नद्यस्तदुच्यताम् ॥ २५ ॥
शिलवृत्तिवाले ब्राह्मणने पूछा- ब्रह्मन्! कौन- से देश, कौन - से जनपद, कौन -कौन आश्रम, कौन - से पर्वत और कौन - कौन - सी नदियाँ पुण्यकी दृष्टिसे सर्वश्रेष्ठ समझनेयोग्य हैं? यह बतानेकी कृपा करें ॥ २५ ॥
सिद्धउवाच
ते देशास्ते जनपदास्तेऽऽश्रमास्ते च पर्वताः ।
येषां भागीरथी गङ्गा मध्येनैति सरिद्वरा ॥ २६ ॥
सिद्धने कहा — ब्रह्मन्! वे ही देश, जनपद, आश्रम और पर्वत पुण्यकी दृष्टिसे सर्वश्रेष्ठ हैं, जिनके बीचसे होकर सरिताओंमें उत्तम भागीरथी गङ्गा बहती हैं ॥ २६ ॥
पृष्ठ 359
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तपसा ब्रह्मचर्येण यज्ञैस्त्यागेन वा पुनः ।
गतिं तां न लभेज्जन्तुर्गङ्गां संसेव्य यां लभेत् ॥ २७ ॥
गङ्गाजीका सेवन करनेसे जीव जिस उत्तम गतिको प्राप्त करता है उसे वह तपस्या, ब्रह्मचर्य, यज्ञ अथवा त्यागसे भी नहीं पा सकता ॥ २७ ॥
स्पृष्टानि येषां गाङ्गेयैस्तोयैर्गात्राणि देहिनाम् ।
न्यस्तानि न पुनस्तेषां त्यागः स्वर्गाद् विधीयते ॥ २८ ॥
जिन देहधारियोंके शरीर गङ्गाजीके जलसे भीगते हैं अथवा मरनेपर जिनकी हड्डियाँ गंगाजीमें डाली जाती हैं वे कभी स्वर्गसे नीचे नहीं गिरते ॥ २८ ॥
सर्वाणि येषां गाङ्गेयैस्तोयैः कार्याणि देहिनाम् ।
गां त्यक्त्वा मानवा विप्र दिवि तिष्ठन्ति ते जनाः ॥ २ ९ ॥
विप्रवर! जिन देहधारियोंके सम्पूर्ण कार्य गङ्गाजलसे ही सम्पन्न होते हैं वे मानव मरनेके बाद पृथ्वीका निवास छोड़कर स्वर्गमें विराजमान होते हैं ॥ २ ९ ॥
पूर्वे वयसि कर्माणि कृत्वा पापानि ये नराः ।
पश्चात् गङ्गां निषेवन्ते तेऽपि यान्त्युत्तमां गतिम् ॥ ३० ॥
पृष्ठ 360
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
जो मनुष्य जीवनकी पहली अवस्थामें पापकर्म करके भी पीछे गङ्गाजीका सेवन करने लगते हैं वे भी उत्तम गतिको ही प्राप्त होते हैं ॥ ३० ॥
स्नातानां शुचिभिस्तोयैर्गाङ्गेयैः प्रयतात्मनाम् ।
व्युष्टिर्भवति या पुंसां न सा क्रतुशतैरपि ॥ ३१ ॥
गङ्गाजीके पवित्र जलसे स्नान करके जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है उन पुरुषोंके पुण्यकी जैसी वृद्धि होती है; वैसी सैकड़ों यज्ञ करनेसे भी नहीं हो सकती ॥ ३१ ॥
यावदस्थि मनुष्यस्य गङ्गातोयेषु तिष्ठति ।
तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥ ३२ ॥
मनुष्यकी हड्डी जितने समयतक गङ्गाजीके जलमें पड़ी रहती है, उतने हजार वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ३२ ॥
अपहत्य तमस्तीव्रं यथा भात्युदये रविः ।
तथापहत्य पाप्मानं भाति गङ्गाजलोक्षितः ॥ ३३ ॥
जैसे सूर्य उदयकालमें घने अन्धकारको विदीर्ण करके प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार गङ्गाजलमें स्नान करनेवाला पुरुष अपने पापोंको नष्ट करके सुशोभित होता है ॥ ३३ ॥
विसोमा इव शर्वर्यो विपुष्पास्तरवो यथा ।
तद्वद् देशा दिशश्चैव हीना गङ्गाजलैः शिवैः ॥ ३४ ॥
जैसे बिना चाँदनीकी रात और बिना फूलोंके वृक्ष शोभा नहीं पाते, उसी प्रकार गङ्गाजीके कल्याणमय जलसे वञ्चित हुए देश और दिशाएँ भी शोभा एवं सौभाग्य हीन हैं ॥ ३४ ॥
वर्णाश्रमा यथा सर्वे धर्मज्ञानविवर्जिताः ।
क्रतवश्च यथासोमास्तथा गङ्गां विना जगत् ॥ ३५ ॥
जैसे धर्म और ज्ञानसे रहित होनेपर सम्पूर्ण वर्णों और आश्रमोंकी शोभा नहीं होती है तथा जैसे सोमरसके बिना यज्ञ सुशोभित नहीं होते, उसी प्रकार गङ्गाके बिना जगत्की शोभा नहीं है ॥ ३५ ॥
यथा हीनं नभोऽर्केण भूःशैलैः खं च वायुना ।
तथा देशा दिशश्चैव गङ्गाहीना न संशयः ॥ ३६ ॥
जैसे सूर्यके बिना आकाश, पर्वतोंके बिना पृथ्वी और वायुके बिना अन्तरिक्षकी शोभा नहीं होती, उसी प्रकार जो देश और दिशाएँ गङ्गाजीसे रहित हैं उनकी भी शोभा नहीं होती - इसमें संशय नहीं है ॥ ३६ ॥
त्रिषु लोकेषु ये केचित् प्राणिनः सर्व एव ते ।
तर्प्यमाणाः परां तृप्तिं यान्ति गङ्गाजलैः शुभैः ॥ ३७ ॥
तीनों लोकोंमें जो कोई भी प्राणी हैं, उन सबका गङ्गाजीके शुभ जलसे तर्पण करनेपर वे सब परम तृप्ति लाभ करते हैं ॥ ३७ ॥