श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 361–370

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 361–370

पृष्ठ 361

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यस्तु सूर्येण निष्टप्तं गाङ्गेयं पिबते जलम् ।

गवां निर्हारनिर्मुक्ताद् यावकात् तद् विशिष्यते ॥ ३८ ॥

जो मनुष्य सूर्यकी किरणोंसे तपे हुए गङ्गाजलका पान करता है, उसका वह जलपान गायके गोबरसे निकले हुए जौकी लप्सी खानेसे अधिक पवित्रकारक है ॥ ३८ ॥

इन्दुव्रतसहस्रं तु यश्चरेत् कायशोधनम् ।

पिबेद् यश्चापि गङ्गाम्भः समौ स्यातां न वा समौ ॥ ३ ९ ॥

जो शरीरको शुद्ध करनेवाले एक सहस्र चान्द्रायण व्रतोंका अनुष्ठान करता है और जो केवल गङ्गाजल पीता है, वे दोनों समान ही हैं अथवा यह भी हो सकता है कि दोनों समान न हों ( गङ्गाजल पीनेवाला बढ़ जाय ) ॥ ३ ९ ॥

तिष्ठेद् युगसहस्रं तु पदेनैकेन यः पुमान् ।

मासमेकं तु गङ्गायां समौ स्यातां न वा समौ ॥ ४० ॥

जो पुरुष एक हजार युगोंतक एक पैरसे खड़ा होकर तपस्या करता है और जो एक मासतक गङ्गातटपर निवास करता है, वे दोनों समान हो सकते हैं अथवा यह भी सम्भव है कि समान न हों ॥ ४० ॥

लंबतेऽवाक्शिरा यस्तु युगानामयुतं पुमान् ।

तिष्ठेद् यथेष्टं यश्चापि गङ्गायां स विशिष्यते ॥ ४१ ॥

जो मनुष्य दस हजार युगोंतक नीचे सिर करके वृक्षमें लटका रहे और जो इच्छानुसार गङ्गाजीके तटपर निवास करे, उन दोनोंमें गङ्गाजीपर निवास करनेवाला ही श्रेष्ठ है ॥ ४१ ॥

अग्नौ प्रास्तं प्रधूयेत यथा तूलं द्विजोत्तम ।

तथा गङ्गावगाढस्य सर्वपापं प्रधूयते ॥ ४२ ॥

द्विजश्रेष्ठ! जैसे अतामें डाली हुई रूई तुरंत जलकर भस्म हो जाती है, उसी प्रकार गङ्गामें गोता लगानेवाले मनुष्यके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ ४२ ॥

भूतानामिह सर्वेषां दुःखोपहतचेतसाम् ।

गतिमन्वेषमाणानां न गङ्गासदृशी गतिः ॥ ४३ ॥

इस संसारमें दुःखसे व्याकुलचित होकर अपने लिये कोई आश्रय ढूँढ़नेवाले समस्त प्राणियोंके लिये गंगाजीके समान कोई दूसरा सहारा नहीं है ॥ ४३ ॥

भवन्ति निर्विषाः सर्पा यथा तार्क्ष्यस्य दर्शनात् ।

गङ्गाया दर्शनात् तद्वत् सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ४४ ॥

जैसे गरुड़को देखते ही सारे सर्पोंके विष झड़ जाते हैं, उसी प्रकार गङ्गाजीके दर्शनमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ ४४ ॥

अप्रतिष्ठाश्च ये केचिदधर्मशरणाश्च ये ।

तेषां प्रतिष्ठा गङ्गेह शरणं शर्म वर्म च ॥ ४५ ॥

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जगत्में जिनका कहीं आधार नहीं है; तथा जिन्होंने धर्मकी शरण नहीं ली है, उनका आधार और उन्हें शरण देनेवाली श्रीगङ्गाजी ही हैं । वे ही उसका कल्याण करनेवाली तथा कवचकी भाँति उसे सुरक्षित रखनेवाली हैं ॥ ४५ ॥

प्रकृष्टैरशुभैर्ग्रस्ताननेकैः पुरुषाधमान् ।

पततो नरके गङ्गा संश्रितान् प्रेत्य तारयेत् ॥ ४६ ॥

जो नीच मानव अनेक बड़े -बड़े अमङ्गलकारी पापकर्मोंसे ग्रस्त होकर नरकमें गिरनेवाले हैं, वे भी यदि गङ्गाजीकी शरणमें आ जाते हैं तो ये मरनेके बाद उनका उद्धार कर देती हैं ॥ ४६ ॥

संविभक्ता मुनिभिर्नुनं देवैः सवासवैः ।

येऽभिगच्छन्ति सततं गङ्गां मतिमतां वर ॥ ४७ ॥

बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण! जो लोग सदा गङ्गाजीकी यात्रा करते हैं, उनपर निश्चय ही इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता तथा मुनिलोग पृथक् - पृथक् कृपा करते आये हैं ॥ ४७ ॥

विनयाचारहीनाश्च अशिवाश्च नराधमाः ।

ते भवन्ति शिवा विप्र ये वै गङ्गामुपाश्रिताः ॥ ४८ ॥

विप्रवर! विनय और सदाचारसे हीन अमङ्गलकारी नीच मनुष्य भी गङ्गाजीकी शरणमें जानेपर कल्याणस्वरूप हो जाते हैं ॥ ४८ ॥

यथा सुराणाममृतं पितॄणां च यथा स्वधा ।

सुधा यथा च नागानां तथा गङ्गाजलं नृणाम् ॥ ४ ९ ॥

जैसे देवताओंको अमृत, पितरोंको स्वधा और नागोंको सुधा तृप्त करती है, उसी प्रकार मनुष्योंके लिये गंगाजल ही पूर्ण तृप्तिका साधन है ॥ ४ ९ ॥

उपासते यथा बाला मातरं क्षुधयार्दिताः ।

श्रेयस्कामास्तथा गङ्गामुपासन्तीह देहिनः ॥ ५० ॥

जैसे भूखसे पीड़ित हुए बच्चे माताके पास जाते हैं, उसी प्रकार कल्याणकी इच्छा रखनेवाले प्राणी इस जगत् में गङ्गाजीकी उपासना करते हैं ॥ ५० ॥

स्वायम्भुवं यथा स्थानं सर्वेषां श्रेष्ठमुच्यते ।

स्नातानां सरितां श्रेष्ठा गङ्गा तद्वदिहोच्यते ॥ ५१ ॥

जैसे ब्रह्मलोक सब लोकोंसे श्रेष्ठ बताया जाता है, वैसे ही स्नान करनेवाले पुरुषोंके लिये गङ्गाजी ही सब नदियोंमें श्रेष्ठ कही गयी हैं ॥ ५१ ॥

यथोपजीविनां धेनुर्देवादीनां धरा स्मृता ।

तथोपजीविनां गङ्गा सर्वप्राणभृतामिह ॥ ५२ ॥

जैसे धेनुस्वरूपा पृथ्वी उपजीवी देवता आदिके लिये आदरणीय है, उसी प्रकार इस जगत्में गंगा समस्त उपजीवी प्राणियोंके लिये आदरणीय हैं ॥ ५२ ॥

देवाः सोमार्कसंस्थानि यथा सत्रादिभिर्मखैः ।

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अमृतान्युपजीवन्ति तथा गङ्गाजलं नसः ॥ ५३ ॥

जैसे देवता सत्र आदि यज्ञोंद्वारा चन्द्रमा और सूर्यमें स्थित अमृतसे आजीविका चलाते हैं, उसी प्रकार संसारके मनुष्य गंगाजलका सहारा लेते हैं ॥ ५३ ॥

जाह्नवीपुलिनोत्थाभिः सिकताभिः समुक्षितम् ।

आत्मानं मन्यते लोको दिविष्ठमिव शोभितम् ॥ ५४ ॥

गंगाजीके तटसे उड़े हुए बालुका- कणोंसे अभिषिक्त हुए अपने शरीरको ज्ञानी पुरुष स्वर्गलोकमें स्थित हुआ- सा शोभासम्पन्न मानता है ॥ ५४ ॥

जाह्नवीतीरसम्भूतां मृदं मूर्ध्ना बिभर्ति यः ।

बिभर्ति रूपं सोऽर्कस्य तमोनाशाय निर्मलम् ॥ ५५ ॥

जो मनुष्य गंगाके तीरकी मिट्टी अपने मस्तकमें लगाता है वह अज्ञानान्धकारका नाश करनेके लिये सूर्यके समान निर्मल स्वरूप धारण करता है ॥ ५५ ॥

गङ्गोर्मिभिरथो दिग्धः पुरुषं पवनो यदा ।

स्पृशते सोऽस्य पाप्मानं सद्य एवापकर्षति ॥ ५६ ॥

गंगाकी तरंगमालाओंसे भीगकर बहनेवाली वायु जब मनुष्यके शरीरका स्पर्श करती है, उसी समय वह उसके सारे पापोंको नष्ट कर देती है ॥ ५६ ॥

व्यसनैरभितप्तस्य नरस्य विनशिष्यतः ।

गङ्गादर्शनजा प्रीतिर्व्यसनान्यपकर्षति ॥ ५७ ॥

दुर्व्यसनजनित दुःखोंसे संतप्त होकर मरणासन्न हुआ मनुष्य भी यदि गंगाजीका दर्शन करे तो उसे इतनी प्रसन्नता होती है कि उसकी सारी पीड़ा तत्काल नष्ट हो जाती है ॥ ५७ ॥

हंसारावैः कोकरवै रवैरन्यैश्च पक्षिणाम् ।

पस्पर्ध गङ्गा गन्धर्वान् पुलिनैश्च शिलोच्चयान् ॥ ५८ ॥

हंसोंकी मीठी वाणी, चक्रवाकोंके सुमधुर शब्द तथा अन्यान्य पक्षियोंके कलरवोंद्वारा गंगाजी गन्धर्वोंसे होड़ लगाती हैं तथा अपने ऊँचे - ऊँचे तटोंद्वारा पर्वतोंके साथ स्पर्धा करती हैं ॥ ५८ ॥

हंसादिभिः सुबहुभिर्विविधैः पक्षिभिर्वृताम् ।

गङ्गां गोकुलसम्बाधां दृष्ट्वा स्वर्गोऽपि विस्मृतः ॥ ५ ९ ॥

हंस आदि बहुसंख्यक एवं विविध पक्षियोंसे घिरी हुई तथा गौओंके समुदायसे व्याप्त हुई गंगाजीको देखकर मनुष्य स्वर्गलोकको भी भूल जाता है ॥ ५ ९ ॥

न सा प्रीतिर्दिविष्ठस्य सर्वकामानुपाश्नतः ।

सम्भवेद् या परा प्रीतिर्गङ्गायाः पुलिने नृणाम् ॥ ६० ॥

गंगाजीके तटपर निवास करनेसे मनुष्योंको जो परम प्रीति- अनुपम आनन्द मिलता है वह स्वर्गमें रहकर सम्पूर्ण भोगोंका अनुभव करनेवाले पुरुषको भी नहीं प्राप्त हो

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सकता ॥ ६० ॥

वाङ्मनःकर्मजैर्ग्रस्तः पापैरपि पुमानिह ।

वीक्ष्य गङ्गां भवेत् पूतो अत्र मे नास्ति संशयः ॥ ६१ ॥

मन, वाणी और क्रियाद्वारा होनेवाले पापोंसे ग्रस्त मनुष्य भी गंगाजीका दर्शन करने मात्रसे पवित्र हो जाता है - इसमें मुझे संशय नहीं है ॥ ६१ ॥

सप्तावरान् सप्त परान् पितॄंस्तेभ्यश्च ये परे ।

पुमांस्तारयते गङ्गां वीक्ष्य स्पृष्ट्वावगाह्य च ॥ ६२ ॥

गंगाजीका दर्शन, उनके जलका स्पर्श तथा उस जलके भीतर स्नान करके मनुष्य सात पीढ़ी पहलेके पूर्वजोंका और सात पीढ़ी आगे होनेवाली संतानोंका तथा इनसे भी ऊपरके पितरों और संतानोंका उद्धार कर देता है ॥ ६२ ॥

श्रुताभिलषिता पीता स्पृष्टा दृष्टावगाहिता ।

गङ्गा तारयते नृणामुभौ वंशौ विशेषतः ॥ ६३ ॥

जो पुरुष गंगाजीका माहात्म्य सुनता, उनके तटपर जानेकी अभिलाषा रखता, उनका दर्शन करता, जल पीता, स्पर्श करता तथा उनके भीतर गोते लगाता है, उसके दोनों कुलोंका भगवती गंगा विशेषरूपसे उद्धार कर देती हैं ॥ ६३ ॥

दर्शनात् स्पर्शनात् पानात् तथा गङ्गेति कीर्तनात् ।

पुनात्यपुण्यान् पुरुषान् शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ६४ ॥

गंगाजी अपने दर्शन, स्पर्श, जलपान तथा अपने गंगानामके कीर्तनसे सैकड़ों और हजारों पापियोंको तार देती हैं ॥ ६४ ॥

य इच्छेत् सफलं जन्म जीवितं श्रुतमेव च ।

स पितॄंस्तर्पयेद् गाङ्गमभिगम्य सुरांस्तथा ॥ ६५ ॥

जो अपने जन्म, जीवन और वेदाध्ययनको सफल बनाना चाहता हो वह गंगाजीके पास जाकर उनके जलसे देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करे ॥ ६५ ॥

न सुतैर्न च वित्तेन कर्मणा न च तत्फलम् ।

प्राप्नुयात् पुरुषोऽत्यन्तं गङ्गां प्राप्य यदाप्नुयात् ॥ ६६ ॥

मनुष्य गंगास्नान करके जिस अक्षय फलको प्राप्त करता है उसे पुत्रोंसे, धनसे तथा किसी कर्मसे भी नहीं पा सकता ॥ ६६ ॥

जात्यन्धैरिह तुल्यास्ते मृतैः पङ्गुभिरेव च ।

समर्था ये न पश्यन्ति गङ्गां पुण्यजलां शिवाम् ॥ ६७ ॥

जो सामर्थ्य होते हुए भी पवित्र जलवाली कल्याणमयी गंगाका दर्शन नहीं करते वे जन्मके अन्धों, पंगुओं और मुर्दोंके समान हैं ॥ ६७ ॥

भूतभव्यभविष्यज्ञैर्महर्षिभिरुपस्थिताम् ।

देवैः सेन्द्रैश्च को गङ्गां नोपसेवेत मानवः ॥ ६८ ॥

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भूत, वर्तमान और भविष्यके ज्ञाता महर्षि तथा इन्द्र आदि देवता भी जिनकी उपासना करते हैं, उन गंगाजीका सेवन कौन मनुष्य नहीं करेगा? ॥ ६८ ॥

वानप्रस्थैर्गृहस्थैश्च यतिभिर्ब्रह्मचारिभिः ।

विद्यावद्भिः श्रितां गङ्गां पुमान् को नाम नाश्रयेत् ॥ ६ ९ ॥

ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी और विद्वान् पुरुष भी जिनकी शरण लेते हैं, ऐसी गंगाजीका कौन मनुष्य आश्रय नहीं लेगा? ॥ ६ ९ ॥

उत्क्रामद्भिश्च यः प्राणः प्रयतः शिष्टसम्मतः ।

चिन्तयेन्मनसा गङ्गां स गतिं परमां लभेत् ॥ ७० ॥

जो साधु पुरुषोंद्वारा सम्मानित तथा संयतचित्त मनुष्य प्राण निकलते समय मन- ही- मन गंगाजीका स्मरण करता है, वह परम उत्तम गतिको प्राप्त कर लेता है ॥ ७० ॥

न भयेभ्यो भयं तस्य न पापेभ्यो न राजतः ।

आ देहपतनाद् गङ्गामुपास्ते यः पुमानिह ॥ ७१ ॥

जो पुरुष यहाँ जीवनपर्यन्त गंगाजीकी उपासना करता है उसे भयदायक वस्तुओंसे, पापोंसे तथा राजासे भी भय नहीं होता ॥ ७१ ॥

महापुण्यां च गगनात् पतन्तीं वै महेश्वरः ।

दधार शिरसा गङ्गां तामेव दिवि सेवते ॥ ७२ ॥

भगवान् महेश्वरने आकाशसे गिरती हुई परम पवित्र गंगाजीको सिरपर धारण किया, उन्हींका वे स्वर्गमें सेवन करते हैं ॥ ७२ ॥

अलंकृतास्त्रयो लोकाः पथिभिर्विमलैस्त्रिभिः ।

यस्तु तस्या जलं सेवेत् कृतकृत्यः पुमान् भवेत् ॥ ७३ ॥

जिन्होंने तीन निर्मल मार्गोंद्वारा आकाश, पाताल तथा भूतल- इन तीन लोकोंको अलंकृत किया है उन गंगाजीके जलका जो मनुष्य सेवन करेगा वह कृतकृत्य हो जायगा ॥ ७३ ॥

दिवि ज्योतिर्यथाऽऽदित्यः पितॄणां चैव चन्द्रमाः ।

देवेशश्च तथा नृणां गङ्गा च सरितां तथा ॥ ७४ ॥

स्वर्गवासी देवताओंमें जैसे सूर्यका तेज श्रेष्ठ है, जैसे पितरोंमें चन्द्रमा तथा मनुष्योंमें राजाधिराज श्रेष्ठ है, उसी प्रकार समस्त सरिताओंमें गंगाजी उत्तम हैं ॥ ७४ ॥

मात्रा पित्रा सुतैर्दारैर्विमुक्तस्य धनेन वा ।

न भवेद्धि तथा दुःख यथा गङ्गावियोगजम् ॥ ७५ ॥

( गंगाजीमें भक्ति रखनेवाले पुरुषको ) माता, पिता, पुत्र, स्त्री और धनका वियोग होनेपर भी उतना दुःख नहीं होता, जितना गंगाके बिछोहसे होता है ॥ ७५ ॥

नारण्यैर्नेष्टविषयैर्न सुतैर्न धनागमैः ।

तथा प्रसादो भवति गङ्गां वीक्ष्य यथा भवेत् ॥ ७६ ॥

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इसी प्रकार उसे गंगाजीके दर्शनसे जितनी प्रसन्नता होती है, उतनी वनके दर्शनोंसे, अभीष्ट विषयसे, पुत्रोंसे तथा धनकी प्राप्तिसे भी नहीं होती ॥ ७६ ॥

पूर्णमिन्दुं यथा दृष्ट्वा नृणां दृष्टिः प्रसीदति ।

तथा त्रिपथगां दृष्ट्वा नृणां दृष्टिः प्रसीदति ॥ ७७ ॥

जैसे पूर्ण चन्द्रमाका दर्शन करके मनुष्योंकी दृष्टि प्रसन्न हो जाती है, उसी तरह त्रिपथगा गंगाका दर्शन करके मनुष्योंके नेत्र आनन्दसे खिल उठते हैं ॥ ७७ ॥

तद्भावस्तद्गतमनास्तन्निष्ठस्तत्परायणः ।

गङ्गां योऽनुगतो भक्त्या स तस्याः प्रियतां व्रजेत् ॥ ७८ ॥

जो गंगाजीमें श्रद्धा रखता, उन्हींमें मन लगाता, उन्हींके पास रहता, उन्हींका आश्रय लेता तथा भक्तिभावसे उन्हींका अनुसरण करता है वह भगवती भागीरथीका स्नेह - भाजन होता है ॥ ७८ ॥

भूस्थैः स्वःस्थैर्दिविष्ठैश्च भूतैरुच्चावचैरपि ।

गङ्गा विगाह्या सततमेतत् कार्यतमं सताम् ॥ ७ ९ ॥

पृथ्वी, आकाश तथा स्वर्गमें रहनेवाले छोटे - बड़े सभी प्राणियोंको चाहिये कि वे निरन्तर

गंगाजीमें स्नान करें । यही सत्पुरुषोंका सबसे उत्तम कार्य है ॥ ७९ ॥

विश्वलोकेषु पुण्यत्वाद् गङ्गायाः प्रथितं यशः ।

यत्पुत्रान्सगरस्येतो भस्माख्याननयद् दिवम् ॥ ८० ॥

सम्पूर्ण लोकोंमें परम पवित्र होनेके कारण गंगाजीका यश विख्यात है; क्योंकि उन्होंने भस्मीभूत होकर पड़े हुए सगरपुत्रोंको यहाँसे स्वर्गमें पहुँचा दिया ॥ ८० ॥

वाय्वीरिताभिः सुमनोहराभि- द्रुताभिरत्यर्थसमुत्थिताभिः । गङ्गोर्मिभिर्भानुमतीभिरिद्धाः सहस्ररश्मिप्रतिमा भवन्ति ॥ ८१ ॥

वायुसे प्रेरित हो बड़े वेगसे अत्यन्त ऊँचे उठनेवाली गंगाजीकी परम मनोहर एवं कान्तिमयी तरंगमालाओंसे नहाकर प्रकाशित होनेवाले पुरुष परलोकमें सूर्यके समान तेजस्वी होते हैं ॥ ८१ ॥

पयस्विनीं घृतिनीमत्युदारां समृद्धिनीं वेगिनीं दुर्विगाह्याम् । गङ्गां गत्वा यैः शरीरं विसृष्टं गता धीरास्ते विबुधैः समत्वम् ॥ ८२ ॥

दुग्धके समान उज्ज्वल और घृतके समान स्निग्ध जलसे भरी हुई, परम उदार, समृद्धिशालिनी, वेगवती तथा अगाध जलराशिवाली गंगाजीके समीप जाकर जिन्होंने अपना शरीर त्याग दिया है वे धीर पुरुष देवताओंके समान हो गये ॥ ८२ ॥

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अन्धान् जडान् द्रव्यहीनांश्च गङ्गा यशस्विनी बृहती विश्वरूपा । देवैः सेन्द्रैर्मुनिभिर्मानवैश्च निषेविता सर्वकामैर्युनक्ति ॥ ८३ ॥

इन्द्र आदि देवता, मुनि और मनुष्य जिनका सदा सेवन करते हैं वे यशस्विनी, विशालकलेवरा, विश्वरूपा गंगादेवी अपनी शरणमें आये हुए अन्धों, जडों और धनहीनोंको भी सम्पूर्ण मनोवाञ्छित कामनाओंसे सम्पन्न कर देती हैं ॥ ८३ ॥

ऊर्जावतीं महापुण्यां मधुमतीं त्रिवर्त्मगाम् ।

त्रिलोकगोप्त्रीं ये गङ्गां संश्रितास्ते दिवं गताः ॥ ८४ ॥

गंगाजी ओजस्विनी, परम पुण्यमयी, मधुर जलराशिसे परिपूर्ण तथा भूतल, आकाश और पाताल— इन तीन मार्गोंपर विचरनेवाली हैं। जो लोग तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाली गंगाजीकी शरण में आये हैं, वे स्वर्गलोकको चले गये ॥ ८४ ॥

यो वत्स्यति द्रक्ष्यति वापि मर्त्य- स्तस्मै प्रयच्छन्ति सुखानि देवाः । तद्भाविताः स्पर्शनदर्शनेन इष्टां गतिं तस्य सुरादिशन्ति ॥ ८५ ॥

जो मनुष्य गंगाजीके तटपर निवास और उनका दर्शन करता है उसे सब देवता सुख देते हैं । जो गंगाजीके स्पर्श और दर्शनसे पवित्र हो गये हैं उन्हें गंगाजीसे ही महत्त्वको प्राप्त हुए देवता मनोवाञ्छित गति प्रदान करते हैं ॥ ८५ ॥

दक्षां पृश्निं बृहतीं विप्रकृष्टां शिवामृद्धां भागिनीं सुप्रसन्नाम् । विभावरीं सर्वभूतप्रतिष्ठां गङ्गां गता ये त्रिदिवं गतास्ते ॥ ८६ ॥

गंगा जगत्का उद्धार करनेमें समर्थ हैं । भगवान् पृश्निगर्भकी जननी ' पृश्नि ' के तुल्य हैं, विशाल हैं, सबसे उत्कृष्ट हैं, मंगलकारिणी हैं, पुण्यराशिसे समृद्ध हैं, शिवजीके द्वारा मस्तकपर धारित होनेके कारण सौभाग्यशालिनी तथा भक्तोंपर अत्यन्त प्रसन्न रहनेवाली हैं । इतना ही नहीं, पापोंका विनाश करनेके लिये वे कालरात्रिके समान हैं तथा सम्पूर्ण प्राणियोंकी आश्रयभूत हैं । जो लोग गंगाजीकी शरणमें गये हैं वे स्वर्गलोकमें जा पहुँचे हैं ॥ ८६ ॥

ख्यातिर्यस्याः खं दिवं गां च नित्यं पुरा दिशो विदिशश्चावतस्थे । तस्या जलं सेव्य सरिद्वराया मर्त्याः सर्वे कृतकृत्या भवन्ति ॥ ८७ ॥

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आकाश, स्वर्ग, पृथ्वी, दिशा और विदिशाओंमें भी जिनकी ख्याति फैली हुई है, सरिताओंमें श्रेष्ठ उन भगवती भागीरथीके जलका सेवन करके सभी मनुष्य कृतार्थ हो जाते हैं ॥ ८७ ॥

इयं गङ्गेति नियतं प्रतिष्ठा गुहस्य रुक्मस्य च गर्भयोषा । प्रातस्त्रिवर्गा घृतवहा विपाष्मा गङ्गावतीर्णा वियतो विश्वतोया ॥ ८८ ॥

- ' ये गंगाजी हैं ' – ऐसा कहकर जो दूसरे मनुष्योंको उनका दर्शन कराता है, उसके लिये भगवती भागीरथी सुनिश्चित प्रतिष्ठा ( अक्षय पद प्रदान करनेवाली ) हैं । वे कार्तिकेय और सुवर्णको अपने गर्भमें धारण करनेवाली, पवित्र जलकी धारा बहानेवाली और पाप दूर करनेवाली हैं । वे आकाशसे पृथ्वीपर उतरी हुई हैं । उनका जल सम्पूर्ण विश्वके लिये पीने योग्य है । उनमें प्रातःकाल स्नान करनेसे धर्म, अर्थ और काम तीनों वर्गोंकी सिद्धि होती है ॥ ८८ ॥

( नारायणादक्षयात् पूर्वजाता विष्णोः पादात् शिशुमाराद् ध्रुवाच्च । सोमात् सूर्यान्मेरुरूपाच्च विष्णोः समागता शिवमूर्ध्ना हिमाद्रिम् II ) भगवती गंगा पूर्वकालमें अविनाशी भगवान् नारायणसे प्रकट हुई हैं । वे भगवान् विष्णुके चरण, शिशुमार चक्र, ध्रुव, सोम, सूर्य तथा मेरुरूप विष्णुसे अवतरित हो भगवान् शिवके मस्तकपर आयी हैं और वहाँसे हिमालय पर्वतपर गिरी हैं ॥ सुतावनीध्रस्य हरस्य भार्या दिवो भुवश्चापि कृतानुरूपा । भव्या पृथिव्यां भागिनी चापि राजन् गङ्गा लोकानां पुण्यदा वै त्रयाणाम् ॥ ८ ९ ॥ गंगाजी गिरिराज हिमालयकी पुत्री, भगवान् शंकरकी पत्नी तथा स्वर्ग और पृथ्वीकी शोभा हैं । राजन्! वे भूमण्डलपर निवास करनेवाले प्राणियोंका कल्याण करनेवाली, परम सौभाग्यवती तथा तीनों लोकोंको पुण्य प्रदान करनेवाली हैं ॥ ८ ९ ॥ मधुस्रवा घृतधारा घृतार्चि- र्महोर्मिभिः शोभिता ब्राह्मणैश्च । दिवश्च्युता शिरसाऽऽप्ता शिवेन गङ्गावनीधात् त्रिदिवस्य माता ॥ ९ ० ॥ श्रीभागीरथी मधुका स्रोत एवं पवित्र जलकी धारा बहाती हैं । जलती हुई घीकी ज्वालाके समान उनका उज्ज्वल प्रकाश है । वे अपनी उत्ताल तरङ्गों तथा जलमें स्नान-

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संध्या करनेवाले ब्राह्मणोंसे सुशोभित होती हैं । वे जब स्वर्गसे नीचेकी ओर चलीं तब भगवान् शिवने उन्हें अपने सिरपर धारण किया । फिर हिमालय पर्वतपर आकर वहाँसे वे

इस पृथ्वीपर उतरी हैं । श्रीगंगाजी स्वर्गलोककी जननी हैं ॥ ९ ० ॥

योनिर्वरिष्ठा विरजा वितन्वी शय्याचिरा वारिवहा यशोदा । विश्वावती चाकृतिरिष्टसिद्धा गङ्गोक्षितानां भुवनस्य पन्थाः ॥ ९ १ ॥ सबका कारण, सबसे श्रेष्ठ, रजोगुणरहित, अत्यन्त सूक्ष्म, मरे हुए प्राणियोंके लिये सुखद शय्या, तीव्र वेगसे बहनेवाली, पवित्र जलका स्रोत बहानेवाली, यश देनेवाली, जगत्की रक्षा करनेवाली, सत्स्वरूपा तथा अभीष्टको सिद्ध करनेवाली भगवती गंगा अपने भीतर स्नान करनेवालोंके लिये स्वर्गका मार्ग बन जाती हैं ॥ क्षान्त्या मह्या गोपने धारणे च दीप्त्या कृशानोस्तपनस्य चैव । तुल्या गङ्गा सम्मता ब्राह्मणानां गुहस्य ब्रह्मण्यतया च नित्यम् ॥ ९ २ ॥ क्षमा, रक्षा तथा धारण करनेमें पृथ्वीके समान और तेजमें अग्नि एवं सूर्यके समान शोभा पानेवाली गंगाजी ब्राह्मणजातिपर सदा अनुग्रह करनेके कारण सुब्रह्मण्य कार्तिकेय तथा ब्राह्मणोंके लिये भी प्रिय एवं सम्मानित हैं ॥ ९ २ ॥ ऋषिष्टुतां विष्णुपदीं पुराणां

सुपुण्यतोयां मनसापि लोके ।

सर्वात्मना जाह्नवीं ये प्रपन्ना- स्ते ब्रह्मणः सदनं सम्प्रयाताः ॥ ९ ३ ॥

ऋषियोंद्वारा जिनकी स्तुति होती है, जो भगवान् विष्णुके चरणोंसे उत्पन्न, अत्यन्त प्राचीन तथा परम पावन जलसे भरी हुई हैं, उन गंगाजीकी जगत्में जो लोग मनके द्वारा भी सब प्रकारसे शरण लेते हैं वे देहत्यागके पश्चात् ब्रह्मलोकमें जाते हैं ॥ ९ ३ ॥ लोकानवेक्ष्य जननीव पुत्रान्

सर्वात्मना सर्वगुणोपपन्नान् ।

तत्स्थनकं ब्राह्ममभीप्समाने- र्गङ्गा सदैवात्मवशैरुपास्या ॥ ९ ४ ॥

जैसे माता अपने पुत्रोंको स्नेहभरी दृष्टिसे देखती है और उनकी रक्षा करती है, उसी प्रकार गंगाजी सर्वात्मभावसे अपने आश्रयमें आये हुए सर्वगुणसम्पन्न लोकोंको कृपादृष्टिसे देखकर उनकी रक्षा करती हैं; अतः जो ब्रह्मलोकको प्राप्त करनेकी इच्छा रखते हैं उन्हें अपने मनको वशमें करके सदा मातृभावसे गंगाजीकी उपासना करनी चाहिये ॥ ९ ४ ॥

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उस्रां पुष्टां मिषतीं विश्वभोज्या- मिरावतीं धारिणीं भूधराणाम् । शिष्टाश्रयाममृतां ब्रह्मकान्तां गङ्गां श्रयेदात्मवान् सिद्धिकामः ॥ ९ ५ ॥ जो अमृतमय दूध देनेवाली, गौके समान सबको पुष्ट करनेवाली, सब कुछ देखनेवाली, सम्पूर्ण जगत्के उपयोगमें आनेवाली, अन्न देनेवाली तथा पर्वतोंको धारण करनेवाली हैं, श्रेष्ठ पुरुष जिनका आश्रय लेते हैं और जिन्हें ब्रह्माजी भी प्राप्त करना चाहते हैं; तथा जो अमृतस्वरूप हैं, उन भगवती गंगाजीका सिद्धिकामी जितात्मा पुरुषोंको अवश्य आश्रय लेना चाहिये ॥ ९ ५ ॥ प्रसाद्य देवान् सविभून् समस्तान् भगीरथस्तपसोग्रेण गङ्गाम् । गामानयत् तामभिगम्य शश्वत् पुंसां भयं नेह चामुत्र विद्यात् ॥ ९ ६ ॥ राजा भगीरथ अपनी उग्र तपस्यासे भगवान् शंकरसहित सम्पूर्ण देवताओंको प्रसन्न करके गंगाजीको इस पृथ्वीपर ले आये । उनकी शरणमें जानेसे मनुष्यको इहलोक और परलोकमें भय नहीं रहता ॥ ९ ६ ॥ उदाहृतः सर्वथा ते गुणानां मयैकदेशः प्रसमीक्ष्य बुद्ध्या । शक्तिर्न मे काचिदिहास्ति वक्तुं गुणान् सर्वान् परिमातुं तथैव ॥ ९ ७ ॥ ब्रह्मन्! मैंने अपनी बुद्धिसे सर्वथा विचारकर यहाँ गंगाजीके गुणोंका एक अंशमात्र बताया है । मुझमें कोई इतनी शक्ति नहीं है कि मैं यहाँ उनके सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन कर सकूँ ॥ ९ ७ ॥ मेरोः समुद्रस्य च सर्वयत्नैः संख्योपलानामुदकस्य वापि । शक्यं वक्तुं नेह गङ्गाजलानां गुणाख्यानं परिमातुं तथैव ॥ ९ ८ ॥ कदाचित् सब प्रकारके यत्न करनेसे मेरु गिरिके प्रस्तरकणों और समुद्रके जलविन्दुओंकी गणना की जा सके; परंतु यहाँ गंगाजलके गुणोंका वर्णन तथा गणना करना कदापि सम्भव नहीं है ॥ ९ ८ ॥ तस्मादेतान् परया श्रद्धयोक्तान् गुणान् सर्वान् जाह्नवीयात् सदैव । भवेद् वाचा मनसा कर्मणा च