06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 571–580

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 571–580

पृष्ठ 571

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छोटे - बड़े और बड़ोंसे भी बड़े जो क्षत्रिय तेज और बलसे तप रहे हैं, उन सबके तेज और तप ब्राह्मणोंके पास जाते ही शान्त हो जाते हैं ॥ ३५-३६ ॥

न मे पिता प्रियतरो न त्वं तात तथा प्रियः ।

न मे पितुः पिता राजन् न चात्मा न च जीवितम् ॥ ३७ ॥

तात! मुझे ब्राह्मण जितने प्रिय हैं, उतने मेरे पिता, तुम, पितामह, यह शरीर और जीवन भी प्रिय नहीं हैं ॥

त्वत्तश्च मे प्रियतरः पृथिव्यां नास्ति कश्चन ।

त्वत्तोऽपि मे प्रियतरा ब्राह्मणा भरतर्षभ ॥ ३८ ॥

भरतश्रेष्ठ! इस पृथ्वीपर तुमसे अधिक प्रिय मेरे लिये दूसरा कोई नहीं है; परंतु ब्राह्मण तुमसे भी बढ़कर प्रिय हैं ॥ ३८ ॥

ब्रवीमि सत्यमेतच्च यथाहं पाण्डुनन्दन ।

तेन सत्येन गच्छेयं लोकान् यत्र च शान्तनुः ॥ ३ ९ ॥

पाण्डुनन्दन! मैं यह सच्ची बात कह रहा हूँ और चाहता हूँ कि इस सत्यके प्रभावसे मैं उन्हीं लोकोंमें जाऊँ जहाँ मेरे पिता शान्तनु गये हैं ॥ ३ ९ ॥

पश्येयं च सतां लोकान् शुचीन् ब्रह्मपुरस्कृतान् ।

तत्र मे तात गन्तव्यमह्नाय च चिराय च ॥ ४० ॥

इस सत्यके प्रभावसे ही मैं सत्पुरुषोंके उन पवित्र लोकोंका दर्शन कर रहा हूँ जहाँ ब्राह्मणों और ब्रह्माजीकी प्रधानता है । तात! मुझे शीघ्र ही चिरकालके लिये उन लोकोंमें जाना है ॥ ४० ॥

सोऽहमेतादृशाल्लोँकान् दृष्ट्वा भरतसत्तम ।

यन्मे कृतं ब्राह्मणेषु न तप्ये तेन पार्थिव ॥ ४१ ॥

भरतश्रेष्ठ! पृथ्वीनाथ! ब्राह्मणोंके लिये मैंने जो कुछ किया है, उसके फलस्वरूप ऐसे पुण्यलोकोंका दर्शन करके मुझे संतोष हो गया है। अब मैं इस बातके लिये संतप्त नहीं हूँ कि दूसरा कोई पुण्य क्यों नहीं किया? ॥ ४१ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ९ ॥

पृष्ठ 572

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षष्टितमोऽध्यायः श्रेष्ठ अयाचक, धर्मात्मा, निर्धन एवं गुणवान्‌को दान देनेका विशेष फल युधिष्ठिरउवाच यौ च स्यातां चरणेनोपपन्नौ यौ विद्यया सदृशौ जन्मना च । ताभ्यां दानं कतमस्मै विशिष्ट- मयाचमानाय च याचते च ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! उत्तम आचरण, विद्या और कुलमें एक समान प्रतीत होनेवाले दो ब्राह्मणोंमेंसे यदि एक याचक हो और दूसरा अयाचक तो किसको दान देनेसे उत्तम फलकी प्राप्ति होती है? ॥ भीष्म उवाच

श्रेयो वै याचतः पार्थ दानमाहुरयाचते ।

अर्हत्तमो वै धृतिमान् कृपणादधृतात्मनः ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! याचना करनेवालेकी अपेक्षा याचना न करनेवालेको दिया हुआ दान ही श्रेष्ठ एवं कल्याणकारी बताया गया है तथा अधीर हृदयवाले कृपण मनुष्यकी अपेक्षा धैर्य धारण करनेवाला ही विशेष सम्मानका पात्र है ॥ २ ॥

क्षत्रियो रक्षणधृतिर्ब्राह्मणोऽनर्थनाधृतिः ।

ब्राह्मणो धृतिमान् विद्वान् देवान् प्रीणाति तुष्टिमान् ॥ ३ ॥

रक्षाके कार्यमें धैर्य धारण करनेवाला क्षत्रिय और याचना न करनेमें दृढ़ता रखनेवाला ब्राह्मण श्रेष्ठ है । जो ब्राह्मण धीर, विद्वान् और संतोषी होता है, वह देवताओंको अपने व्यवहारसे संतुष्ट करता है ॥ ३ ॥

याच्यमाहुरनीशस्य अभिहारं च भारत ।

उद्वेजयन्ति याचन्ति सदा भूतानि दस्युवत् ॥ ४ ॥

भारत! दरिद्रकी याचना उसके लिये तिरस्कारका कारण मानी गयी है; क्योंकि याचक प्राणी लुटेरोंकी भाँति सदा लोगोंको उद्विग्न करते रहते हैं ॥ ४ ॥

म्रियते याचमानो वै न जातु म्रियते ददत् ।

ददत् संजीवयत्येनमात्मानं च युधिष्ठिर ॥ ५ ॥

याचक मर जाता है, किंतु दाता कभी नहीं मरता । युधिष्ठिर! दाता इस याचकको और अपनेको भी जीवित रखता है ॥ ५ ॥

पृष्ठ 573

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आनृशंस्यं परो धर्मो याचते यत् प्रदीयते ।

अयाचतः सीदमानान् सर्वोपायैर्निमन्त्रयेत् ॥ ६ ॥

याचकको जो दान दिया जाता है, वह दयारूप परम धर्म है, परंतु जो लोग क्लेश उठाकर भी याचना नहीं करते, उन ब्राह्मणोंको प्रत्येक उपायसे अपने पास बुलाकर दान देना चाहिये ॥ ६ ॥

यदि वै तादृशा राष्ट्रान् वसेयुस्ते द्विजोत्तमाः ।

भस्मच्छन्नानिवाग्नींस्तान् बुध्येथास्त्वं प्रयत्नतः ॥ ७ ॥

यदि तुम्हारे राज्यके भीतर वैसे श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते हों तो वे राखमें छिपी हुई आगके समान हैं । तुम्हें प्रयत्नपूर्वक ऐसे ब्राह्मणोंका पता लगाना चाहिये ॥ ७ ॥

तपसा दीप्यमानास्ते दहेयुः पृथिवीमपि ।

अपूज्यमानाः कौरव्य पूजार्हास्तु तथाविधाः ॥ ८ ॥

कुरुनन्दन! तपस्यासे देदीप्यमान होनेवाले वे ब्राह्मण पूजित न होनेपर यदि चाहें तो सारी पृथ्वीको भी भस्म कर सकते हैं; अतः वैसे ब्राह्मण सदा ही पूजा करनेके योग्य हैं ॥ ८ ॥

पूज्या हि ज्ञानविज्ञानतपोयोगसमन्विताः ।

तेभ्य पूजां प्रयुञ्जीथा ब्राह्मणेभ्यः परंतप ॥ ९ ॥

परंतप! जो ब्राह्मण ज्ञान-विज्ञान, तपस्या और योगसे युक्त हैं, वे पूजनीय होते हैं । उन ब्राह्मणोंकी तुम्हें सदा पूजा करनी चाहिये ॥ ९ ॥

ददद् बहुविधान् दायानुपागच्छन्नयाचताम् ।

यदग्निहोत्रे सुहुते सायंप्रातर्भवेत् फलम् ॥ १० ॥

विद्यावेदव्रतवति तद्दानफलमुच्यते । जो याचना नहीं करते, उनके पास तुम्हें स्वयं जाकर नाना प्रकारके पदार्थ देने चाहिये । सायं और प्रातःकाल विधिपूर्वक अग्निहोत्र करनेसे जो फल मिलता है, वही वेदके विद्वान् और व्रतधारी ब्राह्मणको दान देनेसे भी मिलता है ॥ १०३ ॥

विद्यावेदव्रतस्नातानव्यपाश्रयजीविनः ॥ ११ ॥

गूढस्वाध्यायतपसो ब्राह्मणान् संशितव्रतान् ।

कृतैरावसथैर्हृद्यैः सप्रेष्यैः सपरिच्छदैः ॥ १२ ॥

निमन्त्रयेथाः कौरव्य कामैश्चान्यैर्द्विजोत्तमान् । कुरुनन्दन! जो विद्या और वेदव्रतमें निष्णात हैं, जो किसीके आश्रित होकर जीविका नहीं चलाते, जिनका स्वाध्याय और तपस्या गुप्त है तथा जो कठोर व्रतका पालन करनेवाले हैं, ऐसे उत्तम ब्राह्मणोंको तुम अपने यहाँ निमन्त्रित करो और उन्हें सेवक, आवश्यक सामग्री तथा अन्यान्य उपभोगकी वस्तुओंसे सम्पन्न मनोरम गृह बनवाकर दो ॥ ११-१२ ||

पृष्ठ 574

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अपि ते प्रतिगृह्णीयुः श्रद्धोपेतं युधिष्ठिर ॥ १३ ॥

कार्यमित्येव मन्वाना धर्मज्ञाः सूक्ष्मदर्शिनः । युधिष्ठिर! वे धर्मज्ञ तथा सूक्ष्मदर्शी ब्राह्मण तुम्हारे श्रद्धायुक्त दानको कर्तव्यबुद्धिसे किया हुआ मानकर अवश्य स्वीकार करेंगे ॥ १३३ ॥

अपि ते ब्राह्मणा भुक्त्वा गताः सोद्धरणान् गृहान् ॥ १४ ॥

येषां दाराः प्रतीक्षन्ते पर्जन्यमिव कर्षकाः । जैसे किसान वर्षाकी बाट जोहते रहते हैं, उसी प्रकार जिनके घरकी स्त्रियाँ अन्नकी प्रतीक्षामें बैठी हों और बालकोंको यह कहकर बहला रही हों कि ' अब तुम्हारे बाबूजी भोजन लेकर आते ही होंगे '; क्या ऐसे ब्राह्मण तुम्हारे यहाँ भोजन करके अपने घरोंको गये हैं? ॥ १४३ ॥

अन्नानि प्रातःसवने नियता ब्रह्मचारिणः ॥ १५ ॥

ब्राह्मणास्तात भुञ्जानास्त्रेताग्निं प्रीणयन्त्युत । तात! नियमपूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण यदि प्रातःकाल घरमें भोजन करते हैं तो तीनों अग्नियोंको तृप्त कर देते हैं ॥ १५३ ॥

माध्यन्दिनं ते सवनं ददतस्तात वर्तताम् ॥ १६ ॥

गोहिरण्यानि वासांसि तेनेन्द्रः प्रीयतां तव । बेटा! दोपहरके समय जो तुम ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें गौ, सुवर्ण और वस्त्र प्रदान करते हो, इससे तुम्हारे ऊपर इन्द्रदेव प्रसन्न हों ॥ १६३ ॥

तृतीयं सवनं ते वै वैश्वदेवं युधिष्ठिर ॥ १७ ॥

यद् देवेभ्यः पितृभ्यश्च विप्रेभ्यश्च प्रयच्छसि । युधिष्ठिर! तीसरे समयमें जो तुम देवताओं, पितरों और ब्राह्मणोंके उद्देश्यसे दान करते हो, वह विश्वेदेवोंको संतुष्ट करनेवाला होता है ॥ १७३ ॥

अहिंसा सर्वभूतेभ्यः संविभागश्च भागशः ॥ १८ ॥

दमस्त्यागो धृतिः सत्यं भवत्यवभृथाय ते । सब प्राणियोंके प्रति अहिंसाका भाव रखना, सबको यथायोग्य भाग अर्पण करना, इन्द्रियसंयम, त्याग, धैर्य और सत्य – ये सब गुण तुम्हें यज्ञान्तमें किये जानेवाले अवभृथ-स्नानका फल देंगे ॥ १८३ ॥

एष ते विततो यज्ञः श्रद्धापूतः सदक्षिणः ॥ १ ९ ॥ विशिष्टः सर्वयज्ञानां नित्यं तात प्रवर्तताम् ॥ २० ॥

इस प्रकार जो तुम्हारे श्रद्धासे पवित्र एवं दक्षिणायुक्त यज्ञका विस्तार हो रहा है; यह सभी यज्ञोंसे बढ़कर है । तात युधिष्ठिर! तुम्हारा यह यज्ञ सदा चालू रहना चाहिये ॥ १ ९ -२० ||

पृष्ठ 575

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इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६० ॥

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पृष्ठ 576

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एकषष्टितमोऽध्यायः राजाके लिये यज्ञ, दान और ब्राह्मण आदि प्रजाकी रक्षाका उपदेश युधिष्ठिर उवाच

दानं यज्ञः क्रिया चेह किंस्वित् प्रेत्य महाफलम् ।

कस्य ज्यायः फलं प्रोक्तं कीदृशेभ्यः कथं कदा ॥ १ ॥

एतदिच्छामि विज्ञातुं याथातथ्येन भारत ।

विद्वन् जिज्ञासमानाय दानधर्मान् प्रचक्ष्व मे ॥ २ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — भारत! दान और यज्ञकर्म–इन दोनोंमेंसे कौन मृत्युके पश्चात् महान् फल देनेवाला होता है? किसका फल श्रेष्ठ बताया गया है? कैसे ब्राह्मणोंको कब दान देना चाहिये और किस प्रकार कब यज्ञ करना चाहिये? मैं इस बातको यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ । विद्वन्! आप मुझ जिज्ञासुको दानसम्बन्धी धर्म विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १-२ ॥

अन्तर्वेद्यां च यद् दत्तं श्रद्धया चानृशंस्यतः ।

किंस्विन्नैःश्रेयसं तात तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ३ ॥

तात पितामह! जो दान वेदीके भीतर श्रद्धापूर्वक दिया जाता है और जो वेदीके बाहर दयाभावसे प्रेरित होकर दिया जाता है; इन दोनोंमें कौन विशेष कल्याणकारी होता है? ॥ ३ ॥

भीष्मउवाच

रौद्रं कर्म क्षत्रियस्य सततं तात वर्तते ।

तस्य वैतानिकं कर्म दानं चैवेह पावनम् ॥ ४ ॥

भीष्मजीने कहा- बेटा! क्षत्रियको सदा कठोर कर्म करने पड़ते हैं, अतः यहाँ यज्ञ और दान ही उसे पवित्र करनेवाले कर्म हैं ॥ ४ ॥

न तु पापकृतां राज्ञां प्रतिगृह्णन्ति साधवः ।

एतस्मात् कारणाद् यज्ञैर्यजेद् राजाऽऽप्तदक्षिणैः ॥ ५ ॥

श्रेष्ठ पुरुष पाप करनेवाले राजाका दान नहीं लेते हैं; इसलिये राजाको पर्याप्त दक्षिणा देकर यज्ञोंका अनुष्ठान करना चाहिये ॥ ५ ॥

अथ चेत् प्रतिगृह्णीयुर्दद्यादहरहर्नृपः ।

श्रद्धामास्थाय परमां पावनं ह्येतदुत्तमम् ॥ ६ ॥

श्रेष्ठ पुरुष यदि दान स्वीकार करें तो राजाको उन्हें प्रतिदिन बड़ी श्रद्धाके साथ दान देना चाहिये; क्योंकि श्रद्धापूर्वक दिया हुआ दान आत्मशुद्धिका सर्वोत्तम साधन है ॥ ६ ॥

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महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 577 का मूल पृष्ठ
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ब्राह्मणांस्तर्पयन् द्रव्यैस्ततो यज्ञे यतव्रतः ।

मैत्रान् साधून् वेदविदः शीलवृत्ततपोर्जितान् ॥ ७ ॥

तुम नियमपूर्वक यज्ञमें सुशील, सदाचारी, तपस्वी, वेदवेत्ता, सबसे मैत्री रखनेवाले तथा साधु स्वभाववाले ब्राह्मणोंको धन देकर संतुष्ट करो ॥ ७ ॥

यत् ते ते न करिष्यन्ति कृतं ते न भविष्यति ।

यज्ञान् साधय साधुभ्यः स्वाद्वन्नान् दक्षिणावतः ॥ ८ ॥

यदि वे तुम्हारा दान स्वीकार नहीं करेंगे तो तुम्हें पुण्य नहीं होगा; अतः श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये स्वादिष्ट अन्न और दक्षिणासे युक्त यज्ञोंका अनुष्ठान करो ॥ ८ ॥

इष्टं दत्तं च मन्येथा आत्मानं दानकर्मणा ।

पूजयेथा यायजूकांस्तवाप्यंशो भवेद् यथा ॥ ९ ॥

याज्ञिक पुरुषोंको दान करके ही तुम अपनेको यज्ञ और दानके पुण्यका भागी समझ लो । यज्ञ करनेवाले ब्राह्मणोंका सदा सम्मान करो । इससे तुम्हें भी यज्ञका आंशिक फल प्राप्त होगा ॥ ९ ॥

(विद्वद्भयः सम्प्रदानेन तत्राप्यंशोऽस्य पूजया ।

यज्वभ्यश्चाथ विद्वद्भयो दत्त्वा लोकं प्रदापयेत् ॥

प्रदद्याज्ज्ञानदातॄणां ज्ञानदानांशभाग् ( भवेत् । ) विद्वानोंको दान देनेसे, उनकी पूजा करनेसे दाता और पूजकको यज्ञका आंशिक फल प्राप्त होता है । यज्ञकर्ताओं तथा ज्ञानी पुरुषोंको दान देनेसे वह दान उत्तम लोककी प्राप्ति कराता है । जो दूसरोंको ज्ञानदान करते हैं, उन्हें भी अन्न और धनका दान करे । इससे दाता उनके ज्ञानदानके आंशिक पुण्यका भागी होता है ॥

प्रजावतो भरेथाश्च ब्राह्मणान् बहुकारिणः ।

प्रजावांस्तेन भवति यथा जनयिता तथा ॥ १० ॥

जो बहुतोंका उपकार करनेवाले और बाल- बच्चेवाले ब्राह्मणोंका पालन - पोषण करता है वह उस शुभ कर्मके प्रभावसे प्रजापतिके समान संतानवान् होता है ॥ १० ॥

यावतः साधुधर्मान् वै सन्तः संवर्धयन्त्युत ।

सर्वस्वैश्चापि भर्तव्या नरा ये बहुकारिणः ॥ ११ ॥

जो संत पुरुष सदा समस्त सद्धर्मोंका प्रचार और विस्तार करते रहते हैं, अपना सर्वस्व देकर भी उनका भरण- पोषण करना चाहिये; क्योंकि वे राजाके अत्यन्त उपकारी होते हैं ॥ ११ ॥

समृद्धः सम्प्रयच्छ त्वं ब्राह्मणेभ्यो युधिष्ठिर ।

धेनूरनडुहोऽन्नानि च्छत्रं वासांस्युपानहौ ॥ १२ ॥

युधिष्ठिर! तुम समृद्धिशाली हो, इसलिये ब्राह्मणोंको गाय, बैल, अन्न, छाता, जूता और वस्त्र दान करते रहो ॥ १२ ॥

पृष्ठ 578

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आज्यानि यजमानेभ्यस्तथान्नानि च भारत ।

अश्ववन्ति च यानानि वेश्मानि शयनानि च ॥ १३ ॥

एते देया व्युष्टिमन्तो लघूपायाश्च भारत । भारत! जो ब्राह्मण यज्ञ करते हों, उन्हें घी, अन्न, घोड़े जुते हुए रथ आदिकी सवारियाँ, घर और शय्या आदि वस्तुएँ देनी चाहिये । भरतनन्दन! राजाके लिये ये दान सरलतासे होनेवाले और समृद्धिको बढ़ानेवाले हैं ॥ १३३ ॥

अजुगुप्सांश्च विज्ञाय ब्राह्मणान् वृत्तिकर्शितान् ॥ १४ ॥

उपच्छन्नं प्रकाशं वा वृत्त्या तान् प्रतिपालयेत् । जिन ब्राह्मणोंका आचरण निन्दित न हो, वे यदि जीविकाके बिना कष्ट पा रहे हों तो उनका पता लगाकर गुप्त या प्रकट रूपमें जीविकाका प्रबन्ध करके सदा उनका पालन करते रहना चाहिये ॥ १४३ ॥

राजसूयाश्वमेधाभ्यां श्रेयस्तत् क्षत्रियान् प्रति ॥ १५ ॥

एवं पापैर्विनिर्मुक्तस्त्वं पूतः स्वर्गमाप्स्यसि ।

क्षत्रियोंके लिये वह कार्य राजसूय और अश्वमेध यज्ञोंसे भी अधिक कल्याणकारी है ।

ऐसा करनेसे तुम सब पापोंसे मुक्त एवं पवित्र होकर स्वर्गलोकमें जाओगे ॥

संचयित्वा पुनः कोशं यद् राष्ट्रं पालयिष्यसि ॥ १६ ॥

तेन त्वं ब्रह्मभूयत्वमवाप्स्यसि धनानि च । कोषका संग्रह करके यदि तुम उसके द्वारा राष्ट्रकी रक्षा करोगे तो तुम्हें दूसरे जन्मोंमें धन और ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति होगी ॥ १६३ ॥

आत्मनश्च परेषां च वृत्तिं संरक्ष भारत ॥ १७ ॥

पुत्रवच्चापि भृत्यान् स्वान् प्रजाश्च परिपालय । भरतनन्दन! तुम अपनी और दूसरोंकी भी जीविकाकी रक्षा करो तथा अपने सेवकों और प्रजाजनोंका पुत्रकी भाँति पालन करो ॥ १७३ ॥

योगः क्षेमश्च ते नित्यं ब्राह्मणेष्वस्तु भारत ॥ १८ ॥

तदर्थं जीवितं तेऽस्तु मा तेभ्योऽप्रतिपालनम् । भारत! ब्राह्मणोंके पास जो वस्तु न हो, उसे उनको देना और जो हो उसकी रक्षा करना भी तुम्हारा नित्य कर्तव्य है । तुम्हारा जीवन उन्हींकी सेवामें लग जाना चाहिये । उनकी रक्षासे तुम्हें कभी मुँह नहीं मोड़ना चाहिये ॥ १८३ ॥

अनर्थो ब्राह्मणस्यैष यद् वित्तनिचयो महान् ॥ १९ ॥

श्रिया ह्यभीक्ष्णं संवासो दर्पयेत् सम्प्रमोहयेत् । ब्राह्मणोंके पास यदि बहुत धन इकट्ठा हो जाय तो यह उनके लिये अनर्थका ही कारण होता है; क्योंकि लक्ष्मीका निरन्तर सहवास उन्हें दर्प और मोहमें डाल देता है ॥ १ ९ ३ ॥

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ब्राह्मणेषु प्रमूढेषु धर्मो विप्रणशेद् ध्रुवम् ।

धर्मप्रणाशे भूतानामभावः स्यान्न संशयः ॥ २० ॥

ब्राह्मण जब मोहग्रस्त होते हैं, तब निश्चय ही धर्मका नाश हो जाता है और धर्मका नाश होनेपर प्राणियोंका भी विनाश हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ २० ॥

यो रक्षिभ्यः सम्प्रदाय राजा राष्ट्रं विलुम्पति ।

यज्ञे राष्ट्राद् धनं तस्मादानयध्वमिति ब्रुवन् ॥ २१ ॥

यच्चादाय तदाज्ञप्तं भीतं दत्तं सुदारुणम् ।

यजेद् राजा न तं यज्ञं प्रशंसन्त्यस्य साधवः ॥ २२ ॥

जो राजा प्रजासे करके रूपमें प्राप्त हुए धनको कोषकी रक्षा करनेवाले कोषाध्यक्ष आदिको देकर खजानेमें रखवा लेता है और अपने कर्मचारियोंको यह आज्ञा देता है कि ' तुम लोग यज्ञके लिये राज्यसे धन वसूलकर ले आओ', इस प्रकार यज्ञके नामपर जो राज्यकी प्रजाको लूटता है तथा उसकी आज्ञाके अनुसार लोगोंको डरा- धमकाकर निष्ठुरतापूर्वक लाये हुए धनको लेकर जो उसके द्वारा यज्ञका अनुष्ठान करता है, उस राजाके ऐसे यज्ञकी श्रेष्ठ पुरुष प्रशंसा नहीं करते हैं ॥ २१-२२ ॥

अपीडिताः सुसंवृद्धा ये ददत्यनुकूलतः ।

तादृशेनाप्युपायेन यष्टव्यं नोद्यमाहृतैः ॥ २३ ॥

इसलिये जो लोग बहुत धनी हों और बिना पीड़ा दिये ही अनुकूलतापूर्वक धन दे सकें, उनके दिये हुए अथवा वैसे ही मृदु उपायसे प्राप्त हुए धनके द्वारा यज्ञ करना चाहिये; प्रजापीड़नरूप कठोर प्रयत्नसे लाये हुए धनके द्वारा नहीं ॥ २३ ॥

यदा परिनिषिच्येत निहितो वै यथाविधि ।

तदा राजा महायज्ञैर्यजेत बहुदक्षिणैः ॥ २४ ॥

जब राजाका विधिपूर्वक राज्याभिषेक हो जाय और वह राज्यासनपर बैठ जाय तब राजा बहुत - सी दक्षिणाओंसे युक्त महान् यज्ञका अनुष्ठान करे ॥ २४ ॥

वृद्धबालधनं रक्ष्यमन्धस्य कृपणस्य च ।

न खातपूर्वं कुर्वीत न रुदन्ती धनं हरेत् ॥ २५ ॥

राजा वृद्ध, बालक, दीन और अन्धे मनुष्यके धनकी रक्षा करे । पानी न बरसनेपर जब प्रजा कुआँ खोदकर किसी तरह सिंचाई करके कुछ अन्न पैदा करे और उसीसे जीविका चलाती हो तो राजाको वह धन नहीं लेना चाहिये तथा किसी क्लेशमें पड़कर रोती हुई स्त्रीका भी धन न ले ॥ २५ ॥

हृतं कृपणवित्तं हि राष्ट्रं हन्ति नृपश्रियम् ।

दद्याच्च महतो भोगान् क्षुद्भयं प्रणुदेत् सताम् ॥ २६ ॥

यदि किसी दरिद्रका धन छीन लिया जाय तो वह राजाके राज्यका और लक्ष्मीका विनाश कर देता है । अतः राजाको चाहिये कि दीनोंका धन न लेकर उन्हें महान् भोग अर्पित

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करे और श्रेष्ठ पुरुषोंको भूखका कष्ट न होने दे ॥ २६ ॥

येषां स्वादूनि भोज्यानि समवेक्ष्यन्ति बालकाः नाश्नन्ति विधिवत् तानि किं नु पापतरं ततः ॥ २७ ॥

जिसके स्वादिष्ट भोजनकी ओर छोटे-छोटे बच्चे तरसती आँखोंसे देखते हों और वह उन्हें न्यायतः खानेको न मिलता हो, उस पुरुषके द्वारा इससे बढ़कर पाप और क्या हो सकता है? ॥ २७ ॥

यदि ते तादृशो राष्ट्रे विद्वान् सीदेत् क्षुधा द्विजः ।

भ्रूणहत्यां च गच्छेथाः कृत्वा पापमिवोत्तमम् ॥ २८ ॥

राजन्! यदि तुम्हारे राज्यमें कोई वैसा विद्वान् ब्राह्मण भूखसे कष्ट पा रहा हो तो तुम्हें भ्रूण- हत्याका पाप लगेगा और कोई बड़ा भारी पाप करनेसे मनुष्यकी जो दुर्गति होती है, वही तुम्हारी भी होगी ॥ २८ ॥

धिक् तस्य जीवितं राज्ञो राष्ट्रे यस्यावसीदति ।

द्विजोऽन्यो वा मनुष्योऽपि शिबिराह वचो यथा ॥ २ ९ ॥

राजा शिबिका कथन है कि 'जिसके राज्यमें ब्राह्मण या कोई और मनुष्य क्षुधासे पीड़ित हो रहा हो, उस राजाके जीवनको धिक्कार है ॥ २ ९ ॥

यस्य स्म विषये राज्ञः स्नातकः सीदति क्षुधा ।

अवृद्धिमेति तद्राष्ट्रं विन्दते सहराजकम् ॥ ३० ॥

जिस राजाके राज्यमें स्नातक ब्राह्मण भूखसे कष्ट पाता है, उसके राज्यकी उन्नति रुक जाती है; साथ ही वह राज्य शत्रु राजाओंके हाथमें चला जाता है ॥ ३० ॥

क्रोशन्त्यो यस्य वै राष्ट्राद् हृयन्ते तरसा स्त्रियः ।

क्रोशतां पतिपुत्राणां मृतोऽसौ न च जीवति ॥ ३१ ॥

जिसके राज्यसे रोती - बिलखती स्त्रियोंका बलपूर्वक अपहरण हो जाता हो और उनके पति- पुत्र रोते - पीटते रह जाते हों, वह राजा नहीं, मुर्दा है । अर्थात् वह जीवित रहते हुए मुर्देके समान है ॥ ३१ ॥

अरक्षितारं हर्तारं विलोप्तारमनायकम् ।

तं वै राजकलिं हन्युः प्रजाः सन्नह्य निर्घृणम् ॥ ३२ ॥

जो प्रजाकी रक्षा नहीं करता, केवल उसके धनको लूटता- खसोटता रहता है, तथा जिसके पास कोई नेतृत्व करनेवाला मन्त्री नहीं है, वह राजा नहीं, कलियुग है । समस्त प्रजाको चाहिये कि ऐसे निर्दयी राजाको बाँधकर मार डाले ॥ ३२ ॥

अहं वो रक्षितेत्युक्त्वा यो न रक्षति भूमिपः ।

स संहत्य निहन्तव्यः श्वेव सोन्माद आतुरः ॥ ३३ ॥

जो राजा प्रजासे यह कहकर कि ' मैं तुमलोगोंकी रक्षा करूँगा' उनकी रक्षा नहीं करता, वह पागल और रोगी कुत्तेकी तरह सबके द्वारा मार डालने योग्य है ॥