श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 581–590

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 581–590

पृष्ठ 581

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 581 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पापं कुर्वन्ति यत् किंचित् प्रजा राज्ञा ह्यरक्षिताः ।

चतुर्थं तस्य पापस्य राजा विन्दति भारत ॥ ३४ ॥

भरतनन्दन! राजासे अरक्षित होकर प्रजा जो कुछ भी पाप करती है, उस पापका एक चौथाई भाग राजाको भी प्राप्त होता है ॥ ३४ ॥

अथाहुः सर्वमेवेति भूयोऽर्धमिति निश्चयः ।

चतुर्थं मतमस्माकं मनोः श्रुत्वानुशासनम् ॥ ३५ ॥

कुछ लोगोंका कहना है कि सारा पाप राजाको ही लगता है । दूसरे लोगोंका यह निश्चय है कि राजा आधे पापका भागी होता है । परंतु मनुका उपदेश सुनकर हमारा मत यही है कि राजाको उस पापका एक चतुर्थांश ही प्राप्त होता है ॥ ३५ ॥

शुभं वा यच्च कुर्वन्ति प्रजा राज्ञा सुरक्षिताः ।

चतुर्थं तस्य पुण्यस्य राजा चाप्नोति भारत ॥ ३६ ॥

भारत! राजासे भलीभाँति सुरक्षित होकर प्रजा जो भी शुभ कर्म करती है, उसके पुण्यका चौथाई भाग राजा प्राप्त कर लेता है ॥ ३६ ॥

जीवन्तं त्वानुजीवन्तु प्रजाः सर्वा युधिष्ठिर ।

पर्जन्यमिव भूतानि महाद्रुममिवाण्डजाः ॥ ३७ ॥

कुबेरमिव रक्षांसि शतक्रतुमिवामराः ।

ज्ञातयस्त्वानुजीवन्तु सुहृदश्च परंतप ॥ ३८ ॥

परंतप युधिष्ठिर! जैसे सब प्राणी मेघके सहारे जीवन धारण करते हैं, जैसे पक्षी महान् वृक्षका आश्रय लेकर रहते हैं, तथा जिस प्रकार राक्षस कुबेरके और देवता इन्द्रके आश्रित रहकर जीवन धारण करते हैं, उसी प्रकार तुम्हारे जीते -जी सारी प्रजा तुमसे ही अपनी जीविका चलाये तथा तुम्हारे सुहृद् एवं भाई-बन्धु भी तुमपर ही अवलम्बित होकर जीवन निर्वाह करें ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि एकषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६१ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल ३ ९ ३ श्लोक हैं )

पृष्ठ 582

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 582 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्विषष्टितमोऽध्यायः सब दानोंसे बढ़कर भूमिदानका महत्त्व तथा उसीके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका संवाद युधिष्ठिरउवाच

इदं देयमिदं देयमितीयं श्रुतिरादरात् ।

बहुदेयाश्च राजानः किंस्विद् दानमनुत्तमम् ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! यह देना चाहिये, वह देना चाहिये, ऐसा कहकर यह श्रुति बड़े आदरके साथ दानका विधान करती है तथा शास्त्रोंमें राजाओंके लिये बहुत कुछ दान करनेके लिये बात कही गयी है; परंतु मैं यह जानना चाहता हूँ कि सब दानोंमें सर्वोत्तम दान कौन--सा है? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अतिदानानि सर्वाणि पृथिवीदानमुच्यते ।

अचला ह्यक्षया भूमिर्दोग्ध्री कामानिहोत्तमान् ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा- बेटा! सब दानोंसे बढ़कर पृथ्वीदान बताया गया है । पृथ्वी अचल और अक्षय है । वह इस लोकमें समस्त उत्तम भोगोंको देनेवाली है ॥

दोग्ध्री वासांसि रत्नानि पशून् व्रीहियवांस्तथा ।

भूमिदः सर्वभूतेषु शाश्वतीरेधते समाः ॥ ३ ॥

वस्त्र, रत्न, पशु और धान-जौ आदि नाना प्रकारके अन्न - इन सबको देनेवाली पृथ्वी ही है; अतः पृथ्वीका दान करनेवाला मनुष्य सदा समस्त प्राणियोंमें सबसे अधिक अभ्युदयशील होता है ॥ ३ ॥

यावद् भूमेरायुरिह तावद् भूमिद एधते ।

न भूमिदानादस्तीह परं किंचिद् युधिष्ठिर ॥ ४ ॥

युधिष्ठिर! इस जगत्में जबतक पृथ्वीकी आयु है, तबतक भूमिदान करनेवाला मनुष्य समृद्धिशाली रहकर सुख भोगता है । अतः यहाँ भूमिदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है ॥ ४ ॥

अप्यल्पं'प्रददुः सर्वे पृथिव्या इति नः श्रुतम् ।

भूमिमेव ददुः सर्वे भूमिं ते भुञ्जते जनाः ॥ ५ ॥

हमने सुना है कि जिन लोगोंने थोड़ी -सी भी पृथ्वी दान की है, वे सब लोग भूमिदानका ही पूर्ण फल पाकर उसका उपभोग करते हैं ॥ ५ ॥

स्वकर्मैवोपजीवन्ति नरा इह परत्र च ।

पृष्ठ 583

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 583 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

भूमिर्भूतिर्महादेवी दातारं कुरुते प्रियम् ॥ ६ ॥

मनुष्य इहलोक और परलोकमें अपने कर्मके अनुसार ही जीवन- निर्वाह करते हैं । भूमि

ऐश्वर्यस्वरूपा महादेवी है । वह दाताको अपना प्रिय बना लेती है ॥

य एतां दक्षिणां दद्यादक्षयां राजसत्तम ।

पुनर्नरत्वं सम्प्राप्य भवेत् स पृथिवीपतिः ॥ ७ ॥

नृपश्रेष्ठ! जो इस अक्षय भूमिका दान करता है वह दूसरे जन्ममें मनुष्य होकर पृथ्वीका स्वामी होता है ॥ ७ ||

यथा दानं तथा भोग इति धर्मेषु निश्चयः ।

संग्रामे वा तनुं जह्याद् दद्याच्च पृथिवीमिमाम् ॥ ८ ॥

इत्येतत् क्षत्रबन्धूनां वदन्ति परमां श्रियम् । धर्मशास्त्रोंका सिद्धान्त है कि जैसा दान किया जाता है, वैसा ही भोग मिलता है । संग्राममें शरीरका त्याग करना तथा इस पृथ्वीका दान करना - ये दोनों ही कार्य क्षत्रियोंको उत्तम लक्ष्मीकी प्राप्ति करानेवाले होते हैं ॥ ८३ ॥

पुनाति दत्ता पृथिवी दातारमिति शुश्रुम ॥ ९ ॥

अपि पापसमाचारं ब्रह्मघ्नमपि चानृतम् ।

सैव पापं प्लावयति सैव पापात् प्रमोचयेत् ॥ १० ॥

दानमें दी हुई पृथ्वी दाताको पवित्र कर देती है - यह हमने सुना है । कितना ही बड़ा पापाचारी, ब्रह्महत्यारा और असत्यवादी क्यों न हो, दानमें दी हुई पृथ्वी ही दाताके पापको धो बहा देती है और वही उसे सर्वथा पापमुक्त कर देती है ॥ ९-१० ॥

अपि पापकृतां राज्ञां प्रतिगृह्णन्ति साधवः ।

पृथिवीं नान्यदिच्छन्ति पावनं जननी यथा ॥ ११ ॥

श्रेष्ठ पुरुष पापाचारी राजाओंसे भी पृथ्वीका दान तो ले लेते हैं, किंतु और किसी

वस्तुका दान नहीं लेना चाहते । पृथ्वी वैसी ही पावन वस्तु है जैसी माता ॥ ११ ॥

नामास्याः प्रियदत्तेति गुह्यं देव्याः सनातनम् ।

दानं वाप्यथवाऽऽदानं नामास्याः प्रथमं प्रियम् ॥ १२ ॥

इस पृथ्वी देवीका सनातन गोपनीय नाम ' प्रियदत्ता' है । इसका दान अथवा ग्रहण दोनों ही दाता और प्रतिग्रहीताको प्रिय हैं; इसीलिये इसका यह प्रथम नाम सबको प्रिय है ॥ १२ ॥

य एतां विदुषे दद्यात् पृथिवीं पृथिवीपतिः ।

पृथिव्यामेतदिष्टं स राजा राज्यमितो व्रजेत् ॥ १३ ॥

जो पृथ्वीपति विद्वान् ब्राह्मणोंको इस पृथ्वीका दान देता है, वह राजा इस दानके प्रभावसे पुनः राज्य प्राप्त करता है । भूमण्डलमें यह पृथ्वीदान सबको प्रिय है ॥ १३ ॥

पुनश्चासौ जनिं प्राप्य राजवत् स्यान्न संशयः ।

पृष्ठ 584

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 584 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तस्मात् प्राप्यैव पृथिवीं दद्यात् विप्राय पार्थिवः ॥ १४ ॥

वह पुनर्जन्म पाकर राजाके समान ही होता है, इसमें संशय नहीं है । अतः राजाको चाहिये कि वह पृथ्वीपर अधिकार पाते ही उसमेंसे कुछ ब्राह्मणको दान करे ॥ १४ ॥

नाभूमिपतिना भूमिरधिष्ठेया कथंचन ।

न चापात्रेण वा ग्राह्या दत्तदाने न चाचरेत् ॥ १५ ॥

जो जिस भूमिका स्वामी नहीं है, उसे उसपर किसी तरह अधिकार नहीं करना चाहिये तथा अयोग्य पात्रको भूमिदान नहीं ग्रहण करना चाहिये । जिस भूमिको दानमें दे दिया गया हो, उसे अपने उपयोगमें नहीं लाना चाहिये ॥ १५ ॥

ये चान्ये भूमिमिच्छेयुः कुर्युरवं न संशयः ।

यः साधोर्भूमिमादत्ते न भूमिं विन्दते तु सः ॥ १६ ॥

दूसरे भी जो लोग भावी जन्ममें भूमि पानेकी इच्छा करें, उन्हें भी इस जन्ममें इसी तरह भूमिदान करना चाहिये । इसमें संशय नहीं है । जो छल- बलसे श्रेष्ठ पुरुषकी भूमिका अपहरण कर लेता है, उसे भूमिकी प्राप्ति नहीं होती ॥ १६ ॥

भूमिं दत्त्वा तु साधुभ्यो विन्दते भूमिमुत्तमाम् ।

प्रेत्य चेह च धर्मात्मा सम्प्राप्नोति महद् यशः ॥ १७ ॥

श्रेष्ठ पुरुषोंको भूमिदान देनेसे दाताको उत्तम भूमिकी प्राप्ति होती है तथा वह धर्मात्मा पुरुष इहलोक और परलोकमें भी महान् यशका भागी होता है ॥ १७ ॥

(एकागारकरीं दत्त्वा षष्टिसाहस्रमूर्ध्वगः । तावत्या हरणे पृथ्व्या नरकं द्विगुणोत्तरम् ॥ ) जो एक घर बनाने भरके लिये भूमि दान करता है, वह साठ हजार वर्षोंतक ऊर्ध्वलोकमें निवास करता है । तथा जो उतनी ही पृथ्वीका हरण कर लेता है, उसे उससे दूने अधिक कालतक नरकमें रहना पड़ता है ॥

यस्य विप्रास्तु शंसन्ति साधोर्भूमिं सदैव हि ।

न तस्य शत्रवो राजन् प्रशंसन्ति वसुन्धराम् ॥ १८ ॥

राजन्! ब्राह्मण जिस श्रेष्ठ पुरुषकी दी हुई भूमिकी सदा ही प्रशंसा करते हैं, उसकी उस भूमिकी राजाके शत्रु प्रशंसा नहीं करते हैं ॥ १८ ॥

यत् किंचित् पुरुषः पापं कुरुते वृत्तिकर्शितः ।

अपि गोचर्ममात्रेण भूमिदानेन पूयते ॥ १ ९ ॥

जीविका न होनेके कारण मनुष्य क्लेशमें पड़कर जो कुछ पाप कर डालता है, वह सारा पाप गोचर्मके बराबर भूमि- दान करनेसे धुल जाता है ॥ १ ९ ॥

येऽपि संकीर्णकर्माणो राजानो रौद्रकर्मिणः ।

तेभ्यः पवित्रमाख्येयं भूमिदानमनुत्तमम् ॥ २० ॥

पृष्ठ 585

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 585 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

जो राजा कठोर कर्म करनेवाले तथा पापपरायण हैं, उन्हें पापोंसे मुक्त होनेके लिये परम पवित्र एवं सबसे उत्तम भूमिदानका उपदेश देना चाहिये ॥ २० ॥

अल्पान्तरमिदं शश्वत् पुराणा मेनिरे जनाः ।

यो यजेताश्वमेधेन दद्याद् वा साधवे महीम् ॥ २१ ॥

प्राचीनकालके लोग सदा यह मानते रहे हैं कि जो अश्वमेधयज्ञ करता है अथवा जो श्रेष्ठ पुरुषको पृथ्वीदान करता है, इन दोनोंमें बहुत कम अन्तर है ॥

अपि चेत्सुकृतं कृत्वा शङ्केरन्नपि पण्डिताः ।

अशङ्क्यमेकमेवैतद् भूमिदानमनुत्तमम् ॥ २२ ॥

दूसरा कोई पुण्य कर्म करके उसके फलके विषयमें विद्वान् पुरुषोंको भी शंका हो जाय, यह सम्भव है; किंतु एकमात्र यह सर्वोत्तम भूमिदान ही ऐसा सत्कर्म है, जिसके फलके विषयमें किसीको शंका नहीं हो सकती ॥ २२ ॥

सुवर्णं रजतं वस्त्रं मणिमुक्तावसूनि च ।

सर्वमेतन्महाप्राज्ञो ददाति वसुधां ददत् ॥ २३ ॥

जो महाबुद्धिमान् पुरुष पृथ्वीका दान करता है, वह सोना, चाँदी, वस्त्र, मणि, मोती तथा रत्न— इन सबका दान कर देता है ( अर्थात् इन सभी दानोंका फल प्राप्त कर लेता है । ) ॥ २३ ॥

तपो यज्ञःश्रुतं शीलमलोभः सत्यसंधता ।

गुरुदैवतपूजा च एता वर्तन्ति भूमिदम् ॥ २४ ॥

पृथ्वीका दान करनेवाले पुरुषको तप, यज्ञ, विद्या, सुशीलता, लोभका अभाव, सत्यवादिता, गुरु - शुश्रूषा और देवाराधन - इन सबका फल प्राप्त हो जाता है ॥ २४ ॥

भर्तृनिःश्रेयसे युक्तास्त्यक्तात्मानो रणे हताः ।

ब्रह्मलोकगताः सिद्धा नातिक्रामन्ति भूमिदम् ॥ २५ ॥

जो अपने स्वामीका भला करनेके लिये रणभूमिमें मारे जाकर शरीर त्याग देते हैं और जो सिद्ध होकर ब्रह्मलोकमें पहुँच जाते हैं, वे भी भूमिदान करनेवाले पुरुषको लाँघकर आगे नहीं बढ़ने पाते ॥ २५ ॥

यथा जनित्री स्वं पुत्रं क्षीरेण भरते सदा ।

अनुगृह्णाति दातारं तथा सर्वरसैर्मही ॥ २६ ॥

जैसे माता अपने बच्चेको सदा दूध पिलाकर पालती है, उसी प्रकार पृथ्वी सब प्रकारके रस देकर भूमिदातापर अनुग्रह करती है ॥ २६ ॥

मृत्युर्वैकिङ्करो दण्डस्तमो वह्निः सुदारुणः ।

घोराश्च दारुणाः पाशा नोपसर्पन्ति भूमिदम् ॥ २७ ॥

कालकी भेजी हुई मौत, दण्ड, तमोगुण, दारुण अग्नि और अत्यन्त भयंकर पाश — ये भूमिदान करनेवाले पुरुषका स्पर्श नहीं कर सकते हैं ॥ २७ ॥

पृष्ठ 586

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 586 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पितॄंश्च पितृलोकस्थान् देवलोकाच्च देवताः ।

संतर्पयति शान्तात्मा यो ददाति वसुन्धराम् ॥ २८ ॥

जो पृथ्वीका दान करता है, वह शान्ताचित्त पुरुष पितृलोकमें रहनेवाले पितरों तथा देवलोकसे आये हुए देवताओंको भी तृप्त कर देता है ॥ २८ ॥

कृशाय म्रियमाणाय वृत्तिग्लानाय सीदते ।

भूमिं वृत्तिकरीं दत्त्वा सत्री भवति मानवः ॥ २ ९ ॥

दुर्बल, जीविकाके बिना दुखी और भूखके कष्टसे मरते हुए ब्राह्मणको उपजाऊ भूमिदान करनेवाला मनुष्य यज्ञका फल पाता है ॥ २ ९ ॥

यथा धावति गौर्वत्सं स्रवन्ती वत्सला पयः ।

एवमेव महाभाग भूमिर्भवति भूमिदम् ॥ ३० ॥

महाभाग! जैसे बछड़ेके प्रति वात्सल्यभावसे भरी हुई गौ अपने थनोंसे दूध बहाती हुई उसे पिलानेके लिये दौड़ती है, उसी प्रकार यह पृथ्वी भूमिदान करनेवालेको सुख पहुँचानेके लिये दौड़ती है ॥ ३० ॥

फालकृष्टां महीं दत्त्वा सबीजां सफलामपि ।

उदीर्णं वापि शरणं यथा भवति कामदः ॥ ३१ ॥

जो मनुष्य जोती - बोयी और उपजी हुई खेतीसे भरी भूमिका दान करता है अथवा विशाल भवन बनवाकर देता है, उसकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥ ३१ ॥

ब्राह्मणं वृत्तिसम्पन्नमाहिताग्निं शुचिव्रतम् ।

नरः प्रतिग्राह्य महीं न याति परमापदम् ॥ ३२ ॥

जो सदाचारी, अग्निहोत्री और उत्तम व्रतमें संलग्न ब्राह्मणको पृथ्वीका दान करता है, वह कभी भारी विपत्तिमें नहीं पड़ता है ॥ ३२ ॥

यथा चन्द्रमसो वृद्धिरहन्यहनि जायते ।

तथा भूमिकृतं दानं सस्ये सस्ये विवर्धते ॥ ३३ ॥

जैसे चन्द्रमाकी कला प्रतिदिन बढ़ती है, उसी प्रकार दान की हुई पृथ्वीमें जितनी बार फसल पैदा होती है, उतना ही उसके पृथ्वी दानका फल बढ़ता जाता है ॥ ३३ ॥

अत्र गाथा भूमिगीताः कीर्तयन्ति पुराविदः ।

याः श्रुत्वा जामदग्न्येन दत्ता भूः काश्यपाय वै ॥ ३४ ॥

प्राचीन बातोंको जाननेवाले लोग भूमिकी गायी हुई गाथाओंका वर्णन किया करते हैं, जिन्हें सुनकर जमदग्निनन्दन परशुरामने काश्यपजीको सारी पृथ्वी दान कर दी थी ॥ ३४ ॥

मामेवादत्त मां दत्त मां दत्त्वा मामवाप्स्यथ ।

अस्मिल्लोँके परे चैव तद् दत्तं जायते पुनः ॥ ३५ ॥

पृष्ठ 587

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 587 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

वह गाथा इस प्रकार है— ( पृथ्वी कहती है — ) ' मुझे ही दानमें दो, मुझे ही ग्रहण करो । मुझे देकर ही मुझे पाओगे; क्योंकि मनुष्य इस लोकमें जो कुछ दान करता है, वही उसे इहलोक और परलोकमें भी प्राप्त होता है ' ॥ ३५ ॥

य इमां व्याहृतिं वेद ब्राह्मणो वेदसम्मिताम् ।

श्राद्धस्य क्रियमाणस्य ब्रह्मभूयं स गच्छति ॥ ३६ ॥

जो ब्राह्मण श्राद्धकालमें पृथ्वीकी गायी हुई वेदसम्मत इस गाथाका पाठ करता है, वह ब्रह्मभावको प्राप्त होता है ॥ ३६ ॥

कृत्यानामधिशस्तानामरिष्टशमनं महत् ।

प्रायश्चित्तं महीं दत्त्वा पुनात्युभयतो दश ॥ ३७ ॥

अत्यन्त प्रबल कृत्या ( मारणशक्ति ) के प्रयोगसे जो भय प्राप्त होता है, उसको शान्त करनेका सबसे महान् साधन पृथ्वीका दान ही है । भूमिदानरूप प्रायश्चित्त करके मनुष्य अपने आगे - पीछेकी दस पीढ़ियोंको पवित्र कर देता है ॥ ३७ ॥

पुनाति य इदं वेद वेदवादं तथैव च ।

प्रकृतिः सर्वभूतानां भूमिर्वैश्वानरी मता ॥ ३८ ॥

जो वेदवाणीरूप इस भूमिगाथाको जानता है, वह भी अपनी दस पीढ़ियोंको पवित्र कर देता है । यह पृथ्वी सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्तिस्थान है और अग्नि इसका अधिष्ठाता देवता है ॥ ३८ ॥

अभिषिच्यैव नृपतिं श्रावयेदिममागमम् ।

यथा श्रुत्वा महीं दद्यान्नादद्यात् साधुतश्च ताम् ॥ ३ ९ ॥

राजाको राजसिंहासनपर अभिषिक्त करनेके बाद उसे तत्काल ही पृथ्वीकी गायी हुई यह गाथा सुना देनी चाहिये; जिससे वह भूमिका दान करे और सत्पुरुषोंके हाथसे उन्हें दी हुई भूमि छीन न ले ॥ ३ ९ ॥

सोऽयं कृत्स्नो ब्राह्मणार्थी राजार्थश्चाप्यसंशयः ।

राजा हि धर्मकुशलः प्रथमं भूतिलक्षणम् ॥ ४० ॥

यह सारी कथा ब्राह्मण और क्षत्रियके लिये है । इस विषयमें कोई संदेह नहीं है; क्योंकि राजा धर्ममें कुशल हो, यह प्रजाके ऐश्वर्य ( वैभव) -को सूचित करनेवाला प्रथम लक्षण है ॥ ४० ॥

अथ येषामधर्मज्ञो राजा भवति नास्तिकः ।

न ते सुखं प्रबुध्यन्ति न सुखं प्रस्वपन्ति च ॥ ४१ ॥

सदा भवन्ति चोद्विग्नास्तस्य दुश्चरितैर्नराः ।

योगक्षेमा हि बहवो राष्ट्रं नास्याविशन्ति तत् ॥ ४२ ॥

जिनका राजा धर्मको न जाननेवाला और नास्तिक होता है, वे लोग न तो सुखसे सोते हैं और न सुखसे जागते ही हैं; अपितु उस राजाके दुराचारसे सदैव उद्विग्न रहते है । ऐसे

पृष्ठ 588

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 588 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

राजाके राज्यमें बहुधा योगक्षेम नहीं प्राप्त होते ॥

अथ येषां पुनः प्राज्ञो राजा भवति धार्मिकः ।

सुखं ते प्रतिबुध्यन्ते सुसुखं प्रस्वपन्ति च ॥ ४३ ॥

किंतु जिनका राजा बुद्धिमान् और धार्मिक होता है, वे सुखसे सोते और सुखसे जागते हैं ॥ ४३ ॥

तस्य राज्ञः शुभै राज्यैः कर्मभिर्निर्वृता नराः ।

योगक्षेमेण वृष्ट्या च विवर्धन्ते स्वकर्मभिः ॥ ४४ ॥

उस राजाके शुभ राज्य और शुभ कर्मोंसे प्रजावर्गके लोग संतुष्ट रहते हैं । उस राज्यमें सबके योगक्षेमका निर्वाह होता है, समयपर वर्षा होती है और प्रजा अपने शुभ कर्मोंसे समृद्धिशालिनी होती है ॥ ४४ ॥

स कुलीनः स पुरुषः स बन्धुः स च पुण्यकृत् ।

स दाता स च विक्रान्तो यो ददाति वसुन्धराम् ॥ ४५ ॥

जो पृथ्वीका दान करता है, वही कुलीन, वही पुरुष, वही बन्धु, वही पुण्यात्मा, वही दाता और वही पराक्रमी है ॥ ४५ ॥

आदित्या इव दीप्यन्ते तेजसा भुवि मानवाः ।

ददन्ति वसुधां स्फीतां ये वेदविदुषि द्विजे ॥ ४६ ॥

जो वेदवेत्ता ब्राह्मणको धन- धान्यसे सम्पन्न भूमिदान करते हैं, वे मनुष्य इस पृथ्वीपर अपने तेजसे सूर्यके समान प्रकाशित होते हैं ॥ ४६ ॥

यथा सस्यानि रोहन्ति प्रकीर्णानि महीतले ।

तथा कामाः प्ररोहन्ति भूमिदानसमार्जिताः ॥ ४७ ॥

जैसे भूमिमें बोये हुए बीज खेतीके रूपमें अंकुरित होते और अधिक अन्न पैदा करते हैं, उसी प्रकार भूमिदान करनेसे सम्पूर्ण कामनाएँ सफल होती हैं ॥

आदित्यो वरुणो विष्णुर्ब्रह्मा सोमो हुताशनः ।

शूलपाणिश्च भगवान् प्रतिनन्दन्ति भूमिदम् ॥ ४८ ॥

सूर्य, वरुण, विष्णु, ब्रह्मा, चन्द्रमा, अग्नि और भगवान् शंकर– ये सभी भूमि-दान करनेवाले पुरुषका अभिनन्दन करते हैं ॥ ४८ ॥

भूमौ जायन्ति पुरुषा भूमौ निष्ठां व्रजन्ति च ।

चतुर्विधो हि लोकोऽयं योऽयं भूमिगुणात्मकः ॥ ४ ९ ॥

सब लोग पृथ्वीपर ही जन्म लेते और पृथ्वीमें ही लीन हो जाते हैं । अण्डज, जरायुज, स्वेदज और उद्भिज्ज–इन चारों प्रकारके प्राणियोंका शरीर पृथ्वीका ही कार्य है ॥

एषा माता पिता चैव जगतः पृथिवीपते ।

नानया सदृशं भूतं किंचिदस्ति जनाधिप ॥ ५० ॥

पृष्ठ 589

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 589 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पृथ्वीनाथ! नरेश्वर! यह पृथ्वी ही जगत्की माता और पिता है । इसके समान दूसरा कोई भूत नहीं है ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

बृहस्पतेश्च संवादमिन्द्रस्य च युधिष्ठिर ॥ ५१ ॥

युधिष्ठिर! इस विषयमें विज्ञ पुरुष इन्द्र और बृहस्पतिके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ५१ ॥

इष्ट्वा क्रतुशतेनाथ महता दक्षिणावता ।

मघवा वाग्विदां श्रेष्ठं पप्रच्छेदं बृहस्पतिम् ॥ ५२ ॥

इन्द्रने महान् दक्षिणाओंसे युक्त सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेके पश्चात् वाग्वेत्ताओंमें श्रेष्ठ बृहस्पतिजीसे इस प्रकार पूछा ॥ ५२ ॥

मघवोवाच

भगवन् केन दानेन स्वर्गतः सुखमेधते ।

यदक्षयं महार्घं च तद् ब्रूहि वदतां वर ॥ ५३ ॥

इन्द्र बोले — वक्ताओंमें श्रेष्ठ भगवन्! किस दानके प्रभावसे दाताको स्वर्गसे भी अधिक सुखकी प्राप्ति होती है? जिसका फल अक्षय और अधिक महत्त्वपूर्ण हो, उस दानको ही मुझे बताइये ॥ ५३ ॥

भीष्म उवाच

इत्युक्तः स सुरेन्द्रेण ततो देवपुरोहिताः ।

बृहस्पतिर्बृहत्तेजाः प्रत्युवाच शतक्रतुम् ॥ ५४ ॥

भीष्मजी कहते हैं - भारत! देवराज इन्द्रके ऐसा कहनेपर देवताओंके पुरोहित महातेजस्वी बृहस्पतिने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया ॥ ५४ ॥

बृहस्पतिरुवाच सुवर्णदानं गोदानं भूमिदानं च वृत्रहन् । (विद्यादानं च कन्यानां दानं पापहरं परम् । ) दददेतान् महाप्राज्ञः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५५ ॥

बृहस्पतिने कहा – वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्र! सुवर्णदान, गोदान, भूमिदान, विद्यादान और कन्यादान -ये अत्यन्त पापहारी माने गये हैं । जो परम बुद्धिमान् पुरुष इन सब वस्तुओंका दान करता है वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ५५ ॥

न भूमिदानाद् देवेन्द्र परं किंचिदिति प्रभो ।

विशिष्टमिति मन्यामि यथा प्राहुर्मनीषिणः ॥ ५६ ॥

पृष्ठ 590

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 590 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रभो! देवेन्द्र! जैसा कि मनीषी पुरुष कहते हैं, मैं भूमिदानसे बढ़कर दूसरे किसी दानको नहीं मानता हूँ ॥ ५६ ॥

(ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा राष्ट्रघातेऽथ स्वामिनः । कुलस्त्रीणां परिभवे मृतास्ते भूमिदैः समाः ॥ ) जो ब्राह्मणोंके लिये, गौओंके लिये, राष्ट्रके विनाशके अवसरपर स्वामीके लिये तथा जहाँ कुलांगनाओंका अपमान होता हो, वहाँ उन सबकी रक्षाके लिये युद्धमें प्राण त्याग करते हैं, वे ही भूमिदान करनेवालोंके समान पुण्यके भागी होते हैं ॥

ये शूरा निहता युद्धे स्वर्याता रणगृद्धिनः ।

सर्वे ते विबुधश्रेष्ठ नातिक्रामन्ति भूमिदम् ॥ ५७ ॥

विबुधश्रेष्ठ! मनमें युद्धके लिये उत्साह रखनेवाले जो शूरवीर रणभूमिमें मारे जाकर स्वर्गलोकमें जाते हैं, वे सब- के - सब भूमिदाताका उल्लंघन नहीं कर सकते ॥

भर्तुर्निःश्रेयसे युक्तास्त्यक्तात्मानो रणे हताः ।

ब्रह्मलोकगता मुक्ता नातिक्रामन्ति भूमिदम् ॥ ५८ ॥

स्वामीकी भलाईके लिये उद्यत हो रणभूमिमें मारे जाकर अपने शरीरका परित्याग करनेवाले पुरुष पापोंसे मुक्त हो ब्रह्मलोकमें पहुँच जाते हैं; परंतु वे भी भूमिदातासे आगे नही बढ़ पाते हैं ॥ ५८ ॥

पञ्च पूर्वा हि पुरुषाः षडन्ये वसुधां गताः ।

एकादश ददद्भूमिं परित्रातीह मानवः ॥ ५ ९ ॥

इस जगत्में भूमिदान करनेवाला मनुष्य अपनी पाँच पीढ़ीतकके पूर्वजोंका और अन्य छः पीड़ियोंतक पृथ्वीपर आनेवाली संतानोंका -इस प्रकार कुल ग्यारह पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है ॥ ५ ९ ॥

रत्नोपकीर्णां वसुधां यो ददाति पुरंदर ।

स मुक्तः सर्वकलुषैः स्वर्गलोके महीयते ॥ ६० ॥

पुरंदर! जो रत्नयुक्त पृथ्वीका दान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है ॥ ६० ॥

महीं स्फीतां ददद् राजन् सर्वकामगुणान्विताम् ।

राजाधिराजो भवति तद्धि दानमनुत्तमम् ॥ ६१ ॥

राजन्! धन- धान्यसे सम्पन्न तथा समस्त मनोवांछित गुणोंसे युक्त पृथ्वीका दान करनेवाला पुरुष दूसरे जन्ममें राजाधिराज होता है; क्योंकि वह सर्वोत्तम दान है ॥ ६१ ॥

सर्वकामसमायुक्तां काश्यपीं यः प्रयच्छति ।

सर्वभूतानि मन्यन्ते मां ददातीति वासव ॥ ६२ ॥

इन्द्र! जो सम्पूर्ण भोगोंसे युक्त पृथ्वीका दान करता है, उसे सब प्राणी यही समझते हैं कि यह मेरा दान कर रहा है ॥ ६२ ॥