श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 561–570

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 561–570

पृष्ठ 561

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अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः जलाशय बनानेका तथा बगीचे लगानेका फल युधिष्ठिर उवाच

आरामाणां तडागानां यत् फलं कुरुपुंगव ।

तदहं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तोऽद्य भरतर्षभ ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने कहा– कुरुकुलपुंगव! भरतश्रेष्ठ! बगीचे लगाने और जलाशय बनवानेका जो फल होता है, उसीको अब मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ ॥ भीष्म उवाच

सुप्रदर्शा बलवती चित्रा धातुविभूषिता ।

उपेता सर्वभूतैश्च श्रेष्ठा भूमिरिहोच्यते ॥ २ ॥

भीष्मजी बोले – राजन्! जो देखनेमें सुन्दर हो, जहाँकी मिट्टी प्रबल, अधिक अन्न उपजानेवाली हो, जो विचित्र एवं अनेक धातुओंसे विभूषित हो तथा समस्त प्राणी जहाँ निवास करते हों, वही भूमि यहाँ श्रेष्ठ बतायी जाती है ॥ २ ॥

तस्याः क्षेत्रविशेषाश्च तडागानां च बन्धनम् ।

औदकानि च सर्वाणि प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ॥ ३ ॥

उस भूमिसे सम्बन्ध रखनेवाले विशेष विशेष क्षेत्र, उनमें पोखरोंके निर्माण तथा अन्य सब जलाशय — कूप आदि -इन सबके विषयमें मैं क्रमशः आवश्यक बातें बताऊँगा ॥ ३ ॥

तडागानां च वक्ष्यामि कृतानां चापि ये गुणाः 1 त्रिषु लोकेषु सर्वत्र पूजनीयस्तडागवान् ॥ ४ ॥

पोखरे बनवानेसे जो लाभ होते हैं, उनका भी मैं वर्णन करूँगा । पोखरे बनवानेवाला मनुष्य तीनों लोकोंमें सर्वत्र पूजनीय होता है ॥ ४ ॥

अथवा मित्रसदनं मैत्रं मित्रविवर्धनम् ।

कीर्तिसंजननं श्रेष्ठं तडागानां निवेशनम् ॥ ५ ॥

अथवा पोखरोंका बनवाना मित्रके घरकी भाँति उपकारी, मित्रताका हेतु और मित्रोंकी वृद्धि करनेवाला तथा कीर्तिके विस्तारका सर्वोत्तम साधन है ॥ ५ ॥

धर्मस्यार्थस्य कामस्य फलमाहुर्मनीषिणः ।

तडागसुकृतं देशे क्षेत्रमेकं महाश्रयम् ॥ ६ ॥

मनीषी पुरुष कहते हैं कि देश या गाँवमें एक तालाबका निर्माण धर्म, अर्थ और काम तीनोंका फल देनेवाला है तथा पोखरेसे सुशोभित होनेवाला स्थान समस्त प्राणियोंके लिये

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एक महान् आश्रय है ॥ ॥

चतुर्विधानां भूतानां तडागमुपलक्षयेत् ।

तडागानि च सर्वाणि दिशन्ति श्रियमुत्तमाम् ॥ ७ ॥

तालाबको चारों प्रकारके प्राणियोंके लिये बहुत बड़ा आधार समझना चाहिये । सभी प्रकारके जलाशय उत्तम सम्पत्ति प्रदान करते हैं ॥ ७ ॥

देवा मनुष्यगन्धर्वाः पितरोरगराक्षसाः ।

स्थावराणि च भूतानि संश्रयन्ति जलाशयम् ॥ ८ ॥

देवता, मनुष्य, गन्धर्व, पितर, नाग, राक्षस तथा समस्त स्थावर प्राणी जलाशयका आश्रय लेते हैं ॥ ८ ॥

तस्मात् तांस्ते प्रवक्ष्यामि तडागे ये गुणाः स्मृताः ।

या च तत्र फलावाप्तिर्ऋषिभिः समुदाहृता ॥ ९ ॥

अतः ऋषियोंने तालाब बनवानेसे जिन फलोंकी प्राप्ति बतलायी है तथा तालाबसे जो लाभ होते हैं, उन सबको मैं तुम्हें बताऊँगा ॥ ९ ॥

वर्षाकाले तडागे तु सलिलं यस्य तिष्ठति ।

अग्निहोत्रफलं तस्य फलमाहुर्मनीषिणः ॥ १० ॥

जिसके खोदवाये हुए तालाबमें बरसात भर पानी रहता है, उसके लिये मनीषी पुरुष अग्निहोत्रके फलकी प्राप्ति बताते हैं ॥ १० ॥

शरत्काले तु सलिलं तडागे यस्य तिष्ठति ।

गोसहस्रस्य स प्रेत्य लभते फलमुत्तमम् ॥ ११ ॥

जिसके तालाबमें शरत्कालतक पानी ठहरता है, वह मृत्युके पश्चात् एक हजार गोदानका उत्तम फल पाता है ॥ ११ ॥

हेमन्तकाले सलिलं तडागे यस्य तिष्ठति ।

स वै बहुसुवर्णस्य यज्ञस्य लभते फलम् ॥ १२ ॥

जिसके तालाबमें हेमन्त ( अगहन - पौष) तक पानी रुकता है, वह बहुत - से सुवर्णकी दक्षिणासे युक्त महान् यज्ञके फलका भागी होता है ॥ १२ ॥

यस्य वै शैशिरे काले तडागे सलिलं भवेत् ।

तस्याग्निष्टोमयज्ञस्य फलमाहुर्मनीषिणः ॥ १३ ॥

जिसके जलाशयमें शिशिरकाल ( माघ-फाल्गुन) तक जल रहता है, उसके लिये मनीषी पुरुषोंने अग्निष्टोम नामक यज्ञके फलकी प्राप्ति बतायी है ॥ १३ ॥

तडागं सुकृतं यस्य वसन्ते तु महाश्रयम् ।

अतिरात्रस्य यज्ञस्य फलं स समुपाश्नुते ॥ १४ ॥

जिसका खोदवाया हुआ पोखरा वसन्त ऋतुतक अपने भीतर जल रखनेके कारण प्यासे प्राणियोंके लिये महान् आश्रय बना रहता है, उसे ' अतिरात्र' यज्ञका फल प्राप्त होता

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है ॥ १४ ॥

निदाघकाले पानीयं तडागे यस्य तिष्ठति ।

वाजिमेधफलं तस्य फलं वै मुनयो विदुः ॥ १५ ॥

जिसके तालाबमें ग्रीष्म ऋतुतक पानी रुका रहता है, उसे अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है - ऐसा मुनियोंका मत है ॥ १५ ॥

स कुलं तारयेत् सर्वं यस्य खाते जलाशये ।

गावः पिबन्ति सलिलं साधवश्च नराः सदा ॥ १६ ॥

जिसके खोदवाये हुए जलाशयमें सदा साधु पुरुष और गौएँ पानी पीती हैं, वह अपने समस्त कुलका उद्धार कर देता है ॥ १६ ॥

तडागे यस्य गावस्तु पिबन्ति तृषिता जलम् ।

मृगपक्षिमनुष्याश्च सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥ १७ ॥

जिसके तालाबमें प्यासी गौएँ पानी पीती हैं तथा मृग, पक्षी और मनुष्योंको भी जल सुलभ होता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है ॥ १७ ॥

यत् पिबन्ति जलं तत्र स्नायन्ते विश्रमन्ति च ।

तडागे यस्य तत् सर्वं प्रेत्यानन्त्याय कल्पते ॥ १८ ॥

यदि किसीके तालाबमें लोग स्नान करते, पानी पीते और विश्राम करते हैं तो इन सबका पुण्य उस पुरुषको मरनेके बाद अक्षय सुख प्रदान करता है ॥ १८ ॥

दुर्लभं सलिलं तात विशेषेण परत्र वै ।

पानीयस्य प्रदानेन प्रीतिर्भवति शाश्वती ॥ १ ९ ॥

तात! जल दुर्लभ पदार्थ है । परलोकमें तो उसका मिलना और भी कठिन है । जो जलका दान करते हैं, वे ही वहाँ जलदानके पुण्यसे सदा तृप्त रहते हैं ॥ १ ९ ॥

तिलान् ददत पानीयं दीपान् ददत जाग्रत ।

ज्ञातिभिः सह मोदध्वमेतत् प्रेत्य सुदुर्लभम् ॥ २० ॥

बन्धुओ! तिलका दान करो, जल- दान करो, दीप दान करो, सदा धर्म करनेके लिये सजग रहो तथा कुटुम्बीजनोंके साथ सर्वदा धर्मपालनपूर्वक रहकर आनन्दका अनुभव करो । मृत्युके बाद इन सत्कर्मोंसे परलोकमें अत्यन्त दुर्लभ फलकी प्राप्ति होती है ॥

सर्वदानैर्गुरुतरं सर्वदानैर्विशिष्यते ।

पानीयं नरशार्दूल तस्माद् दातव्यमेव हि ॥ २१ ॥

पुरुषसिंह! जलदान सब दानोंसे महान् और समस्त दानोंसे बढ़कर है; अतः उसका दान अवश्य करना चाहिये ॥ २१ ॥

एवमेतत् तडागस्य कीर्तितं फलमुत्तमम् ।

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वृक्षाणामवरोपणम् ॥ २२ ॥

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इस प्रकार यह मैंने तालाब बनवानेके उत्तम फलका वर्णन किया है । इसके बाद वृक्ष लगानेका माहात्म्य बतलाऊँगा ॥ २२ ॥

स्थावराणां च भूतानां जातयः षट् प्रकीर्तिताः ।

वृक्षगुल्मलतावल्ल्यस्त्वक्सारास्तृणजातयः ॥ २३ ॥

स्थावर भूतोंकी छः जातियाँ बतायी गयी हैं -वृक्ष ( बड़- पीपल आदि), गुल्म ( कुश आदि ), लता ( वृक्षपर फैलनेवाली बेल ), वल्ली (जमीनपर फैलनेवाली बेल ), त्वक्सार ( बाँस आदि ) और तृण ( घास आदि ) ॥ २३ ॥

एता जात्यस्तु वृक्षाणां तेषां रोपे गुणास्त्विमे ।

कीर्तिश्च मानुषे लोके प्रेत्य चैव फलं शुभम् ॥ २४ ॥

ये वृक्षोंकी जातियाँ हैं । अब इनके लगानेसे जो लाभ हैं, वे यहाँ बताये जाते हैं । वृक्ष लगानेवाले मनुष्यकी इस लोकमें कीर्ति बनी रहती है और मरनेके बाद उसे उत्तम शुभ फलकी प्राप्ति होती है ॥ २४ ॥

लभते नाम लोके च पितृभिश्च महीयते ।

देवलोके गतस्यापि नाम तस्य न नश्यति ॥ २५ ॥

संसारमें उसका नाम होता है, परलोकमें पितर उसका सम्मान करते हैं तथा देवलोकमें चले जानेपर भी यहाँ उसका नाम नष्ट नहीं होता ॥ २५ ॥

अतीतानागते चोभे पितृवंशं च भारत ।

तारयेद् वृक्षरोपी च तस्माद् वृक्षांश्च रोपयेत् ॥ २६ ॥

भरतनन्दन! वृक्ष लगानेवाला पुरुष अपने मरे हुए पूर्वजों और भविष्यमें होनेवाली संतानोंका तथा पितृकुलका भी उद्धार कर देता है, इसलिये वृक्षोंको अवश्य लगाना चाहिये ॥ २६ ॥

तस्य पुत्रा भवन्त्येते पादपा नात्र संशयः ।

परलोकगतः स्वर्गं लोकांश्चाप्नोति सोऽव्ययान् ॥ २७ ॥

जो वृक्ष लगाता है, उसके लिये ये वृक्ष पुत्ररूप होते हैं, इसमें संशय नहीं है । उन्हींके कारण परलोकमें जानेपर उसे स्वर्ग तथा अक्षय लोक प्राप्त होते हैं ॥ २७ ॥

पुष्पैः सुरगणान् वृक्षाः फलैश्चापि तथा पितॄन् ।

छायया चातिथिं तात पूजयन्ति महीरुहः ॥ २८ ॥

तात! वृक्षगण अपने फूलोंसे देवताओंकी, फलोंसे पितरोंकी और छायासे अतिथियोंकी पूजा करते हैं ॥ २८ ॥

किन्नरोरगरक्षांसि देवगन्धर्वमानवाः ।

तथा ऋषिगणाश्चैव संश्रयन्ति महीरुहान् ॥ २ ९ ॥

किन्नर, नाग, राक्षस, देवता, गन्धर्व, मनुष्य और ऋषियोंके समुदाय - ये सभी वृक्षोंका आश्रय लेते हैं ॥

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पुष्पिताः फलवन्तश्च तर्पयन्तीह मानवान् ।

वृक्षदं पुत्रवद् वृक्षास्तारयन्ति परत्र तु ॥ ३० ॥

फूले- फले वृक्ष इस जगत् में मनुष्योंको तृप्त करते हैं । जो वृक्षका दान करता है, उसको वे वृक्ष पुत्रकी भाँति परलोकमें तार देते हैं ॥ ३० ॥

तस्मात् तडागे सद्वृक्षा रोप्याः श्रेयोऽर्थिना सदा ।

पुत्रवत् परिपाल्याश्च पुत्रास्ते धर्मतः स्मृताः ॥ ३१ ॥

इसलिये अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको सदा ही उचित है कि वह अपने खोदवाये हुए तालाबके किनारे अच्छे - अच्छे वृक्ष लगाये और उनका पुत्रोंके समान पालन करे; क्योंकि वे वृक्ष धर्मकी दृष्टिसे पुत्र ही माने गये हैं ॥ ३१ ॥

तडागकृद् वृक्षरोपी इष्टयज्ञश्च यो द्विजः ।

एते स्वर्गे महीयन्ते ये चान्ये सत्यवादिनः ॥ ३२ ॥

जो तालाब बनवाता, वृक्ष लगाता, यज्ञोंका अनुष्ठान करता तथा सत्य बोलता है, ये सभी द्विज स्वर्गलोकमें सम्मानित होते हैं ॥ ३२ ॥

तस्मात् तडागं कुर्वीत आरामांश्चैव रोपयेत् ।

यजेच्च विविधैर्यज्ञैः सत्यं च सततं वदेत् ॥ ३३ ॥

इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह तालाब खोदाये, बगीचे लगाये, भाँति- भाँतिके यज्ञोंका अनुष्ठान करे तथा सदा सत्य बोले ॥ ३३ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि आरामतडागवर्णनं नाम अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें बगीचा लगाने और तालाब बनानेका वर्णन नामक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५८ ॥

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एकोनषष्टितमोऽध्यायः भीष्मद्वारा उत्तम दान तथा उत्तम ब्राह्मणोंकी प्रशंसा करते हुए उनके सत्कारका उपदेश युधिष्ठिर उवाच

यानीमानि बहिर्वेद्यां दानानि परिचक्षते ।

तेभ्यो विशिष्टं किं दानं मतं ते कुरुपुंगव ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा – कुरुश्रेष्ठ! वेदीके बाहर जो ये दान बताये जाते हैं, उन सबकी अपेक्षा आपके मतमें कौन दान श्रेष्ठ है? ॥ १ ॥

कौतूहलं हि परमं तत्र मे विद्यते प्रभो ।

दातारं दत्तमन्वेति यद् दानं तत् प्रचक्ष्व मे ॥ २ ॥

प्रभो! इस विषयमें मुझे महान् कौतूहल हो रहा है; अतः जिस दानका पुण्य दाताका अनुसरण करता हो, वह मुझे बताइये ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

अभयं सर्वभूतेभ्यो व्यसने चाप्यनुग्रहः ।

यच्चाभिलषितं दद्यात् तृषितायाभियाचते ॥ ३ ॥

दत्तं मन्येत यद् दत्त्वा तद् दानं श्रेष्ठमुच्यते ।

दत्तं दातारमन्वेति यद् दानं भरतर्षभ ॥ ४ ॥

भीष्मजीने कहा - युधिष्ठिर! सम्पूर्ण प्राणियोंको अभयदान देना, संकटके समय उनपर अनुग्रह करना, याचकको उसकी अभीष्ट वस्तु देना तथा प्याससे पीड़ित होकर पानी माँगनेवालेको पानी पिलाना उत्तम दान है और जिसे देकर दिया हुआ मान लिया जाय अर्थात् जिसमें कहीं भी ममताकी गन्ध न रह जाय, वह दान श्रेष्ठ कहलाता है । भरतश्रेष्ठ! वही दान दाताका अनुसरण करता है ॥

हिरण्यदानं गोदानं पृथिवीदानमेव च ।

एतानि वै पवित्राणि तारयन्त्यपि दुष्कृतम् ॥ ५ ॥

सुवर्णदान, गोदान और भूमिदान - ये तीन पवित्र दान हैं, जो पापीको भी तार देते हैं ॥ ५ ॥

एतानि पुरुषव्याघ्र साधुभ्यो देहि नित्यदा ।

दानानि हि नरं पापान्मोक्षयन्ति न संशयः ॥ ६ ॥

पुरुषसिंह! तुम श्रेष्ठ पुरुषोंको ही सदा उपर्युक्त पवित्र वस्तुओंका दान किया करो । ये दान मनुष्यको पापसे मुक्त कर देते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ६ ॥

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यद् यदिष्टतमं लोके यच्चास्य दयितं गृहे ।

तत् तद् गुणवते देयं तदेवाक्षयमिच्छता ॥ ७ ॥

संसारमें जो -जो पदार्थ अत्यन्त प्रिय माना जाता है तथा अपने घरमें भी जो प्रिय वस्तु मौजूद हो, वही वही वस्तु गुणवान् पुरुषको देनी चाहिये । जो अपने दानको अक्षय बनाना चाहता हो, उसके लिये ऐसा करना आवश्यक है ॥ ७ ॥

प्रियाणि लभते नित्यं प्रियदः प्रियकृत् तथा ।

प्रियो भवति भूतानामिह चैव परत्र च ॥ ८ ॥

जो दूसरोंको प्रिय वस्तुका दान देता है और उनका प्रिय कार्य ही करता है, वह सदा प्रिय वस्तुओंको ही पाता है तथा इहलोक और परलोकमें भी वह समस्त प्राणियोंका प्रिय होता है ॥ ८ ॥

याचमानमभीमानादनासक्तमकिंचनम् ।

यो नार्चति यथाशक्ति स नृशंसो युधिष्ठिर ॥ ९ ॥

युधिष्ठिर! जो आसक्तिरहित अकिंचन याचकका अहंकारवश अपनी शक्तिके अनुसार सत्कार नहीं करता है, वह मनुष्य निर्दयी है ॥ ९ ॥

अमित्रमपि चेद् दीनं शरणैषिणमागतम् ।

व्यसने योऽनुगृह्णाति स वै पुरुषसत्तमः ॥ १० ॥

शत्रु भी यदि दीन होकर शरण पानेकी इच्छासे घरपर आ जाय तो संकटके समय जो उसपर दया करता है, वही मनुष्योंमें श्रेष्ठ है ॥ १० ॥

कृशाय कृतविद्याय वृत्तिक्षीणाय सीदते ।

अपहन्यात् क्षुधां यस्तु न तेन पुरुषः समः ॥ ११ ॥

विद्वान् होनेपर भी जिसकी आजीविका क्षीण हो गयी है तथा जो दीन, दुर्बल और दुखी है, ऐसे मनुष्यकी जो भूख मिटा देता है उस पुरुषके समान पुण्यात्मा कोई नहीं है ॥ ११ ॥

क्रियानियमितान् साधुन् पुत्रदारैश्च कर्शितान् ।

अयाचमानान् कौन्तेय सर्वोपायैर्निमन्त्रयेत् ॥ १२ ॥

कुन्तीनन्दन! जो स्त्री- पुत्रोंके पालनमें असमर्थ होनेके कारण विशेष कष्ट उठाते हैं; परंतु किसीसे याचना नहीं करते और सदा सत्कर्मोंमें ही संलग्न रहते हैं, उन श्रेष्ठ पुरुषोंको प्रत्येक उपायसे सहायता देनेके लिये निमन्त्रित करना चाहिये ॥ १२ ॥

आशिषं ये न देवेषु न च मर्त्येषु कुर्वते ।

अर्हन्तो नित्यसंतुष्टास्तथा लब्धोपजीविनः ॥ १३ ॥

आशीविषसमेभ्यश्च तेभ्यो रक्षस्व भारत ।

तान् युक्तैरुपजिज्ञास्यस्तथा द्विजवरोत्तमान् ॥ १४ ॥

कृतैरावसथैर्नित्यं संप्रेष्यैः सपरिच्छदैः ।

पृष्ठ 568

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निमन्त्रयेथाः कौरव्य सर्वकामसुखावहैः ॥ १५ ॥

युधिष्ठिर! जो देवताओं और मनुष्योंसे किसी वस्तुकी कामना नहीं करते, सदा संतुष्ट रहते और जो कुछ मिल जाय, उसीपर निर्वाह करते हैं, ऐसे पूज्य द्विजवरोंका दूतोंद्वारा पता लगाओ और उन्हें निमन्त्रित करो । भारत! वे दुखी होनेपर विषधर सर्पके समान भयंकर हो जाते हैं; अतः उनसे अपनी रक्षा करो । कुरुनन्दन! सेवकों और आवश्यक सामग्रियोंसे युक्त तथा सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेके कारण सुखद गृह निवेदन करके उनका नित्यप्रति पूर्ण सत्कार करो ॥ १३–१५ ॥

यदि ते प्रतिगृह्णीयुः श्रद्धापूतं युधिष्ठिर ।

कार्यमित्येव मन्वाना धार्मिकाः पुण्यकर्मिणः ॥ १६ ॥

युधिष्ठिर! यदि तुम्हारा दान श्रद्धासे पवित्र और कर्तव्य- बुद्धिसे ही किया हुआ होगा तो पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले वे धर्मात्मा पुरुष उसे उत्तम मानकर स्वीकार कर लेंगे ॥ १६ ॥

विद्यास्नाता व्रतस्नाता ये व्यपाश्रित्य जीविनः ।

गूढस्वाध्यायतपसो ब्राह्मणाः संशितव्रताः ॥ १७ ॥

तेषु शुद्धेषु दान्तेषु स्वदारपरितोषिषु ।

यत् करिष्यसि कल्याणं तत् ते लोके युधाम्पते ॥ १८ ॥

युद्धविजयी युधिष्ठिर! विद्वान्, व्रतका पालन करनेवाले, किसी धनीका आश्रय लिये बिना ही जीवन निर्वाह करनेवाले, अपने स्वाध्याय और तपको गुप्त रखनेवाले तथा कठोर व्रतके पालनमें तत्पर जो ब्राह्मण हैं, जो शुद्ध, जितेन्द्रिय तथा अपनी ही स्त्रीसे संतुष्ट रहनेवाले हैं, उनके लिये तुम जो कुछ करोगे वह जगत्‌में तुम्हारे लिये कल्याणकारी होगा ॥ १७-१८ ॥

यथाग्निहोत्रं सुहुतं सायंप्रातर्द्विजातिना ।

तथा दत्तं द्विजातिभ्यो भवत्यथ यतात्मसु ॥ १ ९ ॥

द्विजके द्वारा सायं और प्रातःकाल विधिपूर्वक किया हुआ अग्निहोत्र जो फल प्रदान करता है, वही फल संयमी ब्राह्मणोंको दान देनेसे मिलता है ॥ १ ९ ॥

एष ते विततो यज्ञः श्रद्धापूतः सदक्षिणः ।

विशिष्टः सर्वयज्ञेभ्यो ददतस्तात वर्तताम् ॥ २० ॥

तात! तुम्हारे द्वारा किया जानेवाला विशाल दान - यज्ञ श्रद्धासे पवित्र एवं दक्षिणासे युक्त

है । वह सब यज्ञोंसे बढ़कर है । तुझ दाताका वह यज्ञ सदा चालू रहे ॥ २० ॥

निवापदानसलिलस्तादृशेषु युधिष्ठिर ।

निवसन् पूजयंश्चैव तेष्वानृण्यं नियच्छति ॥ २१ ॥

युधिष्ठिर! पूर्वोक्त ब्राह्मणोंको पितरोंके लिये किये जानेवाले तर्पणकी भाँति दानरूपी जलसे तृप्त करके उन्हें निवास और आदर देते रहो । ऐसा करनेवाला पुरुष देवता आदिके

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ऋणसे मुक्त हो जाता है ॥ २१ ॥

य एवं नैव कुप्यन्ते न लुभ्यन्ति तृणेष्वपि ।

त एव नः पूज्यतमा ये चापि प्रियवादिनः ॥ २२ ॥

जो ब्राह्मण कभी क्रोध नहीं करते, जिनके मनमें एक तिनके भरका लोभ नहीं होता तथा जो प्रिय वचन बोलनेवाले हैं, वे ही हमलोगोंके परम पूज्य हैं ॥ २२ ॥

एते न बहु मन्यन्ते न प्रवर्तन्ति चापरे ।

पुत्रवत् परिपाल्यास्ते नमस्तेभ्यस्तथाभयम् ॥ २३ ॥

उपर्युक्त ब्राह्मण निःस्पृह होनेके कारण दाताके प्रति विशेष आदर नहीं प्रकट करते । इनमेंसे तो कितने ही धनोपार्जनके कार्यमें तो प्रवृत्त ही नहीं होते हैं । ऐसे ब्राह्मणोंका पुत्रवत् पालन करना चाहिये । उन्हें बारंबार नमस्कार है । उनकी ओरसे हमें कोई भय न हो ॥ २३ ॥

ऋत्विक्पुरोहिताचार्या मृदुब्रह्मधरा हि ते ।

क्षात्रेणापि हि संसृष्टं तेजः शाम्यति वै द्विजे ॥ २४ ॥

ऋत्विक्, पुरोहित और आचार्य - ये प्रायः कोमल स्वभाववाले और वेदोंको धारण करनेवाले होते हैं । क्षत्रियका तेज ब्राह्मणके पास जाते ही शान्त हो जाता है ॥ २४ ॥

अस्ति मे बलवानस्मि राजास्मीति युधिष्ठिर ।

ब्राह्मणान् मा च पर्यश्रीर्वासोभिरशनेन च ॥ २५ ॥

युधिष्ठिर! ‘ मेरे पास धन है, मैं बलवान् हूँ और राजा हूँ' ऐसा समझते हुए तुम ब्राह्मणोंकी उपेक्षा करके स्वयं ही अन्न और वस्त्रका उपभोग न करना ॥ २५ ॥

यच्छोभार्थं बलार्थं वा वित्तमस्ति तवानघ ।

तेन ते ब्राह्मणाः पूज्याः स्वधर्ममनुतिष्ठता ॥ २६ ॥

अनघ! तुम्हारे पास शरीर और घरकी शोभा बढ़ाने अथवा बलकी वृद्धि करनेके लिये जो धन है, उनके द्वारा स्वधर्मका अनुष्ठान करते हुए तुम्हें ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये ॥ २६ ॥

नमस्कार्यास्तथा विप्रा वर्तमाना यथातथम् ।

यथासुखं यथोत्साहं ललन्तु त्वयि पुत्रवत् ॥ २७ ॥

इतना ही नहीं, तुम्हें उन ब्राह्मणोंको सदा नमस्कार करना चाहिये । वे अपनी रुचिके अनुसार जैसे चाहें रहें । तुम्हारे पास पुत्रकी भाँति उन्हें स्नेह प्राप्त होना चाहिये तथा वे सुख और उत्साहके साथ आनन्दपूर्वक रहें, ऐसी चेष्टा करनी चाहिये ॥ २७ ॥

को ह्यक्षयप्रसादानां सुहृदामल्पतोषिणाम् ।

वृत्तिमर्हत्यवक्षेप्तुं त्वदन्यः कुरुसत्तम ॥ २८ ॥

कुरुश्रेष्ठ! जिनकी कृपा अक्षय है, जो अकारण ही सबका हित करनेवाले और थोड़ेमें ही संतुष्ट रहनेवाले हैं, उन ब्राह्मणोंको तुम्हारे सिवा दूसरा कौन जीविका दे सकता

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महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 570 का मूल पृष्ठ
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है ॥ २८ ॥

यथा पत्याश्रयो धर्मः स्त्रीणां लोके सनातनः ।

सदैव सा गतिर्नान्या तथास्माकं द्विजातयः ॥ २ ९ ॥

जैसे इस संसारमें स्त्रियोंका सनातन धर्म सदा पतिकी सेवापर ही अवलम्बित है, उसी प्रकार ब्राह्मण ही सदैव हमारे आश्रय हैं । हमलोगोंके लिये उनके सिवा दूसरा कोई सहारा नहीं है ॥ २ ९ ॥

यदि नो ब्राह्मणास्तात संत्यजेयुरपूजिताः ।

पश्यन्तो दारुणं कर्म सततं क्षत्रिये स्थितम् ॥ ३० ॥

अवेदानामयज्ञानामलोकानामवर्तिनाम् ।

कस्तेषां जीवितेनार्थस्त्वां विना ब्राह्मणाश्रयम् ॥ ३१ ॥

तात! यदि ब्राह्मण क्षत्रियोंके द्वारा सम्मानित न हों तथा क्षत्रियमें सदा रहनेवाले निष्ठुर कर्मको देखकर ब्राह्मण भी उनका परित्याग कर दें तो वे क्षत्रिय वेद, यज्ञ, उत्तम लोक और आजीविकासे भी भ्रष्ट हो जायँ । उस दशामें ब्राह्मणोंका आश्रय लेनेवाले तुम्हारे सिवा उन दूसरे क्षत्रियोंके जीवित रहनेका क्या प्रयोजन है? ॥

अत्र ते वर्तयिष्यामि यथा धर्मं सनातनम् ।

राजन्यो ब्राह्मणान् राजन् पुरा परिचचार ह ॥ ३२ ॥

वैश्यो राजन्यमित्येव शूद्रो वैश्यमिति श्रुतिः । राजन्! अब मैं तुम्हें सनातन कालका धार्मिक व्यवहार कैसा है, यह बताऊँगा । हमने सुना है पूर्वकालमें क्षत्रिय ब्राह्मणोंकी, वैश्य क्षत्रियोंकी और शूद्र वैश्योंकी सेवा किया करते थे ॥ ३२ ॥

दूराच्छूद्रेणोपचर्यो ब्राह्मणोऽग्निरिव ज्वलन् ॥ ३३ ॥

संस्पर्शपरिचर्यस्तु वैश्येन क्षत्रियेण च ।

ब्राह्मण अग्निके समान तेजस्वी हैं; अतः शूद्रको दूरसे ही उनकी सेवा करनी चाहिये ।

उनके शरीरके स्पर्शपूर्वक सेवा करनेका अधिकार केवल क्षत्रिय और वैश्यको ही है ॥ ३३

|| मृदुभावान् सत्यशीलान् सत्यधर्मानुपालकान् ॥ ३४ ॥

आशीविषानिव क्रुद्धांस्तानुपाचरत द्विजान् । ब्राह्मण स्वभावतः कोमल, सत्यवादी और सत्य धर्मका पालन करनेवाले होते हैं, परंतु जब वे कुपित होते हैं तब विषैले सर्पके समान भयंकर हो जाते हैं । अतः तुम सदा ब्राह्मणोंकी सेवा करते रहो ॥ ३४ ॥

अपरेषां परेषां च परेभ्यश्चापि ये परे ॥ ३५ ॥

क्षत्रियाणां प्रतपतां तेजसा च बलेन च ।

ब्राह्मणेष्वेव शाम्यन्ति तेजांसि च तपांसि च ॥ ३६ ॥