06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 621–630
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 621–630
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न स दुर्गाण्यवाप्नोतीत्येवमाह पराशरः ॥ ६० ॥
पराशर मुनिका कथन है कि ' जो मनुष्य सदा एकाग्रचित्त होकर याचकको तत्काल अन्नका दान करता है, उसपर कभी दुर्गम संकट नहीं पड़ता' ॥ ६० ॥
अर्चयित्वा यथान्यायं देवेभ्योऽन्नं निवेदयेत् ।
यदन्ना हि नरा राजंस्तदन्नास्तस्य देवताः ॥ ६१ ॥
राजन्! मनुष्यको प्रतिदिन शास्त्रोक्त विधिसे देवताओंकी पूजा करके उन्हें अन्न निवेदन करना चाहिये । जो पुरुष जिस अन्नका भोजन करता है, उसके देवता भी वही अन्न ग्रहण करते हैं ॥ ६१ ॥
कौमुदे शुक्लपक्षे तु योऽन्नदानं करोत्युत ।
स संतरति दुर्गाणि प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते ॥ ६२ ॥
जो कार्तिक मासके शुक्लपक्षमें अन्नका दान करता है, वह दुर्गम संकटसे पार हो जाता है और मरकर अक्षय सुखका भागी होता है ॥ ६२ ॥
अभुक्त्वातिथये चान्नं प्रयच्छेद् यः समाहितः ।
स वै ब्रह्मविदां लोकान् प्राप्नुयाद् भरतर्षभ ॥ ६३ ॥
भरतश्रेष्ठ! जो पुरुष एकाग्रचित्त हो स्वयं भूखा रहकर अतिथिको अन्नदान करता है, वह ब्रह्मवेत्ताओंके लोकोंमें जाता है ॥ ६३ ॥
सुकृच्छ्रामापदं प्राप्तश्चान्नदः पुरुषस्तरेत् ।
पापं तरति चैवेह दुष्कृतं चापकर्षति ॥ ६४ ॥
अन्नदाता मनुष्य कठिन से कठिन आपत्तिमें पड़नेपर भी उस आपत्तिसे पार हो जाता है । वह पापसे उद्धार पा जाता है और भविष्यमें होनेवाले दुष्कर्मोंका भी नाश कर देता है ॥ ६४ ॥
इत्येतदन्नदानस्य तिलदानस्य चैव ह ।
भूमिदानस्य च फलं गोदानस्य च कीर्तितम् ॥ ६५ ॥
इस प्रकार मैंने यह अन्नदान, तिलदान, भूमिदान और गोदानका फल बताया है ॥ ६५ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल ६५३ श्लोक हैं)
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सप्तषष्टितमोऽध्यायः अन्न और जलके दानकी महिमा युधिष्ठिरउवाच
श्रुतं दानफलं तात यत् त्वया परिकीर्तितम् ।
अन्नदानं विशेषेण प्रशस्तमिह भारत ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — तात! भरतनन्दन! आपने जो दानोंका फल बताया है, उसे मैंने सुन लिया । यहाँ अन्नदानकी विशेषरूपसे प्रशंसा की गयी है ॥ १ ॥
पानीयदानमेवैतत् कथं चेह महाफलम् ।
इत्येतच्छ्रोतुमिच्छामि विस्तरेण पितामह ॥ २ ॥
पितामह! अब जलदान करनेसे कैसे महान् फलकी प्राप्ति होती है, इस विषयको मैं विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
हन्त ते वर्तयिष्यामि यथावद् भरतर्षभ ।
गदतस्तन्ममाद्येह शृणु सत्यपराक्रम ॥ ३ ॥
भीष्मजी कहते हैं - सत्यपराक्रमी भरतश्रेष्ठ! मैं तुम्हें सब कुछ यथार्थ रूपसे बताऊँगा । तुम आज यहाँ मेरे मुँहसे इन सब बातोंको सुनो ॥ ३ ॥
पानीयदानात् प्रभृति सर्वं वक्ष्यामि तेऽनघ ।
यदन्नं यच्च पानीयं सम्प्रदायाश्नुते नरः ॥ ४ ॥
अनघ! जलदानसे लेकर सब प्रकारके दानोंका फल मैं तुम्हें बताऊँगा । मनुष्य अन्न और जलका दान करके जिस फलको पाता है, वह सुनो ॥ ४ ॥
न तस्मात् परमं दानं किंचिदस्तीति मे मनः ।
अन्नात् प्राणभृतस्तात प्रवर्तन्ते हि सर्वशः ॥ ५ ॥
तात! मेरे मनमें यह धारणा है कि अन्न और जलके दानसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है; क्योंकि अन्नसे ही सब प्राणी उत्पन्न होते और जीवन धारण करते हैं ॥ ५ ॥
तस्मादन्नं परं लोके सर्वलोकेषु कथ्यते ।
अन्नाद् बलं च तेजश्च प्राणिनां वर्धते सदा ॥ ६ ॥
अन्नदानमतस्तस्माच्छ्रेष्ठमाह प्रजापतिः । इसलिये लोकमें तथा सम्पूर्ण मनुष्योंमें अन्नको ही सबसे उत्तम बताया गया है । अन्नसे ही सदा प्राणियोंके तेज और बलकी वृद्धि होती है; अतः प्रजापतिने अन्नके दानको ही सर्वश्रेष्ठ बतलाया है ॥ ६१ ॥
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सावित्र्या ह्यपि कौन्तेय श्रुतं ते वचनं शुभम् ॥ ७ ॥
यतश्च यद् यथा चैव देवसत्रे महामते । कुन्तीनन्दन! तुमने सावित्रीके शुभ वचनको भी सुना है । महामते देवताओंके यज्ञमें जिस हेतुसे और जिस प्रकार जो वचन सावित्रीने कहा था, वह इस प्रकार है - ॥ ७३ ॥
अन्ने दत्ते नरेणेह प्राणा दत्ता भवन्त्युत ॥ ८ ॥
प्राणदानाद्धि परमं न दानमिह विद्यते ।
श्रुतं हि ते महाबाहो लोमशस्यापि तद्वचः ॥ ९ ॥
‘ जिस मनुष्यने यहाँ किसीको अन्न दिया है, उसने मानो प्राण दे दिये और प्राणदानसे बढ़कर इस संसारमें दूसरा कोई दान नहीं है। ' महाबाहो! इस विषयमें तुमने लोमशका भी वह वचन सुना ही है ॥ ८ - ९ ॥
प्राणान् दत्त्वा कपोताय यत् प्राप्तं शिबिना पुरा ।
तां गतिं लभते दत्त्वा द्विजस्यान्नं विशाम्पते ॥ १० ॥
प्रजानाथ! पूर्वकालमें राजा शिबिने कबूतरके लिये प्राणदान देकर जो उत्तम गति प्राप्त की थी, ब्राह्मणको अन्न देकर दाता उसी गतिको प्राप्त कर लेता है ॥ १० ॥
तस्माद् विशिष्टां गच्छन्ति प्राणदा इति नः श्रुतम् ।
अन्नं वापि प्रभवति पानीयात् कुरुसत्तम ।
नीरजातेन हि विना न किंचित् सम्प्रवर्तते ॥ ११ ॥
कुरुश्रेष्ठ! अतः प्राणदान करनेवाले पुरुष श्रेष्ठ गतिको प्राप्त होते हैं - ऐसा हमने सुना है । किंतु अन्न भी जलसे ही पैदा होता है। जलराशिसे उत्पन्न हुए धान्यके बिना कुछ भी नहीं हो सकता ॥ ११ ॥
नीरजातश्च भगवान् सोमो ग्रहगणेश्वरः ।
अमृतं च सुधा चैव स्वाहा चैव स्वधा तथा ॥ १२ ॥
अन्नौषध्यो महाराज वीरुधश्च जलोद्भवाः ।
यतः प्राणभृतां प्राणाः सम्भवन्ति विशाम्पते ॥ १३ ॥
महाराज! ग्रहोंके अधिपति भगवान् सोम जलसे ही प्रकट हुए हैं । प्रजानाथ! अमृत, सुधा, स्वाहा, स्वधा, अन्न, ओषधि, तृण और लताएँ भी जलसे उत्पन्न हुई हैं, जिनसे समस्त प्राणियोंके प्राण प्रकट एवं पुष्ट होते हैं ॥ १२-१३ ॥
देवानाममृतं ह्यन्नं नागानां च सुधा तथा ।
पितॄणां च स्वधा प्रोक्ता पशूनां चापि वीरुधः ॥ १४ ॥
देवताओंका अन्न अमृत, नागोंका अन्न सुधा, पितरोंका अन्न स्वधा और पशुओंका अन्न तृण- लता आदि है ॥ १४ ॥
अन्नमेव मनुष्याणां प्राणानाहुर्मनीषिणः ।
तच्च सर्वं नरव्याघ्र पानीयात् सम्प्रवर्तते ॥ १५ ॥
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तस्मात् पानीयदानाद् वै न परं विद्यते क्वचित् । मनीषी पुरुषोंने अन्नको ही मनुष्योंका प्राण बताया है । पुरुषसिंह! सब प्रकारका अन्न ( खाद्य पदार्थ ) जलसे ही उत्पन्न होता है; अतः जलदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान कहीं नहीं है ॥ १५३ ॥
तच्च दद्यान्नरो नित्यं यदीच्छेद् भूतिमात्मनः ॥ १६ ॥
धन्यं यशस्यमायुष्यं जलदानमिहोच्यते ।
शत्रूंश्चाप्यधि कौन्तेय सदा तिष्ठति तोयदः ॥ १७ ॥
जो मनुष्य अपना कल्याण चाहता है, उसे प्रतिदिन जलदान करना चाहिये । जलदान इस जगत्में धन, यश और आयुकी वृद्धि करनेवाला बताया जाता है । कुन्तीनन्दन! जलदान करनेवाला पुरुष सदा अपने शत्रुओंसे भी ऊपर रहता है ॥ १६-१७ ॥
सर्वकामानवाप्नोति कीर्तिं चैव हि शाश्वतीम् ।
प्रेत्य चानन्त्यमश्नाति पापेभ्यश्च प्रमुच्यते ॥ १८ ॥
वह इस जगत्में सम्पूर्ण कामनाओं तथा अक्षय कीर्तिको प्राप्त करता है और सम्पूर्ण
पापोंसे मुक्त हो जाता है । मृत्युके पश्चात् वह अक्षय सुखका भागी होता है ॥
तोयदो मनुजव्याघ्र स्वर्गं गत्वा महाद्युते ।
अक्षयान् समवाप्नोति लोकानित्यब्रवीन्मनुः ॥ १ ९ ॥
महातेजस्वी पुरुषसिंह! जलदान करनेवाला पुरुष स्वर्गमें जाकर वहाँके अक्षय लोकोंपर अधिकार प्राप्त करता है - ऐसा मनुने कहा है ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पानीयदानमाहात्म्ये सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें जलदानका माहात्म्यविषयक सरसठवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ६७ ॥
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अष्टषष्टितमोऽध्यायः तिल, जल, दीप तथा रत्न आदिके दानका माहात्म्य- धर्मराज और ब्राह्मणका संवाद युधिष्ठिर उवाच
तिलानां कीदृशं दानमथ दीपस्य चैव हि ।
अन्नानां वाससां चैव भूय एव ब्रवीहि मे ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! तिलोंके दानका कैसा फल होता है? दीप, अन्न और वस्त्रके दानकी महिमाका भी पुनः मुझसे वर्णन कीजिये ॥ १ ॥
भीष्मउवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
ब्राह्मणस्य च संवादं यमस्य च युधिष्ठिर ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा - युधिष्ठिर! इस विषयमें ब्राह्मण और यमके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २ ॥
मध्यदेशे महान् ग्रामो ब्राह्मणानां बभूव ह ।
गंगायमुनयोर्मध्ये यामुनस्य गिरेरधः ॥ ३ ॥
पर्णशालेति विख्यातो रमणीयो नराधिप ।
विद्वांसस्तत्र भूयिष्ठा ब्राह्मणाश्चावसंस्तथा ॥ ४ ॥
नरेश्वर! मध्यदेशमें गंगा- यमुनाके मध्यभागमें यामुन पर्वतके निम्न स्थलमें ब्राह्मणोंका एक विशाल एवं रमणीय ग्राम था जो लोगोंमें पर्णशालानामसे विख्यात था । वहाँ बहुत - से विद्वान् ब्राह्मण निवास करते थे ॥ ३-४ ॥
अथ प्राह यमः कंचित् पुरुषं कृष्णवाससम् ।
रक्ताक्षमूर्ध्वरोमाणं काकजंघाक्षिनासिकम् ॥ ५ ॥
एक दिन यमराजने काला वस्त्र धारण करनेवाले अपने एक दूतसे, जिसकी आँखें लाल, रोएँ ऊपरको उठे हुए और पैरोंकी पिण्डली, आँख एवं नाक कौएके समान थीं, कहा
– ॥५ ॥ गच्छ त्वं ब्राह्मणग्रामं ततो गत्वा तमानय ।
अगस्त्यं गोत्रतश्चापि नामतश्चापि शर्मिणम् ॥ ६ ॥
शमे निविष्टं विद्वांसमध्यापकमनावृतम् । ‘ तुम ब्राह्मणोंके उस ग्राममें चले जाओ और जाकर अगस्त्यगोत्री शर्मी नामक शमपरायण विद्वान् अध्यापक ब्राह्मणको, जो आवरणरहित है, यहाँ ले आओ ॥ ६३ ॥
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मा चान्यमानयेथास्त्वं सगोत्रं तस्य पार्श्वतः ॥ ७ ॥
स हि तादृग्गुणस्तेन तुल्योऽध्ययनजन्मना ।
अपत्येषु तथा वृत्ते समस्तेनैव धीमता ॥ ८ ॥
‘ उसी गाँवमें उसीके समान एक दूसरा ब्राह्मण भी रहता है । वह शर्मीके ही गोत्रका है । उसके अगल - बगलमें ही निवास करता है । गुण, वेदाध्ययन और कुलमें भी वह शर्मीके ही समान है । सन्तानोंकी संख्या तथा सदाचारके पालनमें भी वह बुद्धिमान् शर्मीके ही तुल्य है । तुम उसे यहाँ न ले आना ॥ ७-८ ॥
तमानय यथोद्दिष्टं पूजा कार्या हि तस्य वै ।
स गत्वा प्रतिकूलं तच्चकार यमशासनम् ॥ ९ ॥
‘ मैंने जिसे बताया है, उसी ब्राह्मणको तुम यहाँ ले आओ; क्योंकि मुझे उसकी पूजा करनी है । ' उस यमदूतने वहाँ जाकर यमराजकी आज्ञाके विपरीत कार्य किया ॥ ९ ॥
तमाक्रम्यानयामास प्रतिषिद्धो यमेन यः ।
तस्मै यमः समुत्थाय पूजां कृत्वा च वीर्यवान् ॥ १० ॥
प्रोवाच नीयतामेष सोऽन्य आनीयतामिति । वह आक्रमण करके उसी ब्राह्मणको उठा लाया, जिसके लिये यमराजने मना कर दिया था । शक्तिशाली यमराजने उठकर उसके लाये हुए ब्राह्मणकी पूजा की और दूतसे कहा —' इसको तुम ले जाओ और दूसरेको यहाँ ले आओ ' ॥ १०३ ॥
एवमुक्ते तु वचने धर्मराजेन स द्विजः ॥ ११ ॥
उवाच धर्मराजानं निर्विण्णोऽध्ययनेन वै ।
यो मे कालो भवेच्छेषस्तं वसेयमिहाच्युत ॥ १२ ॥
धर्मराजके इस प्रकार आदेश देनेपर अध्ययनसे ऊबे हुए उस समागत ब्राह्मणने उनसे कहा– ' धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले देव! मेरे जीवनका जो समय शेष रह गया है, उसमें मैं यहीं रहूँगा' ॥ ११-१२ ॥ यम उवाच
नाहं कालस्य विहितं प्राप्नोमीह कथंचन ।
यो हि धर्मं चरति वै तं तुतु जानामि केवलम् ॥ १३ ॥
यमराजने कहा — ब्रह्मन्! मैं कालके विधानको किसी तरह नहीं जानता । जगत्में जो पुरुष धर्माचरण करता है, केवल उसीको मैं जानता हूँ ॥ १३ ॥
गच्छ विप्र त्वमद्यैव आलयं स्वं महाद्युते ।
ब्रूहि सर्वं यथा स्वैरं करवाणि किमच्युत ॥ १४ ॥
धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले महातेजस्वी ब्राह्मण! तुम अभी अपने घरको चले जाओ
और अपनी इच्छाके अनुसार सब कुछ बताओ । मैं तुम्हारे लिये क्या करूँ? ॥ १४ ॥
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ब्राह्मणउवाच
यत् तत्र कृत्वा सुमहत् पुण्यं स्यात् तद् ब्रवीहि मे ।
सर्वस्य हि प्रमाणं त्वं त्रैलोक्यस्यापि सत्तम ॥ १५ ॥
ब्राह्मणने कहा – साधुशिरोमणे! संसारमें जो कर्म करनेसे महान् पुण्य होता हो वह मुझे बताइये; क्योंकि समस्त त्रिलोकीके लिये धर्मके विषयमें आप ही प्रमाण हैं ॥ १५ ॥
यम उवाच
शृणु तत्त्वेन विप्रर्षे प्रदानविधिमुत्तमम् ।
तिलाः परमकं दानं पुण्यं चैवेह शाश्वतम् ॥ १६ ॥
यमने कहा- ब्रह्मर्षे! तुम यथार्थरूपसे दानकी उत्तम विधि सुनो । तिलका दान सब दानोंमें उत्तम है । वह यहाँ अक्षय पुण्यजनक माना गया है ॥ १६ ॥
तिलाश्च सम्प्रदातव्या यथाशक्ति द्विजर्षभ ।
नित्यदानात् सर्वकामांस्तिला निर्वर्तयन्त्युत ॥ १७ ॥
द्विजश्रेष्ठ! अपनी शक्तिके अनुसार तिलोंका दान अवश्य करना चाहिये । नित्यदान करनेसे तिल दाताकी सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण कर देते हैं ॥ १७ ॥
तिलान् श्राद्धे प्रशंसन्ति दानमेतद्ध्यनुत्तमम् ।
तान् प्रयच्छस्व विप्रेभ्यो विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ १८ ॥
श्राद्धमें विद्वान् पुरुष तिलोंकी प्रशंसा करते हैं । यह तिलदान सबसे उत्तम दान है । अतः तुम शास्त्रीय विधिके अनुसार ब्राह्मणोंको तिलदान देते रहो ॥ १८ ॥
वैशाख्यां पौर्णमास्यां तु तिलान् दद्याद् द्विजातिषु ।
तिला भक्षयितव्याश्च सदा त्वालम्भनं च तैः ॥ १ ९ ॥
वैशाखकी पूर्णिमाको ब्राह्मणोंके लिये तिलदान दे, तिल खाये और सदा तिलोंका ही उबटन लगाये ॥ १ ९ ॥
कार्यं सततमिच्छद्भिः श्रेयः सर्वात्मना गृहे ।
तथाऽऽपः सर्वदा देयाः पेयाश्चैव न संशयः ॥ २० ॥
जो सदा कल्याणकी इच्छा रखते हैं, उन्हें सब प्रकारसे अपने घरमें तिलोंका दान और उपयोग करना चाहिये । इसी प्रकार सर्वदा जलका दान और पान करना चाहिये - इसमें संशय नहीं है ॥ २० ॥
पुष्करिण्यस्तडागानि कूपांश्चैवात्र खानयेत् ।
एतत् सुदुर्लभतरमिहलोके द्विजोत्तम ॥ २१ ॥
द्विजश्रेष्ठ! मनुष्यको यहाँ पोखरी, तालाब और कुएँ खुदवाने चाहिये । यह इस संसारमें अत्यन्त दुर्लभ — पुण्य कार्य है ॥ २१ ॥
आपो नित्यं प्रदेयास्ते पुण्यं ह्येतदनुत्तमम् ।
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प्रपाश्च कार्या दानार्थं नित्यं ते द्विजसत्तम ।
भुक्तेऽप्यन्नं प्रदेयं तु पानीयं वै विशेषतः ॥ २२ ॥
विप्रवर! तुम्हें प्रतिदिन जलका दान करना चाहिये । जल देनेके लिये प्याऊ लगाने चाहिये । यह सर्वोत्तम पुण्य कार्य है । ( भूखेको अन्न देना तो आवश्यक है ही, ) जो भोजन कर चुका हो उसे भी अन्न देना चाहिये । विशेषतः जलका दान तो सभीके लिये आवश्यक है ॥ २२ ॥
भीष्म उवाच
इत्युक्ते स तदा तेन यमदूतेन वै गृहान् ।
नीतश्च कारयामास सर्वं तद् यमशासनम् ॥ २३ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! यमराजके ऐसा कहनेपर उस समय ब्राह्मण जानेको उद्यत हुआ । यमदूतने उसे उसके घर पहुँचा दिया और उसने यमराजकी आज्ञाके अनुसार वह सब पुण्य कार्य किया और कराया ॥ २३ ॥
नीत्वा तं यमदूतोऽपि गृहीत्वा शर्मिणं तदा ।
ययौ स धर्मराजाय न्यवेदयत चापि तम् ॥ २४ ॥
तत्पश्चात् यमदूत शर्मीको पकड़कर वहाँ ले गया और धर्मराजको इसकी सूचना दी ॥ २४ ॥
तं धर्मराजो धर्मज्ञं पूजयित्वा प्रतापवान् ।
कृत्वा च संविदं तेन विससर्ज यथागतम् ॥ २५ ॥
प्रतापी धर्मराजने उस धर्मज्ञ ब्राह्मणकी पूजा करके उससे बातचीत की और फिर वह जैसे आया था, उसी प्रकार उसे विदा कर दिया ॥ २५ ॥
तस्यापि च यमः सर्वमुपदेशं चकार ह ।
प्रेत्यैत्य च ततः सर्वं चकारोक्तं यमेन तत् ॥ २६ ॥
उसके लिये भी यमराजने सारा उपदेश किया । परलोकमें जाकर जब वह लौटा, तब उसने भी यमराजके बताये अनुसार सब कार्य किया ॥ २६ ॥
तथा प्रशंसते दीपान् यमः पितृहितेप्सया ।
तस्माद् दीपप्रदो नित्यं संतारयति वै पितॄन् ॥ २७ ॥
पितरोंके हितकी इच्छासे यमराज दीपदानकी प्रशंसा करते हैं; अतः प्रतिदिन दीपदान करनेवाला मनुष्य पितरोंका उद्धार कर देता है ॥ २७ ॥
दातव्याः सततं दीपास्तस्माद् भरतसत्तम ।
देवतानां पितॄणां च चक्षुष्यं चात्मनां विभो ॥ २८ ॥
इसलिये भरतश्रेष्ठ! देवता और पितरोंके उद्देश्यसे सदा दीपदान करते रहना चाहिये ।
प्रभो! इससे अपने नेत्रोंका तेज बढ़ता है ॥ २८ ॥
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रत्नदानं च सुमहत् पुण्यमुक्तं जनाधिप ।
यस्तान् विक्रीय यजते ब्राह्मणो ह्यभयंकरम् ॥ २ ९ ॥
जनेश्वर! रत्नदानका भी बहुत बड़ा पुण्य बताया गया है । जो ब्राह्मण दानमें मिले हुए रत्नको बेचकर उसके द्वारा यज्ञ करता है, उसके लिये वह प्रतिग्रह भयदायक नहीं होता ॥ २ ९ ॥
यद् वै ददाति विप्रेभ्यो ब्राह्मणः प्रतिगृह्य वै ।
उभयोः स्यात् तदक्षय्यं दातुरादातुरेव च ॥ ३० ॥
जो ब्राह्मण किसी दातासे रत्नोंका दान लेकर स्वयं भी उसे ब्राह्मणोंको बाँट देता है तो उस दानके देने और लेनेवाले दोनोंको अक्षय पुण्य प्राप्त होता है ॥ ३० ॥
यो ददाति स्थितः स्थित्यां तादृशाय प्रतिग्रहम् ।
उभयोरक्षयं धर्मं तं मनुः प्राह धर्मवित् ॥ ३१ ॥
जो पुरुष स्वयं धर्ममर्यादामें स्थित होकर अपने ही समान स्थितिवाले ब्राह्मणको दानमें मिली हुई वस्तुका दान करता है, उन दोनोंको अक्षय धर्मकी प्राप्ति होती है । यह धर्मज्ञ मनुका वचन है ॥ ३१ ॥
वाससां सम्प्रदानेन स्वदारनिरतो नरः ।
सुवस्त्रश्च सुवेषश्च भवतीत्यनुशुश्रुम ॥ ३२ ॥
जो मनुष्य अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखता हुआ वस्त्र दान करता है, वह सुन्दर वस्त्र और मनोहर वेष- भूषासे सम्पन्न होता है - ऐसा हमने सुन रखा है ॥ ३२ ॥
गावः सुवर्णं च तथा तिलाश्चैवानुवर्णिताः ।
बहुशः पुरुषव्याघ्र वेदप्रामाण्यदर्शनात् ॥ ३३ ॥
पुरुषसिंह! मैंने गौ, सुवर्ण और तिलके दानका माहात्म्य अनेकों बार वेद- शास्त्रके प्रमाण दिखाकर वर्णन किया है ॥ ३३ ॥
विवाहांश्चैव कुर्वीत पुत्रानुत्पादयेत च ।
पुत्रलाभो हि कौरव्य सर्वलाभाद् विशिष्यते ॥ ३४ ॥
कुरुनन्दन! मनुष्य विवाह करे और पुत्र उत्पन्न करे । पुत्रका लाभ सब लाभोंसे बढ़कर है ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि यमब्राह्मणसंवादे अष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें यम और ब्राह्मणका संवादविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ६८ ॥
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एकोनसप्ततितमोऽध्यायः गोदानकी महिमा तथा गौओं और ब्राह्मणोंकी रक्षासे पुण्यकी प्राप्ति युधिष्ठिर उवाच
भूय एव कुरुश्रेष्ठ दानानां विधिमुत्तमम् ।
कथयस्व महाप्राज्ञ भूमिदानं विशेषतः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा - महाप्राज्ञ कुरुश्रेष्ठ! आप दानकी उत्तम विधिका फिरसे वर्णन कीजिये । विशेषतः भूमिदानका महत्त्व बताइये ॥ १ ॥
पृथिवीं क्षत्रियो दद्याद् ब्राह्मणायेष्टिकर्मिणे ।
विधिवत् प्रतिगृह्णीयान्न त्वन्यो दातुमर्हति ॥ २ ॥
केवल क्षत्रिय राजा ही यज्ञ करनेवाले ब्राह्मणको पृथ्वीका दान कर सकता है और उसीसे ब्राह्मण विधि - पूर्वक भूमिका प्रतिग्रह ले सकता है । दूसरा कोई यह दान नहीं कर सकता ॥ २ ॥
सर्ववर्णैस्तु यच्छक्यं प्रदातुं फलकाङ्क्षिभिः ।
वेदे वा यत् समाख्यातं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ३ ॥
दानके फलकी इच्छा रखनेवाले सभी वर्णोंके लोग जो दान कर सकें अथवा वेदमें जिस दानका वर्णन हो, उसकी मेरे समक्ष व्याख्या कीजिये ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
तुल्यनामानि देयानि त्रीणि तुल्यफलानि च ।
सर्वकामफलानीह गावः पृथ्वी सरस्वती ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! गाय, भूमि और सरस्वती – ये तीनों समान नामवाली हैं -इन तीनों वस्तुओंका दान करना चाहिये । इन तीनोंके दानका फल भी समान ही है । ये तीनों वस्तुएँ मनुष्योंकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण करनेवाली हैं ॥ ४ ॥
यो ब्रूयाच्चापि शिष्याय धर्म्यं ब्राह्मीं सरस्वतीम् ।
पृथिवीगोप्रदानाभ्यां तुल्यं स फलमश्नुते ॥ ५ ॥
जो ब्राह्मण अपने शिष्यको धर्मानुकूल ब्राह्मी सरस्वती ( वेदवाणी ) का उपदेश करता है, वह भूमिदान और गोदानके समान फलका भागी होता है ॥ ५ ॥
तथैव गाः प्रशंसन्ति न तु देयं ततः परम् ।
संनिकृष्टफलास्ता हि लघ्वर्थाश्च युधिष्ठिर ॥ ६ ॥