श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 611–620
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 611–620
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परमं भेषजं ह्येतद् यज्ञानामेतदुत्तमम् ।
रसानामुत्तमं चैतत् फलानां चैतदुत्तमम् ॥ ८ ॥
घी सबसे उत्तम औषध और यज्ञ करनेकी सर्वश्रेष्ठ वस्तु है । वह रसोंमें उत्तम रस है और फलोंमें सर्वोत्तम फल है ॥ ८ ॥
फलकामो यशस्कामः पुष्टिकामश्च नित्यदा ।
घृतं दद्याद् द्विजातिभ्यः पुरुषः शुचिरात्मवान् ॥ ९ ॥
जो सदा फल, यश और पुष्टि चाहता हो वह पुरुष पवित्र हो मनको वशमें करके द्विजातियोंको घृत दान करे ॥ ९ ॥
घृतं मासे आश्वयुज विप्रेभ्यो यः प्रयच्छति ।
तस्मै प्रयच्छतो रूपं प्रीतौ देवाविहाश्विनौ ॥ १० ॥
जो आश्विन मासमें ब्राह्मणोंको घृत दान करता है, उसपर देववैद्य अश्विनीकुमार प्रसन्न होकर यहाँ उसे रूप प्रदान करते हैं ॥ १० ॥
पायसं सर्पिषा मिश्रं द्विजेभ्यो यः प्रयच्छति ।
गृहं तस्य न रक्षांसि धर्षयन्ति कदाचन ॥ ११ ॥
जो ब्राह्मणोंको घृतमिश्रित खीर देता है, उसके घरपर कभी राक्षसोंका आक्रमण नहीं होता ॥ ११ ॥
पिपासया न म्रियते सोपच्छन्दश्च जायते ।
न प्राप्नुयाच्च व्यसनं करकान् यः प्रयच्छति ॥ १२ ॥
जो पानीसे भरा हुआ कमण्डलु दान करता है, वह कभी प्याससे नहीं मरता । उसके पास सब प्रकारकी आवश्यक सामग्री मौजूद रहती है और वह संकटमें नहीं पड़ता ॥ १२ ॥
प्रयतो ब्राह्मणाग्रे यः श्रद्धया परया युतः ।
उपस्पर्शनषड्भागं लभते पुरुषः सदा ॥ १३ ॥
जो पुरुष सदा एकाग्रचित्त हो ब्राह्मणके आगे बड़ी श्रद्धाके साथ विनययुक्त व्यवहार करता है, वह पुरुष सदा दानके छठे भागका पुण्य प्राप्त कर लेता है ॥ १३ ॥
यः साधनार्थं काष्ठानि ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति ।
प्रतापनार्थं राजेन्द्र वृत्तवद्भयः सदा नरः ॥ १४ ॥
सिद्धयन्त्यर्थाः सदा तस्य कार्याणि विविधानि च ।
उपर्युपरि शत्रूणां वपुषा दीप्यते च सः ॥ १५ ॥
राजेन्द्र! जो मनुष्य सदाचारसम्पन्न ब्राह्मणोंको भोजन बनाने और तापनेके लिये सदा लकड़ियाँ देता है, उसकी सभी कामनाएँ तथा नाना प्रकारके कार्य सदा ही सिद्ध होते रहते और वह शत्रुओंके ऊपर-ऊपर रहकर अपने तेजस्वी शरीरसे देदीप्यमान होता है ॥ १४-१५ ॥
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भगवांश्चापि सम्प्रीतो वह्निर्भवति नित्यशः ।
न तं त्यजन्ति पशवः संग्रामे च जयत्यपि ॥ १६ ॥
इतना ही नहीं, उसके ऊपर सदा भगवान् अग्निदेव प्रसन्न रहते हैं। उसके पशुओंकी हानि नहीं होती तथा वह संग्राममें विजयी होता है ॥ १६ ॥
पुत्राञ्छ्रियं च लभते यश्छत्रं सम्प्रयच्छति ।
न चक्षुर्व्याधिं लभते यज्ञभागमथाश्नुते ॥ १७ ॥
जो पुरुष छाता दान करता है उसे पुत्र और लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है । उसके नेत्रमें कोई रोग नहीं होता और उसे सदा यज्ञका भाग मिलता है ॥ १७ ॥
निदाघकाले वर्षे वा यश्छत्रं सम्प्रयच्छति ।
नास्य कश्चिन्मनोदाहः कदाचिदपि जायते ।
कृच्छ्रात् स विषमाच्चैव क्षिप्रं मोक्षमवाप्नुते ॥ १८ ॥
जो गर्मी और बरसातके महीनोंमें छाता दान करता है, उसके मनमें कभी संताप नहीं होता । वह कठिन - से - कठिन संकटसे शीघ्र ही छुटकारा पा जाता है ॥ १८ ॥
प्रदानं सर्वदानानां शकटस्य विशाम्पते ।
एवमाह महाभागः शाण्डिल्यो भगवानृषिः ॥ १९ ॥
प्रजानाथ! महाभाग भगवान् शाण्डिल्य ऋषि ऐसा कहते हैं कि ' शकट ( बैलगाड़ी ) का दान उपर्युक्त सब दानोंके बराबर है ' ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥
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षट्षष्टितमोऽध्यायः जूता, शकट, तिल, भूमि, गौ और अन्नके दानका माहात्म्य युधिष्ठिर उवाच
दह्यमानाय विप्राय यः प्रयच्छत्युपानहौ ।
यत् फलं तस्य भवति तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! गर्मीके दिनोंमें जिसके पैर जल रहे हों, ऐसे ब्राह्मणको जो जूते पहनाता है, उसको जो फल मिलता है, वह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
उपानहौ प्रयच्छेद् यो ब्राह्मणेभ्यः समाहितः ।
मर्दते कण्टकान् सर्वान् विषमान्निस्तरत्यपि ॥ २ ॥
स शत्रूणामुपरि च संतिष्ठति युधिष्ठिर ।
यानं चाश्वतरीयुक्तं तस्य शुभ्रं विशाम्पते ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा — युधिष्ठिर! जो एकाग्रचित्त होकर ब्राह्मणोंके लिये जूते दान करता है, वह सब कण्टकोंको मसल डालता है और कठिन विपत्तिसे भी पार हो जाता है । इतना ही नहीं, वह शत्रुओंके ऊपर विराजमान होता है । प्रजानाथ! उसे जन्मान्तरमें खच्चरियोंसे जुता हुआ उज्ज्वल रथ प्राप्त होता है ॥ २-३ ॥
उपतिष्ठति कौन्तेय रौप्यकाञ्चनभूषितम् ।
शकटं दम्यसंयुक्तं दत्तं भवति चैव हि ॥ ४ ॥
कुन्तीकुमार! जो नये बैलोंसे युक्त शकट दान करता है, उसे चाँदी और सोनेसे जटित रथ प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
युधिष्ठिर उवाच
यत् फलं तिलदाने च भूमिदाने च कीर्तितम् ।
गोदाने चान्नदाने च भूयस्तद् ब्रूहि कौरव ॥ ५ ॥
युधिष्ठिरने पूछा -कुरुनन्दन! तिल, भूमि, गौ और अन्नका दान करनेसे क्या फल मिलता है? इसका फिरसे वर्णन कीजिये ॥ ५ ॥
भीष्म उवाच
शृणुष्व मम कौन्तेय तिलदानस्य यत् फलम् ।
निशम्य च यथान्यायं प्रयच्छ कुरुसत्तम ॥ ६ ॥
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भीष्मजीने कहा – कुन्तीनन्दन! कुरुश्रेष्ठ! तिलदानका जो फल है, वह मुझसे सुनो और सुनकर यथोचित रूपसे उसका दान करो ॥ ६ ॥
पितॄणां परमं भोज्यं तिलाः सृष्टाः स्वयम्भुवा ।
तिलदानेन वै तस्मात् पितृपक्षः प्रमोदते ॥ ७ ॥
ब्रह्माजीने जो तिल उत्पन्न किये हैं, वे पितरोंके सर्वश्रेष्ठ खाद्य पदार्थ हैं । इसलिये तिल दान करनेसे पितरोंको बड़ी प्रसन्नता होती है ॥ ७ ॥
माघमासे तिलान् यस्तु ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति ।
सर्वसत्त्वसमाकीर्णं नरकं स न पश्यति ॥ ८ ॥
जो माघ मासमें ब्राह्मणोंको तिल दान करता है, वह समस्त जन्तुओंसे भरे हुए नरकका दर्शन नहीं करता ॥ ८ ॥
सर्वसत्रैश्च यजते यस्तिलैर्यजते पितॄन् ।
न चाकामेन दातव्यं तिलश्राद्धं कदाचन ॥ ९ ॥
जो तिलोंके द्वारा पितरोंका पूजन करता है, वह मानो सम्पूर्ण यज्ञोंका अनुष्ठान कर लेता है । तिल- श्राद्ध कभी निष्काम पुरुषको नहीं करना चाहिये ॥ ९ ॥
महर्षेः कश्यपस्यैते गात्रेभ्यः प्रसृतास्तिलाः ।
ततो दिव्यं गता भावं प्रदानेषु तिलाः प्रभो ॥ १० ॥
प्रभो! ये तिल महर्षि कश्यपके अंगोंसे प्रकट होकर विस्तारको प्राप्त हुए हैं; इसलिये दानके निमित्त इनमें दिव्यता आ गयी है ॥ १० ॥
पौष्टिका रूपदाश्चैव तथा पापविनाशनाः ।
तस्मात् सर्वप्रदानेभ्यस्तिलदानं विशिष्यते ॥ ११ ॥
तिल पौष्टिक पदार्थ है । वे सुन्दर रूप देनेवाले और पापनाशक हैं । इसलिये तिल- दान सब दानोंसे बढ़कर है ॥ ११ ॥
आपस्तम्बश्च मेधावी शङ्खश्च लिखितस्तथा ।
महर्षिर्गोतमश्चापि तिलदानैर्दिवं गताः ॥ १२ ॥
परम बुद्धिमान् महर्षि आपस्तम्ब, शंख, लिखित तथा गौतम— ये तिलोंका दान करके दिव्यलोकको प्राप्त हुए हैं ॥ १२ ॥
तिलहोमरता विप्राः सर्वे संयतमैथुनाः ।
समा गव्येन हविषा प्रवृत्तिषु च संस्थिताः ॥ १३ ॥
वे सभी ब्राह्मण स्त्री - समागमसे दूर रहकर तिलोंका हवन किया करते थे, तिल गोघृतके समान हविके योग्य माने गये हैं, इसलिये यज्ञोंमें गृहीत होते हैं एवं हरेक कर्मोंमें उनकी आवश्यकता है ॥ १३ ॥
सर्वेषामिति दानानां तिलदानं विशिष्यते ।
अक्षयं सर्वदानानां तिलदानमिहोच्यते ॥ १४ ॥
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अतः तिलदान सब दानोंसे बढ़कर है । तिलदान यहाँ सब दानोंमें अक्षय फल देनेवाला बताया जाता है ॥
उच्छिन्ने तु पुरा हव्ये कुशिकर्षिः परंतपः ।
तिलैरग्नित्रयं हुत्वा प्राप्तवान् गतिमुत्तमाम् ॥ १५ ॥
पूर्वकालमें परंतप राजर्षि कुशिकने हविष्य समाप्त हो जानेपर तिलोंसे ही हवन करके तीनों अग्नियोंको तृप्त किया था; इससे उन्हें उत्तम गति प्राप्त हुई ॥ १५ ॥
इति प्रोक्तं कुरुश्रेष्ठ तिलदानमनुत्तमम् ।
विधानं येन विधिना तिलानामिह शस्यते ॥ १६ ॥
कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार जिस विधिके अनुसार तिलदान करना उत्तम माना गया है, वह सर्वोत्तम तिलदानका विधान यहाँ बताया गया ॥ १६ ॥
अत ऊर्ध्वं निबोधेदं देवानां यष्टुमिच्छताम् ।
समागमे महाराज ब्रह्मणा वै स्वयम्भुवा ॥ १७ ॥
महाराज! इसके बाद यज्ञकी इच्छावाले देवताओं और स्वयम्भू ब्रह्माजीका समागम होनेपर उनमें परस्पर जो बातचीत हुई थी, उसे बता रहा हूँ, इसपर ध्यान दो ॥
देवाः समेत्य ब्रह्माणं भूमिभागे यियक्षवः ।
शुभं देशमयाचन्त यजेम इति पार्थिव ॥ १८ ॥
पृथ्वीनाथ! भूतलके किसी भागमें यज्ञ करनेकी इच्छावाले देवता ब्रह्माजीके पास जाकर किसी शुभ देशकी याचना करने लगे, जहाँ यज्ञ कर सकें ॥ १८ ॥
देवा ऊचुः
भगवंस्त्वं प्रभुर्भूमेः सर्वस्य त्रिदिवस्य च ।
यजेमहि महाभाग यज्ञं भवदनुज्ञया ॥ १ ९ ॥
देवता बोले — भगवन्! महाभाग! आप पृथ्वी और सम्पूर्ण स्वर्गके भी स्वामी हैं; अतः हम आपकी आज्ञा लेकर पृथ्वीपर यज्ञ करेंगे ॥ १ ९ ॥
नाननुज्ञातभूमिर्हि यज्ञस्य फलमश्नुते ।
त्वं हि सर्वस्य जगतः स्थावरस्य चरस्य च ॥ २० ॥
प्रभुर्भवसि तस्मात्त्वं समनुज्ञातुमर्हसि । क्योंकि भूस्वामी जिस भूमिपर यज्ञ करनेकी अनुमति नहीं देता, उस भूमिपर यदि यज्ञ किया जाय तो उसका फल नहीं होता । आप सम्पूर्ण चराचर जगत्के स्वामी हैं; अतः पृथ्वीपर यज्ञ करनेके लिये हमें आज्ञा दीजिये ॥ ब्रह्मोवाच ददानि मेदिनीभागं भवद्भयोऽहं सुरर्षभाः ॥ २१ ॥
यस्मिन् देशे करिष्यध्वं यज्ञान् काश्यपनन्दनाः ।
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ब्रह्माजीने कहा – काश्यपनन्दन सुरश्रेष्ठगण! तुमलोग पृथ्वीके जिस प्रदेशमें यज्ञ करोगे, वही भूभाग मैं तुम्हें दे रहा हूँ ॥ २१ ॥
देवा ऊचुः भगवन् कृतकार्याः स्म यक्ष्महे स्वाप्तदक्षिणैः ॥ २२ ॥
इमं तु देशं मुनयः पर्युपासन्ति नित्यदा । देवताओंने कहा - भगवन्! हमारा कार्य हो गया । अब हम पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञपुरुषका यजन करेंगे । यह जो हिमालयके पासका प्रदेश है, इसका ऋषि- मुनि सदासे ही आश्रय लेते हैं ( अतः हमारा यज्ञ भी यहीं होगा) ॥ ततोऽगस्त्यश्च कण्वश्च भृगुरत्रिर्वृषाकपिः ॥ २३ ॥
असितो देवलश्चैव देवयज्ञमुपागमन् ।
ततो देवा महात्मान ईजिरे यज्ञमच्युतम् ॥। २४ ॥
तथा समापयामासुर्यथाकालं सुरर्षभाः । तदनन्तर अगस्त्य, कण्व, भृगु, अत्रि, वृषाकपि, असित और देवल देवताओंके उस यज्ञमें उपस्थित हुए । तब महामनस्वी देवताओंने यज्ञपुरुष अच्युतका यजन आरम्भ किया और उन श्रेष्ठ देवगणोंने यथासमय उस यज्ञको समाप्त भी कर दिया ॥ २३-२४ ॥ त इष्टयज्ञास्त्रिदशा हिमवत्यचलोत्तमे ॥ २५ ॥
षष्ठमंशं क्रतोस्तस्य भूमिदानं प्रचक्रिरे । पर्वतराज हिमालयके पास यज्ञ पूरा करके देवताओंने भूमिदान भी किया, जो उस यज्ञके छठे भागके बराबर पुण्यका जनक था ॥ २५३ ॥
प्रादेशमात्रं भूमेस्तु यो दद्यादनुपस्कृतम् ॥ २६ ॥
न सीदति स कृच्छ्रेषु न च दुर्गाण्यवाप्नुते । जिसको खोदखादकर खराब न कर दिया गया हो, ऐसे प्रादेशमात्र भूभागका भी जो दान करता है, वह न तो कभी दुर्गम संकटोंमें पड़ता है और न पड़नेपर कभी दुःखी ही होता है ॥ २६३ ॥
शीतवातातपसहां गृहभूमिं सुसंस्कृताम् ॥ २७ ॥
प्रदाय सुरलोकस्थः पुण्यान्तेऽपि न चाल्यते । जो सर्दी, गर्मी और हवाके वेगको सहन करनेयोग्य सजी- सजायी गृह - भूमि दान करता है, वह देवलोकमें निवास करता है । पुण्यका भोग समाप्त होनेपर भी वहाँसे हटाया नहीं जाता ॥ २७ ॥
मुदितो वसति प्राज्ञः शक्रेण सह पार्थिव ॥ २८ ॥
प्रतिश्रयप्रदानाच्च सोऽपि स्वर्गे महीयते ।
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पृथ्वीनाथ! जो विद्वान् गृहदान करता है, वह भी उसके पुण्यसे इन्द्रके साथ आनन्दपूर्वक निवास करता और स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है ॥ २८३ ॥
अध्यापककुले जातः श्रोत्रियो नियतेन्द्रियः ॥ २९ ॥
गृहे यस्य वसेत् तुष्टः प्रधानं लोकमश्नुते । अध्यापक- वंशमें उत्पन्न श्रोत्रिय एवं जितेन्द्रिय ब्राह्मण जिसके दिये हुए घरमें प्रसन्नतासे रहता है, उसे श्रेष्ठ लोक प्राप्त होते हैं ॥ २ ९ ३ ॥ तथा गवार्थे शरणं शीतवर्षसहं दृढम् ॥ ३० ॥
आसप्तमं तारयति कुलं भरतसत्तम । भरतश्रेष्ठ! जो गौओंके लिये सर्दी और वर्षासे बचानेवाला सुदृढ़ निवासस्थान बनवाता है, वह अपनी सात पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है ॥ ३०३ ॥
क्षेत्र भूमिं ददल्लोके शुभां श्रियमवाप्नुयात् ॥ ३१ ॥
रत्नभूमिं प्रदद्यात् तु कुलवंशं प्रवर्धयेत् । खेतके योग्य भूमि दान करनेवाला मनुष्य जगत्में शुभ सम्पत्ति प्राप्त करता है और जो रत्नयुक्त भूमिका दान करता है, वह अपने कुलकी वंश- परम्पराको बढ़ाता है ॥ ३१३ ॥
न चोषरां न निर्दग्धां महीं दद्यात् कथंचन ॥ ३२ ॥
न श्मशानपरीतां च न च पापनिषेविताम् । जो भूमि ऊसर, जली हुई और श्मशानके निकट हो तथा जहाँ पापी पुरुष निवास करते हों, उसे ब्राह्मणको नहीं देना चाहिये ॥ ३२३ ॥
पारक्ये भूमिदेशे तु पितॄणां निर्वपेत् तु यः ॥ ३३ ॥
तद्भूमिं वापि पितृभिः श्राद्धकर्म विहन्यते । जो परायी भूमिमें पितरोंके लिये श्राद्ध करता है, अथवा जो उस भूमिको पितरोंके लिये दानमें देता है, उसके वे श्राद्धकर्म और दान दोनों ही नष्ट होते ( निष्फल हो जाते हैं ॥ ३३३ || तस्मात् क्रीत्वा महीं दद्यात् स्वल्पामपि विचक्षणः ॥ ३४ ॥
पिण्डः पितृभ्यो दत्तो वै तस्यां भवति शाश्वतः । अतः विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह थोड़ी- सी भी भूमि खरीदकर उसका दान करे । खरीदकर अपनी की हुई भूमिमें ही पितरोंको दिया हुआ पिण्ड सदा स्थिर रहनेवाला होता है ॥ ३४ ॥
अटवीपर्वताश्चैव नद्यस्तीर्थानि यानि च ॥ ३५ ॥
सर्वाण्यस्वामिकान्याहुर्न हि तत्र परिग्रहः ।
इत्येतद् भूमिदानस्य फलमुक्तं विशाम्पते ॥ ३६ ॥
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वन, पर्वत, नदी और तीर्थ - ये सब स्थान किसी स्वामीके अधीन नहीं होते हैं ( इन्हें सार्वजनिक माना जाता है ) । इसलिये वहाँ श्राद्ध करनेके लिये भूमि खरीदनेकी आवश्यकता नहीं है । प्रजानाथ! इस प्रकार यह भूमिदानका फल बताया गया है ॥ ३५-३६ ॥
अतः परं तु गोदानं कीर्तयिष्यामि तेऽनघ ।
गावोऽधिकास्तपस्विभ्यो यस्मात् सर्वेभ्य एव च ॥ ३७ ॥
तस्मान्महेश्वरो देवस्तपस्ताभिः सहास्थितः । अनघ! इसके बाद मैं तुम्हें गोदानका माहात्म्य बताऊँगा । गौएँ समस्त तपस्वियोंसे बढ़कर हैं; इसलिये भगवान् शंकरने गौओंके साथ रहकर तप किया था ॥ ३७ ॥
ब्राह्मो लोके वसन्त्येताः सोमेन सह भारत ॥ ३८ ॥
यां तां ब्रह्मर्षयः सिद्धाः प्रार्थयन्ति परां गतिम् । भारत! ये गौएँ चन्द्रमाके साथ उस ब्रह्मलोकमें निवास करती हैं, जो परमगतिरूप है और जिसे सिद्ध ब्रह्मर्षि भी प्राप्त करनेकी इच्छा रखते हैं ॥ ३८३ ॥
पयसा हविषा दध्ना शकृता चाथ चर्मणा ॥ ३ ९ ॥ अस्थिभिश्चोपकुर्वन्ति शृंगैर्वालैश्च भारत । भरतनन्दन! ये गौएँ अपने दूध, दही, घी, गोबर, चमड़ा, हड्डी, सींग और बालोंसे भी जगत्का उपकार करती रहती हैं ॥ ३ ९ ॥ नासां शीतातपौ स्यातां सदैताः कर्म कुर्वते ॥ ४० ॥
न वर्षविषयं वापि दुःखमासां भवत्युत ।
ब्राह्मणैः सहिता यान्ति तस्मात् पारमकं पदम् ॥ ४१ ॥
इन्हें सर्दी, गर्मी और वर्षाका भी कष्ट नहीं होता है । ये सदा ही अपना काम किया करती हैं । इसलिये ये ब्राह्मणोंके साथ परमपदस्वरूप ब्रह्मलोकमें चली जाती ॥ ४०-४१ ॥
एक गोब्राह्मणं तस्मात् प्रवदन्ति मनीषिणः ।
रन्तिदेवस्य यज्ञे ताः पशुत्वेनोपकल्पिताः ॥ ४२ ॥
अतश्चर्मण्वती राजन् गोचर्मभ्यः प्रवर्तिता ।
पशुत्वाच्च विनिर्मुक्ताः प्रदानायोपकल्पिताः ॥ ४३ ॥
इसीसे गौ और ब्राह्मणको मनस्वी पुरुष एक बताते हैं । राजन्! राजा रन्तिदेवके यज्ञमें वे पशुरूपसे दान देनेके लिये निश्चित की गयी थीं; अतः गौओंके चमड़ोंसे वह चर्मण्वती नामक नदी प्रवाहित हुई थी । वे सभी गौएँ पशुत्वसे विमुक्त थीं और दान देनेके लिये नियत की गयी थीं ॥ ४२-४३ ॥
ताइमा बिप्रमुख्येभ्यो यो ददाति महीपते ।
निस्तरेदापदं कृच्छ्रां विषमस्थोऽपि पार्थिव ॥ ४४ ॥
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भूपाल! पृथ्वीनाथ! जो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको इन गौओंका दान करता है, वह संकटमें पड़ा हो तो भी उस भारी विपत्तिसे उद्धार पा लेता है ॥ ४४ ॥
गवां सहस्रदः प्रेत्य नरकं न प्रपद्यते ।
सर्वत्र विजयं चापि लभते मनुजाधिप ॥ ४५ ॥
जो एक सहस्र गोदान कर देता है, वह मरनेके बाद नरकमें नहीं पड़ता । नरेश्वर! उसे सर्वत्र विजय प्राप्त होती है ॥ ४५ ॥
अमृतं वै गवां क्षीरमित्याह त्रिदशाधिपः ।
तस्माद् ददाति यो धेनुममृतं स प्रयच्छति ॥ ४६ ॥
देवराज इन्द्रने कहा है कि ' गौओंका दूध अमृत है '; जो दूध देनेवाली गौका दान करता है, वह अमृत दान करता है ॥ ४६ ॥
अग्नीनामव्ययं ह्येतद्धौम्यं वेदविदो विदुः ।
तस्माद् ददाति यो धेनुं स हौम्यं सम्प्रयच्छति ॥ ४७ ॥
वेदवेत्ता पुरुषोंका अनुभव है कि ' गोदुग्धरूप हविष्यका यदि अग्निमें हवन किया जाय तो वह अविनाशी फल देता है । ' अतः जो धेनु दान करता है, वह हविष्यका ही दान करता है ॥ ४७ ॥
स्वर्गो वै मूर्तिमानेष वृषभं यो गवां पतिम् ।
विप्रे गुणयुते दद्यात् स वै स्वर्गे महीयते ॥ ४८ ॥
बैल स्वर्गका मूर्तिमान् स्वरूप है । जो गौओंके पति- साँड़का गुणवान् ब्राह्मणको दान करता है, वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ४८ ॥
प्राणा वै प्राणिनामेते प्रोच्यन्ते भरतर्षभ ।
तस्माद् ददाति यो धेनुं प्राणानेष प्रयच्छति ॥ ४ ९ ॥
भरतश्रेष्ठ! ये गौएँ प्राणियों ( को दूध पिलाकर पालनेके कारण उन) के प्राण कहलाती हैं; इसलिये जो दूध देनेवाली गौका दान करता है, वह मानो प्राण दान देता है ॥ ४ ९ ॥
गावः शरण्या भूतानामिति वेदविदो विदुः ।
तस्माद् ददाति यो धेनुं शरणं सम्प्रयच्छति ॥ ५० ॥
वेदवेत्ता विद्वान् ऐसा मानते हैं कि 'गौएँ समस्त प्राणियोंको शरण देनेवाली हैं । ' इसलिये जो धेनु दान करता है, वह सबको शरण देनेवाला है ॥ ५० ॥
न वधार्थं प्रदातव्या न कीनाशे न नास्तिके ।
गोजीविने न दातव्या तथा गौर्भरतर्षभ ॥ ५१ ॥
( गोरसानां न विक्रेतुरपञ्चयजनस्य च । ) भरतश्रेष्ठ! जो मनुष्य वध करनेके लिये गौ माँग रहा हो, उसे कदापि गाय नहीं देनी चाहिये । इसी प्रकार कसाईको, नास्तिकको, गायसे ही जीविका चलानेवालेको, गोरस बेचनेवाले और पंचयज्ञ न करनेवालेको भी गाय नहीं देनी चाहिये ॥ ५१ ॥
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ददत् स तादृशानां वै नरो गां पापकर्मणाम् ।
अक्षयं नरकं यातीत्येवमाहुर्महर्षयः ॥ ५२ ॥
ऐसे पापकर्मी मनुष्योंको जो गाय देता है, वह मनुष्य अक्षय नरकमें गिरता है, ऐसा महर्षियोंका कथन है ॥ ५२ ॥
न कृशां नापवत्सां वा वन्ध्यां रोगान्वितां तथा ।
न व्यंगां न परिश्रान्तां दद्याद् गां ब्राह्मणाय वै ॥ ५३ ॥
जो दुबली हो, जिसका बछड़ा मर गया हो तथा जो ठाँठ, रोगिणी, किसी अंगसे हीन और थकी हुई ( बूढ़ी ) हो, ऐसी गौ ब्राह्मणको नहीं देनी चाहिये ॥ ५३ ॥
दशगोसहस्रदो हि शक्रेण सह मोदते ।
अक्षयाँल्लभते लोकान् नरः शतसहस्रशः ॥ ५४ ॥
दस हजार गोदान करनेवाला मनुष्य इन्द्रके साथ रहकर आनन्द भोगता है और जो लाख गौओंका दान कर देता है, उस मनुष्यको अक्षय लोक प्राप्त होते हैं ॥
इत्येतद् गोप्रदानं च तिलदानं च कीर्तितम् ।
तथा भूमिप्रदानं च शृणुष्वान्ने च भारत ॥ ५५ ॥
भारत! इस प्रकार गोदान, तिलदान और भूमिदानका महत्त्व बतलाया गया । अब पुनः अन्नदानकी महिमा सुनो ॥
अन्नदानं प्रधानं हि कौन्तेय परिचक्षते ।
अन्नस्य हि प्रदानेन रन्तिदेवो दिवं गतः ॥ ५६ ॥
कुन्तीनन्दन! विद्वान् पुरुष अन्नदानको सब दानोंमें प्रधान बताते हैं । अन्नदान करनेसे ही राजा रन्तिदेव स्वर्गलोकमें गये थे ॥ ५६ ॥
श्रान्ताय क्षुधितायान्नं यः प्रयच्छति भूमिपः ।
स्वायम्भुवं महत् स्थानं स गच्छति नराधिप ॥ ५७ ॥
नरेश्वर! जो भूमिपाल थके -माँदे और भूखे मनुष्यको अन्न देता है, वह ब्रह्माजीके परमधाममें जाता है ॥ ५७ ॥
न हिरण्यैर्न वासोभिर्नान्यदानेन भारत ।
प्राप्नुवन्ति नराः श्रेयो यथा ह्यन्नप्रदाः प्रभो ॥ ५८ ॥
भरतनन्दन! प्रभो! अन्नदान करनेवाले मनुष्य जिस तरह कल्याणके भागी होते हैं, वैसा कल्याण उन्हें सुवर्ण, वस्त्र तथा अन्य वस्तुओंके दानसे नहीं प्राप्त होता है ॥ ५८ ॥
अन्नं वै प्रथमं द्रव्यमन्नं श्रीश्च परा मता ।
अन्नात् प्राणः प्रभवति तेजो वीर्यं बलं तथा ॥ ५ ९ ॥
अन्न प्रथम द्रव्य है । वह उत्तम लक्ष्मीका स्वरूप माना गया है । अन्नसे ही प्राण, तेज, वीर्य और बलकी पुष्टि होती है ॥ ५ ९ ॥ सद्यो ददाति यश्चान्नं सदैकाग्रमना नरः ।