श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 631–640

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 631–640

पृष्ठ 631

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इसी प्रकार गोदानकी भी प्रशंसा की गयी है। उससे बढ़कर कोई दान नहीं है । युधिष्ठिर! गोदानका फल निकट भविष्यमें मिलता है तथा वे गौएँ शीघ्र अभीष्ट अर्थकी सिद्धि करती हैं ॥ ६ ॥

मातरः सर्वभूतानां गावः सर्वसुखप्रदाः ।

वृद्धिमाकाङ्क्षता नित्यं गावः कार्याः प्रदक्षिणाः ॥ ७ ॥

गौएँ सम्पूर्ण प्राणियोंकी माता कहलाती हैं । वे सबको सुख देनेवाली हैं । जो अपने अभ्युदयकी इच्छा रखता हो, उसे गौओंको सदा दाहिने करके चलना चाहिये ॥ ७ ॥

संताड्या न तु पादेन गवां मध्ये न च व्रजेत् ।

मंगलायतनं देव्यस्तस्मात् पूज्याः सदैव हि ॥ ८ ॥

गौओंको लात न मारे । उनके बीचसे होकर न निकले । वे मंगलकी आधारभूत देवियाँ हैं, अतः उनकी सदा ही पूजा करनी चाहिये ॥ ८ ॥

प्रचोदनं देवकृतं गवां कर्मसु वर्तताम् ।

पूर्वमेवाक्षरं चान्यदभिधेयं ततः परम् ॥ ९ ॥

देवताओंने भी यज्ञके लिये भूमि जोतते समय बैलोंको डंडे आदिसे हाँका था । अतः पहले यज्ञके लिये ही बैलोंको जोतना या हाँकना श्रेयस्कर माना गया है । उससे भिन्न कर्मके लिये बैलोंको जोतना या डंडे आदिसे हाँकना निन्दनीय है ॥ ९ ॥

प्रचारे वा निवाते वा बुधो नोद्वेजयेत गाः ।

तृषिता ह्यभिवीक्षन्त्यो नरं हन्युः सबान्धवम् ॥ १० ॥

विद्वान् पुरुषको चाहिये कि जब गौएँ स्वच्छन्दता-पूर्वक विचर रही हों अथवा किसी उपद्रवशून्य स्थानमें बैठी हों तो उन्हें उद्वेगमें न डाले । जब गौएँ प्याससे पीड़ित हो जलकी इच्छासे अपने स्वामीकी ओर देखती हैं ( और वह उन्हें पानी नहीं पिलाता है ), तब वे रोषपूर्ण दृष्टिसे बन्धु - बान्धवोंसहित उसका नाश कर देती हैं ॥ १० ॥

पितृसद्मानि सततं देवतायतनानि च ।

पूयन्ते शकृता यासां पूतं किमधिकं ततः ॥ ११ ॥

जिनके गोबरसे लीपनेपर देवताओंके मन्दिर और पितरोंके श्राद्धस्थान पवित्र होते हैं, उनसे बढ़कर पावन और क्या हो सकता है? ॥ ११ ॥

घासमुष्टिं परगवे दद्यात् संवत्सरं तु यः ।

अकृत्वा स्वयमाहारं व्रतं तत् सार्वकामिकम् ॥ १२ ॥

जो एक वर्षतक प्रतिदिन स्वयं भोजनके पहले दूसरेकी गायको एक मुट्ठी घास खिलाता है, उसका वह व्रत समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला होता है ॥ १२ ॥

स हि पुत्रान् यशोऽर्थं च श्रियं चाप्यधिगच्छति ।

नाशयत्यशुभं चैव दुःस्वप्नं चाप्यपोहति ॥ १३ ॥

पृष्ठ 632

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वह अपने लिये पुत्र, यश, धन और सम्पत्ति प्राप्त करता है तथा अशुभ कर्म और दुःस्वप्नका नाश कर देता है ॥ १३ ॥

युधिष्ठिर उवाच

देयाः किंलक्षणा गावः काश्चापि परिवर्जयेत् ।

कीदृशाय प्रदातव्या न देयाः कीदृशाय च ॥ १४ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! किन लक्षणोंवाली गौओंका दान करना चाहिये और किनका दान नहीं करना चाहिये? कैसे ब्राह्मणको गाय देनी चाहिये और कैसे ब्राह्मणको नहीं देनी चाहिये? ॥ १४ ॥

भीष्म उवाच

असद्वृत्ताय पापाय लुब्धायानृतवादिने ।

हव्यकव्यव्यपेताय न देया गौः कथंचन ॥ १५ ॥

भीष्मजीने कहा- राजन्! दुराचारी, पापी, लोभी, असत्यवादी तथा देवयज्ञ और श्राद्धकर्म न करनेवाले ब्राह्मणको किसी तरह गौ नहीं देनी चाहिये ॥ १५ ॥

भिक्षवेबहुपुत्राय श्रोत्रियायाहिताग्नये ।

दत्त्वा दशगवां दाता लोकानाप्नोत्यनुत्तमान् ॥ १६ ॥

जिसके बहुत - से पुत्र हों, जो श्रोत्रिय ( वेदवेत्ता) और अग्निहोत्री ब्राह्मण हो और गौके लिये याचना कर रहा हो, ऐसे पुरुषको दस गौओंका दान करनेवाला दाता उत्तम लोकोंको पाता है ॥ १६ ॥

यश्चैव धर्मं कुरुते तस्य धर्मफलं च यत् ।

सर्वस्यैवांशभाग् दाता तं निमित्तं प्रवृत्तयः ॥ १७ ॥

जो गोदान ग्रहण करके धर्माचरण करता है, उसके धर्मका जो कुछ भी फल होता है, उस सम्पूर्ण धर्मके एक अंशका भागी दाता भी होता है, क्योंकि उसीके लिये उसकी गोदानमें प्रवृत्ति हुई थी ॥ १७ ॥

यश्चैनमुत्पादयते यश्चैनं त्रायते भयात् ।

यश्चास्य कुरुते वृत्तिं सर्वे ते पितरस्त्रयः ॥ १८ ॥

- जो जन्म देता है, जो भयसे बचाता है तथा जो जीविका देता है – ये तीनों ही पिताके तुल्य हैं ॥ १८ ॥

कल्मषं गुरुशुश्रूषा हन्ति मानो महद्यशः ।

अपुत्रतां त्रयः पुत्रा अवृत्तिं दश धेनवः ॥ १ ९ ॥

गुरुजनोंकी सेवा सारे पापोंका नाश कर देती है । अभिमान महान् यशको नष्ट कर देता है । तीन पुत्र पुत्रहीनताके दोषका निवारण कर देते हैं और दूध देनेवाली दस गौएँ हों तो ये जीविकाके अभावको दूर कर देती हैं ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 633

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वेदान्तनिष्ठस्य बहुश्रुतस्य प्रज्ञानतृप्तस्य जितेन्द्रियस्य । शिष्टस्य दान्तस्य यतस्य चैव भूतेषु नित्यं प्रियवादिनश्च ॥ २० ॥

यः क्षुद्भयाद् वै न विकर्म कुर्या- न्मृदुश्च शान्तो ह्यतिथिप्रियश्च । वृत्तिं द्विजायातिसृजेत तस्मै यस्तुल्यशीलश्च सपुत्रदारः ॥ २१ ॥

जो वेदान्तनिष्ठ, बहुज्ञ, ज्ञानानन्दसे तृप्त, जितेन्द्रिय, शिष्ट, मनको वशमें रखनेवाला, यत्नशील, समस्त प्राणियोंके प्रति सदा प्रिय वचन बोलनेवाला, भूखके भयसे भी अनुचित कर्म न करनेवाला, मृदुल, शान्त, अतिथिप्रेमी, सबपर समानभाव रखनेवाला और स्त्री- पुत्र आदि कुटुम्बसे युक्त हो, उस ब्राह्मणकी जीविकाका अवश्य प्रबन्ध करना चाहिये ॥ २०-२१ ॥ शुभे पात्रे ये गुणा गोप्रदाने तावान् दोषो ब्राह्मणस्वापहारे । सर्वावस्थं ब्राह्मणस्वापहारो दाराश्चैषां दूरतो वर्जनीयाः ॥ २२ ॥

शुभ पात्रको गोदान करनेसे जो लाभ होते हैं, उसका धन ले लेनेपर उतना ही पाप लगता है; अतः किसी भी अवस्थामें ब्राह्मणोंके धनका अपहरण न करे तथा उनकी स्त्रियोंका संसर्ग दूरसे ही त्याग दे ॥ २२ ॥

( विप्रदारे परहृते विप्रस्वनिचये तथा ।

परित्रायन्ति शक्तास्तु नमस्तेभ्यो मृतास्तु वा ॥

न पालयन्ति चेत् तस्य हन्ता वैवस्वतो यमः ।

दण्डयन् भर्त्सयन् नित्यं निरयेभ्यो न मुञ्चति ॥

तथा गवां परित्राणे पीडने च शुभाशुभम् । विप्रगोषु विशेषेण रक्षितेषु हतेषु वा ॥ ) जहाँ ब्राह्मणोंकी स्त्रियों अथवा उनके धनका अपहरण होता हो, वहाँ शक्ति रहते हुए जो उन सबकी रक्षा करते हैं, उन्हें नमस्कार है । जो उनकी रक्षा नहीं करते हैं, वे मुर्दोंके समान हैं । सूर्यपुत्र यमराज ऐसे लोगोंका वध कर डालते हैं, प्रतिदिन उन्हें यातना देते और डाँटते - फटकारते हैं और नरकसे उन्हें कभी छुटकारा नहीं देते हैं । इसी प्रकार गौओंके संरक्षण और पीड़नसे भी शुभ और अशुभकी प्राप्ति होती है । विशेषतः ब्राह्मणों और गौओंके अपने द्वारा सुरक्षित होनेपर पुण्य और मारे जानेपर पाप होता है ॥

पृष्ठ 634

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इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोदानमाहात्म्ये एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ६ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानका माहात्म्यविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६९ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं )

पृष्ठ 635

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सप्ततितमोऽध्यायः ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेसे होनेवाली हानिके विषयमें दृष्टान्तके रूपमें राजा नृगका उपाख्यान भीष्म उवाच

अत्रैव कीर्त्यते सद्भिर्ब्राह्मणस्वाभिमर्शने ।

नृगेण सुमहत् कृच्छ्रं यदवाप्तं कुरूद्वह ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं— कुरुश्रेष्ठ! इस विषयमें श्रेष्ठ पुरुष वह प्रसंग सुनाया करते हैं, जिसके अनुसार एक ब्राह्मणके धनको ले लेनेके कारण राजा नृगको महान् कष्ट उठाना पड़ा था ॥ १ ॥

निविशन्त्यां पुरा पार्थ द्वारवत्यामिति श्रुतिः ।

अदृश्यत महाकूपस्तृणवीरुत्समावृतः ॥ २ ॥

पार्थ! हमारे सुननेमें आया है कि पूर्वकालमें जब द्वारकापुरी बस रही थी, उसी समय वहाँ घास और लताओंसे ढँका हुआ एक विशाल कूप दिखायी दिया ॥ २ ॥

प्रयत्नं तत्र कुर्वाणास्तस्मात् कूपाज्जलार्थिनः ।

श्रमेण महता युक्तास्तस्मिंस्तोये सुसंवृते ॥ ३ ॥

ददृशुस्ते महाकायं कृकलासमवस्थितम् । वहाँ रहनेवाले यदुवंशी बालक उस कुएँका जल पीनेकी इच्छासे बड़े परिश्रमके साथ उस घास - फूसको हटानेके लिये महान् प्रयत्न करने लगे । इतनेहीमें उस कुएँके ढँके हुए जलमें स्थित हुए एक विशालकाय गिरगिटपर उनकी दृष्टि पड़ी ॥ ३३ ॥

तस्य चोद्धरणे यत्नमकुर्वंस्ते सहस्रशः ॥ ४ ।

प्रग्रहैश्चर्मपट्टैश्च तं बद्ध्वा पर्वतोपमम् ।

नाशक्नुवन् समुद्धर्तुं ततो जग्मुर्जनार्दनम् ॥ ५ ॥

फिर तो वे सहस्रों बालक उस गिरगिटको निकालनेका यत्न करने लगे । गिरगिटका शरीर एक पर्वतके समान था । बालकोंने उसे रस्सियों और चमड़ेकी पट्टियोंसे बाँधकर खींचनेके लिये बहुत जोर लगाया परंतु वह टस से मस न हुआ । जब बालक उसे निकालनेमें सफल न हो सके, तब वे भगवान् श्रीकृष्णके पास गये ॥ ४-५ ॥

खमावृत्योदपानस्य कृकलासः स्थितो महान् ।

तस्य नास्ति समुद्धर्तेत्येतत् कृष्णे न्यवेदयन् ॥ ६ ॥

उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे निवेदन किया-' भगवन्! एक बहुत बड़ा गिरगिट कुएँमें पड़ा है, जो उस कुएँके सारे आकाशको घेरकर बैठा है; पर उसे निकालनेवाला कोई नहीं

पृष्ठ 636

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है ' ॥ ६ ॥

स वासुदेवेन समुद्धृतश्च पृष्टश्च कार्यं निजगाद राजा । नृगस्तदाऽऽत्मानमथो न्यवेदयत् पुरातनं यज्ञसहस्रयाजिनम् ॥ ७ ॥

यह सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण उस कुएँके पास गये । उन्होंने उस गिरगिटको कुएँसे बाहर निकाला और अपने पावन हाथके स्पर्शसे राजा नृगका उद्धार कर दिया । इसके बाद उनसे परिचय पूछा । तब राजाने उन्हें अपना परिचय देते हुए कहा - ' प्रभो! पूर्वजन्ममें मैं राजा नृग था, जिसने एक सहस्र यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ' ॥ तथा ब्रुवाणं तु तमाह माधवः शुभं त्वया कर्म कृतं न पापकम् । कथं भवान् दुर्गतिमीदृशीं गतो नरेन्द्र तद् ब्रूहि किमेतदीदृशम् ॥ ८ ॥

उनकी ऐसी बात सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने पूछा — ' राजन्! आपने तो सदा पुण्यकर्म ही किया था, पापकर्म कभी नहीं किया, फिर आप ऐसी दुर्गतिमें कैसे पड़ गये? बताइये, क्यों आपको यह ऐसा कष्ट प्राप्त हुआ? ॥ ८ ॥

शतं सहस्राणि गवां शतं पुनः पुनः शतान्यष्टशतायुतानि । त्वया पुरा दत्तमितीह शुश्रुम नृप द्विजेभ्यः क्व नु तद् गतं तव ॥ ९ ॥

‘ नरेश्वर! हमने सुना है कि पूर्वकालमें आपने ब्राह्मणोंको पहले एक लाख गौएँ दान कीं । दूसरी बार सौ गौओंका दान किया । तीसरी बार पुनः सौ गौएँ दानमें दीं । फिर चौथी बार आपने गोदानका ऐसा सिलसिला चलाया कि लगातार अस्सी लाख गौओंका दान कर दिया । ( इस प्रकार आपके द्वारा इक्यासी लाख दो सौ गौएँ दानमें दी गयीं । ) आपके उन सब दानोंका पुण्यफल कहाँ चला गया? ' ॥ ९ ॥

नृगस्ततोऽब्रवीत् कृष्णं ब्राह्मणस्याग्निहोत्रिणः ।

प्रोषितस्य परिभ्रष्टा गौरेका मम गोधने ॥ १० ॥

तब राजा नृगने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा – ' प्रभो! एक अग्निहोत्री ब्राह्मण परदेश चला गया था । उसके पास एक गाय थी, जो एक दिन अपने स्थानसे भागकर मेरी गौओंके झुंडमें आ मिली ॥ १० ॥

गवां सहस्रे संख्याता तदा सा पशुपैर्मम ।

सा ब्राह्मणाय मे दत्ता प्रेत्यार्थमभिकाङ्क्षता ॥ ११ ॥

पृष्ठ 637

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‘ उस समय मेरे ग्वालोंने दानके लिये मँगायी गयी एक हजार गौओंमें उसकी भी गिनती करा दी और मैंने परलोकमें मनोवांछित फलकी इच्छासे वह गौ भी एक ब्राह्मणको दे दी ॥ ११ ॥

अपश्यत् परिमार्गंश्च तां गां परगृहे द्विजः ।

ममेयमिति चोवाच ब्राह्मणो यस्य साभवत् ॥ १२ ॥

' कुछ दिनों बाद जब वह ब्राह्मण परदेशसे लौटा, तब अपनी गाय ढूँढ़ने लगा । ढूँढ़ते-ढूँढ़ते जब वह गाय उसे दूसरेके घर मिली, तब उस ब्राह्मणने, जिसकी वह गौ पहले थी, उस दूसरे ब्राह्मणसे कहा - ' यह गाय तो मेरी है ' ॥ १२ ॥

तावुभौ समनुप्राप्तौ विवदन्तौ भृशज्वरौ ।

भवान् दाता भवान् हर्तेत्यथ तौ मामवोचताम् ॥ १३ ॥

‘ फिर तो वे दोनों आपसमें लड़ पड़े और अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए मेरे पास आये । उनमेंसे एकने कहा— "महाराज! यह गौ आपने मुझे दानमें दी है ( और यह ब्राह्मण इसे अपनी बता रहा है । ) ” दूसरेने कहा – “महाराज! वास्तवमें यह मेरी गाय है । आपने उसे चुरा लिया है " ॥ १३ ॥

शतेन शतसंख्येन गवां विनिमयेन वै ।

पृष्ठ 638

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याचे प्रतिग्रहीतारं स तु मामब्रवीदिदम् ॥ १४ ॥

देशकालोपसम्पन्ना दोग्ध्री शान्तातिवत्सला ।

स्वादुक्षीरप्रदा धन्या मम नित्यं निवेशने ॥ १५ ॥

‘ तब मैंने दान लेनेवाले ब्राह्मणसे प्रार्थनापूर्वक कहा- ' मैं इस गायके बदले आपको दस हजार गौएँ देता हूँ ( आप इन्हें इनकी गाय वापस दे दीजिये ) । यह सुनकर वह यों बोला —' महाराज! यह गौ देश- कालके अनुरूप, पूरा दूध देनेवाली, सीधी -सादी और अत्यन्त दयालुस्वभावकी है । यह बहुत मीठा दूध देनेवाली है । धन्य भाग्य जो यह मेरे घर आयी । यह सदा मेरे ही यहाँ रहे ॥ १४-१५ ॥

कृतं च भरते सा गौर्मम पुत्रमपस्तनम् ।

न सा शक्या मया दातुमित्युक्त्वा स जगाम ह ॥ १६ ॥

' अपने दूधसे यह गौ मेरे मातृहीन शिशुका प्रतिदिन पालन करती है; अतः मैं इसे

कदापि नहीं दे सकता । " यह कहकर वह उस गायको लेकर चला गया ॥ १६ ॥

ततस्तमपरं विप्रं याचे विनिमयेन वै ।

गवां शतसहस्रं हि तत्कृते गृह्यतामिति ॥ १७ ॥

‘ तब मैंने उन दूसरे ब्राह्मणसे याचना की— ' भगवन्! उसके बदलेमें आप मुझसे एक लाख गौएँ ले लीजिये ” ॥ १७ ॥

ब्राह्मणउवाच

न राज्ञां प्रतिगृह्णामि शक्तोऽहं स्वस्य मार्गणे ।

सैव गौर्दीयतां शीघ्रं ममेति मधुसूदन ॥ १८ ॥

' मधुसूदन! तब उस ब्राह्मणने कहा- " मैं राजाओंका दान नहीं लेता । मैं अपने लिये

धनका उपार्जन करनेमें समर्थ हूँ । मुझे तो शीघ्र मेरी वही गौ ला दीजिये " ॥ १८ ॥

रुक्ममश्वांश्च ददतो रजतस्यन्दनांस्तथा ।

न जग्राह ययौ चापि तदा स ब्राह्मणर्षभः ॥ १ ९ ॥

‘ मैंने उसे सोना, चाँदी, रथ और घोड़े - सब कुछ देना चाहा; परंतु वह उत्तम ब्राह्मण कुछ न लेकर तत्काल चुपचाप चला गया ॥ १ ९ ॥

एतस्मिन्नेव काले तु चोदितः कालधर्मणा ।

पितृलोकमहं प्राप्य धर्मराजमुपागमम् ॥ २० ॥

' इसी बीचमें कालकी प्रेरणासे मैं मृत्युको प्राप्त हुआ और पितृलोकमें पहुँचकर धर्मराजसे मिला ॥ २० ॥

यमस्तु पूजयित्वा मां ततो वचनमब्रवीत् ।

नान्तः संख्यायते राजंस्तव पुण्यस्य कर्मणः ॥ २१ ॥

अस्ति चैव कृतं पापमज्ञानात् तदपि त्वया ।

पृष्ठ 639

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चरस्व पापं पश्चाद् वा पूर्वं वा त्वं यथेच्छसि ॥ २२ ॥

‘ यमराजने मेरा आदर-सत्कार करके मुझसे यह बात कही - "राजन्! तुम्हारे पुण्यकर्मोंकी तो गिनती ही नहीं है । परन्तु अनजानमें तुमसे एक पाप भी बन गया है । उस पापको तुम पीछे भोगो या पहले ही भोग लो, जैसी तुम्हारी इच्छा हो, करो ॥ २१-२२ ॥

रक्षितास्मीति चोक्तं ते प्रतिज्ञा चानृता तव ।

ब्राह्मणस्वस्य चादानं द्विविधस्ते व्यतिक्रमः ॥ २३ ॥

“ आपने प्रजाके धन -जनकी रक्षाके लिये प्रतिज्ञा की थी; किंतु उस ब्राह्मणकी गाय खो जानेके कारण आपकी वह प्रतिज्ञा झूठी हो गयी । दूसरी बात यह है कि आपने ब्राह्मणके धनका भूलसे अपहरण कर लिया था । इस तरह आपके द्वारा दो तरहका अपराध हो गया है " ॥ २३ ॥

पूर्वं कृच्छ्रं चरिष्येऽहं पश्चाच्छुभमिति प्रभो ।

धर्मराजं ब्रुवन्नेवं पतितोऽस्मि महीतले ॥ २४ ॥

‘ तब मैंने धर्मराजसे कहा -प्रभो! मैं पहले पाप ही भोग लूँगा । उसके बाद पुण्यका उपभोग करूँगा । इतना कहना था कि मैं पृथ्वीपर गिरा ॥ २४ ॥

अश्रौषं पतितश्चाहं यमस्योच्चैः प्रभाषतः ।

वासुदेवः समुद्धर्ता भविता ते जनार्दनः ॥ २५ ॥

पूर्णे वर्षसहस्रान्ते क्षीणे कर्मणि दुष्कृते ।

प्राप्स्यसे शाश्वताल्लोँकाञ्जितान् स्वेनैव कर्मणा ॥ २६ ॥

‘ गिरते समय उच्चस्वरसे बोलते हुए यमराजकी यह बात मेरे कानोंमें पड़ी — ‘ महाराज! एक हजार दिव्य वर्ष पूर्ण होनेपर तुम्हारे पापकर्मका भोग समाप्त होगा । उस समय जनार्दन भगवान् श्रीकृष्ण आकर तुम्हारा उद्धार करेंगे और तुम अपने पुण्यकर्मोंके प्रभावसे प्राप्त हुए सनातन लोकोंमें जाओगे ' ॥ २५-२६ ॥

कूपेऽऽत्मानमधःशीर्षमपश्यं पतितश्च ह ।

तिर्यग्योनिमनुप्राप्तं न च मामजहात् स्मृतिः ॥ २७ ॥

‘ कुएँमें गिरनेपर मैंने देखा, मुझे तिर्यग्योनि ( गिरगिटकी देह ) मिली है और मेरा सिर नीचेकी ओर है । इस योनिमें भी मेरी पूर्वजन्मोंकी स्मरणशक्तिने मेरा साथ नहीं छोड़ा है ॥ २७ ॥

त्वया तु तारितोऽस्म्यद्य किमन्यत्र तपोबलात् ।

अनुजानीहि मां कृष्ण गच्छेयं दिवमद्य वै ॥ २८ ॥

' श्रीकृष्ण! आज आपने मेरा उद्धार कर दिया । इसमें आपके तपोबलके सिवा और क्या कारण हो सकता है । अब मुझे आज्ञा दीजिये, मैं स्वर्गलोकको जाऊँगा' ॥ २८ ॥

अनुज्ञातः स कृष्णेन नमस्कृत्य जनार्दनम् ।

दिव्यमास्थाय पन्थानं ययौ दिवमरिंदमः ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 640

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भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें आज्ञा दे दी और वे शत्रुदमन नरेश उन्हें प्रणाम करके दिव्य मार्गका आश्रय ले स्वर्गलोकको चले गये ॥ २ ९ ॥

ततस्तस्मिन् दिवं याते नृगे भरतसत्तम ।

वासुदेव इमं श्लोकं जगाद कुरुनन्दन ॥ ३० ॥

भरतश्रेष्ठ! कुरुनन्दन! राजा नृगके स्वर्गलोकको चले जानेपर वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने इस श्लोकका गान किया- ॥ ३० ॥

ब्राह्मणस्वं न हर्तव्यं पुरुषेण विजानता ।

ब्राह्मणस्वं हृतं हन्ति नृगं ब्राह्मणगौरिव ॥ ३१ ॥

' समझदार मनुष्यको ब्राह्मणके धनका अपहरण नहीं करना चाहिये । चुराया हुआ ब्राह्मणका धन चोरका उसी प्रकार नाश कर देता है, जैसे ब्राह्मणकी गौने राजा नृगका सर्वनाश किया था' ॥ ३१ ॥

सतां समागमः सद्भिर्नाफलः पार्थ विद्यते ।

विमुक्तं नरकात् पश्य नृगं साधुसमागमात् ॥ ३२ ॥

कुन्तीनन्दन! यदि सज्जन पुरुष सत्पुरुषोंका संग करें तो उनका वह संग व्यर्थ नहीं जाता । देखो, श्रेष्ठ पुरुषके समागमके कारण राजा नृगका नरकसे उद्धार हो गया ॥

प्रदानफलवत् तत्र द्रोहस्तत्र तथाफलः ।

अपचारं गवां तस्माद् वर्जयेत युधिष्ठिर ॥ ३३ ॥

युधिष्ठिर! गौओंका दान करनेसे जैसा उत्तम फल मिलता है, वैसे ही गौओंसे द्रोह करनेपर बहुत बड़ा कुफल भोगना पड़ता है; इसलिये गौओंको कभी कष्ट नहीं पहुँचाना चाहिये ॥ ३३ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि नृगोपाख्याने सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें नृगका उपाख्यानविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ७० ॥