श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 711–720
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 711–720
पृष्ठ 711
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
गौओ! मैं तुमसे सम्मान चाहती हूँ । तुम सदा सबका कल्याण करनेवाली हो । तुम्हारे किसी एक अंगमें, नीचेके कुत्सित अंगमें भी यदि स्थान मिल जाय तो मैं उसमें रहना चाहती हूँ ॥ २१ ॥
न वोऽस्ति कुत्सितं किंचिदंगेष्वालक्ष्यतेऽनघाः ।
पुण्याः पवित्राः सुभगा ममादेशं प्रयच्छथ ॥ २२ ॥
वसेयं यत्र वो देहे तन्मे व्याख्यातुमर्हथ । निष्पाप गौओ! वास्तवमें तुम्हारे अंगोंमें कहीं कोई कुत्सित स्थान नहीं दिखायी देता । तुम परम पुण्यमयी, पवित्र और सौभाग्यशालिनी हो । अतः मुझे आज्ञा दो। तुम्हारे शरीरमें जहाँ मैं रह सकूँ, उसके लिये मुझे स्पष्ट बताओ ॥ २२ ॥
एवमुक्तास्ततो गावः शुभाः करुणवत्सलाः ।
सम्मन्त्र्य सहिताः सर्वाः श्रियमूचुर्नराधिप ॥ २३ ॥
नरेश्वर! लक्ष्मीके ऐसा कहनेपर करुणा और वात्सल्यकी मूर्ति शुभस्वरूपा गौओंने एक साथ मिलकर सलाह की; फिर सबने लक्ष्मीसे कहा— ॥ २३ ॥
अवश्यं मानना कार्या तवास्माभिर्यशस्विनि ।
शकृन्मूत्रे निवस त्वं पुण्यमेतद्धि नः शुभे ॥ २४ ॥
‘ शुभे! यशस्विनि! अवश्य ही हमें तुम्हारा सम्मान करना चाहिये । तुम हमारे गोबर और मूत्रमें निवास करो; क्योंकि हमारी ये दोनों वस्तुएँ परम पवित्र हैं ' ॥ २४ ॥
श्रीरुवाच
दिष्ट्या प्रसादो युष्माभिः कृतो मेऽनुग्रहात्मकः ।
एवं भवतु भद्रं वः पूजितास्मि सुखप्रदाः ॥ २५ ॥
लक्ष्मीने कहा — सुखदायिनी गौओ! धन्यभाग्य जो तुमलोगोंने मुझपर अपना कृपापूर्ण प्रसाद प्रकट किया । ऐसा ही होगा – मैं तुम्हारे गोबर और मूत्रमें ही निवास करूँगी । तुमने मेरा मान रख लिया, अतः तुम्हारा कल्याण हो ॥ २५ ॥
एवं कृत्वा तु समयं श्रीर्गोभिः सह भारत ।
पश्यन्तीनां ततस्तासां तत्रैवान्तरधीयत ॥ २६ ॥
भरतनन्दन! इस प्रकार गौओंके साथ प्रतिज्ञा करके लक्ष्मीजी उनके देखते -देखते वहाँसे अन्तर्धान हो गयीं ॥ २६ ॥
एवं गोशकृतः पुत्र माहात्म्यं तेऽनुवर्णितम् ।
माहात्म्यं च गवां भूयः श्रूयतां गदतो मम ॥ २७ ॥
बेटा! इस तरह मैंने तुमसे गोबरका माहात्म्य बतलाया है। अब पुनः गौओंका माहात्म्य बतला रहा हूँ, सुनो ॥ २७ ॥
पृष्ठ 712
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्रीगोसंवादो नाम द्वयशीतितमोऽध्यायः ॥ ८२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें लक्ष्मी और गौओंका संवादनामक बयासीवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ८२ ॥
Fara
पृष्ठ 713
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
त्र्यशीतितमोऽध्यायः ब्रह्माजीका इन्द्रसे गोलोक और गौओंका उत्कर्ष बताना और गौओंको वरदान देना भीष्म उवाच
ये च गां सम्प्रयच्छन्ति हुतशिष्टाशिनश्च ये ।
तेषां सत्राणि यज्ञाश्च नित्यमेव युधिष्ठिर ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! जो मनुष्य सदा यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन और गोदान करते हैं उन्हें प्रतिदिन अन्नदान और यज्ञ करनेका फल मिलता है ॥ १ ॥
ऋते दधि घृतेनेह न यज्ञः सम्प्रवर्तते ।
तेन यज्ञस्य यज्ञत्वमतो मूलं च कथ्यते ॥ २ ॥
दही और गोघृतके बिना यज्ञ नहीं होता । उन्हींसे यज्ञका यज्ञत्व सफल होता है । अतः गौओंको यज्ञका मूल कहते हैं ॥ २ ॥
दानानामपि सर्वेषां गवां दानं प्रशस्यते ।
गावः श्रेष्ठाः पवित्राश्च पावनं ह्येतदुत्तमम् ॥ ३ ॥
सब प्रकारके दानोंमें गोदान ही उत्तम माना जाता है; इसलिये गौएँ श्रेष्ठ, पवित्र तथा परम पावन हैं ॥ ३ ॥
पुष्ट्यर्थमेताः सेवेत शान्त्यर्थमपि चैव ह ।
पयोदधिघृतं चासां सर्वपापप्रमोचनम् ॥ ४ ॥
मनुष्यको अपने शरीरकी पुष्टि तथा सब प्रकारके विघ्नोंकी शान्तिके लिये भी गौओंका सेवन करना चाहिये । इनके दूध, दही और घी सब पापोंसे छुड़ानेवाले हैं ॥ ४ ॥
गावस्तेजः परं प्रोक्तमिह लोके परत्र च ।
न गोभ्यः परमं किंचित् पवित्रं भरतर्षभ ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! गौएँ इहलोक और परलोकमें भी महान् तेजोरूप मानी गयी हैं। गौओंसे बढ़कर पवित्र कोई वस्तु नहीं है ॥ ५ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
पितामहस्य संवादमिन्द्रस्य च युधिष्ठिर ॥ ६ ॥
युधिष्ठिर! इस विषयमें विद्वान् पुरुष इन्द्र और ब्रह्माजीके इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ६ ॥
पराभूतेषु दैत्येषु शक्रस्त्रिभुवनेश्वरः ।
प्रजाः समुदिताः सर्वाः सत्यधर्मपरायणाः ॥ ७ ॥
पृष्ठ 714
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पूर्वकालमें देवताओंद्वारा दैत्योंके परास्त हो जानेपर जब इन्द्र तीनों लोकोंके अधीश्वर हुए तब समस्त प्रजा मिलकर बड़ी प्रसन्नताके साथ सत्य और धर्ममें तत्पर रहने लगी ॥ ७ ॥
अथर्षयः सगन्धर्वाः किन्नरोरगराक्षसाः ।
देवासुरसुपर्णाश्च प्रजानां पतयस्तथा ॥ ८ ॥
पर्युपासन्त कौन्तेय कदाचिद् वै पितामहम् ।
नारदः पर्वतश्चैव विश्वावसुर्हहाहुहूः ॥ ९ ॥
दिव्यतानेषु गायन्तः पर्युपासन्त तं प्रभुम् ।
तत्र दिव्यानि पुष्पाणि प्रावहत् पवनस्तदा ॥ १० ॥
आजहुर्ऋतवश्चापि सुगन्धीनि पृथक् पृथक् ।
तस्मिन् देवसमावाये सर्वभूतसमागमे ॥ ११ ॥
दिव्यवादित्रसंघुष्टे दिव्यस्त्रीचारणावृते ।
इन्द्रः पप्रच्छ देवेशमभिवाद्य प्रणम्य च ॥ १२ ॥
कुन्तीनन्दन! तदनन्तर एक दिन जब ऋषि, गन्धर्व, किन्नर, नाग, राक्षस, देवता, असुर, गरुड़ और प्रजापतिगण ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित थे, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा और हूहू नामक गन्धर्व जब दिव्य तान छेड़कर गाते हुए वहाँ उन भगवान् ब्रह्माजीकी उपासना करते थे, वायुदेव दिव्य पुष्पोंकी सुगन्ध लेकर बह रहे थे, पृथक्- पृथक् ऋतुएँ भी उत्तम सौरभसे युक्त दिव्य पुष्प भेंट कर रही थीं, देवताओंका समाज जुटा था, समस्त प्राणियोंका समागम हो रहा था, दिव्य वाद्योंकी मनोरम ध्वनि गूँज रही थी तथा दिव्यांगनाओं और चारणोंसे वह समुदाय घिरा हुआ था, उसी समय देवराज इन्द्रने देवेश्वर ब्रह्माजीको प्रणाम करके पूछा— ॥ ८–१२ ॥
देवानां भगवन् कस्माल्लोकेशानां पितामह ।
उपरिष्टाद् गवां लोक एतदिच्छामि वेदितुम् ॥ १३ ॥
‘ भगवन्! पितामह! गोलोक समस्त देवताओं और लोकपालोंके ऊपर क्यों है? मैं इसे जानना चाहता हूँ ॥
किं तपो ब्रह्मचर्यं वा गोभिः कृतमिहेश्वर ।
देवानामुपरिष्टाद् यद् वसन्त्यरजसः सुखम् ॥ १४ ॥
' प्रभो! गौओंने यहाँ किस तपस्याका अनुष्ठान अथवा ब्रह्मचर्यका पालन किया है, जिससे वे रजोगुणसे रहित होकर देवताओंसे भी ऊपर स्थानमें सुखपूर्वक निवास करती हैं? ' ॥ १४ ॥
ततः प्रोवाच ब्रह्मा तं शक्रं बलनिषूदनम् ।
अवज्ञातास्त्वया नित्यं गावो बलनिषूदन ॥ १५ ॥
तेन त्वमासां माहात्म्यं वेत्सि शृणु यत् प्रभो ।
पृष्ठ 715
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
गवां प्रभावं परमं माहात्म्यं च सुरर्षभ ॥ १६ ॥
तब ब्रह्माजीने बलसूदन इन्द्रसे कहा- ' बलासुरका विनाश करनेवाले देवेन्द्र! तुमने सदा गौओंकी अवहेलना की है । प्रभो! इसीलिये तुम इनका माहात्म्य नहीं जानते । सुरश्रेष्ठ! गौओंका महान् प्रभाव और माहात्म्य मैं बताता हूँ, सुनो ॥ १५-१६ ॥
यज्ञांगं कथिता गावो यज्ञ एव च वासव ।
एताभिश्च विना यज्ञो न वर्तेत कथंचन ॥ १७ ॥
‘ वासव! गौओंको यज्ञका अंग और साक्षात् यज्ञरूप बतलाया गया है; क्योंकि इनके दूध, दही और घीके बिना यज्ञ किसी तरह सम्पन्न नहीं हो सकता ॥ १७ ॥
धारयन्ति प्रजाश्चैव पयसा हविषा तथा ।
एतासां तनयाश्चापि कृषियोगमुपासते ॥ १८ ॥
जनयन्ति च धान्यानि बीजानि विविधानि च । ‘ ये अपने दूध - घीसे प्रजाका भी पालन - पोषण करती हैं । इनके पुत्र ( बैल ) खेतीके काम आते तथा नाना प्रकारके धान्य एवं बीज उत्पन्न करते हैं ॥ १८३ ॥
ततो यज्ञाः प्रवर्तन्ते हव्यं कव्यं च सर्वशः ॥ १ ९ ॥
पयोदधिघृतं चैव पुण्याश्चैताः सुराधिप ।
वहन्ति विविधान् भारान् क्षुत्तृष्णापरिपीडिताः ॥ २० ॥
‘ उन्हींसे यज्ञ सम्पन्न होते और हव्यकव्यका भी सर्वथा निर्वाह होता है । सुरेश्वर! इन्हीं गौओंसे दूध, दही और घी प्राप्त होते हैं । ये गौएँ बड़ी पवित्र होती हैं । बैल भूख- प्याससे पीड़ित होकर भी नाना प्रकारके बोझ ढोते रहते हैं ॥ १ ९ -२० ॥ मुनींश्च धारयन्तीह प्रजाश्चैवापि कर्मणा ।I वासवाकूटवाहिन्यः कर्मणा सुकृतेन च ॥ २१ ॥
‘ इस प्रकार गौएँ अपने कर्मसे ऋषियों तथा प्रजाओंका पालन करती रहती हैं । वासव!
इनके व्यवहारमें माया नहीं होती । ये सदा सत्कर्ममें ही लगी रहती हैं ॥ २१ ॥
उपरिष्टात् ततोऽस्माकं वसन्त्येताः सदैव हि ।
एवं ते कारणं शक्र निवासकृतमद्य वै ॥ २२ ॥
गवां देवोपरिष्टाद्धि समाख्यातं शतक्रतो ।
एता हि वरदत्ताश्च वरदाश्चापि वासव ॥ २३ ॥
‘ इसीसे ये गौएँ हम सब लोगोंके ऊपर स्थानमें निवास करती हैं । शक्र! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैंने यह बात बतायी कि गौएँ देवताओंके भी ऊपर स्थानमें क्यों निवास करती हैं । शतक्रतु इन्द्र! इसके सिवा ये गौएँ वरदान भी प्राप्त कर चुकी हैं और प्रसन्न होनेपर दूसरोंको वर देनेकी भी शक्ति रखती हैं ॥ २२-२३ ॥
सुरभ्यः पुण्यकर्मिण्यः पावनाः शुभलक्षणाः ।
यदर्थं गां गताश्चैव सुरभ्यः सुरसत्तम ॥ २४ ॥
पृष्ठ 716
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तच्च मे शृणु कार्त्स्न्येन वदतो बलसूदन । ‘ सुरभी गौएँ पुण्यकर्म करनेवाली और शुभ लक्षणा होती हैं । सुरश्रेष्ठ! बलसूदन! वे जिस उद्देश्यसे पृथ्वीपर गयी हैं, उसको भी मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ, सुनो ॥ २४ ॥
पुरा देवयुगे तात देवेन्द्रेषु महात्मसु ॥ २५ ॥
त्रींल्लोकाननुशासत्सु विष्णौ गर्भत्वमागते ।
अदित्यास्तप्यमानायास्तपो घोरं सुदुश्चरम् ॥ २६ ॥
पुत्रार्थममरश्रेष्ठ पादेनैकेन नित्यदा ।
तां तु दृष्ट्वा महादेवीं तप्यमानां महत्तपः ॥ २७ ॥
दक्षस्य दुहिता देवी सुरभी नाम नामतः ।
अतप्यत तपो घोरं हृष्टा धर्मपरायणा ॥ २८ ॥
'तात! पहले सत्ययुगमें जब महामना देवेश्वरगण तीनों लोकोंपर शासन करते थे और अमरश्रेष्ठ! जब देवी अदिति पुत्रके लिये नित्य एक पैरसे खड़ी रहकर अत्यन्त घोर एवं दुष्कर तपस्या करती थी और उस तपस्यासे संतुष्ट होकर साक्षात् भगवान् विष्णु ही उनके गर्भमें पदार्पण करनेवाले थे उन्हीं दिनोंकी बात है, महादेवी अदितिको महान् तप करती देख दक्षकी धर्मपरायणा पुत्री सुरभी देवीने बड़े हर्षके साथ घोर तपस्या आस्मभ की ॥ २५ —२८ ॥
कैलासशिखरे रम्ये देवगन्धर्वसेविते ।
व्यतिष्ठदेकपादेन परमं योगमास्थिता ॥ २ ९ ॥
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ।
संतप्तास्तपसा तस्या देवाः सर्षिमहोरगाः ॥ ३० ॥
‘ कैलासके रमणीय शिखरपर जहाँ देवता और गन्धर्व सदा विराजते रहते हैं, वहाँ वह उत्तम योगका आश्रय ले ग्यारह हजार वर्षोंतक एक पैरसे खड़ी रही । उसकी तपस्यासे देवता, ऋषि और बड़े - बड़े नाग भी संतप्त हो उठे ॥ २ ९ -३० ॥
तत्र गत्वा मया सार्धं पर्युपासन्त तां शुभाम् ।
अथाहमब्रुवं तत्र देवीं तां तपसान्विताम् ॥ ३१ ॥
' वे सब लोग मेरे साथ ही उस शुभलक्षणा तपस्विनी सुरभी देवीके पास जाकर खड़े हुए । तब मैंने वहाँ उससे कहा- ॥ ३१ ॥
किमर्थं तप्यसे देवि तपो घोरमनिन्दिते ।
प्रीतस्तेऽहं महाभागे तपसानेन शोभने ॥। ३२ ॥
वरयस्व वरं देवि दातास्मीति पुरंदर ॥ ३३ ॥
‘ सती- साध्वी देवी! तुम किसलिये यह घोर तपस्या करती हो? शोभने! महाभागे! मैं तुम्हारी इस तपस्यासे बहुत संतुष्ट हूँ । देवि! तुम इच्छानुसार वर माँगो । " पुरंदर! इस तरह मैंने सुरभीको वर माँगनेके लिये प्रेरित किया ॥ ३२-३३ ॥
पृष्ठ 717
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सुरभ्युवाच
वरेण भगवन् मह्यं कृतं लोकपितामह ।
एष एव वरो मेऽद्य यत् प्रीतोऽसि ममानघ ॥ ३४ ॥
सुरभीने कहा— भगवन्! निष्पाप लोकपितामह! मुझे वर लेनेकी कोई आवश्यकता नहीं है । मेरे लिये तो सबसे बड़ा वर यही है कि आज आप मुझपर प्रसन्न हो गये हैं ॥ ३४ ॥
ब्रह्मोवाच
तामेवं ब्रुवतीं देवीं सुरभिं त्रिदशेश्वर ।
प्रत्यब्रुवं यद् देवेन्द्र तन्निबोध शचीपते ॥ ३५ ॥
ब्रह्माजीने कहा— देवेश्वर! देवेन्द्र! शचीपते! जब सुरभी ऐसी बात कहने लगी तब मैंने उसे जो उत्तर दिया, वह सुनो ॥ ३५ ॥
अलोभकाम्यया देवि तपसा च शुभानने ।
प्रसन्नोऽहं वरं तस्मादमरत्वं ददामि ते ॥ ३६ ॥
पृष्ठ 718
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
( मैंने कहा— ) देवि! शुभानने! तुमने लोभ और कामनाको त्याग दिया है । तुम्हारी इस निष्काम तपस्यासे मैं बहुत प्रसन्न हूँ; अतः तुम्हें अमरत्वका वरदान देता हूँ ॥ ३६ ॥
त्रयाणामपि लोकानामुपरिष्टान्निवत्स्यसि ।
मत्प्रसादाच्च विख्यातो गोलोकः सम्भविष्यति ॥ ३७ ॥
तुम मेरी कृपासे तीनों लोकोंके ऊपर निवास करोगी और तुम्हारा वह धाम ‘ गोलोक ' नामसे विख्यात होगा ॥ ३७ ॥
मानुषेषु च कुर्वाणाः प्रजाः कर्म शुभास्तव ।
निवत्स्यन्ति महाभागे सर्वा दुहितरश्च ते ॥ ३८ ॥
महाभागे! तुम्हारी सभी शुभ संतानें – समस्त पुत्र और कन्याएँ मानवलोकमें उपयुक्त कर्म करती हुई निवास करेंगी ॥ ३८ ॥
मनसा चिन्तिता भोगास्त्वया वै दिव्यमानुषाः ।
यच्च स्वर्गे सुखं देवि तत् ते सम्पत्स्यते शुभे ॥ ३ ९ ॥
देवि! शुभे! तुम अपने मनसे जिन दिव्य अथवा मानवी भोगोंका चिन्तन करोगी तथा जो स्वर्गीय सुख होगा, वे सभी तुम्हें स्वतः प्राप्त होते रहेंगे ॥ ३ ९ ॥
तस्या लोकाः सहस्राक्ष सर्वकामसमन्विताः ।
न तत्र क्रमते मृत्युर्न जरा न च पावकः ॥ ४० ॥
सहस्राक्ष! सुरभीके निवासभूत गोलोकमें सबकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण होती हैं । वहाँ
मृत्यु और बुढ़ापाका आक्रमण नहीं होता है । अग्निका भी जोर नहीं चलता ॥ ४० ॥
न दैवं नाशुभं किंचिद् विद्यते तत्र वासव ।
तत्र दिव्यान्यरण्यानि दिव्यानि भवनानि च ॥ ४१ ॥
विमानानि सुयुक्तानि कामगानि च वासव । वासव! वहाँ न कोई दुर्भाग्य है और न अशुभ । वहाँ दिव्य वन, दिव्य भवन तथा परम सुन्दर एवं इच्छानुसार विचरनेवाले विमान मौजूद हैं ॥ ४१३३ ॥
ब्रह्मचर्येण तपसा यत्नेन च दमेन च ॥ ४२ ॥
दानैश्च विविधैः पुण्यैस्तथा तीर्थानुसेवनात् ।
तपसा महता चैव सुकृतेन च कर्मणा ॥ ४३ ॥
शक्यः समासादयितुं गोलोकः पुष्करेक्षण । कमलनयन इन्द्र! ब्रह्मचर्य, तपस्या, यत्न, इन्द्रियसंयम, नाना प्रकारके दान, पुण्य, तीर्थसेवन, महान् तप और अन्यान्य शुभ कर्मोंके अनुष्ठानसे ही गोलोककी प्राप्ति हो सकती है ॥ ४२-४३ ॥ एतत् ते सर्वमाख्यातं मया शक्रानुपृच्छते ॥ ४४ ॥
न ते परिभवः कार्यो गवामसुरसूदन ॥ ४५ ॥
पृष्ठ 719
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
असुरसूदन शक्र! इस प्रकार तुम्हारे पूछनेके अनुसार मैंने सारी बातें बतलायी हैं । अब तुम्हें गौओंका कभी तिरस्कार नहीं करना चाहिये ॥ ४४-४५ ॥ भीष्म उवाच
एतच्छ्रुत्वा सहस्राक्षः पूजयामास नित्यदा ।
गाश्चक्रे बहुमानं च तासु नित्यं युधिष्ठिर ॥ ४६ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! ब्रह्माजीका यह कथन सुनकर सहस्र नेत्रधारी इन्द्र प्रतिदिन गौओंकी पूजा करने लगे । उन्होंने उनके प्रति बहुत सम्मान प्रकट किया ॥ ४६ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं पावनं च महाद्युते ।
पवित्रं परमं चापि गवां माहात्म्यमुत्तमम् ॥ ४७ ॥
महाद्युते! यह सब मैंने तुमसे गौओंका परम पावन, परम पवित्र और अत्यन्त उत्तम माहात्म्य कहा है ॥ ४७ ॥
कीर्तितं पुरुषव्याघ्र सर्वपापविमोचनम् ।
य इदं कथयेन्नित्यं ब्राह्मणेभ्यः समाहितः ॥ ४८ ॥
हव्यकव्येषु यज्ञेषु पितृकार्येषु चैव ह ।
सार्वकामिकमक्षय्यं पितॄंस्तस्योपतिष्ठते ॥ ४ ९ ॥
पुरुषसिंह! यदि इसका कीर्तन किया जाय तो यह समस्त पापोंसे छुटकारा दिलानेवाला है । जो एकाग्रचित्त हो सदा यज्ञ और श्राद्धमें हव्य और कव्य अर्पण करते समय ब्राह्मणोंको यह प्रसंग सुनायेगा, उसका दिया हुआ ( हव्य और कव्य) समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और अक्षय होकर पितरोंको प्राप्त होगा ॥ ४८-४९ ॥
गोषु भक्तश्च लभते यद् यदिच्छति मानवः ।
स्त्रियोऽपि भक्ता या गोषु ताश्च काममवाप्नुयुः ॥ ५० ॥
गोभक्त मनुष्य जिस - जिस वस्तुकी इच्छा करता है, वह सब उसे प्राप्त होती है । स्त्रियोंमें भी जो गौओंकी भक्ता हैं, वे मनोवाञ्छित कामनाएँ प्राप्त कर लेती हैं ॥ ५० ॥
पुत्रार्थी लभते पुत्रं कन्यार्थी तामवाप्नुयात् ।
धनार्थी लभते वित्तं धर्मार्थी धर्ममाप्नुयात् ॥ ५१ ॥
पुत्रार्थी मनुष्य पुत्र पाता है और कन्यार्थी कन्या । धन चाहनेवालेको धन और धर्म चाहनेवालेको धर्म प्राप्त होता है ॥ ५१ ॥
विद्यार्थी चाप्नुयाद् विद्यां सुखार्थी प्राप्नुयात् सुखम् ।
न किंचिद् दुर्लभं चैव गवां भक्तस्य भारत ॥ ५२ ॥
विद्यार्थी विद्या पाता है और सुखार्थी सुख। भारत! गोभक्तके लिये यहाँ कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ ५२ ॥
पृष्ठ 720
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोलोकवर्णने त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोलोकका वर्णनविषयक तिरासीवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ८३ ॥