06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 731–740
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 731–740
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‘ प्रभो! संतानके लिये प्रकट होनेवाला जो आपका उत्तम तेज है, उसे आप अपने भीतर ही रोक लीजिये । आप दोनों त्रिलोकीके सारभूत हैं । अतः अपनी संतानके द्वारा सम्पूर्ण जगत्को संतप्त कर डालेंगे ॥ ६७ ॥
तदपत्यं हि युवयोर्देवानभिभवेद् ध्रुवम् ।
न हि ते पृथिवी देवी न च द्यौर्न दिवं विभो ॥ ६८ ॥
नेदं धारयितुं शक्ताः समस्ता इति मे मतिः ।
तेजःप्रभावनिर्दग्धं तस्मात् सर्वमिदं जगत् ॥ ६ ९ ॥
‘ आप दोनोंसे जो पुत्र उत्पन्न होगा, वह निश्चय ही देवताओंको पराजित कर देगा । प्रभो! हमारा तो ऐसा विश्वास है कि न तो पृथ्वीदेवी, न आकाश और न स्वर्ग ही आपके तेजको धारण कर सकेगा । ये सब मिलकर भी आपके इस तेजको धारण करनेमें समर्थ नहीं हैं । यह सारा जगत् आपके तेजके प्रभावसे भस्म हो जायगा ॥ ६८-६९ ॥ तस्मात् प्रसादं भगवन् कर्तुमर्हसि नः प्रभो ।
न देव्यां सम्भवेत् पुत्रो भवतः सुरसत्तम ।
धैर्यादेव निगृह्णीष्व तेजो ज्वलितमुत्तमम् ॥ ७० ॥
‘ अतः भगवन्! हमपर कृपा कीजिये । प्रभो! सुरश्रेष्ठ! हम यही चाहते हैं कि देवी पार्वतीके गर्भसे आपके कोई पुत्र न हो । आप धैर्यसे ही अपने प्रज्वलित उत्तम तेजको भीतर ही रोक लीजिये ' ॥ ७० ॥
इति तेषां कथयतां भगवान् वृषभध्वजः ।
एवमस्त्विति देवांस्तान् विप्रर्षे प्रत्यभाषत ॥ ७१ ॥
' विप्रर्षे! देवताओंके ऐसा कहनेपर भगवान् वृषभध्वजने उनसे ‘ एवमस्तु' कह दिया ॥ ७१ ॥
इत्युक्त्वा चोर्ध्वमनयद् रेतो वृषभवाहनः ।
ऊर्ध्वरेताः समभवत् ततः प्रभृति चापि सः ॥ ७२ ॥
‘ देवताओंसे ऐसा कहकर वृषभवाहन भगवान् शंकरने अपने ‘ रेतस्’ अर्थात् वीर्यको ऊपर चढ़ा लिया । तभीसे वे ' ऊर्ध्वरेता' नामसे विख्यात हुए ॥ ७२ ॥
रुद्राणीति ततः क्रुद्धा प्रजोच्छेदे तदा कृते ।
देवानथाब्रवीत् तत्र स्त्रीभावात् परुषं वचः ॥ ७३ ॥
'देवताओंने मेरी भावी संतानका उच्छेद कर डाला' यह सोचकर उस समय देवी रुद्राणी बहुत कुपित हुईं और स्त्री- स्वभाव होनेके कारण उन्होंने देवताओंसे यह कठोर वचन कहा— ॥ ७३ ॥
यस्मादपत्यकामो वै भर्ता मे विनिवर्तितः ।
तस्मात् सर्वे सुरा यूयमनपत्या भविष्यथ ॥ ७४ ॥
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‘ देवताओ! मेरे पतिदेव मुझसे संतान उत्पन्न करना चाहते थे, किंतु तुमलोगोंने इन्हें इस कार्यसे निवृत्त कर दिया; इसलिये तुम सभी देवता निर्वंश हो जाओगे ॥
प्रजोच्छेदो मम कृतो यस्माद् युष्माभिरद्य वै ।
तस्मात् प्रजा वः खगमाः सर्वेषां न भविष्यति ॥ ७५ ॥
‘ आकाशचारी देवताओ! आज तुम सब लोगोंने मिलकर मेरी संततिका उच्छेद किया है; अतः तुम सब लोगोंके भी संतान नहीं होगी' ॥ ७५ ॥
पावकस्तु न तत्रासीच्छापकाले भृगूद्वह ।
देवा देव्यास्तथा शापादनपत्यास्ततोऽभवन् ॥ ७६ ॥
भृगुश्रेष्ठ! उस शापके समय वहाँ अग्निदेव नहीं थे; अतः उनपर यह शाप लागू नहीं हुआ । अन्य सब देवता देवीके शापसे संतानहीन हो गये ॥ ७६ ॥
रुद्रस्तु तेजोऽप्रतिमं धारयामास वै तदा ।
प्रस्कन्नं तु ततस्तस्मात् किंचित्तत्रापतद् भुवि ॥ ७७ ॥
रुद्रदेवने उस समय अपने अनुपम तेज ( वीर्य) को यद्यपि रोक लिया था; तो भी किंचित् स्खलित होकर वहीं पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ७७ ॥
उत्पपात तदा वह्नौ ववृधे चाद्भुतोपमम् ।
तेजस्तेजसि संयुक्तमात्मयोनित्वमागतम् ॥ ७८ ॥
वह अद्भुत तेज अग्निमें पड़कर बढ़ने और ऊपरको उठने लगा । तेजसे संयुक्त हुआ वह तेज एक स्वयम्भू पुरुषके रूपमें अभिव्यक्त होने लगा ॥ ७८ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु देवाः शक्रपुरोगमाः ।
असुरस्तारको नाम तेन संतापिता भृशम् ॥ ७९ ॥
इसी समय तारक नामक एक असुर उत्पन्न हुआ था, जिसने इन्द्र आदि देवताओंको अत्यन्त संतप्त कर दिया था ॥ ७९ ॥
आदित्या वसवो रुद्रा मरुतोऽथाश्विनावपि ।
साध्याश्च सर्वे संत्रस्ता दैतेयस्य पराक्रमात् ॥ ८० ॥
आदित्य, वसु, रुद्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार तथा साध्य- सभी देवता उस दैत्यके पराक्रमसे संत्रस्त हो उठे थे ॥ ८० ॥
स्थानानि देवतानां हि विमानानि पुराणि च ।
ऋषीणां चाश्रमाश्चैव बभूवुरसुरैर्हृताः ॥ ८१ ॥
असुरोंने देवताओंके स्थान, विमान, नगर तथा ऋषियोंके आश्रम भी छीन लिये थे ॥ ८१ ॥
ते दीनमनसः सर्वे देवता ऋषयश्चये प्रजग्मुः शरणं देवं ब्रह्माणमजरं विभुम् ॥ ८२ ॥
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वे सब देवता और ऋषि दीनचित्त हो अजर- अमर एवं सर्वव्यापी देवता भगवान् ब्रह्माकी शरणमें गये ॥ ८२ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सुवर्णोत्पत्तिर्नाम चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥ ८४ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गतदानधर्मपर्वमें सुवर्णकी उत्पत्ति नामक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८४ ॥
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पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध देवा ऊचुः
असुरस्तारको नाम त्वया दत्तवरः प्रभो ।
सुरानृषींश्च क्लिश्नाति वधस्तस्य विधीयताम् ॥ १ ॥
देवता बोले — प्रभो! आपने जिसे वर दे रखा है, वह तारक नामक असुर देवताओं
और ऋषियोंको बड़ा कष्ट दे रहा है । अतः उसके वधका कोई उपाय कीजिये ॥
तस्माद् भयं समुत्पन्नमस्माकं वै पितामह ।
परित्रायस्व नो देव न ह्यन्या गतिरस्ति नः ॥ २ ॥
पितामह! देव! उस असुरसे हमलोगोंको भारी भय उत्पन्न हो गया है । आप हमारी उससे रक्षा करें; क्योंकि हमारे लिये दूसरी कोई गति नहीं है ॥ २ ॥
ब्रह्मोवाच
समोऽहं सर्वभूतानामधर्मं नेह रोचये ।
हन्यतां तारकः क्षिप्रं सुरर्षिगणबाधिता ॥ ३ ॥
ब्रह्माजीने कहा- मेरा तो समस्त प्राणियोंके प्रति समान भाव है तथापि मैं अधर्म नहीं पसन्द करता; अतः देवताओं तथा ऋषियोंको कष्ट देनेवाले तारकासुरको तुम लोग शीघ्र ही मार डालो ॥ ३ ॥
वेदा धर्माश्च नोच्छेदं गच्छेयुः सुरसत्तमाः ।
विहितं पूर्वमेवात्र मया वै व्येतु वो ज्वरः ॥ ४ ॥
सुरश्रेष्ठगण! वेदों और धर्मोंका उच्छेद न हो, इसका उपाय मैंने पहलेसे ही कर लिया है । अतः तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ॥ ४ ॥
देवा ऊचुः वरदानाद् भगवतो दैतेयो बलगर्वितः ।
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देवैर्न शक्यते हन्तुं स कथं प्रशमं व्रजेत् ॥ ५ ॥
देवता बोले- भगवन्! आपके ही वरदानसे वह दैत्य बलके घमंडसे भर गया है ।
देवता उसे नहीं मार सकते । ऐसी दशामें वह कैसे शान्त हो सकता है? ॥ ५ ॥
स हि नैव स्म देवानां नासुराणां न रक्षसाम् ।
वध्यः स्यामिति जग्राह वरं त्वत्तः पितामह ॥ ६ ॥
पितामह! उसने आपसे यह वरदान प्राप्त कर लिया है कि देवताओं, असुरों तथा राक्षसोंमेंसे किसीके हाथसे भी मारा न जाऊँ ॥ ६ ॥
देवाश्च शप्ता रुद्राण्या प्रजोच्छेदे पुराकृते ।
न भविष्यति वोऽपत्यमिति सर्वे जगत्पते ॥ ७ ॥
जगत्पते! पूर्वकालमें जब हमने रुद्राणीकी संततिका उच्छेद कर दिया, तब उन्होंने सब देवताओंको शाप दे दिया कि तुम्हारे कोई संतान नहीं होगी ॥ ७ ॥
ब्रह्मोवाच
हुताशनो न तत्रासीच्छापकाले सुरोत्तमाः ।
स उत्पादयितापत्यं वधाय त्रिदशद्विषाम् ॥ ८ ॥
ब्रह्माजी बोले- सुरश्रेष्ठगण! उस शापके समय वहाँ अग्निदेव नहीं थे । अतः देवद्रोहियोंके वधके लिये वे ही संतान उत्पन्न करेंगे ॥ ८ ॥
तद् वै सर्वानतिक्रम्य देवदानवराक्षसान् ।
मानुषानथ गन्धर्वान् नागानथ च पक्षिणः ॥ ९ ॥
अस्त्रेणामोघपातेन शक्या तं घातयिष्यति ।
यतो वो भयमुत्पन्नं ये चान्ये सुरशत्रवः ॥ १० ॥
वही समस्त देवताओं, दानवों, राक्षसों, मनुष्यों, गन्धर्वों, नागों तथा पक्षियोंको लाँघकर अपने अचूक अस्त्र - शक्तिके द्वारा उस असुरका वध कर डालेगा, जिससे तुम्हें भय उत्पन्न हुआ है । दूसरे जो देवशत्रु हैं, उनका भी वह संहार कर डालेगा ॥ ९ -१० ॥
सनातनो हि संकल्पः काम इत्यभिधीयते ।
रुद्रस्य तेजः प्रस्कन्नमग्नौ निपतितं च यत् ॥ ११ ॥
तत्तेजोऽग्निर्महद्भूतं द्वितीयमिति पावकम् ।
वधार्थं देवशत्रूणां गंगायां जनयिष्यति ॥ १२ ॥
सनातन संकल्पको ही काम कहते हैं । उसी कामसे रुद्रका जो तेज स्खलित होकर अग्निमें गिरा था, उसे अग्निने ले रखा है । द्वितीय अग्निके समान उस महान् तेजको वे गंगाजीमें स्थापित करके बालकरूपसे उत्पन्न करेंगे । वही बालक देवशत्रुओंके वधका कारण होगा ॥ ११-१२ ॥ स तु नावाप तं शापं नष्टः स हुतभुक् तदा ।
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तस्माद् वो भयहृद् देवाः समुत्पत्स्यति पावकिः ॥ १३ ॥
अग्निदेव उस समय छिपे हुए थे, इसलिये वह शाप उन्हें नहीं प्राप्त हुआ; अतः देवताओ! अग्निके जो पुत्र उत्पन्न होगा, वह तुमलोगोंका सारा भय हर लेगा ॥
अन्विष्यतां वै ज्वलनस्तथा चाद्य नियुज्यताम् ।
तारकस्य वधोपायः कथितो वै मयानघाः ॥ १४ ॥
तुमलोग अग्निदेवकी खोज करो और उन्हें आज ही इस कार्यमें नियुक्त करो । निष्पाप देवताओ! तारकासुरके वधका यह उपाय मैंने बता दिया ॥ १४ ॥
न हि तेजस्विनां शापास्तेजःसु प्रभवन्ति वै ।
बलान्यतिबलं प्राप्य दुर्बलानि भवन्ति वै ॥ १५ ॥
तेजस्वी पुरुषोंके शाप तेजस्वियोंपर अपना प्रभाव नहीं दिखाते । साधारण बली कितने ही क्यों न हों, अत्यन्त बलशालीको पाकर दुर्बल हो जाते हैं ॥ १५ ॥
हन्यादवध्यान् वरदानपि चैव तपस्विनः ।
संकल्पाभिरुचिः कामः सनातनतमोऽभवत् ॥ १६ ॥
तपस्वी पुरुषका जो काम है, वही संकल्प एवं अभिरुचिके नामसे प्रसिद्ध है । वह सनातन या चिरस्थायी होता है । वह वर देनेवाले अवध्य पुरुषोंका भी वध कर सकता है ॥ १६ ॥
जगत्पतिरनिर्देश्यः सर्वगः सर्वभावनः ।
हृच्छयः सर्वभूतानां ज्येष्ठो रुद्रादपि प्रभुः ॥ १७ ॥
अग्निदेव इस जगत्के पालक, अनिर्वचनीय, सर्वव्यापी, सबके उत्पादक, समस्त प्राणियोंके हृदयमें शयन करनेवाले, सर्वसमर्थ तथा रुद्रसे भी ज्येष्ठ हैं ॥
अन्विष्यतां स तु क्षिप्रं तेजोराशिर्हुताशनः ।
वो मनोगतं कामं देवः सम्पादयिष्यति ॥ १८ ॥
तेजकी राशिभूत अग्निदेवका तुम सब लोग शीघ्र अन्वेषण करो । वे तुम्हारी मनोवांछित कामनाको पूर्ण करेंगे ॥
एतद् वाक्यमुपश्रुत्य ततो देवा महात्मनः ।
जग्मुः संसिद्धसंकल्पाः पर्येषन्तो विभावसुम् ॥ १ ९ ॥
महात्मा ब्रह्माजीका यह कथन सुनकर सफलमनोरथ हुए देवता अग्निदेवका अन्वेषण करनेके लिये वहाँसे चले गये ॥ १ ९ ॥
ततस्त्रैलोक्यमुषयो व्यचिन्वन्त सुरैः सह ।
कांक्षन्तो दर्शनं बह्नेः सर्वे तद्गतमानसाः ॥ २० ॥
तब देवताओंसहित ऋषियोंने तीनों लोकोंमें अग्निकी खोज प्रारम्भ की । उन सबका मन उन्हींमें लगा था और वे सभी अग्निदेवका दर्शन करना चाहते थे ॥ २० ॥
परेण तपसा युक्ताः श्रीमन्तो लोकविश्रुताः ।
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लोकानन्वचरन् सिद्धाः सर्व एव भृगूत्तम ॥ २१ ॥
भृगुश्रेष्ठ! उत्तम तपस्यासे युक्त, तेजस्वी और लोकविख्यात सभी सिद्ध देवता सभी लोकोंमें अग्निदेवकी खोज करते रहे ॥ २१ ॥
नष्टमात्मनि संलीनं नाधिजग्मुर्हुताशनम् ।
ततः संजातसंत्रासानग्निदर्शनलालसान् ॥ २२ ॥
जलेचरः क्लान्तमनास्तेजसाग्नेः प्रदीपितः ।
उवाच देवान् मण्डूको रसातलतलोत्थितः ॥ २३ ॥
वे छिपकर अपने - आपमें ही लीन थे; अतः देवता उनके पास नहीं पहुँच सके । तब अग्निका दर्शन करनेके लिये उत्सुक और भयभीत हुए देवताओंसे एक जलचारी मेढक, जो अग्निके तेजसे दग्ध एवं क्लान्तचित्त होकर रसातलसे ऊपरको आया था, बोला - ॥ २२-२३ ॥
रसातलतले देवा वसत्यग्निरिति प्रभो ।
संतापादिह सम्प्राप्तः पावकप्रभवादहम् ॥ २४ ॥
‘ देवताओ! अग्नि रसातलमें निवास करते हैं । प्रभो! मैं अग्निजनित संतापसे ही घबराकर यहाँ आया हूँ ॥
स संसुप्तो जले देवा भगवान् हव्यवाहनः ।
अपः संसृज्य तेजोभिस्तेन संतापिता वयम् ॥ २५ ॥
‘ देवगण! भगवान् अग्निदेव अपने तेजके साथ जलको संयुक्त करके जलमें ही सोये हैं । हमलोग उन्हींके तेजसे संतप्त हो रहे हैं ॥ २५ ॥
तस्य दर्शनमिष्टं वो यदि देवा विभावसोः ।
तत्रैवमधिगच्छध्वं कार्यं वो यदि वह्निना ॥ २६ ॥
‘ देवताओ! यदि आपको अग्निदेवका दर्शन अभीष्ट हो और यदि उनसे आपका कोई कार्य हो तो वहीं जाकर उनसे मिलिये ॥ २६ ॥
गम्यतां साधयिष्यामो वयं ह्यग्निभयात् सुराः ।
एतावदुक्त्वा मण्डूकस्त्वरितो जलमाविशत् ॥ २७ ॥
' देवगण! आप जाइये । हम भी अग्निके भयसे अन्यत्र जायँगे । ' इतना ही कहकर वह मेढक तुरंत ही जलमें घुस गया ॥ २७ ॥
हुताशनस्तु बुबुधे मण्डूकस्य च पैशुनम् ।
शशाप स तमासाद्य न रसान् वेत्स्यसीति वै ॥ २८ ॥
अग्निदेव समझ गये कि मेढकने मेरी चुगली खायी है; अतः उन्होंने उसके पास पहुँचकर यह शाप दे दिया कि ' तुम्हें रसका अनुभव नहीं होगा ' ॥ २८ ॥
तं वै संयुज्य शापेन मण्डूकं त्वरितो ययौ ।
अन्यत्र वासाय विभुर्न चात्मानमदर्शयत् ॥ २ ९ ॥
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मेढकको शाप देकर वे तुरंत दूसरी जगह निवास करनेके लिये चले गये । सर्वव्यापी अग्निने अपने - आपको प्रकट नहीं किया ॥ २ ९ ॥
देवास्त्वनुग्रहं चक्रुर्मण्डूकानां भृगूत्तम ।
यत्तच्छृणु महाबाहो गदतो मम सर्वशः ॥ ३० ॥
भृगुश्रेष्ठ! महाबाहो! उस समय देवताओंने मेढकोंपर जो कृपा की, वह सब बता रहा हूँ, सुनो ॥ ३० ॥
देवा ऊचुः
अग्निशापादजिह्वापि रसज्ञानबहिष्कृताः ।
सरस्वतीं बहुविधां यूयमुच्चारयिष्यथ ॥ ३१ ॥
देवता बोले – मेढको! अग्निदेवके शापसे तुम्हारे जिह्वा नहीं होगी; अतः तुम रसोंके ज्ञानसे शून्य रहोगे तथापि हमारी कृपासे तुम नाना प्रकारकी वाणीका उच्चारण कर सकोगे ॥ ३१ ॥
बिलवासं गतांश्चैव निराहारानचेतसः ।
गतासूनपि संशुष्कान् भूमिः संधारयिष्यति ॥ ३२ ॥
तमोघनायामपि वै निशायां विचरिष्यथ । बिलमें रहते समय तुम आहार न मिलनेके कारण अचेत और निष्प्राण होकर सूख जाओगे तो भी भूमि तुम्हें धारण किये रहेगी – वर्षाका जल मिलनेपर तुम पुनः जीवित हो उठोगे । घने अन्धकारसे भरी हुई रात्रिमें भी तुम विचरते रहोगे ॥ ३२ ॥
इत्युक्त्वा तांस्ततो देवाः पुनरेव महीमिमाम् ॥ ३३ ॥
परीयुर्ज्वलनस्यार्थे न चाविन्दन् हुताशनम् । मेढकोंसे ऐसा कहकर देवता पुनः अग्निकी खोजके लिये इस पृथ्वीपर विचरने लगे; किंतु वे अग्निदेवको कहीं उपलब्ध न कर सके ॥ ३३३ ॥
अथ तान् द्विरदः कश्चित् सुरेन्द्रद्विरदोपमः ॥ ३४ ॥
अश्वत्थस्थोऽग्निरित्येवमाह देवान् भृगूद्वह । भृगुश्रेष्ठ! तदनन्तर देवराज इन्द्रके ऐरावतकी भाँति कोई विशालकाय गजराज देवताओंसे बोला- ' अश्वत्थ अग्निरूप है' ॥ ३४ ॥
शशाप ज्वलनः सर्वान् द्विरदान् क्रोधमूर्च्छितः ॥ ३५ ॥
प्रतीपा भवतां जिह्वा भवित्रीति भृगूद्वह । भृगुकुलभूषण! यह सुनकर अग्निदेव क्रोधसे विह्वल हो उठे और उन्होंने समस्त हाथियोंको शाप देते हुए कहा – तुमलोगोंकी जिह्वा उलटी हो जायगी ' ॥ ३५३ ॥
इत्युक्त्वा निःसृतोऽश्वत्थादग्निर्वारणसूचितः ।
प्रविवेश शमीगर्भमथ वह्निः सुषुप्सया ॥ ३६ ॥
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ऐसा कहकर हाथीद्वारा सूचित किये गये अग्निदेव अश्वत्थसे निकलकर शमीके भीतर प्रविष्ट हो गये । वे वहाँ अच्छी तरह सोना चाहते थे ॥ ३६ ॥
अनुग्रहं तु नागानां यं चक्रुः शृणु तं प्रभो ।
देवा भृगुकुलश्रेष्ठ प्रीत्या सत्यपराक्रमाः ॥ ३७ ॥
प्रभो! भृगुकुलश्रेष्ठ! तब सत्यपराक्रमी देवताओंने प्रसन्न हो नागोंपर जिस प्रकार अपना अनुग्रह प्रकट किया, उसे सुनो ॥ ३७ ॥
देवा ऊचुः
प्रतीपया जिह्वयापि सर्वाहारं करिष्यथ ।
वाचं चोच्चारयिष्यध्वमुच्चैरव्यञ्जिताक्षराम् ॥ ३८ ॥
देवता बोले- हाथियो! तुम अपनी उलटी जिह्वासे भी सब प्रकारके आहार ग्रहण कर सकोगे तथा उच्चस्वरसे वाणीका उच्चारण कर सकोगे; किंतु उससे किसी अक्षरकी अभिव्यक्ति नहीं होगी ॥ ३८ ॥
इत्युक्त्वा पुनरेवाग्निमनुसस्रुर्दिवौकसः ।
अश्वत्थान्निःसृतश्चाग्निः शमीगर्भमुपाविशत् ॥ ३ ९ ॥
ऐसा कहकर देवताओंने पुनः अग्निका अनुसरण किया । उधर अग्निदेव अश्वत्थसे निकलकर शमीके भीतर जा बैठे ॥ ३ ९ ॥
शुकेन ख्यापितो विप्र तं देवाः समुपाद्रवन् ।
शशाप शुकमग्निस्तु वाग्विहीनो भविष्यसि ॥ ४० ॥
विप्रवर! तदनन्तर तोतेने अग्निका पता बता दिया । फिर तो देवता शमीवृक्षकी ओर दौड़े । यह देख अग्निने तोतेको शाप दे दिया- ' तू वाणीसे रहित हो जायगा ' ॥
जिह्वामावर्तयामास तस्यापि हुतभुक् तथा ।
दृष्ट्वा तु ज्वलनं देवाः शुकमूचुर्दयान्विताः ॥ ४१ ॥
भविता न त्वमत्यन्तं शुकत्वे नष्टवागिति ।
आवृत्तजिह्वस्य सतो वाक्यं कान्तं भविष्यति ॥ ४२ ॥
अग्निदेवने उसकी भी जिह्वा उलट दी । अब अग्निदेवको प्रत्यक्ष देखकर देवताओंने -दयायुक्त होकर शुकसे कहा- ' तू शुकयोनिमें रहकर अत्यन्त वाणीरहित नहीं होगा– कुछ-कुछ बोल सकेगा । जीभ उलट जानेपर भी तेरी बोली बड़ी मधुर एवं कमनीय होगी ॥ बालस्येव प्रवृद्धस्य कलमव्यक्तमद्भुतम् । ‘ जैसे बड़े - बूढ़े पुरुषको बालककी समझमें न आनेवाली अद्भुत तोतली बोली बड़ी मीठी लगती है, उसी प्रकार तेरी बोली भी सबको प्रिय लगेगी' ॥ ४२ ॥
इत्युक्त्वा तं शमीगर्भे वह्निमालक्ष्य देवताः ॥ ४३ ॥
तदेवायतनं चक्रुः पुण्यं सर्वक्रियास्वपि ।
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ततः प्रभृति चाप्यग्निः शमीगर्भेषु दृश्यते ॥ ४४ ॥
ऐसा कहकर शमीके गर्भमें अग्निदेवका दर्शन करके देवताओंने सभी कर्मोंके लिये शमीको ही अग्निका पवित्र स्थान नियत किया । तबसे अग्निदेव शमीके भीतर दृष्टिगोचर होने लगे ॥ ४३-४४ ॥
उत्पादने तथोपायमभिजग्मुश्च मानवाः ।
आपो रसातले यास्तु संस्पृष्टाश्चित्रभानुना ॥ ४५ ॥
ताः पर्वतप्रस्रवणैरूष्मां मुञ्चन्ति भार्गव ।
पावकेनाधिशयता संतप्तास्तस्य तेजसा ॥ ४६ ॥
भार्गव! मनुष्योंने अग्निको प्रकट करनेके लिये शमीका मन्थन ही उपाय जाना । अग्निने रसातलमें जिस जलका स्पर्श किया था और वहाँ शयन करनेवाले अग्नि-देवके तेजसे जो संतप्त हो गया था, वह जल पर्वतीय झरनोंके रूपमें अपनी गरमी निकालता है ॥ ४५-४६ ॥
अथाग्निर्देवता दृष्ट्वा बभूव व्यथितस्तदा ।
किमागमनमित्येवं तानपृच्छत पावकः ॥ ४७ ॥
उस समय देवताओंको देखकर अग्निदेव व्यथित हो गये और उनसे पूछने लगे —‘किस उद्देश्यसे यहाँ आपलोगोंका शुभागमन हुआ है? ' ॥ ४७ ॥
तमूचुर्विबुधाः सर्वे ते चैव परमर्षयः ।
त्वां नियोक्ष्यामहे कार्ये तद् भवान् कर्तुमर्हति ॥ ४८ ॥
कृते च तस्मिन् भविता तवापि सुमहान् गुणः ॥ ४ ९ ॥
तब सम्पूर्ण देवता और महर्षि उनसे बोले – ' हम तुम्हें एक कार्यमें नियुक्त करेंगे । उसे तुम्हें करना चाहिये । उस कार्यको सम्पन्न कर देनेपर तुम्हें भी बहुत बड़ा लाभ होगा' ॥ ४८-४९ ॥ अग्निरुवाच
ब्रूत यद् भवतां कार्यं कर्तास्मि तदहं सुराः ।
भवतां तु नियोज्योऽस्मि मा वोऽत्रास्तु विचारणा ॥ ५० ॥
अग्निने कहा — देवताओ! आपलोगोंका जो कार्य है उसे मैं अवश्य पूर्ण करूँगा, अतः उसे कहिये । मैं आपलोगोंका आज्ञापालक हूँ । इस विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ ५० ॥
देवा ऊचुः
असुरस्तारको नाम ब्रह्मणो वरदर्पितः ।
अस्मान् प्रबाधते वीर्याद् वधस्तस्य विधीयताम् ॥ ५१ ॥