श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 721–730
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 721–730
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चतुरशीतितमोऽध्यायः भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना युधिष्ठिर उवाच
उक्तं पितामहेनेदं गवां दानमनुत्तमम् ।
विशेषेण नरेन्द्राणामिह धर्ममवेक्षताम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा - पितामह! आपने सब मनुष्योंके लिये, विशेषतः धर्मपर दृष्टि रखनेवाले नरेशोंके लिये परम उत्तम गोदानका वर्णन किया है ॥ १ ॥
राज्यं हि सततं दुःखं दुर्धरं चाकृतात्मभिः ।
भूयिष्ठं च नरेन्द्राणां विद्यते न शुभा गतिः ॥ २ ॥
राज्य सदा ही दुःखरूप है । जिन्होंने अपना मन वशमें नहीं किया है, उनके लिये राज्यको सुरक्षित रखना बहुत ही कठिन है । इसलिये प्रायः राजाओंको शुभ गति नहीं प्राप्त होती है ॥ २ ॥
पूयन्ते तत्र नियतं प्रयच्छन्तो वसुन्धराम् ।
सर्वे च कथिता धर्मास्त्वया मे कुरुनन्दन ॥ ३ ॥
उनमें वे ही पवित्र होते हैं जो नियमपूर्वक पृथ्वीका दान करते हैं । कुरुनन्दन! आपने मुझसे समस्त धर्मोंका वर्णन किया है ॥ ३ ॥
एवमेव गवामुक्तं प्रदानं ते नृगेण ह ।
ऋषिणा नाचिकेतेन पूर्वमेव निदर्शितम् ॥ ४ ॥
इसी तरह राजा नृगने जो गोदान किया था तथा नाचिकेत ऋषिने जो गौओंका दान और पूजन किया था, वह सब आपने पहले ही कहा और निर्देश किया है ॥ ४ ॥
वेदोपनिषदश्चैव सर्वकर्मसु दक्षिणाः ।
सर्वक्रतुषु चोद्दिष्टं भूमिर्गावोऽथ काञ्चनम् ॥ ५ ॥
वेद और उपनिषदोंने भी प्रत्येक कर्ममें दक्षिणाका विधान किया है । सभी यज्ञोंमें भूमि, गौ और सुवर्णकी दक्षिणा बतायी गयी है ॥ ५ ॥
तत्र श्रुतिस्तु परमा सुवर्णं दक्षिणेति वै ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं पितामह यथातथम् ॥ ६ ॥
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इनमें सुवर्ण सबसे उत्तम दक्षिणा है - ऐसा श्रुतिका वचन है, अतः पितामह! मैं इस विषयको यथार्थ रूपसे सुनना चाहता हूँ ॥ ६ ॥
किं सुवर्णं कथं जातं कस्मिन् काले किमात्मकम् ।
किं दैवं किं फलं चैव कस्माच्च परमुच्यते ॥ ७ ॥
सुवर्ण क्या है? कब और किस तरहसे इसकी उत्पत्ति हुई? सुवर्णका उपादान क्या है? इसका देवता कौन है? इसके दानका फल क्या है? सुवर्ण क्यों उत्तम कहलाता है? ॥ ७ ॥
कस्माद् दानं सुवर्णस्य पूजयन्ति मनीषिणः ।
कस्माच्च दक्षिणार्थं तद् यज्ञकर्मसु शस्यते ॥ ८ ॥
मनीषी विद्वान् सुवर्णदानका अधिक आदर क्यों करते हैं? तथा यज्ञ- कर्मोंमें दक्षिणाके लिये सुवर्णकी प्रशंसा क्यों की जाती है? ॥ ८ ॥
कस्माच्च पावनं श्रेष्ठं भूमेर्गोभ्यश्च काञ्चनम् ।
परमं दक्षिणार्थे च तद् ब्रवीहि पितामह ॥ ९ ॥
पितामह! क्यों सुवर्ण पृथ्वी और गौओंसे भी पावन और श्रेष्ठ है? दक्षिणाके लिये सबसे उत्तम वह क्यों माना गया है? यह मुझे बताइये ॥ ९ ॥
भीष्म उवाच
शृणु राजन्नवहितो बहुकारणविस्तरम् ।
जातरूपसमुत्पत्तिमनुभूतं च यन्मया ॥ १० ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! ध्यान देकर सुनो! सुवर्णकी उत्पत्तिका कारण बहुत विस्तृत है । इस विषयमें मैंने जो अनुभव किया है, उसके अनुसार तुम्हें सब बातें बता रहा हूँ ॥ १० ॥
पिता मम महातेजाः शान्तनुर्निधनं गतः ।
तस्य दित्सुरहं श्राद्धं गंगाद्वारमुपागमम् ॥ ११ ॥
मेरे महातेजस्वी पिता महाराज शान्तनुका जब देहावसान हो गया तब मैं उनका श्राद्ध करनेके लिये गंगाद्वार तीर्थ ( हरद्वार ) में गया ॥ ११ ॥
तत्रागम्य पितुः पुत्र श्राद्धकर्म समारभम् ।
माता मे जाह्नवी चात्र साहाय्यमकरोत् तदा ॥ १२ ॥
बेटा! वहाँ पहुँचकर मैंने पिताका श्राद्धकर्म आरम्भ किया । इस कार्यमें वहाँ उस समय मेरी माता गंगाने भी बड़ी सहायता की ॥ १२ ॥
ततोऽग्रतस्ततः सिद्धानुपवेश्य बहूनृषीन् ।
तोयप्रदानात् प्रभृति कार्याण्यहमथारभम् ॥ १३ ॥
तदनन्तर अपने सामने बहुत - से सिद्ध महर्षियोंको बिठाकर मैंने जलदान आदि सारे कार्य आरम्भ किये ॥ १३ ॥
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तत् समाप्य यथोद्दिष्टं पूर्वकर्म समाहितः ।
दातुं निर्वपणं सम्यग् यथावदहमारभम् ॥ १४ ॥
एकाग्रचित्त होकर शास्त्रोक्तविधिसे पिण्डदानके पहलेके सब कार्य समाप्त करके मैंने विधिवत् पिण्डदान देना आरम्भ किया ॥ १४ ॥
ततस्तं दर्भविन्यासं भित्त्वा सुरुचिरांगदः ।
प्रलम्बाभरणो बाहुरुदतिष्ठद् विशाम्पते ॥ १५ ॥
प्रजानाथ! इसी समय पिण्डदानके लिये जो कुश बिछाये गये थे, उन्हें भेदकर एक बड़ी सुन्दर बाँह बाहर निकली । उस विशाल भुजामें बाजूबंद आदि अनेक आभूषण शोभा पा रहे थे ॥ १५ ॥
तमुत्थितमहं दृष्ट्वा परं विस्मयमागमम् ।
प्रतिग्रहीता साक्षान्मे पितेति भरतर्षभ ॥ १६ ॥
ततो मे पुनरेवासीत् संज्ञा संचिन्त्य शास्त्रतः ।
नायं वेदेषु विहितो विधिर्हस्त इति प्रभो ॥ १७ ॥
पिण्डो देयो नरेणेह ततो मतिरभून्मम ।
साक्षान्नेह मनुष्यस्य पिण्डं हि पितरः क्वचित् ॥ १८ ॥
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गृह्णन्ति विहितं चेत्थं पिण्डो देयः कुशेष्विति । उसे ऊपर उठी देख मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ । भरतश्रेष्ठ! साक्षात् मेरे पिता ही पिण्डका दान लेनेके लिये उपस्थित थे । प्रभो! किंतु जब मैंने शास्त्रीय विधिपर विचार किया, तब मेरे मनमें सहसा यह बात स्मरण हो आयी कि मनुष्यके लिये हाथपर पिण्ड देनेका वेदमें विधान नहीं है । पितर साक्षात् प्रकट होकर कभी मनुष्यके हाथसे पिण्ड लेते भी नहीं हैं । शास्त्रकी आज्ञा तो यही है कि कुशोंपर पिण्डदान करें ॥ १६–१८३ ॥ ततोऽहं तदनादृत्य पितुर्हस्तनिदर्शनम् ॥ १ ९ ॥
शास्त्रप्रामाण्यसूक्ष्मं तु विधिं पिण्डस्य संस्मरन् ।
ततो दर्भेषु तत् सर्वमददं भरतर्षभ ॥ २० ॥
भरतश्रेष्ठ! यह सोचकर मैंने पिताके प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले हाथका आदर नहीं किया । शास्त्रको ही प्रमाण मानकर उसकी पिण्डदानसम्बन्धी सूक्ष्म विधिका ध्यान रखते हुए कुशोंपर ही सब पिण्डोंका दान किया ॥ १ ९ -२० ॥
शास्त्रमार्गानुसारेण तद् विद्धि मनुजर्षभ ।
ततः सोऽन्तर्हितो बाहुः पितुर्मम जनाधिप ॥ २१ ॥
नरश्रेष्ठ! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि मैंने शास्त्रीय मार्गका अनुसरण करके ही सब कुछ किया । नरेश्वर! तदनन्तर मेरे पिताकी वह बाँह अदृश्य हो गयी ॥ २१ ॥
ततो मां दर्शयामासुः स्वप्नान्ते पितरस्तथा ।
प्रीयमाणास्तु मामूचुः प्रीताः स्म भरतर्षभ ॥ २२ ॥
विज्ञानेन तवानेन यन्न मुह्यसि धर्मतः । तदनन्तर स्वप्नमें पितरोंने मुझे दर्शन दिया और प्रसन्नतापूर्वक मुझसे कहा ——भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे इस शास्त्रीय ज्ञानसे हम बहुत प्रसन्न हैं; क्योंकि उसके कारण तुम्हें धर्मके विषयमें मोह नहीं हुआ ॥ २२ ॥
त्वया हि कुर्वता शास्त्रं प्रमाणमिह पार्थिव ॥ २३ ॥
आत्मा धर्मः श्रुतं वेदाः पितरश्चर्षिभिः सह ।
साक्षात् पितामहो ब्रह्मा गुरवोऽथ प्रजापतिः ॥ २४ ॥
प्रमाणमुपनीता वै स्थिताश्च न विचालिताः । ‘ पृथ्वीनाथ! तुमने यहाँ शास्त्रको प्रमाण मानकर आत्मा, धर्म, शास्त्र, वेद, पितृगण, ऋषिगण, गुरु, प्रजापति और ब्रह्माजी – इन सबका मान बढ़ाया है तथा जो लोग धर्ममें स्थित हैं उन्हें भी तुमने अपना आदर्श दिखाकर विचलित नहीं होने दिया है ॥ २३-२४३ ॥ तदिदं सम्यगारब्धं त्वयाद्य भरतर्षभ ॥ २५ ॥
किं तु भूमेर्गवां चार्थे सुवर्णं दीयतामिति । ‘ भरतश्रेष्ठ! यह सब कार्य तो तुमने बहुत उत्तम किया है; किंतु अब हमारे कहनेसे भूमिदान और गोदानके निष्क्रयरूपसे कुछ सुवर्णदान भी करो ॥ २५३ ॥
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एवं वयं च धर्मज्ञ सर्वे चास्मत्पितामहाः ॥ २६ ॥
पाविता वै भविष्यन्ति पावनं हि परं हि तत् । ' धर्मज्ञ! ऐसा करनेसे हम और हमारे सभी पितामह पवित्र हो जायँगे; क्योंकि सुवर्ण सबसे अधिक पावन वस्तु है ॥ २६३ ॥
दशपूर्वान् दशैवान्यांस्तथा संतारयन्ति ते ॥ २७ ॥
सुवर्णं ये प्रयच्छन्ति एवं मत्पितरोऽब्रुवन् ।
ततोऽहं विस्मितो राजन् प्रतिबुद्धो विशाम्पते ॥ २८ ॥
सुवर्णदानेऽकरवं मतिं च भरतर्षभ । ' जो सुवर्ण दान करते हैं, वे अपने पहले और पीछेकी दस- दस पीढ़ियोंका उद्धार कर देते हैं । ' राजन्! जब मेरे पितरोंने ऐसा कहा तो मेरी नींद खुल गयी । उस समय स्वप्नका स्मरण करके मुझे बड़ा विस्मय हुआ । प्रजानाथ! भरतश्रेष्ठ! तब मैंने सुवर्णदान करनेका निश्चित विचार कर लिया ॥ २७-२८३ ॥ इतिहासमिमं चापि शृणु राजन् पुरातनम् ॥ २ ९ ॥ जामदग्न्यं प्रति विभो धन्यमायुष्यमेव च । राजन्! अब ( सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके माहात्म्यके विषयमें ) एक प्राचीन इतिहास सुनो जो जमदग्निनन्दन परशुरामजीसे सम्बन्ध रखनेवाला है । विभो! यह आख्यान धन तथा आयुकी वृद्धि करनेवाला है ॥ २ ९ ३ ॥ जामदग्न्येन रामेण तीव्ररोषान्वितेन वै ॥ ३० ॥
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी कृता निःक्षत्रिया पुरा । पूर्वकालकी बात है, जमदग्निकुमार परशुरामजीने तीव्र रोषमें भरकर इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियोंसे शून्य कर दिया था ॥ ३० ॥
ततो जित्वा महीं कृत्स्नां रामो राजीवलोचनः ॥ ३१ ॥
आजहार क्रतुं वीरो ब्रह्मक्षत्रेण पूजितम् ।
वाजिमेधं महाराज सर्वकामसमन्वितम् ॥ ३२ ॥
महाराज! इसके बाद सम्पूर्ण पृथ्वीको जीतकर वीर कमलनयन परशुरामजीने ब्राह्मणों और क्षत्रियोंद्वारा सम्मानित तथा सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान किया ॥ ३१-३२ ॥
पावनं सर्वभूतानां तेजोद्युतिविवर्धनम् ।
विपाप्मा च स तेजस्वी तेन क्रतुफलेन च ॥ ३३ ॥
नैवात्मनोऽथ लघुतां जामदग्न्योऽध्यगच्छत ।
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यद्यपि अश्वमेध यज्ञ समस्त प्राणियोंको पवित्र करनेवाला तथा तेज और कान्तिको बढ़ानेवाला है तथापि उसके फलसे तेजस्वी परशुरामजी सर्वथा पापमुक्त न हो सके । इससे उन्होंने अपनी लघुताका अनुभव किया ॥ ३३ ॥
स तु क्रतुवरेणेष्ट्वा महात्मा दक्षिणावता ॥ ३४ ॥
पप्रच्छागमसम्पन्नानृषीन् देवांश्च भार्गवः ।
पावनं यत् परं नृणामुग्रे कर्मणि वर्तताम् ॥ ३५ ॥
तदुच्यतां महाभागा इति जातघृणोऽब्रवीत् ।
इत्युक्ता वेदशास्त्रज्ञास्तमूचुस्ते महर्षयः ॥ ३६ ॥
प्रचुर दक्षिणासे सम्पन्न उस श्रेष्ठ यज्ञका अनुष्ठान पूर्ण करके महामना भृगुवंशी परशुरामजीने मनमें दयाभाव लेकर शास्त्रज्ञ ऋषियों और देवताओंसे इस प्रकार पूछा -' महाभाग महात्माओ! उग्र कर्ममें लगे हुए मनुष्योंके लिये जो परम पावन वस्तु हो, वह मुझे बताइये । ' उनके इस प्रकार पूछनेपर उन वेद- शास्त्रोंके ज्ञाता महर्षियोंने इस प्रकार कहा— ॥ ३४–३६ ॥
राम विप्राः सत्क्रियन्तां वेदप्रामाण्यदर्शनात् ।
भूयश्च विप्रर्षिगणाः प्रष्टव्याः पावनं प्रति ॥ ३७ ॥
‘ परशुराम! तुम वेदोंकी प्रामाणिकतापर दृष्टि रखते हुए ब्राह्मणोंका सत्कार करो और ब्रह्मर्षियोंके समुदायसे पुनः इस पावन वस्तुके लिये प्रश्न करो ॥ ३७ ॥
ते यद् ब्रूयुर्महाप्राज्ञास्तच्चैव समुदाचर ।
ततो वसिष्ठं देवर्षिमगस्त्यमथ काश्यपम् ॥ ३८ ॥
तमेवार्थं महातेजाः पप्रच्छ भृगुनन्दनः ।
जाता मतिर्मे विप्रेन्द्राः कथं पूयेयमित्युत ॥ ३ ९ ॥
केन वा कर्मयोगेन प्रदानेनेह केन वा । ‘ और वे महाज्ञानी महर्षिगण जो कुछ बतावें, उसीका प्रसन्नतापूर्वक पालन करो । ' तब महातेजस्वी भृगुनन्दन परशुरामजीने वसिष्ठ, नारद, अगस्त्य और कश्यपजीके पास जाकर पूछा——-'विप्रवरो! मैं पवित्र होना चाहता हूँ । बताइये, कैसे किस कर्मके अनुष्ठानसे अथवा किस दानसे पवित्र हो सकता हूँ? ॥ ३८-३९ ३ ॥
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यदि वोऽनुग्रहकृता बुद्धिर्मां प्रति सत्तमाः ।
प्रब्रूत पावनं किं मे भवेदिति तपोधनाः ॥ ४० ॥
‘ साधुशिरोमणे! तपोधनो! यदि आपलोग मुझपर अनुग्रह करना चाहते हों तो बतायें, मुझे पवित्र करनेवाला साधन क्या है? ' ॥ ४० ॥
ऋषय ऊचुः
गाश्च भूमिं च वित्तं च दत्त्वेह भृगुनन्दन ।
पापकृत् पूयते मर्त्य इति भार्गव शुश्रुम ॥ ४१ ॥
ऋषियोंने कहा – भृगुनन्दन! हमने सुना है कि पाप करनेवाला मनुष्य यहाँ गाय, भूमि और धनका दान करके पवित्र हो जाता है ॥ ४१ ॥
अन्यद् दानं तु विप्रर्षे श्रूयतां पावनं महत् ।
दिव्यमत्यद्भुताकारमपत्यं जातवेदसः ॥ ४२ ॥
ब्रह्मर्षे! एक दूसरी वस्तुका दान भी सुनो । वह वस्तु सबसे बढ़कर पावन है । उसका आकार अत्यन्त अद्भुत और दिव्य है तथा वह अग्निसे उत्पन्न हुई है ॥
दग्ध्वा लोकान् पुरा वीर्यात् सम्भूतमिह शुश्रुम ।
सुवर्णमिति विख्यातं तद् ददत् सिद्धिमेष्यसि ॥ ४३ ॥
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उस वस्तुका नाम है सुवर्ण । हमने सुना है कि पूर्वकालमें अग्निने सम्पूर्ण लोकोंको भस्म करके अपने वीर्यसे सुवर्णको प्रकट किया था। उसीका दान करनेसे तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी ॥ ४३ ॥
ततोऽब्रवीद् वसिष्ठस्तं भगवान् संशितव्रतः ।
शृणु राम यथोत्पन्नं सुवर्णमनलप्रभम् ॥ ४४ ॥
तदनन्तर कठोर व्रतका पालन करनेवाले भगवान् वसिष्ठने कहा – ' परशुराम! अग्निके समान प्रकाशित होनेवाला सुवर्ण जिस प्रकार प्रकट हुआ है, वह सुनो ॥
फलं दास्यति ते यत् तु दाने परमिहोच्यते ।
सुवर्णं यच्च यस्माच्च यथा च गुणवत्तमम् ॥ ४५ ॥
तन्निबोध महाबाहो सर्वं निगदतो मम । ' सुवर्णका दान तुम्हें उत्तम फल देगा; क्योंकि वह दानके लिये सर्वोत्तम बताया जाता है । महाबाहो! सुवर्णका जो स्वरूप है, जिससे उत्पन्न हुआ है और जिस प्रकार वह विशेष गुणकारी है, वह सब बता रहा हूँ, मुझसे सुनो ॥ ४५३ ॥
अग्नीषोमात्मकमिदं सुवर्णं विद्धि निश्चये ॥ ४६ ॥
अजोऽग्निर्वरुणो मेषः सूर्योऽश्व इति दर्शनम् । ‘ यह सुवर्ण अग्नि और सोमरूप है । इस बातको तुम निश्चितरूपसे जान लो । बकरा,
अग्नि, भेड़, वरुण तथा घोड़ा सूर्यका अंश है । ऐसी दृष्टि रखनी चाहिये ॥
कुञ्जराश्च मृगा नागा महिषाश्चासुरा इति ॥ ४७ ॥
कुक्कुटाश्च वराहाश्च राक्षसा भृगुनन्दन ।
इडा गावः पयः सोमो भूमिरित्येव च स्मृतिः ॥ ४८ ॥
' भृगुनन्दन! हाथी और मृग नागोंके अंश हैं । भैंसे असुरोंके अंश हैं । मुर्गा और सूअर -राक्षसोंके अंश हैं इडा– गौ, दुग्ध और सोम– ये सब भूमिरूप ही हैं । ऐसी स्मृति है ॥ ४७-४८ ॥
जगत् सर्वं च निर्मथ्य तेजोराशिः समुत्थितः ।
सुवर्णमेभ्यो विप्रर्षे रत्नं परममुत्तमम् ॥ ४ ९ ॥
‘ सारे जगत्का मन्थन करके जो तेजकी राशि प्रकट हुई है, वही सुवर्ण है । अतः ब्रह्मर्षे! यह अज आदि सभी वस्तुओंसे परम उत्तम रत्न है ॥ ४ ९ ॥
एतस्मात् कारणाद् देवा गन्धर्वोरगराक्षसाः ।
मनुष्याश्च पिशाचाश्च प्रयता धारयन्ति तत् ॥ ५० ॥
‘ इसीलिये देवता, गन्धर्व, नाग, राक्षस, मनुष्य और पिशाच - ये सब प्रयत्नपूर्वक सुवर्ण धारण करते हैं ॥
मुकुटैरङ्गदयुतैरलंकारैः पृथग्विधैः ।
सुवर्णविकृतैस्तत्र विराजन्ते भृगूत्तम ॥ ५१ ॥
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‘ भृगुश्रेष्ठ! वे सोनेके बने हुए मुकुट, बाजूबंद तथा अन्य नाना प्रकारके अलंकारोंसे सुशोभित होते हैं ॥
तस्मात् सर्वपवित्रेभ्यः पवित्रं परमं स्मृतम् ।
भूमेर्गोभ्योऽथ रत्नेभ्यस्तद् विद्धि मनुजर्षभ ॥ ५२ ॥
‘ अतः नरश्रेष्ठ! जगत्में भूमि, गौ तथा रत्न आदि जितनी पवित्र वस्तुएँ हैं, सुवर्णको उन सबसे पवित्र माना गया है; इस बातको भलीभाँति जान लो ॥ ५२ ॥
पृथिवीं गाश्च दत्त्वेह यच्चान्यदपि किंचन ।
विशिष्यते सुवर्णस्य दानं परमकं विभो ॥ ५३ ॥
‘विभो! पृथ्वी, गौ तथा और जो कुछ भी दान किया जाता है, उन सबसे बढ़कर सुवर्णका दान है ॥
अक्षयं पावनं चैव सुवर्णममरद्युते ।
प्रयच्छ द्विजमुख्येभ्यः पावनं ह्येतदुत्तमम् ॥ ५४ ॥
‘ देवोपम तेजस्वी परशुराम! सुवर्ण अक्षय और पावन है, अतः तुम श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको यह उत्तम और पावन वस्तु ही दान करो ॥ ५४ ॥
सुवर्णमेव सर्वासु दक्षिणासु विधीयते ।
सुवर्णं ये प्रयच्छन्ति सर्वदास्ते भवन्त्युत ॥ ५५ ॥
सब दक्षिणाओंमें सुवर्णका ही विधान है; अतः जो सुवर्ण दान करते हैं, वे सब कुछ दान करनेवाले होते हैं ॥
देवतास्ते प्रयच्छन्ति ये सुवर्णं ददत्यथ ।
अग्निर्हि देवताः सर्वाः सुवर्णं च तदात्मकम् ॥ ५६ ॥
‘जो सुवर्ण देते हैं, वे देवताओंका दान करते हैं; क्योंकि अग्नि सर्वदेवतामय है और सुवर्ण अग्निका स्वरूप है ॥ ५६ ॥
तस्मात् सुवर्णं ददता दत्ताः सर्वाः स्म देवताः ।
भवन्ति पुरुषव्याघ्र न ह्यतः परमं विदुः ॥ ५७ ॥
‘ पुरुषसिंह! अतः सुवर्णका दान करनेवाले पुरुषोंने सम्पूर्ण देवताओंका ही दान कर दिया – ऐसा माना जाता है । अतः विद्वान् पुरुष सुवर्णसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं मानते हैं ॥ ५७ ॥
भूय एव च माहात्म्यं सुवर्णस्य निबोध मे ।
गदतो मम विप्रर्षे सर्वशस्त्रभृतां वर ॥ ५८ ॥
‘ सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ विप्रर्षे! मैं पुनः सुवर्णका माहात्म्य बता रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो ॥ ५८ ॥
मया श्रुतमिदं पूर्वं पुराणे भृगुनन्दन ।
प्रजापतेः कथयतो यथान्यायं तु तस्य वै ॥ ५ ९ ॥
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‘ भृगुनन्दन! मैंने पहले पुराणमें प्रजापतिकी कही हुई यह न्यायोचित बात सुन रखी है ॥ ५ ९ ॥ शूलपाणेर्भगवतो रुद्रस्य च महात्मनः गिरौ हिमवति श्रेष्ठे तदा भृगुकुलोद्वह ॥ ६० ॥
देव्या विवाहे निर्वृत्ते रुद्राण्या भृगुनन्दन ।
समागमे भगवतो देव्या सह महात्मनः ॥ ६१ ॥
' भृगुकुलरत्न! भृगुनन्दन परशुराम! यह बात उस समयकी है, जब श्रेष्ठ पर्वत हिमालयपर शूलपाणि महात्मा भगवान् रुद्रका देवी रुद्राणीके साथ विवाह- संस्कार सम्पन्न हुआ था और महामना भगवान् शिवको उमादेवीके साथ समागम - सुख प्राप्त था ॥ ६०-६१ ॥
ततः सर्वे समुद्विग्ना देवा रुद्रमुपागमन् ।
ते महादेवमासीनं देवीं च वरदामुमाम् ॥ ६२ ॥
‘ उस समय सब देवता उद्विग्न होकर कैलास शिखरपर बैठे हुए महान् देवता रुद्र और वरदायिनी देवी उमाके पास गये ॥ ६२ ॥
प्रसाद्य शिरसा सर्वे रुद्रमूचुर्भृगूद्वह ।
अयं समागमो देव देव्या सह तवानघ ॥ ६३ ॥
तपस्विनस्तपस्विन्या तेजस्विन्याऽतितेजसः । भृगुश्रेष्ठ! वहाँ उन सबने उन दोनोंके चरणोंमें मस्तक झुकाकर उन्हें प्रसन्न करके भगवान् रुद्रसे कहा—' पापरहित महादेव! यह जो देवी पार्वतीके साथ आपका समागम हुआ है, यह एक तपस्वीका तपस्विनीके साथ और एक महातेजस्वीका एक तेजस्विनीके साथ संयोग हुआ है ॥ ६३ ॥
अमोघतेजास्त्वं देव देवी चेयमुमा तथा ॥ ६४ ॥
अपत्यं युवयोर्देव बलवद् भविता विभो ।
तन्नूनं त्रिषु लोकेषु न किञ्चिच्छेषयिष्यति ॥ ६५ ॥
‘ देव! प्रभो! आपका तेज अमोघ है । ये देवी उमा भी ऐसी ही अमोघ तेजस्विनी हैं । आप दोनोंकी जो संतान होगी वह अत्यन्त प्रबल होगी । निश्चय ही वह तीनों लोकोंमें किसीको शेष नहीं रहने देगी ॥
तदेभ्यः प्रणतेभ्यस्त्वं देवेभ्यः पृथुलोचन ।
वरं प्रयच्छ लोकेश त्रैलोक्यहितकाम्यया ॥ ६६ ॥
‘विशाललोचन! लोकेश्वर! हम सब देवता आपके चरणोंमें पड़े हैं । आप तीनों लोकोंके हितकी इच्छासे हमें वर दीजिये ॥ ६६ ॥
अपत्यार्थं निगृह्णीष्व तेजः परमकं विभो ।
त्रैलोक्यसारौ हि युवां लोकं संतापयिष्यथः ॥ ६७ ॥