श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 741–750

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 741–750

पृष्ठ 741

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देवता बोले — अग्निदेव! एक तारकनामक असुर है जो ब्रह्माजीके वरदानसे मदमत्त होकर अपने पराक्रमसे हम सब लोगोंको कष्ट दे रहा है । अतः तुम उसके वधका कोई उपाय करो ॥ ५१ ॥

इमान् देवगणांस्तात प्रजापतिगणांस्तथा ।

ऋषींश्चापि महाभाग परित्रायस्व पावक ॥ ५२ ॥

तात! महाभाग पावक! इन देवताओं, प्रजापतियों तथा ऋषियोंकी भी रक्षा करो ॥ ५२ ॥

अपत्यं तेजसा युक्तं प्रवीरं जनय प्रभो ।

यद् भयं नोऽसुरात् तस्मान्नाशयेद्धव्यवाहन ॥ ५३ ॥

प्रभो! हव्यवाहन! तुम एक ऐसा तेजस्वी और महावीर पुत्र उत्पन्न करो जो उस असुरसे प्राप्त होनेवाले हमारे भयका नाश करे ॥ ५३ ॥

शप्तानां नो महादेव्या नान्यदस्ति परायणम् ।

अन्यत्र भवतो वीर्यं तस्मात् त्रायस्व नः प्रभो ॥ ५४ ॥

प्रभो! महादेवी पार्वतीने हमलोगोंको संतानहीन होनेका शाप दे दिया है; अतः तुम्हारे बलवीर्यके सिवा हमारे लिये दूसरा कोई आश्रय नहीं रह गया है इसलिये हमलोगोंकी रक्षा करो ॥ ५४ ॥

इत्युक्तः स तथेत्युक्त्वा भगवान् हव्यवाहनः ।

जगामाथ दुराधर्षो गङ्गां भागीरथीं प्रति ॥ ५५ ॥

देवताओंके ऐसा कहनेपर ' तथास्तु' कहकर दुर्धर्ष भगवान् हव्यवाहन भागीरथी गंगाके तटपर गये ॥ ५५ ॥

तया चाप्यभवन्मिश्रो गर्भं चास्यादधे तदा ।

ववृधे स तदा गर्भः कक्षे कृष्णगतिर्यथा ॥ ५६ ॥

वे वहाँ गंगाजीसे मिले । गंगाजीने उस समय भगवान् शंकरके उस तेजको गर्भरूपसे धारण किया । जैसे सूखे तिनकों अथवा लकड़ियोंके ढेरमें रखी हुई आग प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार वह तेजस्वी गर्भ गंगाजीके भीतर बढ़ने लगा ॥ ५६ ॥

तेजसा तस्य देवस्य गंगा विह्वलचेतना ।

संतापमगमत् तीव्रं सोढुं सा न शशाक ह ॥ ५७ ॥

अग्निदेवके दिये हुए उस तेजसे गंगाजीका चित्त व्याकुल हो गया । वे अत्यन्त संतप्त हो उठीं और उसे सहन करनेमें असमर्थ हो गयीं ॥ ५७ ॥

आहिते ज्वलनेनाथ गर्भे तेजाः समन्विते ।

गंगायामसुरः कश्चिद् भैरवं नादमानदत् ॥ ५८ ॥

अग्निके द्वारा गंगाजीमें स्थापित किया हुआ वह तेजस्वी गर्भ जब बढ़ रहा था, उसी समय किसी असुरने वहाँ आकर सहसा बड़े जोरसे भयानक गर्जना की ॥ ५८ ॥

पृष्ठ 742

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अबुद्धिपतितेनाथ नादेन विपुलेन सा ।

वित्रस्तोद्भ्रान्तनयना गंगा विस्रुतलोचना ॥ ५ ९ ॥

उस आकस्मिक महान् सिंहनादसे भयभीत हुई गंगाजीकी आँखें घूमने लगीं और उनके नेत्रोंसे आँसू बहने लगा ॥ ५ ९ ॥

विसंज्ञा नाशकद् गर्भं वोढुमात्मानमेव च ।

सा तु तेजः परीतांगी कम्पयन्तीव जाह्नवी ॥ ६० ॥

उवाच ज्वलनं विप्र तदा गर्भबलोद्धता ।

ते न शक्तास्मि भगवंस्तेजसोऽस्य विधारणे ॥ ६१ ॥

वे अचेत हो गयीं । अतः उस गर्भको और अपने - आपको भी न सम्हाल सकीं । उनके सारे अंग तेजसे व्याप्त हो रहे थे । विप्रवर! उस समय जाह्नवी देवी उस गर्भकी शक्तिसे अभिभूत हो काँपती हुई- सी अग्निसे बोलीं- ' भगवन्! मैं आपके इस तेजको धारण करनेमें असमर्थ हूँ ॥ ६०-६१ ॥

विमूढास्मि कृतानेन न मे स्वास्थ्यं यथा पुरा ।

विह्वला चास्मि भगवंश्चेतो नष्टं च मेऽनघ ॥ ६२ ॥

‘निष्पाप अग्निदेव! इसने मुझे मूर्च्छित- सी कर दिया है । मेरा स्वास्थ्य अब पहले - जैसा नहीं रह गया है । भगवन्! मैं बहुत घबरा गयी हूँ । मेरी चेतना लुप्त सी हो रही है ॥ ६२ ॥

धारणे नास्य शक्ताहं गर्भस्य तपतां वर ।

उत्स्रक्ष्येऽहमिमं दुःखान्न तु कामात् कथंचन ॥ ६३ ॥

‘ तपनेवालोंमें श्रेष्ठ पावक! अब मुझमें इस गर्भको धारण किये रहनेकी शक्ति नहीं रह गयी है । मैं असह्य दुःखसे ही इसे त्यागने जा रही हूँ । स्वेच्छासे किसी प्रकार नहीं ॥ ६३ ॥

न तेजसोऽस्ति संस्पर्शो मम देव विभावसो ।

आपदर्थे हि सम्बन्धः सुसूक्ष्मोऽपि महाद्युते ॥ ६४ ॥

‘ देव! विभावसो! महाद्युते! इस तेजके साथ मेरा कोई सम्पर्क नहीं है । इस समय जो अत्यन्त सूक्ष्म सम्बन्ध स्थापित हुआ है वह भी देवताओंपर आयी हुई विपत्तिको टालनेके उद्देश्यसे ही है ॥ ६४ ॥

यदत्र गुणसम्पन्नमितरद् वा हुताशन ।

त्वय्येव तदहं मन्ये धर्माधर्मौ च केवलौ ॥। ६५ ॥

‘ हुताशन! इस कार्यमें यदि कोई गुण या दोषमुक्त परिणाम हो अथवा केवल धर्म या अधर्म हो, उन सबका उत्तरदायित्व आपपर ही है, ऐसा मैं मानती हूँ' ॥ ६५ ॥

तामुवाच ततो वह्निर्धार्यतां धार्यतामिति ।

गर्भो मत्तेजसा युक्तो महागुणफलोदयः ॥ ६६ ॥

तब अग्निने गंगाजीसे कहा- देवि! यह गर्भ मेरे तेजसे युक्त है, इससे महान् गुणयुक्त

फलका उदय होनेवाला है । इसे धारण करो, धारण करो ॥ ६६ ॥

पृष्ठ 743

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शक्ता ह्यसि महीं कृत्स्नां वोढुं धारयितुं तथा ।

न हि ते किंचिदप्राप्यमन्यतो धारणादृते ॥ ६७ ॥

' देवि! तुम सारी पृथ्वीको धारण करनेमें समर्थ हो, फिर इस गर्भको धारण करना तुम्हारे लिये कुछ असाध्य नहीं है ' ॥ ६७ ॥

सा वह्निना वार्यमाणा देवैरपि सरिद्वरा ।

समुत्ससर्ज तं गर्भं मेरौ गिरिवरे तदा ॥ ६८ ॥

देवताओं तथा अग्निके मना करनेपर भी सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाने उस गर्भको गिरिराज मेरुके शिखरपर छोड़ दिया ॥ ६८ ॥

समर्था धारणे चापि रुद्रतेजःप्रधर्षिता ।

नाशकत् तं तदा गर्भं संधारयितुमोजसा ॥ ६ ९ ॥

यद्यपि गंगाजी उस गर्भको धारण करनेमें समर्थ थीं; तो भी रुद्रके तेजसे पराभूत होकर बलपूर्वक उसे धारण न कर सकीं ॥ ६ ९ ॥

सा समुत्सृज्य तं दुःखाद् दीप्तवैश्वानरप्रभम् ।

दर्शयामास चाग्निस्तं तदा गंगां भृगूद्वह ॥ ७० ॥

पप्रच्छ सरितां श्रेष्ठां कच्चिद् गर्भः सुखोदयः ।

कीदृग्वर्णोऽपि वा देवि कीदृग्रूपश्च दृश्यते ।

तेजसा केन वा युक्तः सर्वमेतद् ब्रवीहि मे ॥ ७१ ॥

भृगुश्रेष्ठ! गंगाजीने बड़े दुःखसे अग्निके समान तेजस्वी उस गर्भको त्याग दिया । तत्पश्चात् अग्निने उनका दर्शन किया और सरिताओंमें श्रेष्ठ उन गंगाजीसे पूछा — ‘ देवि! तुम्हारा गर्भ सुखपूर्वक उत्पन्न हो गया है न? उसकी कान्ति कैसी है अथवा उसका रूप कैसा दिखायी देता है, वह कैसे तेजसे युक्त है? यह सारी बातें मुझसे कहो ' ॥ ७०-७१ ॥ गंगोवाच

जातरूपः स गर्भो वै तेजसा त्वमिवानघ ।

सुवर्णो विमलो दीप्तः पर्वतं चावभासयत् ॥ ७२ ॥

गंगा बोलीं – देव! वह गर्भ क्या है, सोना है । अनघ! वह तेजमें हूबहू आपके ही समान है । सुवर्ण- जैसी निर्मल कान्तिसे प्रकाशित होता है और सारे पर्वतको उद्भासित करता है ॥ ७२ ॥

पद्मोत्पलविमिश्राणां हृदानामिव शीतलः ।

गन्धोऽस्य स कदम्बानां तुल्यो वै तपतां वर ॥ ७३ ॥

तपनेवालोंमें श्रेष्ठ अग्निदेव! कमल और उत्पलसे संयुक्त सरोवरोंके समान उसका अंग शीतल है और कदम्ब- पुष्पोंके समान उससे मीठी- मीठी सुगन्ध फैलती रहती है ॥ ७३ ॥

तेजसा तस्य गर्भस्य भास्करस्येव रश्मिभिः ।

पृष्ठ 744

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यद् द्रव्यं परसंसृष्टं पृथिव्यां पर्वतेषु च ॥ ७४ ॥

तत् सर्वं काञ्चनीभूतं समन्तात् प्रत्यदृश्यत । सूर्यकी किरणोंके समान उस गर्भसे वहाँकी भूमि या पर्वतोंपर रहनेवाले जिस किसी द्रव्यका स्पर्श हुआ, वह सब चारों ओरसे सुवर्णमय दिखायी देने लगा ॥ ७४ ॥

पर्यधावत शैलांश्च नदीः प्रस्रवणानि च ॥ ७५ ॥

व्यादीपयंस्तेजसा च त्रैलोक्यं सचराचरम् । वह बालक अपने तेजसे चराचर प्राणियोंको प्रकाशित करता हुआ पर्वतों, नदियों और झरनोंकी ओर दौड़ने लगा था ॥ ७५३ ॥

एवंरूपः स भगवान् पुत्रस्ते हव्यवाहन ।

सूर्यवैश्वानरसमः कान्त्या सोम इवापरः ॥ ७६ ॥

हव्यवाहन! आपका ऐश्वर्यशाली पुत्र ऐसे ही रूपवाला है । वह सूर्य तथा आपके समान तेजस्वी और दूसरे चन्द्रमाके समान कान्तिमान् है ॥ ७६ ॥

एवमुक्त्वा तु सा देवी तत्रैवान्तरधीयत ।

पावकश्चापि तेजस्वी कृत्वा कार्यं दिवौकसाम् ॥ ७७ ॥

जगामेष्टं ततो देशं तदा भार्गवनन्दन । भार्गवनन्दन! ऐसा कहकर देवी गंगा वहीं अन्तर्धान हो गयीं और तेजस्वी अग्निदेव देवताओंका कार्य सिद्ध करके उस समय वहाँसे अभीष्ट देशको चले गये ॥ एतैः कर्मगुणैर्लोके नामाग्नेः परिगीयते ॥ ७८ ॥

हिरण्यरेता इति वै ऋषिभिर्विबुधैस्तथा ।

पृथिवी च तदा देवी ख्याता वसुमतीति वै ॥ ७९ ॥

इन्हीं समस्त कर्मों और गुणोंके कारण देवता तथा ऋषि संसारमें अग्निको हिरण्यरेताके नामसे पुकारते हैं । उस समय अग्निजनित हिरण्य ( वसु ) धारण करनेके कारण पृथ्वीदेवी वसुमती नामसे विख्यात हुईं ॥

स तु गर्भो महातेजा गांगेयः पावकोद्भवः ।

दिव्यं शरवणं प्राप्य ववृधेऽद्भुतदर्शनः ॥ ८० ॥

अग्निके अंशसे उत्पन्न हुआ गंगाका वह महातेजस्वी गर्भ सरकण्डोंके दिव्य वनमें पहुँचकर बढ़ने और अद्भुत दिखायी देने लगा ॥ ८० ॥

ददृशुः कृत्तिकास्तं तु बालार्कसदृशद्युतिम् ।

पुत्रं वै ताश्च तं बालं पुपुषुः स्तन्यविस्रवैः ॥ ८१ ॥

प्रभातकालके सूर्यकी भाँति अरुण कान्तिवाले उस तेजस्वी बालकको कृत्तिकाओंने देखा और उसे अपना पुत्र मानकर स्तनोंका दूध पिलाकर उसका पालन - पोषण किया ॥ ८१ ॥

ततः स कार्तिकेयत्वमवाप परमद्युतिः ।

पृष्ठ 745

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स्कन्नत्वात् स्कन्दतां चापि गुहावासाद् गुहोऽभवत् ॥ ८२ ॥

इसीलिये वह परम तेजस्वी कुमार ' कार्तिकेय' नामसे प्रसिद्ध हुआ । शिवके स्कन्दित ( स्खलित ) वीर्यसे उत्पन्न होनेके कारण उनका नाम ' स्कन्द' हुआ और पर्वतकी गुहामें निवास करनेसे वह ' गुह ' कहलाया ॥ ८२ ॥

एवं सुवर्णमुत्पन्नमपत्यं जातवेदसः ।

तत्र जाम्बूनदं श्रेष्ठं देवानामपि भूषणम् ॥ ८३ ॥

इस प्रकार अग्निसे संतानरूपमें सुवर्णकी उत्पत्ति हुई है । उसमें भी जाम्बूनद नामक सुवर्ण श्रेष्ठ है और वह देवताओंका भी भूषण है ॥ ८३ ॥

ततः प्रभृति चाप्येतज्जातरूपमुदाहृतम् ।

रत्नानामुत्तमं रत्नं भूषणानां तथैव च ॥ ८४ ॥

तभीसे सुवर्णका नाम जातरूप हुआ । वह रत्नोंमें उत्तम रत्न और आभूषणोंमें श्रेष्ठ आभूषण है ॥ ८४ ॥

पवित्रं च पवित्राणां मङ्गलानां च मंगलम् ।

यत् सुवर्णं स भगवानग्निरीशः प्रजापतिः ॥ ८५ ॥

वह पवित्रोंमें भी अधिक पवित्र तथा मंगलोंमें भी अधिक मंगलमय है । जो सुवर्ण है, वही भगवान् अग्नि हैं, वही ईश्वर और प्रजापति हैं ॥ ८५ ॥

पवित्राणां पवित्रं हि कनकं द्विजसत्तमाः ।

अग्नीषोमात्मकं चैव जातरूपमुदाहृतम् ॥ ८६ ॥

द्विजवरो! सुवर्ण सम्पूर्ण पवित्र वस्तुओंमें अतिशय पवित्र है; उसे अग्नि और सोमरूप बताया गया है ॥ वसिष्ठ उवाच

अपि चेदं पुरा राम श्रुतं मे ब्रह्मदर्शनम् ।

पितामहस्य यद् वृत्तं ब्रह्मणः परमात्मनः ॥ ८७ ॥

वसिष्ठजी कहते हैं — परशुराम! परमात्मा पितामह ब्रह्माका जो ब्रह्मदर्शन नामक वृत्तान्त मैंने पूर्वकालमें सुना था, वह तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो ॥ ८७ ॥

देवस्य महतस्तात वारुणीं बिभ्रतस्तनुम् ।

ऐश्वर्ये वारुणे राम रुद्रस्येशस्य वै प्रभो ॥ ८८ ॥

आजग्मुर्मुनयः सर्वे देवाश्चाग्निपुरोगमाः ।

यज्ञांगानि च सर्वाणि वषट्कारश्च मूर्तिमान् ॥ ८ ९ ॥

मूर्तिमन्ति च सामानि यजूंषि च सहस्रशः ।

ऋग्वेदश्चागमत् तत्र पदक्रमविभूषितः ॥ ९० ॥

पृष्ठ 746

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 746 का मूल पृष्ठ
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प्रभावशाली तात परशुराम! एक समयकी बात है, सबके ईश्वर और महान् देवता भगवान् रुद्र वरुणका स्वरूप धारण करके वरुणके साम्राज्यपर प्रतिष्ठित थे । उस समय उनके यज्ञमें अग्नि आदि सम्पूर्ण देवता और ऋषि पधारे। सम्पूर्ण मूर्तिमान् यज्ञांग, वषट्कार, साकार साम, सहस्रों यजुर्मन्त्र तथा पद और क्रमसे विभूषित ऋग्वेद भी वहाँ उपस्थित हुए ॥ ८८ – ९० ॥

लक्षणानि स्वराः स्तोभा निरुक्तं सुरपङ्क्तयः ।

ओङ्कारश्चावसन्नेत्रे निग्रहप्रग्रहौ तथा ॥ ९ १ ॥

वेदोंके लक्षण, उदात्त आदि स्वर, स्तोत्र, निरुक्त, सुरपंक्ति, ओंकार तथा यज्ञके नेत्रस्वरूप प्रग्रह और निग्रह भी उस स्थानपर स्थित थे ॥ ९ १ ॥

वेदाश्च सोपनिषदो विद्या सावित्र्यथापि च ।

भूतं भव्यं भविष्यं च दधार भगवान् शिवः ॥ ९ २ ॥

वेद, उपनिषद्, विद्या और सावित्री देवी भी वहाँ आयी थीं । भगवान् शिवने भूत, वर्तमान और भविष्य - तीनों कालोंको धारण किया था ॥ ९ २ ॥

संजुहावात्मनाऽऽत्मानं स्वयमेव तदा प्रभो ।

यज्ञं च शोभयामास बहुरूपं पिनाकधृत् ॥ ९ ३ ॥

प्रभो! पिनाकधारी महादेवजीने अनेक रूपवाले उस यज्ञकी शोभा बढ़ायी और उन्होंने स्वयं ही अपने द्वारा अपने आपको आहुति प्रदान की ॥ ९ ३ ॥

द्यौर्नभः पृथिवी खं च तथा चैवैष भूपतिः ।

सर्वविद्येश्वरः श्रीमानेष चापि विभावसुः ॥ ९ ४ ॥

ये भगवान् शिव ही स्वर्ग, आकाश, पृथ्वी समस्त शून्य प्रदेश, राजा, सम्पूर्ण विद्याओंके अधीश्वर तथा तेजस्वी अग्निरूप हैं ॥ ९ ४ ॥

एष ब्रह्मा शिवो रुद्रो वरुणोऽग्निः प्रजापतिः ।

कीर्त्यते भगवान् देवः सर्वभूतपतिः शिवः ॥ ९ ५ ॥

ये ही भगवान् सर्वभूतपति महादेव ब्रह्मा, शिव, रुद्र, वरुण, अग्नि, प्रजापति तथा कल्याणमय शम्भु आदि नामोंसे पुकारे जाते हैं ॥ ९ ५ ॥

तस्य यज्ञः पशुपतेस्तपः क्रतव एव च ।

दीक्षा दीप्तव्रता देवी दिशश्च सदिगीश्वराः ॥ ९ ६ ॥

देवपत्न्यश्च कन्याश्च देवानां चैव मातरः ।

आजग्मुः सहितास्तत्र तदा भृगुकुलोद्वह ॥ ९ ७ ॥

भृगुकुलभूषण! इस प्रकार भगवान् पशुपतिका वह यज्ञ चलने लगा । उसमें सम्मिलित होनेके लिये तप, क्रतु, उद्दीप्त व्रतवाली दीक्षा देवी, दिक्पालोंसहित दिशाएँ, देवपत्नियाँ, देवकन्याएँ तथा देव- माताएँ भी एक साथ आयी थीं ॥ ९ ६ - ९ ७ ॥ यज्ञं पशुपतेः प्रीता वरुणस्य महात्मनः ।

पृष्ठ 747

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स्वयम्भुवस्तु ता दृष्ट्वा रेतः समपतद् भुवि ॥ ९ ८ ॥ महात्मा वरुण पशुपतिके यज्ञमें आकर वे देवांगनाएँ बहुत प्रसन्न थीं । उस समय उन्हें देखकर स्वयम्भू ब्रह्माजीका वीर्य स्खलित हो पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ९ ८ ॥

तस्य शुक्रस्य विस्पन्दान् पांसून् संगृह्य भूमितः ।

त्रास्यत् पूषा कराभ्यां वै तस्मिन्नेव हुताशने ॥ ९९ ॥

तब ब्रह्माजीके वीर्यसे संसिक्त धूलिकणोंको दोनों हाथोंद्वारा भूमिसे उठाकर पूषाने उसी आगमें फेंक दिया ॥ ९९ ॥

ततस्तस्मिन् सम्प्रवृत्ते सत्रे ज्वलितपावके ।

ब्रह्मणो जुह्वतस्तत्र प्रादुर्भावो बभूव ह ॥ १०० ॥

तदनन्तर प्रज्वलित अग्निवाले उस यज्ञके चालू होनेपर वहाँ ब्रह्माजीका वीर्य पुनः स्खलित हुआ ॥ १०० ॥

स्कन्नमात्रं च तच्छुक्रं स्रुवेण परिगृह्य सः ।

आज्यवन्मन्त्रतश्चापि सोऽजुहोद् भृगुनन्दन ॥ १०१ ॥

भृगुनन्दन! स्खलित होते ही उस वीर्यको स्रुवेमें लेकर उन्होंने स्वयं ही मन्त्र पढ़ते हुए घीकी भाँति उसका होम कर दिया ॥ १०१ ॥

ततः स जनयामास भूतग्रामं च वीर्यवान् ।

तस्य तत् तेजसस्तस्माज्जज्ञे लोकेषु तैजसम् ॥ १०२ ॥

शक्तिशाली ब्रह्माजीने उस त्रिगुणात्मक वीर्यसे चतुर्विध प्राणिसमुदायको जन्म दिया । उनके वीर्यका जो रजोमय अंश था, उससे जगत् में तैजस प्रवृत्तिप्रधान जंगम प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई ॥ १०२ ॥

तमसस्तामसा भावा व्यापि सत्त्वं तथोभयम् ।

स गुणस्तेजसो नित्यस्तस्य चाकाशमेव च ॥ १०३ ॥

तमोमय अंशसे तामस पदार्थ- स्थावर वृक्ष आदि प्रकट हुए और जो सात्त्विक अंश था, वह राजस और तामस दोनोंमें अन्तर्भूत हो गया । वह सत्त्वगुण अर्थात् प्रकाशस्वरूपा बुद्धिका नित्यस्वरूप है और आकाश आदि सम्पूर्ण विश्व भी उस बुद्धिका कार्य होनेसे उसका ही स्वरूप है ॥ १०३ ॥

सर्वभूतेषु च तथा सत्त्वं तेजस्तथोत्तमम् ।

शुक्रे हुतेऽग्नौ तस्मिंस्तु प्रादुरासंस्त्रयः प्रभो ॥ १०४ ॥

पुरुषा वपुषा युक्ताः स्वैः स्वैः प्रसवजैर्गुणैः । अतः सम्पूर्ण भूतोंमें जो सत्त्वगुण तथा उत्तम तेज है, वह प्रजापतिके उस शुक्रसे ही प्रकट हुआ है । प्रभो! ब्रह्माजीके वीर्यकी जब अग्निमें आहुति दी गयी तब उससे तीन शरीरधारी पुरुष उत्पन्न हुए, जो अपने - अपने कारणजनित गुणोंसे सम्पन्न थे ॥ १०४ ॥

भृगित्येव भृगुः पूर्वमंगारेभ्योऽङ्गिराभवत् ॥ १०५ ॥

पृष्ठ 748

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 748 का मूल पृष्ठ
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अंगारसंश्रयाच्चैव कविरित्यपरोऽभवत् ।

सह ज्वालाभिरुत्पन्नो भृगुस्तस्माद् भृगुः स्मृतः ॥ १०६ ॥

भृग् अर्थात् अग्निकी ज्वालासे उत्पन्न होनेके कारण एक पुरुषका नाम ' भृगु ' हुआ । अंगारोंसे प्रकट हुए दूसरे पुरुषका नाम ' अंगिरा' हुआ और अंगारोंके आश्रित जो स्वल्पमात्र ज्वाला या भृगु होती है उससे ' कवि' नामक तीसरे पुरुषका प्रादुर्भाव हुआ । भृगुजी ज्वालाओंके साथ ही उत्पन्न हुए थे, उससे भृगु कहलाये ॥ १०५-१०६ ॥

मरीचिभ्यो मरीचिस्तु मारीचः कश्यपो ह्यभूत् ।

अंगारेभ्योऽङ्गितस्तात वालखिल्याः कुशोच्चयात् ॥ १०७ ॥

उसी अग्निकी मरीचियोंसे मरीचि उत्पन्न हुए; जिनके पुत्र मारीच – कश्यप नामसे विख्यात हैं । तात! अंगारोंसे अंगिरा और कुशोंके ढेरसे वालखिल्य नामक ऋषि प्रकट हुए थे ॥ १०७ ॥

अत्रैवात्रेति च विभो जातमत्रिं वदन्त्यपि ।

तथा भस्मव्यपोहेभ्यो ब्रह्मर्षिगणसम्मताः ॥ १०८ ॥

वैखानसाः समुत्पन्नास्तपः श्रुतगुणेप्सवः ।

अश्रुतोऽस्य समुत्पन्नावश्विनौ रूपसम्मतौ ॥ १० ९ ॥

विभो! अत्रैव — उन्हीं कुशसमूहोंसे एक और ब्रह्मर्षि उत्पन्न हुए, जिन्हें लोग ‘ अत्रि ’ कहते हैं । भस्म— राशियोंसे ब्रह्मर्षियोंद्वारा सम्मानित वैखानसोंकी उत्पत्ति हुई, जो तपस्या, शास्त्र -ज्ञान और सद्गुणोंके अभिलाषी होते हैं । अग्निके अश्रुसे दोनों अश्विनीकुमार प्रकट हुए, जो अपनी रूप - सम्पत्तिके द्वारा सर्वत्र सम्मानित हैं ॥ १०८-१०९ ॥

शेषाः प्रजानां पतयः स्रोतोभ्यस्तस्य जज्ञिरे ।

ऋषयो रोमकूपेभ्यः स्वेदाच्छन्दो बलान्मनः ॥ ११० ॥

शेष प्रजापतिगण उनके श्रवण आदि इन्द्रियोंसे उत्पन्न हुए । रोमकूपोंसे ऋषि, पसीनेसे छन्द और वीर्यसे मनकी उत्पत्ति हुई ॥ ११० ॥

एतस्मात् कारणादाहुरग्निः सर्वास्तु देवताः ।

ऋषयः श्रुतसम्पन्ना वेदप्रामाण्यदर्शनात् ॥ १११ ॥

इस कारणसे शास्त्रज्ञानसम्पन्न महर्षियोंने वेदोंकी प्रामाणिकतापर दृष्टि रखते हुए अग्निको सर्वदेवमय बताया है ॥ १११ ॥

यानि दारुणि निर्यासास्ते मासाः पक्षसंज्ञिताः ।

अहोरात्रा मुहूर्ताश्च पित्तं ज्योतिश्च दारुणम् ॥ ११२ ॥

उस यज्ञमें जो समिधाएँ काममें ली गयीं तथा उनसे जो रस निकला, वे ही सब मास, पक्ष, दिन, रात एवं मुहूर्तरूप हो गये और अग्निका जो पित्त था, वह उग्र तेज होकर प्रकट हुआ ॥ ११२ ॥

रौद्रं लोहितमित्याहुलहितात् कनकं स्मृतम् ।

पृष्ठ 749

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 749 का मूल पृष्ठ
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तन्मैत्रमिति विज्ञेयं धूमाच्च वसवः स्मृताः ॥ ११३ ॥

अग्निके तेजको लोहित कहते हैं, उस लोहितसे कनक उत्पन्न हुआ । उस कनकको मैत्र जानना चाहिये तथा अग्निके धूमसे वसुओंकी उत्पत्ति बतायी गयी है ॥

अर्चिषो याश्च ते रुद्रास्तथाऽऽदित्या महाप्रभाः ।

उद्दिष्टास्ते तथांगारा ये धिष्ण्येषु दिवि स्थिताः ॥ ११४ ॥

अग्निकी जो लपटें होती हैं, वे ही एकादश रुद्र तथा अत्यन्त तेजस्वी द्वादश आदित्य हैं, तथा उस यज्ञमें जो दूसरे दूसरे अंगारे थे वे ही आकाशस्थित नक्षत्रमण्डलोंमें ज्योतिःपुंजके रूपमें स्थित हैं ॥ ११४ ॥

आदिकर्ता च लोकस्य तत्परं ब्रह्म तद् ध्रुवम् ।

सर्वकामदमित्याहुस्तद्रहस्यमुवाच ह ॥ ११५ ॥

इस लोकके जो आदि स्रष्टा हैं, उन ब्रह्माजीका कथन है कि अग्नि परब्रह्मस्वरूप है । वही अविनाशी परब्रह्म परमात्मा है और वही सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है । यह गोपनीय रहस्य ज्ञानी पुरुष बताते हैं ॥

ततोऽब्रवीन्महादेवो वरुणः पवनात्मकः ।

मम सत्रमिदं दिव्यमहं गृहपतिस्त्विह ॥ ११६ ॥

तब वरुण एवं वायुरूप महादेवजीने कहा – ' देवताओ! यह मेरा दिव्य यज्ञ है । मैं ही इस यज्ञका गृहस्थ यजमान हूँ ॥ ११६ ॥

त्रीणि पूर्वाण्यपत्यानि मम तानि न संशयः ।

इति जानीत खगमा मम यज्ञफलं हि तत् ॥ ११७ ॥

‘ आकाशचारी देवगण! पहले जो तीन पुरुष प्रकट हुए हैं, वे भृगु, अंगिरा और कवि मेरे पुत्र हैं, इसमें संशय नहीं है । इस बातको तुम जान लो; क्योंकि इस यज्ञका जो कुछ फल है, उसपर मेरा ही अधिकार है ' ॥ ११७ ॥

अग्निरुवाच

मदङ्गेभ्यः प्रसूतानि मदाश्रयकृतानि च ।

ममैव तान्यपत्यानि वरुणो ह्यवशात्मकः ॥ ११८ ॥

अग्नि बोले- ये तीनों संतानें मेरे अंगोंसे उत्पन्न हुई हैं और मेरे ही आश्रयमें विधाताने इनकी सृष्टि की है । अतः ये तीनों मेरे ही पुत्र हैं । वरुणरूपधारी महादेवजीका इनपर कोई अधिकार नहीं है ॥ ११८ ॥

अथाब्रवील्लोकगुरुर्ब्रह्मा लोकपितामहः ।

ममैव तान्यपत्यानि मम शुक्रं हुतं हि तत् ॥ ११ ९ ॥

तदनन्तर लोकपितामह लोकगुरु ब्रह्माजीने कहा- ' ये सब मेरी ही संतानें हैं; क्योंकि मेरे ही वीर्यकी आहुति दी गयी है; जिससे इनकी उत्पत्ति हुई है ॥

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महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 750 का मूल पृष्ठ
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अहं कर्ता हि सत्रस्य होता शुक्रस्य 'चैव ह यस्य बीजं फलं तस्य शुक्रं चेत् कारणं मतम् ॥ १२० ॥

‘ मैं ही यज्ञका कर्ता और अपने वीर्यका हवन करनेवाला हूँ । जिसका बीज होता है उसको ही उसका फल मिलता है । यदि इनकी उत्पत्तिमें वीर्यको ही कारण माना जाय तो निश्चय ही ये मेरे पुत्र हैं ' ॥ १२० ॥

ततोऽब्रुवन् देवगणाः पितामहमुपेत्य वै ।

कृताञ्जलिपुटाः सर्वे शिरोभिरभिवन्द्य च ॥ १२१ ॥

इस प्रकार विवाद उपस्थित होनेपर समस्त देवताओंने ब्रह्माजीके पास जा दोनों हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर उनको प्रणाम किया और कहा— ॥ १२१ ॥

वयं च भगवन् सर्वे जगच्च सचराचरम् ।

तवैव प्रसवाः सर्वे तस्मादग्निर्विभावसुः ॥ १२२ ॥

वरुणश्चेश्वरो देवो लभतां काममीप्सितम् । ‘ भगवन्! हम सब लोग और चराचरसहित सारा जगत् ये सब- के - सब आपकी ही संतान हैं । अतः अब ये प्रकाशमान अग्नि और ये वरुणरूपधारी ईश्वर महादेव भी अपना मनोवांछित फल प्राप्त करें ' ॥ १२२ ॥

निसर्गाद् ब्रह्मणश्चापि वरुणो यादसाम्पतिः ॥ १२३ ॥

जग्राह वै भृगुं पूर्वमपत्यं सूर्यवर्चसम् ।

ईश्वरोऽङ्गिरसं चाग्नेरपत्यार्थमकल्पयत् ॥ १२४ ॥

तब ब्रह्माजीकी आज्ञासे जलजन्तुओंके स्वामी वरुणरूपी भगवान् शिवने सबसे पहले सूर्यके समान तेजस्वी भृगुको पुत्ररूपमें ग्रहण किया । फिर उन्होंने ही अंगिराको अग्निकी संतान निश्चित किया ॥ १२३-१२४ ॥

पितामहस्त्वपत्यं वै कविं जग्राह तत्त्ववित् ।

तदा स वारुणः ख्यातो भृगुः प्रसव कर्मवित् ॥ १२५ ॥

आग्नेयस्त्वंगिराः श्रीमान् कविर्ब्राह्यो महायशाः ।

भार्गवांगिरसौ लोके लोकसंतानलक्षणौ ॥ १२६ ॥

तदनन्तर तत्त्वज्ञानी ब्रह्माने कविको अपनी संतानके रूपमें ग्रहण किया । उस समय संतानके कर्तव्यको जाननेवाले महर्षि भृगु वारुण नामसे विख्यात हुए । तेजस्वी अंगिरा आग्नेय तथा महायशस्वी कवि ब्राह्म नामसे विख्यात हुए । भृगु और अंगिरा — ये दोनों लोकमें जगत्की सृष्टिका विस्तार करनेवाले बतलाये गये हैं ॥ १२५-१२६ ॥

एते हि प्रस्रवाः सर्वे प्रजानां पतयस्त्रयः ।

सर्व संतानमेतेषामिदमित्युपधारय ॥ १२७ ॥

इस प्रकार ये तीन प्रजापति हैं और शेष सब लोग इनकी संतानें हैं । यह सारा जगत् इन्हींकी संतति हैं, इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो ॥ १२७ ॥