06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 781–790
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 781–790
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पादयोश्चैव विप्राणां ये त्वन्नमुपभुञ्जते ॥ १४ ॥
कृत्वा च दक्षिणाग्रान् वै दर्भान् स प्रयतः शुचिः प्रददौ श्रीमतः पिण्डान् नामगोत्रमुदाहरन् ॥ १५ ॥
इसके बाद भोजन करनेवाले ब्राह्मणोंके पैरोंके नीचे आसनोंपर उन्होंने दक्षिणाग्र कुश बिछा दिये और ( अपने सामने भी ) दक्षिणाग्र कुश रखकर पवित्र एवं सावधान हो अपने पुत्र श्रीमान्के नाम और गोत्रका उच्चारण करते हुए कुशोंपर पिण्डदान किया ॥ १४-१५ ॥
तत् कृत्वा स मुनिश्रेष्ठो धर्मसंकरमात्मनः ।
पश्चात्तापेन महता तप्यमानोऽभ्यचिन्तयत् ॥ १६ ॥
इस प्रकार श्राद्ध करनेके पश्चात् मुनिश्रेष्ठ निमि अपनेमें धर्मसंकरताका दोष मानकर ( अर्थात् वेदमें पिता - पितामह आदिके उद्देश्यसे जिस श्राद्धका विधान है, उसको मैंने स्वेच्छासे पुत्रके निमित्त किया है - यह सोचकर) महान् पश्चात्तापसे संतप्त हो उठे और इस प्रकार चिन्ता करने लगे- ॥ १६ ॥
अकृतं मुनिभिः पूर्वं किं मयेदमनुष्ठितम् ।
कथं नु शापेन न मां दहेयुर्ब्राह्मणा इति ॥ १७ ॥
' अहो! मुनियोंने जो कार्य पहले कभी नहीं किया, उसे मैंने ही क्यों कर डाला? मेरे इस मनमाने बर्तावको देखकर ब्राह्मणलोग मुझे अपने शापसे क्यों नहीं भस्म कर डालेंगे? ' ॥ १७ ॥
ततः संचिन्तयामास वंशकर्तारमात्मनः ध्यातमात्रस्तथा चात्रिराजगाम तपोधनः ॥ १८ ॥
यह बात ध्यानमें आते ही उन्होंने अपने वंशप्रवर्तक महर्षि अत्रिका स्मरण किया ।
उनके चिन्तन करते ही तपोधन अत्रि वहाँ आ पहुँचे ॥ १८ ॥
अथात्रिस्तं तथा दृष्ट्वा पुत्रशोकेन कर्षितम् ।
भृशमाश्वासयामास वाग्भिरिष्टाभिरव्ययः ॥ १ ९ ॥
आनेपर जब अविनाशी अत्रिने निमिको पुत्रशोकसे व्याकुल देखा तब मधुर वाणीद्वारा उन्हें बहुत आश्वासन दिया— ॥ १ ९ ॥
निमे संकल्पितस्तेऽयं पितृयज्ञस्तपोधन ।
मा ते भूद् भीः पूर्वदृष्टो धर्मोऽयं ब्रह्मणा स्वयम् ॥ २० ॥
‘ तपोधन निमे! तुमने जो यह पितृयज्ञ किया है, इससे डरो मत । सबसे पहले स्वयं ब्रह्माजीने इस धर्मका साक्षात्कार किया है ॥ २० ॥
सोऽयं स्वयम्भुविहितो धर्मः संकल्पितस्त्वया ।
ऋते स्वयम्भुवः कोऽन्यः श्राद्धेयं विधिमाहरेत् ॥ २१ ॥
‘ अतः तुमने यह ब्रह्माजीके चलाये हुए धर्मका ही अनुष्ठान किया है । ब्रह्माजीके सिवा दूसरा कौन इस श्राद्धविधिका उपदेश कर सकता है ॥ २१ ॥
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अथाख्यास्यामि ते पुत्र श्राद्धेयं विधिमुत्तमम् ।
स्वयम्भुविहितं पुत्र तत् कुरुष्व निबोध मे ॥ २२ ॥
' बेटा! अब मैं तुमसे स्वयम्भू ब्रह्माजीकी बतायी हुई श्राद्धकी उत्तम विधिका वर्णन करता हूँ, इसे सुनो और सुनकर इसी विधिके अनुसार श्राद्धका अनुष्ठान करो ॥ २२ ॥
कृत्वाग्नौकरणं पूर्वं मन्त्रपूर्वं तपोधन ।
ततोऽग्नयेऽथ सोमाय वरुणाय च नित्यशः ॥ २३ ॥
विश्वेदेवाश्च ये नित्यं पितृभिः सह गोचराः ।
तेभ्यः संकल्पिता भागाः स्वयमेव स्वयम्भुवा ॥ २४ ॥
‘ तब तपोधन! पहले वेदमन्त्रके उच्चारणपूर्वक अग्नौकरण- अग्निकरणकी क्रिया पूरी करके अग्नि, सोम, वरुण और पितरोंके साथ नित्य रहनेवाले विश्वेदेवोंको उनका भाग सदा अर्पण करे । साक्षात् ब्रह्माजीने इनके भागोंकी कल्पना की है ॥ २३-२४ ॥
स्तोतव्या चेह पृथिवी निवापस्येह धारिणी ।
वैष्णवी काश्यपी चेति तथैवेहाक्षयेति च ॥ २५ ॥
‘ तदनन्तर श्राद्धकी आधारभूता पृथ्वीकी वैष्णवी, काश्यपी और अक्षया आदि नामोंसे स्तुति करनी चाहिये ॥
उदकानयने चैव स्तोतव्यो वरुणो विभुः ।
ततोऽग्निश्चैव सोमश्च आप्याय्याविहतेऽनघ ॥ २६ ॥
‘ अनघ! श्राद्धके लिये जल लानेके लिये भगवान् वरुणका स्तवन करना उचित है ।
इसके बाद तुम्हें अग्नि और सोमको भी तृप्त करना चाहिये ॥ २६ ॥
देवास्तु पितरो नाम निर्मिता ये स्वयम्भुवा ।
उष्णपा ये महाभागास्तेषां भागः प्रकल्पितः ॥ २७ ॥
' ब्रह्माजीके ही उत्पन्न किये हुए कुछ देवता पितरोंके नामसे प्रसिद्ध हैं । उन महाभाग पितरोंको उष्णप भी कहते हैं। स्वयम्भूने श्राद्धमें उनका भाग निश्चित किया है ॥ २७ ॥
ते श्राद्धेनार्च्यमाना वै विमुच्यन्ते ह किल्बिषात् ।
सप्तकः पितृवंशस्तु पूर्वदृष्टः स्वयम्भुवा ॥ २८ ॥
' श्राद्धके द्वारा उनकी पूजा करनेसे श्राद्धकर्ताके पितरोंका पापसे उद्धार हो जाता है । ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जिन अग्निष्वात्त आदि पितरोंको श्राद्धका अधिकारी बताया है, उनकी संख्या सात है ॥ २८ ॥
विश्वे चाग्निमुखा देवाः संख्याताः पूर्वमेव ते ।
तेषां नामानि वक्ष्यामि भागार्हाणां महात्मनाम् ॥ २ ९ ॥
‘विश्वेदेवोंकी चर्चा तो मैंने पहले ही की है, उन सबका मुख अग्नि है । यज्ञमें भाग पानेके अधिकारी उन महात्माओंके नामोंको कहता हूँ ॥ २ ९ ॥ बलं धृतिर्विपाप्मा च पुण्यकृत् पावनस्तथा ।
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पार्ष्णिक्षेमा समूहश्च दिव्यसानुस्तथैव च ॥ ३० ॥
विवस्वान् वीर्यवान् ह्रीमान् कीर्तिमान् कृत एव च ।
जितात्मा मुनिवीर्यश्च दीप्तरोमा भयंकरः ॥ ३१ ॥
अनुकर्मा प्रतीतश्च प्रदाताप्यंशुमांस्तथा ।
शैलाभः परमक्रोधी धीरोष्णी भूपतिस्तथा ॥ ३२ ॥
स्रजो वज्री वरी चैव विश्वेदेवाः सनातनाः ।
विद्युद्वर्चाः सोमवर्चाः सूर्यश्रीश्चेति नामतः ॥ ३३ ॥
सोमपः सूर्यसावित्रो दत्तात्मा पुण्डरीयकः ।
उष्णीनाभो नभोदश्च विश्वायुर्दीप्तिरेव च ॥ ३४ ॥
चमूहरः सुरेशश्च व्योमारिः शंकरो भवः ।
ईशः कर्ता कृतिर्दक्षो भुवनो दिव्यकर्मकृत् ॥ ३५ ॥
गणितः पञ्चवीर्यश्च आदित्यो रश्मिवांस्तथा ।
सप्तकृत् सोमवर्चाश्च विश्वकृत् कविरेव च ॥ ३६ ॥
अनुगोप्ता सुगोप्ता च नप्ता चेश्वर एव च ।
कीर्तितास्ते महाभागाः कालस्य गतिगोचराः ॥ ३७ ॥
' बल, धृति, विपाप्मा, पुण्यकृत्, पावन, पर्ष्णिक्षेमा, समूह, दिव्यसानु, विवस्वान्, वीर्यवान्, ह्रीमान्, कीर्तिमान्, कृत, जितात्मा, मुनिवीर्य, दीप्तरोमा, भयंकर, अनुकर्मा, प्रतीत, प्रदाता, अंशुमान्, शैलाभ, परमक्रोधी, धीरोष्णी, भूपति, स्रज, वज्री, वरी, विश्वेदेव, विद्युद्वर्चा, सोमवर्चा, सूर्यश्री, सोमप, सूर्यसावित्र, दत्तात्मा, पुण्डरीयक, उष्पीनाभ, नभोद, विश्वायु, दीप्ति, चमूहर, सुरेश, व्योमारि, शंकर, भव, ईश, कर्ता, कृति, दक्ष, भुवन, दिव्यकर्मकृत्, गणित, पंचवीर्य, आदित्य, रश्मिवान्, सप्तकृत्, सोमवर्चा, विश्वकृत्, कवि, अनुगोप्ता, सुगोप्ता, नप्ता और ईश्वर । इस प्रकार सनातन विश्वेदेवोंके नाम बतलाये गये । ये महाभाग कालकी गतिके जाननेवाले कहे गये हैं ॥
अश्राद्धेयानि धान्यानि कोद्रवाः पुलकास्तथा ।
हिंगुद्रव्येषु शाकेषु पलाण्डुं लसुनं तथा ॥ ३८ ॥
सौभाञ्जनः कोविदारस्तथा गृञ्जनकादयः ।
कूष्माण्डजात्यलाबुं च कृष्णं लवणमेव च ॥ ३ ९ ॥
ग्राम्यवाराहमांसं च यच्चैवाप्रोक्षितं भवेत् ।
कृष्णाजाजी विडश्चैव शीतपाकी तथैव च ।
अंकुराद्यास्तथा वर्ज्या इह शृंगाटकानि च ॥ ४० ॥
‘ अब श्राद्धमें निषिद्ध अन्न आदि वस्तुओंका वर्णन करता हूँ । अनाजमें कोदो और पुलक-सरसो, हिंगुद्रव्य - छौंकनेके काम आनेवाले पदार्थोंमें हींग आदि पदार्थ, शाकोंमें प्याज, लहसुन, सहिजन, कचनार, गाजर, कुम्हडा और लौकी आदि; कालानमक, गाँवमें
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पैदा होनेवाले वाराहीकन्दका गूदा, अप्रोक्षित- जिसका प्रोक्षण नहीं किया गया ( संस्कार-हीन ), काला जीरा, बीरिया सौंचर नमक, शीतपाकी ( शाक -विशेष ), जिसमें अंकुर उत्पन्न
हो गये हों ऐसे मूँग और सिंघाड़ा आदि । ये सब वस्तुएँ श्राद्धमें वर्जित हैं ॥
वर्जयेल्लवणं सर्वं तथा जम्बूफलानि च ।
अवक्षुतावरुदितं तथा श्राद्धे च वर्जयेत् ॥ ४१ ॥
‘ सब प्रकारका नमक, जामुनका फल तथा छींक या आँसूसे दूषित हुए पदार्थ भी श्राद्धमें त्याग देने चाहिये ॥
निवापे हव्यकव्ये वा गर्हितं च सुदर्शनम् ।
पितरश्च हि देवाश्च नाभिनन्दन्ति तद्धविः ॥ ४२ ॥
‘ श्राद्धविषयक हव्य - कव्यमें सुदर्शनसोमलता निन्दित है । उस हविको विश्वेदेव एवं पितृगण पसंद नहीं करते हैं ॥ ४२ ॥
चाण्डालश्वपचौ वर्ज्यो निवापे समुपस्थिते ।
काषायवासाः कुष्ठी वा पतितो ब्रह्महापि वा ॥ ४३ ॥
संकीर्णयोनिर्विप्रश्च सम्बन्धी पतितश्च यः ।
वर्जनीया बुधैरेते निवापे समुपस्थिते ॥ ४४ ॥
‘ पिण्डदानका समय उपस्थित होनेपर उस स्थानसे चाण्डालों और श्वपचोंको हटा देना चाहिये । गेरुआ वस्त्र धारण करनेवाला संन्यासी, कोढ़ी, पतित, ब्रह्महत्यारा, वर्णसंकर ब्राह्मण तथा धर्मभ्रष्ट सम्बन्धी भी श्राद्धकाल उपस्थित होनेपर विद्वानोंद्वारा वहाँसे हटा देने योग्य हैं ' ॥ ४३-४४ ॥
इत्येवमुक्त्वा भगवान् स्ववंश्यं तमृषिं पुरा ।
पितामहसभां दिव्यां जगामात्रिस्तपोधनः ॥ ४५ ॥
पूर्वकालमें अपने वंशज निमि ऋषिको श्राद्धके विषयमें यह उपदेश देकर तपस्याके धनी भगवान् अत्रि ब्रह्माजीकी दिव्य सभामें चले गये ॥ ४५ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्राद्धकल्पे एकनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ १ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्राद्धकल्पविषयक इक्यानबेवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ९ १ ॥ 0
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द्विनवतितमोऽध्यायः पितर और देवताओंका श्राद्धान्नसे अजीर्ण होकर ब्रह्माजीके पास जाना और अग्निके द्वारा अजीर्णका निवारण, श्राद्धसे तृप्त हुए पितरोंका आशीर्वाद भीष्म उवाच
तथा निमौ प्रवृत्ते तु सर्व एव महर्षयः ।
पितृयज्ञं तु कुर्वन्ति विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इस प्रकार जब महर्षि निमि पहले - पहल श्राद्धमें प्रवृत्त हुए, उसके बाद सभी महर्षि शास्त्रविधिके अनुसार पितृयज्ञका अनुष्ठान करने लगे ॥ १ ॥
ऋषयो धर्मनित्यास्तु कृत्वा निवपनान्युत ।
तर्पणं चाप्यकुर्वन्त तीर्थाम्भोभिर्यतव्रताः ॥ २ ॥
सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले और नियमपूर्वक व्रत धारण करनेवाले महर्षि पिण्डदान करनेके पश्चात् तीर्थके जलसे पितरोंका तर्पण भी करते थे ॥ २ ॥
निवापैर्दीयमानैश्च चातुर्वर्ण्येन भारत ।
तर्पिताः पितरो देवास्तत्रान्नं जरयन्ति वै ॥ ३ ॥
अजीर्णैस्त्वभिहन्यन्ते ते देवाः पितृभिः सह ।
सोममेवाभ्यपद्यन्त तदा ह्यन्नाभिपीडिताः ॥ ४ ॥
भारत! धीरे - धीरे चारों वर्णोंके लोग श्राद्धमें देवताओं और पितरोंको अन्न देने लगे । लगातार श्राद्धमें भोजन करते - करते वे देवता और पितर पूर्ण तृप्त हो गये । अब वे अन्न पचानेके प्रयत्नमें लगे । अजीर्णसे उन्हें विशेष कष्ट होने लगा । तब वे सोम देवताके पास गये ॥
तेऽब्रुवन् सोममासाद्य पितरोऽजीर्णपीडिताः ।
निवापान्नेन पीड्यामः श्रेयो नोऽत्र विधीयताम् ॥ ५ ॥
सोमके पास जाकर वे अजीर्णसे पीड़ित पितर इस प्रकार बोले— ' देव! हम श्राद्धान्नसे
बहुत कष्ट पा रहे हैं । अब आप हमारा कल्याण कीजिये ' ॥ ५ ॥
तान् सोमः प्रत्युवाचाथ श्रेयश्चेदीप्सितं सुराः ।
स्वयम्भूसदनं यात स वः श्रेयोऽभिधास्यति ॥ ६ ॥
तब सोमने उनसे कहा – ' देवताओ! यदि आप कल्याण चाहते हैं तो ब्रह्माजीकी शरणमें जाइये, वही आपलोगोंका कल्याण करेंगे ' ॥ ६ ॥
ते सोमवचनाद् देवाः पितृभिः सह भारत ।
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मेरुशृंगे समासीनं पितामहमुपागमन् ॥ ७ ॥
भरतनन्दन! सोमके कहनेसे वे पितरोंसहित देवता मेरुपर्वतके शिखरपर विराजमान ब्रह्माजीके पास गये ॥ पितर ऊचुः
निवापान्नेन भगवन् भृशं पीड्यामहे वयम् ।
प्रसादं कुरु नो देव श्रेयो नः संविधीयताम् ॥ ८ ॥
पितरोंने कहा — भगवन्! निरन्तर श्राद्धका अन्न खानेसे हम अजीर्णतावश अत्यन्त कष्ट पा रहे हैं । देव! हमलोगोंपर कृपा कीजिये और हमें कल्याणके भागी बनाइये ॥ ८ ॥
इति तेषां वचः श्रुत्वा स्वयम्भूरिदमब्रवीत् ।
एष मे पार्श्वतो वह्निर्युष्मच्छ्रेयोऽभिधास्यति ॥ ९ ॥
पितरोंकी यह बात सुनकर स्वयम्भू ब्रह्माजीने इस प्रकार कहा - ' देवगण! मेरे निकट
ये अग्निदेव विराजमान हैं । ये ही तुम्हारे कल्याणकी बात बतायेंगे' ॥ ९ ॥
अग्निरुवाच
सहितास्तात भोक्ष्यामो निवापे समुपस्थिते ।
जरयिष्यथ चाप्यन्नं मया सार्धं न संशयः ॥ १० ॥
अग्नि बोले — देवताओ और पितरो! अबसे श्राद्धका अवसर उपस्थित होनेपर हमलोग साथ ही भोजन किया करेंगे । मेरे साथ रहनेसे आपलोग उस अन्नको पचा सकेंगे, इसमें संशय नहीं है ॥ १० ॥
एतच्छ्रुत्वा तु पितरस्ततस्ते विज्वराऽभवन् ।
एतस्मात् कारणाच्चाग्नेः प्राक् तावद् दीयते नृप ॥ ११ ॥
नरेश्वर! अग्निकी यह बात सुनकर वे पितर निश्चिन्त हो गये; इसीलिये श्राद्धमें पहले अग्निको ही भाग अर्पित किया जाता है ॥ ११ ॥
निवप्ते चाग्निपूर्व वै निवापे पुरुषर्षभ ।
न ब्रह्मराक्षसास्तं वै निवापं धर्षयन्त्युत ॥ १२ ॥
पुरुषप्रवर! अग्निमें हवन करनेके बाद जो पितरोंके निमित्त पिण्डदान दिया जाता है, उसे ब्रह्मराक्षस दूषित नहीं करते ॥ १२ ॥
रक्षांसि चापवर्तन्ते स्थिते देवे हुताशने ।
पूर्वं पिण्डं पितुर्दद्यात् ततो दद्यात् पितामहे ॥ १३ ॥
अग्निदेवके विराजमान रहनेपर राक्षस वहाँसे भाग जाते हैं । सबसे पहले पिताको पिण्ड देना चाहिये, फिर पितामहको ॥ १३ ॥
प्रपितामहाय च तत एष श्राद्धविधिः स्मृतः ।
ब्रूयाच्छ्राद्धे च सावित्रीं पिण्डे पिण्डे समाहितः ॥ १४ ॥
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तदनन्तर प्रपितामहको पिण्ड देना चाहिये । यह श्राद्धकी विधि बतायी गयी है । श्राद्धमें एकाग्रचित्त हो प्रत्येक पिण्ड देते समय गायत्री मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये ॥ १४ ॥
सोमायेति च वक्तव्यं तथा पितृमतेति च ।
रजस्वला च या नारी व्यंगिता कर्णयोश्च या ।
निवापे नोपतिष्ठेत संग्राह्या नान्यवंशजा ॥ १५ ॥
पिण्ड- दानके आरम्भमें पहले अग्नि और सोमके लिये जो दो भाग दिये जाते हैं, उनके मन्त्र क्रमशः इस प्रकार हैं- ' अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा', ' सोमाय पितृमते स्वाहा । ' जो स्त्री रजस्वला हो अथवा जिसके दोनों कान बहरे हों, उसको श्राद्धमें नहीं ठहरना चाहिये । दूसरे वंशकी स्त्रीको भी श्राद्धकर्ममें नहीं लेना चाहिये ॥
जलं प्रतरमाणश्च कीर्तयेत पितामहान् ।
नदीमासाद्य कुर्वीत पितॄणां पिण्डतर्पणम् ॥ १६ ॥
जलको तैरते समय पितामहों ( के नामों) का कीर्तन करे । किसी नदीके तटपर जानेके बाद वहाँ पितरोंके लिये पिण्डदान और तर्पण करना चाहिये ॥ १६ ॥
पूर्वं स्ववंशजानां तु कृत्वाद्भिस्तर्पणं पुनः ।
सुहृत्सम्बन्धिवर्गाणां ततो दद्याज्जलाञ्जलिम् ॥ १७ ॥
पहले अपने वंशमें उत्पन्न पितरोंका जलके द्वारा तर्पण करके तत्पश्चात् सुहृद् और सम्बन्धियोंके समुदायको जलांजलि देनी चाहिये ॥ १७ ॥
कल्माषगोयुगेनाथ युक्तेन तरतो जलम् ।
पितरोऽभिलषन्ते वै नावं चाप्यधिरोहिताः ॥ १८ ॥
जो चितकबरे रंगके बैलोंसे जुती गाड़ीपर बैठकर नदीके जलको पार कर रहा हो, उसके पितर इस समय मानो नावपर बैठकर उससे जलांजलि पानेकी इच्छा रखते हैं ॥
सदा नावि जलं तज्ज्ञाः प्रयच्छन्ति समाहिताः ।
मासार्धे कृष्णपक्षस्य कुर्यान्निर्वपणानि वै ॥ १ ९ ॥
पुष्टिरायुस्तथा वीर्यं श्रीश्चैव पितृभक्तितः । अतः जो इस बातको जानते हैं, वे एकाग्रचित्त हो नावपर बैठनेपर सदा ही पितरोंके लिये जल दिया करते हैं । महीनेका आधा समय बीत जानेपर कृष्णपक्षकी अमावास्या तिथिको अवश्य श्राद्ध करना चाहिये । पितरोंकी भक्तिसे मनुष्यको पुष्टि, आयु, वीर्य और लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है ॥ १ ९ ३ ॥ पितामहः पुलस्त्यश्च वसिष्ठः पुलहस्तथा ॥ २० ॥
अंगिराश्च क्रतुश्चैव कश्यपश्च महानृषिः ।
एते कुरुकुलश्रेष्ठ महायोगेश्वराः स्मृताः ॥ २१ ॥
एते च पितरो राजन्नेष श्राद्धविधिः परः ।
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कुरुकुलश्रेष्ठ! ब्रह्मा, पुलस्त्य, वसिष्ठ, पुलह, अंगिरा, क्रतु और महर्षि कश्यप — ये सात ऋषि महान् योगेश्वर और पितर माने गये हैं । राजन्! इस प्रकार यह श्राद्धकी उत्तम विधि बतायी गयी ॥ २०-२१३ ॥ प्रेतास्तु पिण्डसम्बन्धान्मुच्यन्ते तेन कर्मणा ॥ २२ ॥
इत्येषा पुरुषश्रेष्ठ श्राद्धोत्पत्तिर्यथागमम् ।
व्याख्याता पूर्वनिर्दिष्टा दानं वक्ष्याम्यतः परम् ॥ २३ ॥
प्रेत ( मरे हुए पिता आदि ) पिण्डके सम्बन्धसे प्रेतत्वके कष्टसे छुटकारा पा जाते हैं । पुरुषश्रेष्ठ! यह मैंने शास्त्रके अनुसार तुम्हें पूर्वमें बताये श्राद्धकी उत्पत्तिका प्रसंग
विस्तारपूर्वक बताया है । अब दानके विषयमें बताऊँगा ॥ २२-२३ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्राद्धकल्पे द्विनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ २ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्राद्धकल्पविषयक बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९२ ॥
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त्रिनवतितमोऽध्यायः गृहस्थके धर्मोंका रहस्य, प्रतिग्रहके दोष बतानेके लिये वृषादर्भि और सप्तर्षियोंकी कथा, भिक्षुरूपधारी इन्द्रके द्वारा कृत्याका वध करके सप्तर्षियोंकी रक्षा तथा कमलोंकी चोरीके विषयमें शपथ खानेके बहानेसे धर्मपालनका संकेत युधिष्ठिर उवाच
द्विजातयो व्रतोपेता हविस्ते यदि भुञ्जते ।
अन्नं ब्राह्मणकामाय कथमेतत् पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! यदि व्रतधारी विप्र किसी ब्राह्मणकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये उसके घर श्राद्धका अन्न भोजन कर ले तो इसे आप कैसा मानते हैं? ( अपने व्रतका लोप करना उचित है या ब्राह्मणकी प्रार्थना अस्वीकार करना ) ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अवेदोक्तव्रताश्चैव भुञ्जानाः कामकारणे ।
वेदोक्तेषु तु भुञ्जाना व्रतलुप्ता युधिष्ठिर ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा - युधिष्ठिर! जो वेदोक्त व्रतका पालन नहीं करते, वे ब्राह्मणकी इच्छापूर्तिके लिये श्राद्धमें भोजन कर सकते हैं; किंतु जो वैदिक व्रतका पालन कर रहे हों, वे यदि किसीके अनुरोधसे श्राद्धका अन्न ग्रहण करते हैं तो उनका व्रत भंग हो जाता है ॥ युधिष्ठिरउवाच
यदिदं तप इत्याहुरुपवासं पृथग्जनाः ।
तपः स्यादेतदेवेह तपोऽन्यद् वापि किं भवेत् ॥ ३ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! साधारण लोग जो उपवासको ही तप कहा करते हैं, उसके सम्बन्धमें आपकी क्या धारणा है? मैं यह जानना चाहता हूँ कि वास्तवमें उपवास ही तप है या उसका और कोई स्वरूप है ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
मासार्धमासोपवासाद् यत् तपो मन्यते जनः ।
आत्मतन्त्रोपघाती यो न तपस्वी न धर्मवित् ॥ ४ ॥
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भीष्मजीने कहा- राजन्! जो लोग पंद्रह दिन या एक महीनेतक उपवास करके उसे तपस्या मानते हैं, वे व्यर्थ ही अपने शरीरको कष्ट देते हैं । वास्तवमें केवल उपवास करनेवाले न तपस्वी हैं, न धर्मज्ञ ॥ ४ ॥
त्यागस्य चापि सम्पत्तिः शिष्यते तप उत्तमम् ।
सदोपवासी च भवेद् ब्रह्मचारी तथैव च ॥५ ॥
मुनश्च स्यात् सदा विप्रो वेदांश्चैव सदा जपेत् । त्यागका सम्पादन ही सबसे उत्तम तपस्या है । ब्राह्मणको सदा उपवासी ( व्रतपरायण ), ब्रह्मचारी, मुनि और वेदोंका स्वाध्यायी होना चाहिये ॥ ५३ ॥
कुटुम्बिको धर्मकामः सदास्वप्नश्च मानवः ॥ ६ ॥
अमांसाशी सदा च स्यात् पवित्रं च सदा पठेत् ।
ऋतवादी सदा च स्यान्नियतश्च सदा भवेत् ॥ ७ ॥
विघसाशी कथं च स्याद् सदा चैवातिथिप्रियः ।
अमृताशी सदा च स्यात् पवित्री च सदा भवेत् ॥ ८ ॥
धर्मपालनकी इच्छासे ही उसको स्त्री आदि कुटुम्बका संग्रह करना चाहिये ( विषयभोगके लिये नहीं ) । ब्राह्मणको उचित है कि वह सदा जाग्रत् रहे, मांस कभी न खाय, पवित्रभावसे सदा वेदका पाठ करे, सदा सत्य भाषण करे और इन्द्रियोंको संयममें रखे । उसको सदा अमृताशी, विघसाशी और अतिथिप्रिय तथा सदा पवित्र रहना चाहिये ॥ ६— ८ ॥ युधिष्ठिर उवाच
कथं सदोपवासी स्याद् ब्रह्मचारी च पार्थिव ।
विघसाशी कथं च स्यात् कथं चैवातिथिप्रियः ॥ ९ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पृथ्वीनाथ! ब्राह्मण कैसे सदा उपवासी और ब्रह्मचारी होवे? तथा किस प्रकार वह विघसाशी एवं अतिथिप्रिय हो सकता है? ॥ ९ ॥
भीष्म उवाच
अन्तरा सायमाशं च प्रातराशं च यो नरः ।
सदोपवासी भवति यो न भुंक्तेऽन्तरा पुनः ॥ १० ॥
भीष्मजीने कहा — युधिष्ठिर! जो मनुष्य केवल प्रातःकाल और सायंकाल ही भोजन करता है, बीचमें कुछ नहीं खाता, उसे सदा उपवासी समझना चाहिये ॥
भार्यां गच्छन् ब्रह्मचारी ऋतौ भवति चैव ह ।
ऋतवादी सदा च स्याद् दानशीलस्तु मानवः ॥ ११ ॥
जो केवल ऋतुकालमें धर्मपत्नीके साथ सहवास करता है वह ब्रह्मचारी ही माना जाता है । सदा दान देनेवाला पुरुष सत्यवादी ही समझने योग्य है ॥ ११ ॥