श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 791–800
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 791–800
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अभक्षयन् वृथा मांसममांसाशी भवत्युत ।
दानं ददत् पवित्री स्यादस्वप्नश्च दिवास्वपन् ॥ १२ ॥
जो मांस नहीं खाता, वह अमांसाशी होता है और जो सदा दान देनेवाला है, वह पवित्र माना जाता है । जो दिनमें नहीं सोता वह सदा जागनेवाला माना जाता है ॥ १२ ॥
भृत्यातिथिषु यो भुंक्ते भुक्तवत्सु नरः सदा ।
अमृतं केवलं भुंक्ते इति विद्धि युधिष्ठिर ॥ १३ ॥
युधिष्ठिर! जो सदा भृत्यों * और अतिथियोंके भोजन कर लेनेके बाद ही स्वयं भोजन करता है, उसे केवल अमृत भोजन करनेवाला ( अमृताशी ) समझना चाहिये ॥ १३ ॥
अभुक्तवत्सु नाश्नाति ब्राह्मणेषु तु यो नरः ।
अभोजनेन तेनास्य जितः स्वर्गो भवत्युत ॥ १४ ॥
जबतक ब्राह्मण भोजन नहीं कर लें तबतक जो अन्न ग्रहण नहीं करता, वह मनुष्य अपने उस व्रतके द्वारा स्वर्गलोकपर विजय पाता है ॥ १४ ॥
देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च संश्रितेभ्यस्तथैव च ।
अवशिष्टानि यो भुंक्ते तमाहुर्विघसाशिनम् ॥ १५ ॥
तेषां लोका ह्यपर्यन्ताः सदने ब्रह्मणः स्मृताः ।
उपस्थिता ह्यप्सरसो गन्धर्वैश्च जनाधिप ॥ १६ ॥
नरेश्वर! जो देवताओं, पितरों और आश्रितोंको भोजन करानेके बाद बचे हुए अन्नको ही स्वयं भोजन करता है उसे विघसाशी कहते हैं । उन मनुष्योंको ब्रह्मधाममें अक्षय लोकोंकी प्राप्ति होती है तथा गन्धर्वोंसहित अप्सराएँ उनकी सेवामें उपस्थित होती हैं ॥
देवतातिथिभिः सार्धं पितृभ्यश्चोपभुञ्जते ।
रमन्ते पुत्रपौत्रेण तेषां गतिरनुत्तमा ॥ १७ ॥
जो देवताओं और अतिथियोंसहित पितरोंके लिये अन्नका भाग देकर स्वयं भोजन करते हैं, वे इस जगत्में पुत्र - पौत्रोंके साथ रहकर आनन्द भोगते हैं और मृत्युके पश्चात् उन्हें परम उत्तम गति प्राप्त होती है ॥ १७ ॥
युधिष्ठिर उवाच
ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छन्ति दानानि विविधानि च ।
दातृप्रतिग्रहीत्रोर्वै को विशेषः पितामह ॥ १८ ॥
युधिष्ठिरने पूछा– पितामह! लोग ब्राह्मणोंको नाना प्रकारकी वस्तुएँ दान करते हैं ।
दान देने और दान लेनेवाले पुरुषोंमें क्या विशेषता होती है? ॥ १८ ॥
भीष्म उवाच
साधोर्यः प्रतिगृह्णीयात् तथैवासाधुतो द्विजः ।
गुणवत्यल्पदोषः स्यान्निर्गुणे तु निमज्जति ॥ १ ९ ॥
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भीष्मजीने कहा- राजन्! जो ब्राह्मण साधु अर्थात् उत्तम गुण- आचरणवाले पुरुषसे तथा असाधु अर्थात् दुर्गुण और दुराचारवाले पुरुषसे दान ग्रहण करता है, उनमें सद्गुणी-सदाचारवाले पुरुषसे दान लेना अल्प दोष है । किंतु दुर्गुण और दुराचारवालेसे दान लेनेवाला पापमें डूब जाता है ॥ १ ९ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
वृषादर्भेश्च संवादं सप्तर्षीणां च भारत ॥ २० ॥
भारत! इस विषयमें राजा वृषादर्भि और सप्तर्षियोंके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २० ॥
कश्यपोऽत्रिर्वसिष्ठश्च भरद्वाजोऽथ गौतमः ।
विश्वामित्रो जमदग्निः साध्वी चैवाप्यरुन्धती ॥ २१ ॥
सर्वेषामथ तेषां तु गण्डाभूत् कर्मकारिका ।
शूद्रः पशुसखश्चैव भर्ता चास्या बभूव ह ॥ २२ ॥
ते च सर्वे तपस्यन्तः पुरा चेरुर्महीमिमाम् ।
समाधिनोपशिक्षन्तो ब्रह्मलोकं सनातनम् ॥ २३ ॥
एक समयकी बात है, कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, भरद्वाज, गौतम, विश्वामित्र, जमदग्नि और पतिव्रता देवी अरुन्धती - ये सब लोग समाधिके द्वारा सनातन ब्रह्मलोकको प्राप्त करनेकी इच्छासे तपस्या करते हुए इस पृथ्वीपर विचर रहे थे । इन सबकी सेवा करनेवाली एक दासी थी, जिसका नाम था 'गण्डा' । वह पशुसख नामक एक शूद्रके साथ व्याही गयी थी ( पशुसख भी इन्हीं महर्षियोंके साथ रहकर सबकी सेवा किया करता था ) ॥ २१– २३ ॥
अथाभवदनावृष्टिर्महती कुरुनन्दन ।
कृच्छ्रप्राणोऽभवद् यत्र लोकोऽयं वै क्षुधान्वितः ॥ २४ ॥
कुरुनन्दन! एक बार पृथ्वीपर दीर्घकालतक वर्षा नहीं हुई । जिससे अकाल पड़ जानेके कारण यह सारा जगत् भूखसे पीड़ित रहने लगा । लोग बड़ी कठिनाईसे अपने प्राणोंकी रक्षा करते थे ॥ २४ ॥
कस्मिंश्चिच्च पुरा यज्ञे शैब्येन शिबिसूनुना ।
दक्षिणार्थेऽथ ऋत्विग्भ्यो दत्तः पुत्रः पुरा किल ॥ २५ ॥
पूर्वकालमें शिबिके पुत्र शैब्यने किसी यज्ञमें दक्षिणाके रूपमें अपना एक पुत्र ही ऋत्विजोंको दे दिया था ॥ २५ ॥
अस्मिन् कालेऽथ सोऽल्पायुर्दिष्टान्तमगमत् प्रभुः ।
ते तं क्षुधाभिसंतप्ताः परिवार्योपतस्थिरे ॥ २६ ॥
उस दुर्भिक्षके समय वह अल्पायु राजकुमार मृत्युको प्राप्त हो गया । वे सप्तर्षि भूखसे पीड़ित थे, इसलिये उस मरे हुए बालकको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ २६ ॥
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वृषादर्भिरुवाच (प्रतिग्रहो ब्राह्मणानां सृष्टा वृत्तिरनिन्दिता । )
प्रतिग्रहस्तारयति पुष्टिर्वै प्रतिगृह्यताम् ।
मयि यद् विद्यते वित्तं तद् वृणुध्वं तपोधनाः ॥ २७ ॥
तब वृषादर्भि बोले—प्रतिग्रह ब्राह्मणोंके लिये उत्तम वृत्ति नियत किया गया है । तपोधन! प्रतिग्रह दुर्भिक्ष और भूखके कष्टसे ब्राह्मणकी रक्षा करता है तथा पुष्टिका उत्तम साधन है । अत: मेरे पास जो धन है उसे आप स्वीकार करें और ले लें ॥ २७ ॥
प्रियो हि मे ब्राह्मणो याचमानो दद्यामहं वोऽश्वतरीसहस्रम् । एकैकशः सवृषाः सम्प्रसूताः सर्वेषां वै शीघ्रगाः श्वेतरोमाः ॥ २८ ॥
क्योंकि जो ब्राह्मण मुझसे याचना करता है, वह मुझे बहुत प्रिय लगता है। मैं आपलोगोंमेंसे प्रत्येकको एक हजार खच्चरियाँ देता हूँ तथा सभीको सफेद रोएँवाली शीघ्रगामिनी एवं ब्यायी हुई गौएँ साँडोंसहित देनेको उद्यत हूँ ॥ २८ ॥
कुलंभराननडुहः शतं शतान्
धुर्यान्श्वेतान् सर्वशोऽहं ददामि ।
प्रष्ठौहीनां पीवराणां च ताव- दग्रया गृष्ट्यो धेनवः सुव्रताश्च ॥ २ ९ ॥
साथ ही एक कुलका भार वहन करनेवाले दस हजार भारवाहक सफेद बैल भी आप सब लोगोंको दे रहा हूँ। इतना ही नहीं, मैं आप सब लोगोंको जवान, मोटी - ताजी, पहली बारकी ब्यायी हुई, अच्छे स्वभाववाली श्रेष्ठ एवं दुधारू गौएँ भी देता हूँ ॥ २ ९ ॥ वरान् ग्रामान् व्रीहिरसं यवांश्च रत्नं चान्यद् दुर्लभं किं ददानि । नास्मिन्नभक्ष्ये भावमेवं कुरुध्वं पुष्ट्यर्थं वः किं प्रयच्छाम्यहं वै ॥ ३० ॥
इनके सिवा अच्छे - अच्छे गाँव, धान, रस, जौ, रत्न तथा और भी अनेक दुर्लभ वस्तुएँ प्रदान कर सकता हूँ । बतलाइये, मैं आपको क्या दूँ? आप इस अभक्ष्य वस्तुके भक्षणमें मन न लगावें । कहिये, आपके शरीरकी पुष्टिके लिये मैं क्या दूँ ॥ ३० ॥
ऋषय ऊचुः
राजन् प्रतिग्रहो राज्ञां मध्वास्वादो विषोपमः ।
तज्जानमानः कस्मात् त्वं कुरुषे नः प्रलोभनम् ॥ ३१ ॥
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ऋषि बोले — राजन्! राजाका दिया हुआ दान ऊपरसे मधुके समान मीठा जान पड़ता है, परंतु परिणाममें विषके समान भयंकर हो जाता है । इस बातको जानते हुए भी आप क्यों हमें प्रलोभनमें डाल रहे हैं ॥ ३१ ॥
क्षेत्रं हि दैवतमिदं ब्राह्मणान् समुपाश्रितम् ।
अमलो ह्येष तपसा प्रीतः प्रीणाति देवताः ॥ ३२ ॥
ब्राह्मणोंका शरीर देवताओंका निवासस्थान है, उसमें सभी देवता विद्यमान रहते हैं । यदि ब्राह्मण तपस्यासे शुद्ध एवं संतुष्ट हो तो वह सम्पूर्ण देवताओंको प्रसन्न करता है ॥ ३२ ॥
अह्नापहि तपो जातु ब्राह्मणस्योपजायते ।
तद् दाव इव निर्दह्यात् प्राप्तो राजप्रतिग्रहः ॥ ३३ ॥
ब्राह्मण दिनभरमें जितना तप संग्रह करता है, उसको राजाका दिया हुआ दान वनको दग्ध करनेवाले दावानलकी भाँति नष्ट कर डालता है ॥ ३३ ॥
कुशलं सह दानेन राजन्नस्तु सदा तव ।
अर्थिभ्यो दीयतां सर्वमित्युक्त्वान्येन ते ययुः ॥ ३४ ॥
राजन्! इस दानके साथ ही आप सदा सकुशल रहें और यह सारा दान आप उन्हींको दें
जो आपसे इन वस्तुओंको लेना चाहते हों । ऐसा कहकर वे दूसरे मार्गसे चल दिये ॥ ३४ ॥
ततः प्रचोदिता राज्ञा वनं गत्वास्य मन्त्रिणः ।
प्रचीयोदुम्बराणि स्म दातुं तेषां प्रचक्रिरे ॥ ३५ ॥
तब राजाकी प्रेरणासे उनके मन्त्री वनमें गये और गूलरके फल तोड़कर उन्हें देनेकी चेष्टा करने लगे ॥ ३५ ॥
उदुम्बराण्यथान्यानि हेमगर्भाण्युपाहरन् ।
भृत्यास्तेषां ततस्तानि प्रग्राहितुमुपाद्रवन् ॥ ३६ ॥
मन्त्रियोंने गूलर तथा दूसरे - दूसरे वृक्षोंके फल तोड़कर उनमें सुवर्ण मुद्राएँ भर दीं । फिर उन फलोंको लेकर राजाके सेवक उन्हें ऋषियोंके हवाले करनेके लिये उनके पीछे दौड़े गये ॥ ३६ ॥
गुरूणीति विदित्वाथ न ग्राह्याण्यत्रिरब्रवीत् ।
न स्महे मन्दविज्ञाना न स्महे मन्दबुद्धयः ॥ ३७ ॥
हैमानीमानि जानीमः प्रतिबुद्धाः स्म जागृम ।
इह ह्येतदुपादत्तं प्रेत्य स्यात् कटुकोदयम् ।
अप्रतिग्राह्यमेवैतत् प्रेत्येह च सुखेप्सुना ॥ ३८ ॥
वे सभी फल भारी हो गये थे, इस बातको महर्षि अत्रि ताड़ गये और बोले — ये ‘ गूलर हमारे लेने योग्य नहीं हैं । हमारी बुद्धि मन्द नहीं हुई है । हमारी ज्ञानशक्ति लुप्त नहीं हुई है । हम सो नहीं रहे हैं, जागते हैं। हमें अच्छी तरह ज्ञात है कि इनके भीतर सुवर्ण भरा पड़ा है ।
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यदि आज हम इन्हें स्वीकार कर लेते हैं तो परलोकमें हमें इनका कटु परिणाम भोगना पड़ेगा । जो इहलोक और परलोकमें भी सुख चाहता हो उसके लिये यह फल अग्राह्य है ' ॥ ३७-३८ ॥ वसिष्ठ उवाच
शतेन निष्कगणितं सहस्रेण च सम्मितम् ।
तथा बहु प्रतीच्छन् वै पापिष्ठां पतते गतिम् ॥ ३ ९ ॥
वसिष्ठ बोले – एक निष्क ( स्वर्णमुद्रा) का दान लेनेसे सौ हजार निष्कोंके दान लेनेका दोष लगता है । ऐसी दशामें जो बहुत-से निष्क ग्रहण करता है, उसको तो घोर पापमयी गतिमें गिरना पड़ता है ॥ ३ ९ ॥ कश्यप उवाच
यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः ।
सर्वं तन्नालमेकस्य तस्माद् विद्वान् शमं चरेत् ॥ ४० ॥
कश्यपने कहा — इस पृथ्वीपर जितने धान, जौ, सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब किसी एक पुरुषको मिल जायँ तो भी उसे संतोष न होगा; यह सोचकर विद्वान् पुरुष अपने मनकी तृष्णाको शान्त करे ॥ ४० ॥
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भरद्वाजउवाच
उत्पन्नस्य रुरोः शृंगं वर्धमानस्य वर्धते ।
प्रार्थना पुरुषस्येव तस्य मात्रा न विद्यते ॥ ४१ ॥
भरद्वाज बोले — जैसे उत्पन्न हुए मृगका सींग उसके बढ़नेके साथ- साथ बढ़ता रहता है, उसी प्रकार मनुष्यकी तृष्णा सदा बढ़ती ही रहती है, उसकी कोई सीमा नहीं है ॥ गौतम उवाच
न तल्लोके द्रव्यमस्ति यल्लोकं प्रतिपूरयेत् ।
समुद्रकल्पः पुरुषो न कदाचन पूर्यते ॥ ४२ ॥
गौतमने कहा — संसारमें ऐसा कोई द्रव्य नहीं है, जो मनुष्यकी आशाका पेट भर सके ।
पुरुषकी आशा समुद्रके समान है, वह कभी भरती ही नहीं ॥ ४२ ॥
विश्वामित्र उवाच
कामं कामयमानस्य यदा कामः समृध्यते ।
अथैनमपरः कामस्तृष्णाविध्यति बाणवत् ॥ ४३ ॥
विश्वामित्र बोले- किसी वस्तुकी कामना करनेवाले मनुष्यकी एक इच्छा जब पूरी होती है, तब दूसरी नयी उत्पन्न हो जाती है । इस प्रकार तृष्णा तीरकी तरह मनुष्यके मनपर चोट करती ही रहती है ॥ ४३ ॥
(अत्रिरुवाच न जातु कामः कामनामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ ) अत्रि बोले — भोगोंकी कामना उनके उपभोगसे कभी नहीं शान्त होती है । अपितु घीकी आहुति पड़नेपर प्रज्वलित होनेवाली आगकी भाँति वह और भी बढ़ती ही जाती है ॥ जमदग्निरुवाच
प्रतिग्रहे संयमो वै तपो धारयते ध्रुवम् ।
तद् धनं ब्राह्मणस्येह लुभ्यमानस्य विस्रवेत् ॥ ४४ ॥
जमदग्निने कहा — प्रतिग्रह न लेनेसे ही ब्राह्मण अपनी तपस्याको सुरक्षित रख सकता है । तपस्या ही ब्राह्मणका धन है । जो लौकिक धनके लिये लोभ करता है, उसका तपरूपी धन नष्ट हो जाता है ॥ ४४ ॥
अरुन्धत्युवाच धर्मार्थं संचयो यो वै द्रव्याणां पक्षसम्मतः ।
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तपःसंचय एवेह विशिष्टो द्रव्यसंचयात् ॥ ४५ ॥
अरुन्धती बोलीं- संसारमें एक पक्षके लोगोंकी राय है कि धर्मके लिये धनका संग्रह करना चाहिये; किंतु मेरी रायमें धन - संग्रहकी अपेक्षा तपस्याका संचय ही श्रेष्ठ है ॥ ४५ ॥
गण्डोवाच
उग्रादितो भयाद् यस्माद् बिभ्यतीमे ममेश्वराः ।
बलीयांसो दुर्बलवद् बिभेम्यहमतः परम् ॥ ४६ ॥
गण्डाने कहा — मेरे ये मालिक लोग अत्यन्त शक्तिशाली होते हुए भी जब इस भयंकर प्रतिग्रहके भयसे इतना डरते हैं, तब मेरी क्या सामर्थ्य है? मुझे तो दुर्बल प्राणियोंकी भाँति इससे बहुत बड़ा भय लग रहा है ॥ पशुसखउवाच
यद् वै धर्मे परं नास्ति ब्राह्मणास्तद्धनं विदुः ।
विनयार्थं सुविद्वांसमुपासेयं यथातथम् ॥ ४७ ॥
पशुसखने कहा - धर्मका पालन करनेपर जिस धनकी प्राप्ति होती है, उससे बढ़कर कोई धन नहीं है । उस धनको ब्राह्मण ही जानते हैं; अतः मैं भी उसी धर्ममय धनकी प्राप्तिका उपाय सीखनेके लिये विद्वान् ब्राह्मणोंकी सेवामें लगा हूँ ॥ ४७ ॥
ऋषय ऊचुः
कुशलं सह दानेन तस्मै यस्य प्रजा इमाः ।
फलान्युपधियुक्तानि य एवं नः प्रयच्छति ॥ ४८ ॥
ऋषियोंने कहा — जिसकी प्रजा ये कपटयुक्त फल देनेके लिये ले आयी है तथा जो इस प्रकार फलके व्याजसे हमें सुवर्णदान कर रहा है, वह राजा अपने दानके साथ ही कुशलसे रहे ॥ ४८ ॥
भीष्मउवाच
इत्युक्त्वा हेमगर्भाणि हित्वा तानि फलानि वै ।
ऋषयो जग्मुरन्यत्र सर्व एव धृतव्रताः ॥ ४ ९ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! यह कहकर उन सुवर्णयुक्त फलोंका परित्याग करके वे समस्त व्रतधारी महर्षि वहाँसे अन्यत्र चले गये ॥ ४ ९ ॥ मन्त्रिण ऊचुः
उपधिं शंकमानास्ते हित्वा तानि फलानि वै ।
ततोऽन्येनैव गच्छन्ति विदितं तेऽस्तु पार्थिव ॥ ५० ॥
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तब मन्त्रियोंने शैव्यके पास जाकर कहा - महाराज! आपको विदित हो कि उन
फलोंको देखते ही ऋषियोंको यह संदेह हुआ कि हमारे साथ छल किया जा रहा है ।
इसलिये वे फलोंका परित्याग करके दूसरे मार्गसे चले गये हैं ॥ ५० ॥
इत्युक्तः स तु भृत्यैस्तैर्वृषादर्भिश्चुकोप ह ।
तेषां वै प्रतिकर्तुं च सर्वेषामगमद् गृहम् ॥ ५१ ॥
सेवकोंके ऐसा कहनेपर राजा वृषादर्भिको बड़ा कोप हुआ और वे उन सप्तर्षियोंसे अपने अपमानका बदला लेनेका विचार करके राजधानीको लौट गये ॥ ५१ ॥
स गत्वा हवनीयेऽग्नौ तीव्रं नियममास्थितः ।
जुहाव संस्कृतैर्मन्त्रैरेकैकामाहुतिं नृपः ॥ ५२ ॥
वहाँ जाकर अत्यन्त कठोर नियमोंका पालन करते हुए वे आहवनीय अग्निमें आभिचारिक मन्त्र पढ़कर एक-एक आहुति डालने लगे ॥ ५२ ॥
तस्मादग्नेः समुत्तस्थौ कृत्या लोकभयंकरी ।
तस्या नाम वृषादर्भिर्यातुधानीत्यथाकरोत् ॥ ५३ ॥
आहुति समाप्त होनेपर उस अग्निसे एक लोकभयंकर कृत्या प्रकट हुई। राजा वृषादर्भिने उसका नाम यातुधानी रखा ॥ ५३ ॥
सा कृत्या कालरात्रीव कृताञ्जलिरुपस्थिता ।
वृषादर्भि नरपतिं किं करोमीति चाब्रवीत् ॥ ५४ ॥
कालरात्रिके समान विकराल रूप धारण करनेवाली वह कृत्या हाथ जोड़कर राजाके पास उपस्थित हुई और बोली – ' महाराज! मैं आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ? ' ॥ ५४ ॥
वृषादर्भिरुवाच
ऋषीणां गच्छ सप्तानामरुन्धत्यास्तथैव च ।
दासीभर्तुश्च दास्याश्च मनसा नाम धारय ॥ ५५ ॥
ज्ञात्वा नामानि चैवैषां सर्वानेतान् विनाशय ।
विनष्टेषु तथा स्वैरं गच्छ यत्रेप्सितं तव ॥ ५६ ॥
वृषादर्भिने कहा - यातुधानी! तुम यहाँसे वनमें जाओ और वहाँ अरुन्धतीसहित सातों ऋषियोंका, उनकी दासीका और उस दासीके पतिका भी नाम पूछकर उसका तात्पर्य अपने मनमें धारण करो । इस प्रकार उन सबके नामोंका अर्थ समझकर उन्हें मार डालो; उसके बाद जहाँ इच्छा हो चली जाना ॥ ५५-५६ ॥
सा तथेति प्रतिश्रुत्य यातुधानी स्वरूपिणी ।
जगाम तद् वनं यत्र विचेरुस्ते महर्षयः ॥ ५७ ॥
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राजाकी यह आज्ञा पाकर यातुधानीने ' तथास्तु ' कहकर इसे स्वीकार किया और जहाँ वे महर्षि विचरा करते थे, उस वनमें चली गयी ॥ ५७ ॥
भीष्म उवाच
अथात्रिप्रमुखा राजन् वने तस्मिन् महर्षयः ।
व्यचरन् भक्षयन्तो वै मूलानि च फलानि च ॥ ५८ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! उन दिनों वे अत्रि आदि महर्षि उस वनमें फल- मूलका आहार करते हुए घूमा करते थे ॥ ५८ ॥
अथापश्यन् सुपीनांसपाणिपादमुखोदरम् ।
परिव्रजन्तं स्थूलांगं परिव्राजं शुना सह ॥ ५ ९ ॥
एक दिन उन महर्षियोंने देखा, एक संन्यासी कुत्तेके साथ वहाँ इधर - उधर विचर रहा है । उसका शरीर बहुत मोटा था । उसके मोटे कंधे, हाथ, पैर, मुख और पेट आदि सभी अंग सुन्दर और सुडौल थे ॥ ५ ९ ॥
अरुन्धती तु तं दृष्ट्वा सर्वांगोपचितं शुभम् ।
भवितारो भवन्तो वै नैवमित्यब्रवीदृषीन् ॥ ६० ॥
अरुन्धतीने सारे अंगोंसे हृष्ट- पुष्ट हुए उस सुन्दर संन्यासीको देखकर ऋषियोंसे कहा -' क्या आपलोग कभी ऐसे नहीं हो सकेंगे? ' ॥ ६० ॥
वसिष्ठ उवाच
नैतस्येह यथास्माकमग्निहोत्रमनिर्हुतम् ।
सायं प्रातश्च होतव्यं तेन पीवाञ्छुना सह ॥ ६१ ॥
वसिष्ठजीने कहा – हमलोगोंकी तरह इसको इस बातकी चिन्ता नहीं है कि आज हमारा अग्निहोत्र नहीं हुआ और सबेरे तथा शामको अग्निहोत्र करना है; इसीलिये यह कुत्तेके साथ खूब मोटा - ताजा हो गया है ॥ ६१ ॥
अत्रिरुवाच
नैतस्येह यथास्माकं क्षुधा वीर्यं समाहतम् ।
कृच्छ्राधीतं प्रणष्टं च तेन पीवाञ्छुना सह ॥ ६२ ॥
अत्रि बोले- हमलोगोंकी तरह भूखके मारे उसकी सारी शक्ति नष्ट नहीं हो गयी है तथा बड़े कष्टसे जो वेदोंका अध्ययन किया गया था, वह भी हमारी तरह इसका नष्ट नहीं हुआ है; इसीलिये यह कुत्तेके साथ मोटा हो गया है ॥ ६२ ॥
विश्वामित्र उवाच
नैतस्येह यथास्माकं शश्वच्छास्त्रं जरद्गवः ।
अलसः क्षुत्परो मूर्खस्तेन पीवाञ्छुना सह ॥ ६३ ॥
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विश्वामित्रने कहा— हमलोगोंका भूखके मारे सनातन शास्त्र विस्मृत हो गया है और शास्त्रोक्त धर्म भी क्षीण हो चला है । ऐसी दशा इसकी नहीं है तथा यह आलसी, केवल पेटकी भूख बुझानेमें ही लगा हुआ और मूर्ख है । इसीलिये यह कुत्तेके साथ मोटा हो गया है ॥ ६३ ॥
जमदग्निरुवाच
नैतस्येह यथास्माकं भक्तमिन्धनमेव च ।
संचिन्त्यं वार्षिकं चित्ते तेन पीवाञ्छुना सह ॥ ६४ ॥
जमदग्नि बोले- हमारी तरह इसके मनमें वर्षभरके लिये भोजन और ईंधन जुटानेकी चिन्ता नहीं है, इसीलिये कुत्तेके साथ मोटा हो गया है ॥ ६४ ॥
कश्यप उवाच
नैतस्येह यथास्माकं चत्वारश्च सहोदराः ।
देहि देहीति भिक्षन्ति तेन पीवाञ्छुना सह ॥ ६५ ॥
कश्यपने कहा — हमलोगोंके चार भाई हमसे प्रतिदिन ' भोजन दो, भोजन दो ' कहकर अन्न माँगते हैं, अर्थात् हमलोगोंको एक भारी कुटुम्बके भोजन- वस्त्रकी चिन्ता करनी पड़ती
है । इस संन्यासीको यह सब चिन्ता नहीं है । अतः यह कुत्तेके साथ मोटा है ॥ ६५ ॥
भरद्वाज उवाच
नैतस्येह यथास्माकं ब्रह्मबन्धोरचेतसः ।
शोको भार्यापवादेन तेन पीवाञ्छुना सह ॥ ६६ ॥
भरद्वाज बोले- इस विवेकशून्य ब्राह्मणबन्धुको हमलोगोंकी तरह अपनी स्त्रीके
कलंकित होनेका शोक नहीं है । इसीलिये यह कुत्तेके साथ मोटा हो गया है ॥
गौतम उवाच
नैतस्येह यथास्माकं त्रिकौशेयं च रांकवम् ।
एकैकं वै त्रिवर्षीयं तेन पीवाञ्छुना सह ॥ ६७ ॥
गौतम बोले- हमलोगोंकी तरह इसे तीन - तीन वर्षोंतक कुशकी रस्सीकी बनी हुई तीन लरवाली मेखला और मृगचर्म धारण करके नहीं रहना पड़ता है । इसीलिये यह कुत्तेके साथ मोटा हो गया है ॥ ६७ ॥
भीष्म उवाच
अथ दृष्ट्वा परिव्राट् स तान् महर्षीन् शुना सह ।
अभिगम्य यथान्यायं पाणिस्पर्शमथाचरत् ॥ ६८ ॥