06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 801–810
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 801–810
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भीष्मजी कहते हैं - राजन्! कुत्तेसहित आये हुए संन्यासीने जब उन महर्षियोंको देखा, तब उनके पास आकर संन्यासकी मर्यादाके अनुसार उनका हाथसे स्पर्श किया ॥ ६८ ॥
परिचर्यां वने तां तु क्षुत्प्रतीघातकारिकाम् ।
अन्योन्येन निवेद्याथ प्रातिष्ठन्त सहैव ते ॥ ६ ९ ॥
तदनन्तर वे एक दूसरेको अपना कुशल-समाचार बताते हुए बोले- ' हमलोग अपनी भूख मिटानेके लिये इस वनमें भ्रमण कर रहे हैं ' ऐसा कहकर वे साथ - ही - साथ वहाँसे चल पड़े ॥ ६९ ॥
एकनिश्चयकार्याश्च व्यचरन्त वनानि ते ।
आददानाः समुद्धृत्य मूलानि च फलानि च ॥ ७० ॥
उन सबके निश्चय और कार्य एक- से थे । वे फल- मूलका संग्रह करके उन्हें साथ लिये उस वनमें विचर रहे थे ॥ ७० ॥
कदाचिद् विचरन्तस्ते वृक्षैरविरलैर्वृताम् ।
शुचिवारिप्रसन्नोदां ददृशुः पद्मिनीं शुभाम् ॥ ७१ ॥
एक दिन घूमते - फिरते हुए उन महर्षियोंको एक सुन्दर सरोवर दिखायी पड़ा; जिसका जल बड़ा ही स्वच्छ और पवित्र था । उसके चारों किनारोंपर सघन वृक्षोंकी पंक्ति शोभा पा रही थी ॥ ७१ ॥
बालादित्यवपुःप्रख्यैः पुष्करैरुपशोभिताम् ।
वैदूर्यवर्णसदृशैः पद्मपत्रैरथावृताम् ॥ ७२ ॥
प्रातःकालीन सूर्यके समान अरुण रंगके कमलपुष्प उस सरोवरकी शोभा बढ़ा रहे थे तथा वैदूर्यमणिकी - सी कान्तिवाले कमलिनीके पत्ते उसमें चारों ओर छा रहे थे ॥ ७२ ॥
नानाविधैश्च विहगैर्जलप्रकरसेविभिः ।
एकद्वारामनादेयां सूपतीर्थामकर्दमाम् ॥ ७३ ॥
नाना प्रकारके विहंगम कलरव करते हुए उसकी जलराशिका सेवन करते थे । उसमें प्रवेश करनेके लिये एक ही द्वार था। उसकी कोई वस्तु ली नहीं जा सकती थी । उसमें उतरनेके लिये बहुत सुन्दर सीढ़ियाँ बनी हुई थीं । वहाँ काई और कीचड़का तो नाम भी नहीं था ॥ ७३ ॥
वृषादर्भिप्रयुक्ता तु कृत्या विकृतदर्शना ।
यातुधानीति विख्याता पद्मिनीं तामरक्षत ॥ ७४ ॥
राजा वृषादर्भिकी भेजी हुई भयानक आकारवाली यातुधानी कृत्या उस तालाबकी रक्षा कर रही थी ॥ ७४ ॥
पशुसखसहायास्तु बिसार्थं ते महर्षयः ।
पद्मिनीमभिजग्मुस्ते सर्वे कृत्याभिरक्षिताम् ॥ ७५ ॥
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पशुसखके साथ वे सभी महर्षि मृणाल लेनेके लिये उस सरोवरके तटपर गये, जो उस कृत्याके द्वारा सुरक्षित था ॥ ७५ ॥
ततस्ते यातुधानीं तां दृष्ट्वा विकृतदर्शनाम् ।
स्थितां कमलिनीतीरे कृत्यामूचुर्महर्षयः ॥ ७६ ॥
सरोवरके तटपर खड़ी हुई उस यातुधानी कृत्याको जो बड़ी विकराल दिखायी देती थी, देखकर वे सब महर्षि बोले-— ॥ ७६ ॥
Bajndran
एका तिष्ठसि का च त्वं कस्यार्थे किं प्रयोजनम् ।
पद्मिनीतीरमाश्रित्य ब्रूहि त्वं किं चिकीर्षसि ॥ ७७ ॥
‘ अरी! तू कौन है और किसलिये यहाँ अकेली खड़ी है? यहाँ तेरे आनेका क्या प्रयोजन है? इस सरोवरके तटपर रहकर तू कौन- सा कार्य सिद्ध करना चाहती है? ' ॥ ७७ ॥
यातुधान्युवाच
यास्मि सास्म्यनुयोगो मे न कर्तव्यः कथंचन ।
आरक्षिणीं मां पद्मिन्या वित्त सर्वे तपोधनाः ॥ ७८ ॥
यातुधानी बोली – तपस्वियो! मैं जो कोई भी होऊँ, तुम्हें मेरे विषयमें पूछ-ताछ करनेका किसी प्रकार कोई अधिकार नहीं है । तुम इतना ही जान लो कि मैं इस सरोवरका
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संरक्षण करनेवाली हूँ ॥ ७८ ॥
ऋषय ऊचुः
सर्व एव क्षुधार्ताः स्म न चान्यत् किंचिदस्ति नः ।
भवत्याः सम्मते सर्वे गृह्णीयाम बिसान्युत ॥ ७९ ॥
ऋषि बोले- भद्रे! इस समय हमलोग भूखसे व्याकुल हैं और हमारे पास खानेके लिये दूसरी कोई वस्तु नहीं है। अतः यदि तुम अनुमति दो तो हम सब लोग इस सरोवरसे कुछ मृणाल ले लें ॥ ७ ९ ॥ यातुधान्युवाच
समयेन बिसानीतो गृह्णीध्वं कामकारतः ।
एकैको नाम मे प्रोक्त्वा ततो गृह्णीत माचिरम् ॥ ८० ॥
यातुधानीने कहा —ऋषियो! एक शर्तपर तुम इस सरोवरसे इच्छानुसार मृणाल ले सकते हो । एक- एक करके आओ और मुझे अपना नाम और तात्पर्य बताकर मृणाल ले लो । इसमें विलम्ब करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ८० ॥
भीष्म उवाच
विज्ञाय यातुधानीं तां कृत्यामृषिवधैषिणीम् ।
अत्रिः क्षुधापरीतात्मा ततो वचनमब्रवीत् ॥ ८१ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! उसकी यह बात सुनकर महर्षि अत्रि यह समझ गये कि ‘ यह राक्षसी कृत्या है और हम सब ऋषियोंका वध करनेकी इच्छासे यहाँ आयी हुई है । ' तथापि भूखसे व्याकुल होनेके कारण उन्होंने इस प्रकार उत्तर दिया ॥ ८१ ॥
अत्रिरुवाच
अरात्रिरत्रिः सा रात्रिर्यां नाधीते त्रिरद्य वै ।
अरात्रिरत्रिरित्येव नाम मे विद्धि शोभने ॥ ८२ ॥
अत्रि बोले- कल्याणी! काम आदि शत्रुओंसे त्राण करनेवालेको अरात्रि कहते हैं और अत् ( मृत्यु ) से बचानेवाला अत्रि कहलाता है। इस प्रकार मैं ही अरात्रि होनेके कारण अत्रि हूँ । जबतक जीवको एकमात्र परमात्माका ज्ञान नहीं होता, तबतककी अवस्था रात्रि कहलाती है । उस अज्ञानावस्थासे रहित होनेके कारण भी मैं अरात्रि एवं अत्रि कहलाता हूँ। सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अज्ञात होनेके कारण जो रात्रिके समान है, उस परमात्मतत्त्वमें मैं सदा जाग्रत् रहता हूँ; अतः वह मेरे लिये अरात्रिके समान है, इस व्युत्पत्तिके अनुसार भी मैं
अरात्रि और अत्रि ( ज्ञानी) नाम धारण करता हूँ । यही मेरे नामका तात्पर्य समझो ॥
यातुधान्युवाच
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यथोदाहृतमेतत् ते मयि नाम महाद्युते ।
दुर्धार्यमेतन्मनसा गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ८३ ॥
यातुधानीने कहा —तेजस्वी महर्षे! आपने जिस प्रकार अपने नामका तात्पर्य बताया है, उसका मेरी समझमें आना कठिन है । अच्छा, अब आप जाइये और तालाबमें उतरिये ॥ ८३ ॥
वसिष्ठ उवाच
वसिष्ठोऽस्मि वरिष्ठोऽस्मि वसे वासगृहेष्वपि ।
वसिष्ठत्वाच्च वासाच्च वसिष्ठ इति विद्धि माम् ॥ ८४ ॥
वसिष्ठ बोले — मेरा नाम वसिष्ठ है, सबसे श्रेष्ठ होनेके कारण लोग मुझे वरिष्ठ भी कहते हैं । मैं गृहस्थ- आश्रममें वास करता हूँ; अतः वसिष्ठता ( ऐश्वर्य- सम्पत्ति ) और वासके कारण तुम मुझे वसिष्ठ समझो ॥ यातुधान्युवाच
नामनैरुक्तमेतत् ते दुःखव्याभाषिताक्षरम् ।
नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ८५ ॥
- यातुधानी बोली – मुने! आपने जो अपने नामकी व्याख्या की है उसके तो अक्षरोंका भी उच्चारण करना कठिन है । मैं इस नामको नहीं याद रख सकती । आप जाइये तालाबमें प्रवेश कीजिये ॥ ८५ ॥
कश्यप उवाच
कुलं कुलं च कुवमः कुवमः कश्यपो द्विजः ।
काश्यः काशनिकाशत्वादेतन्मे नाम धारय ॥ ८६ ॥
कश्यपने कहा — यातुधानी! कश्य नाम है शरीरका, जो उसका पालन करता है उसे कश्यप कहते हैं । मैं प्रत्येक कुल ( शरीर ) में अन्तर्यामीरूपसे प्रवेश करके उसकी रक्षा करता हूँ, इसीलिये कश्यप हूँ। कु अर्थात् पृथ्वीपर वम यानी वर्षा करनेवाला सूर्य भी मेरा ही स्वरूप है, इसलिये मुझे ' कुवम' भी कहते हैं । मेरे देहका रंग काशके फूलकी भाँति उज्ज्वल है, अतः मैं काश्य नामसे भी प्रसिद्ध हूँ । यही मेरा नाम है । इसे तुम धारण करो ॥ ८६ ॥
यातुधान्युवाच
यथोदाहृतमेतत् ते मयि नाम महाद्युते ।
दुर्धार्यमेतन्मनसा गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ८७ ॥
यातुधानी बोली- महर्षे! आपके नामका तात्पर्य समझना मेरे लिये बहुत कठिन है ।
आप भी कमलोंसे भरी हुई बावड़ीमें जाइये ॥ ८७ ॥
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भरद्वाज उवाच
भरेऽसुतान् भरेऽशिष्यान् भरे देवान् भरे द्विजान् ।
भरे भार्यां भरे द्वाजं भरद्वाजोऽस्मि शोभने ॥ ८८ ॥
भरद्वाजने कहा — कल्याणी! जो मेरे पुत्र और शिष्य नहीं हैं, उनका भी मैं पालन करता हूँ, तथा देवता, ब्राह्मण, अपनी धर्मपत्नी तथा द्वाज ( वर्णसंकर ) मनुष्योंका भी भरण- पोषण करता हूँ, इसलिये भरद्वाज नामसे प्रसिद्ध हूँ ॥ ८८ ॥
यातुधान्युवाच
नामनैरुक्तमेतत् ते दुःखव्याभाषिताक्षरम् ।
नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ८ ९ ॥
यातुधानी बोली - मुनिवर! आपके नामाक्षरका उच्चारण करनेमें भी मुझे क्लेश जान पड़ता है, इसलिये मैं इसे धारण नहीं कर सकती । जाइये, आप भी इस सरोवरमें उतरिये ॥ ८ ९ ॥ गौतम उवाच
गोदमो दमतोऽधूमोऽदमस्ते समदर्शनात् ।
विद्धि मां गौतमं कृत्ये यातुधानि निबोध माम् ॥ ९ ० ॥
गौतमने कहा — कृत्ये! मैंने गो नामक इन्द्रियोंका संयम किया है, इसलिये ‘ गोदम ’ नाम धारण करता हूँ । मैं धूमरहित अग्निके समान तेजस्वी हूँ, सबमें समान दृष्टि रखनेके कारण तुम्हारे या और किसीके द्वारा मेरा दमन नहीं हो सकता । मेरे शरीरकी कान्ति ( गो ) अन्धकारको दूर भगानेवाली ( अतम) है, अतः तुम मुझे गौतम समझो ॥ ९ ० ॥ यातुधान्युवाच
यथोदाहृतमेतत् ते मयि नाम महामुने ।
नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ९ १ ॥
यातुधानी बोली – महामुने! आपके नामकी व्याख्या भी मैं नहीं समझ सकती ।
जाइये, पोखरेमें प्रवेश कीजिये ॥ ९ १ ॥
विश्वामित्र उवाच
विश्वे देवाश्च मे मित्रं मित्रमस्मि गवां तथा ।
विश्वामित्रमिति ख्यातं यातुधानि निबोध माम् ॥ ९ २ ॥
विश्वामित्रने कहा — यातुधानी! तू कान खोलकर सुन ले, विश्वेदेव मेरे मित्र हैं, तथा गौओं और सम्पूर्ण विश्वका मैं मित्र हूँ । इसलिये संसारमें विश्वामित्रके नामसे प्रसिद्ध हूँ ॥ ९ २ ॥
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यातुधान्युवाच
नामनैरुक्तमेतत् ते दुःखव्याभाषिताक्षरम् ।
नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ९ ३ ॥
यातुधानी बोली - महर्षे! आपके नामकी व्याख्याके एक अक्षरका भी उच्चारण करना मेरे लिये कठिन है । इसे याद रखना मेरे लिये असम्भव है । अतः जाइये, सरोवरमें प्रवेश कीजिये ॥ ९ ३ ॥ जमदग्निरुवाच
जाजमद्यजजानेऽहं जिजाहीह जिजायिषि ।
जमदग्निरिति ख्यातस्ततो मां विद्धि शोभने ॥ ९ ४ ॥
जमदग्निने कहा — कल्याणी! मैं जगत् अर्थात् देवताओंके आहवनीय अग्निसे उत्पन्न हुआ हूँ, इसलिये तुम मुझे जमदग्नि नामसे विख्यात समझो ॥ ९ ४ ॥ यातुधान्युवाच
यथोदाहृतमेतत् ते मयि नाम महामुने ।
नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ९ ५ ॥
यातुधानी बोली - महामुने! आपने जिस प्रकार अपने नामका तात्पर्य बतलाया है,
उसको समझना मेरे लिये बहुत कठिन है । अब आप सरोवरमें प्रवेश कीजिये ॥ ९ ५ ॥
अरुन्धत्युवाच
धरान् धरित्रीं वसुधां भर्तुस्तिष्ठाम्यनन्तरम् ।
मनोऽनुरुन्धती भर्तुरिति मां विद्धयारुन्धतीम् ॥ ९ ६ ॥
अरुन्धतीने कहा — यातुधानी! मैं अरु अर्थात् पर्वत, पृथ्वी और द्युलोकको अपनी शक्तिसे धारण करती हूँ। अपने स्वामीसे कभी दूर नहीं रहती और उनके मनके अनुसार चलती हूँ, इसलिये मेरा नाम अरुन्धती है ॥ ९ ६ ॥ यातुधान्युवाच
नामनैरुक्तमेतत् ते दुःखव्याभाषिताक्षरम् ।
नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ९ ७ ॥
यातुधानी बोली - देवि! आपने जो अपने नामकी व्याख्या की है, उसके एक अक्षरका भी उच्चारण मेरे लिये कठिन है, अतः इसे भी मैं नहीं याद रख सकती । आप तालाबमें प्रवेश कीजिये ॥ ९ ७ ॥ गण्डोवाच वक्त्रैकदेशे गण्डेति धातुमेतं प्रचक्षते ।
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तेनोन्नतेन गण्डेति विद्धि मानलसम्भवे ॥ ९ ८ ॥ गण्डाने कहा — अग्निसे उत्पन्न होनेवाली कृत्ये! गडि धातुसे गण्ड शब्दकी सिद्धि होती है, यह मुखके एक देश – कपोलका वाचक है । मेरा कपोल ( गण्ड ) ऊँचा है, इसलिये लोग मुझे गण्डा कहते हैं ॥ ९ ८ ॥ यातुधान्युवाच
नामनैरुक्तमेतत् ते दुःखव्याभाषिताक्षरम् ।
नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ ९९ ॥
यातुधानी बोली- तुम्हारे नामकी व्याख्याका भी उच्चारण करना मेरे लिये कठिन है ।
अतः इसको याद रखना असम्भव है । जाओ, तुम भी बावड़ीमें उतरो ॥ ९९ ॥
पशुसखउवाच
पशून् रञ्जामि दृष्ट्वाहं पशूनां च सदा सखा ।
गौणं पशुसखेत्येवं विद्धि मामग्निसम्भवे ॥ १०० ॥
पशुसखने कहा — आगसे पैदा हुई कृत्ये! मैं पशुओंको प्रसन्न रखता हूँ और उनका प्रिय सखा हूँ; इस गुणके अनुसार मेरा नाम पशुसख है ॥ १०० ॥
यातुधान्युवाच
नामनैरुक्तमेतत् ते दुःखव्याभाषिताक्षरम् ।
नैतद् धारयितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ॥ १०१ ॥
यातुधानी बोली- तुमने जो अपने नामकी व्याख्या की है, उसके अक्षरोंका उच्चारण करना भी मेरे लिये कष्टप्रद है । अतः इसको याद नहीं रख सकती; अब तुम भी पोखरेमें जाओ ॥ १०१ ॥
शुनःसखउवाच
एभिरुक्तं यथा नाम नाहं वक्तुमिहोत्सहे ।
शुनःसखसखायं मां यातुधान्युपधारय ॥ १०२ ॥
शुनःसख ( संन्यासी ) ने कहा -यातुधानी! इन ऋषियोंने जिस प्रकार अपना नाम
बताया है; उस तरह मैं नहीं बता सकता। तू मेरा नाम शुनःसख समझ ॥
यातुधान्युवाच
नामनैरुक्तमेतत् ते वाक्यं संदिग्धया गिरा ।
तस्मात् पुनरिदानीं त्वं ब्रूहि यन्नाम ते द्विज ॥ १०३ ॥
यातुधानी बोली - विप्रवर! आपने संदिग्धवाणीमें अपना नाम बताया है । अतः अब फिर स्पष्टरूपसे अपने नामकी व्याख्या कीजिये ॥ १०३ ॥
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शुनःसखउवाच
सकृदुक्तं मया नाम न गृहीतं त्वया यदि ।
तस्मात् त्रिदण्डाभिहता गच्छ भस्मेति मा जिरम् ॥ १०४ ॥
शुनःसखने कहा- मैंने एक बार अपना नाम बता दिया फिर भी यदि तूने उसे ग्रहण नहीं किया तो इस प्रमादके कारण मेरे इस त्रिदण्डकी मार खाकर अभी भस्म हो जा— इसमें विलम्ब न हो ॥ १०४ ॥
सा ब्रह्मदण्डकल्पेन तेन मूर्ध्नि हता तदा ।
कृत्या पपात मेदिन्यां भस्म सा च जगाम ह ॥ १०५ ॥
यह कहकर उस संन्यासीने ब्रह्मदण्डके समान अपने त्रिदण्डसे उसके मस्तकपर ऐसा हाथ जमाया कि वह यातुधानी पृथ्वीपर गिर पड़ी और तुरंत भस्म हो गयी ॥
शुनःसखा च हत्वा तां यातुधानीं महाबलाम् ।
भूवि त्रिदण्डं विष्टभ्य शाद्वले समुपाविशत् ॥ १०६ ॥
इस प्रकार शुनःसखने उस महाबलवती राक्षसीका वध करके त्रिदण्डको पृथ्वीपर रख दिया और स्वयं भी वे वहीं घाससे ढँकी हुई भूमिपर बैठ गये ॥ १०६ ॥
ततस्ते मुनयः सर्वे पुष्कराणि बिसानि च ।
यथाकाममुपादाय समुत्तस्थुर्मुदान्विताः ॥ १०७ ॥
तदनन्तर वे सभी महर्षि इच्छानुसार कमलके फूल और मृणाल लेकर प्रसन्नतापूर्वक सरोवरसे बाहर निकले ॥ १०७ ॥
श्रमेण महता कृत्वा ते बिसानि कलापशः ।
तीरे निक्षिप्य पद्मिन्यास्तर्पणं चक्रुरम्भसा ॥ १०८ ॥
फिर बहुत परिश्रम करके उन्होंने अलग- अलग बोझे बाँधे । इसके बाद उन्हें किनारेपर ही रखकर वे सरोवरके जलसे तर्पण करने लगे ॥ १०८ ॥
अथोत्थाय जलात् तस्मात् सर्वे ते समुपागमन् ।
नापश्यंश्चापि ते तानि बिसानि पुरुषर्षभाः ॥ १० ९ ॥
थोड़ी देर बाद जब वे पुरुषप्रवर पानीसे बाहर निकले तो उन्हें रखेहुएअपने वेमृणाल नहीं दिखायी पड़े ॥ १० ९ ॥ ऋषय ऊचुः
केन क्षुधापरीतानामस्माकं पापकर्मणाम् ।
नृशंसेनापनीतानि बिसान्याहारकांक्षिणाम् ॥ ११० ॥
तब वे ऋषि एक दूसरेसे कहने लगे - अरे! हम सब लोग भूखसे व्याकुल थे और अब भोजन करना चाहते थे । ऐसे समयमें किस निर्दयीने हम पापियोंके मृणाल चुरा लिये ॥ ११० ॥
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ते शंकमानास्त्वन्योन्यं पप्रच्छुर्द्विजसत्तमाः ।
त ऊचुः समयं सर्वे कुर्म इत्यरिकर्शन ॥ १११ ॥
शत्रुसूदन! वे श्रेष्ठ ब्राह्मण आपसमें ही एक-दूसरेपर संदेह करते हुए पूछ- ताछ करने लगे और अन्तमें बोले - ' हम सब लोग मिलकर शपथ करें ' ॥ १११ ॥
त उक्त्वा बाढमित्येवं सर्व एव तदा समम् ।
क्षुधार्ताः सुपरिश्रान्ताः शपथायोपचक्रमुः ॥ ११२ ॥
शपथकी बात सुनकर सब- के - सब बोल उठे - ' बहुत अच्छा ' । फिर वे भूखसे पीड़ित और परिश्रमसे थके - माँदे ब्राह्मण एक साथ ही शपथ खानेको तैयार हो गये ॥ ११२ ॥
अत्रिरुवाच
गां स्पृशतु पादेन सूर्यं च प्रतिमेहतु ।
अनध्यायेष्वधीयीत बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ ११३ ॥
अत्रि बोले- जो मृणालकी चोरी करता हो उसे गायको लात मारने, सूर्यकी ओर मुँह करके पेशाब करने और अनध्यायके समय अध्ययन करनेका पाप लगे ॥ वसिष्ठ उवाच
अनध्याये पठेल्लोके शुनः सः परिकर्षतु ।
परिव्राट् कामवृत्तस्तु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ ११४ ॥
शरणागतं हन्तु स वै स्वसुतां चोपजीवतु ।
अर्थान् कांक्षतु कीनाशाद् बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ ११५ ॥
वसिष्ठ बोले — जिसने मृणाल चुराये हों उसे निषिद्ध समयमें वेद पढ़ने, कुत्ते लेकर शिकार खेलने, संन्यासी होकर मनमाना बर्ताव करने, शरणागतको मारने, अपनी कन्या बेचकर जीविका चलाने तथा किसानके धन छीन लेनेका पाप लगे ॥ ११४-११५ ॥ कश्यप उवाच
सर्वत्र सर्वं लपतु न्यासलोपं करोतु च ।
कूटसाक्षित्वमभ्येतु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ ११६ ॥
कश्यपने कहा- जिसने मृणालोंकी चोरी की हो उसको सब जगह सब तरहकी बातें कहने, दूसरोंकी धरोहर हड़प लेने और झूठी गवाही देनेका पाप लगे ॥
वृथामांसाशनश्चास्तु वृथादानं करोतु च ।
यातु स्त्रियं दिवा चैव बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ ११७ ॥
जो मृणालोंकी चोरी करता हो उसे मांसाहारका पाप लगे । उसका दान व्यर्थ चला जाय तथा उसे दिनमें स्त्रीके साथ समागम करनेका पाप लगे ॥ ११७ ॥
भरद्वाज उवाच
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नृशंसस्त्यक्तधर्मास्तु स्त्रीषु ज्ञातिषु गोषु च ।
ब्राह्मणं चापि जयतां बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ ११८ ॥
भरद्वाज बोले – जिसने मृणाल चुराया हो उस निर्दयीको धर्मके परित्यागका दोष लगे । वह स्त्रियों, कुटुम्बीजनों तथा गौओंके साथ पापपूर्ण बर्ताव करनेका दोषी हो और ब्राह्मणको वाद - विवादमें पराजित करनेका पाप लगे ॥ ११८ ॥
उपाध्यायमधः कृत्वा ऋचोऽध्येतु अजूंषि च ।
जुहोतु च स कक्षाग्नौ बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ ११ ९ ॥
जो मृणालकी चोरी करता हो, उसे उपाध्याय (अध्यापक या गुरु) को नीचे बैठाकर उनसे ऋग्वेद और यजुर्वेदका अध्ययन करने और घासस--फूसकी आगमें आहुति डालनेका पाप लगे ॥ ११ ९ ॥ जमदग्निरुवाच
पुरीषमुत्सृजत्वप्सु हन्तु गां चैव द्रुह्यतु ।
अनृतौ मैथुनं यातु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ १२० ॥
जमदग्नि बोले –जिसने मृणालोंका अपहरण किया हो, उसे पानीमें मलत्याग करनेका पाप लगे, गाय मारनेका अथवा उसके साथ द्रोह करनेका तथा ऋतुकाल आये बिना ही स्त्रीके साथ समागम करनेका पाप लगे ॥ १२० ॥
द्वेष्यो भार्योपजीवी स्याद् दूरबन्धुश्च वैरवान् ।
अन्योन्यस्यातिथिश्चास्तु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ १२१ ॥
जिसने मृणाल चुराये हों उसे सबके साथ द्वेष करनेका, स्त्रीकी कमाईपर जीविका चलानेका, भाई- बन्धुओंसे दूर रहनेका, सबसे वैर करनेका और एक- दूसरेके घर अतिथि होनेका पाप लगे ॥ १२१ ॥
गौतमउवाच
अधीत्य वेदांस्त्यजतु त्रीनग्नीनपविध्यतु ।
विक्रीणातु तथा सोमं बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ १२२ ॥
गौतम बोले- जिसने मृणाल चुराये हों उसे वेदोंको पढ़कर त्यागनेका, तीनों अग्नियोंका परित्याग करनेका और सोमरसका विक्रय करनेका पाप लगे ॥ १२२ ॥
उदपानप्लवे ग्रामे ब्राह्मणो वृषलीपतिः ।
तस्य सालोक्यतां यातु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ १२३ ॥
जिसने मृणालोंकी चोरी की हो उसे वही लोक मिले, जो एक ही कूपमें पानी भरनेवाले, गाँवमें निवास करनेवाले और शूद्रकी पत्नीसे संसर्ग रखनेवाले ब्राह्मणको मिलता है ॥ १२३ ॥
विश्वामित्र उवाच