श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 811–820

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 811–820

पृष्ठ 811

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जीवतो वै गुरून् भृत्यान् भरन्त्वस्य परे जनाः ।

अगतिर्बहुपुत्रः स्याद् बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ १२४ ॥

विश्वामित्र बोले— जो इन मृणालोंको चुरा ले गया हो, जिस पुरुषके जीवित रहनेपर उसकेगुरु और माता तथा पिताका दूसरे पुरुष पोषण करें उसको और जिसकी कुगति हुई हो तथा जिसके बहुत - से पुत्र हों उसको जो पाप लगता है वह पाप उसे लगे ॥ १२४ ॥

अशुचिर्ब्रह्मकूटोऽस्तु ऋद्धया चैवाप्यहंकृतः ।

कर्षको मत्सरी चास्तु बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ १२५ ॥

जिसने मृणालोंका अपहरण किया हो, उसे अपवित्र रहनेका, वेदको मिथ्या माननेका, धनका घमंड करनेका, ब्राह्मण होकर खेत जोतनेका और दूसरोंसे डाह रखनेका पाप लगे ॥ १२५ ॥

वर्षाचरोऽस्तु भृतको राज्ञश्चास्तु पुरोहितः ।

अयाज्यस्य भवेदृत्विग् बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ १२६ ॥

जिसने मृणाल चुराये हों, उसे वर्षाकालमें परदेशकी यात्रा करनेका, ब्राह्मण होकर वेतन लेकर काम करनेका, राजाके पुरोहित तथा यज्ञके अनधिकारीसे भी यज्ञ करानेका पाप लगे ॥ १२६ ॥

अरुन्धत्युवाच

नित्यं परिभवेच्छ्वश्रूं भर्तुर्भवतु दुर्मनाः ।

एका स्वादु समाश्नातु बिसस्तैन्यं करोति या ॥ १२७ ॥

अरुन्धती बोलीं- जो स्त्री मृणालोंकी चोरी करती हो उसे प्रतिदिन सासका तिरस्कार करनेका, अपने पतिका दिल दुखानेका और अकेली ही स्वादिष्ट वस्तुएँ खानेका पाप लगे ॥ १२७ ॥

ज्ञातीनां गृहमध्यस्था सक्तूनतु दिनक्षये ।

अभोग्या वीरसूरस्तु बिसस्तैन्यं करोति या ॥ १२८ ॥

जिसने मृणालोंकी चोरी की हो, उस स्त्रीको कुटुम्बीजनोंका अपमान करके घरमें रहनेका, दिन बीत जानेपर सत्तू खानेका, कलंकिनी होनेके कारण पतिके उपभोगमें न आनेका और ब्राह्मणी होकर भी क्षत्राणियोंके समान उग्र स्वभाववाले वीर पुत्रकी जननी होनेका पाप लगे ॥ १२८ ॥

गण्डोवाच

अनृतं भाषतु सदा बन्धुभिश्च विरुध्यतु ।

ददातु कन्यां शुल्केन बिसस्तैन्यं करोति या ॥ १२ ९ ॥

गण्डा बोली- जिस स्त्रीने मृणालकी चोरी की हो उसे सदा झूठ बोलनेका, भाई-बन्धुओंसे लड़ने और विरोध करने और शुल्क लेकर कन्यादान करनेका पाप लगे ॥

पृष्ठ 812

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साधयित्वा स्वयं प्राशेद् दास्ये जीर्यतु चैव ह ।

विकर्मणा प्रमीयेत बिसस्तैन्यं करोति या ॥ १३० ॥

जिस स्त्रीने मृणाल चुराया हो उसे रसोई बनाकर अकेली भोजन करनेका, दूसरोंकी गुलामी करती करती ही बूढ़ी होनेका और पापकर्म करके मौतके मुखमें पड़नेका पाप लगे ॥ १३० ॥

पशुसख उवाच

दास एव प्रजायेतामप्रसूतिरकिंचनः ।

दैवतेष्वनमस्कारो बिसस्तैन्यं करोति यः ॥ १३१ ॥

पशुसख बोला – जिसने मृणालोंकी चोरी की हो उसे दूसरे जन्ममें भी दासीके ही घरमें पैदा होने, संतानहीन और निर्धन होने तथा देवताओंको नमस्कार न करनेका पाप लगे ॥ १३१ ॥

शुनःसखउवाच अध्वर्यवे दुहितरं वा ददातु च्छन्दोगे वा चरितब्रह्मचर्ये । आथर्वणं वेदमधीत्य विप्रः स्नायीत वा यो हरते बिसानि ॥ १३२ ॥

शुनःसखने कहा — जिसने मृणालोंको चुराया हो वह ब्रह्मचर्यव्रत पूर्ण करके आये हुए यजुर्वेदी अथवा सामवेदी विद्वान्‌को कन्यादान दे अथवा वह ब्राह्मण अथर्ववेदका अध्ययन पूरा करके शीघ्र ही स्नातक बन जाय ॥ १३२ ॥

ऋषय ऊचुः

इष्टमेतद् द्विजातीनां योऽयं ते शपथः कृतः ।

त्वया कृतं बिसस्तैन्यं सर्वेषां नः शुनःसख ॥ १३३ ॥

ऋषियोंने कहा — शुनःसख! तुमने जो शपथ की है, वह तो ब्राह्मणोंको अभीष्ट ही है ।

अतः जान पड़ता है, हमारे मृणालोंकी चोरी तुमने ही की है ॥ १३३ ॥

शुनःसखउवाच

न्यस्तमद्यं न पश्यद्भिर्यदुक्तं कृतकर्मभिः ।

सत्यमेतन्न मिथ्यैतद् बिसस्तैन्यं कृतं मया ॥ १३४ ॥

- शुनःसखने कहा –मुनिवरो! आपका कहना ठीक है । वास्तवमें आपका भोजन मैंने ही रख लिया है । आपलोग जब तर्पण कर रहे थे, उस समय आपकी दृष्टि इधर नहीं थी; तभी मैंने वह सब लेकर रख लिया था । अतः आपका यह कथन कि तुमने ही मृणाल चुराये हैं, ठीक है । मिथ्या नहीं है । वास्तवमें मैंने ही उन मृणालोंकी चोरी की है ॥ १३४ ॥

पृष्ठ 813

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मया ह्यन्तर्हितानीह बिसानीमानि पश्यत ।

परीक्षार्थं भगवतां कृतमेवं मयानघाः ॥ १३५ ॥

मैंने उन मृणालोंको यहाँ छिपा दिया था । देखिये, ये रहे आपके मृणाल । निष्पाप मुनियो! मैंने आपलोगोंकी परीक्षाके लिये ही ऐसा किया था ॥ १३५ ॥

रक्षणार्थं च सर्वेषां भवतामहमागतः ।

यातुधानी ह्यतिक्रूरा कृत्यैषा वो वधैषिणी ॥ १३६ ॥

मैं आप सब लोगोंकी रक्षाके लिये यहाँ आया था यह यातुधानी अत्यन्त क्रूर स्वभाववाली कृत्या थी और आपलोगोंका वध करना चाहती थी ॥ १३६ ॥

वृषादर्भिप्रयुक्तेषा निहता मे तपोधनाः ।

दुष्टा हिंस्यादियं पापा युष्मान् प्रत्यग्निसम्भवा ॥ १३७ ॥

तस्मादस्म्यागतो विप्रा वासवं मां निबोधत ।

अलोभादक्षया लोकाः प्राप्ता वै सार्वकामिकाः ॥ १३८ ॥

उत्तिष्ठध्वमितः क्षिप्रं तानवाप्नुत वै द्विजाः ॥ १३ ९ ॥

तपोधनो! राजा वृषादर्भिने इसे भेजा था, किन्तु यह मेरे द्वारा मारी गयी । ब्राह्मणो! मैंने सोचा कि अग्निसे उत्पन्न यह दुष्ट पापिनी कृत्या कहीं आप लोगोंकी हिंसा न कर डाले; इसलिये मैं यहाँ आ गया । आपलोग मुझे इन्द्र समझें । आपलोगोंने जो लोभका परित्याग किया है, इससे आपको वे अक्षयलोक प्राप्त हुए हैं, जो सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले हैं । अतः ब्राह्मणो! अब आपलोग यहाँसे उठें और शीघ्र उन लोकोंमें पदार्पण करें ॥ १३७– १३ ९ ॥ भीष्म उवाच

ततो महर्षयः प्रीतास्तथेत्युक्त्वा पुरंदरम् ।

सहैव त्रिदशेन्द्रेण सर्वे जग्मुस्त्रिविष्टपम् ॥ १४० ॥

भीष्मजी कहते हैं — युधिष्ठिर! इन्द्रकी बात सुनकर महर्षियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने देवराजसे ‘ तथास्तु ' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली । फिर वे सब- के - सब देवेन्द्रके साथ ही स्वर्गलोक चले गये ॥ १४० ॥

एवमेते महात्मानो भोगैर्बहुविधैरपि ।

क्षुधा परमया युक्ताश्छन्द्यमाना महात्मभिः ॥ १४१ ॥

नैव लोभं तदा चक्रुस्ततः स्वर्गमवाप्नुवन् ॥ १४२ ॥

इस प्रकार उन महात्माओंने अत्यन्त भूखे होनेपर और बड़े - बड़े लोगोंके अनेक प्रकारके भोगोंद्वारा लालच देनेपर भी उस समय लोभ नहीं किया । इसीसे उन्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति हुई ॥ १४१-१४२ ॥ तस्मात् सर्वास्ववस्थासु नरो लोभं विवर्जयेत् ।

पृष्ठ 814

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एष धर्मः परो राजंस्तस्माल्लोभं विवर्जयेत् ॥ १४३ ॥

राजन्! इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह सभी दशाओंमें लोभका त्याग करे, क्योंकि

यह सबसे बड़ा धर्म है । अतः लोभको अवश्य त्याग देना चाहिये ॥ १४३ ॥

इदं नरः सुचरितं समवायेषु कीर्तयन् ।

अर्थभागी च भवति न च दुर्गाण्यवाप्नुते ॥ १४४ ॥

जो मनुष्य जनसमुदायमें इस पवित्र चरित्रका कीर्तन करता है, वह धन एवं मनोवांछित वस्तुका भागी होता है और कभी संकटमें नहीं पड़ता है ॥ १४४ ॥

प्रीयन्ते पितरश्चास्य ऋषयो देवतास्तथा ।

यशोधर्मार्थभागी च भवति प्रेत्य मानवः ॥ १४५ ॥

उसके ऊपर देवता, ऋषि और पितर सभी प्रसन्न होते हैं । वह मनुष्य इहलोकमें यश, धर्म एवं धनका भागी होता है । और मृत्युके पश्चात् उसे स्वर्गलोक सुलभ होता है ॥ १४५ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि बिसस्तैन्योपाख्याने त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ३ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मृणालकी चोरीका उपाख्यानविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥

( दक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल १४६३ श्लोक हैं ) PR * पोष्यवर्ग

पृष्ठ 815

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चतुर्नवतितमोऽध्यायः ब्रह्मसरतीर्थमें अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर ब्रह्मर्षियों और राजर्षियोंकी धर्मोपदेशपूर्ण शपथ तथा धर्मज्ञानके उद्देश्यसे चुराये हुए कमलोंका वापस देना भीष्म उवाच

अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

यद् वृत्तं तीर्थयात्रायां शपथं प्रति तच्छृणु ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं — युधिष्ठिर! इसी विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है । तीर्थयात्राके प्रसंगमें इसी तरहकी शपथको लेकर जो एक घटना घटित हुई थी, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ १ ॥

पुष्करार्थं कृतं स्तैन्यं पुरा भरतसत्तम ।

राजर्षिभिर्महाराज तथैव च द्विजर्षिभिः ॥ २ ॥

भरतवंशशिरोमणे! महाराज! पूर्वकालमें कुछ राजर्षियों और ब्रह्मर्षियोंने भी इसी प्रकार कमलोंके लिये चोरी की थी ॥ २ ॥

ऋषयः समेताः पश्चिमे वै प्रभासे समागता मन्त्रममन्त्रयन्त । चराम सर्वां पृथिवीं पुण्यतीर्थां तन्नः कामं हन्त गच्छाम सर्वे ॥ ३ ॥

पश्चिम समुद्रके तटपर प्रभास तीर्थमें बहुत -से ऋषि एकत्र हुए थे । उन समागत महर्षियोंने आपसमें यह सलाह की कि हमलोग अनेक पुण्यतीर्थोंसे भरी हुई समूची पृथ्वीकी यात्रा करें । यह हम सभी लोगोंकी अभिलाषा है । अतः सब लोग साथ - ही - साथ यात्रा प्रारम्भ कर दें ॥ ३ ॥

शुक्रोऽङ्गिराश्चैव कविश्च विद्वां- स्तथा ह्यगस्त्यो नारदपर्वतौ च । भृगुर्वसिष्ठः कश्यपो गौतमश्च विश्वामित्रो जमदग्निश्च राजन् ॥ ४ ॥

ऋषिस्तथा गालवोऽथाष्टकश्च भरद्वाजोऽरुन्धती वालखिल्याः । शिबिर्दिलीपो नहुषोऽम्बरीषो राजा ययातिर्धुन्धुमारोऽथ पूरुः ॥ ५ ॥

पृष्ठ 816

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जग्मुः पुरस्कृत्य महानुभावं शतक्रतुं वृत्रहणं नरेन्द्राः । तीर्थानि सर्वाणि परिभ्रमन्तो माघ्यां ययुः कौशिकीं पुण्यतीर्थाम् ॥ ६ ॥

राजन्! ऐसा निश्चय करके शुक्र, अंगिरा, विद्वान् कवि, अगस्त्य, नारद, पर्वत, भृगु, वसिष्ठ, कश्यप, गौतम, विश्वामित्र, जमदग्नि, गालव मुनि, अष्टक, भरद्वाज, अरुन्धती, वालखिल्यगण, शिबि, दिलीप, नहुष, अम्बरीष, राजा ययाति, धुन्धुमार और पूरु --ये सभी राजर्षि तथा ब्रह्मर्षि वज्रधारी महानुभाव वृत्रहन्ता शतक्रतु इन्द्रको आगे करके यात्राके लिये निकले और सभी तीर्थोंमें घूमते हुए माघ मासकी पूर्णिमा तिथिको पुण्यसलिला कौशिकी नदीके तटपर जा पहुँचे ॥ ४–६ ॥ सर्वेषु तीर्थेष्ववधूतपापा जग्मुस्ततो ब्रह्मसरः सुपुण्यम् । देवस्य तीर्थे जलमग्निकल्पा विगाह्य ते भुक्तबिसप्रसूनाः ॥ ७ ॥

इस प्रकार वहाँके तीर्थोंमें स्नानके द्वारा अपने पाप धो करके ऋषिगण उस स्थानसे परम पवित्र ब्रह्मसर तीर्थमें गये । उन अग्निके समान तेजस्वी ऋषियोंने वहाँके जलमें स्नान करके कमलके फूलोंका आहार किया ॥ ७ ॥

केचिद् बिसान्यखनंस्तत्र राज- न्नन्ये मृणालान्यखनंस्तत्र विप्राः । अथापश्यन् पुष्करं ते ह्रियन्तं ह्रदादगस्त्येन समुद्धृतं तत् ॥ ८ ॥

राजन्! कुछ ऋषि वहाँ कमल खोदने लगे । कुछ ब्राह्मण मृणाल उखाड़ने लगे । इसी बीचमें अगस्त्यजीने उस पोखरेसे जितना कमल उखाड़कर रखा था, वह सब सहसा गायब हो गया । इस बातको सबने देखा ॥ ८ ॥

तानाह सर्वानृषिमुख्यानगस्त्यः केनादत्तं पुष्करं मे सुजातम् । युष्मान् शंके पुष्करं दीयतां मे न वै भवन्तो हर्तुमर्हन्ति पद्मम् ॥ ९ ॥

तब अगस्त्यजीने उन समस्त ऋषियोंसे पूछा- ' किसने मेरे सुन्दर कमल ले लिये । मैं आप सब लोगोंपर संदेह करता हूँ। मेरे कमल लौटा दीजिये । आप जैसे साधु पुरुषोंको कमलोंकी चोरी करना कदापि उचित नहीं है ॥ ९ ॥

शृणोमि कालो हिंसते धर्मवीर्यं सोऽयं प्राप्तो वर्तते धर्मपीडा ।

पृष्ठ 817

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पुराधर्मो वर्तते नेह यावत् तावद् गच्छामः सुरलोकं चिराय ॥ १० ॥

‘ सुनता हूँ कि काल धर्मकी शक्तिको नष्ट कर देता है । वही काल इस समय प्राप्त हुआ है । तभी तो धर्मको हानि पहुँचायी जा रही है – अस्तेय- धर्मका हनन हो रहा है । अतः इस जगत्में अधर्मका विस्तार न हो इसके पहले ही हम चिरकालके लिये स्वर्गलोकमें चले जायँ ॥ १० ॥

पुरा वेदान् ब्राह्मणा ग्राममध्ये घुष्टस्वरा वृषलान् श्रावयन्ति । पुरा राजा व्यवहारेण धर्मान् पश्यत्यहं परलोकं व्रजामि ॥ ११ ॥

‘ ब्राह्मणलोग गाँवके बीचमें उच्चस्वरसे वेदपाठ करके शूद्रोंको सुनाने लगें तथा राजा व्यावसायिक दृष्टिसे धर्मको देखने लगें, इसके पहले ही मैं परलोकमें चला जाऊँ ॥ ११ ॥

पुरा वरान् प्रत्यवरान् गरीयसो यावन्नरा नावमंस्यन्ति सर्वे । तमोत्तरं यावदिदं न वर्तते तावद् व्रजामि परलोकं चिराय ॥ १२ ॥

' जबतक सभी श्रेष्ठ मनुष्य महान् पुरुषोंकी नीचोंके समान अवहेलना नहीं करते हैं तथा जबतक इस संसारमें अज्ञानजनित तमोगुणका बाहुल्य नहीं हो जाता, इसके पहले ही मैं चिरकालके लिये परलोक चला जाऊँ ॥ १२ ॥

पुरा प्रपश्यामि परेण मर्त्यान् बलीयसा दुर्बलान् भुज्यमानान् । तस्माद् यास्यामि परलोकं चिराय न ह्युत्सहे द्रष्टुमिह जीवलोकम् ॥ १३ ॥

‘ भविष्यकालमें बलवान् मनुष्य दुर्बलोंको अपने उपभोगमें लायेंगे, इस बातको मैं अभीसे देख रहा हूँ । इसलिये मैं दीर्घकालके लिये परलोकमें चला जाऊँ । यहाँ रहकर इस जीवजगत्की ऐसी दुरवस्था मैं नहीं देख सकता' ॥ १३ ॥

तमाहुरार्ता ऋषयो महर्षि न ते वयं पुष्करं चोरयामः । मिथ्याभिषंगो भवता न कार्यः शपाम तीक्ष्णैः शपथैर्महर्षे ॥ १४ ॥

यह सुनकर सभी महर्षि घबरा उठे और अगस्त्यजीसे बोले - ' महर्षे! हमने आपके कमल नहीं चुराये हैं । आपको झूठा कलंक नहीं लगाना चाहिये । हम अपनी सफाई देनेके लिये कठोर- से - कठोर शपथ खा सकते हैं ' ॥ १४ ॥

पृष्ठ 818

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ते निश्चितास्तत्र महर्षयस्तु सम्पश्यन्तो धर्ममेतं नरेन्द्राः । ततोऽशपन्त शपथान् पर्ययेण सहैव ते पार्थिव पुत्रपौत्रैः ॥ १५ ॥

पृथ्वीनाथ! तदनन्तर वे महर्षि तथा नरेशगण वहाँ कुछ निश्चय करके इस धर्मपर दृष्टि रखते हुए पुत्रों और पौत्रोंसहित बारी- बारीसे शपथ खाने लगे ॥ १५ ॥

भृगुरुवाच

प्रत्याक्रोशेदिहाक्रुष्टस्ताडितः प्रतिताडयेत् ।

खादेच्च पृष्ठमांसानि यस्ते हरति पुष्करम् ॥ १६ ॥

भृगु बोले- मुने! जिसने आपके कमलकी चोरी की है, वह गाली सुनकर बदलेमें गाली दे और मार खाकर बदलेमें स्वयं भी मारे तथा दूसरेकी पीठके मांस खाय अर्थात् उपर्युक्त पापोंका भागी हो ॥ १६ ॥

वसिष्ठ उवाच

अस्वाध्यायपरो लोके श्वानं च परिकर्षतु ।

पुरे च भिक्षुर्भवतु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ १७ ॥

वसिष्ठने कहा — जिसने आपके कमल चुराये हो, वह स्वाध्यायसे विमुख हो जाय ।

कुत्ता साथ लेकर शिकार खेले और गाँव - गाँव भीख माँगता फिरे ॥ १७ ॥

कश्यप उवाच

सर्वत्र सर्वं पणतु न्यासे लोभं करोतु च ।

कूटसाक्षित्वमभ्येतु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ १८ ॥

कश्यपने कहा- जो आपका कमल चुरा ले गया हो, वह सब जगह सब तरहकी वस्तुओंकी खरीद - विक्री करे । किसीकी धरोहरको हड़प लेनेका लोभ करे और झूठी गवाही दे, अर्थात् उपर्युक्त पापोंका भागी हो ॥ १८ ॥

गौतम उवाच

जीवत्वहंकृतो बुद्ध्या विषमेणासमेन सः ।

कर्षको मत्सरी चास्तु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ १ ९ ॥

गौतम बोले –जिसने आपके कमलकी चोरी की हो, वह अहंकारी, बेईमान और अयोग्यका साथ करनेवाला, खेती करनेवाला और ईर्ष्यायुक्त होकर जीवन व्यतीत करे ॥ १ ९ ॥ अंगिराउवाच

पृष्ठ 819

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अशुचिर्ब्रह्मकूटो s स्तु श्वानं च परिकर्षतु ।

ब्रह्महानिकृतिश्चास्तु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २० ॥

अंगिराने कहा – जो आपका कमल ले गया हो, वह अपवित्र, वेदको मिथ्या बतानेवाला, ब्रह्महत्यारा और अपने पापोंका प्रायश्चित्त न करनेवाला हो । इतना ही नहीं, वह कुत्तोंको साथ लेकर शिकार खेलता फिरे, अर्थात् उपर्युक्त पापोंका भागी हो ॥ २० ॥

धुन्धुमार उवाच

अकृतज्ञस्तु मित्राणां शूद्रायां च प्रजायतु ।

एकः सम्पन्नमश्नातु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २१ ॥

धुन्धुमारने कहा –जिसने आपके कमलोंकी चोरी की हो, वह अपने मित्रोंका उपकार न माने । शूद्र जातिकी स्त्रीसे संतान उत्पन्न करे और अकेला ही स्वादिष्ट अन्न भोजन करे । अर्थात् इन पापोंके फलका भागी बने ॥ २१ ॥

पूरुरुवाच

चिकित्सायां प्रचरतु भार्यया चैव पुष्यतु ।

श्वशुरात्तस्य वृत्तिः स्याद् यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २२ ॥

पूरु बोले- जों आपका कमल चुरा ले गया हो, वह चिकित्साका व्यवसाय ( वैद्य या डॉक्टरका पेशा ) करे । स्त्रीकी कमाई खाय और ससुरालके धनपर गुजारा करे ॥ २२ ॥

दिलीप उवाच

उदपानप्लवे ग्रामे ब्राह्मणो वृषलीपतिः ।

तस्य लोकान् स व्रजतु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २३ ॥

दिलीप बोले- जो आपका कमल चुराकर ले गया हो, वह एक कूएँपर सबके साथ पानी भरनेवाले गाँवमें रहकर शूद्र जातिकी स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्राह्मणको मृत्युके पश्चात् जिन दुःखदायी लोकोंमें जाना पड़ता है, उन्हींमें जाय ॥ २३ ॥

शुक्र उवाच

वृथामांसं समश्नातु दिवा गच्छतु मैथुनम् ।

प्रेष्यो भवतु राज्ञश्च यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २४ ॥

शुक्रने कहा- जो आपका कमल चुराकर ले गया हो, उसे मांस खानेका, दिनमें मैथुन करनेका और राजाकी नौकरी करनेका पाप लगे ॥ २४ ॥

जमदग्निरुवाच

अनध्यायेष्वधीयीत मित्रं श्राद्धे च भोजयेत् ।

श्राद्धे शूद्रस्य चाश्नीयाद् यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २५ ॥

पृष्ठ 820

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जमदग्नि बोले – जिसने आपके कमल लिये हों, वह निषिद्ध कालमें अध्ययन करे ।

मित्रको ही श्राद्धमें जिमावे तथा स्वयं भी शूद्रके श्राद्धमें भोजन करे ॥ २५ ॥

शिबिरुवाच

अनाहिताग्निम्रियतां यज्ञे विघ्नं करोतु च ।

तपस्विभिर्विरुध्येच्च यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २६ ॥

शिबिने कहा — जो आपका कमल चुरा ले गया हो; वह अग्निहोत्र किये बिना ही मर जाय, यज्ञमें विघ्न डाले और तपस्वी जनोंके साथ विरोध करे, अर्थात् इन सब पापोंके फलका भागी हो ॥ २६ ॥

ययातिरुवाच

अनृतौ च व्रती चैव भार्यायां स प्रजायतु ।

निराकरोतु वेदांश्च यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २७ ॥

ययातिने कहा— जिसने आपके कमलोंकी चोरी की हो, वह व्रतधारी होकर भी ऋतुकालसे अतिरिक्त समयमें स्त्री- समागम करे और वेदोंका खण्डन करे, अर्थात् इन सब पापोंके फलका भागी हो ॥ २७ ॥

नहुषउवाच

अतिथिगृहसंस्थोऽस्तु कामवृत्तस्तु दीक्षितः ।

विद्यां प्रयच्छतु भृतो यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २८ ॥

नहुष बोले- जिसने आपके कमलोंका अपहरण किया हो, वह संन्यासी होकर भी घरमें रहे । यज्ञकी दीक्षा लेकर भी इच्छाचारी हो और वेतन लेकर विद्या पढ़ाये, अर्थात् इन सब पापोंके फलका भागी हो ॥ २८ ॥

अम्बरीष उवाच

नृशंसस्त्यक्तधर्मोऽस्तु स्त्रीषु ज्ञातिषु गोषु च ।

निहन्तु ब्राह्मणं चापि यस्ते हरति पुष्करम् ॥ २ ९ ॥

अम्बरीषने कहा- जो आपका कमल ले गया हो, वह क्रूरस्वभावका हो जाय । स्त्रियों, बन्धु - बान्धवों और गौओंके प्रति अपने धर्मका पालन न करे तथा ब्रह्महत्याके पापका भागी हो ॥ २ ९ ॥ नारद उवाच

गृहज्ञानी बहिःशास्त्रं पठतां विस्वरं पदम् ।

गरीयसोऽवजानातु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ३० ॥