06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 841–850
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 841–850
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क्षत्रा आरम्भयज्ञास्तु हविर्यज्ञा विशः स्मृताः ।
शूद्राः परिचारयज्ञा जपयज्ञास्तु ब्राह्मणाः ॥
क्षत्रिय आस्मभ ( उत्साह) रूप यज्ञ करनेवाले होते हैं । वैश्योंके यज्ञमें हविष्य ( हवनीय पदार्थ) की प्रधानता होती है, शूद्रोंका यज्ञ सेवा ही है, तथा ब्राह्मण जपरूपी यज्ञ करनेवाले होते हैं ॥
शुश्रूषाजीविनः शूद्रा वैश्या विपणजीविनः ।
अनिष्टनिग्रहाः क्षत्रा विप्राः स्वाध्यायजीविनः ॥
शूद्र'सेवासे जीवननिर्वाह करनेवाले होते हैं, वैश्य व्यापारजीवी हैं, दुष्टोंका दमन करना क्षत्रियोंकी जीवनवृत्ति है और ब्राह्मण वेदोंके स्वाध्यायसे जीवन - निर्वाह करते हैं ॥
तपसा शोभते विप्रो राजन्यः पालनादिभिः ।
आतिथ्येन तथा वैश्यः शूद्रो दास्येन शोभते ॥
क्योंकि ब्राह्मण तपस्यासे, क्षत्रिय पालन आदिसे, वैश्य अतिथि सत्कारसे और शूद्र सेवावृतिसे शोभा पाते हैं ॥ यतात्मना तु शूद्रेण शुश्रूषा नित्यमेव कर्तव्या त्रिषु वर्णेषु प्रायेणाश्रमवासिषु ॥ अपने मनको वशमें रखनेवाले शूद्रको सदा ही तीनों वर्णोंकी विशेषतः आश्रमवासियोंकी सेवा करनी चाहिये ॥
अशक्तेन त्रिवर्णस्य सेव्या ह्याश्रमवासिनः ।
यथाशक्ति यथाप्रज्ञं यथाधर्मं यथाश्रुतम् ॥
विशेषेणैव कर्तव्या शुश्रूषा भिक्षुकाश्रमे ॥
त्रिवर्णकी सेवामें अशक्त हुए शूद्रको अपनी शक्ति, बुद्धि, धर्म तथा शास्त्रज्ञानके अनुसार आश्रमवासियोंकी सेवा करनी चाहिये । विशेषतः संन्यास- आश्रममें रहनेवाले भिक्षुकी सेवा उसके लिये परम कर्तव्य है ॥
आश्रमाणां तु सर्वेषां चतुर्णां भिक्षुकाश्रमम् ।
प्रधानमिति मन्यन्ते शिष्टाः शास्त्रविनिश्चये ॥
शास्त्रोंके सिद्धान्त-ज्ञानमें निपुण शिष्ट पुरुष चारों आश्रमोंमें संन्यासको ही प्रधान मानते हैं ॥
यच्चोपदिश्यते शिष्टैः श्रुतिस्मृतिविधानतः ।
तथाऽऽस्थेयमशक्तेन स धर्म इति निश्चितः ॥
शिष्ट पुरुष वेदों और स्मृतियोंके विधानके अनुसार जिस कर्तव्यका उपदेश करें असमर्थ पुरुषको उसीका अनुष्ठान करना चाहिये । उसके लिये वही धर्म निश्चित किया गया है ॥ अतोऽन्यथा तु कुर्वाणः श्रेयो नाप्नोति मानवः ।
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तस्माद् भिक्षुषु शूद्रेण कार्यमात्महितं सदा ॥ इसके विपरीत करनेवाला मानव कल्याणका भागी नहीं होता है, अतः शूद्रको संन्यासियोंकी सेवा करके सदा अपना कल्याण करना चाहिये ॥
इह यत् कुरुते श्रेयस्तत् प्रेत्य समुपाश्नुते ।
तच्चानसूयता कार्यं कर्तव्यं यद्धि मन्यते ॥
असूयता कृतस्येह फलं दुःखादवाप्यते ॥
मनुष्य इस लोकमें जो कल्याणकारी कार्य करता है, उसका फल मुत्युके पश्चात् उसे प्राप्त होता है । जिसे वह अपना कर्तव्य समझता है, उस कार्यको वह दोषदृष्टि न रखते हुए करे । दोषदृष्टि रखते हुए जो कार्य किया जाता है, उसका फल इस जगत्में बड़े दुःखसे प्राप्त होता है ॥
प्रियवादी जितक्रोधो वीततन्द्रिरमत्सरः ।
क्षमावान् शीलसम्पन्नः सत्यधर्मपरायणः ॥
आपद्भावेन कुर्याद्धि शुश्रूषां भिक्षुकाश्रमे ॥
शूद्रको चाहिये कि वह प्रिय वचन बोले, क्रोधको जीते, आलस्य दूर भगा दे, ईर्ष्या-द्वेषसे रहित हो जाय, क्षमाशील, शीलवान् तथा सत्यधर्ममें तत्पर रहे । आपत्तिकालमें वह संन्यासियोंके आश्रममें (जाकर ) उनकी सेवा करे ॥
अयं मे परमो धर्मस्त्वनेनेदं सुदुस्तरम् ।
संसारसागरं घोरं तरिष्यामि न संशयः ॥
निर्भयो देहमुत्सृज्य यास्यामि परमां गतिम् ।
नातः परं ममास्त्यन्य एष धर्मः सनातनः ॥
एवं संचिन्त्य मनसा शूद्रो बुद्धिसमाधिना ।
कुर्यादविमना नित्यं शुश्रूषाधर्ममुत्तमम् ॥
‘ यही मेरा परम धर्म है, इसीके द्वारा मैं इस अत्यन्त दुस्तर घोर संसार- सागरसे पार हो जाऊँगा । इसमें संशय नहीं है । मैं निर्भय होकर इस देहका त्याग करके परमगतिको प्राप्त हो जाऊँगा । इससे बढ़कर मेरे लिये दूसरा कोई कर्तव्य नहीं है । यही सनातन धर्म है । ' मन-ही- मन ऐसा विचार करके प्रसन्नचित्त हुआ शूद्र बुद्धिको एकाग्र करके सदा उत्तम शुश्रूषा- धर्मका पालन करे ॥
शुश्रूषानियमेनेह भाव्यं शिष्टाशिना सदा ।
शमान्वितेन दान्तेन कार्याकार्यविदा सदा ॥
शूद्रको चाहिये कि वह नियमपूर्वक सेवामें तत्पर रहे, सदा यज्ञशिष्ट अन्न भोजन करे ।
मन और इन्द्रियोंको वशमें रखे और सदा कर्तव्याकर्तव्यको जाने ॥
सर्वकार्येषु कृत्यानि कृतान्येव च दर्शयेत् ।
यथा प्रीतो भवेद् भिक्षुस्तथा कार्यं प्रसाधयेत् ॥
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यदकल्पं भवेद् भिक्षोर्न तत् कार्यं समाचरेत् । सभी कार्योंमें जो आवश्यक कृत्य हों, उन्हें करके ही दिखावे । जैसे - जैसे संन्यासीको प्रसन्नता हो, उसी प्रकार उसका कार्य साधन करे । जो कार्य संन्यासीके लिये हितकर न हो, उसे कदापि न करे ॥ यदाश्रमस्याविरुद्धं धर्ममात्राभिसंहितम् ॥ तत् कार्यमविचारेण नित्यमेव शुभार्थिना । जो कार्य संन्यास - आश्रमके विरुद्ध न हो तथा जो धर्मके अनुकूल हो, शुभकी इच्छा रखनेवाले शूद्रको वह कार्य सदा बिना विचारे ही करना चाहिये ॥ मनसा कर्मणा वाचा नित्यमेव प्रसादयेत् ॥
स्थातव्यं तिष्ठमानेषु गच्छमानाननुव्रजेत् ।
आसीनेष्वासितव्यं च नित्यमेवानुवर्तिना ॥
मन, वाणी और क्रियाद्वारा सदा ही उन्हें संतुष्ट रखे । जब वे संन्यासी खड़े हों, तब सेवा करनेवाले शूद्रको स्वयं भी खड़ा रहना चाहिये तथा जब वे कहीं जा रहे हों, तब उसे स्वयं भी उनके पीछे - पीछे जाना चाहिये । यदि वे आसनपर बैठे हों तब वह स्वयं भी भूमिपर बैठे । तात्पर्य यह कि सदा ही उनका अनुसरण करता रहे ॥
नैशकार्याणि कृत्वा तु नित्यं चैवानुचोदितः ।
यथाविधिरुपस्पृश्य संन्यस्य जलभाजनम् ॥
भिक्षूणां निलयं गत्वा प्रणम्य विधिपूर्वकम् ।
ब्रह्मपूर्वान् गुरूंस्तत्र प्रणम्य नियतेन्द्रियः ॥
तथाऽऽचार्यपुरोगाणामनुकुर्यान्नमस्क्रियाम् ।
स्वधर्मचारिणां चापि सुखं पृष्ट्वाभिवाद्य च ॥
यो भवेत् पूर्वसंसिद्धस्तुल्यधर्मा भवेत् सदा ।
तस्मै प्रणामः कर्तव्यो नेतरेषां कदाचन ॥
रात्रिके कार्य पूरे करके प्रतिदिन उनसे आज्ञा लेकर विधिपूर्वक स्नान करके उनके लिये जलसे भरा हुआ कलश ले आकर रखे । फिर संन्यासियोंके स्थानपर जाकर उन्हें विधिपूर्वक प्रणाम करके इन्द्रियोंको संयममें रखकर ब्राह्मण आदि गुरुजनोंको प्रणाम करे । इसी प्रकार स्वधर्मका अनुष्ठान करनेवाले आचार्य आदिको नमस्कार एवं अभिवादन करे। उनका कुशल- समाचार पूछे । पहलेके जो शूद्र आश्रमके कार्यमें सिद्धहस्त हों, उनका स्वयं भी सदा अनुकरण करे, उनके समान कार्यपरायण हो । अपने समानधर्मा शूद्रको प्रणाम करे, दूसरे शूद्रोंको कदापि नहीं ॥
अनुक्त्वा तेषु चोत्थाय नित्यमेव यतव्रतः ।
सम्मार्जनमथो कृत्वा कृत्वा चाप्युपलेपनम् ॥
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संन्यासियों अथवा आश्रमके दूसरे व्यक्तियोंको कहे बिना ही प्रतिदिन नियमपूर्वक उठे और झाड़ू देकर आश्रमकी भूमिको लीप- पोत दे ॥
ततः पुष्पबलिं दद्यात् पुष्पाण्यादाय धर्मतः ।
निष्क्रम्यावसथात् तूर्णमन्यत् कर्म समाचरेत् ॥
तत्पश्चात् धर्मके अनुसार फूलोंका संग्रह करके पूजनीय देवताओंकी उन फूलोंद्वारा पूजा करे। इसके बाद आश्रमसे निकलकर तुरंत ही दूसरे कार्यमें लग जाय ॥
यथोपघातो न भवेत् स्वाध्यायेऽऽश्रमिणां तथा ।
उपघातं तु कुर्वाण एनसा सम्प्रयुज्यते ॥
आश्रमवासियोंके स्वाध्यायमें विघ्न न पड़े, इसके लिये सदा सचेष्ट रहे । जो स्वाध्यायमें विघ्न डालता है, वह पापका भागी होता है ॥
तथाऽऽत्मा प्रणिधातव्यो यथा ते प्रीतिमाप्नुयुः ।
परिचारिकोऽहं वर्णानां त्रयाणां धर्मतः स्मृतः ॥
किमुताश्रमवृद्धानां यथालब्धोपजीविनाम् ॥
अपने - आपको इस प्रकार सावधानीके साथ सेवामें लगाये रखना चाहिये, जिससे वे साधु पुरुष प्रसन्न हों । शूद्रको सदा इस प्रकार विचार करना चाहिये कि ' मैं तो शास्त्रोंमें धर्मतः तीनों वर्णोंका सेवक बताया गया हूँ। फिर जो संन्यास आश्रममें रहकर जो कुछ मिल जाय, उसीसे निर्वाह करनेवाले बड़े -बूढ़े संन्यासी हैं, उनकी सेवाके विषयमें तो कहना ही क्या है? ( उनकी सेवा करना तो मेरा परम धर्म है ही ) ॥
भिक्षूणां गतरागाणां केवलं ज्ञानदर्शिनाम् ।
विशेषेण मया कार्या शुश्रूषा नियतात्मना ॥
‘ जो केवल ज्ञानदर्शी, वीतराग संन्यासी हैं, उनकी सेवा मुझे विशेषरूपसे मनको वशमें रखते हुए करनी चाहिये ॥ तेषां प्रसादात् तपसा प्राप्स्यामीष्टां शुभां गतिम् ॥
एवमेतद् विनिश्चित्य यदि सेवेत भिक्षुकान् ।
विधिना यथोपदिष्टेन प्राप्नोति परमां गतिम् ॥
‘ उनकी कृपा और तपस्यासे मैं मनोवांछित शुभगति प्राप्त कर लूँगा । ' ऐसा निश्चय करके यदि शूद्र पूर्वोक्त विधिसे संन्यासियोंका सेवन करे तो परम गतिको प्राप्त होता है ॥
न तथा सम्प्रदानेन नोपवासादिभिस्तथा ।
इष्टां गतिमवाप्नोति यथा शुश्रूषकर्मणा ॥
शूद्र सेवाकर्मसे जिस मनोवांछित गतिको प्राप्त कर लेता है, वैसी गति दान तथा उपवास आदिके द्वारा भी नहीं प्राप्त कर सकता ॥
यादृशेन तु तोयेन शुद्धिं प्रकुरुते नरः ।
तादृग् भवति तद्धौतमुदकस्य स्वभावतः ॥
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मनुष्य जैसे जलसे कपड़ा धोता है, उस जलकी स्वच्छताके अनुसार ही वह वस्त्र स्वच्छ होता है ॥
शूद्रोऽप्येतेन मार्गेण यादृशं सेवते जनम् ।
तादृग् भवति संसर्गादचिरेण न संशयः ॥
शूद्र भी इसी मार्गसे चलकर जैसे पुरुषका सेवन करता है, संसर्गवश वह शीघ्र वैसा हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ तस्मात् प्रयत्नतः सेव्या भिक्षवो नियतात्मना । अतः शूद्रको चाहिये कि अपने मनको वशमें करके प्रयत्नपूर्वक संन्यासियोंकी सेवा
करे ।
अध्वना कर्शितानां च व्याधितानां तथैव च ॥
शुश्रूषां नियतः कुर्यात् तेषामापदि यत्नतः । जो राह चलनेसे थके -माँदे कष्ट पा रहे हों तथा रोगसे पीड़ित हों, उन संन्यासियोंकी उस आपत्तिके समय यत्न और नियमके साथ विशेष सेवा करे ॥ दर्भाजिनान्यवेक्षेत भैक्षभाजनमेव च ॥ यथाकामं च कार्याणि सर्वाण्येवोपसाधयेत् । उनके कुशासन, मृगचर्म और भिक्षापात्रकी भी देखभाल करे तथा उनकी रुचिके अनुसार सारा कार्य करता रहे ॥ प्रायश्चित्तं यथा न स्यात् तथा सर्वं समाचरेत् ॥ व्याधितानां तु प्रयतः चैलप्रक्षालनादिभिः । प्रतिकर्मक्रिया कार्या भेषजानयनैस्तथा । सब कार्य इस प्रकार सावधानीसे करे, जिससे कोई अपराध न बनने पावे । संन्यासी यदि रोगग्रस्त हो जायँ तो सदा उद्यत रहकर उनके कपड़े धोवे । उनके लिये ओषधि ले आवे तथा उनकी चिकित्साके लिये प्रयत्न करे ॥
भिक्षाटनोऽभिगच्छेत भिषजश्च विपश्चितः ।
ततो विनिष्क्रियार्थानि द्रव्याणि समुपार्जयेत् ॥
भिक्षुक बीमार होनेपर भी भिक्षाटनके लिये जाय । विद्वान् चिकित्सकोंके यहाँ उपस्थित हो तथा रोग- निवारणके लिये उपयुक्त विशुद्ध ओषधियोंका संग्रह करे ॥
यश्च प्रीतमना दद्यादादद्याद् भेषजं नरः ।
अश्रद्धया हि दत्तानि तान्यभोज्याणि भिक्षुभिः ॥
जो चिकित्सक प्रसन्नतापूर्वक ओषधि दे, उसीसे संन्यासीको औषध लेना चाहिये ।
अश्रद्धापूर्वक दी हुई ओषधियोंको संन्यासी अपने उपयोगमें न ले ॥
श्रद्धया यदुपादत्तं श्रद्धया चोपपादितम् ।
तस्योपभोगाद् धर्मः स्याद् व्याधिभिश्च निवर्त्यते ॥
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जो श्रद्धापूर्वक दी गयी और श्रद्धासे ही ग्रहण की गयी हो, उसी ओषधिके सेवनसे धर्म होता है और रोगोंसे छुटकारा भी मिलता है ॥
आदेहपतनादेवं शुश्रूषेद् विधिपूर्वकम् ।
न त्वेव धर्ममुत्सृज्य कुर्यात् तेषां प्रतिक्रियाम् ॥
शूद्रको चाहिये कि जबतक यह शरीर छूट न जाय तबतक इसी प्रकार विधिपूर्वक सेवा करता रहे । धर्मका उल्लंघन करके उन साधु- संन्यासियोंके प्रति विपरीत आचरण न करे ॥
स्वभावतो हि द्वन्द्वानि विप्रयान्त्युपयान्ति च ।
स्वभावतः सर्वभावा भवन्ति न भवन्ति च ॥
सागरस्योर्मिसदृशा विज्ञातव्या गुणात्मकाः । शीत - उष्ण आदि सारे द्वन्द्व स्वभावसे ही आते - जाते रहते हैं, समस्त पदार्थ स्वभावसे ही उत्पन्न होते और नष्ट हो जाते हैं । सारे त्रिगुणमय पदार्थ समुद्रकी लहरोंके समान उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं ॥ विद्यादेवं हि यो धीमांस्तत्त्ववित् तत्त्वदर्शनः ॥ न स लिप्यत पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा । जो बुद्धिमान् एवं तत्त्वज्ञ पुरुष ऐसा जानता है, वह जलसे निर्लिप्त रहनेवाले पद्मपत्रके समान पापसे लिप्त नहीं होता ॥ एवं प्रयतितव्यं हि शुश्रूषार्थमतन्द्रितैः ॥ सर्वाभिरुपसेवाभिस्तुष्यन्ति यतयो यथा । इस प्रकार शूद्रोंको आलस्यशून्य होकर संन्यासियोंकी सेवाके लिये प्रयत्नशील रहना चाहिये । वह सब प्रकारकी छोटी - बड़ी सेवाओंद्वारा ऐसी चेष्टा करे, जिससे वे संन्यासी सदा संतुष्ट रहें ॥ नापराध्येत भिक्षोस्तु न चैवमवधीरयेत् ॥ उत्तरं च न संदद्यात् क्रुद्धं चैव प्रसादयेत् । भिक्षुका अपराध कभी न करे, उसकी अवहेलना भी न करे, उसकी कड़ी बातका कभी उत्तर न दे और यदि वह कुपित हो तो उसे प्रसन्न करनेकी चेष्टा करे ॥ श्रेय एवाभिधातव्यं कर्तव्यं च प्रहृष्टवत् ॥ तूष्णीम्भावेन वै तत्र न क्रुद्धमभिसंवदेत् ।
सदा कल्याणकारी बात ही बोले और प्रसन्नतापूर्वक कल्याणकारी कर्म ही करे ।
संन्यासी कुपित हो तो उसके सामने चुप ही रहे, बातचीत न करे ॥
लब्धालब्धेन जीवेत तथैव परिपोषयेत् । संन्यासीको चाहिये कि भाग्यसे कोई वस्तु मिले या न मिले, जो कुछ प्राप्त हो उसीसे जीवन - निर्वाह एवं शरीरका पोषण करे ॥ कोपिनं तु न याचेत ज्ञानविद्वेषकारितः ॥
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स्थावरेषु दयां कुर्याज्जंगमेषु च प्राणिषु ।
यथाऽऽत्मनि तथान्येषु समां दृष्टिं निपातयेत् ॥
जो क्रोधी हो, उससे किसी वस्तुकी याचना न करे । जो ज्ञानसे द्वेष रखता हो, उससे भी कोई वस्तु न माँगे । स्थावर और जंगम सभी प्राणियोंपर दया करे। जैसे अपने ऊपर उसी प्रकार दूसरोंपर समतापूर्ण दृष्टि डाले ॥
पुण्यतीर्थानुसेवी च नदीनां पुलिनाश्रयः ।
शून्यागारनिकेतश्च वनवृक्षगुहाशयः ॥
अरण्यानुचरो नित्यं वेदारण्यनिकेतनः ।
एकरात्रं द्विरात्रं वा न क्वचित् सज्जते द्विजः ॥
संन्यासी पुण्यतीर्थोंका निरन्तर सेवन करे, नदियोंके तटपर कुटी बनाकर रहे । अथवा सूने घरमें डेरा डाले । वनमें वृक्षोंके नीचे अथवा पर्वतोंकी गुफाओंमें निवास करे । सदा वनमें विचरण करे । वेदरूपी वनका आश्रय ले, किसी भी स्थानमें एक रात या दो रातसे अधिक न रहे । कहीं भी आसक्त न हो ॥
शीर्णपर्णपुटे वापि वन्ये चरति भिक्षुकः ।
न भोगार्थमनुप्रेत्य यात्रामात्रं समश्नुते ॥
संन्यासी जंगली फल- मूल अथवा सूखे पत्तेका आहार करे । वह भोगके लिये नहीं, शरीरयात्राके निर्वाहके लिये भोजन करे ॥
धर्मलब्धं समश्नाति न कामान् किंचिदश्नुते ।
युगमात्रदृगध्वानं क्रोशादूर्ध्वं न गच्छति ॥
वह धर्मतः प्राप्त अन्नका ही भोजन करे । कामना- पूर्वक कुछ भी न खाय । रास्ता चलते समय वह दो हाथ आगेतककी भूमिपर ही दृष्टि रखे और एक दिनमें एक कोससे अधिक न चले ॥
समो मानापमानाभ्यां समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
सर्वभूताभयकरस्तथैवाभयदक्षिणः ॥
मान हो या अपमान– वह दोनों अवस्थाओंमें समान भावसे रहे । मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णको एक समान समझे । समस्त प्राणियोंको निर्भय करे और सबको अभयकी दक्षिणा दे ॥
निर्द्वन्द्वो निर्नमस्कारो निरानन्दपरिग्रहः ।
निर्ममो निरहंकारः सर्वभूतनिराश्रयः ॥
शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंसे निर्विकार रहे, किसीको नमस्कार न करे । सांसारिक सुख और परिग्रहसे दूर रहे । ममता और अहंकारको त्याग दे । समस्त प्राणियोंमेंसे किसीके भी आश्रित न रहे ॥ परिसंख्यानतत्त्वज्ञस्तथा सत्यरतिः सदा ।
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ऊर्ध्वं नाधो न तिर्यक् च न किंचिदभिकामयेत् ॥ वस्तुओंके स्वरूपके विषयमें विचार करके उनके तत्त्वको जाने । सदा सत्यमें अनुरक्त रहे । ऊपर, नीचे या अगल- बगलमें कहीं किसी वस्तुकी कामना न करे ॥
एवं संचरमाणस्तु यतिधर्मं यथाविधि ।
कालस्य परिणामात् तु यथा पक्वफलं तथा ॥
स विसृज्य स्वकं देहं प्रविशेद् ब्रह्म शाश्वतम् । इस प्रकार विधिपूर्वक यतिधर्मका पालन करनेवाला संन्यासी कालके परिणामवश अपने शरीरको पके हुए फलकी भाँति त्यागकर सनातन ब्रह्ममें प्रविष्ट हो जाता है ॥ निरामयमनाद्यन्तं गुणसौम्यमचेतनम् ॥
निरक्षरमबीजं च निरिन्द्रियमजं तथा ।
अजय्यमक्षरं यत् तदभेद्यं सूक्ष्ममेव च ॥
निर्गुणं च प्रकृतिमन्निर्विकारं च सर्वशः ।
भूतभव्यभविष्यस्य कालस्य परमेश्वरम् ॥
अव्यक्तं पुरुषं क्षेत्रमानन्त्याय प्रपद्यते । वह ब्रह्म निरामय, अनादि, अनन्त, सौम्यगुणसे युक्त, चेतनासे ऊपर उठा हुआ, अनिर्वचनीय, बीजहीन, इन्द्रियातीत, अजन्मा, अजेय, अविनाशी, अभेद्य, सूक्ष्म, निर्गुण, सर्वशक्तिमान्, निर्विकार, भूत, वर्तमान और भविष्य कालका स्वामी तथा परमेश्वर है । वही अव्यक्त, अन्तर्यामी पुरुष और क्षेत्र भी है । जो उसे जान लेता है, वह मोक्षको प्राप्त कर लेता है ॥ एवं स भिक्षुर्निर्वाणं प्राप्नुयाद् दग्धकिल्बिषः ॥ इहस्थो देहमुत्सृज्य नीडं शकुनिवद् यथा । इस प्रकार वह भिक्षु घोंसला छोड़कर उड़ जानेवाले पक्षीकी भाँति यहीं इस शरीरको त्यागकर समस्त पापोंको ज्ञानाग्निसे दग्ध कर देनेके कारण निर्वाण- मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ यत् करोति यदश्नाति शुभं वा यदि वाशुभम् ॥ नाकृतं भुज्यते कर्म न कृतं नश्यते फलम् । मनुष्य जो शुभ या अशुभ कर्म करता है, उसका वैसा ही फल भोगता है । बिना किये हुए कर्मका फल किसीको नहीं भोगना पड़ता है तथा किये हुए कर्मका फल भोगके बिना नष्ट नहीं होता है ॥ शुभकर्मसमाचारः शुभमेवाप्नुते फलम् ॥ तथाशुभसमाचारो ह्यशुभं समवाप्नुते । जो शुभ कर्मका आचरण करता है, उसे शुभ फलकी ही प्राप्ति होती है और जो अशुभ कर्म करता है, वह अशुभ फलका ही भागी होता है ॥
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तथा शुभसमाचारो ह्यशुभानि विवर्जयेत् ॥ शुभान्येव समादद्याद् य इच्छेद् भूतिमात्मनः । अतः जो अपना कल्याण चाहता हो, वह शुभ कर्मोंका ही आचरण करे । अशुभ कर्मोंको त्याग दे । ऐसा करनेसे वह शुभ फलोंको ही प्राप्त करेगा ॥ तस्मादागमसम्पन्नो भवेत् सुनियतेन्द्रियः ॥ शक्यते ह्यागमादेव गतिं प्राप्तुमनामयाम् । मनुष्यको चाहिये कि वह अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके शास्त्रोंके ज्ञानसे सम्पन्न हो । शास्त्रके ज्ञानसे ही मनुष्यको अनामय गतिकी प्राप्ति हो सकती है ॥ परा चैषा गतिर्दृष्टा यामन्वेषन्ति साधवः ॥ यत्रामृतत्वं लभते त्यक्त्वा दुःखमनन्तकम् । साधु पुरुष जिसका अन्वेषण करते हैं, वह परमगति शास्त्रोंमें देखी गयी है । जहाँ पहुँचकर मनुष्य अनन्त दुःखका परित्याग करके अमृतत्वको प्राप्त कर लेता है ॥ इमं हि धर्ममास्थाय ये s पि स्युः पापयोनयः ॥ स्त्रियो वैश्याश्च शूद्राश्च प्राप्नुयुः परमां गतिम् । इस धर्मका आश्रय लेकर पापयोनिमें उत्पन्न हुए पुरुष तथा स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र भी परमगतिको प्राप्त कर लेते हैं ॥ किं पुनर्ब्राह्मणो विद्वान् क्षत्रियो वा बहुश्रुतः ॥
न चाप्यक्षीणपापस्य ज्ञानं भवति देहिनः ।
ज्ञानोपलब्धिर्भवति कृतकृत्यो यदा भवेत् ॥
फिर जो विद्वान् ब्राह्मण अथवा बहुश्रुत क्षत्रिय है, उसकी सद्गतिके विषयमें क्या कहना है । जिस देहधारीके पाप क्षीण नहीं हुए हैं, उसे ज्ञान नहीं होता । जब मनुष्यको ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है, तब वह कृतकृत्य हो जाता है ॥
उपलभ्य तु विज्ञानं ज्ञानं वाप्यनसूयकः ।
तथैव वर्तेद् गुरुषु भूयांसं वा समाहितः ॥
ज्ञान या विज्ञानको प्राप्त कर लेनेपर भी दोषदृष्टिसे रहित हो गुरुजनोंके प्रति पहले ही-जैसा सद्भाव रखे । अथवा एकाग्रचित्त होकर पहले से भी अधिक श्रद्धाभाव रखे ॥
यथावमन्येत गुरुं तथा तेषु प्रवर्तते ।
व्यर्थमस्य श्रुतं भवति ज्ञानमज्ञानतां व्रजेत् ॥
शिष्य जिस तरह गुरुका अपमान करता है, उसी प्रकार गुरु भी शिष्योंके प्रति बर्ताव करता है । अर्थात् शिष्यको अपने कर्मके अनुसार फल मिलता है । गुरुका अपमान करनेवाले शिष्यका किया हुआ वेद - शास्त्रोंका अध्ययन व्यर्थ हो जाता है । उसका सारा ज्ञान अज्ञानरूपमें परिणत हो जाता है ॥ गतिं चाप्यशुभां गच्छेन्निरयाय न संशयः ।
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प्रक्षीयते तस्य पुण्यं ज्ञानमस्य विरुध्यते ॥ वह नरकमें जानेके लिये अशुभ मार्गको ही प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है । उसका पुण्य नष्ट हो जाता है और ज्ञान अज्ञान हो जाता है ॥ अदृष्टपूर्वकल्याणो यथादृष्टविधिर्नरः ॥ उत्सेकान्मोहमापद्य तत्त्वज्ञानं न चाप्नुयात् । जिसने पहले कभी कल्याणका दर्शन नहीं किया है ऐसा मनुष्य शास्त्रोक्त विधिको न देखनेके कारण अभिमानवश मोहको प्राप्त हो जाता है । अतः उसे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति नहीं होती ॥ एवमेव हि नोत्सेकः कर्तव्यो ज्ञानसम्भवः ॥ फलं ज्ञानस्य हि शमः प्रशमाय यतेत् सदा । अतः किसीको भी ज्ञानका अभिमान नहीं करना चाहिये । ज्ञानका फल है शान्ति, इसलिये सदा शान्तिके लिये ही प्रयत्न करे ॥ उपशान्तेन दान्तेन क्षमायुक्तेन सर्वदा ॥ शुश्रूषा प्रतिपत्तव्या नित्यमेवानसूयता । मनका निग्रह और इन्द्रियोंका संयम करके सदा क्षमाशील तथा अदोषदर्शी होकर गुरुजनोंकी सेवा करनी चाहिये ॥ धृत्या शिश्नोदरं रक्षेत् पाणिपादं च चक्षुषा ॥ इन्द्रियार्थांश्च मनसा मनो बुद्धौ समादधेत् । धैर्यके द्वारा उपस्थ और उदरकी रक्षा करे । नेत्रोंके द्वारा हाथ और पैरोंकी रक्षा करे । मनसे इन्द्रियोंके विषयोंको बचावे और मनको बुद्धिमें स्थापित करे ॥ धृत्याss सीत ततो गत्वा शुद्धदेशं सुसंवृतम् ॥ लब्ध्वाऽऽसनं यथादृष्टं विधिपूर्वं समाचरेत् । पहले शुद्ध एवं घिरे हुए स्थानमें जाकर आसन ले, उसके ऊपर धैर्यपूर्वक बैठे और शास्त्रोक्त विधिके अनुसार ध्यानके लिये प्रयत्न करे ॥ ज्ञानयुक्तस्तथा देवं हृदिस्थमुपलक्षयेत् ॥ आदीप्यमानं वपुषा विधूममनलं यथा । रश्मिमन्तमिवादित्यं वैद्युताग्निमिवाम्बरे । संस्थितं हृदये पश्येदीशं शाश्वतमव्ययम् । विवेकयुक्त साधक अपने हृदयमें विराजमान परमात्मदेवका साक्षात्कार करे । जैसे आकाशमें विद्युत्का प्रकाश देखा जाता है तथा जिस प्रकार किरणोंवाले सूर्य प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार उस परमात्मदेवको धूमरहित अग्निकी भाँति तेजस्वी स्वरूपसे प्रकाशित देखे । हृदयदेशमें विराजमान उन अविनाशी सनातन परमेश्वरका बुद्धिरूपी नेत्रोंके द्वारा दर्शन करे ॥