श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 831–840
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 831–840
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‘विप्रवर! ब्रह्मर्षे! मैंने जो कुछ भी कहा है, वह सब आप भी जानते हैं । भला, सूर्यको गिरानेसे आपको क्या लाभ होगा? अतः मैं प्रार्थनापूर्वक आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ ( कृपया सूर्यको नष्ट करनेका संकल्प छोड़ दीजिये ) ' ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि छत्रोपानहोत्पत्तिर्नाम पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें छत्र और उपानहकी उत्पत्तिनामक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९५ ॥
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षण्णवतितमोऽध्यायः छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानकी प्रशंसा युधिष्ठिर उवाच
एवं प्रयाचति तथा भास्करे मुनिसत्तमः ।
जमदग्निर्महातेजाः किं कार्यं प्रत्यपद्यत ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! जब सूर्यदेव इस प्रकार याचना कर रहे थे, उस समय महातेजस्वी मुनिश्रेष्ठ जमदग्निने कौन- सा कार्य किया? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
स तथा याचमानस्य मुनिरग्निसमप्रभः ।
जमदग्निः शमं नैव जगाम कुरुनन्दन ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा – कुरुनन्दन! सूर्यदेवके इस तरह प्रार्थना करनेपर भी अग्निके समान तेजस्वी जमदग्नि मुनिका क्रोध शान्त नहीं हुआ ॥ २ ॥
ततः सूर्यो मधुरया वाचा तमिदमब्रवीत् ।
कृताञ्जलिर्विप्ररूपी प्रणम्यैनं विशाम्पते ॥ ३ ॥
प्रजानाथ! तब विप्ररूपधारी सूर्यने हाथ जोड़ प्रणाम करके मधुर वाणीद्वारा यों कहा - ॥ ३ ॥
चलं निमित्तं विप्रर्षे सदा सूर्यस्य गच्छतः ।
कथं चलं भेत्स्यसि त्वं सदा यान्तं दिवाकरम् ॥ ४ ॥
‘ विप्रर्षे! आपका लक्ष्य तो चल है, सूर्य भी सदा चलते रहते हैं । अतः निरन्तर यात्रा करते हुए सूर्यरूपी चंचल लक्ष्यका आप किस प्रकार भेदन करेंगे? ' ॥ ४ ॥
जमदग्निरुवाच
स्थिरं चापि चलं चापि जाने त्वां ज्ञानचक्षुषा ।
अवश्यं विनयाधानं कार्यमद्य मया तव ॥ ५ ॥
जमदग्नि बोले- हमारा लक्ष्य चंचल हो या स्थिर, हम ज्ञानदृष्टिसे पहचान गये हैं कि तुम्हीं सूर्य हो । अतः आज दण्ड देकर तुम्हें अवश्य ही विनययुक्त बनायेंगे ॥ ५ ॥
मध्याह्ने वै निमेषार्धं तिष्ठसि त्वं दिवाकर ।
तत्र भेत्स्यामि सूर्य त्वां न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥ ६ ॥
दिवाकर! तुम दोपहरके समय आधे निमेषके लिये ठहर जाते हो! सूर्य! उसी समय तुम्हें स्थिर पाकर हम अपने बाणोंद्वारा तुम्हारे शरीरका भेदन कर डालेंगे । इस विषयमें मुझे कोई ( अन्यथा ) विचार नहीं करना है ॥
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सूर्यउवाच
असंशयं मां विप्रर्षे भेत्स्यसे धन्विनां वर ।
अपकारिणं मां विद्धि भगवन् शरणागतम् ॥ ७ ॥
सूर्य बोले- धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ विप्रर्षे! निस्संदेह आप मेरे शरीरका भेदन कर सकते हैं । भगवन्! यद्यपि मैं आपका अपराधी हूँ तो भी आप मुझे अपना शरणागत समझिये ॥ ७ ॥
भीष्म उवाच
ततः प्रहस्य भगवान् जमदग्निरुवाच तम् ।
न भीः सूर्य त्वया कार्या प्रणिपातगतो ह्यसि ॥ ८ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! सूर्यदेवकी यह बात सुनकर भगवान् जमदग्नि हँस पड़े और उनसे बोले — ‘ सूर्यदेव! अब तुम्हें भय नहीं मानना चाहिये; क्योंकि तुम मेरे शरणागत हो गये हो ॥ ८ ॥
ब्राह्मणेष्वार्जवं यच्च स्थैर्यं च धरणीतले ।
सौम्यतां चैव सोमस्य गाम्भीर्यं वरुणस्य च ॥ ९ ॥
दीप्तिमग्नेः प्रभां मेरोः प्रतापं तपनस्य च ।
एतान्यतिक्रमेद्यो वै स हन्याच्छरणागतम् ॥ १० ॥
' ब्राह्मणोंमें जो सरलता है, पृथ्वीमें जो स्थिरता है, सोमका जो सौम्यभाव, सागरकी जो गम्भीरता, अग्निकी जो दीप्ति, मेरुकी जो चमक और सूर्यका जो प्रताप है — इन सबका वह पुरुष उल्लंघन कर जाता है, इन सबकी मर्यादाका नाश करनेवाला समझा जाता है जो शरणागतका वध करता है ॥ ९ -१० ॥
भवेत् स गुरुतल्पी च ब्रह्महा च स वै भवेत् ।
सुरापानं स कुर्याच्च यो हन्याच्छरणागतम् ॥ ११ ॥
जो शरणागतकी हत्या करता है, उसे गुरुपत्नीगमन, ब्रह्महत्या और मदिरापानका पाप लगता है ' ॥ ११ ॥
एतस्य त्वपनीतस्य समाधिं तात चिन्तय ।
यथा सुखगमः पन्था भवेत् त्वद्रश्मिभावितः ॥ १२ ॥
तात! इस समय तुम्हारे द्वारा जो यह अपराध हुआ है, उसका कोई समाधान —उपाय सोचो । जिससे तुम्हारी किरणोंद्वारा तपा हुआ मार्ग सुगमतापूर्वक चलने योग्य हो सके ' ॥ १२ ॥
भीष्म उवाच
एतावदुक्त्वा स तदा तूष्णीमासीद् भृगूत्तमः ।
अथ सूर्योऽददत् तस्मै छत्रोपानहमाशु वै ॥ १३ ॥
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भीष्मजी कहते हैं - राजन्! इतना कहकर भृगुश्रेष्ठ जमदग्नि मुनि चुप हो गये । तब भगवान् सूर्यने उन्हें शीघ्र ही छत्र और उपानह दोनों वस्तुएँ प्रदान कीं ॥ १३ ॥
सूर्यउवाच
महर्षे शिरसस्त्राणं छत्रं मद्रश्मिवारणम् ।
प्रतिगृह्णीष्व पद्भ्यां च त्राणार्थं चर्मपादुके ॥ १४ ॥
सूर्यदेवने कहा - महर्षे! यह छत्र मेरी किरणोंका निवारण करके मस्तककी रक्षा करेगा तथा चमड़ेके बने ये एक जोड़े जूते हैं, जो पैरोंको जलनेसे बचानेके लिये प्रस्तुत किये गये हैं । आप इन्हें ग्रहण कीजिये ॥ १४ ॥
अद्यप्रभृति चैवेह लोके सम्प्रचरिष्यति ।
पुण्यकेषु च सर्वेषु परमक्षय्यमेव च ॥ १५ ॥
आजसे इस जगत्में इन दोनों वस्तुओंका प्रचार होगा और पुण्यके सभी अवसरोंपर इनका दान उत्तम एवं अक्षय फल देनेवाला होगा ॥ १५ ॥
भीष्म उवाच
छत्रोपानहमेतत् तु सूर्येणैतत् प्रवर्तितम् ।
पुण्यमेतदभिख्यातं त्रिषु लोकेषु भारत ॥ १६ ॥
भीष्मजी कहते हैं — भारत! छाता और जूता - इन दोनों वस्तुओंका प्राकट्य —छाता लगाने और जूता पहननेकी प्रथा सूर्यने ही जारी की है । इन वस्तुओंका दान तीनों लोकोंमें पवित्र बताया गया है ॥ १६ ॥
तस्मात् प्रयच्छ विप्रेषु छत्रोपानहमुत्तमम् ।
धर्मस्तेषु महान् भावी न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥ १७ ॥
इसलिये तुम ब्राह्मणोंको उत्तम छाते और जूते दिया करो । उनके दानसे महान् धर्म होगा । इस विषय में मुझे भी संदेह नहीं है ॥ १७ ॥
छत्रं हि भरतश्रेष्ठ यः प्रदद्याद् द्विजातये ।
शुभ्रं शतशलाकं वै स प्रेत्य सुखमेधते ॥ १८ ॥
भरतश्रेष्ठ! जो ब्राह्मणको सौ शलाकाओंसे युक्त सुन्दर छाता दान करता है, वह परलोकमें सुखी होता है ॥
स शक्रलोके वसति पूज्यमानो द्विजातिभिः ।
अप्सरोभिश्च सततं देवैश्च भरतर्षभ ॥ १ ९ ॥
भरतभूषण! वह देवताओं, ब्राह्मणों और अप्सराओंद्वारा सतत सम्मानित होता हुआ इन्द्रलोकमें निवास करता है ॥ १ ९ ॥
दह्यमानाय विप्राय यः प्रयच्छत्युपानहौ ।
स्नातकाय महाबाहो संशिताय द्विजातये ॥ २० ॥
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सोऽपि लोकानवाप्नोति दैवतैरभिपूजितान् ।
गोलोके स मुदा युक्तो वसति प्रेत्य भारत ॥ २१ ॥
महाबाहो! भरतनन्दन! जिसके पैर जल रहे हों ऐसे कठोर व्रतधारी स्नातक द्विजको जो जूते दान करता है, वह शरीर त्यागके पश्चात् देववन्दित लोकोंमें जाता है और बड़ी प्रसन्नताके साथ गोलोकमें निवास करता है ॥
एतत् ते भरतश्रेष्ठ मया कार्त्स्न्येन कीर्तितम् ।
छत्रोपानहदानस्य फलं भरतसत्तम ॥ २२ ॥
भरतश्रेष्ठ! भरतसत्तम! यह मैंने तुमसे छातों और जूतोंके दानका सम्पूर्ण फल बताया है ॥ २२ ॥
[ सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति ] युधिष्ठिर उवाच
शूद्राणामिह शुश्रूषा नित्यमेवानुवर्णिता ।
कैः कारणैः कतिविधा शुश्रूषा समुदाहृता ॥
युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! इस जगत्में शूद्रोंके लिये सदा द्विजातियोंकी सेवाको ही
परम धर्म बताया गया है । वह सेवा किन कारणोंसे कितने प्रकारकी कही गयी है? ॥
के च शुश्रूषया लोका विहिता भरतर्षभ ।
शूद्राणां भरतश्रेष्ठ ब्रूहि मे धर्मलक्षणम् ॥
भरतभूषण! भरतरत्न! शूद्रोंको द्विजोंकी सेवासे किन लोकोंकी प्राप्ति बतायी गयी है? मुझे धर्मका लक्षण बताइये ॥ भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
शूद्राणामनुकम्पार्थं यदुक्तं ब्रह्मवादिना ॥
भीष्मजीने कहा — राजन्! इस विषयमें ब्रह्मवादी पराशरने शूद्रोंपर कृपा करनेके लिये जो कुछ कहा है, उसी इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥
वृद्धः पराशरः प्राह धर्मं शुभ्रमनामयम् ।
अनुग्रहार्थं वर्णानां शौचाचारसमन्वितम् ॥
बड़े - बूढ़े पराशर मुनिने सब वर्णोंपर कृपा करनेके लिये शौचाचारसे सम्पन्न निर्मल एवं अनामय धर्मका प्रतिपादन किया ॥
धर्मोपदेशमखिलं यथावदनुपूर्वशः ।
शिष्यानध्यापयामास शास्त्रमर्थवदर्थवित् ॥
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तत्त्वज्ञ पराशर मुनिने अपने सारे धर्मोपदेशको ठीक- ठीक आनुपूर्वीसहित अपने
शिष्योंको पढ़ाया । वह एक सार्थक धर्मशास्त्र था ॥
पराशरउवाच
क्षान्तेन्द्रियेण दान्तेन शुचिनाचापलेन वै ।
अदुर्बलेन धीरेण नोत्तरोत्तरवादिना ॥
अलुब्धेनानृशंसेन ऋजुना ब्रह्मवादिना ।
चारित्रतत्परेणैव सर्वभूतहितात्मना ॥
अरयः षड् विजेतव्या नित्यं स्वं देहमाश्रिताः ।
कामक्रोधौ च लोभश्च मानमोहौ मदस्तथा ॥
पराशरने कहा –मनुष्यको चाहिये कि वह जितेन्द्रिय, मनोनिग्रही, पवित्र, चंचलतारहित, सबल, धैर्यशील, उत्तरोत्तर वाद-विवाद न करनेवाला, लोभहीन, दयालु, सरल, ब्रह्मवादी, सदाचारपरायण और सर्वभूतहितैषी होकर सदा अपने ही देहमें रहनेवाले काम, क्रोध, लोभ, मान, मोह और मद - इन छः शत्रुओंको अवश्य जीते ॥
विधिना धृतिमास्थाय शुश्रूषुरनहंकृतः ।
वर्णत्रयस्यानुमतो यथाशक्ति यथाबलम् ॥
कर्मणा मनसा वाचा चक्षुषा च चतुर्विधम् ।
आस्थाय नियमं धीमान् शान्तो दान्तो जितेन्द्रियः ॥
बुद्धिमान् मनुष्य विधिपूर्वक धैर्यका आश्रय ले गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर, अहंकारशून्य तथा तीनों वर्णोंकी सहानुभूतिका पात्र होकर अपनी शक्ति और बलके अनुसार कर्म, मन, वाणी और नेत्र – इन चारोंके द्वारा चार प्रकारके संयमका अवलम्बन ले शान्तचित्त, दमनशील एवं जितेन्द्रिय हो जाय ॥
नित्यं दक्षजनान्वेषी शेषान्नकृतभोजनः ।
वर्णत्रयान्मधु यथा भ्रमरो धर्ममाचरन् ॥
दक्ष—ज्ञानीजनोंका नित्य अन्वेषण करनेवाला यज्ञशेष अमृतरूप अन्नका भोजन करे । जैसे भौंरा फूलोंसे मधुका संचय करता है, उसी प्रकार तीनों वर्णोंसे मधुकरी भिक्षाका संचय करते हुए ब्राह्मण भिक्षुको धर्मका आचरण करना चाहिये ॥
स्वाध्यायधनिनो विप्राः क्षत्रियाणां बलं धनम् ।
वणिक्कृषिश्च वैश्यानां शूद्राणां परिचारिका ॥
व्युच्छेदात् तस्य धर्मस्य निरयायोपपद्यते । ब्राह्मणोंका धन है वेद- शास्त्रोंका स्वाध्याय, क्षत्रियोंका धन है बल, वैश्योंका धन है व्यापार और खेती, तथा शूद्रोंका धन है तीनों वर्णोंकी सेवा । इस धर्मरूपी धनका उच्छेद करनेसे मनुष्य नरकमें पड़ता है ॥
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ततो म्लेच्छा भवन्त्येते निर्घृणा धर्मवर्जिताः ॥ पुनश्च निरयं तेषां तिर्यग्योनिश्च शाश्वती । नरकसे निकलनेपर ये धर्मरहित निर्दय मनुष्य म्लेच्छ होते हैं और म्लेच्छ होनेके बाद फिर पापकर्म करनेसे उन्हें सदाके लिये नरक और पशु -पक्षी आदि तिर्यक् योनिकी प्राप्ति होती है ॥ ये तु सत्पथमास्थाय वर्णाश्रमकृतं पुरा ॥
सर्वान् विमार्गानुत्सृज्य स्वधर्मपथमाश्रिताः ।
सर्वभूतदयावन्तो दैवतद्विजपूजकाः ॥
शास्त्रदृष्टेन विधिना श्रद्धया जितमन्यवः ।
तेषां विधिं प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥
उपादानविधिं कृत्स्नं शुश्रूषाधिगमं तथा । जो लोग प्राचीन वर्णाश्रमोचित सन्मार्गका आश्रय ले सारे विपरीत मार्गोंका परित्याग करके स्वधर्मके मार्गपर चलते हैं, समस्त प्राणियोंके प्रति दया रखते हैं और क्रोधको जीतकर शास्त्रोक्त विधिसे श्रद्धापूर्वक देवताओं तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करते हैं, उनके लिये यथावत् रूपसे क्रमशः सम्पूर्ण धर्मोंके ग्रहणकी विधि तथा सेवाभावकी प्राप्ति आदिका वर्णन करता हूँ ॥ शौचकृत्यस्य शौचार्थान् सर्वानेव विशेषतः ॥ महाशौचप्रभृतयो दृष्टास्तत्त्वार्थदर्शिभिः । जो विशेषरूपसे शौचका सम्पादन करना चाहते हैं, उनके लिये सभी शौचविषयक प्रयोजनोंका वर्णन करता हूँ । तत्त्वदर्शी विद्वानोंने शास्त्रमें महाशौच आदि विधानोंको प्रत्यक्ष देखा है ॥ तत्रापि शूद्रो भिक्षूणां मृदं शेषं च कल्पयेत् ॥ वहाँ शूद्र भी भिक्षुओंके शौचाचारके लिये मिट्टी तथा अन्य आवश्यक पदार्थोंका प्रबन्ध करे ॥
भिक्षुभिः सुकृतप्रज्ञैः केवलं धर्ममाश्रितैः ।
सम्यग्दर्शनसम्पन्नैर्गताध्वनि हितार्थिभिः ॥
अवकाशमिदं मेध्यं निर्मितं कामवीरुधम् । जो धर्मके ज्ञाता, केवल धर्मके ही आश्रित तथा सम्यक् ज्ञानसे सम्पन्न हैं, उन सर्वहितैषी संन्यासियोंको चाहिये कि वे सज्जनाचरित मार्गपर स्थित हो इस पवित्र कामलतास्वरूप स्थान ( मलत्यागके योग्य क्षेत्र आदि) का निश्चय करे ॥ निर्जनं संवृतं बुद्ध्वा नियतात्मा जितेन्द्रियः ॥
सजलं भाजनं स्थाप्यं मृत्तिकां च परीक्षिताम् ।
परीक्ष्य भूमिं मूत्रार्थी तत आसीत वाग्यतः ॥
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मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह निर्जन एवं घिरे हुए स्थानको देखकर वहाँ सजल पात्र और देख- भाल कर ली हुई मृत्तिका रखे । फिर उस भूमिका भलीभाँति निरीक्षण करके मौन होकर मूत्र - त्यागके लिये बैठे ॥
उदङ्मुखो दिवा कुर्याद् रात्रौ चेद् दक्षिणामुखः ।
अन्तर्हितायां भूमौ तु अन्तर्हितशिरास्तथा ॥
यदि दिन हो तो उत्तरकी ओर मुँह करके और रात हो तो दक्षिणाभिमुख होकर मल या मूत्रका त्याग करे । मल त्याग करनेके पूर्व उस समय भूमिको तिनके आदिसे ढके रखना चाहिये तथा अपने मस्तकको भी वस्त्रसे आच्छादित किये रहना उचित है ॥
असमाप्ते तथा शौचे न वाचं किंचिदीरयेत् ।
कृतकृत्यस्तथाऽऽचम्य गच्छन्नोदीरयेद् वचः ॥
जबतक शौच - कर्म समाप्त न हो जाय तबतक मुँहसे कुछ न बोले, अर्थात् मौन रहे ।
शौच - कर्म पूरा करके भी आचमनके अनन्तर जाते समय मौन ही रहे ॥
शौचार्थमुपतिष्ठंस्तु मृद्भाजनपुरस्कृतः ।
स्थाप्यं कमण्डलुं गृह्य पार्श्वोरुभ्यामथान्तरे ॥
शौचं कुर्याच्छनैर्धीरो बुद्धिपूर्वमसंकरम् । शौचके लिये बैठा हुआ पुरुष अपने सामने मृत्तिका और जलपात्र रखे । धीर पुरुष कमण्डलुको हाथमें लिये हुए दाहिने पार्श्व और ऊरुके मध्यदेशमें रखे और सावधानीके साथ धीरे - धीरे मूत्र- त्याग करे, जिससे अपने किसी अंगपर उसका छींटा न पड़े ॥ पाणिना शुद्धमुदकं संगृह्य विधिपूर्वकम् ॥ विप्रुषश्च यथा न स्युर्यथा चोरू न संस्पृशेत् । तत्पश्चात् हाथसे विधिपूर्वक शुद्ध जल लेकर मूत्रस्थान ( उपस्थ ) को ऐसी सावधानीके साथ धोये, जिससे उसमें मूत्रकी बूँदें न लगी रह जायँ तथा अशुद्ध हाथसे दोनों जाँघोंका भी स्पर्श न करे ॥ अपाने मृत्तिकास्तिस्रः प्रदेयास्त्वनुपूर्वशः ॥ यथा घातो हि न भवेत् क्लेदजः परिधानके । यदि मल त्याग किया गया हो तो गुदाभागको धोते समय उसमें क्रमशः तीन बार मिट्टी लगाये । गुदाको शुद्ध करनेके लिये बारंबार इस प्रकार धोना चाहिये कि जलका आघात कपड़ेमें न लगे ॥ सव्ये द्वादश देयाः स्युस्तिस्रस्तिस्रः पुनः पुनः । तत्पश्चात् बायें हाथमें बारह बार और दाहिनेमें कई बार तीन - तीन बार मिट्टी लगावे ॥ मलोपहतचैलस्य द्विगुणं तु विधीयते ॥ सहपादमथोरुभ्यां हस्तशौचमसंशयम् ।
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जिसका कपड़ा मलसे दूषित हो गया है ऐसे पुरुषके लिये द्विगुण शौचका विधान है ।
उसे दोनों पैरों, दोनों जाँघों और दोनों हाथोंकी विशेष शुद्धि अवश्य करनी चाहिये ॥
अवधीरयमाणस्य संदेह उपजायते ।
यथा यथा विशुद्ध्येत तत् तथा तदुपक्रमेत् ॥
शौचका पालन न करनेसे शरीर शुद्धिके विषयमें संदेह बना रहता है । अतः जिस - जिस प्रकारसे शरीर- शुद्धि हो वैसे - ही - वैसे कार्य करनेकी चेष्टा करे ॥ क्षारौषराभ्यां वस्त्रस्य कुर्याच्छौचं मृदा सह ॥ लेपगन्धापनयनममेध्यस्य विधीयते । मिट्टीके साथ क्षार और रेह मिलाकर उसके द्वारा वस्त्रकी शुद्धि करनी चाहिये । जिसमें कोई अपवित्र वस्तु लग गयी हो उस वस्त्रसे उस वस्तुका लेप मिट जाय और उसकी दुर्गन्ध दूर हो जाय, ऐसी शुद्धिका सम्पादन आवश्यक होता है ॥ देयाश्चतस्रस्तिस्रो वा द्वे वाप्येकां तथाऽऽपदि ॥ कालमासाद्य देशं च शौचस्य गुरुलाघवम् । आपत्तिकालमें चार, तीन, दो अथवा एक बार मृत्तिका लगानी चाहिये । देश और कालके अनुसार शौचाचारमें गौरव अथवा लाघव किया जा सकता है ॥ विधिनानेन शौचं तु नित्यं कुर्यादतन्द्रितः ॥ अविप्रेक्षन्नसम्भ्रान्तः पादौ प्रक्षाल्य तत्परः । इस विधिसे प्रतिदिन आलस्यका परित्याग करके शौच ( शुद्धि ) का सम्पादन करे तथा शुद्धिका सम्पादन करनेवाला पुरुष दोनों पैरोंको धोकर इधर- उधर दृष्टि न डालता हुआ बिना किसी घबराहटके चला जाय ॥ सुप्रक्षालितपादस्तु पाणिमामणिबन्धनात् ॥ अधस्तादुपरिष्टाच्च ततः पाणिमुपस्पृशेत् । पहले पैरोंको भलीभाँति धोकर फिर कलाईसे लेकर समूचे हाथको ऊपरसे नीचेतक धो डाले । इसके बाद हाथमें जल लेकर आचमन करे ॥ मनोगतास्तु निश्शब्दा निश्शब्दं त्रिरपः पिबेत् ॥ द्विर्मुखं परिमृज्याच्च खानि चोपस्पृशेद् बुधः । आचमनके समय मौन होकर तीन बार जल पीये । उस जलमें किसी प्रकारकी आवाज न हो तथा आचमनके पश्चात् वह जल हृदयतक पहुँचे । विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह अंगूठेके मूलभागसे दो बार मुँह पोंछे । इसके बाद इन्द्रियोंके छिद्रोंका स्पर्श करे ॥
ऋग्वेदं तेन प्रीणाति प्रथमं यः पिबेदपः ।
द्वितीयं च यजुर्वेदं तृतीयं साम एव च ॥
वह प्रथम बार जो जल पीता है, उससे ऋग्वेदको तृप्त करता है, द्वितीय बारका जल यजुर्वेदको और तृतीय बारका जल सामवेदको तृप्त करता है ॥
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मृज्यते प्रथमं तेन अथर्वा प्रीतिमाप्नुयात् ॥ द्वितीयेनेतिहासं च पुराणस्मृतिदेवताः । पहली बार जो मुखका मार्जन किया जाता है, उससे अथर्ववेद तृप्त होता है और द्वितीय बारके मार्जनसे इतिहास - पुराण एवं स्मृतियोंके अधिष्ठाता देवता सन्तुष्ट होते हैं ॥ यच्चक्षुषि समाधत्ते तेनादित्यं तु प्रीणयेत् ॥ प्रीणाति वायुं घ्राणं च दिशश्चाप्यथ श्रोत्रयोः । मुखमार्जनके पश्चात् द्विज जो अंगुलियोंसे नेत्रोंका स्पर्श करता है, उसके द्वारा वह सूर्यदेवको तृप्त करता है । नासिकाके स्पर्शसे वायुको और दोनों कानोंके स्पर्शसे वह दिशाओंको संतुष्ट करता है ॥ ब्रह्माणं तेन प्रीणाति यन्मूर्धनि समालभेत् ॥ समुत्क्षिपति चापोर्ध्वमाकाशं तेन प्रीणयेत् । आचमन करनेवाला पुरुष अपने मस्तकपर जो हाथ रखता है, उसके द्वारा वह ब्रह्माजीको तृप्त करता है और ऊपरकी ओर जो जल फेंकता है, उसके द्वारा वह आकाशके अधिष्ठाता देवताको संतुष्ट करता है ॥ प्रीणाति विष्णुः पद्भ्यां तु सलिलं वै समादधत् ॥
प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि अन्तर्जानुरुपस्पृशेत् ।
सर्वत्र विधिरित्येष भोजनादिषु नित्यशः ॥
वह अपने दोनों पैरोंपर जो जल डालता है, इससे भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं । आचमन करनेवाला पुरुष पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके अपने हाथको घुटनेके भीतर रखकर जलका स्पर्श करे । भोजन आदि सभी अवसरोंपर सदा आचमन करनेकी यही विधि है ॥
अन्नेषु दन्तलग्नेषु उच्छिष्टः पुनराचमेत् ।
विधिरेष समुद्दिष्टः शौचे चाभ्युक्षणं स्मृतम् ॥
यदि दाँतोंमें अन्न लगा हो तो अपनेको जूठा मानकर पुनः आचमन करे, यह शौचाचारकी विधि बतायी गयी । किसी वस्तुकी शुद्धिके लिये उसपर जल छिड़कना भी कर्तव्य माना गया है ॥
शूद्रस्यैष विधिर्दृष्टो गृहान्निष्क्रमतः सतः ।
नित्यं चालुप्तशौचेन वर्तितव्यं कृतात्मना ॥
यशस्कामेन भिक्षुभ्यः शूद्रेणात्महितार्थिना ॥
( साधु - सेवाके उद्देश्यसे ) घरसे निकलते समय शूद्रके लिये भी यह शौचाचारकी विधि देखी गयी है । जिसने मनको वशमें किया है तथा जो अपने हितकी इच्छा रखता है, ऐसे सुयशकामी शूद्रको चाहिये कि वह सदा शौचाचारसे सम्पन्न होकर ही संन्यासियोंके निकट जाय और उनकी सेवा आदिका कार्य करे ॥