श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 851–860
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 851–860
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न चायुक्तेन शक्योऽयं द्रष्टुं देहे महेश्वरः ॥ युक्तस्तु पश्यते बुद्ध्या संनिवेश्य मनो हृदि । जो योगयुक्त नहीं है ऐसा पुरुष अपने हृदयमें विराजमान उस महेश्वरका साक्षात्कार नहीं कर सकता । योगयुक्त पुरुष ही मनको हृदयमें स्थापित करके बुद्धिके द्वारा उस अन्तर्यामी परमात्माका दर्शन करता है ॥ अथ त्वेवं न शक्नोति कर्तुं हृदयधारणम् ॥ यथासांख्यमुपासीत यथावद् योगमास्थितः । यदि इस प्रकार हृदयदेशमें ध्यान- धारणा न कर सके तो यथावत्रूपसे योगका आश्रय ले सांख्यशास्त्रके अनुसार उपासना करे ॥ पञ्च बुद्धीन्द्रियाणीह पञ्च कर्मेन्द्रियाण्यपि ॥ पञ्च भूतविशेषाश्च मनश्चैव तु षोडश । इस शरीरमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच भूत और सोलहवाँ मन — ये सोलह विकार हैं ॥ तन्मात्राण्यपि पञ्चैव मनोऽहंकार एव च ॥
अष्टमं चाप्यथाव्यक्तमेताः प्रकृतिसंज्ञिताः ।
पाँच तन्मात्राएँ, मन, अहंकार और अव्यक्त — ये आठ प्रकृतियाँ हैं ॥
एताः प्रकृतयश्चाष्टौ विकाराश्चापि षोडश ॥
एवमेतदिहस्थेन विज्ञेयं तत्त्वबुद्धिना ।
एवं वर्ष्म समुत्तीर्य तीर्णो भवति नान्यथा ॥
ये आठ प्रकृतियाँ और पूर्वोक्त सोलह विकार- इन चौबीस तत्त्वोंको यहाँ रहनेवाले तत्त्वज्ञ पुरुषको जानना चाहिये । इस प्रकार प्रकृति-पुरुषका विवेक हो जानेसे मनुष्य शरीरके बन्धनसे ऊपर उठकर भवसागरसे पार हो जाता है, अन्यथा नहीं ॥
परिसंख्यानमेवैतन्मन्तव्यं ज्ञानबुद्धिना ।
अहन्यहनि शान्तात्मा पावनाय हिताय च ॥
एवमेव प्रसंख्याय तत्त्वबुद्धिर्विमुच्यते । ज्ञानयुक्त बुद्धिवाले पुरुषको यही सांख्ययोग मानना चाहिये । प्रतिदिन शान्तचित्त हो अपने अन्तःकरणको पवित्र बनाने और अपना हित साधन करनेके लिये इसी प्रकार उपर्युक्त तत्त्वोंका विचार करनेसे मनुष्यको यथार्थ तत्त्वका बोध हो जाता है और वह बन्धनसे छूट जाता है ॥ निष्कलं केवलं भवति शुद्धतत्त्वार्थतत्त्ववित् ॥ शुद्ध तत्त्वार्थको तत्त्वसे जाननेवाला पुरुष अवयवरहित अद्वितीय ब्रह्म हो जाता है ॥ सत्संनिकर्षे परिवर्तितव्यं विद्याधिकाश्चापि निषेवितव्याः ।
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सवर्णतां गच्छति संनिकर्षा- न्नीलः खगो मेरुमिवाश्रयन् वै ॥ मनुष्यको सेदा सत्पुरुषोंके समीप रहना चाहिये । विद्यामें बड़े चढ़े पुरुषोंका सेवन करना चाहिये । जो जिसके निकट रहता है, उसके समान वर्णका हो जाता है । जैसे नील पक्षी मेरु पर्वतका आश्रय लेनेसे सुवर्णके समान रंगका हो जाता है ॥ भीष्म उवाच इत्येवमाख्याय महामुनिस्तदा चतुर्षु वर्णेषु विधानमर्थवित् । शुश्रूषया वृत्तगतिं समाधिना समाधियुक्तः प्रययौ स्वमाश्रमम् ॥ भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! शास्त्रोंके तात्पर्यको जाननेवाले महामुनि पराशर इस प्रकार चारों वर्णोंके लिये कर्तव्यका विधान बताकर तथा शुश्रूषा और समाधिसे प्राप्त होनेवाली गतिका निरूपण करके एकाग्रचित्त हो अपने आश्रमको चले गये ॥ (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त ) [ सबके पूजनीय और वन्दनीय कौन हैं - इस विषयमें इन्द्र और मातलिका संवाद ] युधिष्ठिर उवाच
केषां देवा महाभागाः संनमन्ते महात्मनाम् ।
लोकेऽस्मिंस्तानृषीन् सर्वान् श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! इस लोकमें महाभाग देवता किन महात्माओंको मस्तक झुकाते हैं? मैं उन समस्त ऋषियोंका यथार्थ परिचय सुनना चाहता हूँ ॥ भीष्म उवाच
इतिहासमिमं विप्राः कीर्तयन्ति पुराविदः ।
अस्मिन्नर्थे महाप्राज्ञास्तं निबोध युधिष्ठिर ॥
भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! इस विषय में प्राचीन बातोंको जाननेवाले महाज्ञानी
ब्राह्मण इस इतिहासका वर्णन करते हैं । तुम उस इतिहासको सुनो ॥
वृत्रं हत्वाप्युपावृत्तं त्रिदशानां पुरस्कृतम् ।
महेन्द्रमनुसम्प्राप्तं स्तूयमानं महर्षिभिः ॥
श्रिया परमया युक्तं रथस्थं हरिवाहनम् ।
मातलिः प्राञ्जलिर्भूत्वा देवमिन्द्रमुवाच ह ॥
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जब इन्द्र वृत्रासुरको मारकर लौटे, उस समय देवता उन्हें आगे करके खड़े थे । महर्षिगण महेन्द्रकी स्तुति करते थे । हरित वाहनोंवाले देवराज इन्द्र रथपर बैठकर उत्तम
शोभासे सम्पन्न हो रहे थे । उसी समय मातलिने हाथ जोड़कर देवराज इन्द्रसे कहा ॥
मातलिरुवाच
नमस्कृतानां सर्वेषां भगवंस्त्वं पुरस्कृतः ।
येषां लोके नमस्कुर्यात् तान् ब्रवीतु भवान् मम ॥
मातलि बोले — भगवन्! जो सबके द्वारा वन्दित होते हैं, उन समस्त देवताओंके आप अगुआ हैं; परन्तु आप भी इस जगत् में जिनको मस्तक झुकाते हैं, उन महात्माओंका मुझे परिचय दीजिये ॥ भीष्म उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा देवराजः शचीपतिः ।
यन्तारं परिपृच्छन्तं तमिन्द्रः प्रत्युवाच ह ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! मातलिकी वह बात सुनकर शचीपति देवराज इन्द्रने उपर्युक्त प्रश्न पूछनेवाले अपने सारथिसे इस प्रकार कहा ॥ इन्द्र उवाच
धर्मं चार्थं च कामं च येषां चिन्तयतां मतिः ।
नाधर्मे वर्तते नित्यं तान् नमस्यामि मातले ॥
इन्द्र बोले — मातले! धर्म, अर्थ और कामका चिन्तन करते हुए भी जिनकी बुद्धि कभी अधर्ममें नहीं लगती, मैं प्रतिदिन उन्हींको नमस्कार करता हूँ ॥
ये रूपगुणसम्पन्नाः प्रमदाहृदयंगमाः ।
निवृत्ताः कामभोगेषु तान् नमस्यामि मातले ॥
मातले! जो रूप और गुणसे सम्पन्न हैं तथा युवतियोंके हृदय - मन्दिरमें हठात् प्रवेश कर जाते हैं — अर्थात् जिन्हें देखते ही युवतियाँ मोहित हो जाती हैं, ऐसे पुरुष यदि काम - भोगसे दूर रहते हैं तो मैं उनके चरणोंमें नमस्कार करता हूँ ॥
स्वेषु भोगेषु संतुष्टाः सुवाचो वचनक्षमाः ।
अमानकामाश्चार्ध्यार्हास्तान् नमस्यामि मातले ॥
मातले! जो अपनेको प्राप्त हुए भोगोंमें ही संतुष्ट हैं – दूसरोंसे अधिककी इच्छा नहीं रखते । जो सुन्दर वाणी बोलते हैं और प्रवचन करनेमें कुशल हैं, जिनमें अहंकार और कामनाका सर्वथा अभाव है तथा जो सबसे अर्घ्य पानेके योग्य हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ ॥ धनं विद्यास्तथैश्वर्यं येषां न चलयेन्मतिम् ।
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चलितां ये निगृह्णन्ति तान् नित्यं पूजयाम्यहम् ॥ धन, विद्या और ऐश्वर्य जिनकी बुद्धिको विचलित नहीं कर सकते तथा जो चंचल हुई बुद्धिको भी विवेकसे काबूमें कर लेते हैं, उनकी मैं नित्य पूजा करता हूँ ॥
इष्टैदरैिरुपेतानां शुचीनामाग्निहोत्रिणाम् ।
चतुष्पादकुटुम्बानां मातले प्रणमाम्यहम् ॥
मातले! जो प्रिय पत्नीसे युक्त हैं, पवित्र आचार-विचारसे रहते हैं, नित्य अग्निहोत्र करते हैं और जिनके कुटुम्बमें चौपायों ( गौ आदि पशुओं ) का भी पालन होता है, उनको मैं नमस्कार करता हूँ ॥
येषामर्थस्तथा कामो धर्ममूलविवर्धितः ।
धर्मार्थौ यस्य नियतौ तान् नमस्यामि मातले ॥
मातले! जिनका अर्थ और काम धर्ममूलक होकर वृद्धिको प्राप्त हुआ है तथा जिसके धर्म और अर्थ नियत हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ ॥
धर्ममूलार्थकामानां ब्राह्मणानां गवामपि ।
पतिव्रतानां नारीणां प्रणामं प्रकरोम्यहम् ॥
धर्ममूलक धनकी कामना रखनेवाले ब्राह्मणोंको तथा गौओं और पतिव्रता नारियोंको मैं नित्य प्रणाम करता हूँ ॥
ये भुक्त्वा मानुषान् भोगान् पूर्वे वयसि मातले ।
तपसा स्वर्गमायान्ति शश्वत् तान् पूजयाम्यहम् ॥
मातले! जो जीवनकी पूर्व अवस्थामें मानवभोगोंका उपभोग करके तपस्याद्वारा स्वर्गमें आते हैं, उनका मैं सदा ही पूजन करता हूँ ॥
असम्भोगान्न चासक्तान् धर्मनित्याञ्जितेन्द्रियान् ।
संन्यस्तानचलप्रख्यान् मनसा पूजयामि तान् ॥
जो भोगोंसे दूर रहते हैं, जिनकी कहीं भी आसक्ति नहीं है, जो सदा धर्ममें तत्पर रहते हैं, इन्द्रियोंको काबूमें रखते हैं, जो सच्चे संन्यासी हैं और पर्वतोंके समान कभी विचलित नहीं होते हैं, उन श्रेष्ठ पुरुषोंकी मैं मनसे पूजा करता हूँ ॥
ज्ञानप्रसन्नविद्यानां निरूढं धर्ममिच्छताम् ।
परैः कीर्तितशौचानां मातले तान् नमाम्यहम् ॥
मातले! जिनकी विद्या ज्ञानके कारण स्वच्छ है, जो सुप्रसिद्ध धर्मके पालनकी इच्छा रखते हैं तथा जिनके शौचाचारकी प्रशंसा दूसरे लोग करते हैं, उनको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
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[ सरोवर खोदाने और वृक्ष लगानेका माहात्म्य ] युधिष्ठिरउवाच
संस्कृतानां तटाकानां यत् फल कुरुपुंगव ।
तदहं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तोऽद्य भरतर्षभ ॥
युधिष्ठिरने कहा – कुरुपुंगव! भरतश्रेष्ठ! सरोवरोंके बनानेका जो फल है, उसे आज मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ ॥ भीष्म उवाच
सुप्रदर्शो धनपतिश्चित्रधातुविभूषितः ।
त्रिषु लोकेषु सर्वत्र पूजितो यस्तटाकवान् ॥
भीष्मजी ने कहा- राजन्! जो तालाब बनवाता है वह पुरुष विचित्र धातुओंसे विभूषित धनाध्यक्ष कुबेरके समान दर्शनीय है । वह तीनों लोकोंमें सर्वत्र पूजित होता है ॥
इह चामुत्र सदनं पुत्रीयं वित्तवर्धनम् ।
कीर्तिसंजननं श्रेष्ठं तटाकानां निवेशनम् ॥
तालाबका संस्थापन श्रेष्ठ एवं कीर्तिजनक है । वह इस लोक और परलोकमें भी उत्तम निवासस्थान है । वह पुत्रका घर तथा धनकी वृद्धि करनेवाला है ॥
धर्मस्यार्थस्य कामस्य फलमाहुर्मनीषिणः ।
तटाकं सुकृतं देशे क्षेत्रे देशसमाश्रयम् ॥
मनीषी पुरुषोंने सरोवरोंको धर्म, अर्थ और काम तीनोंका फल देनेवाला बताया है ।
तालाब देशमें मूर्तिमान् पुण्यस्वरूप है और क्षेत्रमें देशका भारी आश्रय है ॥
चतुर्विधानां भूतानां तटाकमुपलक्षये ।
तटाकानि च सर्वाणि दिशन्ति श्रियमुत्तमाम् ॥
मैं तालाबको चारों ( स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, जरायुज) प्रकारके प्राणियोंके लिये उपयोगी देखता हूँ । जगत्में जितने भी सरोवर हैं, वे सभी उत्तम सम्पत्ति प्रदान करते हैं ॥
देवा मनुष्या गन्धर्वाः पितरोरगराक्षसाः ।
स्थावराणि च भूतानि संश्रयन्ति जलाशयम् ॥
देवता, मनुष्य, गन्धर्व, पितर, नाग, राक्षस तथा स्थावर भूत-ये सभी जलाशयका आश्रय लेते हैं ॥
तस्मात्तांस्ते प्रवक्ष्यामि तटाके ये गुणाः स्मृताः ।
या च तत्र फलप्राप्ती ऋषिभिः समुदाहृता ॥
अतः सरोवर खोदवानेमें जो गुण हैं, उन सबका मैं तुमसे वर्णन करूँगा तथा ऋषियोंने तालाब खोदानेसे जिन फलोंकी प्राप्ति बतायी है, उनका भी परिचय दे रहा हूँ ॥ वर्षमात्रं तटाके तु सलिलं यत्र तिष्ठति ।
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अग्निहोत्रफलं तस्य फलमाहुर्मनीषिणः ॥ जिस सरोवरमें एक वर्षतक पानी ठहरता है, उसका फल मनीषी पुरुषोंने अग्निहोत्र बताया है अर्थात् उसे खोदानेवालेको प्रतिदिन अग्निहोत्र करनेका पुण्य प्राप्त होता है ॥
निदाघकाले सलिलं तटाके यस्य तिष्ठति ।
वाजपेयफलं तस्य फलं वै ऋषयोऽब्रुवन् ॥
जिसके तालाबमें गर्मीभर जल रहता है, उसके लिये ऋषियोंने वाजपेय यज्ञके फलकी प्राप्ति बतायी है ॥
सकुलं तारयेद् वंशं यस्य खाते जलाशये ।
गावः पिबन्ति पानीयं साधवश्च नसः सदा ॥
जिसके खोदवाये हुए सरोवरमें सदा साधुपुरुष तथा गौएँ पानी पीती हैं, वह अपने कुलको तार देता है ॥
तटाके यस्य गावस्तु पिबन्ति तृषिता जलम् ।
मृगपक्षिमनुष्याश्च सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥
जिसके जलाशयमें प्यासी गौएँ पानी पीती हैं तथा तृषित मृग, पक्षी एवं मनुष्य अपनी प्यास बुझाते हैं, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है ॥
यत् पिबन्ति जलं तत्र स्नायन्ते विश्रमन्ति च ।
तटाककर्तुस्तत् सर्वं प्रेत्यानन्त्याय कल्पते ॥
मनुष्य उस तालाबमें जो जल पीते, स्नान करते और तटपर विश्राम लेते हैं, वह सारा पुण्य सरोवर बनवानेवालेको परलोकमें अक्षय होकर मिलता है ॥
दुर्लभं सलिलं तात विशेषेण परंतप ।
पानीयस्य प्रदानेन सिद्धिर्भवति शाश्वती ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले तात! जल विशेषरूपसे दुर्लभ वस्तु है; अतः जलदान करनेसे शाश्वत सिद्धि प्राप्त होती है ॥
तिलान् ददत पानीयं दीपमन्नं प्रतिश्रयम् ।
बान्धवैः सह मोदध्वमेतत् प्रेतेषु दुर्लभम् ॥
तिल, जल, दीप, अन्न और रहनेके लिये घर दान करो, तथा बन्धु बान्धवोंके साथ सदा आनन्दित रहो, क्योंकि ये सब वस्तुएँ मरे हुओंके लिये दुर्लभ हैं ॥
सर्वदानैर्गुरुतरं सर्वदानैर्विशिष्यते ।
पानीयं नरशार्दूल तस्माद् दातव्यमेव हि ॥
नरश्रेष्ठ! जलका दान सभी दानोंसे गुरुतर है । वह समस्त दानोंसे बढ़कर है; अतः उसका दान अवश्य ही करना चाहिये ॥
एवमेतत् तटाकेषु कीर्तितं फलमुत्तमम् ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वृक्षाणामपि रोपणे ॥
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इस प्रकार यह सरोवर खोदानेका उत्तम फल बताया गया है । इसके बाद वृक्ष लगानेका फल भली प्रकार बताऊँगा ॥
स्थावराणां तु भूतानां जातयः षट् प्रकीर्तिताः ।
वृक्षगुल्मलतावल्ल्यस्त्वक्सारतॄणवीरुधः ॥
एता जात्यस्तु वृक्षाणामेषां रोपगुणास्त्विमे । स्थावर भूतोंकी छः जातियाँ बतायी गयी हैं - वृक्ष, गुल्म, लता, वल्ली, त्वक्सार तथा
तृण, वीरुध — ये वृक्षोंकी जातियाँ हैं । इनके लगानेसे ये - ये गुण बताये गये हैं ॥
पनसाम्रादयो वृक्षा गुल्मा मन्दारपूर्वकाः ॥
नागिकामलियावल्ल्यो मालतीत्यादिका लताः ।
वेणुक्रमुकत्वक्साराः सस्यानि तृणजातयः ॥
कटहल और आम आदि वृक्ष जातिके अन्तर्गत हैं । मन्दार आदि गुल्म कोटिमें माने गये हैं । नागिका, मलिया आदि वल्लीके अन्तर्गत हैं । मालती आदि लताएँ हैं । बाँस और सुपारी आदिके पेड़ त्वक्सार जातिके अन्तर्गत हैं । खेतमें जो घास और अनाज उगते हैं, वे सब तृण जातिमें अन्तर्भूत हैं ॥
कीर्तिश्च मानुषे लोके प्रेत्य चैव शुभं फलम् ।
लभ्यते नाकपृष्ठे च पितृभिश्च महीयते ॥
देवलोकगतस्यापि नाम तस्य न नश्यति ।
अतीतानागतांश्चैव पितृवंशांश्च भारत ॥
तारयेद् वृक्षरोपी तु तस्माद् वृक्षान् प्ररोपयेत् । भरतनन्दन! वृक्ष लगानेसे मनुष्यलोकमें कीर्ति बनी रहती है और मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें शुभ फलकी प्राप्ति होती है । वृक्ष लगानेवाला पुरुष पितरोंद्वारा भी सम्मानित होता है । देवलोकमें जानेपर भी उसका नाम नहीं नष्ट होता । वह अपने बीते हुए पूर्वजों और
आनेवाली संतानोंको भी तार देता है । अतः वृक्ष अवश्य लगाने चाहिये ॥
तस्य पुत्रा भवन्त्येव पादपा नात्र संशयः ॥
परलोकगतः स्वर्गे लोकांश्चाप्नोति सोऽव्ययान् । जिसके कोई पुत्र नहीं हैं, उसके भी वृक्ष ही पुत्र होते हैं; इसमें संशय नहीं है । वृक्ष लगानेवाला पुरुष परलोकमें जानेपर स्वर्गमें अक्षय लोकोंको प्राप्त होता है ॥ पुष्पैः सुरगणान् वृक्षाः फलैश्चापि तथा पितॄन् ॥ छायया चातिथींस्तात पूजयन्ति महीरुहाः । तात! वृक्ष अपने फूलोंसे देवताओंका, फलोंसे पितरोंका तथा छायासे अतिथियोंका सदा पूजन करते रहते हैं ॥ किन्नरोरगरक्षांसि देवगन्धर्वमानवाः ॥ तथा ऋषिगणाश्चैव संश्रयन्ते महीरुहान् ।
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किन्नर, नाग, राक्षस, देव, गन्धर्व, मनुष्य तथा ऋषिगण भी वृक्षोंका आश्रय लेते हैं ॥ पुष्पिताः फलवन्तश्च तर्पयन्तीह मानवान् ॥
वृक्षदान् पुत्रवद् वृक्षाः तारयन्ति परत्र च ।
तस्मात् तटाके वृक्षा वै रोप्याः श्रेयोऽर्थिना सदा ॥
फल और फूलोंसे भरे हुए वृक्ष इस जगत् में मनुष्योंको तृप्त करते हैं । जो वृक्ष दान करते हैं, उनके वे वृक्ष परलोकमें पुत्रकी भाँति पार उतारते हैं । अतः कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको सदा ही सरोवरके किनारे वृक्ष लगाना चाहिये ॥
पुत्रवत् परिरक्ष्याश्च पुत्रास्ते धर्मतः स्मृताः ।
तटाककृद् वृक्षरोपी इष्टयज्ञश्च यो द्विजः ॥
एते स्वर्गे महीयन्ते ये चान्ये सत्यवादिनः । वृक्ष लगाकर उनकी पुत्रोंकी भाँति रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि वे धर्मतः पुत्र माने गये हैं । जो तालाब बनवाता है और जो उसके किनारे वृक्ष लगाता है, जो द्विज यज्ञका अनुष्ठान करता है तथा दूसरे जो लोग सत्यभाषण करनेवाले हैं - वे सब- के -सब स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होते हैं ॥ तस्मात् तटाकं कुर्वीत आरामांश्चापि योजयेत् ॥ यजेच्च विविधैर्यज्ञैः सत्यं च विधिवद् वदेत् । इसलिये सरोवर खोदावे और उसके तटपर बगीचे भी लगावे । सदा नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करे और विधिपूर्वक सत्य बोले ॥ (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त ) इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि छत्रोपानहदानप्रशंसा नाम षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें छत्रदान और उपानहदानकीप्रशंसानामक छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ६ ॥ ( दाक्षिणात्य अधिक पाठका १७५३ श्लोक मिलाकर कुल १ ९ ७३ श्लोक हैं ) 0
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सप्तनवतितमोऽध्यायः गृहस्थधर्म, पञ्चयज्ञ कर्मके विषयमें पृथ्वीदेवी और भगवान् श्रीकृष्णका संवाद युधिष्ठिर उवाच
गार्हस्थ्यं धर्ममखिलं प्रब्रूहि भरतर्षभ ।
ऋद्धिमाप्नोति किं कृत्वा मनुष्य इह पार्थिव ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा - भरतश्रेष्ठ! पृथ्वीनाथ! अब आप मुझे गृहस्थ आश्रमके सम्पूर्ण धर्मोंका उपदेश कीजिये । मनुष्य कौन-सा कर्म करके इहलोकमें समृद्धिका भागी होता है? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्र ते वर्तयिष्यामि पुरावृत्तं जनाधिप ।
वासुदेवस्य संवादं पृथिव्याश्चैव भारत ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— नरेश्वर! भरतनन्दन! इस विषयमें भगवान् श्रीकृष्ण और पृथ्वीका संवादरूप एक प्राचीन वृत्तान्त बता रहा हूँ ॥ २ ॥
संस्तुत्य पृथिवीं देवीं वासुदेवः प्रतापवान् ।
पप्रच्छ भरतश्रेष्ठ मां त्वं यत् पृच्छसेऽद्य वै ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! प्रतापी भगवान् श्रीकृष्णने पृथ्वी -देवीकी स्तुति करके उनसे यही बात पूछी थी, जो आज तुम मुझसे पूछते हो ॥ ३ ॥
वासुदेव उवाच
गार्हस्थ्यं धर्ममाश्रित्य मया वा मद्विधेन वा ।
किमवश्यं धरे कार्यं किं वा कृत्वा कृतं भवेत् ॥ ४ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने पूछा- वसुन्धरे! मुझको या मेरे जैसे किसी दूसरे मनुष्यको गार्हस्थ्य - धर्मका आश्रय लेकर किस कर्मका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये? क्या करनेसे गृहस्थको सफलता मिलती है? ॥ ४ ॥
पृथिव्युवाच
ऋषयः पितरो देवा मनुष्याश्चैव माधव ।
इज्याश्चैवार्चनीयाश्च यथा चैव निबोध मे ॥ ५ ॥
पृथ्वीने कहा – माधव! गृहस्थ पुरुषको सदा ही देवताओं, पितरों, ऋषियों और अतिथियोंका पूजन एवं सत्कार करना चाहिये । यह सब कैसे करना चाहिये! सो बता रही
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हूँ; सुनिये ॥ ५ ॥
सदा यज्ञेन देवाश्च सदाऽऽतिथ्येन मानुषाः ।
छन्दतश्च यथा नित्यमर्हान् भुञ्जीत नित्यशः ॥ ६ ॥
प्रतिदिन यज्ञ- होमके द्वारा देवताओंका अतिथि सत्कारके द्वारा मनुष्योंका ( श्राद्ध-तर्पण करके पितरोंका ) तथा वेदोंका नित्य स्वाध्याय करके पूजनीय ऋषि- महर्षियोंका यथाविधि पूजन और सत्कार करना चाहिये । इसके बाद नित्य भोजन करना उचित है ॥ ६ ॥
तेन ह्यृषिगणाः प्रीता भवन्ति मधुसूदन ।
नित्यमग्निं परिचरेदभुक्त्वा बलिकर्म च ॥ ७ ॥
कुर्यात् तथैव देवा वै प्रीयन्ते मधुसूदन ।
कुर्यादहरहः श्राद्धमन्नाद्येनोदकेन च ॥ ८ ॥
पयोमूलफलैर्वापि पितॄणां प्रीतिमाहरन् । मधुसूदन! स्वाध्यायसे ऋषियोंको बड़ी प्रसन्नता होती है । प्रतिदिन भोजनके पहले ही अग्निहोत्र एवं बलिवैश्वदेव कर्म करे । इससे देवता संतुष्ट होते हैं । पितरोंकी प्रसन्नताके लिये प्रतिदिन अन्न, जल, दूध अथवा फल- मूलके द्वारा श्राद्ध करना उचित है ॥ ७-८३ ॥ सिद्धान्नाद् वैश्वदेवं वै कुर्यादग्नौ यथाविधि ॥ ९ ॥
सिद्ध अन्न ( तैयार हुई रसोई) मेंसे अन्न लेकर उसके द्वारा विधिपूर्वक बलिवैश्वदेव कर्म करना चाहिये ॥ ९ ॥
अग्नीषोमं वैश्वदेवं धान्वन्तर्यमनन्तरम् ।
प्रजानां पतये चैव पृथग्घोमो विधीयते ॥ १० ॥
पहले अग्नि और सोमको, फिर विश्वेदेवोंको, तदनन्तर धन्वन्तरिको, तत्पश्चात् प्रजापतिको पृथक् - पृथक् आहुति देनेका विधान है ॥ १० ॥
तथैव चानुपूर्व्येण बलिकर्म प्रयोजयेत् ।
दक्षिणायां यमायेति प्रतीच्यां वरुणाय च ॥ ११ ॥
सोमाय चाप्युदीच्यां वै वास्तुमध्ये प्रजापतेः ।
धन्वन्तरेः प्रागुदीच्यां प्राच्यां शक्राय माधव ॥ १२ ॥
इसी प्रकार क्रमशः बलिकर्मका प्रयोग करे । माधव! दक्षिण दिशामें यमको, पश्चिममें वरुणको, उत्तर दिशामें सोमको, वास्तुके मध्यभागमें प्रजापतिको, ईशानकोणमें धन्वन्तरिको और पूर्वदिशामें इन्द्रको बलि समर्पित करे ॥ ११-१२ ॥
मनुष्येभ्य इति प्राहुर्बलिं द्वारि गृहस्य वै ।
मरुद्भ्यो दैवतेभ्यश्च बलिमन्तर्गृहे हरेत् ॥ १३ ॥
घरके दरवाजेपर सनकादि मनुष्योंके लिये बलि देनेका विधान है । मरुद्गणों तथा देवताओंको घरके भीतर बलि समर्पित करनी चाहिये ॥ १३ ॥