06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 971–980
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 971–980
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नवाधिकशततमोऽध्यायः प्रत्येक मासकी द्वादशी तिथिको उपवास और भगवान् विष्णुकी पूजा करनेका विशेष माहात्म्य युधिष्ठिर उवाच
सर्वेषामुपवासानां यच्छ्रेयः सुमहत्फलम् ।
यच्चाप्यसंशयं लोके तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा – पितामह! समस्त उपवासोंमें जो सबसे श्रेष्ठ और महान् फल देनेवाला है तथा जिसके विषयमें लोगोंको कोई संशय नहीं है, वह आप मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
शृणु राजन् यथा गीतं स्वयमेव स्वयम्भुवा ।
यत् कृत्वा निर्वृतो भूयात् पुरुषो नाज संशयः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! स्वयम्भू भगवान् विष्णुने इस विषयमें जैसा कहा है, उसे बताता हूँ, सुनो । उसका अनुष्ठान करके पुरुष परम सुखी हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ २ ॥
द्वादश्यां मार्गशीर्षे तु अहोरात्रेण केशवम् ।
अर्च्याश्वमेधं प्राप्नोति दुष्कृतं चास्य नश्यति ॥ ३ ॥
मार्गशीर्षमासमें द्वादशी तिथिको दिन - रात उपवास करके भगवान् केशवकी पूजा- अर्चा करनेसे मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पा लेता है और उसका सारा पाप नष्ट हो जाता है ॥ ३ ॥
तथैव पौषमासे तु पूज्यो नारायणेति च ।
वाजपेयमवाप्नोति सिद्धिं च परमां व्रजेत् ॥ ४ ॥
इसी प्रकार पौषमासमें द्वादशी तिथिको उपवासपूर्वक भगवान् नारायणकी पूजा करनी चाहिये । ऐसा करनेवाले पुरुषको वाजपेय यज्ञका फल मिलता है और वह परम सिद्धिको प्राप्त हो जाता है ॥ ४ ॥
अहोरात्रेण द्वादश्यां माघमासे तु माधवम् राजसूयमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ५ ॥
माघमासकी द्वादशी तिथिको दिन- रात उपवास करके भगवान् माधवक पूजा करनेसे उपासकको राजसूय यज्ञका फल प्राप्त होता है और वह अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ५ ॥
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तथैव फाल्गुने मासि गोविन्देति च पूजयन् ।
अतिरात्रमवाप्नोति सोमलोकं च गच्छति ॥ ६ ॥
इसी तरह फाल्गुनमासकी द्वादशी तिथिको उपवासपूर्वक गोविन्द नामसे भगवान्की पूजा करनेवाला पुरुष अतिरात्र यज्ञका फल पाता है और मृत्युके पश्चात् सोमलोकमें जाता ॥ ६ ॥
अहोरात्रेण द्वादश्यां चैत्रे विष्णुरिति स्मरन् ।
पौण्डरीकमवाप्नोति देवलोकं च गच्छति ॥ ७ ॥
चैत्रमासकी द्वादशी तिथिको दिन - रात उपवास करके विष्णुनामसे भगवान्का चिन्तन करनेवाला मनुष्य पौण्डरीक यज्ञका फल पाता है और देवलोकमें जाता है ॥ ७ ॥
वैशाखमासे द्वादश्यां पूजयन् मधुसूदनम् ।
अग्निष्टोममवाप्नोति सोमलोकं च गच्छति ॥ ८ ॥
वैशाखमासकी द्वादशी तिथिको उपवासपूर्वक भगवान् मधुसूदनका पूजन करनेवाला पुरुष अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता और सोमलोकमें जाता है ॥ ८ ॥
अहोरात्रेण द्वादश्यां ज्येष्ठे मासि त्रिविक्रमम् ।
गवां मेधमवाप्नोति अप्सरोभिश्च मोदते ॥ ९ ॥
ज्येष्ठमासकी द्वादशी तिथिको दिन - रात उपवास करके जो भगवान् त्रिविक्रमकी पूजा करता है, वह गोमेधयज्ञका फल पाता और अप्सराओंके साथ आनन्द भोगता है ॥
आषाढे मासि द्वादश्यां वामनेति च पूजयन् ।
नरमेधमवाप्नोति पुण्यं च लभते महत् ॥ १० ॥
आषाढ़मासकी द्वादशी तिथिको उपवासपूर्वक वामन नामसे भगवान्का पूजन करनेवालापुरुष नरमेध यज्ञका फल पाता और महान् पुण्यका भागी होता है ॥ १० ॥
अहोरात्रेण द्वादश्यां श्रावणे मासि श्रीधरम् ।
पञ्चयज्ञानवाप्नोति विमानस्थश्च मोदते ॥ ११ ॥
श्रावणमासकी द्वादशी तिथिको दिन- रात उपवास करके जो भगवान् श्रीधरकी आराधना करता है, वह पंच महायज्ञोंका फल पाता और विमानपर बैठकर सुख भोगता है ॥ ११ ॥
तथा भाद्रपदे मासि हृषीकेशेति पूजयन् ।
सौत्रामणिमवाप्नोति पूतात्मा भवते च हि ॥ १२ ॥
भाद्रपदमासकी द्वादशी तिथिको उपवासपूर्वक हृषीकेश नामसे भगवान्की पूजा करनेवाला मनुष्य सौत्रामणि यज्ञका फल पाता और पवित्रात्मा होता है ॥
द्वादश्यामाश्विने मासि पद्मनाभेति चार्चयन् ।
गोसहस्रफलं पुण्यं प्राप्नुयान्नात्र संशयः ॥ १३ ॥
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आश्विनमासकी द्वादशी तिथिको दिन - रात उपवास करके पद्मनाभ नामसे भगवान्की पूजा'करनेवाला पुरुष सहस्र गोदानका पुण्यफल पाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ १३ ॥
द्वादश्यां कार्तिके मासि पूज्य दामोदरेति च ।
गवां यज्ञमवाप्नोति पुमान् स्त्री वा न संशयः ॥ १४ ॥
कार्तिकमासकी द्वादशी तिथिको दिन- रात उपवास करके भगवान् दामोदरकी पूजा करनेसे स्त्री हो या पुरुष गो- यज्ञका फल पाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ १४ ॥
अर्चयेत् पुण्डरीकाक्षमेवं संवत्सरं तु यः ।
जातिस्मरत्वं प्राप्नोति विन्द्याद् बहु सुवर्णकम् ॥ १५ ॥
इस प्रकार जो एक वर्षतक कमलनयन भगवान् विष्णुका पूजन करता है, वह पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण करनेवाला होता है और उसे बहुत- सी सुवर्ण- राशि प्राप्त होती है ॥ १५ ॥
अहन्यहनि तद्भावमुपेन्द्रं योऽधिगच्छति ।
समाप्ते भोजयेद् विप्रानथवा दापयेद् घृतम् ॥ १६ ॥
जो प्रतिदिन इसी प्रकार भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, वह विष्णुभावको प्राप्त होता है । यह व्रत समाप्त होनेपर ब्राह्मणोंको भोजन करावे अथवा उन्हें घृत दान करे ॥ १६ ॥
अतः परं नोपवासो भवतीति विनिश्चयः ।
उवाच भगवान् विष्णुः स्वयमेव पुरातनम् ॥ १७ ॥
इस उपवाससे बढ़कर दूसरा कोई उपवास नहीं है, इसे निश्चय समझना चाहिये ।
साक्षात् भगवान् विष्णुने ही इस पुरातन व्रतके विषयमें बताया है ॥ १७ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विष्णोर्द्वादशकं नाम नवाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १० ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें भगवान्विष्णुका द्वादशी- व्रत नामक एक सौ नवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १० ९ ॥
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दशाधिकशततमोऽध्यायः रूप - सौन्दर्य और लोकप्रियताकी प्राप्तिके लिये मार्गशीर्षमासमें चन्द्र- व्रत करनेका प्रतिपादन वैशम्पायन उवाच
शरतल्पगतं भीष्मं वृद्धं कुरुपितामहम् ।
उपगम्य महाप्राज्ञः पर्यमृच्छद् युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! महाज्ञानी युधिष्ठिरने बाणशय्यापर सोये हुए कुरुकुलके वृद्ध पितामह भीष्मजीके निकट जाकर इस प्रकार प्रश्न किया ॥ युधिष्ठिरउवाच
अङ्गानां रूपसौभाग्यं प्रियं चैव कथं भवेत् ।
धर्मार्थकामसंयुक्तः सुखभागी कथं भवेत् ॥ २ ॥
युधिष्ठिर बोले- पितामह! मनुष्यके अंगोंको सुन्दर रूपका सौभाग्य कैसे प्राप्त होता है? मनुष्यमें लोकप्रियता कैसे आती है? धर्म, अर्थ और कामसे युक्त पुरुष किस प्रकार सुखका भागी हो सकता है? ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
मार्गशीर्षस्य मासस्य चन्द्रे मूलेन संयुते ।
पादौ मूलेन राजेन्द्र जङ्घायामथ रोहिणीम् ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा- राजेन्द्र! मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षकी प्रतिपदाको मूल नक्षत्रसे चन्द्रमाका योग होनेपर चन्द्रसम्बन्धी व्रत आरम्भ करे । चन्द्रमाके स्वरूपका इस प्रकार चिन्तन करना चाहिये । देवता- सहित मूलनक्षत्रके द्वारा उनके दोनों चरणोंकी भावना करे और पिण्डलियोंमें रोहिणीको स्थापित करे ॥ ३ ॥
अश्विन्यां सक्थिनी चैव ऊरू चाषाढयोस्तथा ।
गुह्यं तु फाल्गुनी विद्यात् कृत्तिका कटिकास्तथा ॥ ४ ॥
जाँघोंमें अश्विनी नक्षत्र, ऊरुओंमें पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ा नक्षत्र, गुह्य भागमें पूर्वाफाल्गुनी और उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र तथा कटिभागमें कृत्तिकाकी स्थिति समझे ॥ ४ ॥
नाभिं भाद्रपदे विद्याद् रेवत्यामक्षिमण्डलम् ।
पृष्ठमेव धनिष्ठासु अनुराधोत्तरास्तथा ॥ ५ ॥
नाभिमें पूर्वाभाद्रपदा और उत्तराभाद्रपदाको जाने, नेत्रमण्डलमें रेवती, पृष्ठभागमें धनिष्ठा, अनुराधा तथा उत्तराको स्थापित समझे ॥ ५ ॥
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बाहुभ्यां तु विशाखासु हस्ती हस्तेन निर्दिशेत् ।
पुनर्वस्वङ्गुली राजन्नाश्लेषासु नखास्तथा ॥ ६ ॥
राजन्! दोनों भुजाओंमें विशाखाका, हाथोंमें हस्तका, अंगुलियोंमें पुनर्वसुका तथा नखोंमें आश्लेषाकी स्थापना करे ॥ ६ ॥
ग्रीवां ज्येष्ठा च राजेन्द्र श्रवणेन तु कर्णयोः ।
मुखं पुष्येण दानेन दन्तोष्ठौ स्वातिरुच्यते ॥ ७ ॥
राजेन्द्र! ज्येष्ठा नक्षत्रसे ग्रीवाकी, श्रवणसे दोनों कानोंकी, पुष्य नक्षत्रकी स्थापनासे मुखकी तथा स्वाती नक्षत्रसे दाँतों और ओठोंकी भावना बतायी जाती है ॥
हासं शतभिषां चैव मघां चैवाथ नासिकाम् ।
नेत्रे मृगशिरो विद्याल्ललाटे मित्रमेव तु ॥ ८ ॥
शतभिषाको हास, मघाको नासिका, मृगशिराको नेत्र और मित्र ( अनुराधा ) को ललाट समझे ॥ ८ ॥
भरण्यां तु शिरो विद्यात् केशानार्द्रा नराधिप ।
समाप्ते तु घृतं दद्याद् ब्राह्मणे वेदपारगे ॥ ९ ॥
नरेश्वर! भरणीको सिर और आर्द्राको चन्द्रमाके केश समझे । ( इस प्रकार विभिन्न अंगोंमें नक्षत्रोंकी स्थापना करके तत्सम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा उन- उन अंगोंकी पूजा एवं जप) होम आदि प्रतिदिन करे । पौर्णमासीको व्रत समाप्त होनेपर वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणको घृत दान करे ॥ ९ ॥
सुभगो दर्शनीयश्च ज्ञानभाग्यथ जायते ।
जायते परिपूर्णाङ्गः पौर्णमास्येव चन्द्रमाः ॥ १० ॥
ऐसा करनेसे मनुष्य पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति परिपूर्णांग सौभाग्यशाली, दर्शनीय तथा ज्ञानका भागी होता है ॥ १० ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११० ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११० ॥
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एकादशाधिकशततमोऽध्यायः बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
श्रोतुमिच्छामि मर्त्यानां संसारविधिमुत्तमम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा – सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण महाप्राज्ञ पितामह! अब मैं मनुष्योंकी संसारयात्राके निर्वाहकी उत्तम विधि सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
केन वृत्तेन राजेन्द्र वर्तमाना नरा भुवि ।
प्राप्नुवन्त्युत्तमं स्वर्गं कथं च नरकं नृप ॥ २ ॥
राजेन्द्र! पृथ्वीपर रहनेवाले मनुष्य किस बर्तावसे उत्तम स्वर्गलोक पाते हैं? और नरेश्वर! कैसा बर्ताव करनेसे वे नरकमें पड़ते हैं? ॥ २ ॥
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्टसमं जनाः ।
प्रयान्त्यमुं लोकमितः को वै ताननुगच्छति ॥ ३ ॥
लोग अपने मृत शरीरको काठ और मिट्टीके ढेलेके समान छोड़कर जब यहाँसे परलोककी राह लेते हैं, उस समय उनके पीछे कौन जाता है? ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
अयमायाति भगवान् बृहस्पतिरुदारधीः ।
पृच्छैनं सुमहाभागमेतद् गुह्यं सनातनम् ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा – वत्स! ये उदारबुद्धि भगवान् बृहस्पतिजी यहाँ पधार रहे हैं । इन्हीं महाभागसे इस सनातन गूढ़ विषयको पूछो ॥ ४ ॥
नैतदन्येन शक्यं हि वक्तुं केनचिदद्य वै ।
वक्ता बृहस्पतिसमो न ह्यन्यो विद्यते क्वचित् ॥५ ॥
आज दूसरा कोई इस विषयका प्रतिपादन नहीं कर सकता। बृहस्पतिजीके समान वक्ता दूसरा कोई कहीं भी नहीं है ॥ ५ ॥
वैशम्पायन उवाच
तयोः संवदतोरेवं पार्थगांगेययोस्तदा ।
आजगाम विशुद्धात्मा नाकपृष्ठाद् बृहस्पतिः ॥ ६ ॥
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वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर और गंगानन्दन भीष्म, इन दोनोंमें इस प्रकार बात हो ही रही थी कि विशुद्ध अन्तःकरणवाले बृहस्पतिजी स्वर्गलोकसे वहाँ आ पहुँचे ॥ ६ ॥
ततो राजा समुत्थाय धृतराष्ट्रपुरोगमः ।
पूजामनुपमां चक्रे सर्वे ते च सभासदः ॥ ७ ॥
उन्हें देखते ही राजा युधिष्ठिर धृतराष्ट्रको आगे करके खड़े हो गये । फिर उन्होंने तथा उन सभी सभासदोंने बृहस्पतिजीकी अनुपम पूजा की ॥ ७ ॥
ततो धर्मसुतो राजा भगवन्तं बृहस्पतिम् ।
उपगम्य यथान्यायं प्रश्नं पप्रच्छ तत्त्वतः ॥ ८ ॥
तदनन्तर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने भगवान् बृहस्पतिजीके समीप जाकर यथोचित रीतिसे यह तात्त्विक प्रश्न उपस्थित किया ॥ ८ ॥
युधिष्ठिर उवाच
भगवन् सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
मर्त्यस्य कः सहायो वै पिता माता सुतो गुरुः ॥ ९ ॥
ज्ञातिसम्बन्धिवर्गश्च मित्रवर्गस्तथैव च ।
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्टसमं जनाः ॥ १० ॥
गच्छन्त्यमुत्र लोकं वै क एनमनुगच्छति । युधिष्ठिरने पूछा — भगवन्! आप सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता और सब शास्त्रोंके विद्वान् हैं; अतः बताइये, पिता, माता, पुत्र, गुरु, सजातीय सम्बन्धी और मित्र आदिमेंसे मनुष्यका सच्चा सहायक कौन है? जब सब लोग अपने मरे हुए शरीरको काठ और ढेलेके समान त्यागकर चले जाते हैं, तब इस जीवके साथ परलोकमें कौन जाता है? ॥ बृहस्पतिरुवाच एकः प्रसूयते राजन्नेक एव विनश्यति ॥ ११ ॥
एकस्तरति दुर्गाणि गच्छत्येकस्तु दुर्गतिम् । बृहस्पतिजीने कहा— राजन्! प्राणी अकेला ही जन्म लेता, अकेला ही मरता, अकेला ही दुःखसे पार होता तथा अकेला ही दुर्गति भोगता है ॥ ११३ ॥
असहायः पिता माता तथा भ्राता सुतो गुरुः ॥ १२ ॥
ज्ञातिसम्बन्धिवर्गश्च मित्रवर्गस्तथैव च । पिता, माता, भाई, पुत्र, गुरु, जाति, सम्बन्धी तथा मित्रवर्ग -ये कोई भी उसके सहायक नहीं होते ॥ मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्टसमं जनाः ॥ १३ ॥
मुहूर्तमिव रोदित्वा ततो यान्ति पराङ्मुखाः ।
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लोग उसके मरे हुए शरीरको काठ और मिट्टीके ढेलेकी तरह फेंककर दो घड़ी रोते हैं और फिर उसकी ओरसे मुँह फेरकर चल देते हैं ॥ १३३ ॥
तैस्तच्छरीरमुत्सृष्टं धर्म एकोऽनुगच्छति ॥ १४ ॥
तस्माद् धर्मः सहायश्च सेवितव्यः सदा नृभिः । वे कुटुम्बीजन तो उसके शरीरका परित्याग करके चले जाते हैं, किंतु एकमात्र धर्म ही उस जीवात्माका अनुसरण करता है; इसलिये धर्म ही सच्चा सहायक है । अतः मनुष्योंको सदा धर्मका ही सेवन करना चाहिये ॥ प्राणी धर्मसमायुक्तो गच्छेत् स्वर्गगतिं पराम् ॥ १५ ॥
तथैवाधर्मसंयुक्तो नरकं चोपपद्यते । धर्मयुक्त प्राणी ही उत्तम स्वर्गमें जाता है और अधर्मपरायण जीव नरकमें पड़ता है ॥ १५३ ॥
तस्मान्न्यायागतैरर्थैर्धर्मं सेवेत पण्डितः ॥ १६ ॥
धर्म एको मनुष्याणां सहायः पारलौकिकः । इसलिये विद्वान् पुरुषको चाहिये कि न्यायसे प्राप्त हुए धनके द्वारा धर्मका अनुष्ठान करे । एकमात्र धर्म ही परलोकमें मनुष्योंका सहायक है ॥ १६३ ॥
लोभान्मोहादनुक्रोशाद् भयाद् वाप्यबहुश्रुतः ॥ १७ ॥
नरः करोत्यकार्याणि परार्थे लोभमोहितः । जो बहुश्रुत नहीं है, वही मनुष्य लोभ और मोहके वशीभूत हो दूसरेके लिये लोभ, मोह, दया अथवा भयसे न करने योग्य पापकर्म कर बैठता है ॥ १७३ ॥
धर्मश्चार्थश्च कामश्च त्रितयं जीविते फलम् ॥ १८ ॥
एतत् त्रयमवाप्तव्यमधर्मपरिवर्जितम् । धर्म, अर्थ और काम — ये तीन जीवनके फल हैं, अतः मनुष्यको अधर्मके त्यागपूर्वक इन तीनोंको उपलब्ध करना चाहिये ॥ १८३ ॥
युधिष्ठिर उवाच श्रुतं भगवतो वाक्यं धर्मयुक्तं परं हितम् ॥ १ ९ ॥ शरीरनिचयं ज्ञातुं बुद्धिस्तु मम जायते । युधिष्ठिरने पूछा — भगवन्! आपके मुँहसे मैंने धर्मयुक्त परम हितकर बात सुनी । अब शरीरकी स्थिति जाननेके लिये मेरा विचार हो रहा है ॥ १ ९ ३ ॥ मृतं शरीरं हि नृणां सूक्ष्ममव्यक्ततां गतम् ॥ २० ॥
अचक्षुर्विषयं प्राप्तं कथं धर्मोऽनुगच्छति ।
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मनुष्यका स्थूल शरीर तो मरकर यहीं पड़ा रह जाता है और उसका सूक्ष्म शरीर अव्यक्तभावको प्राप्त हो जाता है— नेत्रोंकी पहुँचसे परे है । ऐसी दशामें धर्म किस प्रकार उसका अनुसरण करता है? ॥ २०३ ॥
बृहस्पतिरुवाच पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिर्मनोऽन्तकः ॥ २१ ॥
बुद्धिरात्मा च सहिता धर्मं पश्यन्ति नित्यदा । बृहस्पतिजीने कहा — धर्मराज! पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, यम, बुद्धि और आत्मा — ये सब सदा एक साथ मनुष्यके धर्मपर दृष्टि रखते हैं ॥ २१३ ॥
प्राणिनामिह सर्वेषां साक्षिभूता निशानिशम् ॥ २२ ॥
एतैश्च सह धर्मोऽपि तं जीवमनुगच्छति । दिन और रात भी इस जगत् के सम्पूर्ण प्राणियोंके कर्मोंके साक्षी हैं । इन सबके साथ धर्म भी जीवका अनुसरण करता है ॥ २२३ ॥
त्वगस्थिमांसं शुक्रं च शोणितं च महामते ॥ २३ ॥
शरीरं वर्जयन्त्येते जीवितेन विवर्जितम् । महामते! त्वचा, अस्थि, मांस, शुक्र और शोणित– ये सब धातु निष्प्राण शरीरका परित्याग कर देते हैं अर्थात् ये उस शरीरधारी जीवात्माका साथ छोड़ देते हैं, एक धर्म ही उसके साथ जाता है ॥ २३३ ॥
ततो धर्मसमायुक्तः प्राप्नुते जीव एव हि ॥ २४ ॥
ततोऽस्य कर्म पश्यन्ति शुभं वा यदि वाशुभम् ।
देवताः पञ्चभूतस्थाः किंभूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ २५ ॥
इसलिये धर्मयुक्त जीव ही परमगति प्राप्त करता है । फिर परलोकमें अपने कर्मोंका भोग समाप्त करके प्राणी जब दूसरा शरीर धारण करता है, उस समय उसके शरीरके पाँचों भूतोंमें स्थित अधिष्ठाता देवता उस जीवके शुभ और अशुभ कर्मोंको देखते हैं। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? ॥ २४-२५ ॥
ततो धर्मसमायुक्तः स जीवः सुखमेधते ।
इहलोके परे चैव किं भूयः कथयामि ते ॥ २६ ॥
तदनन्तर धर्मयुक्त वह जीव इहलोक और परलोकमें सुखका अनुभव करता है । अब तुम्हें और क्या बताऊँ? ॥ २६ ॥
युधिष्ठिर उवाच
तद् दर्शितं भगवता यथा धर्मोऽनुगच्छति ।
एतत् तु ज्ञातुमिच्छामि कथं रेतः प्रवर्तते ॥ २७ ॥
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युधिष्ठिरने पूछा — भगवन्! धर्म जिस प्रकार जीवका अनुसरण करता है, वह तो आपने समझा दिया । अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि इस शरीरमें वीर्यकी उत्पत्ति कैसे होती है? ॥ २७ ॥
बृहस्पतिरुवाच
अन्नमश्नन्ति यद् देवाः शरीरस्था नरेश्वर ।
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिर्मनस्तथा ॥ २८ ॥
ततस्तृप्तेषु राजेन्द्र तेषु भूतेषु पञ्चसु ।
मनःषष्ठेषु शुद्धात्मन् रेतः सम्पद्यते महत् ॥ २ ९ ॥
बृहस्पतिजीने कहा— शुद्धात्मन्! नरेश्वर! राजेन्द्र! इस शरीरमें स्थित पृथ्वी, जल, अन्न, वायु, आकाश और मनके अधिष्ठाता देवता जो अन्न भक्षण करते हैं और उस अन्नसे मनसहित वे पाँचों भूत जब पूर्ण तृप्त होते हैं, तब महान् रेतस् ( वीर्य ) की उत्पत्ति होती है ॥ २८-२९ ॥
ततो गर्भः सम्भवति श्लेषात् स्त्रीपुंसयोर्नृप ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं भूयः किं श्रोतुमिच्छसि ॥ ३० ॥
राजन्! फिर स्त्री- पुरुषका संयोग होनेपर वही वीर्य गर्भका रूप धारण करता है । ये
सब बातें मैंने तुम्हें बता दी । अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ ३० ॥
युधिष्ठिरउवाच
आख्यातं मे भगवता गर्भः संजायते यथा ।
यथा जातस्तु पुरुषः प्रपद्यति तदुच्यताम् ॥ ३१ ॥
युधिष्ठिरने कहा — भगवन्! गर्भ जिस प्रकार उत्पन्न होता है, वह आपने बताया । अब यह बताइये कि उत्पन्न हुआ पुरुष पुनः किस प्रकार बन्धनमें पड़ता है ॥ ३१ ॥
बृहस्पतिरुवाच
आसन्नमात्रः पुरुषस्तैर्भूतैरभिभूयते ।
विप्रयुक्तश्च तैर्भूतैः पुनर्यात्यपरां गतिम् ॥ ३२ ॥
बृहस्पतिजीने कहा— राजन्! जीव उस वीर्यमें प्रविष्ट होकर जब गर्भमें संनिहित होता है, तब वे पाँचों भूत शरीररूपमें परिणत हो उसे बाँध लेते हैं, फिर उन्हीं भूतोंसे विलग होनेपर वह दूसरी गतिको प्राप्त होता है ॥ सर्वभूतसमायुक्तः प्राप्नुते जीव एव हि ।
ततोऽस्य कर्म पश्यन्ति शुभं वा यदि वाशुभम् ।
देवताः पञ्चभूतस्थाः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ३३ ॥