श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 961–970
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 961–970
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रमते देवकन्याभिर्दिव्याभरणभूषितः । जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ बाईसवाँ दिन प्राप्त होनेपर एक बार भोजन करता है तथा अहिंसामें तत्पर, बुद्धिमान्, सत्यवादी और दोषदृष्टिसे रहित होता है, वह सूर्यके समान तेजस्वी रूप धारण करके श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो वसुओंके लोकमें जाता है । वहाँ इच्छानुसार विचरता, अमृत पीकर रहता और दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो देवकन्याओंके साथ रमण करता है ॥ ९ ६ - ९ ८३ ॥ त्रयोविंशे तु दिवसे प्राशेद् यस्त्वेकभोजनम् ॥ ९९ ॥
सदा द्वादशमासांस्तु मिताहारो जितेन्द्रियः ।
वायोरुशनसश्चैव रुद्रलोकं च गच्छति ॥ १०० ॥
जो लगातार बारह महीनोंतक मिताहारी और जितेन्द्रिय होकर तेईसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह वायु, शुक्राचार्य तथा रुद्रके लोकमें जाता है ॥
कामचारी कामगमः पूज्यमानोऽप्सरोगणैः ।
अनेकगुणपर्यन्तं विमानवरमास्थितः ॥ १०१ ॥
रमते देवकन्याभिर्दिव्याभरणभूषितः । वहाँ अनेक गुणोंसे युक्त श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो इच्छानुसार विचरता, जहाँ इच्छा होती वहाँ जाता और अप्सराओंद्वारा पूजित होता है । उन लोकोंमें वह दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो देवकन्याओंके साथ रमण करता है ॥ १०११३ ॥
चतुर्विंशे तु दिवसे यः प्राप्ते प्राशते हविः ॥ १०२ ॥
सदा द्वादशमासांश्च जुह्वानो जातवेदसम् ।
आदित्यानामधीवासे मोदमानो वसेच्चिरम् ॥ १०३ ॥
दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यगन्धानुलेपनः । जो लगातार बारह महीनोंतक अग्निहोत्र करता हुआ चौबीसवें दिन एक बार हविष्यान्न भोजन करता है, वह दिव्यमाला, दिव्यवस्त्र, दिव्यगन्ध तथा दिव्य अनुलेपन धारण करके सुदीर्घकालतक आदित्यलोकमें सानन्द निवास करता है ॥ १०२-१०३३ ॥ विमाने काञ्चने दिव्ये हंसयुक्ते मनोरमे ॥ १०४ ॥
रमते देवकन्यानां सहस्रैरयुतैस्तथा । वहाँ हंसयुक्त मनोरम एवं दिव्य सुवर्णमय विमानपर वह सहस्रों तथा अयुतों देवकन्याओंके साथ रमण करता है ॥ १०४३ ॥
पञ्चविंशे तु दिवसे यः प्राशेदेकभोजनम् ॥ १०५ ॥
सदा द्वादशमासांस्तु पुष्कलं यानमारुहेत् । जो लगातार बारह महीनोंतक पचीसवें दिन एक बार भोजन करता है, उसको सवारीके लिये बहुत - से विमान या वाहन प्राप्त होते हैं ॥ १०५३ ॥
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सिंहव्याघ्रप्रयुक्तैस्तु मेघनिःस्वननादितैः ॥ १०६ ॥
स रथैर्नन्दिघोषैश्च पृष्ठतो ह्यनुगम्यते ।
देवकन्यासमारूढैः काञ्चनैर्विमलैः शुभैः ॥ १०७ ॥
उसके पीछे सिंहों और व्याघ्रोंसे जुते हुए तथा मेघोंकी गम्भीर गर्जनासे निनादित बहुसंख्यक रथ सानन्द विजयघोष करते हुए चलते हैं। उन सुवर्णमय, निर्मल एवं मंगलकारी रथोंपर देवकन्याएँ आरूढ़ होती हैं ॥ १०६-१०७ ॥
विमानमुत्तमं दिव्यमास्थाय सुमनोहरम् ।
तत्र कल्पसहस्रं वै वसते स्त्रीशतावृते ॥ १०८ ॥
सुधारसं चोपजीवन्नमृतोपममुत्तमम् । वह दिव्य, उत्तम एवं मनोहर विमानपर विराजमान हो सैकड़ों सुन्दरियोंसे भरे हुए महलमें सहस्र कल्पोंतक निवास करता है । वहाँ देवताओंके भोज्य अमृतके समान उत्तम सुधारसको पीकर वह जीवन बिताता है ॥ १०८३ ॥
षड्विंशे दिवसे यस्तु प्रकुर्यादेकभोजनम् ॥ १० ९ ॥
सदा द्वादशमासांस्तु नियतो नियताशनः ।
जितेन्द्रियो वीतरागो जुह्वानो जातवेदसम् ॥ ११० ॥
स प्राप्नोति महाभागः पूज्यमानोऽप्सरोगणैः ।
सप्तानां मरुतां लोकान् वसूनां चापि सोऽश्नुते ॥ १११ ॥
जो लगातार बारह महीनोंतक मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर मिताहारी हो छब्बीसवें दिन एक बार भोजन करता है तथा वीतराग और जितेन्द्रिय हो प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता है, वह महाभाग मनुष्य अप्सराओंसे पूजित हो सात मरुद्गणों और आठ वसुओंके लोकोंमें जाता है ॥ १० ९ –१११ ॥
विमानैः स्फाटिकैर्दिव्यैः सर्वरत्नैरलंकृतैः ।
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च पूज्यमानः प्रमोदते ॥ ११२ ॥
द्वे युगानां सहस्रे तु दिव्ये दिव्येन तेजसा । सम्पूर्ण रत्नोंसे अलंकृत स्फटिक मणिमय दिव्य विमानोंसे सम्पन्न हो गन्धर्वों और अप्सराओंद्वारा पूजित होता हुआ दिव्य तेजसे युक्त हो देवताओंके दो हजार दिव्य युगोंतक वह उन लोकोंमें आनन्द भोगता है ॥ ११२३ ॥
सप्तविंशेऽथ दिवसे यः कुर्यादेकभोजनम् ॥ ११३ ॥
सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् ।
फलं प्राप्नोति विपुलं देवलोके च पूज्यते ॥ ११४ ॥
जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ हर सत्ताईसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह प्रचुर फलका भागी होता और देवलोकमें सम्मान पाता है ॥ ११३-११४ ॥
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अमृताशी वसंस्तत्र स वितृष्णः प्रमोदते ।
देवर्षिचरितं राजन् राजर्षिभिरनुष्ठितम् ॥ ११५ ॥
अध्यावसति दिव्यात्मा विमानवरमास्थितः ।
स्त्रीभिर्मनोभिरामाभी रममाणो मदोत्कटः ॥ ११६ ॥
युगकल्पसहस्राणि त्रीण्यावसति वै सुखम् । वहाँ उसे अमृतका आहार प्राप्त होता है तथा वह तृष्णारहित हो वहाँ रहकर आनन्द भोगता है । राजन्! वह दिव्यरूपधारी पुरुष राजर्षियोंद्वारा वर्णित देवर्षियोंके चरित्रका श्रवण-मनन करता है और श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो मनोरम सुन्दरियोंके साथ मदोन्मत्तभावसे रमण करता हुआ तीन हजार युगों एवं कल्पोंतक वहाँ सुखपूर्वक निवास करता है ॥ ११५-११६३ ॥ योऽष्टाविंशे तु दिवसे प्राश्नीयादेकभोजनम् ॥ ११७ ॥
सदा द्वादशमासांस्तु जितात्मा विजितेन्द्रियः ।
फलं देवर्षिचरितं विपुलं समुपाश्नुते ॥ ११८ ॥
जो बारह महीनोंतक सदा अपने मन और इन्द्रियोंको काबूमें रखकर अट्ठाईसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह देवर्षियोंको प्राप्त होनेवाले महान् फलका उपभोग करता है ॥ ११७-११८ ॥
भोगवांस्तेजसा भाति सहस्रांशुरिवामलः ।
सुकुमार्यश्च नार्यस्तं रममाणाः सुवर्चसः ॥ ११ ९ ॥
पीनस्तनोरुजघना दिव्याभरणभूषिताः ।
रमयन्ति मनःकान्ते विमाने सूर्यसंनिभे ॥ १२० ॥
सर्वकामगमे दिव्ये कल्पायुतशतं समाः । वह भोगसे सम्पन्न हो अपने तेजसे निर्मल सूर्यकी भाँति प्रकाशित होता है और सुन्दर कान्तिवाली, पीन उरोज, जाँघ और जघन प्रदेशवाली, दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सुकुमारी रमणियाँ सूर्यके समान प्रकाशित और सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेवाले मनोरम दिव्य विमानपर बैठकर उस पुण्यात्मा पुरुषका दस लाख कल्पोंके वर्षोंतक मनोरंजन करती हैं ॥ ११ ९-१२०३ ॥ एकोनत्रिंशे दिवसे यः प्राशेदेकभोजनम् ॥ १२१ ॥
सदा द्वादशमासान् वै सत्यव्रतपरायणः ।
तस्य लोकाः शुभा दिव्या देवराजर्षिपूजिताः ॥ १२२ ॥
जो बारह महीनोंतक सदा सत्यव्रतके पालनमें तत्पर हो उन्तीसवें दिन एक बार भोजन करता है, उसे देवर्षियों तथा राजर्षियोंद्वारा पूजित दिव्य मंगलमय लोक प्राप्त होते हैं ॥ १२१-१२२ ॥ विमानं सूर्यचन्द्राभं दिव्यं समधिगच्छति ।
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जातरूपमयं युक्तं सर्वरत्नसमन्वितम् ॥ १२३ ॥
वह सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशित, सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित तथा आवश्यक सामग्रियोंसे युक्त सुवर्णमय दिव्य विमान प्राप्त करता है ॥ १२३ ॥
अप्सरोगणसम्पूर्ण गन्धर्वैरभिनादितम् ।
तत्र चैनं शुभा नार्यो दिव्याभरणभूषिताः ॥ १२४ ॥
मनोऽभिरामा मधुरा रमयन्ति मदोत्कटाः । उस विमानमें अप्सराएँ भरी रहती हैं, गन्धर्वोंके गीतोंकी मधुर ध्वनिसे वह विमान गूँजता रहता है । उस विमानमें दिव्य आभूषणोंसे विभूषित, शुभ लक्षणसम्पन्न, मनोभिराम, मदमत्त एवं मधुरभाषिणी रमणियाँ उस पुरुषका मनोरंजन करती हैं ॥ १२४ ॥
भोगवांस्तेजसा युक्तो वैश्वानरसमप्रभः ॥ १२५ ॥
दिव्यो दिव्येन वपुषा भ्राजमान इवामरः ।
वसूनां मरुतां चैव साध्यानामश्विनोस्तथा ॥ १२६ ॥
रुद्राणां च तथा लोकं ब्रह्मलोकं च गच्छति । वह पुरुष भोगसम्पन्न, तेजस्वी, अग्निके समान दीप्तिमान्, अपने दिव्य शरीरसे देवताकी भाँति प्रकाशमान तथा दिव्यभावसे युक्त हो वसुओं, मरुद्गणों, साध्यगणों, अश्विनीकुमारों, रुद्रों तथा ब्रह्माजीके लोकमें भी जाता है ॥ १२५-१२६३ ॥ यस्तु मासे गते भुङ्क्ते एकभक्तं शमात्मकः ॥ १२७ ॥
सदा द्वादशमासान् वै ब्रह्मलोकमवाप्नुयात् । जो बारह महीनोंतक प्रत्येक मास व्यतीत होनेपर तीसवें दिन एक बार भोजन करता और सदा शान्तभावसे रहता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है ॥ १२७३ ॥
सुधारसकृताहारः श्रीमान् सर्वमनोहरः ॥ १२८ ॥
तेजसा वपुषा लक्ष्म्या भ्राजते रश्मिवानिव । वह वहाँ सुधारसका भोजन करता और सबके मनको हर लेनेवाला कान्तिमान् रूप धारण करता है । वह अपने तेज, सुन्दर शरीर तथा अंगकान्तिसे सूर्यकी भाँति प्रकाशित होता है ॥ १२८३ ॥
दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यगन्धानुलेपनः ॥ १२ ९ ॥ सुखेष्वभिरतो भोगी दुःखानामविजानकः । दिव्यमाला, दिव्यवस्त्र, दिव्यगन्ध और दिव्य अनुलेपन धारण करके वह भोगकी शक्ति और साधनसे सम्पन्न हो सुख- भोगमें ही रत रहता है । दुःखोंका उसे कभी अनुभव नहीं होता है ॥ १२ ९ ३ ॥ स्वयंप्रभाभिर्नारीभिर्विमानस्थो महीयते ॥ १३० ॥
रुद्रदेवर्षिकन्याभिः सततं चाभिपूज्यते ।
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नानारमणरूपाभिर्नानारागाभिरेव च ॥ १३१ ॥
नानामधुरभाषाभिर्नानारतिभिरेव च । वह विमानपर आरूढ़ हो अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होनेवाली दिव्य नारियोंद्वारा सम्मानित होता है । रुद्रों तथा देवर्षियोंकी कन्याएँ सदा उसकी पूजा करती हैं । वे कन्याएँ नाना प्रकारके रमणीय रूप, विभिन्न प्रकारके राग, भाँति - भाँतिकी मधुर भाषणकला तथा अनेक तरहकी रति- क्रीड़ाओंसे सुशोभित होती हैं ॥ १३०-१३१३ ॥ विमाने गगनाकारे सूर्यवैदूर्यसंनिभे ॥ १३२ ॥
पृष्ठतः सोमसंकाशे उदर्के चाभ्रसन्निभे ।
दक्षिणायां तु रक्ताभे अधस्तान्नीलमण्डले ॥ १३३ ॥
ऊर्ध्वं विचित्रसंकाशे नैको वसति पूजितः । जिस विमानपर वह विराजमान होता है, वह आकाशके समान विशाल दिखायी देता है । सूर्य और वैदूर्यमणिके समान तेजस्वी जान पड़ता है । उसका पिछला भाग चन्द्रमाके समान, वामभाग मेघके सदृश, दाहिना भाग लाल प्रभासे युक्त, निचला भाग नीलमण्डलके समान तथा ऊपरका भाग अनेक रंगोंके सम्मिश्रणसे विचित्र- सा प्रतीत होता है । उसमें वह अनेक नर- नारियोंके साथ सम्मानित होकर रहता है ॥ १३२-१३३३ ॥ यावद् वर्षसहस्रं वै जम्बूद्वीपे प्रवर्षति ॥ १३४ ॥
तावत् संवत्सराः प्रोक्ता ब्रह्मलोकेऽस्य धीमतः । मेघ जम्बूद्वीपमें जितने जलबिन्दुओंकी वर्षा करता है, उतने हजार वर्षोंतक उस बुद्धिमान् पुरुषका ब्रह्मलोकमें निवास बताया गया है ॥ १३४ ॥
विप्रुषश्चैव यावन्त्यो निपतन्ति नभस्तलात् ॥ १३५ ॥
वर्षासु वर्षतस्तावन्निवसत्यमरप्रभः । वर्षा - ऋतुमें आकाशसे धरतीपर जितनी बूँदें गिरती हैं, उतने वर्षोंतक वह देवोपम तेजस्वी पुरुष ब्रह्मलोकमें निवास करता है ॥ १३५३ ॥
मासोपवासी वर्षैस्तु दशभिः स्वर्गमुत्तमम् ॥ १३६ ॥
महर्षित्वमथासाद्य सशरीरगतिर्भवेत् । दस वर्षोंतक एक-एक मास उपवास करके एकतीसवें दिन भोजन करनेवाला पुरुष उत्तम स्वर्ग लोकको जाता है । वह महर्षि पदको प्राप्त होकर सशरीर दिव्यलोककी यात्रा करता है ॥ १३६३ ॥
मुनिर्दान्तो जितक्रोधो जितशिश्नोदरः सदा ॥ १३७ ॥
जुह्वन्नग्नींश्च नियतः संध्योपासनसेविता ।
बहुभिर्नियमैरेवं शुचिरश्नाति यो नरः ॥ १३८ ॥
अभ्रावकाशशीलश्च तस्य भानोरिव त्विषः ।
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जो मनुष्य सदा मुनि, जितेन्द्रिय, क्रोधको जीतनेवाला, शिश्न और उदरके वेगको सदा काबूमें रखनेवाला, नियमपूर्वक तीनों अग्नियोंमें आहुति देनेवाला और संध्योपासनामें तत्पर रहनेवाला है तथा जो पवित्र होकर इन पहले बताये हुए अनेक प्रकारके नियमोंके पालनपूर्वक भोजन करता है, वह आकाशके समान निर्मल होता है और उसकी कान्ति सूर्यकी प्रभाके समान प्रकाशित होती है ॥ दिवं गत्वा शरीरेण स्वेन राजन् यथामरः ॥ १३ ९ ॥ स्वर्गं पुण्यं यथाकाममुपभुङ्क्ते तथाविधः । राजन्! ऐसे गुणोंसे युक्त पुरुष देवताके समान अपने शरीरके साथ ही देवलोकमें जाकर वहाँ इच्छाके अनुसार स्वर्गके पुण्यफलका उपभोग करता है ॥ १३ ९ ३ ॥ एष ते भरतश्रेष्ठ यज्ञानां विधिरुत्तमः ॥ १४० ॥
व्याख्यातो ह्यानुपूर्व्येण उपवासफलात्मकः ।
दरिद्रैर्मनुजैः पार्थ प्राप्तं यज्ञफलं यथा ॥ १४१ ॥
भरतश्रेष्ठ! यह तुम्हें यज्ञोंका उत्तम विधान क्रमशः विस्तारपूर्वक बताया गया है । इसमें उपवासके फलपर प्रकाश डाला गया है । कुन्तीनन्दन! दरिद्र मनुष्योंने इन उपवासात्मक व्रतोंका अनुष्ठान'करके यज्ञोंका फल प्राप्त किया है ॥ १४०-१४१ ॥
उपवासानिमान् कृत्वा गच्छेच्च परमां गतिम् ।
देवद्विजातिपूजायां रतो भरतसत्तम ॥ १४२ ॥
भरतश्रेष्ठ! देवताओं और ब्राह्मणोंकी पूजामें तत्पर रहकर जो इन उपवासोंका पालन करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है ॥ १४२ ॥
उपवासविधिस्त्वेष विस्तरेण प्रकीर्तितः ।
नियतेष्वप्रमत्तेषु शौचवत्सु महात्मसु ॥ १४३ ॥
दम्भद्रोहनिवृत्तेषु कृतबुद्धिषु भारत ।
अचलेष्वप्रकम्पेषु मा ते भूदत्र संशयः ॥ १४४ ॥
भारत! नियमशील, सावधान, शौचाचारसे सम्पन्न, महामनस्वी, दम्भ और द्रोहसे रहित, विशुद्ध बुद्धि, अचल और स्थिर स्वभाववाले मनुष्योंके लिये मैंने यह उपवासकी विधि विस्तारपूर्वक बतायी है । इस विषयमें तुम्हें संदेह नहीं करना चाहिये ॥ १४३-१४४ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उपवासविधिर्नाम सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमेंउपवासकी विधिनामक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०७ ॥
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अष्टाधिकशततमोऽध्यायः मानस तथा पार्थिव तीर्थकी महत्ता युधिष्ठिर उवाच
यद् वरं सर्वतीर्थानां तन्मे ब्रूहि पितामह ।
यत्र चैव परं शौचं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! जो सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ हो तथा जहाँ जानेसे परम शुद्धि हो जाती हो, उस तीर्थको मुझे विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
सर्वाणि खलु तीर्थानि गुणवन्ति मनीषिणः ।
यत्तु तीर्थं च शौचं च तन्मे शृणु समाहितः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा - युधिष्ठिर! इस पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, वे सब मनीषी पुरुषोंके लिए गुणकारी होते हैं; किंतु उन सबमें जो परम पवित्र और प्रधान तीर्थ हैं, उसका वर्णन करता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ २ ॥
अगाधे विमले शुद्धे सत्यतोये धृतिहृदे ।
स्नातव्यं मानसे तीर्थे सत्त्वमालम्ब्य शाश्वतम् ॥ ३ ॥
जिसमें धैर्यरूप कुण्ड और सत्यरूप जल भरा हुआ है तथा जो अगाध, निर्मल एवं अत्यन्त शुद्ध है, उस मानस तीर्थमें सदा परमात्माका आश्रय लेकर स्नान करना चाहिये ॥ ३ ॥
तीर्थशौचमनर्थित्वमार्जवं सत्यमार्दवम् ।
अहिंसा सर्वभूतानामानृशंस्यं दमः शमः ॥ ४ ॥
कामना और याचनाका अभाव, सरलता, सत्य, मृदुता, अहिंसा, समस्त प्राणियोंके प्रति क्रूरताका अभाव - दया, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह– ये ही इस मानस तीर्थके सेवनसे प्राप्त होनेवाली पवित्रताके लक्षण हैं ॥ ४ ॥
निर्ममा निरहंकारा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः ।
शुचयस्तीर्थभूतास्ते ये भैक्ष्यमुपभुञ्जते ॥ ५ ॥
जो ममता, अहंकार, राग-द्वेषादि द्वन्द्व और परिग्रहसे रहित एवं भिक्षासे जीवन निर्वाह करते हैं, वे विशुद्ध अन्तःकरणवाले साधु पुरुष तीर्थस्वरूप हैं ॥ ५ ॥
तत्त्ववित्त्वनहंबुद्धिस्तीर्थप्रवरमुच्यते । ( नारायणेऽथ रुद्रे वा भक्तिस्तीर्थं परं मता । ) शौचलक्षणमेतत् ते सर्वत्रैवान्ववेक्षतः ॥ ६ ॥
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किंतु जिसकी बुद्धिमें अहंकारका नाम भी नहीं है, वह तत्त्वज्ञानी पुरुष श्रेष्ठ तीर्थ कहलाता है । भगवान् नारायण अथवा भगवान् शिवमें जो भक्ति होती है, वह भी उत्तम तीर्थ मानी गयी है । पवित्रताका यह लक्षण तुम्हें विचार करनेपर सर्वत्र ही दृष्टिगोचर होगा ॥ ६ ॥
रजस्तमः सत्त्वमथो येषां निर्धोतमात्मनः ।
शौचाशौचसमायुक्ताः स्वकार्यपरिमार्गिणः ॥ ७ ॥
सर्वत्यागेष्वभिरताः सर्वज्ञाः समदर्शिनः ।
शौचेन वृत्तशौचार्थास्ते तीर्थाः शुचयश्च ये ॥ ८ ॥
जिनके अन्तःकरणसे तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण धुल गये हैं अर्थात् जो तीनों गुणोंसे रहित है, जो बाह्य पवित्रता और अपवित्रतासे युक्त रहकर भी अपने कर्तव्य ( तत्त्वविचार, ध्यान, उपासना आदि ) का ही अनुसंधान करते हैं । जो सर्वस्वके त्यागमें ही अभिरुचि रखते हैं, सर्वज्ञ और समदर्शी होकर शौचाचारके पालनद्वारा आत्मशुद्धिका सम्पादन करते हैं, वे सत्पुरुष ही परम पवित्र तीर्थस्वरूप हैं ॥ ७-८ ॥
नोदकक्लिन्नगात्रस्तु स्नात इत्यभिधीयते ।
स स्नातो यो दमस्नातः स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥ ९ ॥
शरीरको केवल पानीसे भिगो लेना ही स्नान नहीं कहलाता है । सच्चा स्नान तो उसीने किया है, जिसने मन - इन्द्रियके संयमरूपी जलमें गोता लगाया है । वही बाहर और भीतरसे भी पवित्र माना गया है ॥ ९ ॥
अतीतेष्वनपेक्षा ये प्राप्तेष्वर्थेषु निर्ममाः ।
शौचमेव परं तेषां येषां नोत्पद्यते स्पृहा ॥ १० ॥
जो बीते या नष्ट हुए विषयोंकी अपेक्षा नहीं रखते, प्राप्त हुए पदार्थोंमें ममताशून्य होते हैं तथा जिनके मनमें कोई इच्छा पैदा ही नहीं होती, उन्हींमें परम पवित्रता होती है ॥ १० ॥
प्रज्ञानं शौचमेवेह शरीरस्य विशेषतः ।
तथा निष्किंचनत्वं च मनसश्च प्रसन्नता ॥ ११ ॥
इस जगत्में प्रज्ञान ही शरीर शुद्धिका विशेष साधन है । इसी प्रकार अकिंचनता और मनकी प्रसन्नता भी शरीरको शुद्ध करनेवाले हैं ॥ ११ ॥
वृत्तशौचं मनःशौचं तीर्थशौचमतः परम् ।
ज्ञानोत्पन्नं च यच्छौचं तच्छौचं परमं स्मृतम् ॥ १२ ॥
शुद्धि चार प्रकारकी मानी गयी है - आचारशुद्धि, मनः शुद्धि, तीर्थशुद्धि और ज्ञानशुद्धि; इनमें ज्ञानसे प्राप्त होनेवाली शुद्धि ही सबसे श्रेष्ठ मानी गयी है ॥ १२ ॥
मनसा च प्रदीप्तेन ब्रह्मज्ञानजलेन च ।
स्नाति यो मानसे तीर्थे तत्स्नानं तत्त्वदर्शिनः ॥ १३ ॥
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जो प्रसन्न एवं शुद्ध मनसे ब्रह्मज्ञानरूपी जलके द्वारा मानसतीर्थमें स्नान करता है, उसका वह स्नान ही तत्त्वदर्शी ज्ञानीका स्नान माना गया है ॥ १३ ॥
समारोपितशौचस्तु नित्यं भावसमाहितः ।
केवलं गुणसम्पन्नः शुचिरेव नरः सदा ॥ १४ ॥
जो सदा शौचाचारसे सम्पन्न, विशुद्ध भावसे युक्त और केवल सद्गुणोंसे विभूषित है, उस मनुष्यको सदा शुद्ध ही समझना चाहिये ॥ १४ ॥
शरीरस्थानि तीर्थानि प्रोक्तान्येतानि भारत ।
पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्यानि शृणु तान्यपि ॥ १५ ॥
भारत! यह मैंने शरीरमें स्थित तीर्थोंका वर्णन किया; अब पृथ्वीपर जो पुण्यतीर्थ हैं, उनका महत्त्व भी सुनो ॥ १५ ॥
शरीरस्य यथोद्देशाः शुचयः परिकीर्तिताः ।
तथा पृथिव्या भागाश्च पुण्यानि सलिलानि च ॥ १६ ॥
जैसे शरीरके विभिन्न स्थान पवित्र बताये गये हैं, उसी प्रकार पृथ्वीके भिन्न - भिन्न भाग भी पवित्र तीर्थ हैं और वहाँका जल पुण्यदायक है ॥ १६ ॥
कीर्तनाश्चैव तीर्थस्य स्नानाश्च पितृतर्पणात् ।
धुन्ति पापं तीर्थेषु ते प्रयान्ति सुखं दिवम् ॥ १७ ॥
जो लोग तीर्थोंके नाम लेकर तीर्थोंमें स्नान करके तथा उनमें पितरोंका तर्पण करके अपने पाप धो डालते हैं, वे बड़े सुखसे स्वर्गमें जाते हैं ॥ १७ ॥
परिग्रहाच्च साधूनां पृथिव्याश्चैव तेजसा ।
अतीव पुण्यभागास्ते सलिलस्य च तेजसा ॥ १८ ॥
पृथ्वीके कुछ भाग साधु पुरुषोंके निवाससे तथा स्वयं पृथ्वी और जलके तेजसे अत्यन्त पवित्र माने गये हैं ॥ १८ ॥
मनसश्च पृथिव्याश्च पुण्यास्तीर्थास्तथापरे ।
उभयोरेव यः स्नायात् स सिद्धिं शीघ्रमाप्नुयात् ॥ १ ९ ॥
इस प्रकार पृथ्वीपर और मनमें भी अनेक पुण्यमय तीर्थ हैं । जो इन दोनों प्रकारके तीर्थोंमें स्नान करता है, वह शीघ्र ही परमात्मप्राप्तिरूप सिद्धि प्राप्त कर लेता है ॥ १ ९ ॥
यथा बलं क्रियाहीनं क्रिया वा बलवर्जिता ।
नेह साधयते कार्यं समायुक्ता तु सिध्यति ॥ २० ॥
एवं शरीरशौचेन तीर्थशौचेन चान्वितः ।
शुचिः सिद्धिमवाप्नोति द्विविधं शौचमुत्तमम् ॥ २१ ॥
जैसे क्रियाहीन बल अथवा बलरहित क्रिया इस जगत्में कार्यका साधन नहीं कर सकती । बल और क्रिया दोनोंके संयुक्त होनेपर ही कार्यकी सिद्धि होती है, इसी प्रकार
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शरीरशुद्धि और तीर्थशुद्धिसे युक्त पुरुष ही पवित्र होकर परमात्मप्राप्तिरूप सिद्धि प्राप्त करता है । अतः दोनों प्रकारकी शुद्धि ही उत्तम मानी गयी है ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि शौचानुपृच्छा नामाष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शुद्धिकी जिज्ञासानामक एक सौ आठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १०८ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पावका श्लोक मिलाकर कुल २१३ श्लोक हैं )