श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 981–990
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 981–990
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शरीरमें सम्पूर्ण भूतोंसे युक्त हुआ वह जीव ही सुख या दुःख पाता है । उस समय पाँचों भूतोंमें स्थित उनके अधिष्ठाता देवता जीवके शुभ या अशुभ कर्मको देखते हैं । अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ ३३ ॥
युधिष्ठिर उवाच
त्वगस्थिमांसमुत्सृज्य तैश्च भूतैर्विवर्जितः ।
जीवः स भगवन् क्वस्थः सुखदुःखे समश्नुते ॥ ३४ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! जीव त्वचा, अस्थि और मांसमय शरीरका त्याग करके जब पाँचों भूतोंके सम्बन्धसे पृथक् हो जाता है, तब कहाँ रहकर वह सुख -दुःखका उपभोग करता है? ॥ ३४ ॥
बृहस्पतिरुवाच
जीवः कर्मसमायुक्तः शीघ्रं रेतस्त्वमागतः ।
स्त्रीणां पुष्पं समासाद्य सूते कालेन भारत ॥ ३५ ॥
बृहस्पतिजीने कहा- भारत! जीव अपने कर्मोंसे प्रेरित होकर शीघ्र ही वीर्यभावको प्राप्त होता है और स्त्रीके रजमें प्रविष्ट होकर समयानुसार जन्म धारण करता है ॥ ३५ ॥
यमस्य पुरुषैः क्लेशं यमस्य पुरुषैर्वधम् ।
दुःखं संसारचक्रं च नरः क्लेशं स विन्दति ॥ ३६ ॥
(गर्भमें आनेके पहले सूक्ष्मशरीरमें स्थित होकर अपने दुष्कर्मोंके कारण ) वह यमदूतोंद्वारा नाना प्रकारके क्लेश पाता, उनके प्रहार सहता और दुःखमय संसारचक्रमें भाँति - भाँतिके कष्ट भोगता है ॥ ३६ ॥
इहलोके च स प्राणी जन्मप्रभृति पार्थिव ।
सुकृतं कर्म वै भुङ्क्ते धर्मस्य फलमाश्रितः ॥ ३७ ॥
यदि धर्मं यथाशक्ति जन्मप्रभृति सेवते ।
ततः स पुरुषो भूत्वा सेवते नित्यदा सुखम् ॥ ३८ ॥
पृथ्वीनाथ! यदि प्राणी इस लोकमें जन्मसे ही पुण्यकर्ममें लगा रहता है तो वह धर्मके फलका आश्रय लेकर उसके अनुसार सुख भोगता है । यदि अपनी शक्तिके अनुसार बाल्यकालसे ही धर्मका सेवन करता है तो वह मनुष्य होकर सदा सुखका अनुभव करता है ॥
अथान्तरा तु धर्मस्याप्यधर्ममुपसेवते ।
सुखस्यानन्तरं दुःखं स जीवोऽप्यधिगच्छति ॥ ३ ९ ॥
किंतु धर्मके बीचमें यदि कभी- कभी वह अधर्मका भी आचरण कर बैठता है तो उसे सुखके बाद दुःख भी भोगना पड़ता है ॥ ३ ९ ॥ अधर्मेण समायुक्तो यमस्य विषयं गतः ।
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महद् दुःखं समासाद्य तिर्यग्योनौ प्रजायते ॥ ४० ॥
अधर्मपरायण मनुष्य यमलोकमें जाता है और वहाँ महान् दुःख भोगकर यहाँ पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेता है ॥ ४० ॥
कर्मणा येन येनेह यस्यां योनौ प्रजायते ।
जीवो मोहसमायुक्तस्तन्मे निगदतः शृणु ॥ ४१ ॥
जीव मोहके वशीभूत होकर जिस-जिस कर्मका अनुष्ठान करनेसे जैसी - जैसी योनिमें जन्म धारण करता है, उसे बता रहा हूँ, सुनो ॥ ४१ ॥
यदेतदुच्यते शास्त्रे सेतिहासे च च्छन्दसि ।
यमस्य विषयं घोरं मर्त्यो लोकः प्रपद्यते ॥ ४२ ॥
शास्त्र, इतिहास और वेदमें जो यह बात बतायी गयी है कि मनुष्य इस लोकमें पाप करनेपर मृत्युके पश्चात् यमराजके भयंकर लोकमें जाता है, यह सत्य ही है ॥
इह स्थानानि पुण्यानि देवतुल्यानि भूपते ।
तिर्यग्योन्यतिरिक्तानि गतिमन्ति च सर्वशः ॥ ४३ ॥
भूपाल! इस यमलोकमें देवलोकके समान पुण्यमय स्थान भी हैं, जिनमें तिर्यक् ( तथा कीट- पतंग आदि) योनिके प्राणियोंको छोड़कर समस्त पुण्यात्मा जंगम जीव जाते हैं ॥ ४३ ॥
यमस्य भवने दिव्ये ब्रह्मलोकसमे गुणैः ।
कर्मभिर्नियतैर्बद्धो जन्तुर्दुःखान्युपाश्नुते ॥ ४४ ॥
यमराजका भवन सौन्दर्य आदि गुणोंके कारण ब्रह्मलोकके समान दिव्य भी है । परंतु अपने नियत पापकर्मोंसे बँधा हुआ जीव वहाँ भी नरकमें पड़कर दुःख भोगता है ॥ ४४ ॥
येन येन तु भावेन कर्मणा पुरुषो गतिम् ।
प्रयाति परुषां घोरां तत्ते वक्ष्याम्यतः परम् ॥ ४५ ॥
मनुष्य जिस -जिस भाव और जिस-जिस कर्मसे निष्ठुरतापूर्ण भयंकर गतिको प्राप्त होता है, अब उसीको बता रहा हूँ ॥ ४५ ॥
अधीत्य चतुरो वेदान् द्विजो मोहसमन्वितः ।
पतितात् प्रतिगृह्याथ खरयोनौ प्रजायते ॥ ४६ ॥
जो द्विज चारों वेदोंका अध्ययन करनेके बाद भी मोहवश पतित मनुष्योंसे दान लेता है, उसका गदहेकी योनिमें जन्म होता है ॥ ४६ ॥
खरो जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत ।
खरो मृतो बलीवर्दः सप्त वर्षाणि जीवति ॥ ४७ ॥
भारत! गदहेकी योनिमें वह पंद्रह वर्षोंतक जीवित रहता है । उसके बाद मरकर बैल होता है । उस योनिमें वह सात वर्षोंतक जीवित रहता है ॥ ४७ ॥
बलीवर्दो मृतश्चापि जायते ब्रह्मराक्षसः ।
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ब्रह्मरक्षश्च मासांस्त्रींस्ततो जायति ब्राह्मणः ॥ ४८ ॥
जब बैलका शरीर छूट जाता है, तब वह ब्रह्मराक्षस होता है । तीन मासतक ब्रह्मराक्षस रहनेके बाद फिर वह ब्राह्मणका जन्म पाता है ॥ ४८ ॥
पतितं याजयित्वा तु कृमियोनौ प्रजायते ।
तत्र जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत ॥ ४ ९ ॥
भारत! जो ब्राह्मण पतित पुरुषका यज्ञ कराता है, वह मरनेके बाद कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है और उस योनिमें पंद्रह वर्षोंतक जीवित रहता है ॥ ४ ९ ॥
कृमिभावाद् विमुक्तस्तु ततो जायति गर्दभः ।
गर्दभः पञ्च वर्षाणि पञ्च वर्षाणि सूकरः ॥ ५० ॥
कुक्कुटः पञ्च वर्षाणि पञ्च वर्षाणि जम्बुकः ।
श्वा वर्षमेकं भवति ततो जायति मानवः ॥ ५१ ॥
कीड़ेकी योनिसे छूटनेपर वह गदहेका जन्म पाता है। पाँच वर्षतक गदहा रहकर पाँच वर्ष सूअर, पाँच वर्ष मुर्गा, पाँच वर्ष सियार और एक वर्ष कुत्ता होता है । उसके बाद वह मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होता है ॥
उपाध्यायस्य यः पापं शिष्यः कुर्यादबुद्धिमान् ।
सजीव इह संसारांस्त्रीनाप्नोति न संशयः ॥ ५२ ॥
प्राक् श्वा भवति राजेन्द्र ततः क्रव्यात्ततः खरः ।
ततः प्रेतः परिक्लिष्टः पश्चाज्जायति ब्राह्मणः ॥ ५३ ॥
जो मूर्ख शिष्य अपने अध्यापकका अपराध करता है, वह यहाँ निम्नांकित तीन योनियोंमें जन्म ग्रहण करता है, इसमें संशय नहीं है । राजेन्द्र! पहले तो वह कुत्ता होता है, फिर राक्षस और गदहा होता है । उसके बाद मरकर प्रेतावस्थामें अनेक कष्ट भोगनेके पश्चात् ब्राह्मणका जन्म पाता है ॥ ५२-५३ ॥
मनसापि गुरोर्भार्यां यः शिष्यो याति पापकृत् ।
स उग्रान् प्रैति संसारानधर्मेणेह चेतसा ॥ ५४ ॥
जो पापाचारी शिष्य गुरुपत्नीके साथ समागमका विचार भी मनमें लाता है, वह अपने मानसिक पापके कारण भयंकर योनियोंमें जन्म लेता है ॥ ५४ ॥
श्वयोनी तु स सम्भूतस्त्रीणि वर्षाणि जीवति ।
तत्रापि निधनं प्राप्तः कृमियोनौ प्रजायते ॥ ५५ ॥
कृमिभावमनुप्राप्तो वर्षमेकं तु जीवति ।
ततस्तु निधनं प्राप्तो ब्रह्मयोनौ प्रजायते ॥ ५६ ॥
पहले कुत्तेकी योनिमें जन्म लेकर वह तीन वर्षतक जीवन धारण करता है । उस योनिमें मृत्युको प्राप्त होकर वह कीड़ेकी योनिमें उत्पन्न होता है । कीटयोनिमें जन्म लेकर वह एक
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वर्षतक जीवित रहता है । फिर मरनेके बाद उसका ब्राह्मण- योनिमें जन्म होता है ॥ ५५-५६ ॥
यदि पुत्रसमं शिष्यं गुरुर्हन्यादकारणे ।
आत्मनः कामकारेण सोऽपि हिंस्रः प्रजायते ॥ ५७ ॥
यदि गुरु अपने पुत्रके समान शिष्यको बिना कारणके ही मारता पीटता है तो वह अपनी स्वेच्छा - चारिताके कारण हिंसक पशुकी योनिमें जन्म लेता है ॥
पितरं मातरं चैव यस्तु पुत्रोऽवमन्यते ।
सोऽपि राजन् मृतो जन्तुः पूर्वं जायेत गर्दभः ॥ ५८ ॥
राजन्! जो पुत्र अपने माता -पिताका अनादर करता है, वह भी मरनेके बाद पहले गदहा नामक प्राणी होता ॥ ५८ ॥
गर्दभत्वं तु सम्प्राप्य दश वर्षाणि जीवति ।
संवत्सरं तु कुम्भीरस्ततो जायेत मानवः ॥ ५ ९ ॥
गदहेका शरीर पाकर वह दस वर्षोंतक जीवित रहता है । फिर एक सालतक घड़ियाल रहनेके बाद मानवयोनिमें उत्पन्न होता है ॥ ५ ९ ॥
पुत्रस्य मातापितरौ यस्य रुष्टात्रुभावपि ।
गुर्वपध्यानतः सोऽपि मृतो जायति गर्दभः ॥ ६० ॥
जिस पुत्रके ऊपर माता और पिता दोनों ही रुष्ट होते हैं, वह गुरुजनोंके अनिष्टचिन्तनके कारण मृत्युके बाद गदहा होता है ॥ ६० ॥
खरो जीवति मासांस्तु दश श्वा च चतुर्दश ।
बिडालः सप्तमासांस्तु ततो जायति मानवः ॥ ६१ ॥
गदहेकी योनिमें वह दस मासतक जीवित रहता है । उसके बाद चौदह महीनोंतक कुत्ता और सात मासतक बिलाव होकर अन्तमें वह मनुष्यकी योनिमें जन्म ग्रहण करता है ॥ ६१ ॥
मातापितरावाक्रुश्य सारिकः सम्प्रजायते ।
ताडयित्वा तु तावेव जायते कच्छपो नृप ॥ ६२ ॥
माता- पिताकी निन्दा करके अथवा उन्हें गाली देकर मनुष्य दूसरे जन्ममें मैना होता है । नरेश्वर! जो माता- पिताको मारता है, वह कछुआ होता है ॥ ६२ ॥
कच्छपो दश वर्षाणि त्रीणि वर्षाणि शल्यकः ।
व्यालो भूत्वा च षण्मासांस्ततो जायति मानुषः ॥ ६३ ॥
दस वर्षतक कछुआ रहनेके पश्चात् तीन वर्ष साही और छः महीनेतक सर्प होता है ।
उसके अनन्तर वह मनुष्यकी योनिमें जन्म लेता है ॥ ६३ ॥
भर्तृपिण्डमुपाश्नन् यो राजद्विष्टानि सेवते ।
सोऽपि मोहसमापन्नो मृतो जायति वानरः ॥ ६४ ॥
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जो पुरुष राजाके टुकड़े खाकर पलता हुआ भी मोहवश उसके शत्रुओंकी सेवा करता है, वह मरनेके बाद वानर होता है ॥ ६४ ॥
वानरो दश वर्षाणि पञ्च वर्षाणि मूषिकः ।
श्वाथ भूत्वा तु षण्मासांस्ततो जायति मानुषः ॥ ६५ ॥
दस वर्षोंतक वानर, पाँच वर्षोंतक चूहा और छ: महीनोंतक कुत्ता होकर वह मनुष्यका जन्म पाता है ॥
न्यासापहर्ता तु नरो यमस्य विषयं गतः ।
संसाराणां शतं गत्वा कृमियोनौ प्रजायते ॥ ६६ ॥
दूसरोंकी धरोहर हड़प लेनेवाला मनुष्य यमलोकमें जाता और क्रमशः सौ योनियोंमें भ्रमण करके अन्तमें कीड़ा होता है ॥ ६६ ॥
तत्र जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत ।
दुष्कृतस्य क्षयं कृत्वा ततो जायति मानुषः ॥ ६७ ॥
भारत! कीड़ेकी योनिमें वह पंद्रह वर्षोंतक जीवित रहता है और अपने पापोंका क्षय करके अन्तमें मनुष्य - योनिमें जन्म लेता है ॥ ६७ ॥
असूयको नरश्चापि मृतो जायति शार्ङ्गकः ।
विश्वासहर्ता तु नरो मीनो जायति दुर्मतिः ॥ ६८ ॥
दूसरोंके दोष ढूँढ़नेवाला मनुष्य हरिणकी योनिमें जन्म लेता है तथा जो अपनी खोटी बुद्धिके कारण किसीके साथ विश्वासघात करता है, वह मनुष्य मछली होता है ॥ ६८ ॥
भूत्वा मीनोऽष्ट वर्षाणि मृतो जायति भारत ।
मृगस्तु चतुरो मासांस्ततश्छागः प्रजायते ॥ ६ ९ ॥
भारत! आठ वर्षोंतक मछली रहकर मरनेके बाद वह चार मासतक मृग होता है ।
उसके बाद बकरेकी योनिमें जन्म लेता है ॥ ६ ९ ॥
छागस्तु निधनं प्राप्य पूर्णे संवत्सरे ततः ।
कीटः संजायते जन्तुस्ततो जायति मानुषः ॥ ७० ॥
बकरा पूरे एक वर्षपर मृत्युको प्राप्त होनेके पश्चात् कीड़ा होता है । उसके बाद उस जीवको मनुष्यका जन्म मिलता है ॥ ७० ॥
धान्यान् यवांस्तिलान् माषान् कुलत्थान् सर्षपांश्चणान् ।
कलापानथ मुद्गांश्च गोधूमानतसींस्तथा ॥ ७१ ॥
सस्यस्यान्यस्य हर्ता च मोहाज्जन्तुरचेतनः ।
स जायते महाराज मूषिको निरपत्रपः ॥ ७२ ॥
महाराज! जो पुरुष लज्जाका परित्याग करके अज्ञान और मोहके वशीभूत होकर धान, जौ, तिल, उड़द, कुलथी, सरसों, चना, मटर, मूँग, गेहूँ और तीसी तथा दूसरे - दूसरे अनाजोंकी चोरी करता है, वह मरनेके बाद पहले चूहा होता है ॥ ७१-७२ ॥
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ततः प्रेत्य महाराज मृतो जायति सूकरः ।
सूकरो जातमात्रस्तु रोगेण म्रियते नृप ॥ ७३ ॥
राजन्! फिर वह चूहा मृत्युके पश्चात् सूअर होता है । नरेश्वर! वह सूअर जन्म लेते ही रोगसे मर जाता है ॥ ७३ ॥
श्वा ततो जायते मूढः कर्मणा तेन पार्थिव ।
भूत्वा श्वा पञ्च वर्षाणि ततो जायति मानवः ॥ ७४ ॥
पृथ्वीनाथ! फिर उसी कर्मसे वह मूढ़ जीव कुत्ता होता है और पाँच वर्षतक कुत्ता रहकर अन्तमें मनुष्यका जन्म पाता है ॥ ७४ ॥
परदाराभिमर्शं तु कृत्वा जायति वै वृकः ।
श्वा शृगालस्ततो गृध्रो व्यालः कङ्को बकस्तथा ॥ ७५ ॥
परस्त्रीगमनका पाप करके मनुष्य क्रमशः भेड़िया, कुत्ता, सियार, गीध, साँप, कंक और बगुला होता है ॥ ७५ ॥
भ्रातुर्भार्यां तु पापात्मा यो धर्षयति मोहितः ।
पुंस्कोकिलत्वमाप्नोति सोऽपि संवत्सरं नृप ॥ ७६ ॥
नरेश्वर! जो पापात्मा मोहवश भाईकी स्त्रीके साथ बलात्कार करता है, वह एक वर्षतक कोयलकी योनिमें पड़ा रहता है ॥ ७६ ॥
सखिभार्यां गुरोर्भार्यां राजभार्यां तथैव च ।
प्रधर्षयित्वा कामाय मृतो जायति सूकरः ॥ ७७ ॥
जो कामनाकी पूर्तिके लिये मित्र, गुरु और राजाकी स्त्रीका सतीत्व भंग करता है, वह मरनेके बाद सूअर होता है ॥ ७७ ॥
सूकरः पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि श्वाविधः ।
बिडालः पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि कुक्कुटः ॥ ७८ ॥
पिपीलिकस्तु मासांस्त्रीन् कीटः स्यान्मासमेव तु ।
एतानासाद्य संसारान् कृमियोनौ प्रजायते ॥ ७९ ॥
पाँच वर्षतक सूअर रहकर दस वर्ष भेड़िया, पाँच वर्ष बिलाव, दस वर्ष मुर्गा, तीन महीने चींटी और एक महीने कीड़ेकी योनिमें रहता है । इन सभी योनियोंमें चक्कर लगानेके बाद वह पुनः कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है ॥ ७८-७९ ॥
तत्र जीवति मासांस्तु कृमियोनौ चतुर्दश ।
ततोऽधर्मक्षयं कृत्वा पुनर्जायति मानवः ॥ ८० ॥
उस कीट -योनिमें वह चौदह महीनोंतक जीवन धारण करता है । तदनन्तर पापक्षय करके वह पुनः मनुष्य- योनिमें जन्म लेता है ॥ ८० ॥
उपस्थिते विवाहे तु यज्ञे दानेऽपि वा विभो ।
मोहात् करोति यो विघ्नं स मृतो जायते कृमिः ॥ ८१ ॥
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प्रभो! जो विवाह, यज्ञ अथवा दानका अवसर आनेपर मोहवश उसमें विघ्न डालता है, वह भी मरनेके बाद कीड़ा ही होता है ॥ ८१ ॥
कृमिर्जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत ।
अधर्मस्य क्षयं कृत्वा ततो जायति मानवः ॥ ८२ ॥
भारत! वह कीट पंद्रह वर्षोंतक जीवित रहता है । फिर पापोंका क्षय करके वह मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है ॥ ८२ ॥
पूर्वं दत्त्वा तु यः कन्यां द्वितीये दातुमिच्छति ।
सोऽपि राजन् मृतो जन्तुः कृमियोनौ प्रजायते ॥ ८३ ॥
राजन्! जो पहले एक व्यक्तिको कन्यादान करके फिर दूसरेको उसी कन्याका दान करना चाहता है, वह भी मरनेके बाद कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है ॥ ८३ ॥
तत्र जीवति वर्षाणि त्रयोदश युधिष्ठिर ।
अधर्मसंक्षये युक्तस्ततो जायति मानवः ॥ ८४ ॥
युधिष्ठिर! उस योनिमें वह तेरह वर्षोंतक जीवन धारण करता है । तदनन्तर पापक्षयके पश्चात् वह पुनः मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होता है ॥ ८४ ॥
देवकार्यमकृत्वा तु पितृकार्यमथापि वा ।
अनिर्वाप्य समश्नन् वै मृतो जायति वायसः ॥ ८५ ॥
जो देवकार्य अथवा पितृकार्य न करके बलि- वैश्वदेव किये बिना ही अन्न ग्रहण करता है, वह मरनेके बाद कौएकी योनिमें जन्म लेता है ॥ ८५ ॥
वायसः शतवर्षाणि ततो जायति कुक्कुटः ।
जायते व्यालकश्चापि मासं तस्मात् तु मानुषः ॥ ८६ ॥
सौ वर्षोंतक कौएके शरीरमें रहकर वह मुर्गा होता है । उसके बाद एक मासतक सर्प रहता है । तत्पश्चात् मनुष्यका जन्म पाता है ॥ ८६ ॥
ज्येष्ठं पितृसमं चापि भ्रातरं योऽवमन्यते ।
सोऽपि मृत्युमुपागम्य क्रौञ्चयोनौ प्रजायते ॥ ८७ ॥
बड़ा भाई पिताके समान आदरणीय है, जो उसका अपमान करता है, उसे मृत्युके बाद क्रौंच पक्षीकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है ॥ ८७ ॥
क्रौञ्चो जीवति वर्षं तु ततो जायति चीरकः ।
ततो निधनमापन्नो मानुषत्वमुपाश्नुते ॥ ८८ ॥
क्रौंच होकर वह एक वर्षतक जीवित रहता है । उसके बाद चीरक जातिका पक्षी होता और फिर मरनेके बाद मनुष्य योनिमें जन्म पाता है ॥ ८८ ॥
वृषलो ब्राह्मणीं गत्वा कृमियोनौ प्रजायते ।
ततः सम्प्राप्य निधनं जायते सूकरः पुनः ॥ ८ ९ ॥
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शूद्र-जातिका पुरुष ब्राह्मणजातिकी स्त्रीके साथ समागम करके देहत्यागके पश्चात्
पहले कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है । फिर मरनेके बाद सूअर होता है ॥ ८ ९ ॥
सूकरो जातमात्रस्तु रोगेण म्रियते नृप ।
श्वा ततो जायते मूढः कर्मणा तेन पार्थिव ॥ ९० ॥
नरेश्वर! सूअरकी योनिमें जन्म लेते ही वह रोगसे मर जाता है । पृथ्वीनाथ! तत्पश्चात् वह मूढ़ जीव उसी पाप - कर्मके कारण कुत्ता होता है ॥ ९ ० ॥
श्वा भूत्वा कृतकर्मासौ जायते मानुषस्ततः ।
तत्रापत्यं समुत्पाद्य मृतो जायति मूषिकः ॥ ९ १ ॥
कुत्ता होनेपर पापकर्मका भोग समाप्त करके वह मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है । मनुष्ययोनिमें भी वह एक ही संतान पैदा करके मर जाता है और शेष पापका फल भोगनेके लिये चूहा होता है ॥ ९ १ ॥
कृतघ्नस्तु मृतो राजन् यमस्य विषयं गतः ।
यमस्य पुरुषैः क्रुद्धैर्वधं प्राप्नोति दारुणम् ॥ ९ २ ॥
राजन्! कृतघ्न मनुष्य मरनेके बाद यमराजके लोकमें जाता है । वहाँ क्रोधमें भरे हुए यमदूत उसके ऊपर बड़ी निर्दयताके साथ प्रहार करते हैं ॥ ९ २ ॥
दण्डं समुद्गरं शूलमग्निकुम्भं च दारुणम् ।
असिपत्रवनं घोरवालुकं कूटशाल्मलीम् ॥ ९ ३ ॥
एताश्चान्याश्च बह्वीश्च यमस्य विषयं गतः ।
यातनाः प्राप्य तत्रोग्रास्ततो वध्यति भारत ॥ ९ ४ ॥
भारत! वह दण्ड, मुद्गर और शूलकी चोट खाकर दारुण अग्निकुम्भ (कुम्भीपाक ), असिपत्रवन, तपी हुई भयंकर बालू, काँटोंसे भरी हुई शाल्मली आदि नरकोंमें कष्ट भोगता है । यमलोकमें पहुँचकर इन ऊपर बताये हुए तथा और भी बहुत- से नरकोंकी भयंकर यातनाएँ भोगकर वह वहाँ यमदूतोंद्वारा पीटा जाता है ॥
ततो हतः कृतघ्नः स तत्रोग्रैर्भरतर्षभ ।
संसारचक्रमासाद्य कृमियोनौ प्रजायते ॥ ९ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार निर्दयी यमदूतोंसे पीड़ित हुआ कृतघ्न पुरुष पुनः संसारचक्रमें आता और कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है ॥ ९ ५ ॥
कृमिर्भवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत ।
ततो गर्भं समासाद्य तत्रैव म्रियते शिशुः ॥ ९ ६ ॥
भारत! पंद्रह वर्षोंतक वह कीड़ेकी योनिमें रहता है । फिर गर्भमें आकर वहीं गर्भस्थ शिशुकी दशामें ही मर जाता है ॥ ९ ६ ॥
ततो गर्भशतैर्जन्तुर्बहुभिः सम्प्रपद्यते ।
संसारांश्च बहून् गत्वा ततस्तिर्यक्षु जायते ॥ ९ ७ ॥
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इस तरह कई सौ बार वह जीव गर्भकी यन्त्रणा भोगता है । तदनन्तर बहुत बार जन्म लेनेके पश्चात् वह तिर्यग्योनिमें उत्पन्न होता है ॥ ९ ७ ॥
ततो दुःखमनुप्राप्य बहु वर्षगणानिह ।
अपुनर्भवसंयुक्तस्ततः कूर्मः प्रजायते ॥ ९ ८ ॥
इन योनियोंमें बहुत वर्षोंतक दुःख भोगनेके पश्चात् वह फिर मनुष्ययोनिमें न आकर दीर्घकालके लिये कछुआ हो जाता है ॥ ९ ८ ॥
दधि हृत्वा बकश्चापि प्लवो मत्स्यानसंस्कृतान् ।
चोरयित्वा तु दुर्बुद्धिर्मधु दंशः प्रजायते ॥ ९९ ॥
दुर्बुद्धि मनुष्य दहीकी चोरी करके बगला होता है, कच्ची मछलियोंकी चोरी करके वह कारण्डव नामक जलपक्षी होता है और मधुका अपहरण करके वह डाँस ( मच्छर ) की योनिमें जन्म लेता है ॥ ९९ ॥
फलं वा मूलकं हृत्वा अपूपं वा पिपीलिकाः ।
चोरयित्वा च निष्पावं जायते हलगोलकः ॥ १०० ॥
फल, मूल अथवा पूएकी चोरी करनेपर मनुष्यको चींटीकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है । निष्पाव ( मटर या उड़द) की चोरी करनेवाला हलगोलक नामवाला कीड़ा होता है ॥ १०० ॥
पायसं चोरयित्वा तु तित्तिरित्वमवाप्नुते ।
हृत्वा पिष्टमयं पूपं कुम्भोलूकः प्रजायते ॥ १०१ ॥
खीरकी चोरी करनेवाला तीतरकी योनिमें जन्म लेता है । आटेका पूआ चुराकर मनुष्य मरनेके बाद उल्लू होता है ॥ १०१ ॥
अयो हृत्वा तु दुर्बुद्धिर्वायसो जायते नरः ।
कांस्यं हृत्वा तु दुर्बुद्धिर्हारितो जायते नरः ॥ १०२ ॥
लोहेकी चोरी करनेवाला मूर्ख मानव कौवा होता है । काँसकी चोरी करके खोटी बुद्धिवाला मनुष्य हारीत नामक पक्षी होता है ॥ १०२ ॥
राजतं भाजनं हृत्वा कपोतः सम्प्रजायते ।
हृत्वा तु काञ्चनं भाण्डं कृमियोनौ प्रजायते ॥ १०३ ॥
चाँदीका बर्तन चुरानेवाला कबूतर होता है और सुवर्णमय भाण्डकी चोरी करके मनुष्यको कीड़ेकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है ॥ १०३ ॥
पत्रोर्णं चोरयित्वा तु कृकलत्वं निगच्छति ।
कौशिकं तु ततो हृत्वा नरो जायति वर्तकः ॥ १०४ ॥
ऊनी वस्त्र चुरानेवाला कृकल ( गिरगिट) की योनिमें जन्म लेता है । कौशेय ( रेशमी ) वस्त्रकी चोरी करनेपर मनुष्य बत्तक होता है ॥ १०४ ॥
अंशुकं चोरयित्वा तु शुको जायति मानवः ।
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चोरयित्वा दुकूलं तु मृतो हंसः प्रजायते ॥ १०५ ॥
अंशुक ( महीन कपड़े ) की चोरी करके मनुष्य तोतेका जन्म पाता है तथा दुकूल ( उत्तरीय वस्त्र) की चोरी करके मृत्युको प्राप्त हुआ मानव हंसकी योनिमें जन्म लेता ॥ १०५ ॥
क्रौञ्चः कार्पासिकं हृत्वा मृतो जायति मानवः ।
चोरयित्वा नरः पट्टं त्वाविकं चैव भारत ॥ १०६ ॥
क्षौमं च वस्त्रमादाय शशो जन्तुः प्रजायते । सूती वस्त्रकी चोरी करके मरा हुआ मनुष्य क्रौंच पक्षीकी योनिमें जन्म लेता है । भारत! पाटम्बर, भेड़के ऊनका बना हुआ तथा क्षौम (रेशमी ) वस्त्र चुरानेवाला मनुष्य खरगोश नामक जन्तु होता है ॥ १०६३ ॥
वर्णान् हत्वा तु पुरुषो मृतो जायति बर्हिणः ॥ १०७ ॥
हृत्वा रक्तानि वस्त्राणि जायते जीवजीवकः । अनेक प्रकारके रंगोंकी चोरी करके मृत्युको प्राप्त हुआ पुरुष मोर होता है । लाल कपड़े चुरानेवाला मनुष्य चकोरकी योनिमें जन्म लेता है ॥ १०७३ ॥
वर्णकादींस्तथा गन्धांश्चोरयित्वेह मानवः ॥ १०८ ॥
छुच्छुन्दरित्वमाप्नोति राजल्लोँभपरायणः ।
तत्र जीवति वर्षाणि ततो दश च पञ्च च ॥ १० ९ ॥
राजन्! जो मनुष्य लोभके वशीभूत होकर वर्णक ( अनुलेपन) आदि तथा चन्दनकी चोरी करता है, वह छछूंदर होता है । उस योनिमें वह पंद्रह वर्षतक जीवित रहता है ॥ १०८-१०९ ॥
अधर्मस्य क्षयं गत्वा ततो जायति मानुषः ।
चोरयित्वा पयश्चापि बलाका सम्प्रजायते ॥ ११० ॥
फिर अधर्मका क्षय हो जानेपर वह मनुष्यका जन्म पाता है । दूध चुरानेवाली स्त्री बगुली होती है ॥ ११० ॥
यस्तु चोरयते तैलं नरो मोहसमन्वितः ।
सोऽपि राजन् मृतो जन्तुस्तैलपायी प्रजायते ॥ १११ ॥
राजन्! जो मनुष्य मोहयुक्त होकर तेल चुराता है, वह मरनेपर तेलपायी नामक कीड़ा होता है ॥ १११ ॥
अशस्त्रं पुरुषं हत्वा सशस्त्रः पुरुषाधमः ।
अर्थार्थी यदि वा वैरी स मृतो जायते खरः ॥ ११२ ॥
जो नीच मनुष्य धनके लोभसे अथवा शत्रुताके कारण हथियार लेकर निहत्थे पुरुषको मार डालता है, वह अपनी मृत्युके बाद गदहेकी योनिमें जन्म पाता है ॥ खरो जीवति वर्षे द्वे ततः शस्त्रेण वध्यते ।