सनातन धर्मालोक १-२ — पृष्ठ 101–110
सनातन धर्मालोक १-२ · पृष्ठ 101–110
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१८२ G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * ' व ' होता है । तुम्हारे ' लिए यह वहुवचन है, तब वादीने ' तुम्हारे लिए ' यह ' बहुवचनका अर्थ कैसे किया? वादीसे R दिए गये प्रमाणोंमें जब ' नमो वः ' नहीं है, तब; ' तुम्हारे लिए ' I प्रर्थ नहीं हो सकता । ' तेरे लिए ' ही अर्थ होगा । यदि ' ते ' का अर्थ ' तुम्हारे लिए ' है तब ' वः ' का क्या अर्थ होगा? से और ' तेरे लिए ' की क्या संस्कृत होगी? यदि ' तुभ्यं ' होगी, तो ' तुभ्यं ' के स्थानापन्न ' ते ' में अर्थभेद कैसे होगा? स्वामी रे वेदानन्दजीने आर्यसमाज के ग्रन्थसाहिब स. प्र. की पृष्ठ ३६ की टिप्पणी में ' तुझे नमस्कार ' अर्थ किया है; यह ठीक है । पर प्राप लोग क्या मान्यको ' तुझे ' कहते हैं? यदि नहीं तो बड़े के Fil- लिए छोटे - द्वारा किया हुआ ' नमस्ते ' ठीक नहीं हुआ । नत्य इसके अतिरिक्त क्या आप लोग मान्यको भी ' तुम्हारे नतः लिए ' यह शब्द कभी कहते हैं? यदि नहीं; तो क्यों? यदि 71 इस कथन से मान्यका अपमान है; तो ' ते ' से भी मान्यका अपमान सिद्ध हुआ । तब आप लोग ' नमस्ते ' कहकर मान्य-LE का अपमान क्यों करते हैं? जब वादीके मत में ' नमस्ते ' का हारे । अर्थ ' तुम्हारेलिये नमः ' है; तो वादीने ' नमस्ते स्वात्मवेदिने ' हारे । ( ३३ ) ( २८ ) ( २५ ) ( २२ ) ( २१ ) ( १७ ) ( १४ ) श्रादि प्रमाणों में ' तेरे लिए नमः हो ' यह न कहकर ' तुम्हें नमस्ते ' ' आपको नमस्ते ' यह अर्थ कैसे किया? क्या यह ' नमस्ते ' एक पद है— जो उक्त अर्थ किया? इससे वादीके सारे ट्रैक्टका उसीके ' नमस्ते ' में द्विपदत्वके सिद्धान्तसे खण्डन होगया प्रतिरिक्त उसके दो पद होनेसे उनकी । इसके अनित्यता होगई; क्यों-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. * नमस्ते व्याख्या निरीक्षण १८३ कि एकत्व भी जब नित्य और अनित्य है; तो द्वित्वादि तो सर्वत्र अनित्य ही होता है । श्रागे वादी ३३-३४ पृष्ठमें पूर्वपक्ष उपस्थित करता है-( पू ० ) ' नमस्ते ' शब्दको दो टुकड़ोंमें बांटा जाता है— ' नमः -ते ' । ' ते ' शब्द ' तुभ्यं ' के स्थानपर श्रादेश होता है, परन्तु विचारणीय बात यहां पर यह है कि तुम्यं ' शब्द युष्मद् - शब्द की चतुर्थी विभक्ति के एक - वचनका रूप है, इसका अर्थ है-' तेरे लिए ' । ऐसे अवस्था में यह कैसा असभ्य व्यवहार होगा कि- पुत्र अपने पिताको यह कहे आदर के लिए उसको कहना ' आपके लिए नमः हो ' । श्रतः श्रार्यसमाजमें ' नमस्ते ' शब्दका यह बात अत्यन्त उपयुक्त त्रिकाल में भी नहीं दे सकता । दिया । उसपर लेखनी चला कि तेरे लिए नमः हो ' । श्रतः तो यह तो चाहिये था कि-समझमें यही श्राता है कि-व्यवहार ग्रनुपयुक्त है ' । है; इसका उत्तर प्रार्यसमाज वादीने भी इसका उत्तर नहीं देना उत्तर नहीं होता । हम वादीका उत्तराभास उद्धृत करते हैं; और उसके प्रत्येक वाक्य का निराकरण करते हैं । वादी कहता है-( क ) यह कोई आवश्यक नहीं कि - ' ते ' एकवचनका रूप प्रयोग करनेसे बड़ोंका अनादर होता है ' ( पृ ० ३४ ) ( प्रत्युत्तर ) यह उत्तर अशुद्ध है । पूर्वपक्षमें एकवचन से मान्यका अनादर नहीं कहा गया, किन्तु युष्मद्के एक - वचनसे मान्यका अनादर कहा गया है । यह ठीक भी है, हम इस विषयमें गत - निबन्धों में स्मृति एवं महाभारत प्रादिके प्रमारण An eGangotri Initiative
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१८४ * श्रीसनातनधर्मोलोक ( १-२ ) * दे चुके हैं । यदि युष्मद्की सब विभक्तियोंका एक वचन वादी के मत में अनादरावह नहीं; तो वे लोग संस्कृत में मान्यको ' त्वं, त्वाम्, त्वया, तंव ' आदि क्यों नहीं लिखते । हिन्दी भाषा में भी बड़ को ' तू, तुझे, तेरा ' क्यों नहीं लिखते? । [ ख ] यह तो प्रत्येक भाषाका अपना - अपना तरीका होता है - प्रङ्गरेजीमें ' ही ' [ He ] इस एक वचनके रूपका अर्थ है ' वह ', परन्तु इसका प्रयोग छोटे - बड़े सबके लिए समान रूपसे होता है । [ प्रत्यु ० ] - यह दृष्टान्त विषम है, बात ' युष्मद् के वचनकी चल रही है ' तद् ' शब्दके एक वचनकी नहीं । वादीसे दिये हुए पूर्वपक्ष में केवल युष्मद् - शब्दके एक वचनको प्रक्षिप्त किया है, अन्य शब्दोंके एक वचन नहीं । वादीने अंग्रेजी शब्द ‘ He ' का उद्धरण दिया है, वह प्रकृतोपयुक्त नहीं; वादी अग्रेजीमें युष्मद् के एक वचन Thou, Thy, Thine, और Thee इ न प्रयोगोंको देखें । क्या वह इनका प्रयोग कभी मान्यके लिए अंग्रेजी भाषामें व्यवहृत दिखला सकता है? । परमात्माके लिए, देवतानों के लिए, प्राचीन ऋषि - मुनियोंके लिए, वृक्ष, नदी तथा पशु - पक्षी एवं जड़ वस्तुनोंके लिए तो इसका प्रयोग किया जाता है, पर लौकिक व्यवहार में तो उसके प्रयोग से तिरस्कार ही बोधित होता है । हम इसीका ही तो विरोध करते हैं । यदि आप ' ते ' से अनादर नहीं मानते; तो बड़े के लिए त्वं, त्वां त्वया, तुभ्यं, त्वत्, तव, त्वयि'का प्रयोग भो संस्कृत में, हिन्दी - उर्दू में ' तू, तुझे, तेरे लिए, तेरा आदिका, तथा नमस्ते - व्याख्या - निरीक्षण १८५ अंग्रेजी में Thou, Thy आदिका प्रयोग कीजिए; पर आप भी अनादरवश नहीं करते; तब ' त ' का प्रयोग भी अनादर सूचक होनेसे नहीं करना चाहिए - यह हमारा अभिप्राय है । [ ग ] यदि कोई छोटा पुरुष बड़के लिए ही एकवचनान्त शब्दका व्यवहार करता है; तो इसमें बड़ा व्यक्ति अपना अप-मान नहीं समझता, क्योंकि यह उसकी भाषाके व्यवहारका तरीका है । [ प्रत्यु ० ] यदि ऐसा है; तो क्या संस्कृतभाषामें ' वं, त्वां त्वया, तुभ्यम्, त्वत्, तव, त्वयि, इन युष्मद्के एक वचनों से ' तू, तूने, तुझे, तेरा ' इत्यादि हिन्दी भाषाके युष्मद् के एक वचनोंसे, इसी प्रकार अंग्रेजीके Thou, Thy, Thine, Thee, आदि युष्मद्के एकवचनोंसे ज्येष्ठ व्यक्ति अपना अपमान नहीं समझता? क्या वादी अपने लिए इन शब्दोंका प्रयोग अपने से कम आयु वाले व्यक्ति के द्वारा स्वीकृत कर सकता है? तथा अन्य आर्यसमाजी भी क्या युष्मद्का एक. वचन अपने लिए स्वीकार करनेको उद्यत हैं? यदि ऐसा है; तो उसका प्रयोग आप लोग क्यों नहीं करते; जिससे ' नमस्ते ' पर प्रक्षेपोंका अवसर ही न हो । ( घ ) परन्तु हां, यदि हम ' नमस्ते ' शब्दमें ' ते ' शब्दका हिन्दी अनुवाद करके किसी महापुरुष से कहें कि - ' तेरे लिए नमः ' तो यह एक अपमान सूचक प्रयोग होगा, क्योंकि इस हिन्दीके व्यवहारका यही भाव समझा जाता है । प्रत्यु - क्या ' ते ' का अर्थ ' तेरेलिए ' यह नहीं है? ' संस्कृतमें CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१८६ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * भी क्या उसका ' तुभ्यम् ' अर्थ नहीं है? यदि है; तो ' नमस्ते. ' में ठहरे ' ते ' शब्दसे भो मान्यका अपमान सिद्ध हुआ, और बादीके हो शब्दोंसे वादीका पक्ष खण्डित हो गया । ' जादू वह, जो सिरपर चढ़कर बोले ' यदि ' ते ' इस युष्मद् एकवचनका हिन्दीमें यह अर्थ है; तो संस्कृतमें भी क्या आप ' त्वं, त्वां, तुभ्यं ' का प्रयोग बड़ेको करते हैं? क्या उसमें बड़ेको युष्मद् एक-वचन प्रयुक्त करनेकी शैली है? क्या आप करते - कराते हैं? यदि ' ते ' इस युष्मद् एकवचनका अपमान अर्थ नहीं हैं; तो आप लोग मान्यको सदा युष्मद् - शब्दका एकवचन क्यों नहीं क देते? क्या प्राचीन समयमें युष्मद्द्का एकवचन ' ते ' तो प्रयुक्त होता था; अन्य युष्मद् के एक वचन त्वं, त्वाम् त्वया, तुभ्यम् न ' तव ' आदि मान्य के लिए प्रयुक्त नहीं किये जाते थे? यदि किये जाते थे; तो आप लोग उनका प्रयोग न करके केवल ' ते ' गं का प्रयोग क्यों करते हैं? वादी के पास इसका उत्तर त्रिकाल क. में भी नहीं है । इसलिए वह संकुचित शब्दोंसे कहता है-( ङ ) थोड़ी देर के लिए यदि हम मान भी लें कि ' ते ' शब्द - अपमान सूचक है । [ थोड़ी देर के लिए नहीं; यह आपको हर समय में मानना पड़ेगा ] तो पौराणिक भाइयोंसे - पूछा जा का सकता है कि पूर्व दिये हुए पुराणोंके उदाहरणों में परमात्मा के लिए, अपने पिता, गुरु ऋषि तथा अन्य पूज्योंके लिए एक-वचन के ' ते ' शब्दका प्रयोग क्यों किया गया है? क्या वहां अपमान सूचित नहीं होता? प्रत्यु - उन प्रमारणों में केवल ' ते ' शब्द नहीं है, किन्तु त्वं CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्ते व्याख्या निरीक्षण १८७ त्वां तुभ्यम्, त्वत्, तब, त्वयि ' श्रादि प्रयोग भी हैं; देखिये उन प्रमाणों के पूर्वोत्तर पद्य; तब वादी लोग बड़ों के लिए उनका प्रयोग क्यों नहीं करते हैं? यदि इसमें प्रपमान विचार कर उनका प्रयोग नहीं करते, किन्तु वहां भवान् भवन्तं, भवता, भवते, श्रीमते, भवद्भ्यः, श्रादि का, तथा ' आप, आपको, आपका, श्रापके लिए, प्रादिका प्रयोग करते हैं; तब ' नमस्ते ' में ' ते ' शब्द अपमान - वाचक सिद्ध हुआ । इसके अतिरिक्त मान्यके लिए युष्मद् के एकवचनको देना किसी भी धर्मशास्त्रमें प्रादिष्ट नहीं, बल्कि उसका निषेध है; और उसका प्रयोग छोटोंके लिए कहा गया है । जैसेकि - ' न जातु त्वमिति ब्रूयाद् प्रपन्नोऽपि महत्तरम् | त्वङ्कारो वा वघो वेति विद्वत्सु न विशिष्यते । अवराणां समानानां शिष्याणां च समाचरेत् ' ( महाभारत अनुशासनपर्व १६२।५३ ) ' प्रापत्ति में पड़कर भी बड़ेको तू - यह न कहे, क्योंकि - तू - तड़ाक करना और मारना - इनका समझदारोंमें भेद नहीं होता । हां, छोटों तथा शिष्य आदिको कहे ' । इत्यादि इस विषय के बहुतसे प्रमारण हैं । मनुस्मृति आदिमें भी ऐसा ही स्वीकृत किया गया है - पाठक यह गत - निबन्ध में देख चुके होंगे । छोटोंके लिए ' ते ' शब्द के सिद्ध होने पर भी उनके लिए ' नमः ' शब्दका प्रयोग नहीं दिया जाता; क्योंकि - ' नमः ' शब्दसे संत्कार करने पर सत्क्रियमारण पुरुष बड़ा मालूम देगा । जैसे कि - वादीने भी स्वी-कार किया है - ' जब मनुष्य दूसरेके सामने ऐसी क्रिया करे-जिससे वह दूसरेसे छोटा प्रतीत हो; वही क्रिया ' नमः ' शब्दका Gujarat. An eGangotri Initiative
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१८८ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) अर्थ है । जैसे जब कोई हाथ जोड़कर माथा नवाकर किसी के सामने झुकता है, तो वह उससे छोटा ही प्रतीत होता है ' ( पृ ० ७ ) तब ' नमस्ते ' शब्द दोनों पक्षोंसे प्रयुक्त सिद्ध हुआ । तो फिर मान्यके लिए ' ते ' शब्दका प्रयोग कैसे हो? और छोटेके लिए ' नमः ' शब्दका प्रयोग कैसे दिया जाए? शेष जो किसी इतिहास में मान्यको युष्मद्का एकवचन दोखे, वह भी एक इतिहासका वचन है, ऐसे संकड़ों भी वचनों को विधि - निषेधका एक वाक्य भी बाधित कर दिया करता है, निषेध - वाक्य हम अभी - अभी लिख चुके हैं! कुपर्व में ( महा-भारत ६६८३-८६ ) में भगवान् श्रीकृष्णने भी अर्जुनको बड़े के प्रति ' त्वं, त्वया ' आदि कहना बड़ेका प्रशस्त्रवघ माना है, यह ' नमस्ते हठवाद ' निबन्धमें हम आगे देंगे । फलतः इतिहाससे धर्म - अधर्मका निर्णय नहीं हुआ करता; किन्तु धर्मशास्त्रसे ही धर्माधर्मका निर्णय हुआ करता है । जैसेकि न्यायदर्शनमें कहा है- ' यज्ञो मन्त्र - ब्राह्मणस्य ( विषयः ), लोकवृत्तमितिहास - पुराणस्य, लोक - व्यवहारव्यवस्थापनं च धर्मशास्त्रस्य विषयः । तत्रैकेन न सर्व व्यवस्थाप्यते इति यथा-विषयमेतानि प्रमारणानि इन्द्रियादिवद् - इति ' ( ४ | १ | ६२ ) अर्थात् इतिहास - पुराणका विषय है लोकवृत्त बताना कि उस समय लोगोंका श्राचरण क्या था; पर लोक व्यवहारकी व्यवस्था करना यह धर्मशास्त्रका विषय है । पुराण - इतिहास अपने विषय में प्रधान और धर्मशास्त्र अपने विषय ( लोक - व्यवहार की व्यवस्थापना ) में प्रधान प्रभार होते हैं । पुराण- इतिहास में जो * नमस्ते व्याख्या निरीक्षण हुआ, वह तो लोकवृत्त होता है, वह धर्मशास्त्र से विरुद्ध भी हो सकता है; पर इतिहास - पुराण में किसी मान्यका प्र. | सर्तव्य अनुशासन भी हो जाता है, वह ' धर्मशास्त्र ' हुझा करता है, उसका अनुशासन ग्राह्य हुआ करता है; पर श्राचरण । सभी ग्राह्य नहीं हो जाते । इसी कारण श्रीमद्भागवत में कहा है - ' ईश्वराणां वचः सत्यं तथैवाचरितं क्वचित् । तेषां यत् स्ववचो युक्तं ( धर्मशास्त्रानुकूलम् ), बुद्धिमान् तत् समाचरेत् ( १०१३३।३२ ) इसका उदाहरण भी देख लीजिए - पुराण - इतिहासमें . युधिष्ठिरका द्यूत खेलना श्राया है, द्रौपदीके पांच पति होना भी बताया है; पर यह ऐतिहासिक- प्राचरण धर्मशास्त्र विरुद्ध होनेसे अनुसर्तव्य नहीं हो जाता । ' पुरुषोंका द्वयक्षर वा चतुरक्षर सम नाम करना चाहिए, विषमाक्षर नहीं ' ऐसा मनुस्मृति, पारस्करगृह्यसूत्र श्रादि धर्मशास्त्रोंका आदेश है; जैसे कि वादीके स्वामीने भी लिखा है- ' पुरुषोंका समाक्षर नाम रखना चाहिए, तथा स्त्रियोंका विषमाक्षर नाम रखें ' ( संस्कार. विधि- नामकररण - प्रकररणकी टिप्परगी ) । पर इतिहास में इससे विरुद्ध पुरुषोंके नाम अर्जुन, नकुल, लक्ष्मण - यह विषमाक्षर, और स्त्रियोंके नाम कृष्णा ( द्रौपदी ) ' सीता आदि समाक्षर मिलते हैं; वादीके सम्प्रदाय में भी पुरुषोंके तुलसीराम, छुट्टन-लाल, राजेन्द्र आदि विषमाक्षर नाम मिलते हैं; यह श्राचरण प्राजके इतिहास में दीखनेपर भी धर्मशास्त्र - विरुद्ध होनेसे अनुसरणीय नहीं हो जाता । इस प्रकार इतिहास में युष्मदके CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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* श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) १६० ' ते, तव ' श्रादि दीख जाने पर भी मान्यके लिये एकवचन प्रयोग धर्मशास्त्रके वचनसे विरुद्ध होनेसे अनुसर्तव्य उसका नहीं हो जाता; हम उस धर्मशास्त्र के वचनको गत निबन्ध में तथा ऊपर उद्धृत कर चुके हैं । अतः वादीका यह प्रयास खण्डित हो गया । ( च ) “ द्विवचनका प्रयोग तो एकके लिये हो ही नहीं सकता । " प्रत्यु ० - इससे दो पुरुषोंके लिए वादी मतमें भी नमस्तेका में प्रयोग न हो सका; वहां पर ' नमो वाम् ' कहना पड़ेगा । तब ना परिवर्तनशील होने से ' नमस्ते ' पदका ही सर्वत्र कथन स्वयं ही से कट गया । ( छ ) शेष रह गया बहुवचनका प्रयोग | अब ' यदि ' ते ' के स्थानपर बहुवचनका ' वः ' शब्द प्रयुक्त कर देते; तो हमारे पौराणिक भाई यह प्रश्न कर बैठते कि - छोटोंको ' नमः ' करते समय बहुवचनान्त - शब्द के प्रयोगकी क्या श्राव-: २. श्यकता? बहुत हद तक यह उनका प्रश्न ठीक भी होता । प्रत्युत्तर - वे [ सनातनधर्मी ] तो छोटेको ' नमः ' कहनेका र भी विरोध करते हैं; तब उनकी यह बात वादी क्यों नहीं मान लेते, और छोटेको ' नमस्ते ' कहना क्यों बन्द नहीं कर देते? वे बड़ेको सत्कारार्थं बहुवचन देना भी कहते- मानते हैं, और उसे ' ते ' कहने में उसका अनादर मानते हैं; तब वादी उनकी बात मानकर बड़े को भी ' नमस्ते ' कहना बन्द कर दें, अथवा उन्हें ' नमो वः ' कहकर ' नमस्ते'का बाईकाट कर दें; G ' नमस्ते ' व्याख्या निरीक्षण * १ ९ १ तब आप उन पौराणिकोंकी बात क्यों नहीं मान लेते, जबकि -वह बात आपके अनुसार भी ठीक है । इससे बड़ेको श्रादरार्थ बहुवचन देना वादीके मतमें भी ठीक सिद्ध हुम्रा । तो छोटेके लिए वादीके मतमें भी प्रादर-वाचक- बहुवचनके प्रयोग्य तथा ग्रप्रयोज्य होनेसे उन्हें आदर-बाचक ' नमः ' शब्दका प्रयोग भी ( जिससे अपनी अपकृष्टता-छोटेपनका बोध होता है ) प्रयुक्त सिद्ध हुआ । क्योंकि - अभि-वादनार्थक ' नमः ' शब्दका प्रयोग वृद्ध ( बड़े ) के लिए होता है, छोटे के लिए नहीं । जैसे कि मनुस्मृतिमें कहा है- ' श्रभिवादयेत वृद्धांश्च ' ( ४ । १४८ ) ज्यायांसमभिवादयन् ( २।१२२ ) । निरुक्त में भी ' महान् महनीयो भवति, मानेन अन्यान् जहाति इति शाकपूणिः ' ( ३ | १३ | ६ ) इससे लघुकी बड़ेसे पूजनीयता नहीं होती, अतः ' नमः ' शब्द भी उनके लिए नहीं आ सकता है, वह ( नमः -शब्द ) बड़ेके लिए ही श्राता है, ' जैसेकि - वेदमें भी कहा है- ' यजाम ( पूजें ) इद् नमसा [ ' नमः ' शब्द से ] वृद्ध-मिन्द्रम् ' [ बड़े को ] ( ऋ ० ३1३११७ ) ' गिरा उप वे नमसा [ ' नमः ' शब्द से सत्कार करता हूँ ] दैव्यं जनम् ' [ देवी जनको, दिव्य जनको ) [ ऋ ० २।३०।११ ) । इसके अतिरिक्त इससे बहुवचनमें ' नमस्ते'का प्रयोग भी वादी मतसे प्रशुद्ध सिद्ध हुम्रा । क्योंकि — उसके मतसे भी ' ते ' एक वचनान्त - शब्दका सबके लिए प्रयोग करना ' ( १०३५ ) इन शब्दोंसे ' ते ' के एकवचनान्त होनेसे बहुवचनमें उसका प्रयोग नहीं हो सकता । मान्यके लिए आदर- अर्थ में बहुवचन CC - 0. Ankur Joshi Collection Grat. An eGangotri Initiative
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१६२ G श्रीसनातनधर्मालिोक ( १-२ ) * का प्रयोग करना हो, जैसेकि - स्वा ० दयानन्दजीने स ० प्र०-शादिके अन्त में अपने गुरु विरजानन्दजीको बहुवचन दिया है - उसमें भी वादीके मतानुसार ' ते'का प्रयोग न हो सकनेसे वहां ' नमो वः ' ऐसा परिवर्तन करना म्रा पड़नेसे ' नमस्ते ' की सार्वत्रिकता और अनिवार्यता तथा अपरिवर्तनीयता खण्डित हो गई 1 ( ज ) इन प्रापत्तियोंसे बचने के लिए वैदिक - साहित्यज्ञों ने ' ते ' इस एकवचनान्त शब्दका सबके लिए प्रयोग करना उचित समझा और यह युक्तियुक्त भी है । प्रत्यु - ' ते ' इस एकवचनान्त शब्द के सर्वत्र प्रयोग से श्राप लोगोंकी प्रापत्तिसे रक्षा नहीं हो सकती । दो पुरुषोंके लिए गोपथब्राह्मणमें ' नमो वां भगवन्तौ! ' ( १।२।५ ) श्राया है; प्रथर्व सं. में भी ' उभाभ्यामकरं नमः ' ( प्र. ११।२।१६ ) ' नमो वाम् ' ( ऋ. ११।२।१ ) यह आया है; वहां ' नमस्ते ' यह एकवचन प्रयुक्त नहीं किया गया, यह आप पर आपत्ति पड़ती है । बहुवचन में ' नमो वः पितरः ( प्र. १८/४/८५ ) ' नम एतेभ्यः ( दिव्यास्त्रेभ्यः ) ( उत्तररामचरित प्रथयाङ्क ) यह प्रयोग आया है, यहाँ भी ' नमस्ते ' का प्रयोग एकवचनान्त होने से न हो सका - यह दूसरी प्रापत्ति वादीके पक्षमें आती है । जिसे आदरार्थ बहुवचन देना है, उसे भी ' नमस्ते ' यह वादीके मतमें भी एकवचनान्त वाक्य प्रयुक्त न हो सकेगा, यह तीसरी प्रापत्ति वादी के वैदिक साहित्यज्ञों पर पड़ती है । चादीके वैदिक - साहित्यज्ञ भी मान्यको युष्मद्का एकवचन त्वं त्वया * ' नमस्ते ' - व्याख्या निरीक्षण * tel श्रादि नहीं देते तदनुसार भी युष्मद् के एकवचन होनेसे ' नमस्ते ' । यह प्रयुक्त न हो सकेगा यह उनपर चौथो आपत्ति श्राती है । ' ते ' का प्रयोग अपने छोटेको यद्यपि " दिया जा सकता है; तथापि उनको ' नमः ' यह कथन ठीक नहीं हो सकता, क्योंकि उसे नमस्कार करनेसे वह नमस्कृत हुम्रा व्यक्ति छोटा प्रतीत नहीं होगा । किन्तु बड़ा हो; जैसे कि वादीने भी स्वीकार किया है — ' जब [ छोटा ] मनुष्य दूसरे [ बड़े ] के सामने ऐसी क्रिया करे, जिससे वह उन दूसरे [ बड़े ] से छोटा प्रतीत हो, वही क्रिया ' नमः ' शब्दका अर्थ है, अर्थात् ' नमः ' करने [ छोटा ] दूसरे [ बड़े ] का सत्कार कर रहा होता है । जैसे-' जब कोई हाथ जोड़कर माथा नवां कर किसीके सामने [ नमः शब्द कहकर ] झुकता है, तो वह उससे छोटा ही प्रतीत होता है [ और जिसे नमः कहा जाता है, वह उससे बड़ाही प्रतीत होता है ] ' ( ' नमस्ते की व्याख्या ' पू. ७८ ), तब वहां भी ' नमस्ते ' का प्रयोग न होने से उसकी सार्वत्रिकता और अपरि वर्तनीयता नष्ट हो जाती है, यह वादीके वैदिक - साहित्यज्ञों पर पांचव श्रापत्ति प्राती है । सब स्थानों पर ' नमस्ते ' का प्रयोग युक्तियुक्त भी नहीं है; उसे एकपद माननेकी बहुतसी अशुद्धताएं भी प्राती हैं, जैसेकि वादीने श्रन्तमें कहा है - ' मैं भी प्रापसे सादर नमस्ते करके बिदा होता हूँ ' ( पृ. ३६ ) यहां ' आप ' इसते सभी लोग बोधित होते हैं; तब वादीके अनुसार भी इसमें बहुवचनमें एकवचनान्त ' ते ' का प्रयोग अशुद्ध सिद्ध होगया; स स ० ध ० १३ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gut. An eGangotri Initiative
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१६४ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * ' नमस्ते ' वाद बहुत प्रपत्तियोंका लानेवाला, प्र सकल - शास्त्र- विरुद्ध सिद्ध हुआ 1 यदि ' नमस्ते ' वाद वैदिक होता; और उससे भिन्न शब्द वैदिक होता, तब वेद में नमस्ते से भिन्न कोई भी शब्द इन पा धवसरों पर न होता । वेदमें तो ' नम एवास्तु ' ( प्र. १।१३।३ ) ' नम इत् कृणोमि ' [ अ. 1२1१ ] ' नमो भरन्तः ' [ म. १ | १ | ७ ] ' नम - उक्तिं विधेम ' [ ऋ. १११८६११ ] ' नम उक्तिम् ला ग्रहम् प्रदिक्षि ' [ ऋसं. ५।४३।६ ९ ] ' नम उक्ति जुषस्व ' [ ऋ. ३।१४।२ ] ' नमो वाके ' [ अ. १३।६।५ ] ' नमो अस्तु ग्रस्मै ' [ अ. मः ११।२।१८ ] ' अवोचाम नमो अस्मै ' [ ऋ. १।११४।११ ] II इत्यादि मन्त्रोंसे ' नमः ' की उक्तिका ही मान्यके लिए अनुशासन किया है, ' नमस्ते - उक्ति का कहीं भी प्रदेश नहीं किया । ' उपब्रुवे नमसा ' ( ऋ. १३३८५।७ ) यहां भी ' नमसा ' ' नमः ' शब्द से ही मान्य के पास जाकर कहना कहा है । ' नमसा उपसद्यः ' पर [ २२३ | १३ ] यहां भी ' नमः ' शब्द से माननीय उपसद्य - प्राप्त होने योग्य बताया गया है । ' यदस्माद् नमस्कारेण मुच्यध्वम् ' [ बृहदा. ५८।१२ ) यहांपर ' नमस्कार ' करना कहा है ' नमस्ते ' ' करना नहीं । ' नमः ' की उक्ति भी वहां मान्य देव आदिके लिए बताई गई है - ' गिरा उपब्रुवे नमसा दैव्यं जनम् ' [ ऋ. २ । ३० । ११ ] यहां माननीयको ' नमः ' की वारणीसे सत्करणीय माना है - ' प्रस्मै... विधेम ( पूजें ) नमसा ' ( नमः शब्दसे ) ( २।३५।११ ) छोटेको कहीं ' नमः ' कहना नहीं कहा गया । देव प्रादियोंसे हम छोटोंके लिए तो ' शं ' का अथवा ' स्वस्ति ' का वचन प्रादिष्ट CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्ते व्याख्या निरीक्षण • १६५ है | जैसे कि - यजुः [ २३ | ४४ ] अथवं. [ १११२२४ ], ऋ. [ ११ ८ ९ ।६ ], ऋ. [ १०।६३।१५ ] इत्यादि बहुत स्थानोंमें बरत है । तब उभयपक्षोंका समान शब्द भी प्रवेदिक है । फलतः दोनों श्रोरसे ' नमस्ते'वाद, तथा ' नमस्ते ' की अपरि-वर्तनीयताका वाद, तथा ' नमस्ते ' से भिन्न ' वन्दे ' ग्रादिका प्रव बिकतावाद वेदादि सकल - शास्त्रोंसे विरुद्ध होनेसे त्याज्य ही है । न यह चारों वेदोंमें श्रादिष्ट है, न पञ्चम वेद पुराण- इतिहास में; जहां वादीने सत्यतासे दिखलाया है हमने उसका सत्य समाधान दिखला दिया है । यह ' नमस्ते ' तो ऐकदेशिक सम्प्रदाय श्रार्य समाजका ही लिङ्ग है । सनातनधर्मी विद्वान् इससे घृणा करते हैं, अन्य भी साम्प्रदायिक विद्वान् इससे घृणा करते हैं । वैयाकरण उसमें एकपदताकी अशुद्धि होती हुई देखकर उससे घृणा ही करते हैं । तब यह ' नमस्ते ' -वाद हेय ही है । यह अनेकताका प्रसारक है, विद्वेषका प्रचारक है, • अशुद्धताका तथा अशुद्धार्थ करनेका प्रोत्साहक है । श्राशीर्वाद में भी यह नहीं हो सकता । ' नमः ' शब्दका अन्न - अर्थ वेदमें ही प्रयुक्त होता है, लोकमें नहीं । आशीर्वादमें ' ग्रायुष्मान् भव सौम्य ( मनु. २।१२५ ) ' स्वस्त्यस्तु ' ' शमस्तु ( अ ० १११२२ ४ ) इत्यादि ही शास्त्रोंमें प्रयुक्त होता है, न ' नमस्ते ' और न ही अन्न! ' सीताराम ', जय श्रीकृष्ण, जय राम, आदि शब्द ' नमो मात्रे पृथिव्यै ' ( यजु ० ६।२२ ) ' वन्दे मातरम् ', ' जयहिन्द ' ' जय धर्म ' प्रादिकी भांति इष्ट देव को कीर्तित करते हैं, असम्बद्ध नहीं । Gujarat. An eGangotri Initiative
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१६६ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * परस्पर मिलनेके समय नमः - आशीर्वाद तो हाथ के संकेतसे हो पूर्ण हो जाता है; इन शब्दोंसे एक - दूसरेसे इष्टदेवका कीर्तन वा स्मरण भी हो जाता है । यदि वैदिक शब्दोंका ही सर्वत्र आग्रह हो; तो वेदमें न कहे गये हुए गुरुकुल, श्रार्यसमाज, आर्यसमाज मन्दिर आदि शब्दोंकी भी अवैदिकताका ढंढोरा पोट देना चाहिए और इनका बहिष्कार कर देना चाहिये । फलतः ‘ नमस्ते - व्याख्या ' के निरीक्षणसे स्पष्ट हो गया कि-उसका लेखक अपने पक्षके सिद्ध करनेमें असफल रहा है, तब • ' नमस्ते ' - वाद त्याज्य ही है । श्रन्तमें यह जान रखना चाहिए कि उक्त ट्रक्टके लेखकने भी ' नमस्ते ' को दो पद माना है । जब एक संख्या भी प्रनित्य वस्तुमें प्राप्त होकर अनित्य हो जाती है; तब दो संख्या तो स्वतः अनित्य होगी ही । वेद में जब ' वन्दे ' आदि नमस्कारार्थक शब्द मिलते हैं; तब केवल ' नमः ' का प्रयोग भी अभिवादनमें अनित्य है । फलतः ' नमस्ते ' इन दो पदोंकी तो सर्वथा ही अनित्यता सिद्ध हुई, तब बहुत दोषोंकी उपस्थिति होनेसे ' नमस्ते ' का प्रयोग छोड़ ही देना चाहिए; इसका प्रचार तब तक है, जब तक संस्कृत भाषाका अज्ञान है । अज्ञान दूर होते ही यह शब्द भी प्रज्ञात हो जायेगा । इस प्रकार ' नमस्ते'को ' भारतीय संस्कृति'का अङ्ग बताते हुए श्री राजेन्द्रजीका भी यह श्रङ्ग टूटा - फूटा निकला, तब उस टूटे - फूटे ' नमस्ते ' से मोह लगाना ठीक नहीं । अन्तमें जोकि - श्रीसुखदेव जीने जो यह लिखा है - ' मैं भी आपसे सादर नमस्ते करके विदा होता हूँ ' यह वाक्य भी शुद्ध है । G अन्य प्रमाणोंपर विचार १७ यहां चाहिए कि - ' मैं भी आपसे ' नमः ' करके विदा होता क्योंकि जब श्रापने ' आपसे ' शब्द पृथक् कह दिया हूँ । , त ' नमस्ते ' के ' पद होनेसे ' ते ' पद यहां व्यर्थ हुआ । इसका तो यह अर्थ हुआ कि ' मैं आपको तुझे नमः कहकर बिदा होता हूँ ) । तो बताइये कि यहां ' तुझे यह पद क्या सम्बद्ध दोख रहा है? इसी पर श्रापके ' नमस्ते ' का फैसला है । आप स्वयं । मानेंगे कि - इस वाक्य में ' आपको ' के साथ ' तुझें ' शब्द अस. म्बद्ध है. व्यर्थ है, पुनरुक्त है; इससे ' नमस्तेकी व्याख्या ' में सारीकी सारी गलत ही निकली । तब इस श्रशुद्धतापादक ' नमस्ते ' का बहिष्कार करके ' नमो नमः ' शब्दका वन्दनार्थ प्रयोग होना चाहिए और प्राशीर्वाद में स्वस्ति ' । इस ' नमस्ते ' के विषय में अन्य निबन्ध श्रागे देखिए । ( १० ) ' नमस्ते ' के कई अन्य प्रमाणोंपर विचार । आजकल ' नमस्ते ' छोटा - बड़ा दोनों को कहा जाता है, यह बात शास्त्रविरुद्ध है; पर कई लोग इस बातको सिद्ध करनेके लिए कई प्रमाण दिया करते हैं; उनपर विचार किया जाता है-( १ ) पूर्वपक्ष - ' स राजन्! मानसं दुःखमपनीय युधिष्ठिरात् । कुरु कार्याणि धर्म्या f रण नमस्ते पुरुषर्षभ! ' ( महाभा. प्राथम. वासिकपर्व १०।५० ) इस पद्य में एक ब्राह्मणने धृतराष्ट्रले ' नमस्ते ' कहा है । एक बड़े वर्ण ( ब्राह्मण ) ने छोटे ब ( क्षत्रिय ) को नमस्कार की यदि यह माना जावे; तब से हमारा ( वादीका पक्ष सिद्ध हुआ कि छोटेको भी नमस्कार CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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to * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) -www. १६८ हूँ " किया जाता है । अथवा ' नमस्ते ' द्वारा एक ब्राह्मणने क्षत्रियको तव श्राशीर्वाद दिया यह माना जावे; तब भी हमारा पक्ष पुष्ट हुआा कि छोटेको प्रयुक्त किया हुआ ' नमस्ते ' शब्द आशीर्वाद - वाचक होता है । स. प्र. के ग्रन्थ साहिब संस्कररणकी टिप्पणी ( ३६ पू. ) में स्वा. वेदानन्दजीने भी लिखा है - धृतराष्ट्र ने वनवासका स्वयं विचार किया; उसके जानेसे पूर्व हस्तिनापुरकी जनताने • महर्षि शाकल्यको अपना प्रतिनिधि बनाकर धृतराष्ट्र के पास भेजा । उसने अन्तमें कहा - ' नमस्ते भरतर्षभ! महर्ष दिक शाकल्य ब्राह्मरण हैं; धृतराष्ट्र क्षत्रिय है । ब्राह्मण बड़ा माना जाता है, वह अपने से छोटे क्षत्रियको ' नमस्ते ' कह रहा है ' ॥ ( यह प्रश्न अन्य लोगोंने भी किया है, जैसे कि - पीछे कहा जा चुका है ) । उत्तरपक्ष - यद्यपि इस श्लोकको ब्राह्मणने युद्धसमाप्ति के यह बाद बनवासके लिए तैयार हुए धृतराष्ट्र को कहा था, तथापि रनेके | यह श्लोक उसने अपनी श्रोरसे नहीं कहा, किन्तु क्षत्रिय - प्रजा का वचन ही अनूदित किया था । देखिये- ' तच्छ्र ुत्वा कुरुराजस्य वाक्यानि करुणानि ते । रुरुदुः सर्वशो राजन् समेताः कुरुजाङ्ग-श्रम- ला: ( १०/१ ) हम इन पद्योंका श्रीसातवलेकरका अर्थ देते हैं- वे कुरुजाङ्गलवासी प्रजासमूह धृतराष्ट्रके ऐसे करुरणायुक्त वचन को सुन कर सब कोई इकट्ठे होकर रोदन करने लगे ' । ' ते विनीयतमायासं धृतराष्ट्रवियोगजम् । शनैः शनैस्तदान्योन्यम-ब्रुवन् सम्मतान्युत ' ( १०१ ९ ) ( उन लोगोंने धृतराष्ट्र के वियोग-जनित दुःखको त्यागके धीरे - धीरे प्रापसमें अपना मत प्रकाश CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. * अन्य प्रमाणोंपर विचार 222 किया । ) ' ततः संन्धाय ते सर्वे वाक्यान्यथ समासतः । एक-स्मिन् ब्राह्मणे राजन्! निवेश्योचुर्नराधिपम् ' ( १० ) ( अनन्तर उन सब लोगोंने एकत्रित होकर सन्धान करते हुए एक ब्राह्मण के समीप अपना वचन सुनाके, वह सव ( वचन ) धृतराष्ट्र से कहने के लिए उन्हें ( ब्राह्मणको ) अनुरोध किया ' । ' ततः स्वा-चरणो विप्रः सम्मतोऽर्थविशारदः । साम्बास्यो वह चो राजन्! वक्तुं समुपचक्रमे ' ( १०१११ ) अनन्तर सर्वसम्मत, अर्थविशारद पवित्राचारी वह ऋक्वेत्ता साम्बनामा ब्राह्मरण राजासे वह सव वचन कहने लगा ' । बात स्पष्ट होगई । प्रजानोंने जो जो बात धृतराष्ट्रके प्रति कह देने के लिए ब्राह्मणको कही थी, उस अर्थविशारद ब्राह्मणने वही वही बात उनकी ओर से धृतराष्ट्रको सुना दी । अब यह ब्राह्मणका अपना वचन सिद्ध न हुग्रा । यहां यह समझना चाहिए कि कई क्षत्रियलोग अपने किसी नेताको मान-पत्र देना चाहते हैं; वे उस विषयको विशिष्ट शैलीसे कहने में समर्थ किसी ब्राह्मणको बताकर सूचित करते हैं कि हम सब लोग अलग - अलग अपने भावोंको क्या कहते रहें: आपही हमारी ओर से अमुक - अमुक बातें शृङ्खलावद्ध करके सुना भर दें | अब उस ब्राह्मणने उन्हींका कथन सुना भर देना है, उस ब्राह्मणका उस कथनसे अपना कोई सम्बन्ध नहीं होता । हमारे पास कई महोदय अपने किसी ग्राहत नायकके लिए अभिनन्दनपत्र बनवानेके लिए आते हैं । हम उनके अभिप्रायको . समझकर वैसे श्लोक बनाकर दे देते हैं; तब क्या उस अभि-An eGangotri Initiative
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२०० * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * नन्दनपत्रके प्रणेता होनेसे उन भावोंका दायित्व हमपर हो सकता है? कभी नहीं । क्योंकि हमने तो उन्हींके भावोंका अनुवाद भर कर देना है, उन भावोंका हम व्यक्तिसे कोई सम्बन्ध नहीं होता । तब इससे यह सिद्ध न हुआ कि उस ब्राह्मणने क्षत्रियको नमस्कार की, बल्कि यह सिद्ध हुआ कि धृतराष्ट्रको नमस्कार क्षत्रिय प्रादियोंने ही किया, ब्राह्मरणने नहीं । वेद भी राजाका स्वामित्व ब्राह्मरण से भिन्न प्रजापर मानता है । तभी तो कहा है - " विश! एष वोऽमी राजा, सोमोऽस्माकं ब्राह्मणाना राजा ' ( शुक्ल यजुः वा ० सं. ६।४० ) । ऐ प्रजाम्रो! यह राजा तुम लोगोंका है, हम ब्रह्मणोंका राजा तो सोम ( चन्द्र प्रथवा यज्ञ ) है । इसी प्रकार यजुर्वेद - काण्वसंहिता में भी कहा है- ' एष वः कुरवो! राजा, एष वः पञ्चाला! राजा, सोमोस्माकं ब्राह्मणा-राजा ' ( ११।११ ) अथर्ववेद सहिता में ( २२६ ) भी कहा है- ' सो-मोहि अस्य ( ब्राह्मणस्य ) दायादः ' ( ५।१८।६ ) । बोधायन गृह्य ० ( १।१०।११ ) में ' सोम एव नो राजा इत्याहुर्ब्राह्मणीः प्रजाः ' यह तैत्तिरीय ( २०११ ) का मन्त्र उद्धृत किया है । तैत्तिरीय ब्राह्मण में भी ' एष वो भरता राजा, सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजेत्याह, तस्मात् सोमराजानो ब्राह्मणा ( १२७/६/७ ) यही कहा है । इसलिए धृतराष्ट्र के प्रति वे वचन ब्राह्मण भिन्न प्रजावर्गकी ओरसे कहे हुए मानने पड़ेंगे । तब वादीका पक्ष खण्डित हो गया कि उक्त वचन ब्राह्मरणने कहा है, क्योंकि वह व्यक्तिगत वचन नहीं था । सो यहां क्षत्रिय प्रजाने यह उन्हें 4 अन्य प्रमाणोंपर विचार २०१ नमस्कार किया है | शेष है ' ते ' का प्रश्न, सो प्रजाके समति होनेसे उसका प्रयोग भी संगत हो जाता है । इसके अतिरिक्त बड़ेको ' ते ' कहना विधिसे विरुद्ध है, यह हम अन्यत्र बता चुके हैं । जो इतिहासमें विधि - विरुद्ध प्राचार प्रजावे, वह माननीय नहीं हो सकता । ( २ ) पूर्वपक्ष - ' नमो महद्भ्योस्तु नमोऽर्भकेभ्यो न युवभ्यो नम श्रावदुभ्यः ' इस भागवतपुराणके पद्य में बच्चों और बूढ़ों सबको नमस्ते माना गया है; तब सबको ' नमस्ते ' कहना ठीक हुआ । ' ( श्रीधर्मदेव शास्त्री ) उत्तरपक्ष - पूर्वपक्षियों की यह प्रकृति देखी गई है कि-वे जो भी प्रमाण अपने पक्षकी सिद्धयर्थ दिया करते हैं; उनमें पूर्वापर छिपाया गया होता है । छिपा हुआ वह अंश प्रकट कर देनेपर वही प्रमाण उनसे विरुद्ध हो जाता है । यहां भी यह बात है । सम्पूर्ण पद्य यह है- ' नमो महद्भ्योस्तु, नमो-S र्भकेभ्यो नमो युवभ्यो नम श्रावदुभ्यः । ये ब्राह्मणा गामबधूत-लिङ्गाश्चरन्ति तेभ्यः शिवमस्तु राज्ञाम् ' ( ५।१३।१३ ) इसका वक्ता राजा रहूगरण क्षत्रिय है । वह यह पद्य भरतमुनि, जो ब्राह्मण कुल में थे ( श्रीमद्भाग ० ५२६ ) एवं अन्य ब्राह्मणोंको लक्ष्य करके कह रहा है । ' इसका अर्थ यह है कि जो ब्राह्मण चाहे बड़े हैं वा बालक, युवा हैं या वृद्ध उन सब ब्राह्मणोंको नमस्कार हो । जो ब्राह्मण बाह्य - चिह्नोंको छोड़कर पृथिवी में घूम रहे हैं; उनसे हम राजाओं ( क्षत्रियों ) का कल्याण हो ' । अब ' आलोक'-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative