सनातन धर्मालोक १-२ — पृष्ठ 91–100
सनातन धर्मालोक १-२ · पृष्ठ 91–100
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१६२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * यह प्रमाण श्रीसन्तरामके ' नमस्ते प्रचार ' से लिया गया है । इस मन्त्रका सम्यक् विवेचन हमने ' नमस्ते और हठवाद ' में किया है । ( e ) पूर्वपक्ष - शतपथब्राह्मण में आता है- ' गार्गी अपने पति याज्ञवल्क्यको नमस्ते करती है- ' सा हो वाच - नमस्ते याज्ञवल्क्य ' ( १४।६।८।५ ) समीक्षा - यह है वादियोंका अनुसन्धान- श्री शेरसिंहकी ' नमस्तेकी प्राचीनता ' से यह प्रमारण बिना विचारे दर्शनाध्या पकजीने उद्धृत कर लिया है; और ' नमस्तेकी व्याख्या से भारतीय संस्कृति ' निबन्धमें उसके लेखक श्रीराजेन्द्र जीने उद्धृत कर दिया है । इन लोगोंको ' नमस्ते ' के कहीं दीख जाने से इतनी मस्ती हो जाती है कि फिर श्रागा - पीछा कुछ भी नहीं सोचते । याज्ञवल्क्यकी तो दो स्त्रियां थीं एक कात्यायनी दूसरी मैत्रेयी । देखिये इसपर शतपथ ब्राह्मण ( १४।७।३।१ ) क्या अब वादी गार्गीको उसकी तीसरी पत्नी बनाना चाहता है? तब क्या वे एक पुरुषकी बहुत स्त्रियां मानते हैं? ' जब गार्गी ब्रह्मवादिनी कुमारी थी; और उसका विवाह ही नहीं माना जाता; तब याज्ञवल्क्य गार्गीके पति कैसे हुए? । स्त्रीका पतिको नमस्कार हो - इसमें किसीका वैय नहीं '; ' ते ' में वैमत्य अवश्य है, पर उसने तो याज्ञवल्क्यको-' सा होवाच - श्रहं वै त्वा याज्ञवल्क्य! अहं त्वा द्वाभ्यां प्रश्नाभ्यामुपोपस्थाम्, तौ मे [ त्वं ] ब्रूहीति ' ( १४।६।८।२ ) यहां त्वं त्वाम् आदि भी कहा है; तब क्या वादी मान्यको ' त्वं - त्वां ' CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्ते व्याख्या निरीक्षण १६३ श्रादि कहते हैं? यदि नहीं; तब यह उद्धरण व्यर्थ है । ' सा होवाच- ' ब्राह्मणा भगवन्तः! तदेव बहुमन्यध्वं यद् - प्रस्माद ( याज्ञवल्क्यात् ) नमस्कारेण मुच्याध्वं, न वै युष्माकमिमं कश्चिद् ब्रह्मोद्यं जेता ' ( १४।६।८।१२ ) यहां ' नमस्कार ' शब्द आया है; वही गार्गीको प्रभिमत है; तब वादी भी ' नमस्कार ' शब्दका प्रयोग करें । जब नमस्कार - वाचक पद ' नमः ' ही है, ' ते ' नहीं, तब उसमें वादियोंका आग्रह क्यों? ' नमः श्रीमते! क्यों नहीं कहते? | अथवा मान्यको युष्मद्की सभी विभक्तियोंके एक वचनका प्रयोग क्यों नहीं देते? । और फिर उक्त प्रमारण में दोनों प्रोरसे भी ' नमस्ते ' नहीं । कहां कही है नमस्ते याज्ञवल्क्यने गार्गीको; यह वादी बतावें; पर वे कभी बता नहीं सकते; तब वादीका पक्ष खण्डित हो गया । ( १० ) पूर्ण पक्ष - याज्ञवल्क्य यद्यपि ऋषि थे; वे पदवी-में अपने से छोटे राजा जनकको नमस्ते करते हैं- ' स होवाच जनको वैदेहो - नमस्ते ' ( शत ० ) समीक्षा - यह महा असत्य है । यहां तो वैदेह जनकने ही याज्ञवल्क्यको नमस्कार किया है- ' प्रत्यक्षे कि प्रमारणा-न्तरेण ' | यहांपर ' जनको वैदेहः ' कर्ता है, कर्म नहीं । तब यहां वादी कर्ताका अर्थ कर्मका कैसे करता है? । उसने यह प्रमारण श्री शेरसिह की पुस्तकसे ही बिना विचारके उद्धृत कर लिया है? ' नमस्ते करते हैं ' यह वाक्य वादी कैसे प्रयुक्त करता है, क्या ' नमस्ते ' यह वादीके मत में एकपद है? यहां " नमः ' करते हैं ' यह कहना चाहिए वा ' नमस्ते कहते हैं ' यह Gujarat An eGangotri Initiative
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१६४ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * लिखना चाहिए - श्रन्यथा एक पद मानने में निर्मूलता है । वादीने यहां भी शतपथके पाठको छिपा लिया है । देखिए वहांका पाठ - ' अभयं वै जनक! प्राप्तोऽसीति होवाच याज्ञवल्क्यः । स होवाच जनको वैदेहः - ' नमस्ते याज्ञवल्क्य! अभयं त्वा ' ( शत ० १४।६।११।६ ) । यहां वादीने ' नमस्ते ' के आगे ' याज्ञवल्क्य ' पदको छिपा दिया । तब यहां याज्ञवल्क्य ब्राह्मण है, उसे क्षत्रिय जनकके द्वारा किया हुआ नमस्कार हमारे पक्ष में विरुद्ध नहीं; शेष है ' ते '; वहां तो याज्ञवल्क्यको जनकने ' अभयं, त्वा ' भी कहा है, किमर्थमचारीः [ त्वम् ] ( १४।६।१०।१ ) में ' त्वं ' भी कहा है, तो वादी मान्यको ' ' त्वाम् ' इत्यादि कहते हैं? यदि नहीं, तब ' नमः ' के साथ ' ते ' की अनिवार्यता सिद्ध न हुई; ' नमः श्रीमते ' भी प्रयुक्त किया जा सकता है । यहां भी दोनों पक्षोंमें ' नमस्ते ' नहीं है । इससे भी वादीके पक्षका खण्डन है । ( ११ ) पूर्वपक्ष - महर्षि यम जोकि -नचिकेताके श्राचार्य होनेके कारण अपने शिष्यसे बड़े थे, अपने शिष्य नचिकेताको ' नमस्ते ' करते हैं - ' नमस्तेस्तु ब्रह्मन्! स्वस्ति मे s स्तु ' ( कठोप ० १६ ) । समीक्षा - यहां शिष्य श्राचार्यभाव नहीं कहा, उसे तो अतिथि एवं ब्राह्मण होने के कारण नमस्कार किया गया । तभी तो उसे ' ब्रह्मन्! प्रतिथिर्नमस्यः ' कहा गया है । यम क्षत्रिय, नचिकेता ब्राह्मण थे । जैसे कि - शङ्कर दिग्विजय ( १४१२८ ) के १८३ टीका पद्यमें लिखा है - ' पुरा पितुः शापवशाद्धिः कश्चिद् * नमस्ते व्याख्या निरीक्षण * १६५ । द्विजः पुरं प्राप्य यमस्य गेहम् ' ( १८२ ) ' युक्तं यमः प्रेक्ष्य सुर्वे, पमानः प्रोवाच भूदेवमतीव नम्रः ' ( १८३ ) यहां नचिकेताको । द्विज एवं ' भूदेव ' कहा गया है । ' इत्येवं तु यमेनाऽसौ नमः पूर्वमुदीरितः । नचिकेता उवाचैनम् ' ( १८५ ) । तभी तो उन्होंने अपने लिए ' स्वस्ति मेस्तु ' यहां ' स्वस्ति ' ( कल्याण ) मांगी.. ' नमस्ते ' नहीं । इसी प्रमारणको ' भारतीय संस्कृति ' के लेखकने भी दिया है । उसका उत्तर भी यही है कि यहां गुरु - शिष्य. भाव कुछ भी नहीं । यहां ' वर्गका छोटा - बड़ापन है । यद्यपि नचिकेता, क्षत्रिय - यमसे प्रायु तथा ज्ञानमें छोटा था, तथापि ब्राह्मण होनेक्रे नाते ‘ ब्राह्मणं दशवर्षं तु शतवर्षं तु भूमिपम् । पितापुत्रौ विजानीयाद् ब्राह्मणस्तु तयोः पिता ' ( २०१३५ ) इस मनुके वचनसे. नमस्करणीय था; अतः ब्राह्मणत्व एवं प्रति थित्व के कारण श्रीयमने उसे नमस्कार किया । जैसे कि-स्वामी श्रीवेदानन्दजीने स ० प्र ० ( पृ ०३६ ) की टिप्पणी में माना है - ' ब्राह्मण वड़ा माना जाता है, वह अपने से छोटे क्षत्रियको " । अनुभव में छोटा तथा अभी लड़का होनेसे उसे ' ते ' ( तुभ्यं ) कहा; ब्राह्मरण नचिकेताने यमको क्षत्रिय होने के कारण उसे नमस्कार नहीं की । तब श्रार्य - समाजके ग्रन्थ साहिब - संस्करण स ० प्र ० की टिप्परगी में - ' यह बड़ेका छोटेको नमस्ते है ' यह लिखते हुए स्वा ० वेदानन्दजीका भी खण्डन हो । गया । यद्यपि इसपर गत एक निबन्ध में प्रकाश डाला जा चुका है, तथापि वादियोंका इस प्रसारणपर बहुत बल होनेसे हमने भी इसपर फिर लिख दिया है । तब उभयपक्षने CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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* श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * १६६ वि. ' नमस्ते ' की प्रसिद्धि होनेसे वादीका पक्ष खण्डित होगया । aith अनुसार जब तक दोनों श्रोरसे ' नमस्ते ' शब्दका प्रयोग R: न मिले, तब तक वादीका पक्ष प्रसिद्ध हो रहेगा । बाद जितने भी प्रमाण दिये हैं; उनमें दोनों श्रोरसे ' नमस्ते ' नहीं it, कहा गया । तब उसकी ' भारतीय संस्कृति ' का यह स्तम्भ भी करे टूटा - फूटा है | क्षत्रिय - प्राचार्य भी ब्राह्मरण - शिष्यको नमस्कार करे - इससे वर्णकी ज्येष्ठता होने के कारण ऐसा होनेसे वादीका प्राक्षेप प्रसिद्ध हो गया । इसके विषय में हमने गत - निबन्ध में पि स्पष्टता की है, पाठक वहीं देखें । ॥इस ( १२ ) आगे अर्जुन द्वारा श्रीकृष्णको किये हुए नमस्कार में हमारे पक्षकी कुछ भी हानि नहीं, क्योंकि श्रीकृष्ण बड़े के ये | शेष है ' ते ' वहां प्रर्जुनद्वारा श्रीकृष्ण को ' त्वत्तः ' ( ११/२ ) ' स्त्वत्प्रसादात् ( १८।७३ ) ' त्वया ' ( ६।३३ ) ' तव ' ( १८७३ ) यह युष्मद्के अन्य - विभक्तियोंके एकवचनके प्रयोग भी प्रयुक्त किए गए हैं; पर वादी लोग क्या मान्यको त्वं, त्वया, तव होने श्रादिका प्रयोग करते हैं? यदि नहीं; तो ' नमस्ते ' में ' ते ' की प्रयोज्यता भी सिद्ध हो गई । ( १३ ) पूर्वपक्ष - भवभूति - महाकविलिखित ग्रन्थ ' उत्तर-रामचरित ' में रामने सीताको नमस्ते किया है ' भगवति! जा नमस्ते । समीक्षा - यह महा - असत्य है । यह बात श्रीशेरसिंह श्रार्यसमाजीको पुस्तक से वादीने बिना विचारे उद्धृत की है । वादी लोग अपनेसे पहलेको पुस्तकमें लिखे हुए प्रमारणों को देख CC - 0. Ankur Joshi Collection * ' नमस्ते ' व्याख्या निरीक्षण * १६० कर अपने पक्षको सिद्धि होगई हुई समझ लेते हैं; पर मूल-पुस्तक में देखते नहीं कि वहां यह है भी सही, वा नहीं । शेरसिह ने अपने ' नमस्तेकी प्राचीनता ' ट्रैक्ट में इस प्रकार के बहुतसे असत्य उद्धरण दे डाले हैं - यह लोग परमात्मासे भी नहीं डरते । वहां तो भागीरथी गङ्गाको श्रीरामका नमस्कार है, सोताको नहीं है । और जहां सीताको ' देवि सोते! नमस्ते स्तु ' ( ७/१० ) कहा भी है; वहां श्रीरामने ऐसा नहीं कहा; किन्तु पृथिवीने देवी होने के नाते सीताकी पूज्यता के कारण कहा है और ' ते ' उसे छोटे होने के कारण कहा है । ( ख ) ' भारतीय संस्कृति ' के प्रणेताने ' नलका दासीको ' नमो-स्तुते ' कहना बताया है, पर यहां तो ' नमोस्तु ते ' है ' नमस्ते ' नहीं; तब क्या वादी ' नमोस्तु ते'का प्रयोग करते हैं? आप लोग ' नमः - ते ' में कोई व्यवधान सहन नहीं करते, बल्कि ' नमस्तुभ्यम् ' भी नहीं कहते । तत्र वादीका इससे अपना पक्ष सिद्ध न हुआ । वस्तुतः वादीके दिये हुए प्रमाण में यह पाठ ही नहीं । वहां तो ' गच्छ भद्रे '! ययासुखम् ' यह पाठ है । देखिये महाभारत ( ३।७५।२ ९ ) तब वादीका पक्ष सिद्ध न हुआ । ( १४ ) पूर्वपक्ष- ' देवदेव! जगन्नाथ! नमस्ते भुवनेश्वर! ' ( लिङ्ग पुराण ३।२७।७ ) ' महादेव तुझे नमस्ते हो ' । समीक्षा— जबकि वादी अपने इस ट्रैक्टके १४ पृष्ठ में ' नमस्ते ' में दो पद मानकर उसमें के ' ते ' का ' तुझे ' अर्थ मानता ' है, तब यहां ' तुझे नमस्ते ' कहकर उसे एकपदकी भान्ति कैसे लिखता है? उसे ' तुझे नमः हो ' यह लिखना चाहिये था । पर Gujarat. An eGangotri Initiative
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१६८ G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * वैसा लिखनेसे फिर ' नमस्ते ' टूटता है इसलिए वह पुनरुक्ति-दोषसे भी नहीं डरता । भगवानको ' नमस्ते ' कहने में हमारे पक्षमें कोई क्षति नहीं पड़ती । उसे ' नमः ' तो कहा ही जाता है और ' ते ' भी । सभी भाषाएं भगवान्को ' युष्मद् ' का एक वचन देती हैं । जैसे श्रङ्गरेजी में उसे Thou और हिन्दी - उर्दू में- ' जिधर देखता हूं उधर तू ही तू है ' इत्यादिमें ' तू ' कहा जाता है । ( १५ ) पूर्वपक्ष - पृथ्वी वराह भगवान्को बोली- ' नमस्ते सर्वदेवेश, नमस्ते मोक्षकारिणे ( वाराह पु ० ) भगवान्को और मोक्षदाताको नमस्ते हो । समीक्षा- - जब वादीने ' नमस्ते ' को दो पद माना है; तब उसको एक पदकी तरह व्यवहृत क्यों किया? भगवान्को नमस्कार करने और ' ते ' के कहनेमें हमारे पक्ष में कोई क्षति नहीं पड़ती । भगवान्को सभी भाषायें युष्मद्का एकवचन कहती हैं । ( १६ ) पूर्वपक्ष - ' वाराह की पृथिवीको ' नमस्ते ' – ' नमोस्तु विष्णवे नित्यं नमस्ते जलशायिने ' पीतवस्त्रधारीको नित्य नमस्ते हो ' । समीक्षा- यहां भी पूर्ववत् उत्तर है । वाराहने यह पृथिवी को नहीं कहा । वादीने यह प्रकरण अशुद्ध दिया है- ' प्रत्यक्षे कि प्रमाणान्तरेण ' । यहां नमस्कार विष्णुको है, पृथिवी को नहीं । * नमस्ते - व्याख्या निरीक्षण * ( १७-१८ ) पूर्व - ' केतकी का फूल जड़ होता हुआ भी देवको नमस्ते करता है- ' नमस्ते नाथ! मैं आपको महा नमस्ते । करता हूँ? | स o - यहां भी हमारे पक्षको क्षति नहीं । उत्तर पूर्वव है । ' मैं आपको नमस्ते करता हूँ " यह वादीका श्रर्थ । और ' नमस्ते ' को दो पद माननेके अपने पक्ष के विरुद्ध अशुद्ध है-' आपको ' यह किस शब्दका अर्थ है? यदि ' ते ' का; तो है- क्षेत्र ' नमः ' बचा; तब ' आपको नमस्ते ' अर्थ कैसे? । इस प्रकार ( १८ ) संख्या में भी जान लेना चाहिये । ' शिवके लिए नमस्ते हो ' यह अशुद्ध अर्थ है; ' तुझ शिवके लिये नमः हो ' यह अ करना चाहिये था । + ( १६ ) पूर्व - पुराणों में नीच, स्त्री और शूद्रोंके लिए भी ' नमस्ते ' का प्रयोग है - ' द्विजानां च नमः पूर्वमन्येषां च नमोन कम् । स्त्रीणां च केचिदिच्छन्ति नमोन्तं च यथाविधि ' ( शिव-५०. विद्येश्वरसं ० ११४२ ) । परिणामतः पौराणिकोंका कहना कि नीचोंके लिए नमस्ते नहीं होता- ठीक नहीं । ' उत्तरपक्ष- यह दर्शनाचार्यजीका असत्य है । यहां ' नमस्ते ' है कहां? यहां तो ' नमः ' है; तब वादी यह जबर्दस्ती कैसे करता है? यहां तो यह अर्थ भी नहीं । यहां तो यह आशय है । कि- ' भवत्पूर्वं चरेद् भैक्षमुपनीतो द्विजोत्तमः । भवन्मध्ये राजन्यो वैश्यस्तु भवदुत्तरम् ' ( मनु ० २।४ ९ ) जैसे पह ' भवती भिक्षां ददातु ' में ब्राह्मण ' भवती ' पहले कहता है, यो क्षत्रिय ' भिक्षां भवती ददातु ' मध्य में कहता है । ' भिक्षां द CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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* श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * १७० महा ' भवती ' वैश्य अन्त में कहता है; वैसे शिव - नमस्कार के विषयमें मसे भी जान लेना चाहिये कि द्विज ' नमः ' पहले कहे — ' नमः शिवाय ' । दूसरे लोग ' नमः ' अन्त में कहे- ' शिवाय नमः ' । तब वादीने यहां ' नमस्ते ' का अर्थ कैसे निकाल लिया? तब वादीका यह श्रर्थ कि- ' द्विजोंके लिए पूर्व ' नमः ' शब्दका प्रयोग करना चाहिए, तथा अन्योंके लिए अन्त में ' नमः ' शब्द प्रयुक्त होना चाहिये — यह वादीका अर्थं असङ्गत है । ' पूर्व तथा अन्तमें ' नकार इसका क्या अर्थ है? क्या यह कि - ' द्विज नमस्ते ' कहें और मस्ते शूद्र ' ते नमः ' कहें, और स्त्रियां भी ' ते नमः ' कहें । क्या आप इस अर्थको कभी उक्त पद्य से निकाल सकते हैं? तब क्या अद्विज लोग ' ते नमः ' यह अशुद्ध बोलें? ' नमस्ते ' न कहें? ' तस्मादु ह नायज्ञियं ब्रूयाद् नमस्ते इति ' इस ६ पृष्ठमें आपसे उद्धृत वचनसे अयज्ञिय ( यज्ञाधिकार- विरहित ) कोई भी शिव ' नमस्ते ' न कहे । तब वादीके पक्ष में भी स्त्री - शूद्रादि नीच सिद्ध हुए । तब उनका वेदानध्ययन भी शास्त्रीय सिद्ध हुआ, इस विषय में ' श्रीसनातनधर्मलोक ' का तृतीय पुष्प देखना चाहिये । नमस्ते शास्त्रों में स्त्री - शूद्रोंके साहचर्यसे दोनोंका द्विज - पुरुषको अपेक्षा करता निम्नत्व न्याय्य ही है । स्त्री पुरुषके समान नहीं होती, शूद्र द्विज के समान नहीं होता; तब उनकी अवरता स्वतः सिद्ध हो गई । 7 ( २० ) पूर्व - दक्ष अपनी पुत्री सतीको नमस्ते करता है ' दक्षस्तां जगदम्बिकाम् । नमस्कृत्य करौ बद्ध्वा बहु तुष्टाव ददा भक्तितः ' ( शिवपुराण ) दक्षने जगत्की माता उस सतीको दोनों हाथ जोड़कर ' नमस्ते करके ' ' ' ' ' ' ' । CC - 0. Ankur Joshi Collection तब सिद्ध यदि करे; है? ' नहीं * नमस्ते व्याख्या निरीक्षण * १७१ उत्तर - जब यहां ' नमस्कृत्य ' है; ' नमस्ते इति कृत्वा ' नहीं, ' नमस्ते करके ' यह वादीसे किया हुआ प्रथं अशुद्ध ही हुआ । ( ख ) पूर्वपक्ष - ' पौराणिक भाई इसका उत्तर दें कि -पिता अपनी पुत्रीको नमस्कार या नमस्ते करके सत्कार क्या यह अपनेसे छोटेको ' नमस्ते ' कहनेका प्रमारण नहीं ( पृ ० २२ ) उत्तर पक्ष - यहां नमस्कार साधारण पुत्री होनेके नाते किया गया; यद्यपि देवीका अंश मानकर श्राजकल कोई लड़कीका नमस्कार नहीं लेता; बल्कि उसे नमस्कार ही किया जाता है; अतः यह ' छोटेको नमस्ते ' कहनेका सबूत नहीं । यहां तो सतीके जगदम्बिका होने से जिसका अर्थ वादीने भी जगत् की माता किया है - उसे नमस्कार किया गया है; अतएव यह प्रश्न व्यर्थ है । तभी यहां ' भक्तितस्तुष्टाव ' कहा गया है । कि- भक्ति से उस सतीकी स्तुति की । कोई अपनी सन्तानकी भक्ति नहीं करता; जगदम्बा -देवीकी तो सब भक्ति करते हैं । तभी कहा है- ' गुणाः सर्वत्र पूज्यन्ते, पितृवंशो निरर्थकः । वासु-देवं नमस्यन्ति वसुदेवं न मानवाः ' वसुदेवको कोई नमस्कार नहीं करता; वासुदेवको सब नमस्कार करते हैं; पूजा गुरणों की होती है । तब सतीके नमस्कारसे किसी छोटेको नमस्कार करना सिद्ध - प्रमारग नहीं । ( २१ ) पूर्व - एक ब्राह्मरणको लड़कीमें क्षत्रियके द्वारा पैदा सन्तानको ' सूत ' कहते हैं ( मनु ० १०।११ ) । पौराणिकोंके Gujarat. An eGangotri Initiative
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१७२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) E3 सिद्धान्तमें सूत एक वर्णसङ्कर शूद्र वर्णसङ्कर शूद्रको भी ऋषियोंने महाभाग! व्यासशिष्य! नमोस्तु ११२३ ) । क्या यहां बड़ेने छोटेको उत्तर- पौराणिक सूत तो पुराणानुसार अग्निसे उत्पन्न है, इस विषय में ' श्रीसनातनधर्मालोक होता है; उसी सूत नामवाले नमस्ते किया- ' सूत! सूत ते ' ( शिवपु ० विद्येश्वरसं ० ' नमस्ते ' नहीं किया? | उच्च ब्राह्मण है, वह तो वह सूत जातिवाला नहीं । ' ( तृतीय पुष्प में ) देखना चाहिए । तब हमारे पक्ष में उसे नमस्कार करनेसे कोई भी दोष नहीं आता । इसके अतिरिक्त यहां ' नमोस्तु ते ' है, ' प्रस्तु का मध्य में व्यवधान है; क्या वादी ' नमोस्तु ' का प्रयोग करते हैं? यदि नहीं; तब इससे ' नमस्ते ' की सिद्धि न हुई । वादिगण तो ' नमस्ते ' से भिन्न कथनको अनेकता करनेवाला तथा विद्वेष का प्रसारक मानते हैं; तब उससे भिन्न शब्दों को कैसे प्रमा-रित करते हैं?. जोकि कहा जाता है कि - ' पुराणों के अनुसार इन सूतजीं ने जोकि - शूद्रसे भी पतित हैं [ यह बात गलत है- इसपर उक्त तृतीय- पुष्प देखिए ) पुराणोंको गा - गाकर सुनाया है; तो पुराण श्रवश्यमेव शूद्रों के लिए हैं; इसीलिए भागवत यां है- ' स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरः । इति भारत-माख्यानं कृपया सुनिना कृतम् ' ( पृ ० २४ ) J समीक्षा - यह भी कथन ठीक नहीं । यदि एकमात्र शूद्रों के लिए ही पुराण होते; तो सूतजीके श्रोता भी शूद्र - अन्त्यज आदि होते; पर वहां तो ' ऋषयः शौनकादयः शौनकादि ऋषि * ' नमस्त ' व्याख्या निरीक्षण * To मुनि श्रोता थे । हां, वेदको भांति पुराणोंमें शूद्रोंका अनधिकार । नहीं; अतः वे भी पुराणोंको ' कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः ' ब्राह्मणसे सुन सकते हैं । पर यह नहीं कि पुराण हैं भी शूद्रोंके लिए ही ॥ स्वा ० दयानन्दने संस्कृतभाषानभिज्ञ तथा वेदानभिज्ञ - शूद्रोंके । लिए ' सत्यार्थप्रकाश ' श्राप लोगोंके अनुसार वैदिक सिद्धान्तों । के प्रदर्शनार्थं बनाया था; तब क्या ' सत्यार्थप्रकाश ' के द्रष्टा तथा उसे गा - गाकर सुनाने तथा प्रचार करने वाले प्राप लोग शूद्र हैं, जो वेद छोड़कर ' सत्यार्थ प्रकाश ' में लगे हुए हैं? यदि स ० प्र ० को द्विज भी पढ़ते हैं, और शूद्र भी; इस प्रकार पुराणोंके लिए भी समझ लेना चाहिए । ( २२ ) पूर्वपक्ष - ' विष्णुका दधीचको नमस्ते - ' नमस्तव ' ' ' प्रणनाम मुनि हरिः ' ( शिव पु ० ) मैं तुझे नमस्ते करता हूँ ' । समीक्षा - यहां ' नमस्ते ' शब्द कहां है? । यहां ' मैं तुझे यह किसका अर्थ है? यहां तो ' प्रणनाम ' प्रणाम करना श्राया है । आप लोग संस्कृतानभिज्ञ जनताकी इस प्रकार प्रतारित कर रहे हैं । ( २३ ) पूर्वपक्ष - ब्रह्माने अपने पुत्रको नमस्ते किया-' नमस्ते भगवन्! रुद्र! भास्करामिततेजसे । भगवन्! भूत भव्येश! मम पुत्र महेश्वर! ( शिवपुराण ) समीक्षा- यहां पुत्र होनेसे नहीं, किन्तु भूतभव्येश भगवान् होनेसे ही नमस्कार है; तभी वादी स्वयं भी कहता है- " यहां वस्तुतः पिता अपने पुत्रको नमस्ते नहीं करता; यहां पर परमेश्वर स्वयं ही पुत्ररूपमें प्रकट हुए हैं, अतः ' नमस्ते, यहां परमेश्वरको ही है, ( पृ.२५ ) इस वास्तविक बातका वादीको CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१७४ • श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * प्रत्युत्तर तो स्फुरित नहीं हुआ; पर वह इसपर कहता है-' पौराणिक - सम्मत वेदान्त के अनुसार तो सारा संसार हो ब्रह्मरूप है; लौकिक माता, पिता, पुत्रादि भी ब्रह्मरूप ही हैं; अतः यदि वे परस्पर नमस्ते करें; तो क्या दोष; ब्रह्म ही ब्रह्मको नमस्ते करेगा ' । पाठकोंने देख लिया कि यह क्या पूर्वोक्त ' वास्तविक बात ' का प्रत्युत्तर है कि यह अद्वे तवाद है? अद्वैतवादमें प्रभेदबुद्धि होती है; प्रभेद होनेपर तो नमस्कार वा उपासना भी नहीं हो सकती । इसलिए अद्वैतवादके पूर्ण ज्ञाता एवं प्रचारक स्वामी शङ्कराचार्यने ' परा पूजा ' में कहा है- ' प्रदक्षिणा नन्त स्य अद्वयस्य कुतो नतिः । वेदवाक्यैरवेद्यस्य कुतः स्तोत्रं विधीयते ' । श्रर्थात् श्रद्वैततामें नमस्कार नहीं हो सकती । इसका वादी यह प्रसारण देखे कि क्या वह अपने आपको कभी ' नमस्ते ' कहता है? यदि नहीं; तब स्पष्ट है कि - श्रद्वैतवाद में अपने से किसीका भी भेद न होनेसे कौन किसको नमस्कार करे; फिर तो उपास्य - उपासक के भी प्रभेद हो जानेसे उपासनाभी नहीं हो सकती । तब यह वादीका प्रयास अज्ञानमूलक है । स्वामी दयानन्दजीने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका तथा अपने वेदभाष्य में बहुत बार लिखा है- ' परमात्मा ' जनेभ्य ग्राशीर् (? ) ददाति ' ( परमात्मा मनुष्योंको आशीर्वाद देता है ) । पर यह कहीं नहीं लिखा कि- ' परमात्मा जनेभ्यो नमस्ते करोति ' ( कि-परमात्मा मनुष्यों को नमस्ते करता है ) । जब ऐसा है; तो ' ब्रह्मकी ब्रह्मको नमस्ते ' कैसी? श्रतः यह प्रत्युत्तर वादीका CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्ते व्याख्या निरीक्षण प्रयासमात्र है; उसके पक्षकी दुर्बलता बताता है । ( २४ ) पूर्व - शिवने अपनी स्त्री पार्वतीको नमस्ते किया-' तथा प्रणयभङ्गेन भीतो भूतपतिः स्वयम् । पादयोः प्ररणमन्नेव भवानों प्रत्यभाषत ' ( शिव. वायु. सं. ) । समीक्षा - यहां तो ' नमस्ते ' शब्द ही नहीं; तब यह वादी ने झूठा उद्धरण कैसे दिया? यहां जो ' प्ररणाम ' शब्द है; वादी. इस ' प्ररणाम ' शब्दका प्रचार क्यों नहीं करते? यह प्रणाम भी यहां शिष्टाचार वाचक नहीं, किन्तु मानिनीके मानको दूर करने के लिए कवि कल्पित काम व्यवहार है । उसे इस नमस्ते में कैसे उद्धृत किया जा सकता है? क्या वादीलोग ' नमस्ते ' का प्रयोग मानिनी ( रुठी हुई ) स्त्री के मानको दूर करने के लिए उसके चरणों में करते हैं? ( २५ ) पूर्वपक्ष - ' ब्रह्माने अपनी धर्मपत्नी सावित्रीके चरणों में गिरकर नमस्ते किया - ' पादयोः पतितस्तेऽहं क्षम देवि! नमोऽस्तु ते ' ( पंद्मपु ० ) तुम्हें नमस्ते हो । उत्तर - यहां ' नमोऽस्तु ते ' है, ' नमस्ते ' नहीं; वादियोंका ' नमस्ते ' में ही आग्रह है । तव यह उद्धरण व्यर्थ है! क्या वादी भी यह मानकर स्त्री के पांव पड़कर उसे ' नमस्ते ' कहते हैं? रूठी हुई स्त्रीको मनानेके लिए उसके पैरोंपर गिरना कामशास्त्रका व्यवहार है, शिष्टाचार नहीं । तब शिष्टाचार में वादी इसका उद्धरण कैसे दे सकता है? पूर्व -- ' ऊपरके दो इलोकोंमें तो पति अपनी स्त्रियोंके पैरोंपर गिर कर नमस्ते कर रहे हैं; यह अपनी स्त्रीके चरणों-Gujarat An eGangotri Initiative
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१७६ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * में गिरकर ' नमस्ते ' करना तो वेद- विरुद्ध पौराणिक लीला है | ( पृ ० २७ ) उत्तर - वास्तव में यह शिष्टाचार नहीं है; किन्तु कामाचार है । तब कामाचार शिष्टाचार में कैसे प्रवृत्त हो सकता है? यहां ' नमस्ते ' शब्द भी नहीं है । पुराण- इतिहास में भी कभी साहित्य की तरह दम्पतियोंका व्यवहार दिखलाया जाता है । वहां पर रसभङ्गके भयसे नायक नायिका को यथा - कथश्चित् प्रसन्न हो करता है, डाँटता नहीं । इस विषय में स्पष्टता गत निबन्ध में देखनी चाहिए । ' पूर्व - परन्तु पति - पत्नीका परस्पर प्रेमसे सत्कारार्थं नमस्ते करना आर्यसमाजका वैदिक सिद्धान्त है । उत्तर - तब क्या पैरोंमें गिरना दूसरेका सत्कार नहीं होता? तिरस्कार होता है? वादीके स्वामीजी कहते हैं - ' वधूवर ' नमस्ते ' इस वाक्यसे परस्पर नमस्कार कर, स्त्री पतिके चरण - स्पर्श, पाद - प्रक्षालन करे ' ( संस्कार - विधि विवाह ० ' पृ ० १३३ ) । यहां स्त्रीके द्वारा पतिका चरण स्पर्श सत्कार के लिए ही तो है - यह स्पष्ट है । तब यदि परस्पर सत्कार करना दोनोंका ही प्राप लोगोंके अनुसार कर्तव्य है, तब वादी लोग पतिरूपमें अपनी स्त्री के चरणों पर भी गिरें, जैसाकि वादीने स्वयं कहा है - " यदि तुम स्वयं सत्कार चाहते हो तो औरोंका भी सत्कार करो । जितना तुम छोटे का सत्कार करोगे ' उतनाही वह तुम्हारा भी सत्कार करेगा ( पृ ० १३ ) यदि यह वेद- विरुद्ध है, तो स्त्रीको नमस्कार करना-* नमस्ते व्याख्या निरीक्षण १७७ भी वेद- विरुद्ध है, क्योंकि श्रवर होनेसे जैसे उसके पांवपर गिरना अयोग्य है, वैसे नमस्कार भी प्रयोग्यं ही है । तव अपने कथनानुसार वेद - विरुद्ध इस प्रमाणसे वादी अपने पक्षको किस प्रकार सिद्ध कर सकता है? ( २६ ) पूर्व - ' वासुदेव! नमोस्तुते ' ( विष्णु सहस्र ० ) वासुदेवको नमस्ते किया गया है । उत्तर – यहां हमारे पक्षमें थोड़ी भी क्षति नहीं आती; परमात्माको ‘ ते ( तुभ्यं ) ' भी कहा जाता है, ' नमः ' भी । विष्णु-सहस्रनाम होनेसे यहां परमात्मा के अवतार श्रीकृष्ण लिये जाते हैं । फिर भी यहां ' नमस्ते ' शब्द नहीं; आप लोगोंका उसीमें ग्रह है; तब यह प्रमाण कैसे उद्धृत किया? इस प्रकार ( २७ ) ' नमस्ते भगवान् रुद्र ' यहां रुद्रको नमस्ते किया गया है । ( २८ ) ' गोविन्द! नमो नमस्ते ' गोविन्द! तुझे नमस्ते हो । ( २ ) ' नमस्तस्यै नमस्तस्यै, जगत्तारिणि त्राहि दुर्गं नमस्ते ' यहां दुर्गाको नमस्ते किया गया है । ( ३० ) ' नमस्ते भगवन् भूयो! ' हे भगवन्, तुझे वार - वार नमस्ते हो । इन प्रमाणोंका उत्तर भी जान लेना चाहिये । इनमें ' तुम्हें नमस्ते हो ' यह लिखना अशुद्ध है, और ' नमस्ते यह दो पद हैं । इस वादी पक्षको काटने वाला है । और उनमें ' नमस्ते ' से भिन्न ' तुभ्यम् ' पद भी पृथक् नहीं है- जोकि ' तुम्हें नमस्ते हो ' यह अर्थ किसी प्रकार हो सके । ( ३१ ) पूर्व — ' नमस्ते वाङ्मनोतीतरूपाय ' ( सत्यनारा ० ) सं ० घ ० १२ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१७८ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * प्रभुको नमस्ते हो । उत्तर - यहां तो सभी पुस्तकोंमें ' नमो वाङ्मनसातीतरूपा-यानन्तशक्त ' यह पाठ है; वह ठीक भी है, क्योंकि- ' प्रचतुरवि-चतुर ' ( पा. ५।४।७७ ) इस सूत्र से ' वाङ्मनस ' शब्द अकारान्त है, ऐसा होनेपर आठ अक्षर वाले पादमें ' ते ' शब्द अधिक हो जाता है, उससे ६ अक्षर हो जाते हैं, छन्दोभङ्ग हो जाता है । इसलिए वहां पर ' नमो वाङ् ' यही पाठ है । वादीके कहे पाठ भी हमारे पक्षको कोई क्षति नहीं; क्योंकि परमात्माको नमस्कार तथा युष्मद् शब्दका एकवचन कहना सर्वसम्मत है । इस प्रकार ( ३२ ) दुर्गापाठके ५।१६-७६ श्लोकोंमें ' नमस्ते ' शब्द श्राया है ' - यह वादीकी बात बिल्कुल गलत है, इन सभी पदों में ' नमस्तस्यै ' आया है ' नमस्ते ' नहीं श्राया । इतना असत्य व्यवहार क्यों? ( ३३ ) ' नमस्ते स्वात्मवादिने ' हे प्रभो! तुम्हें नमस्ते हो ' यहां ' तुभ्यं नमस्ते ' कहां है; जो कि वादीने ' तुम्हें नमस्ते हो ' यह अर्थ किया? असत्य व्यवहारकी सीमातीतता है | तुझ स्वात्मवेदीको नमस्कार है, यह अर्थ है; वादीका निर्मूल है | ( ३४ ) पूर्व - श्रीमद्भागवतमें श्रीकृष्णने उत्तम - ब्राह्मणों को नमस्ते किया है- ' विप्रान् स्वालाभसन्तुष्टान् साधून् भूतसुहृत्त-मान् । निरहङ्कारिणः शान्तान् नमस्ते शिरसाऽसकृत् । विप्रों को बार - बार नमस्ते हो । उत्तर - प्रपने अशुद्ध पक्षको सिद्ध करनेके लिए वादी पुस्तक के पाठको बदलने में भी नहीं हिचकिचाते । अथवा वहां CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्ते व्याख्या निरीक्षण * १७ ९ प्रक्षेप कर दिया करते हैं - यह महान् खेद है । वस्तुतः यह छल है, छलियों के लिए वादोने कहा है - ' छलीको वेदमें वज्रसे मारनेका विधान है ' [ पृ ० १४ ] । यह छल वादीने [ १ ] [ २ ] [ ३ ] [ ८ ] [ १० ] [ १३ ] [ १६ ] [ २० ] [ २१ ] [ २४ ] [ २५ ] [ २६ ] [ ३४ ], [ ३८ ] संख्या वाले प्रमाणोंमें तो विशेषकर किया है । यदि श्रार्यराज्य होता तो वादीकी इच्छा [ छलीको वज्रसे मारनेको ] पूर्ण होती । उक्त श्रीमद्भागवतके वचनमें तो ' नमस्ये शिरसाऽसकृत् ' [ १०।५२ । ३३ ] यह ' नमस्ये ' पाठ है, ' नमस्ते ' नहीं । ' भारतीय संस्कृति ' के प्रणेताने भी ' नमस्ते ' ही पाठ दे डाला है । ' नमस्यें ' का श्रर्थ है- ' पूजयामि ' । वादीके अनुसार भी यहां ' नमस्ते ' यह पाठ प्रशुद्ध है; क्यों कि - वादी ' नमस्ते ' में ' नमः -ते ' यह दो पद मानता है [ पृ ० ६ ] और ' ते ' को वह ' वैदिक साहित्यज्ञोंने एकवचनानन्तशब्द [ नमस्ते ] का सबके लिए प्रयोग करना उचित समझा और युक्तियुक्त भी है ' [ पृ ० ३५ ] इन शब्दोंसे एकवचन मानता है; तब ' विप्रान्... नमः ते ' इस द्वितीया के बहुवचनान्त ' विप्र ' शब्द से उस एकवचनान्त चतुर्थीके ' ते ' शब्दकी सङ्गति क्या हो सकती है? । इसके अतिरिक्त ' नमस् ' पदके योगमें उपपद-विभक्ति चतुर्थी होती है; पर यहां तो ' विप्रान् ' में द्वितीया है । ' नमस्ये ' तो सकर्मक क्रिया है, तब उसके योगमें कारकविभक्ति द्वितीया ठीक ही है । ( ३५ ) पू ० - राजा जनकने अपने आसनसे उठकर मुनि-Gujarat. An eGangotri Initiative
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१८० * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * याज्ञवल्क्यको नमस्ते किया- ' जनको ह वैदेहः कूर्चादुपासर्पन उवाच - नमस्ते [ बृहदा ० ] उत्तर -- वहां तो जनकने याज्ञवल्क्यको युष्मद् - शब्दको अन्य-विभक्तियोंके एक वचन भी दिये हैं; जैसेकि हम पहले दिखला चुके हैं, तब वादी मान्यको उन युष्मद् के सभी विभक्तियों के एकवचनका प्रयोग क्यों नहीं देते? यह एक वादीके पक्ष में आपत्ति है; और फिर यहां ' नमस्ते ' के उत्तर में याज्ञवल्क्यने भो जनकको ' नमस्ते ' नहीं कहा - यह वादी के पक्षमें दूसरी आपत्ति है । वर्ण एवं योग्यता में उच्चको नमस्कार करना तो हमारे पक्ष में भी, विरुद्ध नहीं, तब वादीने यह उद्धरण व्यर्थ दिया है [ ३६ ] वाल्मी. में विश्वामित्रने ' नमस्तेस्तु ' आपको मेरा नमस्ते हो ' कहा है । यह गलत है; यहां ' मम तुभ्यं नमस्ते ' पाठ नहीं है, जो कि यह अर्थ किया है । इसीका नाम होता है । असत्य । [ ३७ ] पूर्व - सीता विराध - राक्षसको नमस्ते करती है । उत्तर - यहां हमारे पक्ष में कुछ भी हानि नहीं । राक्षस-जाति देवजातिमें अन्तर्भूत होनेसे मनुष्य की अपेक्षा उच्च है; तब उसको नमस्कार हो सकती है, और मानुषी व्यवहारसे, भिन्न होनेसे वहां ' ते ' का प्रयोग भी हो सकता है; अतः इस प्रमाणसे प्रतिपक्षीका कुछ भी सिद्ध न होनेसे यह उद्धरण व्यर्थ है । ( ३८ ) पूर्व - प्रथर्ववेद में स्त्रीजातिके लिए नमस्तेका प्रयोग नमस्त व्याख्या -निरीक्षण १८१ है- ' नमस्ते जायमाना जातायै उत ते नमः । ' ( अ. १०१.१०११ ) उत्तर - यह वादीका छल है; उसने इसका उत्तराधे दिपा दिया है । वहां ' अन्ये ' यह सम्बोधन है । ' अघ्न्या ' निघण्टु ( २११४ ) तथा वेद: ( यजुः ८।४३ ) के अनुसार गायका नाम । है । सो यह पैदा होरही वा पैदा हुई गायको नमस्कार किया गया है, स्त्री - जातिको नहीं । गायको ' ते ' कहना व्यवहारसे विरुद्ध नहीं । यह प्रमारण वादीने घरौण्डा के ' नमस्ते प्रदीप ' से बिना विचारे ले लिया है । ( ख ) पूर्व - ' मैं समझता हूँ कि इतने विवेचनसे हमारे पण्डितम्मन्य पौराणिक भाइयोंकी आंखें अवश्य खुली होंगी । ' समीक्षा- यहां वादी इस प्रकार परिवर्तन कर दे-समझता हूँ कि इतने विवेचनसे पण्डितम्मन्य दयानन्दी दर्शना ध्यापकजी की प्रांखें अवश्य खुल गई होंगी, उन्होंने अपनेः असत्य व्यवहारसे अपना महल गिरता हुआ देख लिया होगा । फलतः अग्रिम - संस्करण में इस क्षुद्र- पुस्तकका संशोधन कर लेंगे । पूर्व - पृष्ठ ६ में वादी कहता है- ' नमस्ते ' शब्दको दो टुकड़ोंमें न बांटा जा सकता है— नमः - ' ते । व्याकररणके जानने वाले । क जानते हैं कि ' ते ' शब्दका अर्थ है- ' तुभ्यं ' अर्थात् ' तुम्हारे न" लिए ' 1. अब ' नमस्ते ' शब्दका अर्थ यह हुआ कि - ' तुम्हारे प्र लिए नमः । ' समीक्षा - यह कथन अशुद्ध है । ' ते तुभ्यम् ' का अर्थ है- प ' तेरे लिए ' । क्योंकि ' तेमग्रावेकवचनस्य ' ( पा. ८-१-२२ ) । उ एकवचनमें ' ते ' होता है- बहुवचन में युष्मद्को ' ते ' नहीं होता. CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative