सनातन धर्मालोक १-२ — पृष्ठ 111–120
सनातन धर्मालोक १-२ · पृष्ठ 111–120
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०१ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * २०२ सोचें कि इनसे प्रतिपक्षियोंका क्या सिद्ध हुआ? यहाँ पाठक क तो क्षत्रिय ( छोटे ) द्वारा ब्राह्मणों ( बड़े ) को नमस्कार की जा रही है, छोटे - बड़े सर्व साधारणको नहीं । क्षत्रियकी य अपेक्षा ब्राह्मण में चाहे बड़ा हो वा छोटा, बूढ़ा हो, वा बच्चा, वह बड़ा वर होनेसे ( पहले उत्पत्ति मुखरूप - ब्राह्मण नो की होती है; अतः उसे अग्ग्रज, तथा उत्तमाङ्ग होनेसे सर्वोत्तम कहा जाता है । उत्पत्ति समय पहले पा होने लगजाएँ, तो जननीका प्राण - संशय उपस्थित हो जाय ) तो उस ( क्षत्रियादि ) से बड़ा है ही, प्रायुमें छोटा होनेपर भी ब्राह्मण क्षत्रियादिसे बड़ा ही माना जाता है । अतः बड़े श्रायु भी क्षत्रियका छोटे ब्राह्मण कुमारसे नमस्कार कर द संगत ही है, जिसे क्षत्रिय राजा रहूगरणने पूर्ण किया । E इसमें वादि - प्रतिवादि मान्य- मनुस्मृतिका भी निर्णय देखें-' ब्राह्मणं दशवर्षं तु शतवर्षं तु भूमिपन् ( क्षत्रिय नृपम् ) । पिता-पुत्रौ विजानीयाद् ' ब्राह्मणस्तु तयोः पिता ' ( २।१३५ ) यहां प्राचीन भाष्यकार मेधातिथिने लिखा है- ' चिरवृद्धेनापि क्षत्रियेण स्वल्पवर्षोपि ब्राह्मणः प्रत्युत्थाय प्रभिवाद्यश्च - इति प्रकरणार्थः ' । यहीं राधवानन्दने भी कहा है- ' ब्राह्मणस्तु तयोः पिता - पितृवन्मानाहः ' । यहीं राधवानन्दने भी कहा है-' वर्णज्येष्ठ वयोज्यैष्ठयो ' वर्णज्यैष्ठ्यं ' मान्यता- निमित्त-मित्याह - ब्राह्मणमिति ' ( वर्णज्येष्ठता और श्रायु ज्येष्ठता में वर्ण ज्येष्ठता हो मान्यता का कारण है ) । यहीं श्रीरामचन्द्रने लिखा है - ' पिता- पितृस्थानीयः ' । CC - 0. Ankur Joshi Collection G अन्य प्रमाणोंपर विचार * २०३ यही बात श्रापस्तम्ब धर्मसूत्रमें भी कही है -- ' दशवर्षश्च ब्राह्मरणः, शतवर्षश्च क्षत्रियः । पिता - पुत्रौ स्म तो विद्धि, तयोस्तु ब्राह्मणः पिता ' ( १।१४।२२ ) । इसी को अनुसृत करके ' स्मृति-चन्द्रिका ' ( संस्कारकाण्ड, अभिवादनप्रकररण ) में शातातपका वचन उद्धृत किया है; ' अभिवाद्यो नमस्कार्यः शिरसा यश्च एव च । ब्राह्मणः क्षत्रियाद्यैस्तु श्री समैः सादरं सदा ' । इसी प्रकार महाभारत ( अनुशासनपर्व ) में भी कहा है- ' क्षत्रियः शतवर्षी च दशवर्षी द्विजोत्तमः । पिता - पुत्रौ तु विज्ञ यौ तयोहि ब्राह्मणो गुरुः ' ( ८।२१ ) अर्थात् ब्राह्मरण १० वर्ष का हो, और क्षत्रिय १०० वर्षका, फिर भी १० वर्षके ब्राह्मण को पितृतुल्य और १०० वर्ष के क्षत्रियादि को भी पुत्रतुल्य ही माना जावेगा । यही बात महाभारतकारने भी प्रादिपर्वमें कही है--' बालोपि विप्रो मान्य एवेह राज्ञाम् ' ( ५६।२ ) ब्राह्मण - बालक भी राजा से नमस्काररणीय ही है ) । अव'आलोक ' के विद्वान् पाठक विचारें कि श्रीमद्भागवतके पद्य में वर्ण में छोटे क्षत्रिय - रहूगरण द्वारा बड़े वर्णवाला ब्राह्मरण नमस्कृत किया गया है; और क्षत्रियोंका ब्राह्मणों से ' शिवमस्तु राज्ञाम् ' कल्याण मांगा गया है, नमस्कार करना नहीं । यह आज्ञा सर्वसाधारण बच्चों के लिए नहीं है; किन्तु बड़े वरके लड़ केके लिए । और फिर श्रक्षिप्त पद्य में ' नमस्ते ' शब्द भी कहने की आज्ञा नहीं दी गई । तब प्रति - पक्षियों का पक्ष कट गया । ( ३ ) पूर्व पक्ष - - वेद में भी छोटे - बड़े सभीको नमस्ते करना बताया है । देखिये- ' नमो महद्द्भ्यो नमो अर्भकेभ्यो Gujarat. An eGangotri Initiative
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२०४ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * नमो युवभ्यो नम आशिनेभ्यः । ( श्रीसन्तराम बी. ए. ) । उत्तरपक्ष-- यहां भी वादियोंका वही छल है । वे इसके उत्तरार्धको जन- दृष्टिमें नहीं आने देते । सम्पूर्ण मन्त्र इस प्रकार है— ' नमो महद्भ्यो नमो अर्भकेभ्यो नमो युवभ्यो नम आशिनेभ्यः । यजाम देवान् यदि शक्नवाम या ज्यायसः शंस मा वृक्षि देवाः ' ( ऋसं. १।२७।१३ ) यहां यह जानना चाहिए कि-वेदके अर्थ अपनी इच्छानुसार नहीं हुआ करते । उसमें यह भी देखना पड़ता है कि-- वेदका हस्तरूप श्रङ्ग कल्प जो श्रङ्गी वेदके साथ हो परम्परासे चला आ रहा है -- उस मन्त्र को किस अर्थ में प्रयुक्त करता है; अर्थात् वहां ऋषि, देवता तथा छन्द क्या हैं? उस मन्त्र में जो देवता है; वही उसमें स्तुत होता है । इस विधिको स्वामी दयानन्दजीने भी स्वीकृत किया है; तभी उस उस मन्त्रपर ऋषि देवता आदि लिखे ही हैं; यद्यपि फिर अर्थ में अपनी मर्जी ही वरती है । फलतः ' नमो महदुद्भ्यः ' मन्त्रका त्रिष्टुप् छन्द है, ऋषि ( द्रष्टा एवं प्रणेता ) शुनःशेप है, और इस मन्त्र के ' विश्वे देवा देवता ' हैं । तब मन्त्रमें वर्णनीय भी ये देवता ही हुए; मनुष्य नहीं । अग्निसे प्रेरित हुए प्रजीगर्तके पुत्र शुनःशेपने इस मन्त्रसे विश्वेदेवोंकी स्तुति की है । श्रार्य समाजकी छपवाई. हुई ऋ. सं. में भी उक्त मन्त्रका देवता ' विश्वेदेवाः ' ही लिखा है । यदि कोई यह न माने; तो मन्त्रभाग के व्याख्यानरूप ब्राह्मणभागका भी प्रमारण हम इस विषय में देते हैं-ऐतरेय ब्राह्मणके ( जो ऋग्वेदका ब्राह्मण है ) हरिश्चन्द्रो- अन्य प्रमाणोपर विचार २०५ पाण्यानमें इस विषय में कहा है- ' तमग्निरुवाच - विश्वान् नु देवान् स्तुहि, अथ त्वा उत्त्रक्ष्यामः [ अग्निने शुनःशेषको । कहा ' कि- तुम विश्वेदेवोंकी स्तुति करो, फिर तुम्हें पाशसे छोड़ देगे । उसने उक्त मन्त्र से विश्वेदेवोंकी स्तुति की - ] स विश्वान् देवान् । तुष्टाव ' नमो महदभ्यो नमो अर्भकेभ्य इत्येतया ऋचा ( ७ ) ( ३ ) १६ )! तब उसने ' नमो महदभ्यः ' इस मन्त्र से विश्वेदेवों. की स्तुति की । इस प्रकार यह मन्त्र देवताओंका सिद्ध हुआ; सर्वसाधारण मनुष्योंका नहीं । इसीलिए श्रीसायणाचार्यने भी यही व्याख्या की है: -- ' महान्तो गुणैरधिकाः, अभंकाः गुणैर्न्यनाः युवानः - तरुणाः - वयसा ध्याप्ता वृद्धाः इति यथोक्त चतुर्विध-देहयुक्तेभ्यो देवेभ्यो नमोस्तु । यदि शक्नवाम - धनादिसम्पा कथंचित् शक्ताश्चेत्; तदानीं देवान् यजाम । यहां शुनःशेष ऋषिने पूर्वोक्त चार प्रकारके देवताओंको नमस्कार किया है, मनुष्योंको नहीं । देवता मनुष्यों की अपेक्षा प्रधान - योनि होने से सदा ही बड़े होते हैं; चाहे वे आपस में छोटे - बड़े भी क्यों न हों? वस्तुतः यहां ' अर्भकाः ' जोकि देवताओंका विशेषण है-का अर्थ है कि ' अल्पदेहपरिमाणा देवाः ' अर्थात् छोटे देहवासे ' देवता । श्रर्भके ' अल्प ' अर्थ में निरुक्त का प्रमारण देखिये- ' दन-मर्भकमिति अल्पस्य । अर्भकमवहृतं भवति ' । यह कहकर वहां ' नमो महदभ्यो नमो प्रर्भकेभ्यः ' ( ३।२० ३ ) यही निगम दिया गया है । वहां श्रीदुर्गाचार्यका भाष्य इस प्रकार है- ' नमो महदुभ्य. - महत्परिमाणेभ्यो देवेभ्यः । नमो अर्भकेभ्यः - ग्रल्प-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२५ २०६ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * नु परिमाणेभ्यः, नमो युवभ्यः - यौवनवद्भ्यः, नम श्राशिनेभ्यः-· व्यापिभ्यः । यजाम देवान् एतस्मिन् उपस्थिते महाकाले, यदि शक्तवाम अल्पश्रुतविज्ञाना वयम् । अतएव ब्रूमो यदि शक्न-वामेति । वयमीदृशाः सन्तो युष्मान् ब्रूमहे । हे ज्यायसः ७१ ज्यायांसः! देवाः! युष्माकमेव शंस - शंसितारं, मा वृक्षि - मा अस्मान् छिन्त यज्ञफलात्; को हि नाम नापराध्यति इत्यभि-प्रायः जब ऐसा है; तो छोटे परिमाणवाले देवताओंको योनि प्रधानता के कारण नमस्कार करनेमें हमारे पक्षको कुछ भी नाः क्षति नहीं । प्रत्युत इससे पूर्वपक्षियोंका ही पक्ष कटता है, जो घ. कि मन्त्रका अग्रिम अंश छिपा देते हैं, और फिर उक्त मन्त्र में या ' नमस्ते ' शब्द ही नहीं; तब ' नमस्ते ' - पक्षियोंका तो पक्ष ही कट गया; तब वे फड़फड़ा नहीं सकते । इससे छोटे - बड़े सबको नमस्ते करना कट गया; क्योंकि यहां तो अपने से बड़ेको नमस्कार करना सिद्ध है । जैसे कोई श्रार्यसमाजी कहे कि हम बड़े स्वामी [ दयानन्द ] को भी नमस्कार करते हैं; और छोटे स्वामी [ दर्शनानन्द ] को भी । चाहे यह स्वामी प्रापसमें बड़े - छोटे थे; पर नमस्कार करनेवाला इन दोनोंसे छोटा है; तब वह छोटे स्वामीको भी अपने से बड़ा होनेसे ही नमस्कार कर रहा है, श्रपनेसे छोटा होनेसे नहीं । उक्त मन्त्रमें ' देव ' नाम विद्वान्का नमो दया नहीं; इस विषय में ' आलोक ' का चतुर्थ पुष्प मूल्य ५ ) देखिए । ल्प स्वा.द.ने यजुः के अपने संस्कृतभाष्य [ ११२६ ] में ' द्यौवें सर्वेषां देवानामायतनम् ' [ १४।२।३।८ ] इस शतपथका CC - 0. Ankur Joshi Collection * अन्य प्रमाणोंपर विचार # २०७ प्रमाण पदार्थमें उद्धृत किया है । इसका अर्थ यह है कि-सब देवताओंका स्थान द्युलोक [ जहां सूर्य चन्द्रादि हैं ] है । इसलिए निरुक्तमें भी कहा है - ' द्युस्थानो भवतीति देवः ' [ ७१५२ ] प्रथर्ववेद सं ० में भी कहा है- ' सर्वे दिवि देवाः ' [ ११७२७ ] । द्यौ देवता द्युलोक - स्थित ही माने जाते हैं । द्युलोक ' दिवं च पृथिवीं च ' [ १०११६०१३ ] इस ॠ.सं.के मन्त्र के अनुसार पृथिवीलोकसे भिन्न होता है । पृथिवी - लोकस्थ पुरुष देवता नहीं होते । देवता मनुष्योंसे सर्वथा भिन्न एक योनि है - इस विषय में ' श्रालोक ' [ चतुर्थ पुष्प ] देखिए । क्या अर्भक [ बच्चे ] भी विद्वान् होते हैं? यदि यहां विद्वान्-अर्भकोंके लिए वाटीके मतमें नमस्कार हो; अविद्वान् प्रभकों के लिए नहीं; तब बालकमात्रको वादीसे इष्ट नमस्कार खण्डित हो गया । ' त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ' [ गीता ११।४३ ] इस वचनसे गुरु ( बड़े ) को ही पूज्य कहा है - छोटे को नहीं! अर्जुनने श्रीकृष्णको नमस्कार किया; श्रीकृष्ण ने अर्जुनको नहीं । ( ४ ) पूर्वपक्ष - ' नमो ज्येष्ठाय च कनिष्ठाय च नमः पूर्व-जाय चापरजाय च ' ( १६।३२ ) इस यजुर्वेद के मन्त्रमें छोटे-बड़े सबको नमस्ते करना कहा है । उत्तरपक्ष- मन्त्रोंके अर्थ अपनी इच्छानुसार नहीं हुआ करते; किन्तु उसके देवताके अनुसार होते हैं । इस मन्त्रका, बल्कि सारे सूक्तका, रुद्र देवता है । ' रुद्र'का यहां ' परमात्मा ' अर्थ है, जैसेकि स्वा ० द ० ने लिखा है- ' जो दुष्ट कर्म करने वालोंको Gujarat. An eGangotri Initiative
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२०८ G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * रुलाता है, इससे उस परमेश्वरका नाम रुद्र है । ( स ० प्र ० १०. पृ ० ८ ) । ( प्र. ) रुद्र ज्येष्ठ - कनिष्ठ, पूर्वज - प्रपरज कैसे है? [ उ. ] ' माहाभाग्याद् देवतायाः ' [ ७१४१८ ] इस निरुक्त के तथा ' रूपं रूपं मघवा बोभवीति ' [ ऋसं ० ३१५३८ ] इस वेद के प्रसारण से एक भी देवता ऐश्वर्ययुक्त होनेसे अनेक प्रकार के रूपको धारण कर सकती है । रुद्र ' महिमा ' ऐश्वर्यके कारण ज्येष्ठ. [ सबसे बड़ा ] है, लघिमा एवम् प्रणिमा ऐश्वर्य के कारण वह कनिष्ठ है - ' युवाल्पयोः कन् ' [ पा ० ५ | ३ | ६४ ] इस वेदाङ्ग-सूत्रसे अल्प अर्थ में कन् होता है । अर्थात् वह सबसे सूक्ष्म होने. से ' कनिष्ठ ' है । क्योंकि - ' अणोरणीयान् महतो महीयान् ' [ श्वेता ० ३।२० ] तभी तो उसके लिए कहा है- ' उत एषां -. ज्येष्ठः, उत वा कनिष्ठः । एको ह देवो मनसि प्रविष्टः ' [ प्रथर्व ० १०।८।२८ ] इस मन्त्र में परमात्माको ही ज्येष्ठ - कनिष्ठ कहा है । वस्तुतः उक्त स्थलमें रुद्र - भगवान्को नमस्कार किया है, छोटे - बड़े मनुष्य को नहीं । भगवान् में ' प्रणिमा - महिमा, चैव लघिमा - गरिमा तथा । प्राप्तिः प्राकाम्यमीशित्वं वशित्वं चाष्ट सिद्धयः । ' यह प्रोठ भग - ऐश्वर्य भगवान् में स्वतः ही होते हैं । इसलिए परमात्माका ' भगवान् ' नाम प्रसिद्ध है 1. ( प्र ० ) भगवान् पूर्वज प्रपरज कैसे है? [ उ. ] वह जगत्की प्रादिमें हिर-ण्यगर्भरूपसे प्रादुर्भूत होता है । ' पूर्व - जगदादौ हिरण्यगर्भरूपेण जायते प्रादुर्भवतीति पूर्वजः ' [ जनी प्रादुर्भावे ] । तभी तो वेदमें. अन्य प्रमाणोपर विचार २०६ कहा गया है — ‘ हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे ' [ यजुः १३३४ ] ' एको ह देवो मनसि प्रविष्टः प्रथमो जातः ' [ श्र ० १० ८२८ ] । वही भगवान् ' अपरस्मिन् काले - प्रलये कालाग्निरूपेण जायते प्रादुर्भवतीतिः अपरज: ' [ ' स कालाग्निः स चन्द्रमाः ' कैवल्योप. ११८ ] इस प्रकार ' अपरज ' है । इसी प्रमाणको स्वा. द. ने भी अपने स. प्र. [ १ समु., पृ.३ ] में प्रमाण- कोटि में माना है । सो पूर्वोक्त प्रकारका भगवान् रुद्र ही ज्येष्ठ-कनिष्ठ, पूर्वज - प्रपरजरूपमें नमस्कृत किया गया है, वैसा पुरुष नहीं । और इसमें ' नमस्ते ' शब्द भी नहीं । ' नमस्कार ' शब्दका प्रचार बड़ोंके लिए कीजिए; क्योंकि बड़े [ रुद्र ] को ही यहां नमस्कार किया गया है । रुद्र हमसे छोटे नहीं । यह अध्याय vat farai अध्याय है । रुद्र मनुष्य नहीं । [ ५ ] पूर्वपक्ष - ' नमो महदभ्यो अर्भकेभ्यश्च वो नमः [ यजु. १६।२६ ] यहां भी छोटे - बड़े को नमस्ते वेदने कहा है । उत्तरपक्ष - यह भी उसी रुद्राध्यायका मन्त्र है । सो वही साकार बड़े रूपमें महान् श्राकार वाला है, और निराकाररूप-में अल्प ( सूक्ष्म ) आकारवाला है । उसी रुद्रको नमस्कार किया गया है, सर्वसाधारण छोटे बच्चोंको नहीं । इसीलिए परमात्माको कहा जाता है- ' अणोरणीयान् महतो महीयान् ' ( श्वेताश्व. ३।२० ) । श्रक्षिप्त इस मन्त्र में भी ' नमस्ते ' शब्द नहीं । यदि यहां ' ज्येष्ठेभ्यः कनिष्ठेभ्यश्च ' नमस्ते ' इति वक्त-व्यम् ' ऐसा विधान होता; तो ' नमस्ते ' वादियोंकी इष्टसिद्धि स ० ध ० १४ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२१० * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * थी; पर ऐसे मन्त्र रूपमें तो नहीं है । इस प्रकार ' नमो ह्रस्वाय च वामनाय च ' ( यजुः १६ । ३० ) इत्यादि सभी मन्त्रोंमें रुद्र देवता है । यजुर्वेदका १६ वां अध्याय रुद्रका विभूति श्रध्याय है । ' [ परमेश्वर ] सब जगत् को बनानेसे ब्रह्मा, सर्वत्र व्यापक होनेसे विष्णु, दुष्टोंको दण्ड देकर रुलानेसे रुद्र ' ( स.प्र. १ स. पू. ३ ) यहां स्वा.द.ने ' रुद्र ' का अर्थ ' परमात्मा ' किया है । तब इसमें वादियोंको पक्षपुष्टि नहीं । स्वामीने अपने वेद-भाष्यमें छोटे बड़े सबको अभिवादनार्थं नमस्कररणमें अनुपपत्ति मानकर छोटोंको अभयदान अर्थापित किया है; पर फिर किसी पीछेके शिष्यने हिन्दी अर्थ में ' नमस्ते ' शब्द भी डाल दिया है; पर जब मन्त्र में ही ' नमस्ते ' नहीं; तब उसमें ' नमस्ते ' शब्द घुसेड़ देना यह वेद- विरुद्ध महान् दुस्साहस है । ( प्र ० ) यदि १६ वें अध्यायमें यह रुद्रके विशेषरण हैं; तो ' नमो गरणेभ्यो गणपतिभ्यश्च वो नमो नमो ' ( १६।२५ ) यह बहुवचन कैसे है? ( उ ० ) यहां ' असंख्याताः सहस्राणि ये रुद्रा श्रधिभूम्याम् ' ( यजुः १६।५४ ) के कारण बहुत रुद्र देवता हैं । ( प्र ० ) एक रुद्र बहुत कैसे होगा? । ( उ ० ) ' माहाभाग्याद् देवतायाः ' ( निरुक्त ७।४।८ ) इस प्रकार वह कई रूप बना लेता है, अत: बहुत भी है । बहुत होनेपर वहां ' नमो वः ' श्राया है; ' नमस्ते ' नहीं, यह भी ' नमस्ते ' वादियोंको याद रख लेना चाहिये । श्रथवा इस खाध्यायमें रुद्रके गरणोंका भी वर्णन है, तभी ' गणेभ्यो- गणपतिभ्यश्च वः ' कहा गया है । वे बहुत प्रकार CC - 0. Ankur Joshi Collection G अन्य प्रमाणोंपर विचार G २११ के थे, कई छोटे, कई बड़े, कई मध्यम, कई जघन्य ( छोटे कद के ) कई किरातरूपधारी रुद्रके गरण चोररूप ' कई श्व ( कुत्ता ) रूप, कई वामन, कई सभापति, कई स्वापशील ( सोने वाले ), कई जागरूक ( कभी न सोने वाले ), कई तक्षी ( बढ़ई ) रूप, कई रथकाररूप इस प्रकार विचित्ररूपधारी होते हैं; उन्होंका वर्णन यजुर्वेद के १६ वें अध्यायमें है, यह श्रीमहीधराचार्य आदिने आपने भाष्य में स्पष्ट किया है । इसलिए उनकेलिए कहा गया है- ' विरूपेभ्यो विश्वरूपेभ्यश्च वो नमः ' ( १६।२५ ) तब वह रुद्रके गरणोंको नमस्कार किया गया है, न कि छोटे - बड़े मनुष्यों को एक - दूसरे से । यद्यपि यह प्रश्न पहले प्रा चुका है; तथापि इस मन्त्रपर वादियोंका अधिक बल रहता है; अतः हमने भी इसे पुनः स्पष्ट किया है । ( ६ ) पूर्वपक्ष - पत्नि - पत्नि! एम ते लोको नमस्ते प्रस्तु मा मा हिंसी: ' ( मैत्रायरणी सं ० १।४।३।२८ ) यहां पतिका पत्नीको नमस्ते करना वैदिक सिद्ध होता है । ( श्रीधर्मदेव-सिद्धान्तालङ्कार ) । उत्तरपक्ष- यहां देव- पत्नीको नमस्कार किया गया है, पतिका अपनी पत्नीको नमस्कार नहीं है । इसलिए उसके श्रागे-' या सरस्वती वेशयमनी तस्यै स्वाहा ' कहा गया है । यहां देव पत्नी सरस्वतीका वर्णन है । मनुष्योंकेलिए अग्निमें स्वाहा नहीं माता, किन्तु देवताओंके लिए आता है । अतः यहां अपनी पत्नीका वर्णन नहीं । इसीलिए इस स्थलके लिए श्रापस्तम्ब-श्रौतसूत्रमें भी कहा है- ' देवानां पत्नीरुपमाह्वयध्वं पत्नि! Gujarat. An eGangotri Initiative
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२१२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * पत्नि! एष ते लोको नमस्तेऽस्तु मा मा हिसीरिति देवपत्नी-रुपतिष्ठते ' ( ३१५१७ ) यहां पर श्रीरुद्रदत्तने लिखा है- ' अपरेण गार्हपत्यं देवपत्नीनां लोकस्तत्र ता उपतिष्ठते ' इति । इस प्रकार देवपत्नी के नमस्कारके हीं विवक्षित होने से वादीकी इष्ट - सिद्धि नहीं । यह वहां ' यजमान - ब्राह्मण ' है; प्रतः यह यज्ञका वर्णन हुआ । इसलिए शतपथके पत्नीसंयाज - ब्राह्मरणमें भी यद्यपि केवल ' पत्नी ' शब्द है; तथापि वहां भी देवपत्नी - परक ही है । इसलिए वहां श्रीसायरणने भी लिखा है- ' पत्नी संयाजब्राह्मण-मेतत् । ' ते श्रध्वर्य्यादयः, पत्नीः- देवानां संयाजयिष्यन्तः- देवैः सह सङ्गता याजयिष्यन्तः ' ( शत ० १।६।२1१ ) । इसलिए शतपथ के मूल में भी कहा है- ' प्रथ देवानां पत्नीयंजति ' ( १ || २1११ ) 1. इस प्रकार मानव- श्रौतसूत्र ( १।२।५।१० ) में ' पत्नी ' शब्द से ' देव - पत्नी ' गृहीत की गई है । इस प्रकार तैत्तिरीय ब्राह्मण में भी ' पत्नीभिः ' का श्रीसायरणने ' देवपत्नी मन्त्र ': ' ( २३ | १० ). यह अर्थ किया है; इस प्रकार अन्यत्र भी प्रतिपक्षीकी बात, लत सिद्ध हुई । ( ७ ) पूर्वपक्ष - ' रामकी सीताको नमस्ते - श्रीरामचन्द्र जीने महायशस्विनी सती सीताको नमस्ते कहा, देखिये ' उत्तर राम चरित ' ( १।७८ ) ( ' नमस्ते की प्राचीनता ' में श्रीशेरसिंह पृ ० २६ ) उत्तरपक्ष - वादीकी यह बात सर्वथा गलत है । इससे वह पतिकी पत्नीको नमस्कार सिद्ध करना चाहता है । तृतीयाङ्क में ' भगवति गोदावरि! नमस्ते ' यह नदीको नमस्कार है, G अन्य प्रमाणोंपर विचार २१३ सीताको नहीं । जो कि- ' देवि सीते नमस्तेस्तु ' ( ७।१० ) यहां सोताको नमस्कार आया है- यह रामद्वारा नहीं हैं, किन्तु जम्भक प्रस्त्रों ने उसे नमस्कार किया है इससे वादीका पक्ष कट गया । वे कितना असत्य व्यवहार करते हैं । ( ८ ) पूर्वपक्ष - रामकी लक्ष्मरणको नमस्ते ' रघुकुलदेवते नमस्ते ' । ( श्रीशेर्रासह ‘ नमस्तेकी प्राचीनता ' पृ ०२७ में ) । उत्तर - वादीका यह कितना असत्य व्यवहार है! इससे वह बड़ े भाईका छोटे भाईको नमस्कार सिद्ध कर रहा है यहां पर तो भागीरथी नदीको उक्त शब्द कहे गये हैं । देव होनेसे वहां ' ते ' शब्द भी ना सकता है । तभी वहीं ' तुरगविचय. व्यग्रान् ' ( १।८३ ) यह पद्य गङ्गा के लिए आया है । तभी वहां आगे लिखा है - सा त्वमम्ब! ' तब क्या अम्वा ( माता ) यह लक्ष्मण वा सीता को कहा गया है? इन्हीं घूर्तता से उन्होंने संस्कृतानभिज्ञ जनता में ' नमस्ते ' का व्यवहार चला दिया है । ( ६ ) पूर्वपक्ष - जनकको याज्ञवल्क्यकी नमस्ते । ' स होवाच-जनको वैदेहो नमस्ते याज्ञवल्क्य । ( शत. १४।६।१११६ ) ( श्रीशेसह ) : उत्तरपक्ष - इससे प्रतीत होता है कि- शेरसिंहजी प्रार्थ-समाजी संस्कृतसे कोरे हैं । इससे वे सिद्धकर रहे हैं कि- एक ब्राह्मण - ऋषि क्षत्रियको नमस्कार कर रहा है । यहां तो क्षत्रिय जनक ही ब्राह्मण - याज्ञवल्क्यको ' नमस्कार ' कह रहा है. इन्हीं असत्य व्यवहारोंकी रेतीली दीवारों पर ' नमस्ते ' CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२३ G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) • २१४ ठहरा हुआ है । यह तब तक है, जब तक जनता संस्कृतमें शिक्षित नहीं होती । ( १० ) पूर्वपक्ष - ' नमस्ते याज्ञवल्क्य ' यहां सर्पकी याज्ञ-वल्क्यको नमस्ते ' है । ( पृ. २७ ) उत्तर - यहां जनकके लिये ' कूर्चादुपावसर्पन् ' शब्द प्राया है, उसीको पूर्वपक्षीने सर्प समझ लिया । बलिहारी है संस्कृत-हता की । जनक यदि श्रीयाज्ञवल्क्यको नमस्कार करते हैं; तो ता हमारे पक्ष की हानि नहीं । य. ( ११ ) पूर्वपक्ष- ऋषिकी राजाको नमस्ते - ' स हैनं पप्रच्छ याज्ञवल्क्य! ब्रह्मिष्ठोसीति । स होवाच नमो ब्रह्मिष्ठाय ) कुर्मः । ( शतपथ १४/६/४ ) विदेह जनकका होता श्रश्वल नकको पूछता है कि राजन्! क्या ब्रह्मिष्ठ है, हम सबको ला नमः करते हैं ' ( श्रीशेरसिंह पृ ० २४ ) । च. उत्तरपक्ष - यह पूर्वपक्षीकी संस्कृतज्ञता है । यहां तो याज्ञवल्क्यको कहा गया है कि तुम हममें ब्रह्मिष्ठ ( ब्रह्मज्ञानी ) ≡ ( हो । याज्ञवल्क्य अपनी निरभिमानितासे कह दिया कि -हम ब्रह्मिष्ठ क्या हैं, हम ब्रह्मिष्ठको नमस्कार करते हैं । यहां बादीका पक्ष गलत सिद्ध हुआ है । यहां याज्ञवल्क्य ऋषिने राजा जनकको नमस्कार कहां की है, और ' नमस्ते ' शब्द ही यहां कहां है! । वस्तुतः इस प्रसत्यकी रेतीली दीवार पर ' नमस्ते ' टिका हुआ है । यह तब तक टिकेगा, जब तक जनता संस्कृत में शिक्षित नहीं होती । यहां ब्रह्मज्ञानीको नमस्कार CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. * अन्य प्रमाणों पर विचार २१५ किया गया है- राजाको नहीं । हमारी इसमें पक्ष - हानि कुछ भी नहीं । ( १२ ) पूर्व - पुत्र और शिष्यको नमस्ते ।- ' नमस्ते भगवन्-इति होवाच ' ( कठोपनिषत् ) ' नमस्ते ' ब्रह्मन्! स्वस्ति मेऽस्तु, ( कठोप. 18 ) इन दोनों वाक्योंमें महषि - यमने उद्दालकके पुत्र और अपने भावी शिष्य नचिकेताको नमस्ते किया है । ( श्रीशेसह पृ. २४ ) उत्तर - यह भी गलत है । वस्तुतः यम क्षत्रिय थे, और नचिकेता ब्राह्मण अतिथि । सो बड़े वर्गको नमस्कार करने-में हमारे पक्षकी क्षति नहीं । इस विषयमें विस्तीर्ण उत्तर गत-निबन्धों में देखें | ( १३ ) पूर्व - स्त्रीको नमस्ते! - ' इमां तु सर्वभूतानां नम-स्कार्यं तपस्विनीम् ( वाल्मी. अरण्य. २।११७।१३ ) यहां प्रत्रि-ऋषिने अपनी स्त्रीको रामके प्रति सम्पूर्ण जीवोंमें नमस्कार-योग्य बताया है ' । क्या अत्रि ऋषि सर्वभूतोंसे भिन्न हैं? यदि नहीं, तब स्त्रीको ऋषिने नमस्ते करना स्वीकार किया या नहीं? [ श्रीशेसह नमस्ते की प्राचीनतामें पृ. २६ ) उत्तर - बलिहारी है श्रीशेर्रासहजी की! । कैसी तकं वाच-स्पतिता है! ऐसे अवसर पर पति अपनेसे भिन्न अन्य पुरुषों को लेता है । यदि ऋषि पत्नीके लिए कह दे कि - ' इयं सर्व-भूतानां मातेव ' तो क्या उस ऋषिकी पत्नी भी ऋषिको माता हो जावेगी? ऐसा कभी नहीं होता । यदि शेरसिंह लैक्चर करते हुए कहें- ' मान्य सज्जनो, मातानो, बहिनो! ' An eGangotri Initiative
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२१६ G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) ** तब जनता में बैठी हुई शेरसिंहजीकी स्त्री भी क्या उनकी माता वा बहिन मानी जावेगी? ' भगवती सीता सब प्राणियों -की माता है, इस वाक्य के अनुसार सीता श्रीरामकी भी माता होजावेगी? धन्य! वस्तुतः ऐसे अवसरों पर पति - व्यतिरिक्तता ली जाती है । और फिर उक्त पद्य में ' नमस्ते ' है ही कहां? ऐसे असत्य - व्यवहारोंपर नमस्ते प्रतिष्ठित है । पूर्व - स्त्री की पतिको नमस्ते - ' सा होवाच नमस्ते याज्ञ-वल्क्य! [ शत.. १४।६।५।६ ] श्रीमती गार्गी - देवी कहती है कि हे याज्ञवल्क्य! ' नमस्ते ' [ शेरसिह, पृ. २४ ] उत्तर - कितना गलत व्यवहार है । याज्ञवल्क्यकी दो स्त्रियां थी - मैत्रेयी और कात्यायनी । यहां शेरसिंहजीने याज्ञ-वल्क्यकी तीसरी स्त्री गार्गी बना दी । धन्य हो! गार्गी तो कुमारी थी । उसने याज्ञवल्क्यसे कई प्रश्न किए । उसके उत्तर पाकर उसे नमस्कार करती है । इससे हमारे पक्षकी कुछ भी हानि नहीं । ' ते ' का उत्तर गत निबन्धों में दिया जा चुका है । ' आलोक ' पाठक देख रहे हैं कि- यह लोग कैसे गलत व्यवहार करके अपने अशुद्ध पक्षको सिद्ध करनेका प्रयत्न किया करते हैं । ( १५ ) पूर्व - ' क्या किसी ऋषि ने अपनी स्त्रीको नमस्तेकी है - इसके उत्तर में प्रार्य समाजके उपदेशक श्री लोकनाथजीने अलीपुरमें कहा था कि- मालविकाग्निमित्रं - नाटक में पति श्रग्निमित्रने पत्नी मालविकाको नमस्ते किया है । उत्तर — क्या वादी नाटकों को भी प्रमारण मानने लग गये # वेदमें अन्त्यजोंको नमस्ते २१७ हैं, श्रग्निमित्र क्या कोई ऋषि था? वस्तुतः वादी का यह कथन भी बिल्कुल गलत है । उसमें तो मालविकाने अपने भावी पति अग्निमित्र के चित्रो नमस्कार की है; तब क्या श्रार्यसमाजी इसे मानकर मूर्तिपूजा सिद्धान्तको मान लेंगे? ( १० ) वेदमें अन्त्यजोंको नमस्ते । पूर्वपक्ष — वेद ऐसा आदर्श ग्रन्थ है कि - जिसके रुद्राध्याय ( यजुः १६।२७ ) में बढ़ई, सईस, कुम्हार, लोहार, का चाण्डाल, कुत्तों, और मृगोंको पालनेवाले जंगली भी सबके सब उस रुद्र - भगवान् का रूप माने गये हैं । हमें उन सबको रुद्ररूप मानते हुए, उभयतः ( प्रागे भी और पीछे भी ) ' नमस्ते ' करना चाहिए? | ( भारतीय धर्मशास्त्र पृ ० २६ ) उत्तर- इनमें ' नमस्ते ' शब्द कहीं भी नहीं । तब वादियोंका ऐसा प्रनृत - व्यवहार क्यों? यदि इस सूक्तमें वादी नमस्कार - योग्य व्यक्तियों का वर्णन मानें, तो उसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रों का नाम नहीं; तो क्या यह रुद्ररूप नहीं? । वेद उन चार वर्णोंको एक प्रोरसे भी नमस्कार नहीं करना चाहताय और प्रवर्ग - श्रन्त्यजोंको दोनों श्रोरसे नमस्कारका आर्डर देता है; यह क्या बात? वस्तुतः यह १६ वाँ अध्याय रुद्रदेवता का है, यह हम गत-निबन्धों में कह चुके हैं; तब वहां रुद्रको नमस्कार है, बढ़ई श्रादियोंको नहीं । यहां यह रहस्य है कि- महादेवने किरातका रूप भी धारण किया था - यह महाभारत तथा ' किरातार्जुनीय ' में CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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* श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * २१८ ' अन्त्यज ' का रूप धारण किया था ' - यह ' शङ्करदिग्विजय ' में तथा स्पष्ट है । इससे सिद्ध है कि - रुद्र के किरातादि घोर रूप भी हैं, जिन्हें वह समयपर धारण करता है । सरस्वतीके पीछे दौड़ रहे हुए ब्रह्माके मृगरूपके वधार्थ महादेवने किरातरूप भी धारण किया था, जिसका संकेत ' मृगानुसारिणं साक्षात् पर-यामीव पिनाकिनम् ' - ( ११५ ) इस शाकुन्तल के पद्य में महाकवि-कालिदासने किया है । अर्जुन द्वारा वराहके शिकार में भी रुद्रका किरातरूप प्रसिद्ध है । पुराणोंमें भी ' मृगव्याधाय ' ( वायुपुराण २४ । १३६ ) मृगेन्द्र कृत्तिकावसनं ( ३०।१३२ ) इत्यादि- शिवस्तवों में स्पष्ट है । दक्षयज्ञकी मृगरूपता में वध भी -द्वारा किरातरूपमें प्रसिद्ध है । मृगके अनुसरण करनेसे ही रुद्रको वेदमें ' मृगयु ' कहा जाता है । मृगया ( शिकार ) के लिए किरात - रूपधारी उसका कुत्तोंका रखना भी अनिवार्य हो जाता है, तभी उसे वेदमें ' श्वनी ' कहा जाता है; उसके गरग भी उसके सहचारी होनेसे उसके समान जातीय होते हैं । इस अवसरको स्मरण करानेके लिए ही रुद्राध्यायमें ' निषादेभ्यः पुञ्जिष्ठेभ्यश्च वो नमो नमः, श्वनिभ्यो मृगयुभ्यश्च वो नमः, ( यजु: ( १६ २७ ) इत्यादि मन्त्रों में रुद्रके ऐसे ही रूपोंको नमस्कार किया गया है । 7 तब रुद्र के किरातरूपके साथी गरण भी किरात चाण्डाला-दि वा तत्समानधर्मा निषाद, पुजिष्ठ, श्वनी, मृगयु, तस्कर, जिघांसु ( वधिक ) आदि होते हैं । सो उक्त निषादादि-रूपधारी रुद्रके गणों को हो रुद्राध्यायके कई मन्त्रोंमें नमस्कार CC - 0. Ankur Joshi Collection * वेदमें श्रन्त्यजोंको नमस्ते २१ किया गया है; अथवा तद्रूपधारी रुद्रको हो वेदमें आदरार्थ बहुवचन देकर नमस्कार किया गया है । तब वह नमस्कार वर्तमान - निषादादिको सिद्ध नहीं होता; किन्तु वैसे रुद्र वा रुद्र गणोंको ही वह नमस्कार आया है । यहां ' नमस्ते ' भी नहीं, किन्तु ' नमो वः ' है । इसे इस प्रकार समझ लेना चाहिए कि - महादेव यदि श्रन्त्यजरूपमें श्रीशङ्कराचार्यके पास आवें, जैसेकि ' शङ्कर-दिग्विजय ' में कहा है- ' सोऽन्त्यजं पथि निरीक्ष्य चतुभिर्भीषणैः श्वभिरनुद्रुतमारात् ' ( ६।२५ ) पहले तो वे उसे न छुएं, पीछे वे उसे महादेव जानकर उसे नमस्कार कर दें ( ६।४० ), इस प्रकार अर्जुनके पास शङ्कर किरात - रूप धरकर श्राजावें, पहले तो अर्जुन उनसे युद्ध करे, फिर उसे शङ्कर जानकर वह उन्हें प्ररणाम करे ( महाभारत ३।३६।६७ ), सो वह नमस्कार शिवजीको हो ' मानना पड़ेगा, इससे आधुनिक संसारके किरात अन्त्यज श्रादिको प्ररणाम सिद्धान्तित नहीं हो जाता । यदि कोई मत्स्य, कच्छप एवं वराहरूपधारी विष्णु-भगवान्को ' नमो मत्स्यकूर्मादि - नानास्वरूपैः सदा भक्त-कार्योद्यतायातिहन्त्र ' ( कार्तिकमाहात्म्य ७ ७७ ) इस प्रकार नमस्कार कहता है, सो इससे संसारके प्राजकलके मच्छ, कच्छ. एवं सुवर प्ररणामयोग्य नहीं हो जाते । यदि कोई ब्राह्मण क्षत्रियरूपधारी परमात्माके अवतार श्रीराम - कृष्णको नमस्कार करता है; इससे ब्राह्मणसे अपनेसे प्रवर - वर्ण वर्तमान - क्षत्रियादि नमस्कररणीय नहीं हो जाते; इस प्रकार यहां भी समझ लेना Grat. An eGangotri Initiative
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२२० * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * चाहिए कि- इस रूपको धारण करने वाले रुद्रों वा रुद्रगरणोंको नमस्कार है, आधुनिक- निषादादिको नहीं । अव्यपवृक्त - रूप ( प्रभिन्नता ) में तो ब्रह्माण्डगर्भ- परमात्माको प्ररणाम होता ही है; पर जब वे व्यपवृक्तरूप ( भिन्न ) होते हैं, तब वहां उत्तम - मध्यमाऽधमता, तथा व्यवहार्याऽव्यवहार्यता भी हो हो जाती है । रुद्रकी विभूति तो सारा जगत् है । जगत् में कीचड़ भी है, पुरीष भी है, शाक भी होता है; तब क्या वादियों का उनमें समान व्यवहार हो जाता है? वे क्या पुरीषका भी शाककी भांति व्यवहार करते हैं? वस्तुतः यहां धर्मशास्त्रोंकी व्यवस्था ही माननी पड़ती है । क्योंकि - लोक - व्यवहारको व्यवस्था धर्मशास्त्र के अधीन हुआ करती है, और वेदमें यज्ञकी प्रधानता ही मानी जाती है । इस विषयमें ४।१ / ६२ सूत्रके न्यायदर्शन में वात्स्यायन भाष्य देख लेना चाहिए । उसी रुद्राध्याय ( १६।२१ ) में चोरोंके स्वामियोंको भी नमस्कार की गई है; तब प्रक्षेप्ता लोग चोरों वा ठगों वा गिरहकटोंको नमस्कार क्यों नहीं करते हैं? उन्हें दण्ड क्यों दिलवाते हैं? क्यों वे उन्हें अपना धन नहीं चुराने देते? वहीं जिघांसुत्रों ( १६।२१ ) को भी नमस्कार की गई है; तब वादी वैसे मुसलमानोंको नमस्कार क्यों नहीं करते? वहां कुत्तोंको भी नमस्कार की गई है; तब प्रक्षेप्ता कुत्तोंको नमस्ते क्यों नहीं करते? | क्यों उनको अंग्रेजोंकी भांति अपनी शय्या में नहीं सुलाते । उन्हें मारनेवाले म्युनिसिपलिटीके सदस्योंको क्यों नहीं डांटते? वहीं व्याधों ( निशानेबाज ), आततायी ( १६।१८ ) G वेदमें अन्त्यजोंको नमस्ते २२१ स्तेनों ( चोरों ) के पति ( १६।२० ) स्तायुओं ( गिरहकटों ) के पति, मोषरण करनेवालोंके पति ( १६।२१ ) श्रभिघाती ( १६।४६ ) तथा वेधकर रहे हुन ( १६१२३ ) को भी नमः कही गई है; वादी इन्हें नमस्ते क्यों नहीं करते? क्यों इन्हें पकड़वा हैं? वा जेलखाने में ही उन्हें नमस्ते करने क्यों नहीं जाते? 1 प्रतः वह वादियोंका पूर्वपक्ष व्यर्थ है । यदि वादियोंको वेदका आदेश माननीय है, तो कसाई तथा चाण्डाल आदिको भी नमस्कार करें । तब जो वे स्वरूप कसाई पशु प्रोंको मारा करते हैं, वादी उनसे घृणा क्यों करते हैं? उनसे भोजन तथा योनि - सम्बन्ध क्यों नहीं करना चाहते? यदि चाण्डाल रुद्ररूप हैं; तो अस्नात भी उन्हें वादी क्या छूते हैं? उन्हें मलकी टोकड़ी उठवाने में सहायता देते हैं? वादियों की उन्हें स्नान करके सभाओं में आनेकी प्रेरणा स्पष्ट करती है कि वे उन्हें रुद्ररूप नहीं मानते । सनातनधर्मी इसमें जो अभिप्राय रखते हैं, वह दिखला ही दिया गया है, अर्थात् महादेवके किरातरूपमें उसके गरण भी वैसे निषादादि होते हैं, उनका संकेत यजुर्वेद वा. सं. ( १६।२८ ) में बहुवचननान्तरूप नामों की समाप्तिमें जहां उभयतो नमस्कार है- श्री महीधराचार्यने भी अपने भाष्य में दिखलाया है - । श्वपतयः - किरातवेषस्था रुद्रस्य अनुचराः । इसप्रकार ' नमः श्वभ्य: ' [ १६।२८ ] इस मन्त्रमें कुत्तोंको नमस्कार कहा है; पर कुत्तोंको नमस्ते कोई नहीं कहता । तब यहां उनका ग्रहण क्यों? यहां यह रहस्य है कि- किरातरूप रुद्रके सहचारी कुत्तों CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative