सनातन धर्मालोक १-२ — पृष्ठ 21–30

सनातन धर्मालोक १-२ · पृष्ठ 21–30

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१ २२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * नेताओं, वक्ताओं तथा अनुसंधाताओंने अपने पुस्तकों में बिना हमारा नाम लिए ही अपने उपयोगों में लाकर हमारे परिश्रमकी सफलताको प्रमाणित कर दिया है! न. अब हमारे मूल्यांकनका समय आगया है । हम यह चाहते हैं कि यह सम्पूर्ण महाग्रन्थ शीघ्र ही मुद्रित ने होकर प्रकाशित हो जाए । इसकेलिए न्यून से न्यून य एक लाख रुपयेका अनुमानित व्यय होगा । उस कार्य के प्रारम्भार्थ पहले पच्चीस सहस्र रुपया अपेक्षित है । यह धार्मिक सज्जनोंने पूरा करना है । हम इस पो. ( प्रथम पुष्प ) से सब सज्जनोंको आमन्त्रित करते हैं कि वे इस महायज्ञमें अपनी - अपनी आहुति यथाशक्ति प्रा डालें । ' सनातनधर्मालोक ' - सर्वस्व के लिए दश सहस्र उसे रुपया रखा गया है | महासंरक्षकके लिए पांच सहस्र, ष्ट मान्य - सहायकके लिए ढाई सहस्र रुपया, और संरक्षक के लिए एक सहस्र, सम्मान्य सहायक के लिए पांचसौ कर रुपया, तथा मान्य- सहायकके लिए ढाईसौ रुपया से और सहायककेलिए एक सौ रुपया नियत किया गया रा है । साधारण सहायक पचास रुपया तक भी दे सकते हा हैं । सब सज्जन इसमें अपनी शक्ति के अनुरूप द्रव्य टीके स्वयं देकर तथा दूसरे धनी - मानी सज्जनोंसे दिलवाकर सर्वात्मरूप से सहायता करें | तब यह महाग्रन्थ अना-CC - 0. Ankur Joshi * आलोक ' ' -परिचय # २३ यास प्रकाशित हो जाएगा । श्रद्धेय पूज्य श्री १००८ स्वामी करपात्रीजी महा-राजने हमें अपने संरक्षणका वचन दिया है । माननीय श्री पण्डित दुर्गादत्तजी त्रिपाठी ( भूतपूर्व ' सिद्धान्त ' मासिक ' सन्मार्ग सम्पादक काशी ) महोदयका तो हमें इस देशमें आने पर सब प्रकारका सहयोग प्राप्त हो रहा है । ' सन्मार्ग ' दैनिक काशीके प्रधान सम्पादक श्री पण्डित गंगाशंकरजी मिश्रका प्रोत्साहन एवं सहयोग भी प्राप्त हो रहा है । ' कल्याण ' परिवारका सहयोग भी शीघ्र मिलने वाला है । मुलतान के सनातनधर्मके प्रेमी श्री मघवदत्तजी महोदयका सहयोग भी मिल रहा है, द्रव्यकी सहायता सबसे पूर्व श्री पं ० रेवाशंकरमेघ जी शास्त्री पुरोहित देलवाडाकर प्रधानाध्यापक भारतीयविद्याभवन स्व ० से ० देवीदास लल्लूभाई संस्कृत पाठशाला, १२५ गुलालवाडी, बम्बई ४ ने प्रारम्भ की है । फिर श्रीमान् पं ० ब्रह्मदत्तजी शर्मा सहायकाध्यापक राजकीय प्राथमिक पाठशाला, ( अजमेर ) ने की है । श्री ब्रह्मदत्तजीने पुष्कल सहाता भेजी भी है और भेज भी रहे हैं, तथा ग्रागे भेजने का आश्वासन भी दिया है ।. पूज्यपाद द्वारकाशारदा-पीठाधीश्वर जगद्गुरुशंकराचार्यं - श्रीअभिनव Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 22

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२४ G श्री सनातनधर्मालोक ( १-२ ) * सच्चिदानन्द तीर्थस्वामि चरणोंने इसके लिए प्रार-: म्भिक सहायता देकर और भविष्यत् के लिए वचन देकर अपने दृढ़ सनातनधर्मानुरागित्वको प्रकट कर दिया है । आशा है अन्य सन्त, महन्त तथा आचार्य. भी श्रीमान्का अनुकरण करेंगे । श्री पण्डित रामेश्वर शास्त्री प्र ० श्रध्यापक, श्री पण्डित देवकृष्णजी शास्त्री. अध्यापक श्री वेंकटेश्वर संस्कृत महाविद्यालय, जायल ( मारवाड़ ) श्री पं ० हरिप्रसादजी शास्त्री संस्कृताध्यापक.. पठानकोठ, ( इनकी आर्थिक सहायता प्राम्भ हो गई है ), श्री श्याम सुन्दर जी शास्त्री, सिवानी ( हिसार ), भक्त रामशरणदासजी पिलखुआ प्रदिने भी सहायताक वचन दिये हैं । अब सब सज्जनोंको ' क्षिप्रमक्रियमाणस्य कालः · पिवति तद् - रसम्, इस पद्यको स्मरण: करके सहायता देना - दिलवानां शीघ्र प्रारम्भ कर देना चाहिए । जो सज्जन धर्मादाय रखने वाले सज्जनों: से परिचित हों वे उनसे सहायता दिलवावें । अन्य लोग · हमारे प्रकाशित ग्रंथोंका प्रचार करवाकर भी सहायता कर सकते हैं | उनसे प्राप्त द्रव्यका भी शेषः निबन्ध-प्रकाशन में विनियोग किया जायगा । ' श्रीसनातनधर्मा-लोक ' का प्रचारकी दृष्टिसे हम हिंदीमे प्रकाशन - चाहतेः CC - 0. Ankur Joshi Collection आलोक - परिचय २५ हैं परन्तु स्थायी- साहित्य की दृष्टिसे संस्कृत भाषा में भी इसका प्रकाशन चाहते हैं । अब सब सज्जनों को ' श्री दीनानाथशर्मा शास्त्री सारस्वत, विद्यावागीश ( प्रिन्सिपल सँ ० हिन्दी महाविद्यालय ) रामदल दरीबा कलां दिल्ली, इस पते से शीघ्र सहायता - द्रव्य भेज देना चाहिए । जो महोदय दान देना चाहते हों पर उन्हें सत्पात्र न मिल रहा हो, तो उनके लिए या . महाग्रंथही सत्पात्र सिद्ध होगा । जो समर्थ तथा धर्म -श्रद्धालु सज्जन इसमें सहयोग दे सकें, उनके पते में - हमें भेज देने चाहिएं । अन्तमें आपसे श्रीसनातनधर्म - सेवाको दृढ सम्भावना करता हुआ ' श्रीसनातनधर्म लोक - परिचय ' यही समाप्त करता हूँ । पर्याप्त सहायत प्राप्त हो जाने पर हम अन्य सब कार्य छोड़कर केव इस प्रकाशन - कार्य में लग सकते हैं । इस ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के कुछ निबन्धों प कुछ विद्वानोंकी सम्मति भी उद्धृत की जाती है, जिस जनताको उनकी उपयोगिता ज्ञात हो जाए । ' अगस्त्या समुद्रपानोपपत्तिः ' हमारा यह संस्कृत निबन्ध ' मधु वाणी ' पत्रिका [ २२ ] में प्रकाशित हुआ था । य प्र निबन्ध हिन्दीमै ' ब्राह्मरण - सर्वस्व ' इटावा पत्र [ ३४ ॥ मैं प्रकाशित हुआ । इसीको इस पत्र से ' सनातन - ध स Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 23

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षा २६ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) पताका ' - पत्रिकामें उसके सम्पादक महोदयने उद्धृत किया । उसे ' संस्कृत- रत्नाकर ' के सम्पादक व्याक-रणाचार्य श्री सूर्यनारायण शास्त्रिमहाभागने देखा । जव्य उक्त महोदयने ' संस्कृतरत्नाकर ' [ ५-७ अङ्क १२२ पृष्ठ ] में उक्त हमारे निबन्धके सम्बन्धमें यह शब्द लिखे-( १ ) स्वामिनो दयानन्दस्य मतखण्डने परम-कुशलस्य, पौराणिकाख्यानोपपत्ति - साधन- दृढ - व्रतस्य, घर चतुर्ष्वपि वेदेषु कृतश्रमस्य तन्द्रालस्यादि- वैदुष्य-धम विघातकदोषसम्पर्केण सर्वथा विवर्जितस्य, निरन्तर-यत स्वाध्यायशीलस्य, संस्कृतनागर्युभयविधभाषालेख-केक पद्धति - निष्णातस्य, मूलत्रारणनगरस्थ - सनातनधर्म-कालेजोपाध्यक्षस्य, महापण्डितस्य श्रीदीनानाथशर्म-प शास्त्रिणः ‘ अगस्त्यऋषिका समुद्रपान ' इतिशीर्षकयुक्तो जिस युक्तिप्रमाणोपपत्तिसमर्थितो लेखोपि लेखकमहोदयस्य हत्या गम्भीरज्ञानम्, आत्यन्तिकं सनातनधर्मश्रद्धालुत्वं च मधु प्रमाणयति । एतस्य बुधवरस्य लेखा ' रत्नाकरे ' अपि य प्रतिमासं प्रकाश्यमानाः परितोषयन्त्येव पाठकानां ४॥ चेतांसि । अस्मिन्न व तु मासे केनापि कारणेन न प्रहि-न - ध तोऽनेन महात्मना! रत्नाकरे ' लेखः परं भविष्यति न स्याद एवंविधा त्रुटिरिति मन्यामहे श्रीदीनानाथानु-CC - 0. Ankur Joshi * ' श्रालोक - परिचय २७ कम्पाबद्ध - श्रद्धाः ' । ( यह निबन्ध ग्रव छठे पुष्प के रूप में प्रकाशित होता है । ) अब कुछ हिन्दी सम्मतियां भी उद्धृत की जाती [ २ ] ' परमपूज्य श्रीशास्त्रीजीके चरणोंमें सादर यथायोग्य | ' वेदाध्ययनाधिकारका उत्तर ' [ श्री स्वा ० करपात्रीजीके विरोधी लेखकको प्रत्युत्तर ] ' वेदा-ध्ययनाधिकार पर विचार ' [ श्री रामचन्द्र हेडमास्टर की प्रत्यालोचनाका प्रत्युत्तर ] दोनों लेख कलकी डाक से प्राप्त हुए । बहुत परिश्रम किया है । आप जैसे विद्वान् सचमुच आर्य - संस्कृति के अनुपम रत्न हैं । जगदी-श्वर आपसे ऐसी ही अनन्य धर्म- सेवाका महत्कार्यं चिरकाल तक सम्पन्न कराता रहे । आपकी गम्भीर तात्त्विक विवेचन शैलीकी मैं अल्पज्ञ क्या प्रशंसा करूं? सूर्यको दीपक दिखलाकर प्रकाशित क्या करूं? सदा हम पर ऐसी ही कृपा बनाये रखें । ' विनीत - दुर्गादत्त त्रिपाठी ' सिद्धान्त स ० सम्पादक, काशी ( ज्येष्ठ कृष्ण ६ बुध २००३ ) । ( ३ ) ' वर्णव्यवस्था जन्मसे ही है ' और ' महाजनो येन गतः स पन्थाः, शीर्षक दो लेख आपके मिले । लेख दोनों अत्यन्त प्रमाणिक, युक्तियुक्त एवं मुँहतोड़ Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 24

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२० * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * हैं । आपकी लेखनी में विलक्षण जादू है । सचमुच आपके अकल्पित, अमूल्य सहयोग से हम लोगोंको जो शान्ति, सन्तोष, और प्रसन्नता हुई है उसे व्यक्त कर नहीं सकते । सनातनी - समाज प्रापसे गौरवान्वित एवं आपका चिरऋणी है, जगदीश्वर से यही आन्तरिक प्रार्थना है कि आप खूब दीर्घायु एवं धर्म के समर्थन में पूर्ण समर्थ हों । ' विनीत- स ० सम्पादक सिद्धान्त ' आषाढकृष्ण १३ गुरु २००३ । ( ४ ) पंडित - प्रवरमहाभाग, आपके दो लेख ( वेद-स्वरूप - निरूपण और वेदाधिकारि - विचार ) कल प्राप्त हुए | श्रापकी इस नि र्याज साहित्य- सेवा एवं हमारे प्रति ग्रनुग्रहके लिए हमारी जयन्ती - ग्रन्थसमिति आपके चरणों में कृतज्ञतापूर्वक धन्यवाद निवेदन करती है । आप भारत के महामहिम मनीषी विद्वानोंमें एक हैं । उसपर त्यागभाव से निःस्वार्थ सुर - सरस्वतीकी सेवा करना यह आपकी महत्ता के अनुरूप है । किसीने ठीक ही कहा है ' नाल्पीयसि निबध्नन्ति पदमुन्नतचेतसः ॥ येषां भुवनलाभेपि निःसीमानो मनोरथाः । विद्वच्चरण-रेणु, गणेशरामशर्मा, मन्त्री - श्री रजतजयन्ती, महाराज-रावल अभिनन्दन - ग्रन्थ समिति, डूंगरपूर, राजपूताना । २८ जून १ ९ ४६ ' । * आलोक परिचय २ ९ ( ५ ) हे चक्रवर्ती विद्वत्तापूर्ण सार्वभौमपाण्डि-व्यादिमणि! आपके लेख ' वैदिक धर्म ' और ' कल्याण ' मैं पढ़ने को मिलते रहे । आपको विद्वत्ताका कोई पारावार नहीं । ' ' कल्याण ' के हिन्दु - संस्कृति - अ'कर्म ' हिन्दुसंस्कृतिसम्बन्धी दस विषयोंपर विचार ' आपका लेख पढ़नेको मिला, पढ़कर चित्त प्रसन्न हुआ । धन्य है उस माताको, जिसने आप- - जैसे अमूल्य रत्नको जनकर हमारी सारस्वतजातिको सूर्य तुल्य देदीप्यमान ह कर दिया है । …………….आज मैं देख रहा हूँ कि ४ लाख स

श्लोकोंका साहित्य जो चारों वेदों का सार पदार्थ है,

सो आपकी लेखनीसे सूत्ररूपसे व्याख्या सहित गागर में सागर भरा हुआ है । धन्य है आपके पिताको और श धन्य है उस मातृभूमिको, जिस स्थानपर आप जैसे श्रमरवृक्षने वपन प्राप्त होकर अपनी छायासे जनता न को आश्वस्त किया ।...... ( श्रीरूपलाल सारस्वत ब G विद्यारत्न, बगिया मनीराम, कानपुर ) म ( ६ ) आपका ग्रन्थ पढ़कर जितनी प्रसन्नता हुईं ज वह अकथनीय है । मैंने आर्यसमाजके ग्रन्थोंका अध्यक यन किया, किन्तु ' वैदिक - सम्पत्ति ' से भी अधिक खोज म पूर्ण बातें आपकी ' आलोक ' - ग्रन्थमालाके पुष्पोंक स देखने में मिल रही हैं । मेरी सभी शंकाओंका समा स CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 25

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३० * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * धान इन पुष्पों से होता है । आपने गागर में सागर को भर दिया है । मझे आप - जैसे सनातनधर्मके प्रकाण्ड विद्वान् की आवश्यकता थी, भगवान्‌की कृपां I से वह पूर्ण हुई । ( श्रीमथुराप्रसाद चतुर्वेदी शिक्षक न्य प्रा ० शा ० सोवत जि ० गुना, म ० प्र ० ) को ( ७ ) श्रीसनातनधर्म जगत् के प्राण...... आप न द्वारा रचित ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थ के पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । मन - मयूर पढ़कर नाच उठा । है, निःसन्देह आपकी लेखनीपर मां सरस्वती विराजमान र हैं । यदि आपकी विद्वत्तासे आपको आद्य - स्वामी शंकराचार्यका अवतार कह दिया जाय, तो कोई प्रत्युक्ति न होगी । वर्तमानकाल में सनातनधर्म - रूपी ता नौकाके खिवैया श्रीपं ० माधवाचार्यजी ही हैं; वह भी वत बूढ़े हो चुके । मैं तो यह समझ रहा था कि पं ० माधवाचार्य के पश्चात् सनातनधर्मरूपी नौका डूब हुई जायगी, परन्तु अब आप खिवैया हैं ही, कोई चिन्ता मध्य की बात नहीं । सभी स्वर्गारोही सनातनधर्मी शास्त्रार्थ-तेज महारथी - विद्वानोंकी क्षतिपूर्ति करनेमें आप पूर्ण किं समर्थ हैं । अतः प्राप कटिबद्ध होकर शास्त्रार्थके मा मैदान में उतर आवें । उनकी कमीको आापही पूरा कर सकते हैं ।...... वयं तु भवतां पादत्राणावलम्बका: -CC - 0. Ankur Joshi * ' आलोक ' - परिचय * ३१ नवीनचन्द्र जेनल । इस प्रकार प्रयाचित सम्मतियां दो सौसे भी अधिक आई हुई हैं, यह सब इसी महाग्रन्थकी समझनी चाहिएं | अतः श्राजही इसके प्रकाशनार्थं पुष्कल द्रव्य-राशि देने दिलवाने का विचार कीजिए । पत्रव्यवहार तथा सहायता प्रेषणका संक्षिप्त पता: -श्री दीनानाथशास्त्री सारस्वत, प्रिं ०, संस्कृत - महा-विद्यालय, दरीवाकलां देहली । अथवा, फर्स्ट बी -१६, लाजपत नगर नई देहली- १४ । वर्तमानकी सूचना ' श्रीसनातन धर्मालोक ' ग्रन्थमालाके १-२ पुष्प अत्यन्त लघुकाय छपे थे । हमें यह प्राशा नहीं थी कि यह ग्रन्थमाला बहुत शीघ्र ही लोकप्रिय सिद्ध होगी । इन पुष्पों के बाद क्रम से ३८ ४ र्थ और ५ म पुष्प बहुत बड़े प्रकाशित हुए । ५ म पुष्पकी पृष्ठसंख्या तो ९ ३६ तक पहुँची । अब छठा पुष्प भी छप रहा है, इन पुष्पों में बहुत विषय प्रागये हैं; जिससे अनेक शङ्खानोंका समाधान हो जाता है । १-२ पुष्पोंके समाप्त हो जानेसे हम यह उसका परि-वर्धित संस्करण निकालने जा रहे हैं । उनमें संक्षेपसे ' नमस्ते ' विषय रखा गया था । अब हम उसमें ' नमस्ते ' के विषय में उपस्थित की जाने वाली बहुत सी शंकाओं का समाधान रखेंगे । पाठकगरण इन सभी पुष्पोंको मनसे पढ़ें; जिससे उनकी सभी शकाओंका समाधान होकर उनका मनोमयूर नृत्य कर उठेगा । Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 26

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' नमस्ते ' पर विचार ( १ – - क्या ' नमस्ते ' एक पद है? ) आज कल जहां - तहाँ ' नमस्ते ' शब्द का बड़ा प्रचार दीखता है; इसमें प्रार्यसमाजकी तत्परता कहीं जाती है । और आर्यसमाज इसे स्वा. द. जीकी वैदिक देन समझता है । इसका प्रचार शुद्ध वा प्रयुक्त है? शुद्ध या युक्त? इसे पृथक् निबन्ध में बताया जायगा; पर इसका प्रयोग एक - पदकी तरह किया जाता है । केवल संस्कृतानभिज्ञ ही ऐसा नहीं करते, किन्तु प्रार्थ-समाजी संस्कृत विद्वान् भी इसका एक पदकी तरह प्रयोग करते हैं । यह श्राग्रहवाद है । प्रत्युत कई महाशय तो " नम-स्ते " को एक पद सिद्ध करनेका प्रयत्न करते हुए भी देखे गये हैं । वे उसमें लौकिक - शास्त्रों वा वैदिक प्रमारणों को देनेकी चेष्टा भी करते रहते हैं । पर उनका यह प्रयत्न केवल प्राग्रहबाद ही है, शास्त्र वा वेदका इसमें अनुग्रह नहीं, यह यहां बताया जायगा । क्या ' नमस्ते ' निपात है? ( १ ) पूर्णपक्ष - " साधरण से भी प्राचीन ' ऋग्वेद ' के भाष्य-कार श्री वेंकट - माधवसे निर्मित ' ऋग्वेदानुक्रमणिका ' के प्रथम भागमें स्थित ' निपातानुक्रमणिका ' में " नमस्ते " को निपात-- स ० धं ० ३. CC - 0. Ankur Joshi Collection Grat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 27

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३४ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * अव्यय बताया गया है । जैसे कि-' इयन्त इति संख्यानं निपातानां न शक्यते । उपसर्गा विज्ञेयाः क्रियायोगेषु विंशतिः ' । २ । निपाताः खलु कामं वै पृथङ् नाच्छा, सचा पुनः । शश्वद्, नक्तं, दिवा, माकिर्यथेदिति सदं मुहुः | ३ | प्रादथाध, मिथू, शीभं वृथा, सञ्जोग्, ऋधक्, पृथक् । हिरुक् श्रौषट्, वषट् - मंक्षु, किल, हन्त, नहिहः ॥४ ॥

प्रथो यदि नमस्तेऽमी चत्वारिंशद् उदाहृताः । श्राद्युदात्ताश्च सर्वेमी सन्त्यन्येपि च तादृशाः ॥५ ॥

इन पद्यों में ' नमस्ते ' को निपात- अव्यय माना गया है । पं. यदि ऐसा है तो इसके एक पद होनेसे एकवचन, बहुवचन सर्वत्र ग इसका प्रयोग हो सकता है । इस ' नमस्ते ' का अर्थ ' नमस्कार'-१. मात्र है, इसमें ' तुभ्यं ' स्थानिक ' ते ' नहीं; जिससे किसी बड़े की प्रतिष्ठा सूचित हो । यह दो पद नहीं । इस पक्ष में वेदका को अनुग्रह भी है । जैसे कि- ' नमस्ते यातुधानेभ्यो, नमस्ते भेषजें-न भ्यः ' ( अथर्व ० ६।१३।३ ) यहां पर बहुवचनमें ' नमस्ते ' का , श्राना उसे ' निपात ' बताता है । अन्य मन्त्र यह है -- ' नमस्ते लाङ्गलेभ्यः ' ( श्र. २।८।४ ) ' नमस्ते अस्तु पश्यत पश्य मा पश्यत ' ( प्र. १३।४।४८ ) यहां पर भी वही बात है । तब य. इसका सर्वत्र, एक वचन हो, चाहे प्रादरार्थ बहुवचन, प्रयोग नम किया जा सकता है, अपेक्षित सर्वनाम भिन्न जोड़ना पड़ेगा । त [ यह प्रश्न मेरे पास श्री ब्रह्मदत्तजी - जिज्ञासु के ' विरजा-नन्द आश्रम लाहौर ' में पढ़ रहे हुए मुझसे शास्त्रिपरीक्षोत्तीर्ण श्रीमहेन्द्रप्रताप शास्त्रीने भेजा था । इस पर शास्त्रीय विधे-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. * क्या नमस्ते एक पद है? ३५ चना दी जाती है; पाठक ध्यानपूर्वक देखें । ] उत्तरपक्ष - यह बात ठीक नहीं । यहां वादीको भ्रम पड़ गया है, जो उक्त पद्यों में अन्तिम एक पद ' नमस्ते ' निपात मानता है । ' निपातानुक्रमणिका ' के ' नमस्तेऽमी चत्वारिंशदुदाहृताः: ' इस पदपर याद रखना चाहिये कि यहां अन्तिम निपात " नमस् ' है, " नमस्ते " नहीं । यहां ' ते ' का सम्बन्ध ' श्रमी ' से है ' ते अमी '; ' नमस् ' से नहीं । नमस्के हलन्त होनेसे ' अभीनं परेण संयोज्यम् ' इस न्यायसे सन्धि होनेसे ही ' नमस्ते ' बन गया है, यह नमस्ते दो पदों की सन्धि है, एक - पद निपात नहीं । ' अथो यदि नमस्, तेऽमी चत्वारिशद् उदाहृताः ' यही वास्तविक पाठ है । प्रापाततः देखनेसे ही यहां नमस्ते निपात प्रतीत होता है, वास्तविक दृष्टि करनेपर वह भ्रम हट जाता है । इसी कारण श्रीमाधवभट्ट ' नमस्ते ' ( ऋ ० ३।३३।८ ) मन्त्र में ' नमः -ते ' इस प्रकार भिन्न - भिन्न करके व्याख्यात करता है, अन्यथा वह इसे एक पदकी तरह व्याख्यात करता । यहां पर ' ते ' तो ' तद् ' शब्दको प्रथमाके बहुवचनका रूप है । वह ' श्रमी'का विशेषरप है । अब योजना यह हुई ' अथो यदि नमस् ते श्रमी निपाताः चत्वारिशद् उदाहृताः ' अर्थात् खलुसे लेकर नमस् तक ( ते श्रमी ) वे प्रसिद्ध ( निपाताः चत्वा-रिशत् ) चालीस निपात कहे गये हैं । ते प्रसिद्धाः श्रमी - इमे ' खलु ' इत्यत आरभ्य नमस्- पर्यन्तं निर्दिष्टाः निपाताः चत्वारिंशत् - संख्याका उदाहृताः । ' An eGangotri Initiative

पृष्ठ 28

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३६ श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * ( ख ) उक्त पद्योंमें ' ते अमी ' इन दो सर्वनामोंका प्रयोग इस प्रकार है जैसे कि इसी " निपानुक्रमणिका " के निर्दिष्ट अन्तिम पद्य में ' सर्वे - श्रमी इन दो सर्वनामोंका प्रयोग है । यदि ' तेऽमी ' जैसा ही प्रयोग इष्ट हो तो " भगवद्गीता " में देखिये, वहां " त इमेऽवस्थिता युद्धे प्रारणांस्त्यक्त्वा धनानि च " ( १/३३ ) इस पद्य में " ते इमे " इन दो सर्वनामोंसे कौरवोंका निर्देश है । इसी प्रकार श्रीमाधव भट्टके पद्यमें ' ते श्रमी ' इन दो सर्वनामोंसे निपातोंका निर्देश है । अन्वादेश में " तस्मै ते नमः: " इस वाक्यमें दो सर्वनामोंका निर्देश व्याकरण में प्रसिद्ध ही है । इस प्रकार ' प्रथिनो वयममो समुपेमः ' ( ५/७७ ) इस ' नैषधीयचरित ' के पद्य में ' वयंममी ' यहां पर भी दो सर्वनामों का प्रयोग है । यदि ' ते इमे ' ' तस्मै ते ' ' वयममी ' इन उदाहरणोंसे ' तेऽमी ' का सादृश्य न प्रतीत होता हो; तो हम वैसा ही उदाहरण बताते हैं- ' तान्यमूनि सरित् - तटानि ' ( २।२३ ) इस ' उत्तररामचरित ' के पद्य में ' तानि - श्रमूनि ' इस प्रकार तद् एवं श्रदस् इन दो सर्वनामोंका माधव भट्टके पद्यकी तरह बहु-वचनमें एक साथ प्रयोग है । यदि यहां नपुंसकलिंग होनेसे ' मी ' जैसा सादृश्य वादियोंको न प्रतीत होता हो; तो हम स्पष्टतया वैसा ही प्रमाण उपस्थित करते हैं; वादी प्रवधानसे देखें 1-" एके सत्पुरुषाः परार्थघटका स्वार्थं परित्यज्य ये, सामा-न्यास्तु परार्थमुद्यमभूतः स्वार्थाविरोधेन ये । तेऽमी मानुष-* क्या नमस्ते एक पद है? ३७ राक्षसाः परहितं स्वार्थाय निघ्नन्ति ये, ये तु घ्नन्ति निरर्थक परहितं ते के न जानीमहे । " ( नीतिशतक ७५ ) यहां पर ' ' ते ' यह श्रीमाधव भट्टके श्लोकस्थ पदकी तरह स्पष्ट है । यहां पर ' ते ' को कोई निपात नहीं मानता; किन्तु सभी तद्-शब्दका प्रथमा - बहुवचन ही मानते हैं । यदि इसमें वादी लौकिक - प्रमाणको प्रादर न देकर वैदिक प्रमारण चाहते हों । तो उसे देखें - ' त इमे समासते ' ( ऋ ० १११६४ | ३ ९ | ) यहां पर ' ते इमे ' यह दो सर्वनाम हैं । यदि वादी ' तेऽमी जैसा ही वैदिक - निर्देश चाहें; तो वह यह है- ' ते ग्रमी ' समासते ' । ( अथर्व १।१५ । ( १० ) १८ ) यहां ' ते ' निपात नहीं किन्तु प्रथमाका बहुवचन है, माधव भट्टके उद्धरण में भी ' तेडमी ' वैसा ही है; निपात तो नमस् तक ही समाप्त हो गये हैं । इसका प्रमाण यही है कि वादी किसी भी व्याकरणको ढूँढें; किसी भी कोष या निघंटुको देखें; किसी भी ' निपाता. नुक्रमणिका ' की देख - भाल करें, सर्वत्र उनको निपात वा श्रव्ययों में ' नमस् ' ही मिलेगा, नमस्ते नहीं । इसीलिए ही स्वामी दयानन्दजीके ' वेदांगप्रकाश ' के नवम भाग " श्रव्य-यार्थके ” १३ पृष्ठमें स्वामीजीने भी, जो ' नमस्ते ' के श्रादि-प्रचारक माने जाते हैं- " नमस् नतावर्थे नमस्कुर्यान्मातरम् " इस प्रकार नमस्को ही निपात लिखा है, नमस्ते को निपातों में नहीं रखा । ... ( ग ) इसका उत्कट प्रमाण यह है कि - वेदके पद - पाठों चा पदानुक्रमणिकाओं में कहीं भी ढूंढें; किसी भी क्रम, धन CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 29

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३० ३८ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) पर जटा, माला, शिखा, लेखा, ध्वज, दण्ड, रथ - पाठ में देखें, आपको ' नमस्ते; यह एक पद नहीं मिलेगा । जिस मन्त्र में नमस्ते हो; उसका पदपाठ देखने पर मालूम होगा कि वहां ' नमः । ते ' इस प्रकार भिन्न - भिन्न पद ही रखा रहता है, ' नमस्ते ' इस हों प्रकार इकट्ठा नहीं; क्योंकि ये दो ही पद हैं । पदपाठका इतना महत्त्व माना जाता है कि जिस मन्त्रका पदपाठ न हो; ही उस मन्त्रको ' खिल ' समझा जाता है । जैसे कि श्रीसत्यव्रत साम-श्रमीने अपने ' निरुक्तालोचन ' के ' देवराजादीनां कालप्रकरणम् ' पृष्ठ २८६ में लिखा है- ' वस्तुतोऽस्माभिः सर्वत्र तथैव श्रर्थः कल्प-नीयः, यथा न विरुध्येत पदपाठः । प्राषं पदपाठमवमत्य श्रर्थ-करणं तु साहसमेव - इत्यत्र नास्ति वक्तव्यता । ' अर्थात् पद-पाठका अनादर करना तो साहसमात्र है । ' चरण - व्यूहकी टीका में कहा है- ' यस्य मन्त्रस्य पदाभावः, तस्य खैलिकत्वं ना. सिद्धम् ' पद - पाठ रहित मन्त्र, ' खिल ' ' है । यदि पदपाठको वा प्रमारण न माना जाय; तो ' न तस्य प्रतिमास्ति, का ' नतस्य ही ( सर्वलोकनमस्कृतस्य तस्य परमात्मनः ) प्रतिमा अस्ति, इस the प्रकार परमात्मा की प्रतिमा ( लोकसदृशता ) सिद्ध हो जाय; उसकी प्रतिमता ( अनन्य साधारणता ) नष्ट हो जाय । म् " इस प्रकार वेदकी पदानुक्रमणिकाओं में भी देखना को चाहिये । वहां ' नमस्ते ' यह पद कहीं भी नहीं मिलता; किन्तु एक ही मन्त्र में स्थित नमस्तेका नमस् शब्द ' न ' वाले भाग में ठों श्रौर उसीके साथका ' ते ' ' त ' के क्रममें मिलता है । देखिये धन, श्रार्यसमाजी श्रीविश्वेश्वरानन्दजीको बनाई हुई वेदसंहिताओं की पद - सूचियां । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. * क्या नमस्ते एक पद है? G ३६ ( घ ) इसके अतिरिक्त वेदमें ' नमस्ते ' यदि यह निपात वा एक - पद होता, तो ' बहुवचन ' में भी वेद में ' नमस्ते ' ही होता, पर वहां ऐसा नहीं; किन्तु ' नमो वः ' है । जैसे कि - ' नमो वः पितरः ( वा ० यजुर्वेद सं ० २।३२ ) इत्यादि । द्विवचन में भी ' नमो ' वां ' ( अ. ११।२1१ ) न श्राकर ' नमस्ते ' श्राता; पर नहीं प्राता । यदि नमस्ते; यह अखण्ड ही पद होता; तो नमोस्तु ते, [ महा-भारत भीष्मपर्व ५६६६ ] ' नमोस्तु ते ' [ अथर्ववेद सं ० ६ | १३ | १ ] इत्यादिमें ' नमः - ते ' में ' अस्तु ' प्रादिका व्यवधान क्यों होता? व्यवधानसे ' नमस्ते ' दो पद सिद्ध होते हैं । [ प्रश्न करने वाले उक्त ( महेन्द्रप्रताप ) शास्त्रीको उक्त [ श्रीमाधव भट्टका ] प्रमाण उक्त विरजानन्दाश्रमके योग्य अध्यापक श्री युधिष्ठिरनी मीमांसकने बताया था । हमने जब उपर्युक्त उत्तर उस शास्त्रीको भेज दिया; और उसने श्री-मीमांसकजीको दिखलाया; तब उन्होंने मान लिया कि ' नमस्ते ' यह निपात उवत माधव भट्टके प्रमारणसे सिद्ध नहीं होता । उक्त शास्त्रीका पत्र यह है-श्री पूज्या विद्वद्वर्यगुरुवराः! सादरमभिवादये । श्री पं ० युधिष्ठिर मीमांसकमहोदयैरेव ' नमस्ते ' इति निपातः ' इति ' स्वाध्यायकाले विज्ञातमासीत् । यदा ते ग्रजमेर - नगरतः प्रत्या-गताः ग्रन्थमवलोक्य विचार्य च ' मदीया भ्रांतिर्नमस्ते न निपातः ' इति सहर्ष स्वीकृतवन्तः । विनयावनतमस्तकः - महेन्द्र विद्यार्थी, ' श्री विरजानन्दाश्रम, लाहौर १०।६।३७ । फिर उसी शास्त्रीने १६३६ सन् में मुझसे मुलतान में An eGangotri Initiative

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सनातन धर्मालोक १-२, पृष्ठ 30 का मूल पृष्ठ
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* श्रीसनातनधर्मालोक. ( १-२ ) * मिलने पर कहा कि आपकी विवेचनासे पूर्व श्रीमीमांसकजीने आर्यसमाजोंके उत्सवों में भी नमस्तेके निपात होने की घोषणा कर दी थी; पर आपकी विवेचना देखकर उन्होंने नमस्टोके निपात होनेका प्रचार बन्द कर दिया है । यह महोदय विचार-वान् थे; अतः ' बुद्धेः फलमनाग्रहः ' उन्होंने असदाग्रह नहीं किया । अब तो वे स्वर के कारण भी ' नमस्ते ' को दो पद मानते हैं, पर अब भी कई असदाग्रही हैं, जो ' नमस्ते ' को एक-पद मानते हैं; उनकी समीक्षा आगे की जावेगी । इससे उन लोगोंका भी भ्रम सिद्ध हो गया, जो लोग ' नमस्ते ' को रूढ शब्द मानते हैं । संस्कृत - साहित्य एवं वैदिक-साहित्य में यह कहीं भी एक - पदरूपमें रूढिपद नहीं आया । नहीं तो ' नमः ' पद कहीं भी न होता । यदि अपनी इच्छासे ' नमस्ते ' को रूढि माना जाये; तो उसमें वेद एवं शास्त्रोंका अनुग्रह न होनेसे उसमें अवैदिकता एवं निर्मूलता ही होगी । इसकी रूढिता बनाने वाले प्रविद्वान् अथवा विद्वान् भी, पर असदाग्रही कतिपय आर्यसमाजी हैं; उनका यह वैयक्तिकपक्ष साध्य ही है, सिद्ध नहीं । ' नमस्ते ' में ' नमस्ते ' यह दो पद हैं । यह हमने सिद्ध कर दिया । इसमें ' ते ' युष्मद् ' शब्दके चतुर्थीके एकवचनान्त ' तुभ्यं ' के स्थानपर विकल्पसे होता है । इसका प्रयोग. वहां करता चाहिये, जहां बड़ेको युष्मद् शब्दकी सभी विभक्तियों के एक-वचनका प्रयोग संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू श्रादि भाषाओं में दिया जा सके; पर श्राजकल न तो किसी बड़े को त्वं, क्या नमस्त एक पद ह? ४१ त्वम्, तुभ्यं, तव आदि लिखा जाता है, प्रत्युत इससे बड़ेकी प्रतिष्ठा मानी जाती है; न हिन्दी, उर्दू आदि भाषाओं में बड़े को तू - तुझे प्रादि लिखा जाता है; न अंग्रेजीमें Thou Thy Thine, आदि युष्मदके एकवचनका प्रयोग दिया जाता है; तब उसे ' ' नमस्ते ' का प्रयोग भी नहीं दिया जा सकता । हमने कई प्रार्थसमाजियोंसे पूछा कि आप अपने गुरुजी को ' आपका पत्र मिला ' की संस्कृत क्या लिखेंगे? उत्तर मिलता था कि- ' भवतां पत्रं प्राप्तम् ' । हम पूछते थे- ' तव पत्रं प्राप्तम् ' क्यों न लिखोगे? उत्तर मिलता था कि क्या हम उनकी ऐसा लिखकर प्रतिष्ठा करें । हम कहते थे कि फिर ' नमस्ते ' लिखने से उनकी श्रप्रतिष्ठा न होगी? उसके उत्तर में चुप्पी ही प्राप्त होती थी । अन्य प्रश्न यह है कि - श्रादरार्थ बहुवचन देना भी वेदादि शास्त्र के अनुकूल है ( यह अग्रिम निबन्धमें बताया जायगा; ) तब उसमें भी ' नमस्ते ' लिखा जावेगा; या ' नमो वः? यदि ' नमस्ते ' लिखा जावेगा तो ' नमो वः पितरः ' ( यजु ० २१३२ ) यह वेद - मन्त्र शुद्ध हो जायगा । अथवा ' मान्याः! ' नमस्ते ' यह लिखना ही वेदविरुद्ध तथा व्याकरणविरुद्ध हो जायगा! यदि बहुवचन में ' नमो वः ' लिखा जायगा तो ' नमस्ते ' ही सर्वत्र लिखना वैदिक है, इसमें परिवर्तन नहीं हो सकता "; ऐसी श्रार्यसमाजियोंकी प्रतिज्ञा टूट जानेसे ' नमस्ते ' का निरा-कररण हो जायगा । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat An eGangotri Initiative