सनातन धर्मालोक १-२ — पृष्ठ 121–130
सनातन धर्मालोक १-२ · पृष्ठ 121–130
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२२२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * को यहां नमस्कार है, यहांके कुत्तोंको नहीं । रुद्रके कुत्त े भी हुआ करते हैं, जिनका ' रुद्रस्य ऐलवकारेभ्यः [ प्रमथेभ्यः ] महास्येभ्यः श्वभ्योऽकरं नमः ' [ ११ २ ३० ] इस प्रथर्ववेदसं ० के मन्त्रमें संकेत करके उन्हें नमस्कार कहा गया है । सो यह यहां कुत्ते विवक्षित नहीं, न यहां के निषादादि ही विवक्षित हैं । इस मन्त्रमें श्रीसायरणाचार्यने भी लिखा है: - ' मृगयाविहारार्थं किरातरूपधारिणो [ रुद्र -- ] देवस्य सम्बन्धिभ्यः श्वभ्यः-सारमेयेभ्य इदं नमः प्रकरम् - करोमि । रुद्राष्टाध्यायी के शान्त्यध्याय [ १०1८ ] में तथा कृव्य ० तैत्तिरीयारण्यक [ १०२४५ ] में ' अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोर-घोरतरेभ्यः । सर्वतः शर्व! सर्वेभ्यो नमस्ते [ तव ] प्रस्तु रुद्ररूपेभ्यः ' यहां शर्व [ महादेव ] के घोर घोरतर रुद्ररूप भी संकेतित किये गये हैं । वे ही यजुर्वेद के रुद्राध्याय में किरातरूप रुद्रके दिखलाए हैं । तब यजुर्वेद सं ० के १६ वें अध्यायमें महादेव के गरण तथा तद्रूप - रुद्रोंको ही नमस्कार किया गया है । जिस में जिसकी पूर्ण श्रद्धा हो, वह उनके सभी रूपों तथा उसके सम्बन्धियों को भी नमस्कार करता है; उसके कुत्तेका भी सत्कार करता है । इससे दूसरोंके कुत्तों का सत्कार नहीं मान लिया जाता । इसप्रकार वेदमें भी जान लेना चाहिए । वेदमें रुद्रके सर्वविध - रूपोंको, तथा उसके गरंगोंको नमस्कार किया गया है; इससे आधुनिक चाण्डाल - वधिक प्रादियों को नमस्कार इष्ट न होनेसे वादीका पक्ष प्रसिद्ध ही सिद्ध हुआ । अथवा यहां अन्य रहस्य भी हो सकता है, वह यह कि -CC - 0. Ankur Joshi Collection * वेदमें प्रन्त्यजोंको नमस्ते * २२३ उन मन्त्रोंमें जो श्वान तथा चाण्डाल कहे गये हैं, उनको ' नमः ' अर्थात् ' अन्न ' दिया जाता है । वेदमें निघण्टु [ २७ ] के अनुसार [ नमः ] यह अन्नका नाम भी श्राता है । वैश्वदेवव में - ' शुनां ' च पतितानां च श्वपचां पापरोगिणाम् । [ अन्नं- ] शननिर्वपेद्भुवि ' [ ३२ ] इस प्रकार मनुजीके अनुसार अन्न रखा जाता है । वही यहां इष्ट है । वेदमें वैश्वदेव - सूक्तों में अग्निका भी वर्णन आता है; और अग्निको रुद्ररूप भी माना जाता है! जैसे कि - ' त्वमग्ने! रुद्र: ' [ सं ० २ | १ | ६२ ] तब यह अन्न वैश्वदेव - बलिसे सम्बद्ध चाण्डालोंको दिया जाता है, उन्हें नमस्कार नहीं किया जाता । यदि वह कुत्ता, चाण्डालादि उस बलिके समय प्राप्त हो जावें; तब उन्हें वह श्रन्न दे दिया जाता है । यदि उस समय वे न आवें; तो वह अन्न - भाग अग्निमें डाल दिया जाता है; यह बात स्वा. द. जी की ' संस्कार विधि ' [ पृ. २१३ ] में भी स्पष्ट है । उसमें कारण यह है कि- ' तस्मै रुद्राय नमो अस्तु श्रग्नये ' [ अथर्व ७६२१ ] यहां अग्निको रुद्ररूप बताया गया है । फलतः वेदमें वादिसम्मत - प्रन्त्यजोंको नमस्कार सिद्ध न हुआ । बल्कि शतपथानुसार अयज्ञिय अत्रैवरिंगक- लोगोंको नमस्कारका निषेध किया गया है । यह हम स्वा.रामे. जीके मत की समीक्षामें कह चुके हैं । फलतः वेद में शूद्र - अन्त्यजों को नमस्ते कहीं भी अनुशिष्ट नहीं; यह सिद्ध हो चुका - शेष ' नमस्ते ' विषयक विचार श्रागे देखिए । आर्यसमाजने ' नमस्ते ' का प्रचार करके, हठवादको अपनाया है, यह बात अग्रिम निबन्धमें बताई जाएगी । Gujarat. An eGangotri Initiative
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२२४ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) G ( ११ ) नमस्ते अथवा हठवाद । ( १ ) श्रार्यसमाजियोंसे पूछा जाता है कि - प्राप लोगों ने नमः १, नमोस्तु २, नमो वः ३, नमामि ४, नमस्यामि ५, वन्दे ६, अभिवादये ७, नमस्कारः ८, इन पदोंको छोड़कर नमस्कारार्थ केवल ' नमस्ते ' को क्यों स्वीकृत किया? इसपर वे कहते हैं— उक्तशब्द प्रवैदिक हैं, और ' नमस्ते ' वेदोक्त वाक्य है ' । जब उनके इस उत्तरको परीक्षारूप- कसौटी में घिसा जाता है, तब स्पष्ट मालूम पड़ता है कि इन्होंने कदाचित् वेदोंके दर्शन ही नहीं किये । ' प्रालोक ' पाठक इन शब्दोंको वेदमें देखें 1-( क ) वेदमें ' नमः ' शब्द बहुत स्थलों में आया है; कुछ उद्धररण देखिये: - ' नम उष्णीषिणे ' [ यजुः १६।२२ ] ' नमो गरणेभ्यः ' [ १६।२५ ] ' नमः कर्पादने ' [ १६।२६ ] ' नम प्रशवे ' [ १६।३१ ] ' नमः शम्भवाय ' [ १६१४१ ] ' ब्राह्मणेभ्य इदं नमः ' [ अथर्व ६।१३।३ ] ' नमस्तस्मै, नमो दात्र...... नमोऽग्नये, प्रचरते पुरुषाय च ते ( तव ) नमः हे शाले! ' [ श्रथर्व || ३ | १२ ] इत्यादि । इस प्रकार जब ' नमः ' शब्द भी वैदिक सिद्ध हुआ और इसमें ' नमस्ते ' वाले दोष भी नहीं हैं-- जो सम्भवतः धागे कहे जाएंगे - तो ' नमः ' पद छोड़कर ' नमस्ते ' का ही प्रचार करना हठ है या नहीं इसका निर्णय पाठकोंपर छोड़ा जाता है । ( ख ) अब ' नमोस्तु ' देखिये-- ' नमोस्तु नीलग्रीवाय ' [ यजुः १६८ ] ' नमोऽस्तु रुद्रेभ्यः ' [ १६ / ६४-६५-६६ ] नमो-स्तु सर्पेभ्यः ' [ १३३६ ] इत्यादि वेदमन्त्रोंमें ' नमोस्तु ' भी ॐ नमस्ते अथवा हठनाद २२५ मिलता है, और इसमें भी ' नमस्ते ' वाले दोष नहीं; तब ' नमस्ते ' ' को ही पकड़ रखना यदि हठवाद नहीं, तो और क्या है? ( ग ) अब ' नमो वः ' देखिये -- ' नमो वः पितरो रसाय नमो वः पितरः शोषाय नमो वः पितरो जोवाय, नमो वैः पितरः स्वधायै, नमो - वः पितरो घोराय नमो वः पितरो मन्यवे नमो वः पितरः, पितरो नमो वः ' ( २१३२ ) यजुर्वेदसं. के इस मन्त्रमें वेदने ' पितृ ' शब्दको श्रादरार्थ बहुवचन दिया है, जैसे कि ' पितरो वसवः साध्याः ' [ वाल्मी. ६ १०६६ ] इस पद्य में ' पितरः ' के लिए रामाभिरामने लिखा है - ' बहुत्वं पूजार्थम् । उन्हीं बहुवचनात्मक पिताके लिए ' नमस्ते ' यह एकवचनात्मक प्रयोग न लिखकर ' नमो वः ' यह बहुवचनात्मक प्रयोग वेदने दिया है । अब विज्ञ पाठक स्वयं विचारें कि आर्यसमाज जबकि एकवचन बहुवचन सर्वत्र ' नमस्ते ' यह एकवचनात्मक प्रयोग करता है; तब यह उसका वेद विरुद्ध दुराग्रह है या नहीं? । इस प्रकारके मन्त्र: प्रथर्ववेदसं ० में भी मिलते हैं । जैसे कि-' नमो वः पितरः, स्वधा वः पितरः [ १८४८१-८२-८३-८४-८५ ] जब कि वेदने पिताके लिए बहुवचन प्रयुक्त किया श्रौर उसके लिए ' नमस्ते ' न कहकर ' नमो वः, कहा है; इससे ' नमस्ते ' की अनिवार्यता, तथा बहुवचनमें उसका प्रयोग खण्डित हो जाता है । ( घ ) ' नमामसि ' [ अथर्व. ३ ८ ५, ६ ९ ४ ७ ] इस अथर्व-के मन्त्रसे ' नमामि, नमामः, यह प्रयोग भी बेदाभीष्ट है, फिर स ० घ ० १५ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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* श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * २२६ इसका प्रयोग क्यों नहीं करता? ' नमस्ते ' में ही श्रार्यसमाज क्यों श्राग्रह करता है? ( ङ ) वेदमें नमस्यन्तः, ( अ ० १।१२ २ ) शब्द भी श्राता है । इसमें ' नमस्यामि ' भी वैदिक सिद्ध होता है । तब आर्यसमाज इसका प्रयोग क्यों नहीं करता? । ( च ) ' वन्दे ' ( यजुः १२ | ४२, ऋ. सं. १।१४७।२ ) यहां पर ' दे ' का प्रयोग स्पष्ट है । ( छ ) ' यदभिवदति ' ( श्रथर्व.-६६४ ) यहां पर अभिवादन शब्द स्पष्ट है । ( ज ) ' नमस्कारेण ' ( अथर्व. ४ | ३६६ ) ' यत्राऽकृग्वन् धर्मधृतो नमां-सि ' ( अ ० १।२५।१ ) ' नमस्कृत्य द्यावापृथिवीभ्याम् ( अ०-७ ( १०२ ( १०७ ) ।१ ) इससे ' नमस्कार ' शब्द भी वैदिक सिद्ध होता है । तब आर्यसमाजने इस शब्दको क्यों नहीं लिया? केवल ' नमस्ते ' शब्द क्यों लिया? क्या यह हठवाद नहीं? । ' जोकि प्रार्यसमाजी श्री शेरसिंहने ' नमस्तेकी प्राचीनता के ६३ पृष्ठमें ' नमस्कार ' शब्दके विषय में लिखा है कि- ' यह शब्द यद्यपि ' नमः ' से बना है, तथापि कर्ता में प्रत्यप है, जिसका अर्थ है - नमस्करोतीति नमस्कारः ' जो ' नमः ' करता है, उसको ' नमस्कार ' कहते हैं, यथा- ' कुम्भं करोतीति कुम्भकारः ' । श्रतः ' नमस्कार ' कहनेसे मिलने वाले से कोई सम्बन्ध ही नहीं बनता । इसलिए पारिणनिजीने ' तुभ्यं ' से मिला कर ही ' नमस्ते ' करनेकी आज्ञा दी है ' । यह है श्रार्यसमाजीजी का व्याकरण- ज्ञान!!! भावार्थक घञ् - प्रत्ययवाले ' नमस्करणं नमस्कारः ' इस अर्थ वाले नमस्कार - शब्द में यह महाशय कर्त्ता में प्रत्यय मानते हैं? वेदका भी खण्डन करते हैं, पहले हम मन्त्र CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्ते अथवा हठवाद * २२७ चुके हैं । श्रथवा ' उच्चस्तरां वा वपट्कारः ' ( पा ० ११२३५ ) इस ज्ञापकसे ' तथा सर्वे चकाराः प्रत्याख्यायन्ते ' इस महाभाष्य-कारके ज्ञापकसे ' श्रोङ्कार ' की तरह ' वर्णात्कार: ' वाला ( कार ). प्रत्यय समुदायको भी हो जाता है । स्वा.द.ने. भी अपने ' आल्या-तिक ' में ' वर्णात्कार: ' की व्याख्या में ३८५ पृष्ठमें लिखा है-' कहीं वर्ण - समुदाय से भी [ कार प्रत्यय ] होता है - ' एवकार: ' । स्वा. द. जीने ऋ.भाभूके चतुर्थ पृष्ठमें संस्कृत में ' तस्मै ज्येष्ठाय सर्वोत्कृष्टाय ब्रह्मणे प्रत्यन्तं नमोस्तु नः ' ५ म पृष्ठ में लिखा है - ' उसको अत्यन्त प्रेमसे हमारा नमस्कार हो; उस श्रानन्दघनको हमारा नमस्कार प्राप्त हो ' स्वामीने अपनी वैदिक सन्ध्या के अन्त में ' नमः शम्भवाय ' को ' नमस्कार - मन्त्र माना है; इत्यादि बहुत स्थलोंमें ' नमस्कार ' शब्द प्रयुक्त किया है, ' उसको नमस्ते ' हो - यह नहीं लिखा । इससे यह भी स्पष्ट है । कि- प्राजके श्रार्यसमाजियों की भांति स्वामीका ' नमस्ते ' शब्द में पक्षपात नहीं था । श्री पं. भीमसेन जी शर्मा जो स्वा. द. जीके साथ रहा करते थे— ' स्वा. दयानन्द सरस्वतीजी के साथ हमारा निवास ' लेखमें ब्राह्मण - सर्वस्व के १७ अङ्क ( संवत् १६५६ पृ ० २७४ ) में लिखा था- ' स्वा. द. स्थापित फर्रुखा-बादकी पाठशाला में आये हुए स्वा. द. जीको सामान्यतया दूरसे प्रणामादि कर लिया करते थे, तब ' नमस्ते ' का नामनिशान भी नहीं था ' । अब श्राग्रही आर्यसमाजसे प्रष्टव्य है कि- जबकि वेदमें पूर्व - कथनानुसार नमः, नमस्कार आदि प्रयोग हैं, तब इनके Gujarat. An eGangotri Initiative
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२२६ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * प्रयोग में आप वैदिकता क्यों नहीं मानते? और ' नमस्ते ' से भिन्न लिखना अवैदिक होता; तो वेद इन शब्दोंको क्यों प्रयुक्त करता? तब स्पष्ट है कि- वेदका ' नमस्ते ' में पक्षपात नहीं । वेदमें वा किसी स्मृति वा पुराणेतिहास के वचन में कहीं ' नमस्ते ' शब्द के लिए लिखा हुआ विधि - वचन श्रार्यसमाजी नहीं दिखा सकते कि - नमस्कार प्रादिका प्रयोग छोड़कर ' नमस्ते ' का ही प्रयोग करना चाहिए? तब ' नमस्ते ' पर हो बल देते हुए आर्यसमाज का यह हठवाद सिद्ध हुआ । ( २ ) ' नमो वः ' के विषयमें कई कहते हैं कि- ' नमो वः ' बहुवचन में होता है, हम एकमें बहुवचन कैसे दें? जैसे कि श्रीशेसहने ' नमस्ते ' की प्राचीनता ' के ४४ पृष्ठमें लिखा है-' वह शास्त्रकार कभी एकके लिए बहुवचन लिख - लिखाकर झूठी बड़ाई नहीं चाहते थे ' । अथवा कइयोंका विचार है कि- ' ' एक में बहुवचन देना वेदके विरुद्ध हैं - यह भी ठीक नहीं । इस विषय में - ' सम्मानमें बहुवचन ' निबन्ध देखें । पर वादियों में ' आग्रही लोग तो बहुवचनमें भी ' नमस्ते ' का प्रयोग करते हैं । जैसे - आर्यसमाजी श्रीचमूपतिजीने मुलतान गुरुकुल में रहते हुए सन् १ ९ १७ के लगभग एक सन्ध्याकी पुस्तक छपवाई थी । उसको भूमिकामें तीन - चार ब्रह्मचारियोंके नाम लिखकर लिखा- ' प्रिय ब्रह्मचारियो! नमस्ते ' क्या खूब!!! ब्रह्मचारी-तो हुए बहुत; पर उनको दे दिया एकवचन - ' नमस्ते ' । ' ' तेमयावेकवचनस्य ' ( पा. ८।१।२२ ) ' ते ' एकवचन में होता है । अन्य उन्होंने यह भूल की कि उन छात्रोंको प्राशीषके स्थान में * नमस्ते अथवा हठवाद * २२६ श्रभिवादनार्थक ' नमस्कार कर दी!!! नमस्कार अपने से योग्यता, वा श्रयु वा वर्गसे बड़ेको होता है- ' ज्यायांसमभि-वादयन् ' ( मनु २।१२२ ) । तब तो बहुवचनमें ' नमो व पितरः ' ( यजु. २ राई २ ) कहने वाले वेदसे भी पूछना पड़ेगा. कि- ' नमस्ते पितरः ' क्यों नहीं लिखा? प्रार्यसमाजके प्रसिद्ध श्रीधुरेन्द्रशास्त्री ( अब स्वामी ध्रुवानन्द ) मेरे मित्र हैं; उन्होंने शास्त्रिपरीक्षा सन् १ ९ १ ε में मेरे साथ उत्तीर्ण की । उन्होंने मेरे मातुल श्रीपं. चूडामणिजी शास्त्री ( अब स्वा. विज्ञानभिक्षु ) से शिक्षा प्राप्त की है; वे ही जब उन्हें पत्र भेजते थे; तो लिखते थे- ' माननीय - गुरुवराः! नमस्ते ' यह कई वार मैंने उनके पत्रमें देखा है । या तो इसे अज्ञान मानना पड़ेगा, या साम्प्रदायिक प्राग्रह । वहुवचन में ' तेमयावे वचनस्य ' ( ८।१।२२ ) एकवचन ' तुभ्यं ' का स्थानी ' ते ' कैसे दिया जाय? | यदि यह ठीक है, तो ' घोरा ऋषयो नमो अस्तु एभ्यः ' ( अथर्व. २। ३५१४ ) ( सभापतिभ्यश्च वो नमो नमः ' ( यजु. १६।२५ ) गणपतिभ्यश्च वो नमो नमः । ( १६ ॥२५ ) इन मन्त्रों में वेदमें भी बहुवचन में ' नमस्ते ' क्यों नही दिया; अतः बहुवचन में तद्विरुद्ध ' नमस्ते ' का प्रयोग स्पष्ट श्रवैदिक-हठवाद है ।. ( ३ ) हम छठे निबन्धमें ' सम्मानमें ' बहुवचन ' इस विषय के बहुत से उद्धरण दे चुके हैं; तब उसमें ' नमस्ते ' का प्रयोग कैसे हो सकता है? कुछ बहुवचनके उद्धररण अन्य भी देते हैं-[ क ] श्रार्यसमाज में अनुसन्धान विशारद श्री भगवद्दत्तजी बी. ए. ने अपने ' भारतवर्षका बृहद् - इतिहास ' [ प्रथम भाग ] के अन्तमें CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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* श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * २३० [ पू. ३३८ ] स्वा. द. में बहुवचन दिया है - ' इति...... वैदिक धर्म- पुनः - संस्थापक - प्रार्थग्रन्थ - प्रचारक - नवभारत निर्मातृकाणां परम राजनीतिज्ञसहिष्णुप्रवर- श्रीमद्दयानन्द सरस्वतीस्वामिनां प्रशिष्येण इतिहासविद् - भगवद्दत्तेन ' । [ ख ] स्वा. द. जोने हिन्दीभाषा में ' व्यासजी बड़े विद्वान् सत्यवादी, धार्मिक, योगी थे ' ( स.प्र.११ समु.२० ε पृष्ठ ) यहां पर व्यासजीको बहुवचन दिया है । [ ग ] ' मृतश्चाहं पुनजीत: ' इत्यादि निरुक्तकारैरपि पुनर्जन्म-धारणमुक्तम् ' [ ऋ. भा. भू. २१६ पृष्ठ ] में स्वामीने निरुक्त-कारको ' यत्र यत्र महाभाष्य का रैर्योगविभागः कृतोस्ति [ १ | १ | ७ पृष्ठ ३४ ] यहां अपने प्रष्टाध्यायी भाष्य में महाभाष्यकारको बहुवचन दिया है । तब यदि स्वा. द. जी / बहुवचन में ' सब सभासदों को नमस्ते ' यह लिखते हैं जैसे कि श्रीशेरसिंहने लिखा है -- तब यह वेदविरुद्धता है । ' यूयं हि सोम! पितरो मम. स्थन ' [ ऋ. १६६८ ] यहां एक भी सोमको बहुवचन सम्मान में देकर उसके लिए ' यूयं ' प्रयुक्त किया गया है । ( ४ ) सम्मानितको युष्मद्का एकवचन देना उसका शास्त्रा-नुसार प्रशस्त्रवध माना जाता है । देखिये- जब युधिष्ठिरने कर-पीड़ा प्राप्त की, तब अर्जुन के गाण्डीव धनुषको निन्दा की । इससे अर्जुन अपनी प्रतिज्ञा के कारण युधिष्ठिरको मारने दौड़ा; तब भगवान् श्रीकृष्णने उसे उससे तो हटवा दिया, परन्तु युधिष्ठिरको मारनेका अन्य उपाय बताया । ' ततो वधं नार्हति -धर्मपुत्रस्त्वया प्रतिज्ञार्जुन! पालनीया । जीवन्नयं येन मृतो. भवेद्धि तन्मे निबोधेह तवानुरूपम् ' ( महा ० कर्णपर्व ६०।८० ) CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्ते अथवा हठवाद • हे अर्जुन! युधिष्ठिरका मारना ठीक नहीं । मैं उसमें जीवन्मृत करनेका उपाय बताता हूं । ' यदा मानं लभते माननार्हः; तदा स वै जीवति जीवलोके । यदा ऽवमानं लभते महान्तं, तदा जीवन्मृत उच्यते सः ' ( ६६८१ ) मान्यका अपमान करना ही उसका मारना है । उसका प्रकार भगवान् ने यह बताया कि-' त्वमित्यत्र भवन्तं हि ब्रूहि पार्थं! युधिष्ठिरन् । त्वम् इत्युक्तो हि निहतो गुरुर्भवति भारत! ' ( ६६८३ ) ' अवघेन वधः प्रोक्तो यद् गुरुस्त्वमिति प्रभुः ' ( ६ ९ ८६ ) यहां श्रीसातव लेकरने अर्थ लिखा है - ' हे भारत! तुम महाराजको श्रापके स्थानपर ' तुम ' ( तूं? ) कह दो, बस इतने हो से वे मर गये समझो । गुरुको ' तुम ' ( तूं? ) कहना ही उन्हें मार डालना है । ' त्वं ' यह युष्मद्शब्दके एकवचन त्वाम्, तुभ्यम् - ते ' इन सबका उप-लक्षण है । तभी आगे अर्जुनने युधिष्ठिरको त्वं त्वाम्, त्वत्, तव ' आदि शब्द कहे । जैसे कि -'मा त्वं राजन्! व्याहर ' ( कपर्व ७०।२ ) ' यते ह नित्यं तव कर्तुमिष्टम्......... वत्तः सुखं न वयं विद्म किञ्चित् ' ( १३-२१ ) इत्यादि । जब इस प्रकार अर्जुन युष्मद्के एकवचनले बड़े भाईको बुला चुका, तब फिर उसे पश्चात्ताप हुआ कि -- ऐसा करके मैंने मान्यका अपमान किया । इससे उसने अपनी आत्महत्या करनी चाही । उसका उपाय श्रीकृष्ण भगवान् ने उसे अपनी प्रशंसा करना ' बताया । इससे सिद्ध हुआ कि मान्यको युष्मं के एकवचनका कहना उसका अपमान करना है । जैसे कि -- याज्ञवल्क्यस्मृतिके प्रायश्चित्ताध्याय ( २ १-Gujarat. An eGangotri Initiative
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२३२ * श्रीसनातनधर्मलोक ( १-२ ) *
श्लोक ) की मिताक्षरा में कहा है- ' गुरुं जनकादिकं त्वं कृत्य - त्वम्
एवमात्थ त्वया एवं कृतम् - इत्येकवचनान्त - युष्मच्छब्दोच्चा-रणेन निर्भर्त्स्य..... पादप्रणिपातादिना प्रसाद्य ' । पराशरस्मृति ( १११५१ ) की विद्वन्मनोहराटीकामें लिखा है- ' यो गरिष्ठस्य त्वमित्येकवचनं प्रयुङ्क्ते, स तत्कालमेवतमभिवाद्य प्रसाद-येत् ' । विष्णुस्मृतिके ३२ वें अध्यायमें भी ऐसा निषेध प्राया है । केवल इन्हीं पुस्तकों में ऐसा नहीं कहा गया, अपितु महा-भारत अनुशासनपर्वमें तो इससे भी स्पष्ट कहा है – ' न जातु त्वमिति ' ब्रूयाद् आपन्नोपि महत्तरम् । त्वङ्कारो वा वधो वेति विद्वत्सु न विशिष्यते ' । ( अनुशासन. १६२।५३ ) श्रीसातवलेकरने इसका यह अर्थ लिखा है- ' आपद्ग्रस्त होके भी कदापि महत्-पुरुषोंको ' तुम ' ( तूं ) न कहे । विद्वानोंको तुम ( तूं ) कहने और वध करनेमें विशेष अन्तर नहीं है ' । ( ५ ) कई व्यक्तियोंका विचार है कि यहां पर अनादर-पूर्वक कहे हुए त्वङ्करका निषेध है, आदर - पूर्वक कहे हुए का नहीं ' । इससे उन्होंने दो प्रकारका ' त्वङ्कार ' बताया है । यदि दोनों में एककी विधि होती; तो स्मृतिकार वैसा विशेषरण लिखते, पर न लिखनेसे उसका सदाके लिए निषेध हो गया तभी तो महाभारतने कहा है -- ' न जातु त्वमिति ब्रूयात् ' ' जातु ' का अर्थ है -- कभी भी बड़ोंके लिए ' त्वं ' का प्रयोग न करो । जोकि पुराण - इतिहासमें उक्त स्मृतिवचनोंसे विरुद्ध बड़ेके CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्ते अथवा हठवाद लिए ' त्वं ' प्रादि का प्रयोग मिलता है उसमें- २३३ पुराणानां विरोधो यत्र दृश्यते । तत्र श्रौतं; ' श्रुति स्मृति. । प्रमारणं स्मृतिर्वरा ' ( ११४ ) इस व्यासस्मृतिके वचनसे तु द्वयोर्द्वये । ही अधिक माननीय होता है । यही दर्शनके भाष्य में बताई गई है कि होता है - लोकवृत्त बताना, पर करना धर्मशास्त्र ( स्मृति ) का काम पुराणस्य, लोकव्यवहारव्यवस्थापनं एकेन सर्वं न व्यवस्थाप्यते स्मृतिका बात ४।१।६२ वचन । सूत्रके न्याय-पुराण - इतिहासका वि लोक व्यवहारको व्यवस्था होता है ' लोकवृत्तमितिहास-धर्मशास्त्रस्य विषयः । तत्र एतानि प्रमाणानि - इति यथाविषयम् ( स्वस्वविषये ) नाक, कान प्रादि इन्द्रियादिवदिति ' । अर्थात् जैसे श्रांख, अपने - अपने विषयमें प्रधान हैं; इस प्रकार स्मृति - पुराणादि अपने - अपने विषय में प्रधान युधिष्ठिरकी द्यूत - क्रीडा कही हैं । इतिहासमें से अनुसरणीय गई है पर वह स्मृति - विरुद्ध होने नहीं । नामकररण में कहा है कि - पुरुषका नाम द्वचक्षर - चतुरक्षर रखा जादे पर अर्जुन, नकुल आदि विरुद्ध मिलते हैं; प्रार्थसामाजिक नाम ' संस्कार - विधि ' ( पृ ० ६२,६५,६६ जगत्में उनकी अपनी युग्मानि ) में ' द्वयक्षरं चतुरक्षरं वा, त्वेव पुंसाम् प्रयुग्मानि स्त्रीणाम् ' -जो पुत्र हो तो दो वा चार अक्षरका, जो स्त्री हो तो एक, तीन वा पांच अक्षरका नाम रखे ' ऐसी विधि होने पर भी तुलसीराम मूलशङ्कर प्रादि विषमाक्षर, अम्बाशङ्कर, आदि - पञ्चाक्षर नाम मिलते हैं; सत्यवती स्त्रियों के समाक्षर नाम मिलते हैं । पर इस विषय विधिशास्त्र हो देखना पड़ता है, किसीका में वृत्त ( श्राचरण ) Gujarat. An eGangotri Initiative
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* श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * २३३ २३४ महीं । सो विधिशास्त्र स्मृतियां हैं, पुराणोंके प्राचरण ( वृत्त ) नहीं । और फिर वादी लोग ' नमस्ते ' में तो ' ते ' को विधिशास्त्र करते हैं; शेष युष्मदके एक वचनोंको वे भी कहीं भी किसी प्रयुक्त भी भाषा में प्रयुक्त नहीं करते; सो उनके मतमें भी II उनकी अनादर - वाचकता स्पष्ट है, तब ' नमस्ते ' में भी उसका नय प्रयोग ठीक नहीं । श्रीमद्दपानन्द- प्रकाशके राजस्थानकाण्ड चतुर्थ सर्ग ५१७ पृष्ठमें कहा है- ' जगन्नाथने अपने अधमतम अप-राधको मान भी लिया; परन्तु कर्मगति, और फलभोगके विश्वासी महर्षिने ताड़ना तर्जना तो कहां; उसे ' तू ' तक नहीं कहा | वे गम्भीर - भावसे दया दर्शाते बोले; जगन्नाथ! मेरे ,२ इस समय मरनेसे मेरा कार्य सर्वथा अधूरा रह गया । आप नहीं जानते कि इससे लोकहितको कितनी भारी हानि हुई है ' । इससे सिद्ध हुआ कि - वादियोंके श्राचार्यके मत में भी युष्मद्का एकवचन अनादर वाचक है, और ' ग्राप ' कहना श्रादर-वाचक | तब ' नमस्ते ' में ' ते ' शब्द उन्हीं की मीतिसे भी अनादर-द्योतक सिद्ध हुआ । ( ६ ) फिर प्रश्न होता है कि - प्राचीन समय में बड़ेके लिए ' त्वं ' आदिका प्रयोग क्यों होता था? इसपर यह जानना चाहिए कि - परमात्मा के लिए तो सारी भाषाएं युष्मद् - शब्दका एकवचन प्रयुक्त करती हैं । उसे ' जिधर देखता हूँ, उधर तू ही. तू है ' कहा जाता है । अंग्रेजीमें भी परमात्माको Thou कहा जाता है । देवता तथा ऋषि - मुनि भी परमात्मा के समकक्ष होते हैं । अतः लोकोत्तर होनेसे एवं लौकिक - व्यवहारसे दूर होनेसे CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्ते अथवा हठवाद * २३५ उन्हें भी युष्मद्रका एकवचन दिया जाता है । उसमें यह है कि परम पिता परमात्मा कारण सामने हम अनीश्वर तथा देवता- ऋषि मुनियों के बालक हैं; और १०० वर्षके होते हुए भी हैं । छोटे बच्चे पिताको ' तू ' कहकर क्षुद्र श्रीबल्लालके बनाये भोज - प्रबन्धमें पुकारते हैं । सुरतेऽङ्गनानां कहा है- ' बाल्ये सुतानां, , स्तुतौ कवीनां, समरे भटानाम् । त्वंकारयुक्ता हि गिरः प्रशस्ताः ' अर्थात् बचपनमें बच्चोंकी स्त्रियोंकी, कविता में स्तुति करनेमें, सुरत- समयमें कवियों की, युद्धमें योद्धाओं की, ' त्वं ' ( युष्मद् - शब्द के एकवचन वाली ) की वाणी अच्छी लगती है । परन्तु जहां व्यवहारकी भी लिए ' तू ' आदि शब्द ठीक नहीं बात हो, वहां बड़े के हो सकते । लोकमें तो छोटा-बड़ा आदि व्यवहार होते हैं, पर परमात्मामें अलौकिकतावश यह भेद नहीं; क्योंकि वह सबसे बड़ा है । सबसे बड़े में लोकोत्तर होनेसे लोक व्यवहारसे भिन्न ' ' तू ' आदिका व्यवहार उक्त पदके अनुसार ठीक है, परन्तु लोकव्यवहारमें ऐसा करने से बड़ेकी अप्रतिष्ठा मानी जाती है । आप श्रार्य - समाजके हो रहे हुए उत्सबमें उसके सभापति को हिन्दी वा संस्कृतमें कहें कि क्या तू मुझे अपने प्लेटफार्म पर बोलने दे सकता है? ऐसा कहने पर सम्भव है कि-प्रार्यसमाजी कार्यकर्त्ता ' तू ' कहने वालेसे दण्डादण्डि शुरू करके उसका सिर ही फोड़ दें; अथवा कुछ भी न करें; तो वैसे पुरुषको असभ्य ही मान लें । परन्तु ' नमस्ते ' कहनेपर वे पुलकित हो जाते हैं - सो यह साम्प्रदायिक हठके अतिरिक्त अन्य Gujarat. An eGangotri Initiative
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i २३६ * श्री सनातनधर्मालोक ( १-२ ) * कुछ नहीं । जब वादी अपने लिए ' तू - तड़ाक ' नहीं सहते, तो दूसरों को भी ' नमस्ते ' न कहें । यह प्रत्यक्ष है कि- प्राजकल कोई किसी भी भाषा में, चाहे अंग्रेजी हो या उर्दु, संस्कृत हो, या हिन्दी, लौकिक मान्य पुरुष को ' तू ' ' तेरा ' ' तुझे ' आदि नहीं कहता! सभी उसे श्राप, श्रीमान्, श्रीचरण, तत्रभवान् आदि शब्द प्रयुक्त करते हैं । यदि कहीं युष्मद - शब्दका हिन्दी आदिमें बड़ेके लिए प्रयोग । करते भी हैं; तो ' तू ' न कहकर बहुवचन में हिन्दुस्तानी वा पंजाबी आदिमें ' तुम, तुस्सां, त्वाड़े ' आदिका प्रयोग करते हैं । इस कारण ' नमस्ते ' में वह दोष रह जाता है । मान्यको ' तू ' नहीं कहा जाता, अतएव बड़ेको ' नमस्ते ' नहीं कहा जा सकता । छोटेको ' तू ' कहा जानेपर भी उसे ' नमः ' नहीं कहा जाता;. अतः उसे भी ' नमस्ते ' नहीं कहा जा सकता । इस प्रकार समानको भी ' नमः ' नहीं कहा जाता, क्योंकि ' रणम् प्रह्वत्वे ' धातु से ' नमः ' बनता है । ' प्रहृत्व ' झुकने को कहते हैं, झुकना बड़े के श्रागे होता है; अतः ' नमस्ते ' का प्रयोग किसी भी दशा में ठीक नहीं । प्राचीन भाषाओं में, अथवा कवियोंकी गद्य - पद्यमय कविताओं तथा अंग्रेजीको पोइट्रियों में प्राचीन समयमें युष्मद्-शब्द की सभी विभक्तियोंके एकवचन प्रयुक्त होते थे । परन्तु वह इतिहास है; इतिहासका श्राचरण धर्मशास्त्रोंसे श्रविरुद्ध.. होनेपर ही स्वीकृत होता है, पर धर्मशास्त्रमें बड़ेके लिए युष्मद्-शब्दके एकवचनका निषेध है, यह हम पूर्व सूचित कर चुके हैं । * नमस्ते अथवा हठवाद # २३७ प्राचीन समय में ' तू ' श्रादिके प्रयोगका कारण यह है कि उस समय बाह्य लोक व्यवहारकी उन्नति श्रव जसो न थी । उस समयमें स्त्री - पुरुषोंमें नग्न रहने की प्रथा भी थी । श्रब स्वयं नंगा रहना तो दूर; यदि कुम्भ प्रदिम नंगे साधु श्रा जाते हैं; तो उनकी भी तीव्र धालोचना होती है । और छोड़िए यह देखिए कि वेदकालमें जो व्यवहार था; ' वह क्य, ग्राह्य वा गृहीत है? वेदमें हीन उपमाएं श्राती हैं; ' तनूत्यजेव तस्कस वनगूं ' ( ऋ. १०/४/६ ) यहां वेदने प्र करने वाले यजमान की बाहुनोंको चोरोंकी उपमा दी है; क्या श्राजकल ऐसी हीन उपमाएं गृहीत हैं? श्राजकल ' चाण्डाल. इव राजाऽसौ संग्रामेऽधिकसाहसः ' ऐसी होनोपमा अनुचित समझी जाती है । ' रेतो मूत्रं विजहाति योनिं प्रविशदिन्द्रियम् ( यजुः १६ १७६ ) ' यस्यामुशन्तः प्रहराम शेषम् ' ( अं. १४१२ । ३८ ) यह वेदने स्पष्ट बातें कही हैं; श्राजकल इनका कहना ६ ग्राम्य माना जाता है । निरुक्तकार कन्याके पतिको जामाता न कहकर उसे ‘ रेतः - सेक’'शुक्रका सींचनेवाला ( ३।४१६ ) कहता ।. द है; प्राजकल कोई ऐसा कह सकता है? इस प्रकार वैदिक कालमें प्रयुक्त भी युष्मद् का एकवचन इस समय श्रनादृत माना जाता है । इस काररण उसका प्रयोग नहीं किया जाता । तब वह ' नमस्ते ' में भी उपादेय नहीं । ( ७ ) उस समय कुछ अद्वैतवाद भी चालू था; सब एक दूसरेको परमात्मा समझकर उसके लिए प्रयुज्यमान ' तू, तेरा ' after प्रयोग करते थे । पर श्रद्वैतवाद व्यवहारिक नहीं CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२३८ G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * २७ क होता । जब ऐसा हो जाय, तो उस समय दूसरेको ' नमः ' भी तो नहीं कहा जा सकता; क्योंकि -- उस समय कौन बड़ा और वर्ष कौन छोटा? अतः अद्वैतवादमें उपासना भी नहीं हुआ करती । नाते तव अद्वैतवादमें भी ' नमस्ते ' प्रयोज्य नहीं । कइयोंका विचार हैं कि श्रद्वैतवादको छोड़िए, हम उसे मानते ही नहीं; पर सब नात्मा तो समान हैं; तब सबको ' नमस्ते ' कहना ठीक है, इसपर जानना चाहिए कि क्या आत्माकी समानतामें सब यन व्यवहार समान हो सकते हैं? तब तो ब्राह्मण चाण्डाल के नया भी प्रात्माके समान होनेसे उनसे व्यवहार में तारतम्य न डाल होना चाहिए, पर शास्त्रानुसार होता है । आपकी बहिन तथा प्रापकी स्त्रीके भी श्रात्मा के समान होनेसे क्या उन दोनोंमें न्यम् प्रापके सभी व्यवहार समान होते हैं? श्रात्मा तो चींटी तथा २१ हाथीका भी समान होगा; तब क्या आपका उनके साथ समान व्यवहार होगा? क्या आप उनको ' नमस्ते ' कहते हैं? यदि TR सभी समान हैं; तब कौन उच्च और कौन नीच; तब तो ता दूसरोंको नमस्कार की भी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि-क. नमस्कार उच्चको हुआ करती है, नीच वा समान को नहीं । हत इस विषय में ' नमः ' की मूलधातु बताकर हम स्पष्ट कर चुके हैं । III स्वा.द.जोकी सं. वि. वेदारम्भ के ६६ पृष्ठमें ' अमुकगोत्रो -पन्नोऽहं भवन्तमभिवादये ' इस वाक्यके द्वारा शिष्यका प्राचार्य को ' वन्दन ' कराया गया है, और प्राचार्यका शिष्यको ' प्रायु-ष्मान् विद्यावान् भव सौम्य इस वाक्यसे प्राशीर्वाद दिलाया गया है । यहां आत्माकी समानतामें एक - दूसरोंको वन्दना क्यों CC - 0. Ankur Joshi Collection jarat. * नमस्ते अथवा हठनाद २३६ नहीं कराई गई? क्यों नमस्कार प्राशीर्वाद दिलाया गया है? शिष्यने प्राचार्यको प्रायुका श्राशीर्वाद क्यों नहीं दिया? । श्राचार्यको ' त्वां ' न कहलाकर ' भवन्तं ' भवत् शब्दका प्रयोग क्यों दिखलाया गया है - इससे वादियोंका पक्ष निराकृत हो रहा है । ' आये हुए लोग [ वधूको ] ' सौभाग्यमस्तु - शुभं भवतु ' इस प्रकार श्राशीर्वाद देवें ' ( संस्कारविधि. पृ. १७०, १६२ ) ' स्वस्ति ३ ' ( पृ. १७५ ) यहां वधूको प्रागन्तुकोंका श्राशीर्वाद क्यों दिलाया गया? नमस्कार क्यों नहीं कराया गया? यदि सभी आत्मा समान हैं; इसलिए ' नमस्ते ' में युष्मद्का एक-वचन दिया जाता हैं, तो त्वं, त्वया, तुभ्यं, त्वत्, तव, वाय ' ने क्या अपराध किया है, इसका उपयोग वादी बड़ोंके लिए क्यों नहीं करते? इससे स्पष्ट है कि - वादी लोग अपने सम्प्रदायको व्यापकताके लिए ही अपने साम्प्रदायिक शब्द ' नमस्ते ' के प्रचारार्थ साम्यवादके बहाने कर रहे हैं, अन्य कुछ नहीं ।. व्यास आदि कवियोंकी कवितामें जोकि - युष्मद्का एक वचन दीखता है, उसमें एक यह भी कारण है कि - कवि काव्य - संसारका ब्रह्मा होता है । उस कविको सृष्टि उसकी प्रपेक्षा अवर होती है । अत्यन्त उच्च तथा अत्यन्त श्रवरको युष्मद्का एकवचन प्रायः दीखता है । इस कारण व्यासजीने अपनी इस कवित्वको प्रकृतिमें विवश होकर ' भवन्तं ' कहलवानेके योग्य पात्रको भी छोटेके द्वारा ' त्वाम् ' कहलवाया है । फिर भी समय - समयपर ' भवत् ' शब्द भी कहलवाया है An eGangotri Initiative
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२४० G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) ० जैसे कि - प्रर्जुन द्वारा युधिष्ठिरको ' ततो भवन्तमद्राक्षम् ' ( महा-भारत वनपर्व १७४।१० ) श्वः प्रभाते भवान् द्रष्टा ' । ( १७४ ॥ १६ ) । भवांस्तु धर्मसंयुक्त घृतराष्ट्र ब्रुवन् वचः ' ( उद्योगपर्व ६८ ) इस प्रकार वाल्मीकिरामायण में ' भवांस्तु सह वैदेह्या गिरिसानुषु रंस्यते ' ( २।३१।२७ ) लक्ष्मण श्रीराम को कहा है । श्राजकलकी किसी भी सभ्य भाषा में व्यवहार में मान्य के लिए युष्मद्का एकवचन प्रयुक्तं नहीं होता; अतः वह तिरस्कार-वाचक भी है, यही ' नमस्ते ' में ' ते ' का दोष है । नहीं तो फिर क्या कारण है कि आप लोग बड़ेको ' नमस्ते ' के प्रतिरिक्त संस्कृतमें त्वं, त्वां, त्वया, तुभ्यं, आदि और हिन्दी भाषा में तू, तूने, तुझे, ' न कहकर क्यों ' आपका, प्रापके, इत्यादि प्रयुक्त करते हैं, अंग्रेजीमें भी क्यों Thou, Thy, Thee, Thine ' इनका प्रयोग मान्यके लिए नहीं करते; ' You, Your, ' आदि का क्यों प्रयोग करते हैं? यदि आप ' नमस्ते ' में ' ते ' का अर्थ अपनी कल्पनासे ' आप ' कर दें; तो फिर ' तू, तुझे, ' वाचक शब्द कौन रहेगा? । स्वा. द. जीने भी अपने ' संस्कृतवाक्य प्रबोध ' में ' तेरे लिए, वा तेरा ' प्रादिके लिए युष्मद्रका एकवचन और ' आप ' के लिए ' भवत् ' का प्रयोग किया है; इस प्रकार श्री तुलसीराम - स्वामीकी संस्कृत-पुस्तकोंमें भी देखा जा सकता है । तब ' नमस्ते ' के ' ते ' का ' आपको यह श्रर्थ करना प्रसङ्गत है ' । म्रतः ' नमस्ते ' यह सत्कारवाद नहीं, किन्तु हठवाद है । यह जो चल निकला है, G नमस्ते अथवा हठवाद इसमें काररण लोगोंका संस्कृत भाषाको न जानना है । यदि साधारण लोगोंको पता लग जाय कि- ' नमस्ते ' में ' ते ' तू - तड़ाक है; तो वे इसका प्रयोग सर्वथा छोड़ दें । जो श्रार्यसमाज के संस्कृतज्ञ भी इसका प्रयोग सह लेते हैं; या इस पर ' अडियल. टट्ट ' बन जाते हैं; वह सब उदरदेवकी कृपा है; नहीं तो उनको भी वहांसे ' अन्तिम नमस्ते ' प्राप्त हो जावे! ( ८ ) हमारे पास श्रीसनातनधर्म - संस्कृतकालेज मुलतान में सन् १ ९ २७,२८ में एक धर्मपालसिंह अलीगढ़ जिले का श्रार्य-समाजी छात्र शास्त्रिश्रेणीमें पढ़ा करता था । वह प्रामा की हठीली प्रकृतिका उपासक होनेसे अध्यापकोंको ' नमस्ते ' हो कहा करता था । उसे समझाया गया कि - ' ते ( तुभ्यं ) ' से • अध्यापकों की अप्रतिष्ठा है - या तो तुम ' नमो वः ' कहा करो, - अथवा ' नमः श्रीमते ' कहीं । पर वह हठी छात्र न माना । ' नमस्ते ' उन्हें कहा ही करते था । उसी धर्मपालसहने मुझे. वहांके मुख्याध्यापक श्री पं. चूडामणिजी शास्त्रीके लड़के चन्द्र • * आर्यसमाजियों में हठ स्वाभाविक होता है - इस विषय में हम आर्यसमाज से मान्य स्वा. श्रद्धानन्द ( श्रीमुन्शीराम ) जीके लड़के श्री-इन्द्र विद्यावाचस्पतिकी साक्षी देते हैं । श्रार्यसमाजी श्रीरघुनन्दन शर्माकी ' वैदिक - सम्पत्ति ' की आलोचनामें अपने से सम्पादित ' अर्जुन ' पत्र ( ४ / १० / ३४ तिथिके अ ) में उन्होंने लिखा था- ' वैदिक - सम्पत्तिके लेखक • समाजिक विद्वान् हैं; परन्तु उनमें उन ( श्रार्यसमाजियों ) का सा हठ नहीं, है ' । विद्यावाचस्पतिजीके इस लेख से भी श्रार्यसमाजियोंमें हठ सिद्ध होता है । .स ० ध ० १६ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative