सनातन धर्मालोक १-२ — पृष्ठ 131–140

सनातन धर्मालोक १-२ · पृष्ठ 131–140

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२४२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) कुमारकी – जो उससे श्रायुमें छोटा था, और विशारद श्रेणी में पढ़ा करता था - शिकायत की, कि यह मुझसे श्रायु में तथा श्रेणी में छोटा है, पर मुझे ' तू, तूने ' कहा करता है, कृपया इसे समझा दीजिए । मैंने कहा कि हम अध्यापक लोग तो तुमसे वमें, विद्यामें, और प्रायु - प्रनुभव श्रादिमें बड़े हैं; फिर भी तुम हमें युष्मद्रकी चतुर्थीके एकवचन ' ते ' का ' नमस्ते ' में प्रयोग करके हमारी मानहानि नहीं समझते; तो तुम छात्र होते हुए भी एक छोटे लड़के के ' तू, तूने, तेरा ' कहने पर अपनी मानहानि कैसे समझते हो? बस उस समय उस २०-२५ वर्षीय छात्रका मुख फोटो खींचने के योग्य ( विवर्ण ) हो गया, फिर कभी उसने उस चन्द्रकुमारकी शिकायत नहीं की । इस प्रकार एक धर्मपालसिंह क्या, बल्कि सभी प्रार्थ-समाजियोंके विषय में अनुभव किया जा सकता है । यदि प्राप उन्हें ' त्वं, तुभ्यम्!, तू, तूने आादि कहें; तो बिगड़ेंगे, झगड़ेंगे; पर ' नम को नहीं छोड़ेंगे - यही होता है ' हठवाद ' । क्या वे छोटे लड़के को नहीं समझाते कि बच्चे! बड़ेको तू तुझे न कह-कर ' आप आपको ' कहा कर ' । क्या वे संस्कृत छात्रको पत्र व्यवहार के लिए नहीं समझाते कि- मान्यको श्रीमान्, तत्रभवान्, श्रीमन्तः इत्यादि लिखा करो, ' त्वं तुभ्यम् ' आदि नहीं । फिर भी यदि ' नमस्ते ' कहना नहीं छोड़ते - छुड़वाते; तो यह ' हठवाद ' की. पराकाष्ठा हुई । [ 8 ] कई आग्रही कहते हैं कि- ' प्रकृति युष्मद्का एकवचन सिखलाती है, इसीलिए ही छोटा बच्चा पिताको ' तू ' CC - 0. Ankur Joshi Collection G नमस्ते अथवा हठवाद # २४३ कहता है, तब ' नमस्ते ' में ' ते ' भी प्रकृतिका प्रसाद है ' । यह भी ठीक नहीं । यदि यही व्यवहार प्राकृतिक है, तो फिर आप लोग ' आप ' ' श्रीमान् ' आदि छुड़ाकर ' तू, तूने ' का प्रचार क्यों नहीं कराते? यदि प्रकृति में आपका आदर है; तो आप लोग नंगे क्यों नहीं रहते, क्योंकि - प्रकृतिका पुत्र छोटा बच्चा नंगा हो तो रहता है । प्रकृति तो भाई - बहिनके मैथुनमें भी कोई बाधा नहीं डालती । तब भाई - बहिनका विवाह क्यों नहीं मानते? यदि कहो कि यह पशुकर्म है; तो पहला बचपनका कर्म है । बड़प्पनमें बचपन वाले व्यवहार हेय ही होते हैं; तब ' नमस्ते ' इस बचपन वाले व्यवहारको छोड़िये । [ १० ] वास्तव में ' नमस्ते ' किसी भी प्रकार ठीक नहीं । छोटा बड़ेको ' नमः ' तो कहता है, ' ते ' नहीं कहता । बड़ा छोटे को ' ते ' ( तुभ्यं ) तो कहता है. पर ' नमः ' नहीं कहता । क्योंकि यह ' रणम् प्रह्वत्वे ' धातुसे बना है । प्रह्वीभावका प्रथ है, सिर झुकाना । जैसे- ' प्रह्वोऽभवद भ्रातुरुपह्वरे सः ' ( वनपर्व १६५।५ ) यहां अर्जुन युधिष्ठिरके प्रागे झुका । ' स तत् सर्वमशे-वेण श्रुत्वा प्रह्नः कृताञ्जलिः ' ( ३।२८२।१५ ) यहां सुग्रीव लक्ष्मरणके आगे झुका ' | ' पश्चाच्चैव स कृष्णस्य प्रह्वोऽतिष्ठत् कृताञ्जलिः ' ( उद्योगपर्व ७१६ ) यहां अर्जुन श्रीकृष्णके श्रागे भुका । लेकिन छोटे आगे सिर नहीं झुकाया जाता । समान लोग भी कदाचित् परस्पर ' ते ' कह भी डालें, पर उनमें भी परस्पर नमस्कार करना शास्त्रीय नहीं । प्राचीन - पुस्तकोंमें भी समानोंका आपसमें ' नमोवाद ' नहीं कहा गया; किन्तु Gugarat An eGangotri Initiative

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२४४ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * कुशलवाद ही कहा गया है, जैसा कि - श्रापस्तम्बधर्मसूत्र में — ' कुशलमवरवयसं वयस्यं वा पृच्छेत् ' ( १।१४।२३ ) । इस प्रकार. मनुजीने भी कहा है- ' ब्राह्मणं कुशलं पृच्छेत् ' ( २।१२७ ) यह समान - आयुवालोंके लिए है । बड़ेके लिए तो वहां कहा है-' प्रत्युत्थायाभिवादयेत् ' ( २१११६ ) कि उठकर उसका-अभिवादन करे- ' ज्यायांसमभिवादयन् ' ( मनु. २।१२२ ) । इसलिए २।१२७ पद्य में श्रीकुल्लूकभट्टने लिखा है - ' समागम्य -: समागमे कृते श्रभिवादकमवरवयस्कं समानवयस्कम्नभिवाद-कमपि ब्राह्मणं कुशलं पृच्छेत् ' । जो लोग ' नमः ' का ' यथायोग्य सत्कार ' अर्थ कहते हैं, वे काव्य, कोष, व्याकरण आदिके विरुद्ध अर्थ करके ठगते हैं । ' नमस्ते ' कहने वाले ' नमस्तुभ्यम् ' क्यों नहीं कहते - यह भी प्रष्टव्य है । यदि इसमें अवैदिकता कही जाए; तो यह ठीक नहीं. वेद में ' नम एवास्तु तुभ्यम् ' ( अथर्व. १।१३।३ ) भी दीखता है । यदि इसमें प्रतिष्ठा है, तो ' नमस्ते ' में भी अप्रतिष्ठा है । [ ११ ] कई दुराग्रही ' नमस्ते ' इस प्ररणामके उत्तर श्रीशीर्वाद में भी मान्य - पुरुष से ' नमस्ते ' सुनना चाहते हैं; -ऐसे पुरुष भी भ्रान्त हैं । प्राशीर्वाद में ' शमस्ते ' या कुछ और. कहना चाहिये, जैसेकि - देवेन्द्रनाथ के दयानन्द - जीवन चरित्रके: ७ माध्यायके १३५ पृष्ठ में लिखा है- ' दोनों युवकोंने जाकर स्वामीजीको अभिवादन किया, स्वामीजीने ' प्रायुष्मान् भव ' कहनेके अतिरिक्त और कुछ न कहा ' इस कारण ' नमस्ते ' नहीं कहना चाहिए । महाभारत आदिपर्व में कहा है- " अहं. हि * नमस्ते अथवा हठवाद २४५ पूर्वी वयसा भवद्भयस्तेनाभिवादं भवतां न प्रयुजे । यो विद्यया, तपसा, जन्मना वा वृद्धः स पूज्यो भवति द्विजानाम् ( ६२ ) इसका अर्थ श्रार्यसमाजी पण्डित सातवलेकरने । इस प्रकार लिखा है - ' मैं तुमसे अवस्थामें ज्येष्ठ हूँ, इस हेतु तुमको नमस्कार नहीं किया । क्योंकि - जो जऩ विद्या या तपस्या श्रथवा जन्मसे वृद्ध होते हैं; वही द्विजातियोंमें पूजनीय होते हैं । इससे स्पष्ट है कि - मान्यको तो नमस्कार की जा सकती है । जैसे कि -प्रापस्तम्बधर्मसूत्र में कहा है – ' पूजा वरगंज्यायसां कार्या, वृद्धतराणां च ' ( १११३ ।२ - ३ ) ' गुरुभ्यस्त्वासनं देयम-भिवाद्याभिपूज्य च । " नासीनः स्यात् स्थितेष्वेषु श्रायुरस्य न हीयते ( महा. अनुशा. १६२।४५-४६ ) परन्तु अपने से छोटे को वह मान्य नमस्कार नहीं कर सकता । जैसे कि अत्रिस्मृतिमें कहा है- ' हीनवर्णे चः यः कुर्याद् प्रज्ञानाद् अभिवादनम् । तत्र स्नानं प्रकुर्वीत ' ( ३११ ) यहांपर प्रायश्चित्त कहा है । तभी तो महाभारत में कहा है- ' एवं सर्वान् कुरून् वृद्धान् श्रभिवाद्य यतव्रताः । समालिङग्य समानान् वै बालैश्चाप्यभिवादिताः इसका अर्थ श्रीसातवलेकरने यह किया है— ' प्रनन्तर व्रतशील पाण्डव भीष्म, कृपादि वृद्धोंके पांव छूने लगे । इस प्रकार अपने से बड़े सब कौरवोंको प्रणाम किया; और अपने जोड़ियों को गले लगाया । श्रागे बालकोंका प्ररणाम लेकर वारणावत नगर को, चले ' । इस प्रकार वनपर्व में भी लिखा है; जिसका अर्थ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 133

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२४६ G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) श्रीसातवलेकरने इस प्रकार लिखा है- ' तब बुद्धिमान् श्रर्जुनने पहले धौम्य, फिर युधिष्ठिर और पीछे भीमसेनके चरणोंको इस छूकर प्रणाम किया । उसी समय नकुल, सहदेवने अर्जुनको प्रणाम किया । - ' धौम्यस्य पादौ अभिवाद्य धीमान् श्रजातशत्रो-स्तदनन्तरं च । वृकोदरस्यापि च वन्द्य पादौ माद्रीसुताभ्याम-भिवादितश्च ' ( १६५।४-५ ) । ' ज्येष्ठानप्यभिवादयन् । यवीयस-( कनीयस ) व कुशलं ' ( उद्योगपर्व ५६।१६ ) इससे स्पष्ट हो गया कि - छोटे ही बड़े को नमस्कार करें, बड़े छोटेको नहीं । बड़े छोटेसे वा समानोंसे कुशल पूछें । इसी तरह श्रादिपर्व में भी म. कहा है- ' अभिवाद्याभिवाद्यांश्च सर्वेश्व प्रतिनन्दितः । कुमारैः स्य सर्वशो वीरः सत्कारेणाभिचोदितः । समानवयसः सर्वान् श्रा-श्लिष्य स पुनः पुनः । ( २२०।२०- २१ ) यहां बड़ों को नमस्कार तथा समानोंको गले लगाना कहा है । इसी भांति ' अभिवाद्य नत्र ततः पादौ मातापित्रो विशांपते!... अभिवादितः कनोयोभिर्भ्रा-तृभिर्भ्रातृनन्दनः ' ( ३।२५७।७-८ ) ततोऽभिवाद्य जननीं ज्येष्ठ च भ्रातरमेव च । कनीयसः समाघ्राय शिरःसु अरिमर्दनः ' ( १ । १२६३० ) यहां पर छोटोंका बड़ोंको अभिवादन ( नमस्कार ) लर कहा गया है । इसी प्रकार श्रीमद्भागवत में कहा है- ' युधिष्ठिरस्य बत भीष्मस्य कृत्वा पादाभिवन्दनम् । ( श्रीकृष्णः ) फाल्गुनं परिर-म्याथ यमाभ्यां चाभिवादितः । ( १०२५६२४ ) यहां श्रीधर -र्य स्वामीने लिखा है - ' ज्येष्ठयोः [ युधिष्ठिर - भीमयोः ] प्ररणामं कृत्वा, समेन [ श्रर्जुनेन ] श्रालिङ्ग्य, कनिष्ठाभ्यां ( नकुलसह-CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्ते अथवा हठवाद G २४७ देवाभ्याम् ) अभिवन्दितो बभूव ' । इससे प्राचीन कालमें छोटोंकी बड़ोंको चरण - वन्दना, बड़ोंकी छोटोंको ग्राशी: और समानों को प्रालिङ्गन स्पष्ट है; तब ' सभीका प्राचीनकाल में परस्पर ' नमस्ते ' रूपमें समान व्यवहार या - यह बात वादियोंकी खण्डित हो गई । इसी प्रकार वाल्मीकि रामायण में ' ततो विमानाग्रगतं भरतो भ्रातरं तदा । ववन्दे प्रगतो रामं ( ६ । १२७३७ ) मात्रुघ्नश्च तथा रामम् श्रभिवाद्य सलक्ष्मरणम् । सीतायाश्चरणौ वीरो विनयादभ्यवादयत् ' ( १२७ | ४८ ) रामो मातरमासाद्य विवरण शोकर्काशितान् । जग्राह प्ररणतः पादौ, ( ४ ९ ) में भी बड़ोंको वन्दना की गई है, छोटोंको नहीं । प्रमाण इतने हैं कि - वादी देखते - देखते थक जाएं । इससे स्पष्ट है कि - बड़ा छोटेको वा समान समानको नमस्कार नहीं कर सकता । शताब्दी - संस्करण में प्रकाशित हुए प्रार्याभिविनय, स.प्र. आदि ग्रन्थोंमें स्वा. द. के स्वहस्तलिखित पत्रका चित्र है । वहां लिखा है- ' स्वस्ति श्री अस्मत्प्रियवराय श्रीयुत श्याम जिवर्मणे दयानन्दसरस्वती - स्वामिन आशिषो भूयासुस्तमाम् ' यहां पर स्वा. द. जीने एक क्षत्रियको आशीर्वाद लिखी है, ' नमस्ते ' नहीं । तब आशीर्वाद में ' नमस्ते ' कट गया । शताब्दी-संस्करणके प्रथम भाग १६ पृष्ठमें पंडित ज्वालादत्तजी, प्रानन्दित रहो, ( २२।१०।१८८१ ) । १७ पृष्ठमें ' प्रबन्धकर्त्ता मुन्शी समर्थदानजी, आनन्दित रहो, ( भाद्रवदि १२ शनि सं. १ ९ ३ ९ ) । १८ पृष्ठमें ' पंडित सुन्दरलालजी श्रानन्दित रहो ' ११ जून १८८२ ) इन्हीं व्यवहारोंसे आशीर्वाद में स्वामीजीने Gajarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 134

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२४८ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * ' नमस्ते ' को खण्डित सिद्ध कर दिया । स्वामीने वैदिक - संस्कार में ब्रह्मचारी द्वारा प्राचार्यको ' भवत् ' शब्द द्वारा अभिवादन कराया है, और प्राचार्य द्वारा बटुको श्रायुकी प्राशी: दिलवाई है । तब दोनों स्थान ' नमस्ते ' का प्रयोग अवैदिक सिद्ध हुप्रा । नहीं तो यदि दोनों स्थान ' नमस्ते ' कहना ही प्रार्षशैली है; तो वैदिक संस्कार में स्वामीने अनार्षशैली - प्रवैदिक - शैली कैसे चलाई? यदि यही वैदिक-शैली है; तो ' नमस्ते ' - परिपाटी अवैदिक - शैली सिद्ध हुई । वस्तुतः संस्कारविधिमें स्वामीसे निर्दिष्ट यह व्यवहार निर्मूल नहीं है । मनुजीकी भी इसमें साक्षी है- ' अभिवादात् परं विप्रो-ज्यायांसमभिवादयन् । प्रसौ नामाहमस्मीति स्वं नाम परि कीर्तयेत् ' ( २।१२२ ) यहां अभिवादनप्रकार बताया गया है । ' अब प्रत्यभिवादनमें श्राशी: देखिये- ' आयुष्मान् भव सौम्येति वाच्यो विप्रोऽभिवादने ' ( २।१२५ ) ' परन्तु वादी लोग दोनों स्थलोंमें ' नमस्ते ' कहते हैं - यह सब शास्त्रोंसे विरुद्ध है । ' नमस्तेस्त्वायुष्मानेधि देवदत्त ३ ' अथवा ' नमस्तेस्तु देवदत्त ३ ' इस प्रत्यभिवाद - वाक्यको अपनी ' नमस्ते की प्राचीनता ' ( ३७ पृष्ठ ) में दिखलाते हुए श्रीशेरसिंहको जहां मनुस्मृतिसे विरुद्धता सिद्ध हुई; वहां स्वा. द. जीसे भी; क्योंकि स्वामीने अपने वेदारम्भ - संस्कारमें भी वैसा नहीं लिखा, तथा ' प्रत्यभिवादेऽशूद्रे ' इस पाणिनि - सूत्रकी व्याख्या में भी ' अभिवादये, श्रायुष्मानेधि, इस रूपमें ही लिखा है, ' नमस्ते ' दोनों चोर नहीं लिखा । तब श्रीशेरसिंहके प्रत्यभिवाद- वाक्यमें टिको प्लुत नहीं होगा; * नमस्ते अथवा हठवाद २४६ क्योंकि- ' नमस्ते ' प्रत्यभिवादवाचक ही नहीं । नहीं तो उसको इस विषयका प्रसारण दिखलाना चाहिए, पर वैसा प्रमारण ' शशशृङ्ग ' एवं ' काकदन्त ' ही है । और यह भी स्मर्तव्य, कि- प्रत्यभिवाद वाक्य में वाक्यको टिको उदात्त है । प्लुत ( पा. ८।२२८२ ) करना पड़ता है, पर ' नमस्ते ' में वह असम्भव है; क्योंकि उसमें ' अनुदात्तं सर्वमपादादौ ' ( पा. ८.२११८ ) इससे ' ते ' अनुदात्त होता है, वह उदात्त कैसे हो सकता है? अपनी इच्छानुसार परिवर्तन करनेपर तो ' दुष्टः शब्दः स्वरतो वर्णंतो वा मिथ्याप्रयुक्तः यजमानं हिनस्ति ' यह महाभाष्य-प्रोक्त दशा हो जावेगी । तब अभिवादन- प्रत्यभिवादन दोनोंमें ' नमस्ते ' कहना वेद - वेदाङ्गसे विरुद्ध है । जो लोग अभिवादन के उत्तरमें प्रत्यभिवादनकी ' आयुष्मान् भव ' वाली शैली नहीं जानते; मनुजीने उन्हें शूद्र - जैसा बताया है - ' यो न वेस्त्य-भिवादस्य विप्रः प्रत्यभिवादनम् । नाभिवाद्यः स विदुषा यया शूद्रस्तथैव सः ' । ( २।१२६ ) यहां मनुजीने दोनों श्रोर समान व्यवहार ( नमस्ते ) करने वालोंको कैसा सीधा किया है? मनुस्मृतिको स्वामीजी सृष्टिके श्रादि- कालमें बना हुआ मानते a हैं; देखिए स. प्र. ११ समु. का प्रारम्भ । इस प्रकार श्रीयास्क ( निरुक्त ३।४।२ ) आदि अन्य भी । तब मनुप्रोक्त प्रणाम-आशीर्वादका प्रकार सृष्टिका आदि वैदिक कालके सिद्ध हुआ । वेद में यदि मनुष्य परमात्माको नमस्कार करता है, तो परमात्मा मनुष्यको श्राशीः ही देता है, नमस्कार नहीं । स्वा. द. जीने ऋ.भा.भू. के १५६ पृष्ठमें परमात्माकी ओरसे जीवोंको CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 135

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* श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * २५० श्राशीः देने वाले मन्त्र लिखे हैं; पर उनमें कहीं स्वा. द.के हम उद्धरण पूर्व दे चुके हैं । श्रब उनका श्रादर्श देते हैं । हिन्दी भाषा - सारके १ ९ ८४ पृ ० ७०-७१ ) में स्वा. द. जीका एक ' ला. जीवनदासजी, आनन्दित रहो । ' नमस्ते ' नहीं | एक और भी गद्य - भाग ( सं. पत्र छपा है-पाककर्ताका कोई दृढ निश्चय नहीं हो सकता, क्योंकि- पाचक संब वर्णोंमें होते हैं । अब तो इसमें सनातनका व्यवहार ही प्रमारण हो सकता है | जो आप लोगोंमें यज्ञोपवीत होता, और घरावट श्रर्थात् - विधवाको पुन: दूसरेके घर में बैठाना नहीं होता, तो शूद्रवर्णमें गरना आप लोगोंकी नहीं । " " सबसे मेरा आशीर्वाद कहियेगा ' । ( दयानन्द - सरस्वती ) । इस पत्र कई बातें पता लगती हैं । एक यह स्वामी शूद्रको यज्ञोपवीत नहीं मानते थे, २ री विधवा - विवाहको वे शूद्रों में मानते थे, द्विजोंमें नहीं । ३ रो रोटी बनाना केवल शूद्र वर्णका कार्य नहीं । ४ थी, सन्दिग्ध - स्थल में सनातन-व्यवहार ही प्रमारण होता है । पूवीं - वर्ण - व्यवस्था. जन्मसे ही होती है, गुण - कर्म से नहीं । नहीं तो मूर्ख - शूद्रों का ही पाककर्म नियत होता; ब्राह्मणादिका नहीं । ६ ठी - श्राशीर्वाद में ' प्रानन्दित रहो ' लिखो, ' नमस्ते ' नहीं । ७ वीं - अपने से छोटों को आशीर्वाद देना चाहिए, ' नमस्ते ' नहीं कहना चाहिए; इससे स्पष्ट है कि- स्वामीका भी ' नमस्ते ' में पक्षपात नहीं । तभी तो प्रथम-स ० प्र ० में उसका कहीं गन्धतक भी नहीं । इसीलिए उनकी संस्कारविधि तथा वेदभाष्य आदि पुस्तकोंके स्वामी जीकी मृत्यु CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्ते अथवा हठवाद २५१ से पीछेके छपे संस्करणों में लेखरामादिने ' नमस्ते ' प्रक्षिप्त कर दिया । यदि स्वामीने स्वयं कहीं लिखा भी हो; तो वह साध्य-पक्ष होगा, ' सिद्ध ' नहीं । तब ' नमस्ते ' के प्रत्युत्तर- श्राशीर्वादमें भी ' नमस्ते ' का निराकरण हो गया । ( १२ ) परन्तु कई हठी कहते हैं - ' नमस्ते ' का प्रयोग प्रणाम, आशीर्वाद एवं तिरस्कार सभी स्थानोंमें हो सकता है । प्ररणाम- अर्थमें ' नमः ' तो प्रसिद्ध है ही, प्राशीर्वाद अर्थ में ' नमः ' का अर्थ ' अन्न ' है, तुम्हें प्रन्न प्राप्त हो । तिरस्कार में ' नमः ' का अर्थ ' वज्र ' है ' | इसपर जानना चाहिए कि- ' नमः ' के प्ररणाम अर्थमें तो कोई आपत्ति नहीं; लेकिन शेष प्रथमें दोष है । ' नमः ' का ' अन्न ' और ' वज्र ' अर्थ वैदिक - कोष एवं वेदमें होता है. लोक-में नहीं! लौकिक - कोषोंमें पह श्रर्य नहीं । लोक व्यवहारमें लोकभिन्न - वैदिक शब्दोंका प्रयोग नहीं होता, इसीलिए अष्टाध्यायीमें लौकिक - वैदिक प्रक्रियानोंका परस्पर भेद ही रखा गया है । वेदमें ' देवैः, नदीभि: ' आदि लौकिक शब्द चौर ' देवेभिः, नद्यैः ' श्रादि वैदिक शब्द प्रयुक्त होते हैं; वेदमें ' भाषायां ' वाले प्रयोग प्रयुक्त नहीं होते; और वे भी कभी बाहुलकसे प्रयुक्त हो जाते हैं, पर लोकमें केवल ' देवः, नदीभिः ' श्रादि लौकिक - शब्द प्रयुक्त होते हैं, ' देवेभिः, नद्यः ' श्रादि छान्दस - शब्द प्रयुक्त नहीं होते । इसी प्रकार वेदमें जिस पदका लोकभिन्न अन्य विशेष अर्थ हो, उसका लोकमें व्यवहार नहीं होता । जैसे ' पुरीष ' शब्द Grat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 136

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२५२ G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) ० का लोकमें ' विष्ठा ' अर्थ है । पर वैदिक - निघण्टु में ( १।१२ ) पुरोष, शुक्र, रेतः श्रादि शब्द जलवाचक हैं । तब क्या ' नमस्ते ' - वादी जलपानके स्थान में ' पुरीषपान ' वा ' रेतःपान ' प्रयुक्त करते हैं? जैसे लोकमें ' पुरीष ' शब्दका जल अर्थ में व्यवहार नहीं; इस प्रकार ' रेतः ' श्रादिका जल अर्थ में व्यवहार केवल वेदमें ही होता है, लोकमें नहीं, इसलिए लोक में एतदादिक - शब्दोंका वैदिक - अर्थ व्यवहृत नहीं होता, वैसेही ' नमः ' शब्दका ' अन्न ' ( निघण्टु २१७ ) और वज्रं ( निघं. २ । २० ) यह दोनों अर्थ वैदिककोष और वेदमें होते हैं, लोकमें नहीं । लौकिक साहित्यमें तो आशीर्वाद अर्थ में तथा तिरस्कार-: अर्थमें ' नमः ' का प्रयोग कहीं नहीं मिलता; इसलिए लोकमें ' नमः ' का आशीर्वाद वा तिरस्कार अर्थ में प्रयोग दुराग्रहमात्र हैं । वेदमें भी आशीर्वाद - अर्थमें ' नमस्ते ' व्यवहृत नहीं । इस लिए स्वा. द.के बनाये ' अव्ययार्थ ' में ' नमस् ' अव्ययको ' नति ' अर्थमें ‘ नमस्कुर्यान्मातरम् ' इस उदाहरणमें दिया गया है, आशीर्वाद अर्थ में नहीं; माताको प्राशीर्वाद नहीं दी जाती । तभी स्वा. द. जी की सं. वि. विवाह- प्रकरण ( पृ. १७५ ) की टिप्पणी में ' नमस्ते ' अभिवादन अर्थात् वन्दनमें ही माना गया है, आशीर्वाद अर्थ में नहीं । छोटे - बड़ोंका श्रापसमें वन्दन नहीं होता, किन्तु छोटोंका बड़ोंको प्रणाम और बड़ोंकी छोटों को श्राशीः हुआ करती है । यह हम पूर्व बता चुके हैं कि - छोटे-बड़ोंका समान व्यवहार नहीं हुआ करता । * नमस्ते अथवा हठवाद * २५३ आशीर्वाद मुख्य - वस्तु आयुका देना पड़ता है, जैसाकि मनुजीने कहा है ( २।१२५ ) । अन्नका श्राशीर्वाद किसी भी ग्रन्थ में नहीं देखा गया । ' नमः ' का ' आयु ' श्रर्थ कहीं भी नहीं जोकि - ' सार्वदेशिक ' ( मई १ ९ ४७, पृष्ठ १५३ ) श्रीशिव- । पूजनसहने लिखा है- ' दयानन्दजीने निघण्टुका सहारा लिया है, उसमें ' नमः ' के अर्थ है - प्रायु, ब्रह्म, बर्चः, यशः, श्रन्नम् ' ( निरु. ३।९ ।१३ ) यह जनताकी प्रांख में धूल झोंकना है; क्योंकि — यह अर्थ ' नमः'के नहीं, यह तो निघण्टु ( २/७ ) मैं ' अन्न ' के पर्यायवाचक लिखे हैं, वहां ' प्रायु, ब्रह्म, वर्चः, यश: ' यह अन्न वाचक ही बताये गये हैं; पर जैसे यह शब्द लोक-में अन्न अर्थ में प्रयुक्त नहीं होते; वैसे ' नमः ' भी लोकमें ' अन्न ' अर्थ में प्रयुक्त नहीं होता; तब लोकमें उस अर्थ में ' नमः ' का प्रयोग निरस्त हो गया । तब बलात् प्राशी: - अर्थकी सिद्धि ... के लिए ' अन्न ' अर्थ करना वादियोंका अपने श्रसत्य - पक्षकी सिद्धिके लिए केवल बहानेबाजी ही है, वास्तविकता नहीं; क्योंकि - किसी प्राचीन पुस्तक में ' नमः ' का ' अन्न ' श्रर्थ लेकर श्राशीर्वाद प्रथं नहीं माना गया । और फिर इस पक्ष में यह भी नहीं जाना जा सकता कि यहां नमस्कार किया गया है, वा आशीर्वाद दिया गया है, वा वज्र मारा गया है । जबकि -तटस्थ पुरुष व्यवहार - भेद नहीं जान सकता कि इनमें कौन गुरु, और कौन शिष्य है? कौन इसकी बहिन है और कौन स्त्री है । क्योंकि दोनों ही ' नमस्ते ' का प्रयोग करेंगे । यदि कहा जाय फि-शब्दका अर्थ हमारे अधीन है; हम ' नमः ' का अर्थ ' प्रणाम ' न CC - 0. Ankur Joshi Collection Gajarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 137

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२५४ * श्री सनातनधर्मालोक ( १-२ ) करके ' यथायोग्य व्यवहार ' अर्थ करेंगे - यह भी ठीक नहीं । जिस शब्द के जो अर्थ प्रादि- कालसे प्रयुक्त हैं, उससे अन्य अर्थ बदलनेमें हमारा अधिकार नहीं । नहीं तो वादियोंको कोई ' मूढ ' शब्दसे बुलावे, और कहे कि मैंने इसका अर्थ ' समझदार ' II विचारा है, तब क्या उसे, वादी स्वीकृत कर लेंगे? जब कि संसार में परसा, परसू, परसराम इस प्रकार व्यवहारका अन्तर है, जब कि - गुरु - शिष्य, पिता - पुत्र, पति-पत्नी, लघु - गुरु आदि सम्बन्ध - भेद हैं, और तदनुसार व्यवहार-भेद है; तब सबका अभिवादन - प्रत्यभिवादन में समान व्यवहार. वा समान पद नहीं हो सकता । ' अमुकगोत्रा श्रहं भोः! भवन्तमभिवादयामि ' इस वावयसे स्वा. द. जीने सं. वि. ( गर्भाधान ४२ पृष्ठ ) में ' ऐसा वाक्य बोलके पतिको वन्दन श्रर्थात् नमस्कार करें ' ( पृ. ४२-४३ ) पतिको पत्नीका नमस्कार i कराया है, और उसे ' भवत् ' शब्द कहलाया है । गोभिलमें र विवाह प्रकरण में भी स्वा. द. ने ' अहं भो अभिवादयामि ' वधू - वर माता - पिता आदि वृद्धोंको प्रीतिपूर्वक नमस्कार करें कहलाया है, और फिर वृद्धों द्वारा वर - वधूको नमस्कार नहीं कराई गई । तब ' नमस्ते ' कहना कहलाना शास्त्र - विरुद्ध है । यहांकी टिप्परगी स्वा. द. के किसी शिष्यने प्रक्षिप्त कर दी है । अथवा स्वामीकी भी हो; पर उस टिप्पणी में तो ' नमस्ते ' का अभिवादन वा वन्दन माना है, तब इसका ' आशीर्वाद ' 1 प्रर्थ स्वामीके मतमें भी न होनेसे इसका प्रयोग गलत सिद्ध हुप्रा । पतिको स्त्री ' तू ' कैसे कहे? सं. वि. विवाह पू. १५३ CC - 0. Ankur Joshi G नमस्ते अथवा हठवाद * २५५ की टिप्पणी में स्वामीने पतिद्वारा बघूको ' तेरे हाथको ग्रहरण करता हूँ ' यहां ' तेरे ' कहलवाया है, और क्यू - द्वारा पतिको ' आपके हस्तको ग्रहण करती हूं ' यहां ' ग्राप ' कहलवाया है, इसी स्वा. द. के वाक्य भेदसे सिद्ध हुआ कि बर वधूको ' ते ' कह सकता है; और ' नमः ' नहीं कह सकता; क्योंकि - ' नमः ' का स्वामीके मतमें ' वन्दन ' - नमस्कार है, आशी: नहीं । और वधू वरको ' ते ' नहीं कह सकती । तब बड़ेको ' ते ' कहना . स्वामीके मत से भी विरुद्ध सिद्ध हुआ । इसलिए वेदारम्भमॅ शिष्य - द्वारा गुरुको ' भवन्तं ' कहलाया गया है, और गुरुद्वारा शिष्यको ' त्वं विद्यावान् भव ' तथा अन्य वड़ों द्वारा ' हे बालक! त्वं सर्वा विद्या श्रधीत्य आगम्याः ' ' त्वं ' शब्दसे कहलवाया है; अतः दोनोंका परस्पर ' नमस्ते ' कहना स्वामीके मत में भी ग़लत सिद्ध हुआ । क्योंकि दोनों एक - दूसरेको ' ते ' कैसे कहें? ' जैसे श्रापने मुझको उत्तम विद्या देके, ( समावर्तन पृ. १२१ ) में स्वामीने शिष्य द्वारा प्राचार्यको ' आपने ' कहलवाया है, ' यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वया उपास्यानि ' हे शिष्य, उन्हींका चरण तू कर, ( वेदारम्भ पृ. १०६ ) यहां शिष्य को गुरु द्वारा ' त्वया ' और ' तू ' कहलवाया है; इसलिए दोनों स्थानोंपर ' नमस्ते ' कट गया । पहले नमस्कार में ' अभिवादन ' शब्द कहना भी हम दिखला चुके हैं; उसमें श्रीशेरसिंहका ' नमस्ते की प्राचीनता ' ( पृ.१६ ) में यह कहना कि - ' जबकि अभिवादन भी एक प्रकार का नाम है, फिर अभिवादन- शब्द मात्र कहना किस प्रकार Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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२५६ G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) ठीक हो सकता है ' यह कथन कट गया । मनुस्मृति भी इस ' अभिवादन ' शब्दको मान चुकी है । मनुस्मृतिकी वैदिकता देखिए - ' यः कश्चित् कस्यचिद् धर्मो मनुना परिकीर्तितः । स सर्वोभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ' ( २७ ) अर्थात् मनुने जिसका जो धर्म बताया है, वह वेदमें कहा है, क्योंकि मनु वेदका सब प्रकारका ज्ञान रखता है । स्वा. द. ने भी लिखा है - ' सम्पूर्ण वेद, मनुस्मृति तथा ऋषि प्ररगीत शास्त्र " उन कर्मोंका सेवन उचित है ' ( स. प्र. १० पृ. १६२ ) गोभिल-श्रादि गृह्यसूत्रों में सर्वत्र ' अभिवादये ' शब्द स्पष्ट है, ' यदभिवदति ' इस अथर्व. ( ε | ६ | ४ ) के मन्त्रका स्वामीने सं. वि. पृ. २७४ में ' अभिवादन करता है ' यह अर्थ किया है । तव श्रीशेरसिंहका ' अभिवादन चारों वेदोंमें नहीं है ' ( नमस्तेकी प्रा.पू. ५६ ) यह कहना उसकी वेदानभिज्ञताका सूचक है, उसके इस मतका स्वामीने स्वयं कचूमर निकाल दिया है । स्वयं भी अपने वचनसे वह खण्डित हो गया, अपनी पुस्तकके १६ पृष्ठ में ' अभिवादन ' शब्दके निर्वचन के अवसर में ' अभिवदन्ति जना अनेन अभिवादनम् अर्थात् मनुष्य. भले प्रकार प्रणामादि करते हैं - इससे यह प्रभिवादन कहलाता है ' यहां ' अभिवादन ' शब्दको स्वयं प्ररणामवाचक माना है । गोभिलगृह्य में ' अनु-मन्त्रिता गुरुम् श्रभिवादयते ' ( २।३।१२ ), महाभारत में ' चरणान् अभिवाद्य च ' ( शान्ति ७११३ ) ' प्रातः सायम् अभिवादनादीनि ते नित्यधर्माः ' ( सं.वि. वेदारम्भ पृ. ६३ ) ' प्रातः सायं प्राचार्य को नमस्कार करना ' ( पृ. ६४ ) ' तात! लवोऽभिवादयते ' G नमस्ते प्रथवा हठवाद * २५७ ( उत्तररामचरित ) ' अभिवाद्य गुरुं ' [ शंखस्मृति ३ । ' अभिवादनशीलस्य ' [ मनु. १।१२१ ] ' ततोभिवादयेद् १२ ] वृद्धान ' [ याज्ञवल्क्यस्मृति, श्राचाराध्याय २६ ] ' प्रातरभिवादा इत्येते नित्यधर्माः [ गोभि. ३ १ २७, ब्राह्माण. २२५५१६ ] ' गुरून् गोत्रेणाभिवाद्य ' [ मोभि. २ | ४ | ११ ] ' अभिवादये भगवंत ( महाभा. १।३।३०, बोधायनगृ. २२५ | ५५, ब्राह्मा. ११४१५ वाल्मी. २।१८।२, २६।१, ४० २-३, १२४।२, १२७।३६,, इत्यादि, महाभारत शान्ति, ५०।१०, ५६ १,५८२६, ५६ | ३, ७१ | ४, वनपर्व १८४।६, आदिपर्व १७१।२; १७२२ ) ' अनतशीर्षोऽभिवादयति ' ( वैखानसधर्म. २ | १० | ७-१० ) ‘ श्श्रायुष्मान् भव सौम्य ' ( ८ ), इत्यादि बहुत स्थल उद्धृत किए जा सकते हैं; इनसे अभिवादन - शब्द भी नमस्कार अर्थ में प्रयुक्त किया जा सकता हैं । ' अहं भो! भवन्तमभिवादयामि ' पर स्वा. द. की नमस्ते-' विषयक टिप्पणीको हम पहले प्रक्षिप्त सिद्ध कर चुके हैं; वह I टिप्परगी येह है- ' इस - [ ' अहं भो! श्रभिवादयामि ] से उत्तम ' नमस्ते ' यह वेदोक्त वाक्य श्रभिवादनके लिए नित्यप्रति स्त्री-पुरुष, पिता - पुत्र, गुरु - शिष्य श्रादिके लिए है । प्रातः - सायं पूर्व समागम में जब - जब मिलें; तब - तब इसी वाक्यसे परस्पर वन्दन करें । यदि यह टिप्परगी स्वा. द. जी की भी मानी जाए, तब भी कपोलकल्पित है, क्योंकि - ' न च हेतुमन्तरेण सिद्धिरस्ति ' ( न्याय. १६ ) जबकि - स्वामीके कथनसे ही यह सिद्ध हैं कि-स ० [ ० १७ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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२५८ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) यह वाक्य अभिवादन वा बनाके लिए है; तब ' नमस्ते ' प्रत्यभिवादन या आशीर्वाद के लिए सिद्ध न हुआ; तब नमस्कार-आशीर्वाद दोनोंमें ही इसका प्रयोग हो, यह वादियोंका कथन खण्डित हो गया । किसी भी शास्त्र में यह लिखा नहीं मिला कि पिता, गुरु, पति- अपने पुत्र, शिष्य, पत्नी प्रादियोंको नमस्कारके ' उत्तरमें भी ' नमस्ते कहें । न यह कहीं लिखा है कि - पुत्र आदि भी पिता प्रादियोंको ' नमस्ते ' शब्द ही कहें । छोटे - बड़ेमें कहीं भी समान व्यवहार नहीं कहा गया । ' नमस्ते ' की उत्तमतामें ' वेदोक्तता ' जो कारण सं. वि. की टिप्परगी में कहा गया है, यह भी ठीक नहीं । वेदमें तो “ नमः नः,, नमोस्तु, श्रभिवदति, वन्दे आादि शब्द भी प्रयुक्त हैं; यह हम इस निबन्धकी आदि कह • चुके हैं । तब शब्द उत्तम क्यों नहीं? यह भी प्रष्टव्य है कि ' अभिवादन ' वाचक शब्द ' नमः ' हैं, वा ' नमस्ते '? यदि कहें कि -- ' नमस्ते '; तब इसमें प्रमारण न होनेसे यह प्रयुक्त है; क्योंकि यह एक शब्द नहीं यह हम पूर्व सिद्ध कर चुके हैं । यदि कहा जावे कि - अभिवादनवाचक ' नमः ' है; तब ' नमस्ते ' में श्राग्रह ' व्यर्थ है, ' ते ' शब्द बड़ोंकी अप्रतिष्ठाका ' वाचक ' होनेसे और ' नमः ' शब्द आशीर्वाद - वाचक न होनेसे सब विवादों के मूल हैं । अतः उक्त टिप्परगी स्वा. वि. को सिद्ध न हुई; श्रथवा होती हुई भी शास्त्र - विरुद्ध वा निर्मूल सिद्ध हुई; क्योंकि प्ररणामःशीर्वाद में ' नमस्ते ' ही कहना चाहिए, ऐसी विधि किसी भी विधि - शास्त्र में वा वेदमन्त्रमें नहीं C मिलती CC - 0. Ankur Joshi Collection G नमस्ते प्रथवा हठवाद * २५६ इतिहास में भी कहीं ' नमस्ते ' के उत्तरमें ' नमस्ते ' नहीं मिलता । कई कहते हैं - पिता अपने युवा पुत्रको भी ' नमस्ते ' कहे; क्योंकि - ' प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत् ' ( चाणक्य ३ । १८ ) १६ वें वर्ष में पुत्रसे पिता मित्रवाला व्यवहार करे; इस प्रकार गुरु स्नातक हो चुके हुए शिष्यको भी ' । इसपर उत्तर यह है— इससे उनके मत में भी १६ वर्षोंसे पूर्व समान व्यवहार न होनेसे ' नमस्ते ' का खण्डन हो गया । १६ वर्ष वालोंसे भी सास समान व्यवहार इष्ट नहीं; किन्तु इस पद्यांशके पूर्वार्ध-' लालयेत् पञ्चवर्षाणि दशवर्षाणि ताडयेत् ' के अनुसार यह श्राशय है कि- ' जैसे पिता या गुरु ७-८ वर्षके पुत्र वा शिष्यको पीटता है, डांटता है, चपेट लगा देता है; उसका कान मरोड़ लेता है, १६ वर्षके पुत्र से वा प्राचार्यकुलसे बाहर आये हुए शिष्यसे वैसा व्यवहार न करें ' । इसका यह भाव नहीं कि-' पिता - पुत्र आदिके नमस्कार प्राशीर्वादके व्यवहार में भी विषमता न हो; और दोनों एक - दूसरेको नमस्कार करें ' । नहीं । पुत्र चाहे ५० वर्षका भी हो जावे; तब भी पिताको नमस्कार ही कहे, और पिता उसको आशीर्वाद ही दे । और मित्रोंके भी समानतावश परस्पर नमस्कार आदिष्ट नहीं; किन्तु नमस्कार तो श्रायु, योग्यता वा वसे बड़ेको हो होती है, यह हम पहले सप्रमाण सिद्ध कर चुके हैं; तब उक्त पद्यांशसे वादियोंकी इष्ट - सिद्धि नहीं । [ १३ ] कथनका निष्कर्ष यह है कि श्रार्यसमाजियोंका ' नमस्तेवाद ' और ' हठवाद ' पर्यायवाचक शब्द हैं । ' ते ' यह Gujarat. An eGangotri Initiative

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२६० * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * सर्वनाम सामने वाले निम्नको कहना पड़ता है; परन्तु सदा इसी सर्वनामका प्रयोग नहीं करना पड़ता । कभी ' नमस्तस्मै ' ( अथर्व ० | ३ | १२ ) इस वेद मन्त्र के अनुसार ' तस्मै ' सर्वनाम का, कभी ' तेभ्यो नमोस्तु ' ( यजु. १६१६५ ) इसके अनुकूल ' तेभ्यः ' सर्वनामका, और कभी ' अस्मै का प्रयोग करना पड़ता है । कभी बहुतों के सामने होतेपर अथवा एकको ही श्रादरार्थ बहुवचन देनॅपर ' नमो वः, नमो भवद्भूयः नमः श्रीमद्भयः ' आदि प्रयोग भी देने पड़ते हैं; परन्तु ये दुराग्रही लोग सभी स्थानों में ते ' सर्वग्राम घुसेड़ दिया करते हैं; जैसे मानो कि-' नमस्ते ' एक पद होवे । इसलिए वे लोग ' मम तस्मै नमस्ते भवेत्, मम सम्बन्धिभ्यो मम नमस्ते स्यात् ' इत्यादि प्रयोग भी दे दिया करते हैं । कई मूढ तो ' मम भवते नमस्तेस्तु ' कह दिया करते हैं । बहुतसे मूर्ख संस्कृतानभिज्ञ इसे एकपद मानते हैं । आर्यसमाजके शिक्षित व्यक्ति भी इन दोषोंको जानते हुए भी हठवादके कारण वैसा कहनेको तैयार हो जाते हैं । एक बहुत बड़े प्रायें-समाज प्रेमी- विद्वान् मेरी उपस्थितिमें एक भजन बोल रहे थे-' जगत्की जननी जगत् की माता नमस्ते पहुंचे तुम्हें हमारा ' । मैंने कहा कि - ' पंडितजी; यह तो दुराग्रहकी सीमातीतता है । ' तुम्हें नमस्ते पहुंचे ' में कितनी सख्त पुनरुक्ति है; जब प ' नमस्ते ' का अर्थ ' तुझे नमः ' करते हैं; फिर ' तुम्हें ' अलग क्यों कहते हैं? क्या ' नमस्ते ' एकपद है? " यह सुनकर वे चुप्पी साध गए । क्या उत्तर दें । यही हाल ' नमस्ते ' ट्रैक्ट वालोंने किया * नमस्ते अथवा हठवाद २६१ है - ' मैं प्रापको नमस्ते करता हूँ ' ( ' नमस्ते विधान ' पृ. ५ ) श्री. शेरसिंहने लिखा है- ' हां, आपका यह कहना कि - यह और नमस्तेको एकार्थवाची हो कहते हैं, सो यह किसी नमः ही जैसे हठीने कह दिया होगा ' ( पृ. १६ ) इस प्रकार ' नमस्ते प्राप की प्राचीनता ' में हठ मानकर भी उसोने पृ. २६ में लिखा ' हे राक्षस श्रेष्ठ! मैं तुझे नमस्ते करती हूँ ' यहां उसने ' नमस्ते है-' का ' नमः ' वाला अर्थ करके अपने हठका परिचय दे दिया । जो कि उसीने १६ पृष्ठमें लिखा है- ' सब जानते हैं कि यह भेद हैं, जब मध्यम पुरुषके एक वचनसे सम्बन्ध होता है, ' नमस्ते ' होता है; प्रथम - पुरुष के सम्बन्धमें नमः ही रहता है '; तब ' उसको मेरी नमस्ते हो ' यह वाक्य उसके मत में प्रथम-पुरुषका है, तब उसमें ' नमस्ते ' कहते हुए श्रार्यसमाजी हठी सिद्ध हुए । इस प्रकार डा. सूर्यकान्त M.A.M.O.L. शास्त्री व्याकरणतीर्थ प्रो. डी. ए. वी. कालेज लाहौर ने अपने ' सूर्य-व्याकरण ' के १५ पृष्ठमें एक वाक्य लिखा था- ' कृष्णने गुरु • कुल में जाकर श्राचार्य सान्दोपन मुनिको नमस्ते को शास्त्रीका कैसा. हठ है? यहां नमस्तेको एक पदवत् प्रयुक्त यह किया गया है । यहां ' नमस्कार की ' 1 अथवा ' नमः ' यही वाक्य उचित है - उसमें ' ते ' के. घुसेड़ने की गुंजाइश केवल हठवाद वा ट्रेडमार्क बनाने के लिए है; स्वतः नहीं । इतनी अशुद्धियों उपस्थित होनेपर भी: ' नमस्तेको न छोड़ना - यह कितना हठवाद है! यदि यह लोग नमस्ते, में ठहरे हुए, विवादास्पद और व्यभिचारी ( सदा न रहने वाले ) ' ते ' को जिसका अभिवादन CC - 0. Ankur Joshi Collection jarat. An eGangotri Initiative