सनातन धर्मालोक १-२ — पृष्ठ 141–150

सनातन धर्मालोक १-२ · पृष्ठ 141–150

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२६२ * श्रीसनातनधर्मालोकः ( १-२ ) * अर्थ से सम्बन्ध नहीं हटा दें, तो अधिकांश में ' हठवाद ' का अन्त हो जावे । यदि वेद भी वादियोंकी तरह हठी होता; तो ' नमामसि ' ( अ. ३८५ ) न कहकर ' नमस्ते कुर्मः ' कहता । ' नमस्यन्तः ' ( श्र. १।१२।२ ) में ' नमस्ते कुर्वन्तः ' कहता । ' नमस्कारेण नमसा ' ( श्र. ४ । ३६ । ६ ) यहां भी ' नमस्तेकारेण ' कहता । ' ' नमस्कृत्य द्यावापृथिवीभ्यां ' ( श्र. ७ १०७ 19 ) में ' नमस्ते कृत्वा कहता ' मोवाके ' ( अ. १३।६।५, ऋ. ८।३५।२३ ) में ' नमस्तेवाके ' कहता । ' नमस्तस्मै ' ( अ. ह । ३ । १२ ) में ' नमस्ते तस्मै ' कहता । ' तेभ्यो वो नमः ' ( प्र. ३।२६ । १ ) ' नम एभ्यो प्रस्तु ' ( श्र. ३ । २७।१ ) आदि बहुवचनों में भी ' नमस्ते ' पढ़ता । ' नमो गणेभ्यो गणपतिभ्यश्च वो नमो नम:, ( यजुः १६।२५ ) में भी ' गणपति-भ्यश्च नमस्ते नमस्ते ' पढ़ता । ' नमो वः पितरः ' ( श्र. १८ | ४ | ८१-८६ ) ' ब्राह्मणेभ्य इदं नमः ' ( प्र. ६।१३।३ ) इत्यादिमें ' नमस्ते पितरः ' ' ब्राह्मणेभ्यो नमस्ते ' कहता । ' नमो वां भगवन्तौ! ' ( गोपथब्रा. १।२।५ ) यहां ' नमस्ते भगवन्तौ ' कहता । परन्तु वेदने ऐसे प्रयोग नहीं दिये, इससे स्पष्ट है कि - वेद ' नमस्ते ' का पक्षपाती वा आग्रही नहीं । स्वा. द. ने यजुर्वेद के संस्कृत भाष्य २।१६ मन्त्रके भावार्थ में कहा है - ईश्वरो वदति-हे मनुष्याः! यूयं मां च सततं नमस्कुरुत ' यहां ईश्वरने ' नमस्ते कुरुत ' नहीं कहा । ' हे जगदीश्वर! तुभ्यं स्वाहा, नमश्च नित्यं कुर्मः ' ( स्वा. द. यजुर्भाष्य २।२० अन्वय ) यहाँ ' नमस्ते - कुर्मः ' नहीं कहा; तब सर्वत्र ' नमस्ते ' का प्रयोग करना CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्ते अथवा हठवाद ०. २६३ ' हठवाद ' ही है । इसलिए वैदिकम्मयोंको उचित है कि - ' नमस्ते ' छोड़कर ' नमस्कारः, ' नमः, नमो - नमः, नमोस्तु, वन्दे, श्रभिवादये ' इत्यादि वेदसम्मत नमोवादका ही प्ररणामके समय उपयोग करें । इसीलिए वेदमें ' भूयिष्ठान्ते नमः उक्ति विधेस ' ( यजुः ४०।१६ ) ' नमो भरन्तः [ ऋ. १1१1७ ] इत्यादि कहा है, ' नमस्ते - उक्ति ' और ' नमस्ते भरन्तः ' नहीं कहा । सर्वनाम प्रयोगको श्रोता स्वयं जान लेगा । इसमें कोई प्रशुद्धि के नहीं होगी; और कोई विवाद भी नहीं होगा । वल्कि ' नमः भी ' शब्दके कहने की भी प्रावश्यकता नहीं, बड़के चरणों को छूकर वन्दना की जा सकती है । जैसे कि वाल्मी. रा. में- ' नाम स्वं श्रावयन् रामो ववन्दे चरणौ पितुः [ २ | ३ | ३३ ] किसी भी शास्त्रमें ' नमस्ते ' के उच्चारणकी विधि नहीं की गई; तब यह शब्दोच्चारण सिर्फ अंग्रेजोंका वा मुसलमानोंका अनुकरण है । यदि कोई शब्द बनाना भी हो; तो ' नमः ' वा ' नमो नमः ' वा नमस्कारका प्रचार कीजिए ।: " परन्तु श्राशीर्वाद के लिए अन्य पदं ढूंढना पड़ेगा । मनु-स्मृतिके अनुसार ' श्रायुष्मान् भव है । यदि वेदके शब्दका ही आग्रह हो; तो ' शं'ते ' [ यजु. २३।४४, अथर्व. २।१०।२-३, १४ | ११४०, १८३।६०, १ ९ २१ - २ ] ' शमस्तु ' [ प्र. १।१२ । ४ ] इत्यादि, तथा बहुवचन में ' शं नो मित्रः ' [ ऋ. शह I i ] लिङ्ग देखकर ' शं वः, शं भवद्भयः ' इत्यादि, अथवा ' स्वस्ति न इन्द्र: ' [ सामवेद ] के अनुसार ' स्वस्ति ' शब्दका प्रयोग farat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 142

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२६४ G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * व्यवहर्तव्य है । यदि कोई हठी ' नमस्ते ' कहना न छोड़े; तो आप उसे ' शमस्ते ' शब्दसे प्राशीर्वाद दे दिया करें; क्योंकि-वे ' शान्तिः शान्तिः शान्तिः! तीन प्रकारकी शान्ति चाहते हैं; तब शान्ति की आशीः उन्हें युक्त है ही । [ १४ ] वादी कहते हैं - हम ' नमस्ते ' में इस काररण नाग्रह करते हैं - यह एक शब्द इसी रूपमें सब स्थान रहता है । एक शब्द जाति - संघटनको सूचित करता है । यह भी ठीक नहीं । यदि बहुत पुरुष सामने हों; वा एकको ही सम्मान में बहुवचन देना हो; तो वहां ' नमो वः ' यह परिवर्तन करना पड़ेगा । क्योंकि - हम सिद्धकर चुके हैं कि यह एकपद नहीं । श्राशीः में भी इसे बदलना पड़ेगा; क्योंकि यह श्राशीर्वाद-वाचक नहीं - यह हम पूर्व सिद्धकर चुके हैं । यदि भिन्न - भिन्न शब्द जातिकी अनेकता सूचित करते; तो वेदादिमें नमः आशीः में सर्वत्र ' नमस्ते ' से भिन्न शब्द कहीं न होता । वेदादि-में कहीं ' नमस्ते ' के प्रत्युत्तर में भी ' नमस्ते ' नहीं कहा गया । जाति - संघटन के उपाय अन्य होते हैं; एक शब्दका कथन नहीं? नहीं तो जाति - संघटनके इच्छुक हमारे प्राचीन भी एक शब्द प्रचलित करते । न करनेसे वादियोंका यह व्याज अनुप-पन्न है; केवल इससे प्रार्थसमाजकी वृद्धि दीखती है; अन्य कुछ नहीं । जातिमें जब उच्च - नीचता है; तो एकपद नहीं हो सकता; नहीं तो पिता - पुत्र, गुरु - शिष्य प्रादि व्यवहार की विषमता भी हटा देनी पड़ेगी । नहीं तो फिर ' सव्येन सव्यः स्प्रष्टव्यो दक्षिणेन च दक्षिरणः ' ( मनु. १७२ ) यह चररण-* नमस्ते अथवा हठवाद २६५ वन्दना गुरु - शिष्यकी भी बराबर होनी चाहिए । कइयोंका यह विचार होता है कि- ' शिष्टाचारार्थक कोई एक शब्दहोता ' चाहिए ' । इसपर जानना चाहिए - गुरु - शिष्य, पिता - पुत्र, बड़े-छोटेका शिष्टाचार ' कभी समान शब्दसे नहीं हो सकता क्योंकि - बड़ेका छोटेको प्राशीर्वाद देना और छोटेका बड़ेको । नमस्कार कहना यह शिष्टाचार है, इसमें समान व्यवहार विरुद्धाचार है । समान- शब्द वहां हो सकता है - जहां नमस्कार श्राशीःकी बात न हो । वहांपर जयश्रीकृष्ण, अथवा ' वन्दे. ' मातरम् ' वा ' जयहिन्द ' ' जयभारत ' आदिका प्रयोग किया जा सकता है । अथवा यदि वेदका आग्रह हो; तो ' नम पृथिव्यै ' ( यजु. २२ ) यही कहें । [ १५ ] कई कहते हैं— ' ब्राह्मरण परस्पर नमस्कार करते हैं - उसमें यदि दोष नहीं है, तो परस्पर ' नमस्ते ' में क्या दोष है? इसपर जानना चाहिए कि यदि ब्राह्मण लोगभूल करें; तो क्या दूसरोंको भी जरूरी ही भूल करनी चाहिए? वस्तुतः उनमें भी छोटे - बड़ेका परस्पर नमस्कार नहीं हु करता; किन्तु परस्पर- प्ररणामाशीर्वाद ही होता है । तथापि कइयोंमें परस्पर नमस्कारका व्यवहार दीखता है; उसमें कुछ तो अज्ञान है, कुछ अन्य कारण हैं । वे यह हैं । एक प्रायुमें छोटा ब्राह्मण योग्यतामें तो बड़ा होता है, पर दूसरे अपनेसे आयु में बड़ेको अपना कर्तव्य समझकर नमः कार करता है; पर वह बड़ा उस छोटेको अपनी अपेक्षा योग्यतामें बड़ा मानकर ' न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं CC - 0. Ankur Joshi Collection jarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 143

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२६६ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * शिरः । यो वै युवा ( कनिष्ठो ) ऽप्यधीयानः तं देवा: स्थविरं । विदुः ' ' योऽनूचानः स नो महान् ' ( २।१५६ - १५४ ) इस मनु जीके कथनसे उसे ज्ञानपूर्वक नमस्कार करता है । जैसे कि-भगवान् राम क्षत्रिय होनेसे ब्राह्मणोंको नमस्कार करें; और ब्राह्मण श्रीरामको भगवान्‌ के अवतार होनेसे प्रणाम करें । भीष्म - श्रीकृष्ण भगवान्को देवदेवेश होनेसे नमस्कार करें; और श्रीकृष्ण स्वयं क्षत्रिय वर्ण में अवतीर्ण होनेसे प्रायुमें बड़े क्षत्रिय- भीष्मको नमस्कार करें । माता कौशल्या पुत्र होनेपर भी श्रीरामको देवदेव होनेसे नमस्कार करें, और श्रीराम बालकता के कर्तव्यसे माताके चरणोंको वन्दित करें । परन्तु यह विशेष - विशेष व्यक्तियोंका प्राईवेट व्यवहार हुआ करता है; फिर भी इसमें भी छुटपन और बड़प्पनका विचार होता है; छोटापन आयु और बड़प्पन योग्यतामें । कई समान भी परस्पर नमस्कार करते हैं; वहां कारण यह होता है कि-एक - दूसरे को अपनेसे अधिक योग्यता वाले समझते हैं । तथापि यह ' प्राईवेट ' व्यवहार होते हैं । प्राइवेट व्यवहार वा प्रचलित व्यवहार अनुसर्तव्य नहीं होते; किन्तु शास्त्रीय व्यवहार ही अनुसर्तव्य होते हैं । और उनमें श्रप्रतिष्ठाकारक ' ते ' ( तुभ्यम् ) भी वे प्रयुक्त नहीं करते; और वे योग्यता वा आयु में बहुत arrat कभी भी नमस्कार नहीं करते; तब वादियोंका यह . विषम - उपन्यास है । ( १६ ) ' नमस्ते ' के अधिक प्रचार में न तो उसकी वैदिकता कारण है, और न ही आर्यसमाजियोंकी कार्यदक्षता । इसमें CC - 0. Ankur Joshi Collection G नमस्ते अथवा हठवाद # २६७ तो सनातन धर्मियोंका ढीला - ढाला विरोध जिस वस्तुका विरोध किया ही काररण है । वीरबल जावे; वह बढ़ती ही है । इसमें वाली वह कहानी ठीक घटती है । एक मूर्ख पुरुषने नाकर बीरबलको कहा कि मुझे लोग ' पण्डित ' कहें, ऐसा कोई सुगम उपाय बताइये । बीरबलने कहा कि कठिन कार्य नहीं है । जो तुम्हें ' पण्डित यह तो कुछ लग जाओ, और मारने ' कहे; तो तुम चिढ़ने दौड़ो । उसने मान लिया । वीरबल एक पुरुषको कहा कि इसे पण्डित कहो; तो चिढ़ता है । उसने उससे कहा- क्यों पण्डितजी! ऐसा है? । तब तो वह उसे पीटने दौड़ा । दूसरेने पूछा- यह तुम्हें क्यों पीटता उसने कहा कि- पण्डित कहने से यह पीटता है? । कि- पण्डितजी है । दूसरेने कहा ! यह बात ठीक है? वह उसे भी पीटने दौड़ा । इस प्रकार उसका ' पण्डित ' नाम प्रसिद्ध हो गया । कुछ समयके बाद बीरबलने कहा कि अब चिढ़ना बन्द कर दो । फिर भी उसका नाम पण्डित प्रसिद्ध बना ही रहा । ' नमस्ते ' शब्दका प्रारम्भमें सनातन धर्मियोंने ढीला - ढाला विरोध किया; स्वा. द. का विरोध किया, श्रार्य - समाजका विरोध किया; उसके फलस्वरूप ही अब यह एक बड़ी दूकानदारी चल निकली है, और ' नमस्ते ' भी तूल पकड़ गया । सुधारकोंसे किये जाते हुए अन्त्यजोंके मन्दिरप्रवेशमें सनातन-धर्मियोंने विरोध किया; उसका फल यह हुआ कि अब श्रार्यसमाजी भी मन्दिरोंमें अन्त्यजोंको ले जाते हैं; और इस विषयमें सनातनधर्मियों से शास्त्रार्थ भी करते हैं । मूर्तिपूजा में Guerat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 144

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२६८ G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * श्रविश्वस्त भी श्रीगांधीजी ट्रावनकोरके मन्दिर में अन्त्यजः प्रवेश से मन्दिरको परिक्रमा भी करने लगे, और तुलसीदल, मिश्रित चरणामृत भी लेने लगे । और देखिए - द्विजोंके चोटी रखने एवं उपनयन - सूत्र पहनने का सनातन धर्मियोंने कभी विरोध नहीं किया; उसके फलस्वरूप सुधारकमण्डली तथा उनके नेता श्रीगांधीजीने भी चोटी जनेऊ छोड़ दिये । सतातनधर्मी स्त्री - शूद्रोंके उपनयनका ही विरोध करते हैं; आर्यसमाज़ियोंका भी स्त्री - शूद्रों को ही उपनयन - सूत्र पहनानेमें अधिक ध्यान है । धार्मिक लोग मद्य - मांसके प्रचारका विरोध करते हैं, वह बढ़ता ही जाता है । हिन्दु गोवघका विरोध करते हैं, मुसलमान तथा कांग्रेसी उधर ही अधिक ध्यान देते हैं । इसलिए सिद्ध हुआ कि किसी व्यवहारके प्रचलनमात्रसे उसकी वैदिकता नहीं हो जाती; न इससे उसके प्रचालकोंका ही अतिशय प्रभाव कारण कहा जा सकता है । अन्य कारण यह है कि इस शब्दको अंग्रेजी विद्वान् वकील आदि तथा अन्य सरकारी सर्वेण्टोंने जिनसे जनताको प्रति समय काम रहता है - अपना लिया । उनका साधारण जनतापर बहुत प्रभाव हो जाता है । उन्हीं सुधारकोंका जनतापर प्रभाव पड़ा कि उसने उनकी भ्रांति चोटी जनेऊ भी हटा दिये । खड़े होकर पेशाब करना ओ सीख लिया । हैट - कोट - पेण्ट आदि पहनने भी सीख लिये । ' नमस्ते ' भी सीख लिया । ( १७ ) कइयोंका विचार है कि- ' नमस्ते ' कहनेसे ईसाई-G नमस्ते अथवा हठवाद * २६ ९ मुसलमान डर जाते हैं; और जाति - संघटन तथा परस्पर प्रेस भी २७१ रहता है, यह सब हेत्वाभास हैं । ' करः खलु निवार्यते प्रहरतो न वक्तुर्मुखम् ' चोट कर रहे हुए का हाथ तो रोका जा सकता नम है; पर बोलने वाले मुंह पर ताला कैसे पड़े? ' मुखमस्तीति देक वक्तव्यं दशहस्ता हरीतकी ' । यदि ' नमस्ते ' से ही भय होता; तो ईसाई - मुसलमान कभीके गुम होगये होते । कई स्थान हिन्दु - मुसलमानों होते रहते हैं; वहां ' नमस्ते ' कहकर उन्हें क्यों नहीं डरा दिया दी जाता? बल्कि जिस समयसे ' नमस्ते ' का प्रचार हुआ, कलह भी जारी हुए । ' नमस्ते ' प्रचारक प्रार्यसमाज में भी घास-पार्टी, मांसपार्टी, गुरुकुलपार्टी, कालेजपार्टी, बाबूपार्टी, पण्डित. से पार्टी आदि बहुत पार्टियां बनीं; उनके परस्पर विवाद हुए । भग इससे स्पष्ट है कि- ' नमस्ते ' शिष्टाचार नहीं; किन्तु एक साम्प्रदायिक शब्द है; तथा ' हठवाद ' का पर्यायवाचक है । भी इसके प्रचारसे बहुत - सी अशुद्धियां उपस्थित होती हैं, बड़ोंकी उप अप्रतिष्ठा होती है । अतः इसका प्रचार हटाकर ' नमो नमः ' प्रच श्रथवा ' नमस्कार ' तथा ' स्वस्ति ' इनका यथायोग्य प्रचार ' न कना चाहिए । वा ' नमस्ते ' - विषयक मुख्य तर्कोंका समाधान कर दिया गया । यदि पाठकोंने कई उसकी सिद्धि में अन्य सबल युक्तियां सुनी अ हों; या इस विषयके कई अच्छी वा नई युक्तियों वाले ट्रैक्ट से देखे हों; उन्हें हमारे पास भेजें; श्रग्रिम पुष्पोंमें उनपर विचार किया जावेगा । अब श्री सन्तराम बी. ए. लिखित स CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 145

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६ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * नो १७० ' ' नमस्ते प्रचार ' ट्रैक्टको आलोचना तथा एक अन्य निबन्ध ना यह विषय समाप्त किया जायगा । | देकर त ( १२ ) ‘ नमस्ते - प्रचार ’ - समीक्षा पाठक ' नमस्ते और हठवाद ' आदि निबन्ध पढ़ चुके । ब न श्रीसन्तराम बी ० ए ० वेदरत्न लिखित ' नमस्ते - प्रचार की समीक्षा दी जायगी । हम उनका प्रायः ' वादी ' नाम से निर्देश करेंगे । ना इसकी पृष्ठ संख्या ' नमस्ते - प्रचार ' की प्रथमावृत्तिसे दी गई है । न्य.पू. १ पंक्ति १ - महर्षि दयानन्दके उपदेशानुसार अन्य विषयों 7. से बहुत अधिक प्रचार सामाजिक और असामाजिक- लोगों में ३. श्रापसमें ' नमस्ते ' कहकर सत्कार करनेका हो चुका है । ' समीक्षा- इससे प्रतीत हुआ कि स्वा.दः से पहले कभी 1 भी ' नमस्ते ' - प्रचार नहीं रहा, यह स्वामीके ही दिमागकी उपज है । और स्वामी जीके अन्य विषयोंका जो बहुत अधिक प्रचार नहीं हुआ, शायद वे अन्य विषय प्रवेदिक हों । शेष र ' नमस्ते ' के अधिक प्रचारका कारण हम ' नमस्ते अथवा हठ-वाद ' में कर चुके हैं, वास्तविक कारण वही है । पू. १ पं. ५ - पर कहीं - कहीं सत्यविद्रोही स्वार्थी लोग कई प्रकारके झूठे दोष गढ़ कर संस्कृत भाषा और लौकिक व्यवहार I से हीन लोगोंको " ' नमस्ते पर सन्देह पैदा करनेका यत्न कर रहे हैं । ' 1 समीक्षा- यह बात गलत है । नमस्तेका खंडन करनेवाले सत्यविद्रोही तथा स्वार्थी नहीं हैं । सत्यविद्रोही वादी ही हैं; CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. * नमस्ते प्रचार समीक्षा २७१ जो युष्मद् - शब्दके एक वचनको अन्य सभी स्थानों में श्रमान्य मानते हुए भी केवल ' नमस्ते ' में उत्तम मानते हैं । यह साम्प्र-बायिक दृष्टिकोण होनेसे सर्वया स्वार्थ है । पू. १ पं. १३ - नमस्ते कहना न केवल शास्त्र सम्मत है किन्तु वेदोक्त होनेके कारण सर्वश्रेष्ठ भी हैं ' । .स ० - इसकी समीक्षा हम गत - निबन्धमें कर चुके हैं । पू. १ पं. १६ - ' छोटे बड़े, नीच ऊंच में नमस्ते करना लोक वा शास्त्र सिद्ध है ' । स ० - इसकी समीक्षा पूर्व निबन्धों में हो चुकी है । पृ. २ पं. १ - ' नमस्ते की पुष्टिमें इससे पूर्व भी कई लेख तथा पुस्तक श्रार्य विद्वानोंकी श्रोरसे निकल चुके हैं, पर यह पुस्तक सबसे बड़ा और श्रविक - पुष्ट प्रमारणोंसे भरा हुआ है । ' इससे स्पष्ट प्रतीत हुग्राकि- अन्य श्रार्यसमाजी पण्डितोंके प्रमाण त्रुटि - युक्त तथा शिथिल हैं । अब आपका खण्डन हो जानेसे सबका मटियामेट हो जायगा । पू. ३ पं. ८ - ' नमस्ते ' यह शब्द नमस् और ' ते ' के योग से बना है ' | परन्तु सभी श्रार्यसमाजी इसको एक ही पद मानते हैं, तभी तो बहु - वचनमें अथवा अन्य सर्वनामोंकी श्रावश्यकता में भी इसीका प्रयोग करते हैं । इस कारण शेष- आर्यसमाजियोंके मतमें वादीका पक्ष अशुद्ध सिद्ध हुआ । ...... पं. ε- नमस् अव्यय तथा धातुपाठमें आये ' रम् प्रहृत्वे An eGangotri Initiative

पृष्ठ 146

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२७२ G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * शब्दे च ' धातुसे ' अत्यविचमित मिरणमि ' ( उरगादि. ३-११७ ) इत्यादि सूत्रोंसे नमस् पद सिद्ध होता है । समीक्षा- यहां पर वादीने ' प्रथमप्रासे मक्षिकापातः ' यही न्याय सिद्ध किया है । यहांपर ' अत्यविचमित मिरणमि ' इस सूत्र को ' नमम् ' की सिद्धि में देकर वादीने अपनी व्याकररण - शून्यताका परिचय दिया है । उक्त उणादिसूत्रसे तो ' नमसः ' इस प्रका-रान्त पदकी सिद्धि होती है, हलन्त ' नमस् ' अव्ययकी नहीं । यहां पर तो ' सर्वधातुभ्योऽसुन् ' ( उरगा दि ० ४- १८६ ) इस सूत्र ही ' नमस् ' की सिद्धि होती है, वादी के लिखे सूत्रसे नहीं । और जब कि - धातुपाठ म् धातुका अर्थ प्रहृत्व लिखा है- यह वादी मानते हैं, तब उसका पक्ष खण्डित हो गया । प्रहृत्व कहते हैं कि - नीचे होना । सो बड़ेके सामने ही नीचे होना हो सकता है, छोटेके आगे नहीं । इस कारण वादीका ' नमः ' प्रयोग सर्वत्र सिद्ध न हो सका । इसी कारण अमरकोष में ' नमो नतौं ' ( ३।४।१८ ) इस प्रकार ' नमः ' शब्द झुकने अर्थ में लिखा है । ' नमस् पूजायाम् ' का भी यही अर्थ विवक्षित है । अब वादी ' ते ' शब्दकी सिद्धि करता है । पृ. ४ पं. १- “ तेमयावेकवचनस्य ' इत्यादि पाणिनीय सूत्रोंसे तथा ' एकवाक्ये युष्मदस्मदादेशा वक्तव्याः, एकतिङ् वाक्यम् ' आदि कात्यायन - मुनिकी वार्तिकायों (? ) से नमस्ते शब्द पूजार्थमें सिद्ध होता है । समीक्षा - जबकि वाक्यका लक्षरण वादीने एकतिङ् माना * नमस्ते प्रचार - समीक्षा २७३ है, तब क्या ' नमस्ते ' में एकतिङ् है? यदि नहीं, तब तो एक तिङ् के न होनेसे उन्हीं के अनुसार ' नमस्ते ' अशुद्ध सिद्ध हुआ । यदि वादी कहें कि ' अस्तु'का अध्याहार हो जावेगा तो मास्तु, का भी अध्याहार हो सकता है । तब फिर पूजाका, भी खंडन हो गया । अब वादीको चाहिए कि ' नमस्तेऽस्तु का प्रचार प्रारम्भ करें । आगे लिखते हैं कि - ' इनसे नमस्ते शब्द पूजार्थं सिद्ध होता है ' । यहां वादी धोखा देता है, ' नमस्ते ' शब्द तो पूजार्थं सिद्ध नहीं हुआ, क्योंकि ' नमस्ते ' एक शब्द नहीं, यहां वादी-को लिखना चाहिए कि ' नमस्, शब्द पूजा - अर्थ में सिद्ध सिद्ध होता है, ' इसमें हमारा भी कोई विरोध नहीं । जब वादी भी ' नमस्ते'को एक शब्द मानते हैं, तब उसका पूर्व - पक्ष स्वयं वादीके ही उत्तर - पक्षसे खंडित हो गया । अन्यथा वह नमस्ते शब्दको पूजार्थक न मानता; क्योंकि यह एक शब्द नहीं 1. पृ. ४ पं. ६ ' कई व्याकरण - शून्य ' अनुदात्तं सर्वमपादादा ' से ' नमस्ते ' को. अनुदात्त बताते हैं, पर यह उनकी भूल है । क्योंकि नमस् - शब्द प्रसच् प्रत्ययके कारण ' चित् ' है इसलिए यहां ' चितोऽन्त उदात्त ' से मकार उदात्त हुप्रा । पुनः ' ते ' श्रागे अनुदात्त है, उसको ' उदात्तादनुदात्तस्य स्वरितः, इससे स्वरित हुना और मकार में उदात्त स्वर हुआ है । समीक्षा - वादीने इससे दूसरोंको व्याकरण - शून्य नहीं स ० घ ० १५ CC - 0. Ankur Joshi Collection arat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 147

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२७४ श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) बतलाया,, बल्कि अपना ही व्याकरण- शून्य होना सिद्ध कर दिया है । हम बतला चुके हैं कि नमस् में असुन प्रत्यय है, प्रसच् नहीं । व प्रसच् - प्रत्यय में तो ' नमसः ' यह अकारान्त प्रयोग बनता है, 7, परन्तु वादीके स्वामीको तो नमस् हलन्त अभीष्ट है । सो इसमें असुन प्रत्यय है । ' नित होनेसे ' नित्यादिनित्यम् ' से श्राद्युदात्त हुआ । शेष मकारस्थ प्रकारको ' श्रनुदात्तं पदमेकवर्जम् ' इस स्वरपरिभाषा सूत्र से अनुदात्त हुआ । मकारको उदात्त स्वर लिखना भी वादीकी व्याकरण - शून्यताका परिचायक है, यं क्योंकि उदात्तादि - स्वर अच्को होता है, हल्को नहीं । अस्तु । जब ' न ' में प्रकार ' उदात्त ' हुश्रा और ' म ' में प्रकार व अनुदात्त हुप्रा, तब ' उदात्तादनुदात्तस्य ' इस सूत्र से मकार - स्थित न अकारके अनुदात्तको ' स्वरित ' हुआ । वैसा ही वेद में देखा गया है । उसके बाद ' ते ' में जो अनुदात्त है, उसको ' स्वरितात् संहितायामनुदात्तानाम् ' इस सूत्र से प्रचय हो जावेगा । प्रचय का कोई चिन्ह नहीं होता । यदि उसके आगे कहीं उदात्त वा स्वरित हो तो समान वाक्यमें उस अनुदात्तको ' अनुदात्ततर ' हो जायेगा | यह वादी - जैसा व्याकरणशून्य भला क्या समझे? इनको तो दूसरोंसे सुन - सुनाकर लिखने के समय नाम अपना ही कर देना है । पं. १३ - जो. ' नमस्ते ' को ' नमस्ते ' अर्थ करके पढ़ते हैं, वे न केवल विवक्षा न जान छल - कपट आदिसे साहित्य- हत्या करते हैं । स ०? नमस्ते कहकर अर्थ करना तो आप लोगों पर CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्ते प्रचार - समीक्षा • २७५ उपहास है कि आप लोग शून्य - मस्तक रहते हैं । यदि कोई कहे कि ' लाला जी नमस्ते, चलो पाखानेके रस्ते ' जैसा कि श्रार्यसमाजी छोटे बच्चे कहा करते हैं, तब वादी क्या इसका यही अर्थ समझ लेंगे? यह उपहास तो एक - दूसरों पर हुआ करते हैं । प्रापके भाई सनातन धर्मियोंको ' सड़ातन - धर्मो ' कहते हैं, तब प्राप लोग ' वे न केवल विवक्षा न जानकर छल-कपट श्रादिसे साहित्य - हत्या करते हैं, ' इस अपने वाक्यको क्यों भूल जाते हैं? यहां पर वादी अपने स्वामीजीका वाक्य सदा याद रखें - " परन्तु बहुत मनुष्य ऐसे हैं, जिनको अपने दोष तो नहीं दीखते, किन्तु दूसरोंके दोष देखने में प्रत्युद्युक्त रहते हैं । यह न्यायकी बात नहीं, क्योंकि प्रथम अपने दोष देख - निकालके पश्चात् दूसरेके दोषोंमें दृष्टि देके निकालें, ( सत्यार्थ प्रकाश १२ समुल्लासकी अनुभूमिकामें पृ. २५५ ) । पं. १८ प्रागे वादि - महाशय इस उपहाससे इतना चिढ़े कि ' दुष्टः शब्दः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह । स वाग्वज्जो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोपराधात् " इन सनातनधर्मी वचनोंको भी प्रमाण मानने लग गये । इससे वृत्रासुरका होना तथा इन्द्रसे उसका मारा जाना तथा मन्त्रोंकी सामर्थ्य इत्यादि पौराणिक कही जाती हुई बातें सिद्ध हो गई । पृ. ५ की अंतिम पंक्ति में वादी सिद्धांतकौमुदीके ' शालीनां ते प्रोदनं दास्यामि ' आदि उदाहरणोंसे गद्यमें भी ' नमस्ते ' सिद्ध करते हैं । परन्तु यदि वादी सिद्धांत - कौमुदी पर चलते हैं, तो ' नमस्तेऽस्तु ' यही वाक्य उनको रखना पड़ेगा । क्योंकि वहां Carat An eGangotri Initiative

पृष्ठ 148

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G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * २७६ पर वाक्य में ही ' ते ' प्रदेश लिखा है । वाक्यका लक्षण वहां वाक्यम् ' दिया है, जैसे आपने भी उधृत करके ' एकतिङ् किया है । वहां पर सभी तिङ्युक्त ही उदाहरण हैं । स्वीकृत आपके ' नमस्ते ' में ' तिङ् ' नहीं है । इस कारण प्रापके परन्तु में साम्य सिद्ध न होनेसे प्रापका पक्ष खण्डित हुआ । उदाहरण शंका पू. ६ पं. ११ में आपने ' टि ' में प्लुतोदात्तविधिको उत्तर लिखा है, पर यह स्पष्ट है कि - प्रापसे ठीक उसर का नहीं बन पड़ा, क्योंकि - आपको व्याकरणका अन्तरङ्ग ज्ञान सर्वथा नहीं । यह उत्तर भी आपने किसी अधकचड़े व्याकरण-पूछकर लिखा है । वास्तवमें ' नमस्ते ' के जानने वालेसे प्रत्यभिवाद- वाक्य ही नहीं । सनातनधर्मी इसे प्रत्यभिवाद-वाक्य मानते ही नहीं । शेष वह जो इस पर प्रश्न करते हैं, वह तो दुर्जन - तोषन्याय से समझना चाहिए । ६ की अन्तिम पंक्तिमें वादीने ' नमस्ते ' के ' स् ' को ' तू ' पू. क्यों न हो, इस प्रश्नका उत्तर दिया है; वह व्यर्थ है । ऐसा कभी किसी भी प्रोरसे नहीं किया गया । ' समस्य प्रश्न प्रयोग में इस विषयका शंका - समाधान सनातन - धर्मी विद्वान् जानते ही हैं । और वादीने जो ' नमस्कार ' शब्दपर वही बात घटाई है, इससे मालूम होता है कि — वादी शायद ' नमस्कार ' शब्दको प्रवैदिक मानते हैं । यदि ऐसा है तो स्पष्ट है कि-उसने वेद भी कभी नहीं देखा । वेदमें ' नमस्कार ' शब्द भी आया है । इसमें गत- निबन्ध देखें । पृ. ७ पं. १० ' नमस्तेके श्रथं ' । CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्ते प्रचार - समीक्षा २७७ यह शीर्षक ही गलत है । यहां पर ' नमस्के प्रथं '.यह शीर्षक तो लिखा जा सकता है, ' नमस्तेके अर्थ ' शीर्षक ठोक नहीं, क्योंकि यह दो भिन्न - पद हैं, एक नहीं । वैदिक वा लौकिक कोषों में ' नमस्ते ' शब्द कहीं नहीं मिलेगा । यह हमारा त्रैलेञ्ज है । ' नमस् ' शब्द ही मिलेगा, ' नमस्ते ' शब्द नहीं । सनातन - धर्मको ‘ नमः’से प्रणाम - अर्थंमें कोई विरोध नहीं । पृ. ८ पं. १० में — ' नमस्ते - नमस् और ते के. योगसे बना है । ' ते ' के अर्थं तो निर्विवाद सब लोग तुझे या तेरे लिए हा करते हैं, भेद केवल ' नमस् ' के श्रथों में है । ' समीक्षा - भला हो वादीका, उसने तो ' नमस्ते ' की बनी-बनाई दीवारको सदाके लिए तोड़ - फोड़ दिया । सनातनधर्मी प्रायः इसीलिए तो इसका विरोध करते हैं कि- इसमें ' ते ' ' शब्द है । वे ' नमस् ' का तो स्वयं नमस्कारार्थमें प्रयोग करते हो हैं । शेष वे बड़े के लिए ' ते ' शब्दका कभी प्रयोग नहीं करते क्योंकि-वे जानते हैं कि- ' ते ' का अर्थ ' तुझे वा तेरे लिए ' है । जव वादी भी इसका यही अर्थ मानते हैं, तब तो इसका खण्डन स्वयं उनने ही कर दिया । क्योंकि वर्तमानमें वड़ेको कोई किसी भी भाषा में ' तुझे नहीं कहता । वादी भी बड़े के लिए ' तू तुझे ' आदि शब्दका प्रयोग क्या उचित समझते हैं? वा और कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति अपने लिए ' तू तड़ाक का प्रयोग स्वीकृत कर सकता है? श्रथवा वादीने अपनी किसी पुस्तक किसी प्रतिष्ठित - पात्रको छोटेके द्वारा ' तू - तड़ाक ' कराई है! जबकि - ' ते ' का अर्थ ' तुम्हारे लिए ' भी नहीं, किन्तु ' तेरे लिए ' है, Gujarat An eGangotri Initiative

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२७८ G श्रीसनातनधर्मालाक ( १-२ ) * www III ' तब ' आपके लिए ' यह उसका अर्थ कैसे हो सकता है? पं. १२ - वैदिक लोग तो ' नमस् ' के सत्कार एवं प्रन्न, वस्त्र, पूजन श्रादि नानार्थ प्रसंगके अनुसार करते हैं, और प्रवेदिक वा लोग केवल झुकना वा पाऊं पड़ना ही करते हैं । रा समीक्षा - वादी बतावें कि - इसका अर्थ झुकना है वा नहीं? । यदि वे कहें कि नहीं, और ऐसा अर्थ करने वाले उनके मत में Fho श्रवैदिक हैं, तब तो वादीने अपने मूलभूत श्रीपाणिनि - मुनिको ना भी, जिसने कि- ' गम प्रहृत्वे ' लिखा है, जिसका कि वादी M भी पृ ० ३ में बड़े गौरवसे उद्धरण दिया है- प्रवेदिक सिद्ध कर दिया! नी. पं. १६ – वैदिक - कोष निघण्टु में ' नमस् ' के अर्थ अन्न और वज्र हैं । न्दि स०- इससे सिद्ध हुआ कि -लौकिक - कोष में जिसकी हमें सदा व्यवहारमें आवश्यकता रहती है, अन्न और वस्त्र अर्थ नहीं । हमने लौकिक - व्यवहार लोक - प्रसिद्ध अर्थ वाले शब्दसे जब चलाना होता है । नहीं तो वैदिक - निघण्टुके अनुसार सुवर्णको कोई इन क्या वादी ' लोह ' ( ११२ ) कहते हैं? क्या रात्रिको ' पयः ' ( १७ ) और जलको ' पुरीषम् ' ( १११२ ) कहते हैं? क्या लिए बादलको ' अहिः, वा चमस ( १1१० ), घोड़े को ' वह्नि ' ( १ \ १४ ), वा और सन्तानको ‘ शेषः ' ( २/२ ) कहते हैं? क्या वे मनुष्यको हरि ( २३ ), अंगुलिको ' स्वसा ' ( २१५ ), प्रन्नको ' पितुः ', अथवा वयः ( २७ ) धनको ' इन्द्रिय वा ब्रह्म ' ( २1१० ), संग्रामको खल वा सद्म ( २।१७ ) सुखको ' भेषज ' ( ३।११ ) कहते हैं? * नमस्ते प्रचार - समीक्षा २७६ यदि नहीं; तब ' नमः ' का ' अन्न ' वज्र ' प्रयं वैदिक - निघण्ट तथा वेदमें ही रहेंगे, लोकमें नहीं । तब लोक व्यवहृत ' नमः ' का अर्थ नमस्कार ही रहेगा, श्रन्न - वज्रादि नहीं । अमरकोषमें जो ' नमस् ' शब्द था, उसको वादीने छिपा दिया, क्योंकि उससे केवल झुकना अर्थ पाया जाता है । देखिए- ' नमो नतौ ' ( ३ काण्ड प्रव्यय - वर्ग १८ श्लोक ) । इसीका नाम होता है ' सत्यकी हत्या ' । शेष वादीने जो उसी कोष प्रमाणसे वें पृष्ठको अन्तिम पंक्तियोंमें पूजन अर्थ किया है, तो पूजन बड़ेका ही होता है । ग्रापस्तम्ब धर्मसूत्रमें लिखा है- ' पूजा वर्ण - ज्यायसां कार्या ११३१२ “ वृद्धतरारणाञ्च " ( १।१३१३ ) । इससे छोटेके लिए ' नमस् ' शब्द खण्डित हो गया । इसी प्रकार ' आपटे - कोष में भी समझ लें । वहां ' नमः ' का श्राशीर्वाद श्रयं कहीं नहीं श्राया । आपने यथायोग्य सत्कार वा सम्मान ' अर्थ जो लिखा है, यहां पर ' ययायोग्य ' शब्द वादीका स्वकपोल - कल्पित है । कहीं भी ऐसा नहीं लिखा । इसीका नाम होता है ' आंखों में धूल झोंकना ' । इसी प्रकार जब ' शब्दार्थ - चिन्तामणि ' तथा ' पद्मचन्द्र कोषकारने भी ' नमस् ' का अर्थ अभिवादन माना है; तब इसका आशीर्वाद प्रथमें प्रयोगवादीके दिए प्रमाणोंसे ही खण्डित हो गया । ... ऐसा होनेपर भी वादीने अपढ़ - जनताको ठगा है । यह अर्थ ' नमः ' के हैं; पर उसने यह ' नमस्ते ' के बताये हैं ' नमस्ते ' एक पद नहीं - यह हम पहले बता चुके हैं । वादीने जितने ' प्रमाण दिये हैं उनमें ' नमस् ' शब्द है, ' नमस्ते ' नहीं । हमारा CC - 0. Ankur Joshi Collection jarat. An eGangotri Initiative

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२८० * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * विवाद ' नमस्ते ' में है ' नमः ' में नहीं । ' नमः'का प्रयोग सनातन-धर्मों अभिवादनमें करते ही हैं । शेष ' नमस्का अर्थ यथायोग्य सत्कार है, ' इसपर वादी किसी भी कोषकार वा प्रामाणिक-ग्रन्थको सम्मति नहीं दिखा सके । इसलिए उसका यह अर्थ कपोल कल्पित सिद्ध हुआ । ' धागे वादीने जड़ - पदार्थोंमें भी ' नमः'का प्रयोग माना है । जड़ोंको नमन करनेसे वादीने उनका सुखदायक होना मांना है । तब वादी स्पष्ट मूर्तिपूजक हुए, क्योंकि - स्वामी - दयानन्दजी ने लिखा है- ' क्या यह मूर्तिपूजा नहीं है, किसी जड़ - पदार्थके सामने शिर झुकाना वा उसकी पूजा करना सब मूर्तिपूजा ' है ' ( स. प्र. ११ समु. पृष्ठ २३० ) । वादीने ' नमस् ' का अर्थ पूजा-सत्कार सिद्ध करते हुए मूर्तिपूजा को भी मान लिया । ' चौबे गये थे छब्बे बनने दुब्बे बनकर आये । ' पू. १२ पं. २ में ' नमो महदद्भ्यो नमो अर्भकेभ्यः ' यह मन्त्र दिया है । पर इस मन्त्र में छोटे - बड़े मनुष्यों को किसीका नमस्कार नहीं, किन्तु मनुष्यका देवताओंको नमस्कार है । क्योंकि - इस मन्त्रके देवता ' विश्वेदेवाः ' है । इसलिए ही वादी ने इसका उत्तरार्ध छिपा लिया, तभी तो नहीं लिखा । उसमें ' देवाः ' पद स्पष्ट है । विशेष - समाधान गत- निबन्धमें देखें । इसका यह उत्तर भी हो सकता हैं कि कोई पुरुष किसी ऐसी श्रेणीको नमस्कार कर रहा हो जो स्वयम् उन सबसे छोटा हो प्रौर जिस श्रेणीको वह नमस्कार कर रहा है, उसमें परस्पर कोई बड़ा कोई छोटा हो । इस सत्य पर एक ही नाम नह ' लोग पूल विद्या विज्ञान लिए सत्कार- अन्न करें और है । थोड़े मुख्यादेः विद्याथियोंके - तृप्ति, युवावस्था से बो बलवाले विद्वान है उनके लिए सत्कार, समस्तः विद्यानोंमें व्याप्त दो बुड्ढे विद्वान् हैं, उनके लिए - ( नमः ) सेवापूर्वक देते हुए, जो सामथ्र्यके अनुकूल विचार में समर्थ हों, तो विद्या “ आदि उत्तम - गुरुपोते प्रशंसनीय विद्वानों (? ) को अच्छे प्रकार विद्या ग्रहण करें । ( ऋग्वेद - भाव्य पू. ५५८ ) यद्यपि यह श्रयं -चितृतीय है, तथापि इसमें स्वामीने सबके लिए ' नमस्ते ' शब्दका विधान नहीं माना । यहां पर वादीने नमस्कारका ' यथायोग्य सत्कार अर्थ बिना किसी प्रमाणके दिया है । यहां न पर ' नमस्ते ' पद कहनेकी श्राज्ञा नहीं । श्रतएव उसका ज • समूलोन्मूलन हो गया । पृ. १२ पं. ६ में ' नमो ज्येष्ठाय च कनिष्ठाय ' यह मन्त्र दिया है । पर इस मन्त्रका देवता रुद्र है, न कि मनुष्यः । " ( वही परमेश्वर ) दुष्टों को दण्ड देके रुलाने वाला होनेसे रुद्र ' । ( स. प्र. १ पृ. ३ ) इस कारण वादीका पक्ष सिद्ध न हुआ । और इस मन्त्र में ' नमस्ते ' शब्द कहने की आज्ञा भी नहीं दी इ गई । इस कारण ' नमस्ते - प्रचार ' का मूल ही कट गया । विशेष- समाधान गत निबन्ध में देखना चाहिए । श इस मन्त्रका यह भाव भी हो सकता है कि कोई पुरुष किन्हीं ऐसे पुरुषोंको नमस्कार कर रहा हो, जिनमें एक बड़ा भाई हो, और एक छोटा भाई हो, परन्तु नमस्कार करते CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative