सनातन धर्मालोक १-२ — पृष्ठ 151–160
सनातन धर्मालोक १-२ · पृष्ठ 151–160
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२८२ श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) वाला दोनोंसे छोटा हो । तब इससे वादीका पक्ष सिद्ध न हुआ । इस मत के आदि प्रवर्तक स्वा. द. जीने कनिष्ठुके श्रागे नमस्कार करनेमें अनुपपत्ति मानकर यह अर्थ किया है- ' तुम लोग प्रत्यन्त वृद्धोंका सत्कार, और प्रतिबालकका अन्न, द्या तथा ज्येष्ठ भ्राता वा ब्राह्मरणका सत्कार और छोटे भाई वा कार नीचका अन्न, " नीच कर्मकर्ता शूद्र वा म्लेच्छ पुरुषका अन्नादि से सत्कार करो ' ( यजु. १६।३२ ) इस अर्थको करके स्ते स्वामीने वादीका पक्ष ही काट दिया है । बड़ोंका सत्कार रका करना माना है, छोटेको अन्न देना कहा है । उनकी पूजा यहां नहीं मानी । इस मन्त्रमें ' नमस्ते ' न होनेपर भी इसके ‘ भावार्थमें ' नका जो ' नमस्ते ' का प्रयोग सूचित किया है, यह स्पष्ट प्रक्षिप्त है । इस प्रकार नमस्कार करना जो अभिवादन - वाचक प्रभीष्ट है, छोटेके लिए वह स्वामीके मतानुसार भी वेदसे मन्त्र सिद्ध न हुआ । यदि कहीं स्वामी वैसा कह भी दें, तो वह साध्य - पक्ष होनेसे माननीय नहीं हो सकता । प्रा. पृ. १२ पं. 8 में ' नमो - हस्वाय च ' यह मन्त्र दिया है, दी इसका भी समाधान पूर्व - निबन्ध में देखें । वादीने इसके प्रर्थ था । में भारी धोखा दिया है । लिखा है- ' आकारसे छोटे वा क्षीरण शरीर..... वाले के लिए भी नमस्ते ही करनी चाहिए ' । जब पुरुष । मूलमें शब्द ' नमः ' है, तो ' उसे नमस्ते करनी चाहिए ' यह बड़ा कहां से निक पड़ा? करने दाद के अनुसार नमस्ते प्रचारक स्वा. द. जीने यहां वादी CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. • नमस्ते प्रचार - समीक्षा • २८३ का अभीष्ट प्रथं नहीं माना । देखिए - वालक और प्रशंसित ज्ञानी तथा मध्यम विद्वान्को अन्न देते हैं । ' यहां पर भी स्वा ० द ० जीने नमस्कार अयं नहीं माना । ' बड़े और विद्या में प्रतिवृद्ध 2 विद्यार्थीका सत्कार, श्रवस्थामें अधिक अपने समानोंके साथ बढ़नेवाले तथा सब मित्रका सत्कार ' यहां भी स्वामीने अवस्था वा विद्यामें वृद्धोंका ही नमस्कारसे सत्कार स्वीकृत किया है, छोटोंका नमस्कारसे सत्कार न मानकर अन्नादि देनेसे सत्कार माना है — यह तो भिन्न बात हो गई । इससे वादीका मूलपक्ष हो खण्डित हो गया । यदि छोटोंको उन्हें ' नमः ' करनी इष्ट होती; तब वहां ' नमः ' का अयं वे केवल सत्कार करते, ' अन्नादिसे सत्कार ' अर्थ न करते । श्रतः उन्हें अन्न देने में हमारा निषेध नहीं, उन्हें नमस्कार करना तो दोनों पक्षों में प्रसिद्ध सिद्ध हुआ । इस प्रकार अगले ' नमो मन्त्रिणे पशूनां पतये श्रादि मन्त्रों में रुद्र देवता होनेसे कोई भी दोष नहीं । वादीका इष्ट ' नमस्ते ' यह शब्द है; वह इन मन्त्रों में सर्वथा नहीं, इसलिए वादीको अपनी पुस्तकका नाम अब ' नमस्ते प्रचार ' हटाकर ' नमः -प्रचार ' कर ने प्रस्तुत पुस्तक के तीन वेदोंक लिख यू १३ स्वपद्म्यो चल जीने An eGangotiti al देना चाहिए । श्राश्चर्य तो यह है कि - वादी-टाइटिल पेजपर भी जो मन्त्र गौरवके साथ डाले हैं उनमें भी ' नमस्ते ' पद नहीं है । यः सभापतिभ्यश्च वो नमः, ' नमः नमः ' इत्यादि वेदमन्त्र भी वेदरत्न-क्योंकि इनसे ' नमस्ते ' का खण्डन होता है ।
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२८४ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * इसको यों समझिये कि प्रार्यसमाजी हर हालत में ' नमस्ते ' से भिन्न पद नहीं कहते, पर यहां पर वेदने बहुवचनमें ' नमस्ते ' न कहकर ' नमो वः कहा है । तो फिर ' नमस्ते ' मात्र की अपरिवर्तनीयताका समूलोन्मूलन हो गया । तब जोकि उक्त मन्त्र देकर श्रार्यसमाजी - श्रीशेरसिंहने अपनी ' नमस्तेकी प्राचीनता ' में ' वेदों में परस्पर नमस्तेका प्रयोग ' यह शीर्षक दिया है, यह जनताको धोखा देनेके लिए ही है, क्योंकि यहां तो ' नमो वः ' है, ' नमस्ते ' नहीं; और न ही यहां उसका परस्पर - प्रयोग ही प्रदिष्ट किया गया है । तव वह असत्यवक्ता भी सिद्ध हो गये । यहां वादी श्री सं, रा. जीसे प्रष्टव्य है कि- ' नमस्ते ' यह पद सदा, सब अवस्थाओं में बहुवचनादिमें वा अन्य सर्व-नामोंकी अपेक्षामें इसी रूपमें रहता है; अथवा उस समय ' नमो वः, नमस्तस्मै ' इत्यादि - रूपोंमें बदल जाता है? यदि इसी रूपमें रहता है; तो वेदने ' नमो वः, नमः, नमोऽस्मै ' आदि रूपमें कहकर वादियों के मुंहपर चपत जड़ी है । यदि बदलता रहता है, तो ' नमस्ते ' खण्डित हो गया; और फिर इससे वादियोंने ममता क्यों बांध रखी है? ' नमस्ते ' मात्रके प्राग्रही व्यक्ति अपने स्वामींके इस कथनको याद रखें - ' ( प्र. ) तुम्हारा मत क्या है ( उ. ) वेद अर्थात् मो जो -वेदमें करने और छोड़ने की शिक्षा की है उस - उसका हम यथा-वत् करना छोड़ना मानते हैं । जिस लिए वेद हमको मान्य है; इसलिए हमारा मत वेद है । ऐसा ही मानकर सब CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An * नमस्ते - प्रचार समीक्षा २८५. २८६ मनुष्योंको विशेषकर प्रायको ऐकमत्य होकर रहना चाहिए ' । " ( स. प्र. ३ पृ. ४२ ) अत्र वादियोंसे पूछना है कि वेदने इत्थ जिसे करने के लिए लिखा है, क्या आप उसे करते है? जिसे । है । छोड़ने के लिए लिखा है; क्या उसे छोड़ते हैं? यदि ऐसा यदि है; तो वेदने विधिरूप से यह कहां लिखा है कि प्रणाम उन्ह श्राशीः श्रादि सब अवसरोंमें ' नमस्ते ' ही कहो; और नमः, नमो - नमः, वन्दे प्रादि न कहो । यदि कहीं ' नमस्ते ' की किया विशेष विधि नहीं कही; और नमः, बन्दे, नमस्कार, स्वस्ति, उन्हो शस् आादियोंका प्रणाम - आशी में निषेध नहीं किया, प्रत्युत नहीं वेदने स्वयं ही भिन्न - भिन्न अवसरों में भिन्न - भिन्न पद प्रयुक्त उच्च किये हैं; तब ' नमस्ते ' में आग्रह करना क्या बेद- विरुद्ध प्रर्य नहीं? अन्न जब वादी लोग स्वयं ही वेद- विरुद्ध चलते हैं; तब लोगो ' इसलिए वेद परमेश्वरोक्त हैं, इन्हींके अनुसार सब लोगोंको ग्रन्ना चलना चाहिए | और जो कोई किसीसे पूछे कि तुम्हारा स्वा. क्या मत है; तो यही उत्तर देना कि हमारा मत वेद | भी अर्थात् जो कुछ वेदों में कहा है; हम उसको मानते हैं । तो व ( स. प्र. ७ म समु. के अन्त में पृ. १२७ ) अपने स्वामीके इस वृचनपर हरताल फेरें । क्या वेदमें कहीं लिखा है कि- नीचों बहुवचनम भी ' नमस्ते ' का प्रयोग करो, और आशी: मं भी करना ' नमस्ते ' का प्रयोग करो, अन्य पदोंका नहीं? यदि ऐसा कहीं नमस्क नहीं लिखा, तब क्या ' नमस्ते और हठवाद ' यह वो पर्याय- प्रति होम वाचक सिद्ध न हुए? । eGangotri Initiative
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२८६ * श्रीसनातनधर्मालाक ( १-२ ) * इसी प्रकार ' नमस्तक्षभ्यो रथकारेभ्यश्च वो नमो नमः ' इत्यादि में समझना चाहिए । यहां पर भी ' नमः ' वा ' नमो वः ' है । क्या श्रार्यसमाज कहीं ' नमो वः ' का प्रयोग भी करती है? यदि नहीं, तब वह स्पष्ट वेद- विरुद्ध सिद्ध हुई । नहीं तो फिर उन्हें ' नमस्ते ' छोड़कर ' नमः ' का प्रचार करना चाहिये । इधर वेदने ' नमस्ते ' का खंडन करके वादीके पक्षका खंडन किया है, उधर स्वामीजी भी वादीके पक्षको खंडित करते हैं । उन्होंने इस मन्त्र में ' नमः ' का अर्थ ' अभिवादनार्थक -नमस्कार ' नहीं माना, क्योंकि वे जानते थे कि - श्रभिवादनार्थंक - नमस्कार । उच्चको की जाती है, नीचको नहीं । तभी तो स्वामीने यह धर्य किया है- पदार्थोंको सूक्ष्म क्रियासे बनाने हारे तुमको ग्रन्न देते, और बहुतसे विमानादि यानोंको बनाने हारे तुम. । लोगोंको परिश्रमादिका धन देके सत्कार करते हैं । ' कुलालेभ्यः ' प्रन्नादि पदार्थ देते । ' निषादेभ्यः ' अन्नादि देते ' । इस कारण | स्वा. द. के भाष्यसे भी यह सिद्ध न हुम्रा कि- वेद नीचोंका । भी अभिवादन मानता है । यदि कहीं स्वामीने लिखा भी हो, तो वह साध्य - पक्ष ही होगा, न कि सिद्ध । इन सब ( वादी से उद्धृत ) स्थानों पर उनके स्वामीने नीचोंको अन्न देना माना है, उनको अभिवादनार्थक नमस्कार-करना नहीं माना, सारा दारोमदार वा झगड़ा श्रभिवादनार्थक नमस्कार करनेमें है । सनातन - धर्मी उच्च वर्णका नीच वर्णके । प्रति ' नमस्कार ' सहन नहीं कर सकते । स्वामीजीने भी वैसा । ही माना है । उनके वेदभाष्यसे भी नीचोंको अभिवादन सिद्ध न * नमस्ते प्रचार समीक्षा २८७ हो सका, और न ही उनको ' नमस्ते ' पद कहने की इन मन्त्रोंमें कहीं प्राज्ञा दी गई है । तब प्रार्थसमाजका पक्ष गिर गया; उनको अन्न भले ही देते रहो, सनातनधर्म कब इस बातका निषेध करता हैं? वह तो कहता है कि - छोटेको नमस्कार नहीं की जा सकती, किन्तु श्राशीर्वाद ही दी जा सकती है । ' नमः श्वभ्यः ' १६।२८- यहांपर भी स्वामीने अपने भाष्य-में कुत्तोंको तथा उसके पालने वालोंको अन्न देना ही माना है, उनको नमस्कार करना नहीं माना । कुत्तेके पालने वालेकी वादी क्या पूजा करेंगे कि- ' आइये कुत्त पालने वाले साहब, आप बहुत ही अच्छा करते हैं । उस वक्त क्या उसके पैर चूमेंगे, वा उसके आगे अपना सिर झुकाएगे? वास्तवमें यह रुद्राध्याय है, यहां सभी रुद्रके विशेषरग हैं । रुद्रको बहुवचन पूजामें अथवा ' माहाभाग्याद् देवतायाः, एक ग्रात्मा बहुधा स्तूयते ' ( निरुक्त ७/४८ ) इसके अनुसार दिया गया है । तो फिर परमात्माके लिए ' ते ' का प्रयोग हो सकता है, पर यहां तो ' नमस्ते ' ही नहीं । विशेष हमारे पूर्व निबन्धमें देखो 1 इसी प्रकार ' नमो वन्याय च कक्ष्याय च ' आदि वादीके दिये हुए मन्त्रों में भी समझें । इनमें भी ' नमस्ते ' नहीं । ' नम इषुकृद्भयो धनुष्कृद्भ्यश्च वो नमो नमः ' ( ४६ ) यहां पर आर्य-समाज से विरुद्ध ' नमो वः ' है क्योंकि - हमारा विश्वास है । कि श्रार्यसमाजियोंने श्राज तक भी इसका प्रयोग न किया होगा । पृ. १४ पं. १० - ' नमस्ते हरसे शोचिषे नमस्ते अस्त्वचिषे ' CC - 0.Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२८८ G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * ( यजुः १७१११ ) ' शीतहारी पवित्रस्वरूप तेजस्वीके लिए नमस्ते हो ' शोक!!! यहां पर कैसा गहरा धोखा दिया गया है । यहां पर वादीने ' नमस्ते'को एक पद मानकर लिखा है, क्या यह प्रज्ञता है, अथवा प्रतारकता है, यह वे ही जानें । इस मन्त्र में तो यह कहा गया है ' है अग्ने! तेरे तेजको नमस्कार हो ' । इस मंत्रका देवता अग्नि है । इससे हमारा कुछ भी पक्ष नहीं गिरा । यहां ' ते ' का अर्थ ' तेरा ' है, ' तुभ्यं ' श्रथं वाला ' ते ' यहां पर नहीं, जो वादीका अभीष्ट हैं, फिर वादीने अपनी हिन्दीमें ' नमस्ते ' कैसे लिखा? । श्रग्नि वा परमात्माके तेजको सनातनधर्मी नमस्कार करते ही हैं, यह मूर्ति - पूजा है । उसमें ' ते'का प्रयोग भी हो सकता है । पृ. १४ पं. १२ - शिवो नामासि स्वधितिस्ते पिता नमस्तेस्तु । मा मा हि सः । ( यजुः ३३६३ ) यहां पर क्षुर ( छुरे ) को वादीने नमस्कार माना है । यह तो वेदमें स्पष्ट मूर्तिपूजा सिद्ध हो गई! श्रार्यसमाज जो मूर्तिका सत्कार नहीं मानता, वह इस वेदमन्त्र से वादीके कथनानुसार प्रवेदिक सिद्ध हो गया । बाकी रहा ' ते'का प्रयोग; यह परमात्मा वा उसके पद को पहुँचे हुये देवता, ऋषि, मुनि तथा जड़ोंको प्रथवा जड़ों श्रधिष्ठातृदेवको किया जा सकता है । परन्तु वार्तमानिक-व्यवहार में नहीं हो सकता । इसके लिए हमारा पूर्व - निबन्ध देखें । और फिर यहां पर ' नमस्ते ' के प्रत्युत्तर में ' ' नमस्ते ' नहीं कहा गया । पं ० १४ - ' पिता नोऽसि ' ( यजुः ३७।२० ) यह मन्त्र महावीर CC - 0. Ankur Joshi Collectionerat. * नमस्ते प्रचार - समीक्षा २८६ नामक प्रजापतिकी मुन्मयी मूर्ति वा परमात्मा के लिए इसमें कोई विवाद नहीं । है । पृ. १५ पं. १ ' देव धर्म! नमस्ते अस्तु ' यहां पर ' अग्नि ' के लिए ' ते ' हैं । इसलिए हमारे पक्षकी हानि नहीं । अग्नि-की पूजा सनातनधर्म मानता ही है, उसे तो आर्यसमाज ' मूर्तिपूजा ' के डर से नहीं मानता । श्रतः वादीके ही कहने से बह ( श्रार्यसमाज ) वेदविरुद्ध सिद्ध हुआ । पं. ७ ' नमोस्तु सर्पेभ्यो ' ( यजुः १३१६ ) इस मन्त्र में ' नमस्ते ' नहीं है, ' नमोस्तु ' है । यहां पर वादी सर्प - अर्थका निराकरण करते हैं, इसका कारण मालूम नहीं । यदि इस मन्त्रका सर्व अर्थ नहीं है तो इससे क्या सर्पोको नमस्कार करना श्रर्थ हट गया? नहीं, ऐसा नहीं । इससे अग्रिम ' ये वाऽवटेषु शेरते, तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः ' ( यजुः १३।७ ) इस मन्त्र में तो सर्पोंको नमस्कार अर्थ विद्यमान है, तब वादी सर्पपूजासे बच न सके । बाकी रहा ' सूर्यादि ' लोकका अर्थ; वे तो वादी के मतसे जड़ हैं, यह तो मूर्तिपूजा हो गई । यहां पर हमारे किसी सिद्धान्त-की क्षति नहीं ।, पं. १० ' इस मन्त्रमें लोक - वासी लोगोंको ' नमस्ते ' ' करनेकी श्राज्ञा है " शोककी बात यह है कि - मन्त्र में ' नमस्ते ' का नाम निशान नहीं, और वादीने उसके अर्थ में ' नमस्ते ' घुसेड़ दिया । क्या यह साम्प्रदायिक चश्मेकी कृपा है? । इसी प्रकार ' लोगों ' शब्द भी अपनी ओर से घुसेड़ दिया । स ० घ ० १६ An eGangotri Initiative
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२६० श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) पं. १४ ' नमस्ते प्रग्ने ' यहां पर अग्निका वर्णन होनेसे हमारे पक्षमें कोई क्षति नहीं है । ' ते ' यहां ' तव ' वाचक है, जो ' ओजसे ' से सम्बद्ध है । वादीका अभीष्ट ' तुभ्यं ' स्थानापन्न ' ' नहीं । पं. १५ ' नमः सखिभ्यः ' इस मन्त्रमें ' नमस्ते ' शब्द ही नहीं । तब इस मन्त्र में ' नमस्ते ' कहनेकी शिक्षा कैसे हुई? कई सखा अपनी अपेक्षा बड़ी प्रयुवाले वा बड़ी योग्यतावाले होते हैं; वहां नमस्कार ठीक ही है; तभी तो मन्त्रमें कहा है— ' नमः सखिभ्यः पूर्वसदस्य: ' ' पूर्वसदस्य: ' का अर्थ है - जो इस संसार में हमसे पहले स्थित हैं - अर्थात् बड़े हैं । वस्तुतः इस मन्त्रमें अग्नि आदि देवताओंका वर्णन है । इस मन्त्रका देवता अग्नि है । इसीलिए सायरण भाष्य में कहा है- ' पूर्वसदृद्भ्यः ' - ये यज्ञे प्रारम्भात् पूर्वं सीदन्ति तिष्ठन्तीति पूर्वसदः, तेभ्यः सखिभ्यः – समानख्यानेभ्यः सखिवन्मित्रभूतेभ्यो देवेभ्यो नमः-वयं नमस्कारं कुर्मः ' ( सामवेद सं. २०६ ) इस तृचमें देवताओंका वर्णन है । तभी इसके तीसरे मन्त्र में - ' देवा श्रोका, सि चक्रिरे में ' देवा ' शब्द स्पष्ट है । पृ १६ पं. १ ' नमस्ते राजन्! वरुरणाऽस्तु मन्यवे ' ( श्र. ) इसमें जलोंके राजा वरुरणके क्रोधको नमस्कार किया गया है । यह तो आर्यसमाजके मतमें मूर्तिपूजा हुई और सनातनधर्म के मतमें देवपूजा हुई । देवतानोंको वा जड़ोंको ' ते ' कहा ही जाता है । ' श्रेष्ठ राजा ' अर्थ करना वादीका साहस है; वरुरण एक देवता है, कोई मनुष्य - राजा नहीं । CC - 0. Ankur Joshi G Collection Gujarat. • नमस्ते प्रचार - समीक्षा G २६१ पं ० ३ ' नमस्ते अस्तु विद्युते, स्तनयित्नवे, अश्मने ' इत्यादि-मन्त्रोंमें जड़वस्तु बिजली, मेघ, पत्थर वगैरहके अधिष्ठातृ देवोंको नमस्कार किया गया है । इसलिए मूर्तिपूजा हुई । इसमें ' ते ' का दोष नहीं । वादियोंके मतमें यह जड़ हैं, हमारे मतमें इसके श्रधिष्ठातृ देवोंके लिए युष्मद्का एकवचन श्रदुष्ट होता है - यह गत - निबन्ध में देखें । वादीने इनमें नानाशक्तियोंको' नमस्ते ' माना है, तो शक्तियोंके जड़ होनेसे हमारे पक्षमें कोई क्षति नहीं पड़ती । पं. १० ' नमः शीताय तक्मने ' इस मन्त्रमें वादीने ज्वर-विशेषको ' नमस्ते ' माना है, इस मन्त्र में नमस्ते शब्द ही नहीं, फिर ' ज्वर - विशेषको नमस्ते ' शीर्षक रखना धोखा देना है । ज्वरको नमस्कार करना उसके अधिष्ठातृ - देवकी पूजा होनेसे सनातनधर्मता है, न मालूम वादीकी इधर नजर क्यों नहीं गई? इसके अनुसार स. घ. में शीतलाका जिसे वादी लोग रोग मानते हैं- का पूजन भी अधिष्ठात्री देवताकी पूजा होनेसे वैदिक सिद्ध हुआ । पू. १६-१७ ' ताम्यो गन्धर्व पत्नीभ्योऽप्सरोभ्योऽकरं नमः ' इस मन्त्रमें वादीने ' स्त्रियोंको नमस्ते ' माना है । परन्तु इसमें ' नमस्ते ' शब्द ही नहीं, किन्तु ' नमः ' है । तो फिर ' स्त्रियोंको ' नमस्ते ' शीर्षक रखना क्या घोखा देना नहीं? नमस्कार सर्वसाधारण स्त्रियोंको नहीं, किन्तु देवयोनि वाले गन्धर्वोकी स्त्रियों- अप्सरानोंको मनुष्य - योनिको अपेक्षा उत्तम - योनि होने से नमस्कार किया गया है, जिन्हें प्रार्यसमाज मानता नहीं । An eGangotri Initiative
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२६२ G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * इससे हमारे पक्षको कोई ठेस नहीं लगती । ' स्त्रियोंको नमस्ते ' इस प्रकार बहुवचनमें ' नमस्ते ' रखना वेदविरुद्ध साम्प्रदायिक-हठ है । पृ. १७ पं. ३ ' नमस्ते लांगलेभ्यः ' इस मन्त्रका उत्तर हमारे पूर्व - निबन्धों में ना चुका है । पं. ४ ' नमः सनिस्त्रसाक्षेभ्यो, ' नमः क्षेत्रस्य पतये ' इनमें ' नमस्ते ' नहीं लिखा । तब इसकी टिप्परगी में वादीने यह क्यों लिखा कि- ' इसमें भी नाना - अवस्था वाले प्राणियों को ही नमस्ते करना लिखा है ' । यह स्पष्ट छल है । पं. ८ ' नमो देववघेभ्यो ' इसमें भी ' नमस्ते नहीं । इसमें तो मृत्युको नमस्कार किया गया है । इसी प्रकार ' सुमत्यै मृत्यो! ' इस मन्त्रमें भी मृत्युको नमस्कार है । मृत्यु श्रार्य-समाजके मत में जड़ है, तब ऐसा करना मूर्ति - पूजा है । पं. १२ ' नमस्ते यातुधानेभ्यः यहां पर भी मृत्यु के ही यातुधानोंको नमस्कार है- इसका सम्यक् उत्तर पूर्व - निबन्ध में देखें । ‘ ब्राह्मणेभ्यः इदं नमः ' यहां पर ' नमस्ते ' शब्द ही नहीं । तब ' ब्राह्मणोंको भी नमस्ते करना लिखा है ' यह वादीका छल है । पृ ० १७३१८ में वादी वैदिक प्रमारणोंका उपसंहार करता हुआ लिखता है -प्र. - कई लोग कहा करते हैं कि वेदोंमें ईश्वरको ' नमस्ते ' है, मनुष्योंको नहीं, यह उनका भ्रम है । इन मन्त्रों में ईश्वर CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्ते प्रचार - समीक्षा # को अनुवृत्ति नहीं श्राती, न कोई इन मन्त्रोंमें ईश्वर-शब्द है । वाची! स. - इस अध्याय का देवता रुद्र है । मंत्रका श्रर्थ देवताके अनुसार होता है । रुद्र ईश्वर को कहते हैं, देखिये ( उसके स. प्र. का १ समुल्लास । ) उसकी अनुवृत्ति यहां प्राप्त है । अन्य मन्त्रोंमें जड़ोंके अधिष्ठातृ - देवताओंका वर्णन है— वादियों के मत में मूर्तिपूजा वैदिक हो जायेगी । इस कारण वादीको बात कट गई । पृ. १८ पं. २ ईश्वर एक है, यहां पर प्रायः बहुतोंका वन है । समीक्षा - रुद्रके वर्णनमें बहुवचन भी है, जैसा कि ' असंख्याता सहस्रारिण ये रुद्रा श्रधिभूम्याम् ' ( यजुः १६।५४ । ) ' रुद्रा देवा देवता भवन्ति ' ( गोपथ ११४१८ ) शेष उत्तर पूर्व दिया जा चुका है । श्रादरार्थ भी बहुवचन होता है । .पं.. ३ ईश्वर एक रस रहता है, वह किसीसे छोटा बड़ा या मध्यम नहीं बन सकता । समीक्षा - इसका उत्तर गत निबन्धों में देखें । श्रात्मा भी तो अजन्मा होनेसे किसीसे छोटा - बड़ा नहीं हो सकता । यदि उसे व्यवहार के लिए वैसा कहा जाता है, वैसे परमात्माको भी । वास्तवमें यहां पर स्थूल सूक्ष्म ईश्वरके ऐश्वर्योंका वर्णन हैं । वह सबसे बड़ा है, यह वादी भी मानते ही हैं । सबसे सूक्ष्म है - इसलिए छोटा भी हुआ । ' अणोरणीयान् महतो । महीयान् ' ( श्वेताश्व. ३।२० ) इत्यादि स्वयं समझें ।. Goat An eGangotri Initiative
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२ ९ ४ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * पं. ४ वह जन्म - रहित है, इनमें जन्मवालोंका वर्णन है । समीक्षा - वेदमें परमात्माके लिए लिखा है- ' अजायमानो बहुधा विजायते ' ( यजुः ३१।१६ । ) ' सुजन्मा ' ( प्र. ४।१।१ ) जब उसका अवतार रूपसे वर्णन होता है तो जन्म - वालों जैसा वन भी होता है । पं. ५ इनमें चोर ठग कुत्ता और चोरोंके पति प्रादिके बोधक शब्द हैं, जो ईश्वर के विशेषरण बनाना पाप है । समीक्षा - यह सभी परमात्माके ही बनाए हुए जगत्के अन्तर्गत होनेसे उसके अंश हैं, इसीलिए उसीकी विभूति - रूपसे वरित किये गये । परमात्मा संसारके सभी जीवोंका पति-रक्षक है, केवल पुण्यात्माओंका नहीं, नहीं तो वह पक्षपाती हो जाय । यहां श्रीमहीधराचार्यका भाष्य देखिए- ' रुद्रों लीलया चोरादिरूपं धत्ते ' यद्वा - रुद्रस्य जगदात्मकत्वाच्चो रायो रुद्रा एव ध्येयाः । यद्वा- स्तेनादिशरीरे जीवेश्वररूपेण रुद्रो द्विधा तिष्ठति, तत्र जीवरूपं स्तेनादिशब्दवाच्यं तदीयेश्वर-रुद्ररूपं लक्षयति, यथा- शाखाग्रं चन्द्रस्य लक्षकम् । किं बहुना -लक्ष्यार्थ - विवक्षया मन्त्रेषु लौकिकाः शब्दाः प्रयुक्ताः । इससे उक्त शंका निरस्त हो गई । अथवा - इस सूक्तमें वैसे रुद्रके गणोंका वा किरातरूपधारी रुद्रके वैसे गरणों का वर्णन है-इसकी स्पष्टता गत निबन्धमें देखिये । ' मा नः प्रिया भोजनानि प्रमोषी: ' ( ऋ. १।१०४१८ ) मन्त्रके श्रर्थमें श्रार्याभिविनयमें स्वा. द. जीने भी परमात्माको चोर लिखा है - तब यहां कोई भी शङ्का नहीं रहती । CC - 0. Ankur Joshi Collection G नमस्ते प्रचार - समीक्षा G २२५ पं. ७ इनमें लकड़ी लोहा श्रादिका कर्म करना है, सो ईश्वरमें नहीं होता । जो लिखा समीक्षा - ईश्वर व्यापक है, लोहा आदि उसमें व्याप्य तो उसमें यह सभी काम हो रहे हैं । हैं, पं. ८ - ९ ऐसा किसी शास्त्रका कोई वचन भी नहीं लिखा हो कि नमस्ते ईश्वर बिना, जिसमें किसीको न कहो । समीक्षा - यह भी किसी शास्त्रमें नहीं लिखा कि सभीको ' नमस्ते ' कहा करो । युष्मदशब्दके एक सभी भाषाओं में परमात्मा के लिए श्राता वचनका व्यवहार है, या ऋषि - मुनियों के लिए | परन्तु आजकल की किसी भी भाषामें योग्य व्यक्ति को युष्मदशब्दका एक वचन नहीं दिया जाता है । क्या वादी अपने लिए यह कहा जाना पसन्द करेंगे कि, ' ऐ सन्तराम! तूं ने इस पुस्तक में बहुत स्थानों पर अपने सिद्धांतोंका विरोध भी नहीं देखा । तुझे संस्कृतका ज्ञान तो बहुत साधारण है । तूने अपनी बनी किसी भी पुस्तकमें छोटे पात्रके मुखसे बड़े पात्रको तू तूने तेरे लिए इत्यादि शब्द नहीं कहलवाये - ' इत्यादि । पं. १४-१५ वादी लिखते हैं - यही मानकर संतोष कर लिया करो कि, ये सब ईश्वर के रूप हैं, ईश्वरको हो नमस्ते कर रहे हैं । समीक्षा - प्रद्वैत सिद्धान्त क्या आपका है, जो सबको ईश्वर समभवाते हैं? यदि नहीं, तो श्रापका यह कहना व्यर्थ है । बाकी यह समझ लें कि, अद्वैतवाद परमार्थिक होता हुआ भी Gujarat. An eGangotri Initiative
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२६६ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * व्यावहारिक नहीं । इस विषय में पूर्व- निबन्ध देखें । बात व्यवहारकी चल रही है । यदि वाढीके अनुसार सभी एक दूसरेको ईश्वर मान भी लें, तब तो ' नमस्ते ' ही व्यर्थ है, फिर कौन छोटा, कौन बड़ा? तब वहां ' नमस्ते ' का प्रवेश ही कैसा?. ' नमस्ते ' - समानोंके लिए भी नहीं होता । पृ. १८ पं. १७ ' ब्राह्मण ग्रन्थों और उपनिषदोंमें ' नमस्ते ' । इस शीर्षक में वादी लिखता है कि ' वेद वाक्योंसे हम छोटे - बड़े नीच ऊंच स्त्री - पुरुष आदिको नमस्कार करना सिद्ध कर चुके । समीक्षा - पर यह बात अभी सिद्ध न हो सकी, यह हम दिखला चुके हैं । अब आगे वे ब्राह्मरण - भागादिके प्रमाण देते हैं— पृ. १६ पं. २ ' स होवाच नमो ब्रह्मिष्ठाय कुर्मः ' । समीक्षा - इस शतपथके प्रमारण में ' नमस्ते ' नहीं कहा गया । यहां पर वादीने ' याग्यवल्क्य ' शब्द लिखकर अपने संस्कृत - ज्ञानका नमूना दिखलाया है । पं. ६ ' सा होवाच- नमस्ते याग्य (? ) वल्क्य ' । स. - प्राचीन युग में युष्मद् - शब्दके एकवचन देनेके विषय में उत्तर यह है कि - पुराणादिमें युष्मद् - शब्दकी सभी विभक्तियों के एकवचन श्राये हैं, केवल चतुर्थी विभक्तिका एकवचन नहीं । तो आप लोग भी मान्यके लिए सभी युष्मद् - शब्द एकवचनों का प्रयोग क्यों नहीं देते? यदि मान्यको ' त्वं त्वां त्वया, तुभ्यं ते, त्वत्, तव, त्वयि ' इत्यादि प्रयोग अपमान समझकर नहीं लिखते, तब ' नमस्ते में भी ' ते ' शब्द अपमान - जनक माना * नमस्ते प्रचार - समीक्षा २६७ जावेगा । परमात्माको देवताओंको तथा ऋषि - मुनियोंको युष्मद्-शब्द एकवचन इसलिए दिये जा सकते हैं कि वे बाह्य लौकिक-व्यवहारसे दूर होते हैं । श्रौर जो सर्व - साधारण लोगोंके लिए भी पुराणों में युष्मद् - शब्दका एकवचन प्रयुक्त हुआ है उसके दो कारण हैं । पुराने जमानेमें बाह्य लौकिक सभ्यता इतनी उन्नत न हुई थी, जैसे कि अब है । सृष्टिके आदिमें व्यावहारिक बाह्य सभ्यता अनुन्नत होनेके कारण युष्मद् - शब्दके एकवचन प्रचलित थे । परन्तु पीछे यह सब विधि - विरुद्ध होनेके कारण हट जानेसे असभ्यताजनक माने जाते हैं! दूसरा कारण इस विषयमें गत निबन्ध में देखें । पृ. १६ पं. १६ ' नमस्तेस्तु ब्रह्मन्! स्वस्ति मेऽस्तु ' ( कठ. १६ ) महर्षि यम अपने शिष्य नचिकेत को " नमस्ते " कहते हैं । समीक्षा - यम कोई महर्षि नहीं; किन्तु मृत्यु - देवता विशेष हैं; अतः कठोपनिषद् में उसे ' मृत्यो! ' ( १ | १ | १३ ) श्रन्तक ( २६ ) श्रादि शब्दोंसे संबोधित किया गया है । नचिकेता जब यमके पास आये; तब उनका कोई गुरु - शिष्य - सम्बन्ध नहीं था । • पिताने गुस्से से नचिकेताको यमके पास भेज दिया । यम बाहर गये थे, जब श्राये तो पता लगा कि एक ब्राह्मण-प्रतिवि तीन दिनसे भूखा है । तब उसने श्राकर नमस्कार किया । वर्ण - विचारसे यम सूर्यवंशी होनेसे क्षत्रिय हैं और नचिकेता ब्राह्मण कुमार था । अतः उसे ' ब्रह्मन्! ' कहा गया CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat AreGangotri Initiative,
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२६८ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * है । तब क्षत्रियका ब्राह्मरण - कुमारको नमस्कार करना उचित ही था । आपस्तम्बधर्मसूत्रमें लिखा है - ' दशवर्षश्च ब्राह्मणः शतवर्षश्च क्षत्रियः । पिता - पुत्रौ स्म तो विद्धि तयोस्तु ब्राह्मणः पिता ' ( १।१४।२२ ) इसी प्रकार मनुस्मृति ( २।१३५ ) महा-भारत अनुशासन पर्व ( ८।२१ ) तथा आदिपर्व ( ५६।२ ) में भी कहा है । शेष रहा ' ते'का कहना, सो उसका उत्तर यह है कि-वह ब्राह्मरण- कुमार उच्च वर्ण होने पर भी यमको अपेक्षा श्रायु और अनुभवमें हीन था, इसलिए उसे ' ते ' कहना अनुपपन्न नहीं । फिर उस ब्राह्मण कुमारने ' नमः ' के उत्तर में यमको ' नमस्ते ' नहीं कहा, बल्कि - यमने भी उससे ' स्वस्ति मे-s स्तु ' इस प्रकार स्वस्ति ( कल्याण ) का आशीर्वाद मांगा । उससे ' नमः ' नहीं चाही । अतः वादीका पक्ष कट गया । पृ. १६, पं. १८- १६-२० नाटकों में नमस्ते । उत्तररामचरित्र में सीताने अष्टावक्रको ' नमस्ते ' कहा । इसका उत्तर पूर्व निबन्ध में देखें । इसी प्रकार ' ऋषे! नमस्ते ' में भी समझें । पृ. २० पं. ६ ' तं प्रतीतं स्वधर्मेण ' ' अर्चयिष्यामो भवन्तं ' इनमें ' नमस्ते, नहीं; यह तो पूजनका उस समयके लिए खास 7 विधान है, सदाके लिए नहीं । पं. १३ परस्पर नमस्ते । ' मनुमेकाग्रमासीनम् । समीक्षा - इत्यादि श्लोकोंमें ' नमस्ते, शब्द नहीं, तथापि ऋषि सर्वज्ञ थे, तथा मनु सर्वज्ञ तथा वयोवृद्ध थे । अतः मनु-CC - 0. Ankur Joshi Collection • नमस्ते प्रचार - समीक्षा २१६ द्वारा उनका पूजन हुआ । यह उन ऋषियोंका ' श्रूयताम् ' इस वचनमात्रसे अर्चन हुन । यदि समान - पूजन होता; वो दोनों स्थान समान शब्द ' प्रतिपूज्य ' होता; परन्तु दूसरे स्थान ' अ ' शब्द है, जिससे भिन्न - भिन्न व्यवहार सूचित होता है । नहीं तो समान व्यवहारमें शब्द - भेद होने पर भग्तः प्रक्रम दोष उपस्थित हो जाता है । पृ. २१ पं. ४ ' विश्वामित्रस्तु सम्पूज्य पूजार्हं रघुनंदनम् ' यहां पर भी ' नमस्ते ' शब्द नहीं । दूसरा - राम परमात्माकें अवतार थे । यह अपवाद - शास्त्र है; तव छोटी प्रायु होने पर भी दोष नहीं । ब्राह्मरण भी रामको नमस्कार करते हैं; परन्तु उसकी क्षत्रियताको मानकर नहीं; किन्तु उसे ' परमात्मा-का अवतार ' मानकर । इस प्रकार विश्वामित्रने उसे छोटी श्रासे पूजित नहीं किया, किन्तु विष्णुका अवतार होनेसे । पं. ७ ' सर्वथा च महाप्राज्ञ! पूजार्हेण सुपूजितः ' ( १1 -५२।१७ ) इस रामायरगके वाक्य में ' नमस्ते ' नहीं । श्रौर न ही ' नमस्ते ' शब्दसे पूजन बताया है, किन्तु ' फलमूलेन भगवन् पाद्येनाचमनीयेन भगवद्दर्शनेन च ' ( ११५२।१६ ) ' पूजितः ' यह अग्रिम पद्यसे सम्बन्ध है । तब पाद्यादिसे पूजन और होता है, और ' नमस्कार ' से पूजन अन्य होता है । इससे वादीकी इष्ट - सिद्धि नहीं । पं. १२ नमस्तेऽस्तु गमिष्यामि ' यहां विश्वामित्रने वसिष्ठ-को नमस्कार किया, सो उचित ही था । शेष ' ते ' के विषयमें उत्तर यह है कि पहले युष्मदके सभी एकवचन प्रचलित थे, Gujarat. An eGangotri Initiative
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३०० * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * वस्तुतः वे विधिशास्त्रसे विरुद्ध होनेसे अब सम्माननीय प्रति प्रयुक्त नहीं । इसमें आप लोगोंके - मान्यको संस्कृतमें भेजे हुए युष्मदके एकवचन के प्रयोगसे रहित पत्र ही प्रमारण हैं । पं. १५ ' नमस्तेस्तु महावृक्ष ' ( २२५५/२५ ) इसमें वृक्षको नमस्ते लिखी है । समीक्षा- इसमें वादीने अपने पक्षका खण्डन किया वा हमारे पक्षका? हम ' ते ' शब्दका लौकिक वर्तमान व्यवहार में ही निषेध करते हैं, सो वृक्षके लिए कोई भी युष्मद् - शब्द के एक वचनका निषेध नहीं करता । बाकी रहा - वृक्षको ' नमः ' कहना, यह तो मूर्तिपूजा है, जो वादीने भी मान ली । यहां पर वृक्षाभिमानी देवसे सीताने अपने पतिव्रत धर्म के अक्षुण्ण रखनेकी प्रार्थना की है । पं. १७ ' नमस्ते राक्षसोत्तम! ' राक्षसयोनि देव - दैत्यादिकी अपेक्षा निन्दित होने पर भी मनुष्य योनिसे उच्च मानी गई है, क्योंकि उसे देवग्रहके अन्तर्गत माना जाता है । जैसे कि सुश्रुत-सं. में - ' देवास्तथा शत्रुगरणा ( दैत्या ) श्च तेषां, गन्धर्वयक्षाः पितरो भुजङ्गाः । रक्षांसि या चापि पिशाचजातिरेषोऽष्टको देवगरणग्रहाख्यः ' ( उत्तरतन्त्र ६०।७ ) लोकोत्तर होनेसे उसे ' नमः ' कहा गया है, मानुषिक व्यवहारसे दूर होनेके कारण युष्मद् शब्दका एकवचन दिया गया है । पृ. २२ पं. ३ ' देवदेव! नमस्तेऽस्तु ' ( अध्यात्म ) यहां पर कौशल्याने अपने पुत्र श्रीरामको परमात्मा जानकर ही नमस्कार की है, तभी तो उसे ' देवदेव! ' कहा है । परमात्मा * नमस्ते प्रचार - समीक्षा G ३०१ मानुषिक व्यवहार में नहीं, इसलिए उसे ' ते ' कहा जाता है । फिर ' नमस्ते ' के उत्तर में ' नमस्ते ' नहीं कहा गया । पं. ५ ' ननाम राघवो ऽहल्यां ' यहां पर ' नमस्ते ' नहीं । ग्रहल्या मुनि - पत्नी थी, और श्रीरामचन्द्र मर्यादा पुरुषोत्तम थे, प्रतः मर्यादा पुरुष क्षत्रिय श्रीरामने उसे नमस्कार करनी न हो श्रीग पं. ६-७ ' संपूज्य विधिवद् रामं दण्डवत् प्रणिपत्य सां श्र यहां वही ' दण्डवत् ' शब्द है. जिसे पृ. ३७ में वादी घृणित बतलायेंगे । फिर उसीका प्रमारण यहां देकर वादी अपने पक्ष का खण्डन करते हैं वा मण्डन- यह तो वै ही जानें । यहां भी ' नमस्ते ' शब्द नहीं । यह है ' नमस्ते प्रचार '!!! श्रीरामने य • मानुषिक - व्यवहार में मुनिपत्नी होनेसे उसे नमस्कार किया, परन्तु प्र उसने परमात्मा - रूपसे उसकी पूजा की पं. ८ ' नमोऽस्तु ते राम! ' यहां पर परमात्मा के अवतार रामको कहा गया है । कभी वादियोंने भी ' नमोऽस्तु ते ' कहां-है? यदि नहीं; तब उनका यह प्रमारण विफल है । इसी प्रकार पं. में अग्रिम - श्लोक ' नमस्ते पुरुषाध्यक्ष! नमस्ते भक्त श वत्सल आदि श्लोकों में भी समझें । भगवान्को सभी भाषाएं युष्मका एकवचन देती हैं । इसके आगे जितने श्लोक वादीने दिये हैं, उनमें ' नमस्ते ' शब्द ही नहीं । - पृ. २३ पं. ६ ' नमोस्तु ते देव विशालबुद्धे! ' यहां पर नमस्ते ' ' शब्द " नहीं । क्या आर्यसमाज ' नमोऽस्तु ते ' को ठीक मानता है? यदि ऐसा है तो तदनुयायी इसका प्रयोग क्यों CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative: