सनातन धर्मालोक १-२ — पृष्ठ 31–40

सनातन धर्मालोक १-२ · पृष्ठ 31–40

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४२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) यह भी इसमें विचारणीय है कि अभिवादनार्थक ' नमः ' पद है वा ' ते ' भी? यदि ' नमः ' ही है तो उस ' नमः ' का प्रयोग तो अभिवादनार्थमें ठीक ही है; पर उसमें ' ते ' लगाना अनि-वार्य न हुआ । अपेक्षित सर्वनाम ' श्रीमते भवते, भवद्भ्यः ' जो इष्ट होगा उसका प्रयोग हो जायगा; क्योंकि - युष्मद् के एकवचनका प्रयोग आजकल किसी भी भाषा में प्रयुक्त नहीं । ' नमस्ते ' में दो पद होने से ' द्वित्वादिकं सर्वत्र अनित्यमेव ' इसका प्रयोग भी अनित्य हुआ; नित्य नहीं । अन्य यह बात याद रखनी चाहिये कि -'नमः ' का प्रयोग श्रायुवा योग्यता में बड़े के लिए किया जाता है जैसे कि-' यजाम ( पूजयामः ) इद् नमसा वृद्धम् ' - ( ३।३२।७ ) छोटेके लिए नहीं; क्योंकि ' नमः ' वन्दनावाचक है, आशीर्वादवाचक नहीं । जैसे कि - ' वन्दध्यै नमोभिः ( ऋ ० १।२७।१ ) ' वदि ' श्रभिवादनस्तुत्योः ' यह धातु श्रभिवादनार्थक है । ' नमसा विधेम ' ( ऋ ० १।११४१२ ) ' नमसा सपर्यन्ति ' ( १६४ | १२ ) छोटेकी वन्दना वा पूजा नहीं की जाती । उसे श्राशीष दी जाती है । छोटेको ' ते ' तो कहा जा सकता है, परः ' नमः ' नहीं कहा जा सकता । ' नमः ' का प्रयोग समानके लिए भी त्र नहीं होता, किन्तु योग्यतासे बड़ के लिए होता है; यह अन्य नी बात है - कोई दूसरे समानको भी अपनेसे योग्यतामें बड़ा समझ 7. कर ' नमः ' कह दे । पर ' ते ' का प्रयोग नहीं होता । फलतः ' नमस्ते ' का प्रयोग किसी भी दशा में ठीक नहीं । इसपर जो कोई प्राक्ष ेप किये जाते हैं, वा स्वपक्ष - पुष्टि के लिए कई CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat • बहुवचनमें ' नमस्ते ' (? ) * ४३ वेदादि प्रमारण दिये जाते हैं, इस पर विचार अग्रिम निबन्धों में होगा । ( २ ) क्या बहुवचनमें ' नमस्ते ' हाता है? गत निबन्ध में " नमस्ते " एक पद है, इस मतका निराकरण किया गया है; पर इस विषय में वादिगरण कई वेद - मन्त्र देते हैं; वे यह हैं-( २ ) पूर्वपक्ष ( क ) ' नमस्ते यातुधानेभ्यो नमस्ते भेषजेभ्यः ' ( अथर्व ० ६।१३।३ ) यहां पर बहुवचनमें ' नमस्ते ' का प्रयोग उसे एकपद वा निपात बताता है । ( ख ) अन्य मन्त्र यह है ' नमस्ते लाङ्गलेभ्यः ' ( श्र ० २२८४ ) ( ग ) नमस्ते श्रस्तु पश्यत पश्य मा पश्यत ' ( १३।४।४८ ); यहां पर भी वही बात है । इससे स्पष्ट है कि ' नमस्ते ' एक पद वा निपात है । " [ यह प्रश्न मेरे आर्यसमाजी छात्र श्रीमहेन्द्रप्रताप शास्त्री ने मेरे पास भेजा था, यह बताया जा चुका है । कदाचित् ये मन्त्र श्रीयुधिष्ठिरजी मीमांसकने उस छात्रको बताए हों । मुलतानसे इधर आने पर मुझे ' नमस्ते प्रदीप ' नामक ट्रैक्ट भी मिला है, इसके निर्माता गुरुकुल - घरौण्डा ( करनाल ) के श्राचार्य स्वामी रामेश्वरानन्दजी हैं । अपने निबन्धके १६ वें पृष्ठ पर प्रश्नोत्तर लिखते हैं-" प्रश्न - नमस्ते एक पुरुष के लिए किया जा सकता है; किन्तु बहुत मनुष्योंके लिये नमस्ते करना भूल है? उत्तर-वेदमन्त्रों में अनेक स्थलोंपर बहुवचनके लिए ' नमस्ते ' यह . An eGangotri Initiative

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४४ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * शब्द आता है? यथा ( क ) ' नमस्ते यातुधानेभ्यः, ' नमस्ते भेषजे-भ्यः ' । ( ख ) ' नमस्ते लाङ्गलेभ्यः ( पूर्वोक्त मन्त्र ) ( ग ) ' नमस्ते घोषिरणीभ्यः नमस्ते केशिनीभ्यः नमस्ते देवसेनाभ्यः ( अथर्व ० ( १११२।३१ ) ( घ ) ' नमस्ते श्रस्तु रुद्ररूपेभ्यः ' ( नारायणोप-निषद् १६।१६ ) इत्यादि अनेक प्रमारण उपस्थित किए जाते हैं । ( ङ ) नमस्ते में ' तुभ्यं ' का ' तें ' नहीं; किन्तु ' नमस्ते ' एक पद है; इसमें प्रमारण यह है कि नमस्तेके साथ ' तुभ्यं ' भी श्राता है; जैसे कि - ' तुभ्यं नमस्ते ' ( श्रथर्व ० सं ० १११३1३ ) [ यदि वादी के उक्त प्रसारण ' सिद्ध ' हो जावें; तब निस्सन्देह ' नमस्ते ' एक-पद सिद्ध हो सकता है; पर खेद है कि वादी ने या तो स्वयं हीं धोखा खाया है; या साधारण जनताको धोखा दिया है, यह विद्वान् पाठक स्वयं जान लेंगे । अब इन मन्त्रोंपर क्रमशः विचार किया जाता है । ] ( उत्तरपक्ष ) ( क ) इन प्रक्षिप्त मन्त्रोंमें प्रथम सम्पूर्ण मन्त्र इस प्रकार है- ' नमस्ते यातुधानेभ्यो नमस्ते भेषजेभ्यः । नमस्ते मृत्यो! मूलेभ्यो ब्राह्मणेभ्यः इदं नमः ' ( प्रथर्व ० सं ० ६११३१३ ) पाठकगरण पहले यह याद रखें कि इन मन्त्रों में एक-वचनमें हो ' नमस्ते ' आया है; बहुवचनमें नहीं । बहुवचनमें सदा वेदमें " नमो वः ” प्राता है । उक्त मन्त्र बल्कि सूक्तमें विशेष्य तथा सम्बोध्यमान ' मृत्यु '.. ही है; वह एक वचनान्त है । इसी कारण इस मन्त्र से पूर्व मन्त्र में " मृत्यो! नमोस्तु ते " ( ६।१३।१ । ) इस तथा " सुमत्यै मृत्यो! ते नमः ” ( ६।१३।२ ) इस मन्त्रमें उस मृत्युके लिए * बहुवचनमें ' नमस्ते ' (? ) * ४५ एकवचन दिया गया है । इस प्रकार प्रकृत मन्त्रमें भी जान लेना चाहिये | हे मृत्यो! ' ते यातुधानैभ्यो नमः ' यह अन्वय है । ' यहां ' ते ' का " तुभ्यम् " ( तेरे लिए ) यह अर्थ नहीं; न 2 ही ' नमस्ते ' यहां एक पद है, किन्तु यहाँ ' ते ' का ' तव ' ( तेरा ) यह अर्थ है, ' ते ' पद ' तुधानेभ्यः ', आदि का विशेषरण नहीं, किन्तु मृत्युका सम्बन्धज्ञापक षष्ठयन्त पद है । ' नम ' के योग में चतुर्थी ' यातुधान ' प्रादिको हुई है । अब उक्त मन्त्रका यह अर्थ हुआ कि - ऐ मृत्यु! तेरे यातु. धानोंको ' नमः ' हो, तेरी प्रोषधियोंको नमस्कार हो, तेरे मूल को नमस्कार हो, तेरे ब्राह्मणोंको ( जो शाप देकर मारते हैं ) नमस्कार हो । ' यहां पर ते ' यह एकवचन और षष्ठ्यन्त सर्वनाम है । जब किसीको सम्बोधन दिया जाता है; तो उसे प्रत्यक्ष समान बुलाना पड़ता है; तब वहां प्रभिमुख्यके लिये युष्मद् आदि सर्वनामका देना आवश्यक हुआ करता है; यही बात यहां पर भी घटा लेनी चाहिये । उक्त मन्त्र में ' ते ' यह एक वचन है और षष्ठ्यन्त है-यह केवल हमारी कल्पना नहीं; किन्तु यहां सर्ववेद भाष्यकार श्रीसायणाचार्य ने भी ऐसा ही अर्थ किया है । आज - कल श्रार्यसमाजी भाष्यकार श्रीराजाराम शास्त्री, श्रीपाददामोदर सातवलेकर, श्रीक्षेमकरण त्रिवेदी तथा वेदके चार संहिता के भाष्यकार श्री जयदेव - विद्यालंकार प्रादिने भी यहां ' तें यातुधानोंको नमस्कार, इस प्रकार यहांके ' ते'का ' तेरा, प अर्थ किया है; तब यहां बहुवचनमें नमस्तेका प्रयोग सिद्ध CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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४५ ४६ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) बान स्वय हुआ । न ' नमः ' के योगमें ' चतुर्थी ' हुआ करती है, परन्तु ' नमस्ते यातुधानेभ्यः ' यहां ' तुभ्यं प्रर्थ तो है नहीं; किन्तु ' तव ' यह हौं, श्रर्थ है । इसी कारण ' ते ', का ' नमः ', से सम्बन्ध नहीं है, किन्तु उसका सम्बोध्यमान मृत्युसे सम्बन्ध है, इसीलिए ' ते ' में षष्ठी है । और नमः का योग ' यातुधानेभ्यः ', से है; श्रतः यातुधानेभ्यः, में चतुर्थी हुई है । तब नमस्तेका बहुवचन से कोई सम्बन्ध सिद्ध न हुप्रा । यदि इस सूक्त के उक्त मन्त्र में ' नमस्ते ' यह अखण्ड पद वा श्रव्यय होता, तो इस सूक्त यन्त के प्रथम - मन्त्रमें ' मृत्यो नमोस्तु ते [ अ. ६।१३।१ ] यहां उसे नमः - ते म ' ग्रस्त, का व्यवधान न होता । इससे वेदका भी लिये ' नमः ' पदमें अभिनिवेश सिद्ध होता है, ' नमस्ते ' में नहीं । तभी तो वेदमें ' नम - उक्ति ' [ ऋ. १११८६१, ३।१४१२ ५४३६ ] नम - उक्तिभि: [ ऋ. ८।४।६ ] इस प्रकार ' नमः, ' की उक्ति तो आई है, ' नमस्ते ' की उक्ति कहीं भी नहीं आई । है. इससे वेदका प्रभिनिवेश ' नमः ' की उक्ति में ही सिद्ध हुआ । का इसीलिए ' नमो भरन्तः ' [ ऋ. १।१।७ ] तो प्राया है ' नमस्ते भरन्तः ' नहीं आया । नोदा ( ख ) इस प्रकार ' नमस्ते लांगलेभ्यः [ श्र ० २८ | ४ ] इस मन्त्र में भी समझ लेना चाहिये । यहां भी ' नमस्ते ' दो पद हैं, एक - पद नहीं । इससे पूर्व के मन्त्र में ' बोरर्जुनकाण्डस्य वस्य ते ' [ २ | ८ | ३ | ] यहांपर ' ते ' एकवचनमें प्रयुक्त हुआ है रोगी के लिए | इसी प्रकार ' नमस्ते लांगलेभ्यः ' में भी ' ते ' एक-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. * बहुवचनमें ' नमस्ते ' (? ) G ४७ वचनमें है । यह रोगी के लिएहै कि तेरे लिए अर्थात् तेरे रोग की शान्त्यर्थ लाङ्गलों [ हलों ] को नमस्कार हो । फलतः यहां भी ' ते ' का लांगलोंसे कोई योग नहीं । प्रार्यसमाजी भाष्यकार श्रीजयदेव, श्री सातवलेकर, क्षेमकरण श्रादियोंने भी यहां ' तेरे हलोंके लिये सत्कार ' अथवा ' हलोंके लिये तुझे नमस्कार इत्यादि रूपसे एकवचनका अर्थ करके उक्त मन्त्रमें नमस्ते में ' नमस् ' और ' तो ' दो पद मान लिये हैं । इससे भी हमारे पक्ष की सिद्धि हुई । ( ग ) इसी प्रकार ' नमस्ते श्रस्तु पश्यत ' [ अ ० १३०४१४८ ] यहां पर भी बहुवचन में नमस्ते नहीं है । इस सूक्तका देवता सूर्य है वह एकवचनान्त है । ' पश्यत ' यहां यह बहुवचनान्त क्रिया नहीं, किन्तु एकवचनान्त सम्बोधन है, जिसका अर्थ-दर्शनीय है । इसलिए इस मन्त्रके श्रागे ' पश्य मा पश्यत '! यहां यह एकवचनान्त क्रिया स्पष्ट है । तब सूर्यके एकवचनान्त होने से ' ते ' यह संगत ही है । जब एतदादि - स्थल में बहुवचन में नमस्ते नहीं, यह सिद्ध हो गया; तब दो पद होनेसे यह परिवर्तनीय सिद्ध हुआ । तव ' नमस्ते ' ही एकमात्र कहना यह प्राग्रहके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं । [ यह समाधान हमने महेन्द्रप्रताप शास्त्रोको भेज दिया था; सोपपत्तिक होने से उसको भी रुचिकर प्रतीत हुआ, श्री-युधिष्ठिर जी मीमांसकको भी । ये सत्यके ग्रहणकर्ता थे; असत्यके श्राग्रही नहीं थे । अतएव इसमें ऊहापोहकी अधिक आवश्यकता नहीं रही । आशा है ' आलोक ' के विज्ञ - पाठकोंने An eGangotri Initiative

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४८ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * भी यह सब समझ लिया होगा । - ] अब गुरुकुल - घरौण्डाके आचार्य श्री रामेश्वरानन्दजीके दिये मन्त्रका समाधान दिया जाता है । उनका भी प्रादिम दो मन्त्रों में अधिक अभिनिवेश था, उनका तथा उन पर को हुई श्रापत्तियों का समाधान कुछ आगे किया जायगा, कुछ यहां पर कर दिया गया कि - यहां बहुवचनमें तथा एकपद - रूप में नमस्तेका प्रयोग नहीं है किन्तु एक वचन तथा दो पदोंके रूपमें है । अब उनसे दिये गये मन्त्रों का समाधान दिया जाता है । ३ ( पूर्वपक्ष ) एक मन्त्र उन्होंने यह भी दिया है - ( क ) नमस्ते घोषरणीभ्यः नमस्ते ' देवसेनाभ्यः ' ( प्र. १०।२।३ ) ( ख ) श्रन्य प्रमारण हैं - ' नमस्ते रुद्ररूपेभ्यः ' नारायणोपनिषत् ( १६३१६ ) यहां पर भी वे बहुवचनमें नमस्ते का प्रयोग दिखाकर उसे एकपद वा अव्यय सिद्ध करते हैं; पर वह भी ठीक नहीं । पूर्वापर प्रकरण यदि देखा न जाय; तो इस प्रकारके बहुत से भ्रम साधारण ज्ञान वालोंको वञ्चित कर देते हैं, यह बात अनुभवी विद्वान् जान सकते हैं । उत्तर- पक्ष-( क ) ' नमस्ते घोषिणीभ्यः ' इस मन्त्रके सूक्त में महादेवका भव, शर्व, रुद्र इन शब्दोंसे वर्णन तथा सम्बोधन किया गया है । ' भव ' इस मन्त्र से पूर्वके एक - दो मन्त्र देख लेने चाहियें । ' भव! राजन्! यजमानाय मृड ' ( श्र ० ११।२।२८ ) यहांपर ' भव ' शब्द से महादेवको सम्बोधित किया गया है । अब इससे * बहुवचनमे ' नमस्ते ' (? ) * ४३ अग्रिम मन्त्र देखिये- ' स्वां तन्वं रुद्र! मा रीरिषो नः ( ११२ २६ ) यहांपर महादेवको रुद्र शब्द से सम्बोधित किया गया है । अब इससे अग्रिम मन्त्रको देखना चाहिये, वह यह है-‘ रुद्रस्य ऐलवकारेभ्यः श्वभ्यो प्रकरं नमः ( अ. ११।२ ३० ) यहां रुद्रके बड़े मुख वाले कुत्तोंको नमस्कार किया गया है । श्र इससे अग्रिम मन्त्र वही है - ' नमस्ते घोषिरणीभ्यो नमः केशिनीभ्यः । नमो नमस्कृताभ्यो नमः सम्भुञ्जतीभ्यः । नमः देव! सेनाभ्यः ' [ ११ ।२ ३१ ] इस मन्त्रमें रुद्र की fafar सेनाओं को नमस्कार किया गया है । रुद्र इन मन्त्रों में एक वचन है, यह विज्ञ पाठकगरण देख ही चुके हैं । अब इस म में उसी रुद्र को ' देव ' शब्द से सम्बोधन दिया गया है । सम्बोधनवाले को प्रत्यक्षके समान माना जाता है और से युष्मद् आदि सर्वनामसे परामृष्ट किया जाता है । जैसे निरुक्तकारने इसका संकेत दिया है- ' प्रथ प्रत्यक्षर मध्यम- पुरुषयोगाः त्वमिति च एतेन सर्वनाम्ना ' [ ७२२ प्रर्थात् प्रत्यक्षकृत ऋत्राओं में ' त्वं ' इस सर्वनामका प्रयोग होते है और मध्यम पुरुषका । ' त्वं ' यह युष्मद्का प्रथमान्त हो है । उसमें तो मध्यम पुरुष होता है; पर युष्मद्को चतु आदि विभक्ति हो, तो मध्यम पुरुषकी क्रिया तो नहीं हो पर उसकी प्रत्यक्षता अक्षत होगी । तात्पर्य यह है कि सम ध्यानको अभिमुख ( मुखातिब ) करनेके लिए उसे यु शब्दकी भिन्न - भिन्न विभक्तियोंको प्रयुक्त किया जाता है । स ० ध ० ४ CC - 0: Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangptri Initiative

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४३ C ५० * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * गया उक्त मन्त्र में रुद्रकी सेनाओं का वर्णन है । सायणाचार्य भी मानते हैं कि- ' अतः परं महादेवरुद्रस्य परिवारा नमस्का-रेण प्रार्थ्यन्ते । ' उसी रुद्रको इस मन्त्र में ' देव ' इस एकवचनान्त शब्दसे संबोधित किया गया है । वह रुद्रदेव है एकवचनान्त, नमस्ते उसीको फिर युष्मद् - शब्द के षष्ठ्यन्त ' ते ' ( तव ) से परामृष्ट करके उसके सम्बन्ध वाली सेनाको नमस्कार किया गया है । अब उक्त मन्त्रका अर्थ यह हुआ कि -देव! रुद्र! ते - तव घोषिरणीभ्यः शव्दकर्त्रीभ्यः, केशिनीभ्यः - केशवतीभ्यः, नम-मन स्कृताभ्यः, सेनाभ्यः साधारण सेनाभ्यश्च नमः अर्थात् ऐ रुद्र! है तेरी ललकारनेवाली तथा साधारण सेनाओं को नमस्कार हो । फलतः उक्त मन्त्र में ' नमः - ते ' इसमें का ' ते ' न तो बहु-वचन में है, न ही ' नमः ' के साथ मिलकर एक पद है, न यहां नकु ' ते ' का अर्थ ' तुभ्यम् ' है; किन्तु ' ते ' का यहां ' तव ' तेरी- अर्थ है । RIR इसका ' नमः ' से योग न होकर देव रुद्र से सम्बन्ध है, अतः सम्बन्धमें उसमें षष्ठी है; और ' नमः ' का योग ' घोषिरणोभ्यः ' श्रादिसे है; ग्रतः उनमें चतुर्थी हुई है । अब यह अर्थ प्रति-फलित हुआ - हे देव! ते तव घोषरणीभ्यः केशिनीभ्यः सर्वजन -होग नमस्कृताभ्यश्च सेनाभ्यो नमोस्तु । ' तब यहां बहुवचन में सम नमस्ते सिद्ध नहीं; प्रत्युत यहां तो ' नमः ' शब्द सिद्ध हुआ । ' ते ' षष्ठ्यन्त होनेसे उसका ' नमः ' से कोई सम्बन्ध ही नहीं । ( ख ) इसी प्रकार ' नमस्ते रुद्र रूपेभ्यः ' ( नारा. १६-१९ ) में भी यही बात है । यहां हे रुद्र! ते तव रूपेभ्यो नमः; हे रुद्र! तेरे रूपोंको नमस्कार हो यही अर्थ है । प्रथवा नारायणोप-CC - 0. Ankur Joshi * बहुवचन में ' नमस्ते ' (? ) * ५१ निषत्को १६ वीं कण्डिका में ' शर्वाय नमः, शिवाय नमः शिव-लिंगाय नमः ' और दवीं कण्डिका में ' रुद्राय नमः ' इस प्रकार महादेवका प्रकरण चालू है; तब ' नमस्ते रुद्ररूपेभ्यः ' का अर्थ हुआ कि - हे महादेव! " ते तव रुद्ररूपेभ्यो नमः ' तेरे स्वरूपों को नमस्कार हो । यहां पर भी बहुवचन में ' नमस्ते ' न होकर ' नमः ' ही सिद्ध हुया । ' ते ' तो षष्ठयन्त होनेसे ' नमः ' से कुछ भी सम्बन्ध नहीं रखता । श्रतः स्पष्ट है कि वेदादि - शास्त्रोंमें ' नमस्ते ' कहीं भी एकपद नहीं माना गया । और इन प्रमाणों में बहुवचनमें नमस्ते न होकर एकवचनमें है । अतः ये दो पद हैं । दो पद होने से ' नमस्ते ' ( नमः - ते ) यह परिवर्तनीय हुग्रा ।. इसी " नमस्ते " को एक पद सिद्ध करनेके लिए श्रीरामे-श्वरानन्दजी ने एक वेदमंत्र अपने ' नमस्ते प्रदीप के १२ पृष्ठ में दिया है, वह यह है: - ४ ( पूर्व - पक्ष ) ' तुभ्यं नमस्ते ' ( १११३३ ) इस मन्त्र के देने में तात्पर्य यह है कि यदि ' नमस्ते ' ये दो पद होते तो इसमेंका ' ते ' शब्द ' तुभ्यं ' का आदेश होता । फिर जहां ' नमस्ते ' ये दो पद इष्ट होंगे; वहां ' नमस्ते ' के साथ ' तुभ्यं ' कभी आ ही नहीं सकता । पर जब उक्त मन्त्र में ' तुभ्यं नमस्ते ' आता है, इससे स्पष्ट सिद्ध हो रहा है कि ' नमस्ते ' एक पद है । तभी उन्होंने इसका अर्थ अपने ट्रैक्ट में लिखा है ' तुभ्यं नमस्ते ' ( अ. १1१३1३ ) " आपका नमस्ते इस श्रादर वाचक शब्द से सत्कार हो । " ( उत्तर- पक्ष ) ' तुभ्यं नमस्ते ' इसी मन्त्रांशको जो वादी ने अपने पक्ष ' नमस्ते ' के एक पदत्वको सिद्धि में दिया है; Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 36

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५२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) ० उसका अनन्वित अर्थ करके तो वादी ने वेदपर श्राक्रमरण कर दिया है । हम यह मन्त्र सम्पूर्ण देते हैं; उससे उनका पक्ष सर्वथा निरस्त हो जायगा । वह मन्त्र यह है-' प्रवतोनपाद्! नम एवास्तु तुभ्यं ( पहला पाद ), नमस्ते तये तपुषे च कृण्मः । ( दूसरा पाद ) । विघ्नते धाम परमं गुहा यत् । ( तीसरा पाद ) समुद्र अन्तर्निहितासि नाभिः । [ चौथा पाद ] ( अ. १।३३।३ ] यहां ' तुभ्यं ' शब्द पहले पादके अन्त में है; इसका सम्बन्ध भी उसी पहिले पादके ' नम एवास्तु ' से है, दूसरे पादके ' नमस्ते ' से कोई सम्बन्ध नहीं । अतएव इस पादका अर्थ है कि हे प्रयतोनपात्! तुझे नमः ही हो; इससे वेदको ' नमः ' कहना ही इष्ट होता है, नमस्ते नहीं । तभी ' एव ' शब्द दिया गया है । अग्रिम पादमें भी ' नमः ' व ' ते ' ये दो पद हैं । यहां ' ते ' तव-[ तेरे ] वाचक है, अर्थ यह हुआ कि प्रवतोनपात्! हम [ ते ] तेरे [ हेतये ] शस्त्र तथा तेरे ( तपुषे ) त ेजको [ नमः कृण्मः ] नमस्कार करते हैं । अब जब ' तुभ्यं ' का सम्बन्ध नमस्ते से है ही नहीं; किन्तु ' नम एवास्तु ' से है; तब नमस्ते की एक - पदता कट गई । ' नमस्ते ' हेतये ' में ' ते ' प्रवतोनपात्का संबन्धवाचक षष्ठ्यन्त एक - पद है ' ते ' [ तव ] नमः ' का योग हे ति ( शस्त्र ) तथा तपुष् ( तेज ) से है; अतः इन दोनों में चतुर्थी है । यहां ' ते ' का थं त ेरा होनेसे शेष ' नमः; ही बच गया । अब ' नमस्ते ' ' एक - पद कहां रहा? ' नमः स्वस्तिस्वाहा [ २ | ३ | १६ ] यह क्या नमस्ते एक पद है? ५३ प.रिणनिका सूत्र ' नमः ' के योगमें चतुर्थी बताता है, ' नमस्ते ' ' के योग में नहीं । इधर अव्यय वा निपातोंकी अनुक्र मिरणकाश्रम सर्वत्र ' नमस् ' ही आता है; ' नमस्ते ' कहीं नहीं । श्रतः ' नमस्ते ' का एक पद होना शशशृंग ही है । तब इधर - उधर के पद छिपाकर ' तुभ्यं नमस्ते ' इतना ही पाठ अपने सत्य पक्षको सिद्ध करने के लिए दे देना एक अक्षम्य अपराध ही है । इससे पूर्व जो कि वादी ने ' नमस्ते प्रवतोनपात् [ श्र ० १।१३।२ ] हे ज्ञानवान् राजन्! श्रापको ' नमस्ते ' यह श्रादर-' वाचक शब्द हो ' [ पृ. १२ ] यह अर्थ करके ' नमस्ते ' को एकपद सिद्ध करने का प्रयत्न किया है; यह भी व्यर्थ है । यहाँ पर प्रष्टव्य यह है कि इस मन्त्रके अर्थ में वादीने ' आपको नमस्ते हो ' यहां ' आपको ' यह उक्त मन्त्रांशके किस पदके अर्थ में दिया है? यदि ' नमः - ' ते ' में ' ते ' का यह अर्थ दिया है जो कि वास्त विकता है; तब तो ' नमः ' ' ते ' ये दो पद हो गये; और वादी का पक्ष खण्डित हो गया । यदि ' नमस्ते ' यह उनके मत में एक-पद है; तो ' आपको ' यह शब्द उन्होंने वेद - मन्त्रार्थ में प्रक्षिप्त कैसे कर दिया; जब कि वह मूल - मन्त्र में नहीं है? तब वेद में न्यूनता भी सिद्ध हो गई; क्योंकि ' प्रवतोनपात्! ' यह सम्बुद्धि - पद है । इसमें प्राभिमुख्य होने से उसका प्रतिपादक युष्मद् आदि सर्व-नाम अवश्य अपेक्षित होता है, और वह इसमें ' ते ' के रूपमें है-भी कि ' हे प्रवतोनपात्! तुझे नमस्कार हो । ' तब नमस्तेकी एक पदता कट गई । ' आपको नमस्ते यह आदर वाचक शब्द हो ये शब्द वादीने वेद - मन्त्र के अर्थ में कैसे प्रक्षिप्त कर डाले? यदि CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 37

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५४ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * " नमस्ते यह शब्द " ऐसा अर्थ वेदको विवक्षित होता तो वह ' नमस्ते इति शब्दो भवतेस्तु ' ऐसा देता । कमसे कम उसके एक पदत्वका निर्देशक ' इति ' शब्द अवश्य होता । न होनेसे ' नमस्ते ' ये दो पद सिद्ध हो रहे हैं । सभी प्राचीन अर्वाचीन भाष्यकारोंने हमारे ही अनुकूल अर्थ दिया है, अतः वादीका यह अर्थ अवैदिक सिद्ध हो गया । ५ ( पूर्वपक्ष ) ( क ) ' नमस्ते यातुधानेभ्यः ' में ' ते-तव यातुधानेभ्यः नमः ' आप यह क्यों अन्वय करते हैं ' नमस्ते यातुधानेभ्यः ' यह श्रन्वय क्यों नहीं करते? ( ख ) श्राप कहते हैं यहां " ते " यह सम्बन्ध षष्ठी वाचक शब्द है तो फिर ' नमः स्वस्ति - स्वाहा ' यह पाणिनि - सूत्र कहां गया? क्या ' नमः ' के. योग में कभी षष्ठी भी होती है? ऐसा सूत्र पाणिनिके व्या-करण में तो नहीं है । ( ग ) नमो देवेभ्यः ' तो होता है, ' देवा-नां नमः ' नहीं होता । अग्नये ' स्वाहा ' तो होता है; ' अग्नेः स्वाहा ' इस प्रकार षष्ठी नहीं होती । तब ' नमस्ते यातु-धानेभ्यः ' मन्त्र में नमः के साथ संबन्धित ' ते ' शब्द षष्ठ्यन्त कैसे हो सकता है? अतः स्पष्ट है कि यह ' नमस्ते ' एक - पव ही है; दो पद नहीं । " ( पत्र - व्यवहारमें स्वा. रामे. जी ) ( उत्तरपक्ष ) व्याकरण के विद्वान् वादीकी इस मीमांसाको देखकर हँसेंगे कि जिसे वेदांग - व्याकरणका ही ज्ञान नहीं; वह वेदसे नमस्ते ' यह एकपद सिद्ध करनेका साहस करता है? अब हम वादी रामेश्वरस्वामीकी इस श्रापत्तिका समाधान करते हैं; विद्वान् पाठक इस ओर ध्यान देंगे । CC - 0. Ankur Joshi Collection tion Garat Gujarat. * बहुवचन में ' नमस्ते ' (? ) G ५५ ( क ) ' नमस्ते यातुधानेन्यः ' ( प्र. ६।१३३ ) इसमें जो हमने ' ते ' का षष्ठयन्त अर्थ किया है, उसका कारण हम पीछे कह चुके हैं कि- इस मन्त्र में ' मृत्यो! ' यह एकवचनांत सम्वोधन है । श्राभिमुख्य में सम्बोधन होनेपर सम्बोध्यमानको किसी युष्मद् श्रादि सर्वनामसे परामृष्ट करना पड़ता है । तो यहां वह सर्वनाम ' ते ' है, वह मृत्युका सम्बन्धवाचक होनेसे षष्ठ्यन्त है । वादी के मत में तो ' नमस्ते ' एकपद होने पर आकांक्षित सर्वनामके प्रभाव होनेसे ' न्यून - पद ' दोष उपस्थित होता है । इस न्यूनता को दूर करनेके लिए उन्होंने अपने ' प्रदीप ' में " मृत्यो! " इस सम्बुद्धि - पदका पष्ठ्यन्त अर्थ अपनी कपोल-कल्पना से किया है । ( ख ) जो कि कहा जाता है कि- ' नमस्ते यातुधानेभ्यः ' में " ते " शब्द यदि सम्बन्ध में षष्ठीवाचक है, तो " नमः स्वस्ति " सूत्र कहां गया? ' नमः के योग में षष्ठी विधायक सूत्र पारिण-नीय व्याकरण में तो नहीं है - यह लिखकर स्वा ० रामे ० जोने व्याकरण विषयक अपना अज्ञान दिखलाया है । ' नमः ' के योग में भी ' कर्मादीनां सम्बन्धमात्र विवक्षायां षष्ठ्य व ' इस वचनसे जिसे स्वा. द. जीने महाभाष्यके धनु-सार अपने कारकीयमें ( कर्मादीनामविवक्षा शेषः ' ( पा. २ । ३।५० ) इस प्रकार लिखा है - षष्ठी हो सकती है जैसे कि-' मृच्छकटिक ' के नवम अङ्क में ' युष्माकमपि सुखं ददामि ' शकारके इस वाक्य में चतुर्थीके अवसर में भी षष्ठी घाई है, इस प्रकार ' नमो रघुकुलदेवतानाम् ' यहां, उत्तररामचरित के An eGangotri Initiative

पृष्ठ 38

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.. ५६ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * प्रथमांकके अन्तिम वाक्य में ' नमः ' के योग में षष्ठी भी देखी गई है । पर हम वह उत्तर न देकर वास्तविक उत्तर देते हैं । वादी ध्यानसे देखें । ' नमः स्वस्ति... वषड्योगाच्च ' ( पा. २।३।१६ ) यह पाणिनिका सूत्र है । इसमें ' योगात् ' का अर्थ है संयोग-संबंध | तब जब ' नमः ' इत्यादियों के साथ शब्दका योग हो, तब चतुर्थी होती है, यदि योग न हो तो वहां निकटता होने पर भी चतुर्थी नहीं होती । फलतः ‘ नमस्ते यातुधानेभ्यः ' इस मन्त्र में ' ' नमः ' शब्दका योग ' यातुधानेभ्यः ' के साथ है, इस कारण उसमें चतुर्थी हो ही गई । तो ' नमः स्वस्ति ' यह सूत्र कहां गया - यह प्राक्षेप परिहृत हो गया । चतुर्थी तो यहां पर प्रत्यक्ष ही है । ' ते ' का संबंध तो ' यातुधानेभ्यः ' से है । तो यहां ' षष्ठी शेषे ' [ पा. २ ३५० ] इस सूत्र से षष्ठी हो गई । ( ग ) शेष यह प्रश्न है- ' ते ' ( तव ) यातुधानेभ्यो नमः ' ऐसा अन्वय होने पर ' नमस्ते यातुधानेभ्यः ' इस मन्त्र में ' नमः ' और यातुधानेभ्य. ' का प्रापसमें व्यवधान हो जाता है, तब योग ( सम्बन्ध ) कैसे हो जाता है? इस पर उत्तर यह है कि-' यस्य येनार्थसम्बन्धो दूरस्थस्यापि तस्य सः । अर्थतो ह्यसमर्था-नामानन्तर्यमकाररणम् [ न्यायदर्शन वात्स्यायनभाष्य 91२18 ] अर्थात् जिससे जिसका सम्बन्ध हुआ करता है, वह व्यवधान होने पर भी हो जाता है, जिससे जिसका अर्थ - सम्बन्ध नहीं होता, उसकी निकटतासे भी सम्बन्ध नहीं हुआ करता है । यही बात ' मीमांसादर्शन ' के शावर भाष्य में भी कही है-* क्या नमस्ते एक पद है? ५७ ' असत्यां हि श्राकाङ्क्षायां सन्निधानमकारणं भवति । यथा भार्या - राज्ञः पुरुषो देवदत्तस्य ' ( ६ ४ २३ ) इस मीमांसाके वाक्य में ' राज्ञः पुरुषः ' इन दो पदोंके व्यवधान न होने पर भी श्रापसमें सम्बन्ध न होने से ' समर्थः पदविधि: [ पा. २ | १ | १ ] इस पदविधिके न होनेसे समास न हुआ । ' नमस्ते यातु धानेभ्यः ' में ' नमः ' शब्दका योग ' यातुधान ' शब्दके साथ है, इसलिए यातुधान में चतुर्थी हो ही गई । यातुधानका सम्बन्ध ' ते ' से है, अतः इसमें षष्ठी है । ' ते ' का ' नम: ' इससे श्रयं-सम्बन्ध न होनेसे उसमें चतुर्थी न हुई । वादी भी अपने वाक्य मैं ' नमः ' के योग में चतुर्थी मानते हैं, प्रयोगमें नहीं । ' ते ' का श्रर्थयोग ' नमः ' शब्द से नहीं है, केवल एक स्थान पर ' नमः ' ते ' इस प्रकार स्थित होनेका योग अवश्य है, इसलिए उसके फलस्वरूप विसर्गसन्धि सकार भी हो ही जाता है । ( घ ) मन्त्रों, पद्यों, गद्यों में भी ग्रागे पीछे ठहरे शब्द श्रन्वय सापेक्ष हुआ करते हैं । जैसे कि - अपने ' नमस्ते - प्रदीप ' के २४ पृष्ठ में वादी ने ' नमस्ते रुद्र! मन्यवे का अर्थ हे रुद्र! ते - तव मन्यवे नमः - नमस्कारोस्तु ' यह अन्वय लगाकर किया है, ७ पृष्ठ में ' दशकृत्वः पशुपते! नमस्ते [ प्र. ११।२18 ] का हे प्रभो! ते नमः -प्रापका सत्कार हो, इस प्रकार अन्वय ह लगाकर अर्थ किया है । इसी प्रकार यहां भी अन्वय होता स है ' है मृत्यो! ते तव यातुधानेभ्यो नमः ' इस प्रकार प्राक्ष स्व हट गया । ना ( ङ ) जो कि वे कहते हैं ' नमो देवेभ्यः ' मिलता है ' देवा त CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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५८ * श्रीसनातनघलोक ( १-२ ) * था. नां नमः ' नहीं, यह कहना भी व्याकरणमें अपना अज्ञान भी दिखलाना है | ' देवानां नमः पत्ये ' यह वाक्य भी हुआ करता है । यहाँ ' नमः ' का ' पत्ये ' से ' नमः ते यातुधानेभ्यः ' की तरह सम्बन्ध है, इसीलिए ' नमः ' के योग में चतुर्थी ' पत्ये ' में ही हुई है, ' देवानां ' में नहीं; क्योंकि ' देवानां ' तो ' पत्ये ' का सम्बन्धी पद है, अत: उस ' देवानां ' में ' नमः ते [ तव ] यातुधानेभ्यः ' के ' ते ' की तरह षष्ठी ही हुई । क्य ( च ) इसी तरह नेः स्वाहा स्त्रियै ' यह वाक्य भी होता है | यहां पर ' अग्नेः स्त्रियै [ अग्नाय्यै ] स्वाहा ' यह ग्रन्वय म है । पहले की तरह यहां भी ' स्वाहा ' का योग ' स्त्रिय ' से है; सके इसलिए यहां चतुर्थी है । ' अग्नेः ' यह तो ' स्त्री ' शब्दका सम्बन्धी पद है, इसी लिए यहां षष्ठी है । वादी से दिये हुए वय यही दोनों ' उदाहरण ' यातुधानेभ्यः ' में हमारे पक्षके पोषक के हैं कि - ' हे मृत्यो! ते तव यातुधानेभ्यो नमः । ' वादीका a! वेदांग - व्याकरणसे अभी पूर्ण परिचय नहीं; तो वेदमें वे कया ' नमस्ते ' को एकपद सिद्ध करनेके अधिकारी कैसे हैं? का ( छ ) प्रत्युत ' नमस्ते ' को एकपद माननेमें कई दोष प्रा वय हैं । एक यह कि फिर ' नमस्ते ' के योग में चतुर्थी करने वाला ता सूत्र ' अष्टाध्यायी ' में नहीं मिलता । वहां पर ' नमः - स्वस्ति ओ स्वाहा ' ( २।३।१६ ) यह ' नमः ' के योग में चतुर्थी - विधायक सूत्र है, ' नमस्ते - स्वस्ति ' इत्यादि सूत्र नहीं । जब कि ' सर्वारिण नामानि प्रख्यात जानि ' यह सिद्धान्त स्वा ० रा. भी मानते हैं, वा तब उन्हें बताना पड़ेगा कि - ' नमस्ते ' क्या प्रकृतिप्रत्यय CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. * ' नमस्ते ' एक पद नहीं ५६ हैं? यह तद्धितो शब्द है - या कृदन्ती? इसमें प्रमारण क्या है? वेदमें रूढ शब्दोंको प्रार्यसमाज नहीं मानता, तब यह रूढ शब्द भी न रहा । ( ज ) नमस्ते के प्रवर्तक स्वा ० दयानन्दजी माने जाते हैं, उन्होंने नमस्त ेको ‘ वेदोक्त - वाक्यं माना है, पद नहीं । पद-समूहको वाक्य कहते हैं, तब उनके मतमें भी इसमें दो पद हुए । एक पदको वाक्य कभी नहीं कहा जाता । इस लिए इसका अर्थ भी स्वा. द. ने ' मैं त ेरा मान्य करता हूँ ' यह किया है । यहां तेरा वा आपका श्रर्थ ' ते ' का ही है यह स्पष्ट है । तब यह दो पद सिद्ध हुए । स्वा. दया. ने निपातोंमें नमस् माना है नमस्ते नहीं | तब फिर ' त े ' के नमस्से भिन्न होनेसे नमस्त े ये दो पद सिद्ध हुए । ( झ ) नमस्त े को एक पद मानने पर इसमें वैदिक - स्वर-सञ्चारकी व्यवस्था भी नहीं रहती । दो पद मानने पर इसका स्वरसंचार ठीक हो जाता है । इस पर पाठकगरण देखें । नमस्में ' सर्वधातुभ्योऽसुन् ( उ. ४।१८६ ) यह असुन्_ -प्रत्यय नित् है, तब ' ज्नित्यादिनित्यम् ' ( पा. ६।१।१६७ ) से प्राद्यु-दात्त हुआ, फिर मकार को परिशेषसे ' अनुदात्तं पदमेकवर्जम् ' ( ६।१।१५८ ) से अनुदात्त हो गया, फिर उदात्तके परे अनु-दात्तको ' उदात्तादनुदात्तस्य स्वरितः ' ( ८ | ४ | ६६ ) से स्वरित हो गया । ' त ' ' अनुदात्तं सर्वमपादादौ ( ८।१।१८ ) से अनुदात्त है । स्वरितके सामने ठहरे अनुदात्तको ' स्वरितात् संहि-तायामनुदात्तानाम् ' ( पा. १२१३ ९ ) से प्रचय हो जाता है । An eGangotri Initiative

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६० * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * पर यदि उसके सामने उदात्त वा स्वरित प्रजावे, तो पूर्वके अनुदात्तको प्रचय न होकर ' उदात्तस्वरितपरस्य सन्नतरः ' ( पा. १।२।४० ) से अनुदात्ततर हो जाता है । जहां ' नमः ' के ' म ' को स्वरित न हो तो वहां समझना चाहिये कि उसके सामने उदात्त होगा । वहां पर ' नोदात्त स्वरितो ' ( पा. ८ । ४ । ६७ ) इस सूत्र से स्वरित निषेध होकर पूर्ववत् अनुदात्ततर हो जाता है । पर ' नमस्ते ' को एक पद मानने पर स्वरसंचार व्यवस्था ठीक नहीं बैठती । अतः इसका एकपदत्व खण्डित हो गया । इसके द्विपदत्व में खड़ी की हुई आपत्तियोंका भी समा-धान हो गया । ( ३ ) ' नमस्ते ' के एकपदत्वमें कई युक्ति - प्रमाण । श्रीस्वामी रामेश्वरानन्दजीके ' नमस्ते घोषिरणीभ्यः ' श्रादि मन्त्रोंमें इष्ट नमस्तेके एकपदत्वका निराकरण तो कर दिया गया; व उनके एतद्विषयक कई अन्य प्रमाण तथा युक्तियों पर विचार किया जाता है । ( ६ ) पूर्वपक्ष - वे ' नमस्ते प्रदीपके ' २० वें पृष्ठमें इस प्रकार प्रश्नोत्तर लिखते हैं- ( प्रश्न ) ' यह कैसे जाना जाये कि कहां पर ' नमस्ते ' ' नमः + ते ' के योगले सिद्ध होता है, और कहांपर ' नमस्ते ' एकपद अव्यय है? इसका आप उत्तर इस प्रकार देते हैं-उत्तर- ( क ) जहां पर विशेष प्रथमान्त हो वहां पर ' नमस्ते ' नमः - ' ते ' के - योग से सिद्ध होता है । ( ख ) जहां पर विशेष्य द्वितीयान्तवा चतुर्थ्यन्त हो; वहां पर " नमस्ते " एक पद श्रव्यय ही होता है । " जैसा कि - ' तस्माद् उ ह नायज्ञियं ब्रूयाद् नमस्ते * कई युक्ति प्रमाण * ६१ इति ' ( शतपथ. ७।३।२११३ ) यहां पर यज्ञिय ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यको नमस्तेका अधिकार दिया गया है । ' नमो विद्युते नमस्ते स्तनयित्नवे ' ( यजुर्वेद ) नमस्ते हरसे शोचिये नमस्ते ' ( यजु ० ३६ । २० ) तथा ' नमो नमस्ते गुरवे महात्मने । ( विवेक - चूड़ामणि ४८७ ) इत्यादि मन्त्र तथा इलोकों में " नमस्ते यह एक पद श्रव्यय है " यह लिखकर प्राप इसमें तर्क वायुक्तियां बताते हैं-" यदि यहां ' नमः + ते ' के योगसे नमस्ते सिद्ध होता; तो मन्त्र तथा श्लोंकोंमें प्राये चतुर्थ्यन्त पदोंमें चतुर्थी विभक्तिका होना निष्फल है; क्योंकि जब " ते " का अर्थ ही " तेरे लिये " हो जावेगा; फिर विशेष्य में चतुर्थी विभक्तिका होना कोई श्रयं नहीं रखता । यदि " विद्युते गुरवे, हरसे, शोचिषे " आदिमें आई हुई चतुर्थी का अर्थ यह किया जाता है कि- गुरुके लिए, विद्युत् के लिए - इत्यादि तब तो नमस्ते में आई हुई चतुर्थी विभक्ति, " ते " का कोई अर्थ नहीं रहता । यदि यह कहो कि - " नमः स्वस्ति " इस पाणिनीय सूत्रके आधार पर यहां चतुर्थी विभक्ति हुई है; तो हम पूछेंगे कि इस चतुर्थी विभक्तिका अर्थ क्या होगा? यदि " लिये " अथं करोगे; तो उक्त दोष (? ) आयेंगे । यदि कहो कि अन्य अर्थ करेंगे पा तब हम यह पूछेंगे कि इसमें चतुर्थी विभक्ति करनेका वा फल है? यदि कहो कि यह चतुर्थी विभक्ति निरर्थक है; तर तो वेद पर बड़ा भारी दोष आयेगा, क्यों कि — उसकी ते क्र एक मात्रा भी निरर्थक नहीं है ' । ( ' नमस्ते प्रदीप ' पुष व CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative