सनातन धर्मालोक १-२ — पृष्ठ 41–50

सनातन धर्मालोक १-२ · पृष्ठ 41–50

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६२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * २०-२१ । ) ( क ) इससे पूर्व स्वामीजी ने लिखा था- " जहां पर हमने विशेष्य प्रथमान्त हो; वहां पर " नमस्ते " " नमः ते " के योगसे सिद्ध होता है " इस द्विपदत्वमें उन्होंने कोई प्रथमान्त- विशेष्यता की हेतुतामें पृथक् उदाहरण नहीं दिया । यदि सम्बोधन का प्रथमान्त होना उनको इष्ट हो; वहां वे नमस्तेको दो पद मानें, तो ' नमस्ते यातुधानेभ्यः ' इस मन्त्र में " मृत्यो! " के प्रथमान्त तन होने से " नमस्ते यातुधानेभ्यः ' यहां पर " नमः, ते " उनके अनुसार लिये भी दो पद सिद्ध हो जायेंगे । ( उत्तर - पक्ष ) पहले हम वादी को इस कसौटी पर विचार कर फिर दूसरी कसौटी पर विचार करेंगे-लिए, हम पूर्व कह चुके हैं कि - ' नमस्ते ' के दो पद होने में वादी तुर्थी ने कोई उदाहरण पृथक् रूपसे नहीं दिया । अब उसकी पुस्तक के प्रमारण देखने चाहियें, जहां ' नमस्ते ' को ' दो पद ' माना हो । उक्त निबन्धके ७ वें पृष्ठमें ' दशकृत्वः पशुपते । नमस्ते ' ( अथर्व ० ११ २ \ ६ ) ' पशुपते! नमस्ते ' ( ११।२1११ ) इरोगे ' मा नः क्रुधः पशुपते! नमस्ते ' [ ११।२।१६ ] तीन रंगे मन्त्र दिये हैं । इनमें पूर्व मन्त्रका प्रर्थं लिखा है ' हे पश्वादिके पालक प्रभो! ते नमः - आपका सत्कार हो ' । क्य दूसरे मन्त्रका भी अर्थ पूर्ववत होनेसे उसे ' स्पष्टार्थ ' माना है । तृतीय- मन्त्रका अर्थ वादीने किया है- ' हे पशुपते! हम पर क्रोधित मत हो श्रापका सत्कार हो ' । यहां तीनों स्थलोंमें पुध वादीने ' नमस्ते ' को दो पद माना है । जहां वादीको ' नमस्ते ' ' CC - 0. Ankur Joshi * एकपदत्व में कई युक्तियां ६३ एक पद इष्ट होता है, वहां वह ' प्रापको नमस्ते हो ' ऐसा अर्थ लिखा करता है । यहां क्या कारण है कि वादीने ' नमस्ते ' में दो पद माने हैं? कारण स्पष्ट है यहां उसकी निजकल्पित पहली परि-भाषा दर्शनीय है । वह यह है कि- " जहाँ पर विशेष्य प्रथमान्त हो, वहां पर ' नमस्ते ' ' नमः + तें ' के योगसे सिद्ध होता है । " यहां पर ' पशुपति ' सम्बोध्य होनेसे विशेष्य है और वह प्रथ-मान्त है, क्योंकि सम्वोधन में प्रथमा विभक्ति हुआ करती है । तब उसकी पूर्वपरिभाषानुसार उक्त मन्त्रों में प्रयुक्त ' नमस्ते ' द्विपदात्मक हुआ । तभी तो उसने स्पष्ट रूपसे उसका ' ते-नमः ' ऐसा छेद किया है और अर्थ भी वैसा ही किया है । वादीका इस प्रकारका अन्य पृष्ठका उदाहररण भी देखें । उसकी पुस्तक १८ पृष्ठमें वादीने ' नमस्ते गन्धवं! ( अथर्व ० १४ । २ । ३४ ) यह मन्त्र दिया है । इसका अर्थ इस प्रकार लिखा है- " हे ( गन्धर्व! ) वेद - वारणीको धारण करने वाले ब्रह्मचारिन्! ( ते ) तेरे लिए ( नमः ) अभिवादन हो! " इससे प्रत्यन्त स्पष्ट हो गया कि वादीके मतानुसार जहां सम्बोधन वा प्रथमान्तता हो, वहां पर आया हुआ ' नमस्ते ' द्विपदात्मक होता है । यदि यह वादी की बात ठीक है, तो उसने जितने भी मन्त्र ' नमस्ते ' की एक - पदता में दिये हैं, उनमें से प्रायः सभी ( प्रतिशत निनानवे ) मन्त्रों में कोई सम्बो-धनान्त वा प्रथमान्त पद है, तब उन सबमें ' नमस्ते ' दो ' पद सिद्ध हो जाने से एकपदता न रही । वादी की प्रायः सम्पूर्ण Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 42

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६४ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * पुस्तक में इस प्रकार ' नमस्ते ' दो पद सिद्ध हो जानेसे उसका सम्पूर्ण परिश्रम उसके विरुद्ध जा पड़ता है- यह विद्वान् पाठकोंने समझ लिया होगा । अब वादीकी दूसरी परिभाषा जो ' नमस्ते ' को एक पद सिद्ध करने वाली है— उस पर भी हम विचार करते हैं । इस दूसरी परिभाषा के वादी ने उदाहरण भी दिये हैं और उसके लक्षण का सङ्गमन भी दिया है । विद्वानों का श्रवधान इधर अपेक्षित है । अब आगे फिर प्रश्नोत्तर लिखते हैं--प्रश्न- नमस्तेको आजतक किसीने भी एक पद नहीं माना; केवल आप ही यह हठ करते हैं कि नमस्ते एक पद भी है । उत्तर - हम वेद - मन्त्रों से दिखला चुके हैं कि - नमस्ते एक पद भी हैं; यदि उक्त मन्त्रोंमें ' नमः -ते के योगसे नमस्ते शब्द सिद्ध किया जायगा; तो कदापि अर्थ सङ्गत नहीं हो सकता । यथा - " नमस्ते हरसे " ( यजु. १७।११ ) इत्यादि मन्त्रों में नमः तेके योगसे नमस्ते सिद्ध नहीं होता; किन्तु एक पद ही है । पृष्ठ २३ में फिर आप लिखते हैं - महीधर उवटने भी नमस्तेको कई स्थलों पर एक पद मानकर अर्थ दिया है; जैसे " हे महावीर! पितेव नो अस्मान् बोधय, सर्वदा नमस्ते श्रस्तु " ( यजु ३७१२० ) हे महावीर, तू पिताकी तरह हमको जगा; श्रापको सब चोरसे नमस्ते यह आदर - वाचक शब्द प्रयुक्त हो, यह महीधरका अर्थ है । उवटका अर्थ है - " हे देव धर्म! सर्वदा नमस्ते श्रस्तु ( यजु ३८ । १६ ) तथा " नमस्ते स्तनयित्न-* ' नमस्ते ' एक पद नहीं ६५ रूपाय ” ( यजु. ३६।२१ ) “ नमस्ते अस्तु हे भगवन्!! ( यजु. १६।५२ ) यहां भी ' उबटने ' नमस्ते को एक पद माना है । " ( ७ ) पूर्वपक्ष - ' तस्माद् उ ह नाऽयज्ञियं ब्रूयाद् नमस्ते इति ( शत ० ७।३।२१।३ ) यहां पर यज्ञिय - ब्राह्मण, क्षत्रिय. वैय को ' नमस्ते ' का अधिकार दिया गया है । इससे ' नमस्ते ' एक. पद सिद्ध होता है । ( नमस्ते प्रदीप ) उत्तरपक्ष - शतपथके इस वचनसे ' नमस्ते ' एकपद सिद्ध नहीं होता - उसके पूर्वोत्तर - प्रकरण से वादीकी यह सिकत. भित्ति गिर पड़ेगी । यहां पर यजुर्वेद वा. सं ० ( १३।६-७०८ ) मन्त्रोंकी व्याख्या चालू है, जिनमें सर्वोको नमस्कार की गई है । जैसे कि - ' त्रिषु लोकेषु ये सर्पाः तेभ्यः एतद्न मंग् करोति । ( शत ० ७७३।१।२८ ) ये चैव वनस्पतिषु सर्पाः तेभ्यः एतद्नम-स्करोति ये च प्रवटेषु ( छिद्रेषु ) शेरते, तेभ्यः [ सपॅभ्यः ] एतन्नमः करोति ( २६ ), ये च सूर्यस्य रश्मिषु, तेभ्यः सर्पेभ्यो

नमः । यत्र - यत्र एते [ सर्पाः ], तत्रैव एतद् नमः करोति ' ( ३० ) ।

यहां सर्वत्र सर्पोंके लिए ' नमः ' शब्द प्राया है, नमस्ते कहीं नहीं ॥

यहाँ पर जो कि ' नमो नमः ' यह मूल - मन्त्र में चाया था, ब्राह्मण-भाग उसका अर्थ यों करता है:: - -' नमो नमः । यज्ञो वै नमः । यज्ञ नैव एतान् एतन्नमस्क: रेग a नमस्यति ' ( ७ | ३ | १ | ३० ) प्रर्थात् ' इनका यज्ञ करना ही इनको य नमः शब्दसे पूजना है । ' यह कहकर उपसंहार करते हैं- " तस्माद् उ ह न प्रयज्ञियं ब्रूयाद् नमः - ते इति । यथा ह एवं क स ० ध ०५ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 43

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www ६६ * श्रीसनातनधर्मालोक( १-२ ) * " ब्रूयाद् यज्ञः ते इति तादृक् तत् ( ७।३।११३० ) प्रर्थात् जो यज्ञ ति का अधिकारी ( शूद्रादि ) हो उसे यह ' नमः ( यज्ञ ) तेरे लिये दय है, ऐसा न कहे; क्योंकि ' नमः ' का प्रथं होता है ' यज्ञ ' । जैसे यज्ञ के अनधिकारी ( शूद्रादि ) को कह दिया जाये कि ' यज्ञः- ते ' यह यज्ञ तेरा वा तेरे लिए है, वैसा कहना उसमें उस सह का अनधिकार होनेसे ठीक नहीं होता, ऐसे ही यज्ञके अन-त. धिकारी शूद्र - प्रन्त्यज श्रादिको भी ' नमः - ते ' यह ' नमः [ यज्ञ वाचकशब्द ] तेरे लिए है ' ऐसा मत कहो । क्योंकि - जैसे प्रय-ज्ञिय - शूद्रादिको ' यज्ञ ' का निषेध है, वैसा प्रयज्ञिय शूद्रा-त दिको यज्ञिय नमः कहनेका भी निषेध है । परन्तु सर्प यज्ञिय हैं; जैसे कि ' ऐतरेय में कहा है... ' पाञ्चजन्यं वा एतदुक्थम् नमः देव - मनुष्याणां गन्धर्वाप्सरसां ( यज्ञः ); : [ सर्पारणां पितृणां च [ ३।३१ ] श्रतः उन्हें ' मन्त्रभाग ' ' तेभ्यः सर्पेभ्यो नम: ' [ यजु ० १३१६-७-८ ] कहकर उन्हें यज्ञार्थक ' नमः ' शब्द कहता है । अब पाठकों को प्रतीत हो गया होगा कि जिन मन्त्रोंका Ef यह व्याख्यान है, उनके मूल में ( वाज. यजु. सं. १३।६-७-८ ) ' नमः ' शब्द है ' नमस्ते ' नहीं । यदि यह एक पद होता; तो उक्त मन्त्रों में ' नमः ' न होता, किन्तु ' नमस्ते ' होता । दूसरा नमस्ते रेख का पर्याय शतपथ में ' यज्ञस्ते ' यह यहीं दिखलाया गया है । यदि ' नमस्ते ' एक पद होता; तो उसको ब्राह्मरण - द्रष्टा पहले हैं- ' नमो नमः ' न लिखते, किन्तु ' नमस्ते ' लिखते । पर वैसा नहीं एवं लिखा । और फिर ' यज्ञस्ते ' इसे नमस्तेकी प्रतियोगिता में रख कर सिद्ध कर दिया गया है कि ' यज्ञस्तो ' की भांति ' नमस्ते ' भी दो पद हैं । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat * कई युक्ति - प्रमाण ६७ यदि ' नमस्ते ' एक पद होता; तो उसकी प्रतियोगिता में ' यज्ञस्ते ' न कह कर केवल ' यज्ञः ' कहा जाता । पर ब्राह्मरण-भागने पहले ' नमो वै यज्ञः ' कह कर ' नमः ' का पर्याय वाचक ' यज्ञ ' है यह बता कर ' नमः ' यही पद सिद्ध कर दिया है, और ' ते ' को पृथक् पद बता दिया है । ' नमस्ते ' के स्थान में ' यज्ञस्ते ' ऐसा कह कर ' शतपथ'ने नमस्ते के एक पदत्वकी जड़ ही काट दी है, क्योंकि पूर्वपक्षी महाशय ' यज्ञस्ते ' को एक - पद मान ही नहीं सकते; इसमें यज्ञः ' नमः ' के स्थानापन्न है; और ' यज्ञस्ते ' बाला ' तो ' नमस्तेके ' टो'का अनुवाद है; तो ' यज्ञस्ते ' की भांति नमस्ते भी दो पद सिद्ध हो गये । श्राशा है - विद्वान् पाठकोंने पूर्वपक्षीके इस प्रमारणकी विफलता समझ ही ली होगी । इधर वादी अपने ' नमस्ते प्रदीप ' के २२ पृष्ठमें यज्ञिय-यज्ञमें अधिकृत ब्राह्मरण, क्षत्रिय, वैश्य इन तीन वरणको बताते हैं; शूद्र - अन्त्यज श्रादिको नहीं । यदि वे शतपथके इस प्रमारण से नमस्तेका प्रयोग ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंको करेंगे तो शूद्र-अन्त्यज आदिको वा उनके प्रति इसका प्रयोग न करना पड़ेगा-तब ' नमस्ते प्रदीप ' के ४४ पृष्ठमें दिखलाई हुई - ' परस्पर मिलते समय सत्कार करना हो; तब नमस्ते इस वाक्यका उच्चारण करके... नीच उत्तमों, तथा उत्तम नीचोंका निरन्तर सत्कार करें यह वादीकी वैदिक - प्राज्ञा खण्डित हो जाती है, और फिर नमस्तेकी उनसे अभिमत सार्वदेशिकता तथा सार्वकालि-कता भी कट जाती है । तब शूद्र, अन्त्यज प्रादियोंका ' नमस्ते ' . An इस eGangotri समाजियों Initiative प्रिय वाक्यमें अधिकार न होनेसे और

पृष्ठ 44

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६८ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) यह अधिकार न होनंते, यज्ञ - विषयक वेवमें भी अनधिकार सिद्ध हो जायगा । तो फिर पूर्वपक्षीके सम्प्रदाय श्रार्यसमा-जके सिद्धान्तका भी भंग हो जायगा । इस नमस्तोकी सिद्धिकी प्रसन्नता में वादीने अपनी समाजका भी खण्डन कर दिया । या वादी त्रैवरिकों को भी शतपथानुसार ' नमस्ते ' के स्थान पर ' यज्ञस्ते ' भी कहा करते हैं? यदि नहीं तो वादी के इस पक्षका भी निराकरण हो गया । ( ८ ) अब उनके ' नमस्ते को एक पद सिद्ध करनेके लिए दिये हुए अन्य प्रमाणोंपर जो पूर्वपक्षमें उद्धृत नहीं भी किये गये हैं विचार किया जाता है । पाठकगरण सावधानता से देखें । ' नमस्ते अस्तु विद्युते नमस्ते स्तनयित्नवे ' ( यजु ० २६।२१ ) उनसे दिये गये इस मन्त्रका भी यही अर्थ है कि हे भगवन्! ते तुभ्यं विद्युते नमोस्तु स्तनयित्नवे च, तुझ विद्युत्को, तुम स्तनयित्नुको नमस्कार हो, यहां श्रभिमुख करके कहा जा रहा है । अथवा हे भगवन्! ते तव ( विद्युते ) तेरी बिजली के लिए नमस्कार, अथवा जो तेरा विद्युत् - रूप है, उसे नमस्कार, तेरा जो स्तनयित्नुरूप है, उसे नमस्कार हो । ' इस प्रकार यहां दोनों ही दशाओं में ' नमस्ते ' दो पद है, एक पद नहीं । सन्धिमें नमः की विगों को स् होकर नमस्ते वन गया है । इस प्रकार ' नमस्ते हरसे शोचिषे ' [ १७१११ ] मन्त्रका अर्थ भी समझना चाहिये । इस मन्त्रका देवता [ वर्ण्यमान ] अग्नि है, व अर्थ यह हुआ कि ' ऐ अग्नि! ते तव - तेरे, सब रसोंको हररण करनेवाले तेजको नमस्कार हो, तेरी ज्वालाको CC - 0. Ankur Joshi Collection * क्या नमस्ते एक पद है? ६१ नमस्कार हो । ' इसमें भी स्पष्टतया नमस्ते में दो पद हैं । ' तो यहां पर अग्निका सम्बन्ध वाचक षष्टयन्त पद है । इसमें प्रमारण इस मन्त्रके, उत्तरार्धका ' त ' है; जैसे कि ' अन्यान्ते ' तपन्तु हेतयः । ' हम वादी इस मतसे सहमत नहीं कि उक्त मन्त्रों ' नमस्त ' को दो पद मानने पर अर्थ संगत नहीं होता । हा वादी के लिखे मन्त्रों पर उनके सम्प्रदाय के प्राचार्य स्वाम दयानन्दजी का भाष्य देन हैं । बड़े स्वामीजीने सभी स्थान ' नमस्त े ' दो पद माने हैं । इस पर छोटे स्वामीजी बताएं कि- क्या प्रसंगति पड़ती है? ' नमस्ते हरसे ' ( यजुः १७।११ ] | नमः - सत्करणं ते-तुभ्यं हरसे - यो दुःखं हरति तस्मै ' हे परमेश्वर! हरपा के हररण करने वाले ते - आपके लिए नमः - नमस्कार हो । " ' नमस्ते त्रियुते ' [ ३६२१ ] ' नमः ते तुभ्यं परमेश्वरा प्रस्तु, विद्युत - विद्युदिव अभिव्याप्ताय नमः ते भगवन् श्रत त न्तैश्वर्य सम्पन्न! अस्तु ' । विद्वान् पाठकोंने देखा होगा कि स्वा दयानन्दजी से किये इस अर्थ में ' नमस्ते ' ' पद मानने पर को य असंगति नहीं पड़ती; तब इन मन्त्रों में ' नमः ते ' ये । प पद सिद्ध हुए । के वादीने जिन मन्त्रों में ' नमस्ते ' को एक पद बताया है, । श्र उनमें कई मन्त्रों का स्वा ० द ० जी से प्रोक्त श्रर्थ देते ' तु Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 45

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I ७० * श्री सनातनधर्मालोक ( १-२ ) * इसमें जिनमें ' नमस्ते ' दो पद माने गये हैं । पाठकों असंगति प्रतीत नहीं होगी को उसमें कोई । ' शर्म मे यच्छ, नमस्तेस्तु ' ( यजुः ४।६ नमोस्तु ते उस तेरे लिए ) ते - तुभ्यं मम तिस्ते पिता मेरा अन्नादिपूर्वक सत्कार । ' स्वधि-त्वं मम नमस्ते अस्तु ' ( ३ | ६३ ) स्वा ० द ० भाष्य - ' स पितासि, ते तुभ्यं नमोस्तु ' । नमस्ते रुद्र! ( १६।१ ' नमः- वज्र ं ते तवोपरि ' । नमस्ते अस्तु ) थार नमः - सत्कार: ते - तुभ्यं प्रस्तु भगवः! ( १६।५२ ) नाए भगवः - ऐश्वर्य - सम्पन्न! ' नमस्ते श्रायुधाय ' ( यजुः १६ । १४ ) नमः, ते तुभ्यं श्रायुधाय समन्ताद् युध्यते तस्मै ' । – यः सब मन्त्रों पर स्वामीजीका भाष्य उद्धृत पापा विस्तार अधिक होगा; अतः दिङ्मात्र करने में इन्हीं मन्त्रोंको देख E लेना चाहिये । जब इस प्रकार वेदमन्त्रोंके अर्थ में संगति दीख रही है, ' ते ' निरर्थक नहीं रहता; तब ' नमस्ते ' दो घरा सिद्ध हुए । फिर इनको एक पद सिद्ध करना ही पद वा एक - पदकी छत तरह ' नमस्ते ' को प्रयुक्त करना वेद वा स्वामीजीके मतसे स्वा प्रतिकूल है । जब बड़े स्वामी यहां दो पद मान गये हैं, तब यहां एक पद बताते हुए छोटे स्वामी तो खण्डित हो गए । शेष जो वादीने हिन्दी भाषा के अनुसार ' लिए ' अर्थ पर आपत्ति उठाई है कि- ' नमस्ते विद्युते ' में ' तेरे लिए विद्युत् के लिए नमस्कार ' ऐसा अर्थ लिखना ठीक नहीं लगता है । प्रथवा ' तुझ विद्युत् के लिए नमस्कार ' ऐसा अर्थ करने । ते ' तुझ ' शब्द के साथ ' लिए ' अर्थ न लगनेसे उसमें चतुर्थी पर ' ते ' CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. G एकपद में कई युक्तियां ७१ व्यर्थ होती है, पर वेद में व्यर्थता नहीं होती; प्रतः ' नमस्ते ' एक पद ही ठीक है'- यह वादीका प्रान्तरिक प्राशय ठीक नहीं । संस्कृत भाषा में तो विशेषरण- विशेष्यों में समान विभक्ति लगती है । अब रहा ' नमो नमस्ते गुरवे महात्मने ' यह ' विवेक चूड़ामणि ' का प्रमाण; यहां भी " नमः ते " इस प्रकार दो ही पद हैं, एक पद नहीं । यहां पर गुरुको सम्मुख करके कहा गया है कि तु महात्मा गुरुको बार - बार नमस्कार है । यहां भी एक पद सर्वथा नहीं है । ' ते महात्मने गुरवे नमो नमः ” यह अन्वय है । यह जो कि वादीने नया प्राविष्कार निकाला है कि-' जहां पर विशेष्य चतुर्थ्यन्त वा द्वितीयान्त हो; वहांपर ' नमस्ते ' यह एक पद या अव्यय होता है ' मालूम नहीं कि यह परि-भाषा वादीने किस व्याकरण से निकाली है? इस विषय में उन्होंने जो प्रमाण दिये हैं; हमने उनमें ' नमस्ते ' को दो पद सिद्ध कर दिया है । कहीं तो वहां " ते " यदि सम्बन्ध में षष्ठयन्त है, तो वहां " तेरा " यह अर्थ है । यदि वहां " ते " यह किसी चतुर्थ्यन्तका विशेषरण है; तो वहां उस व्यक्तिको अभिमुख करके तुझ वा तुझ गुरुके लिए, अग्निके लिए नमस्कार हो ऐसा अर्थ है । वादीका यह कथन कि यदि यहां ( नमो नमस्ते गुरवे ) इत्यादि में ) नमस्ते एक पद वा अव्यय न होता, अपितु ' नमः ते ' के योगसे नमस्ते शब्द सिद्ध होता तो मन्त्र तथा An eGangotri Initiative

पृष्ठ 46

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७२ G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) **

श्लोकोंमें चतुर्थ्यन्त पदों में चतुर्थी विभक्तिका होना निष्फल

है, क्योंकि तब " ते " का अर्थ हो ' तेरे लिये ' हो जावेगा, फिर विशेष्य में चतुर्थी विभक्तिका होना कोई अर्थ नहीं रखता ' यह वादीका कथन व्याकरणके विद्वानों के लिए प्रतीव उपहास्य है । वादी याद रखें कि जहां विशेष्य चतुर्थी है और उस व्यक्तिको सामने विद्यमान मानकर कुछ कहा जा रहा है; तो उसे चतुर्थ्यन्त ही सर्वनाम - रूप विशेषरण वा अन्य चतुर्थ्यन्त विशेषण से कहा ही जा सकता है, जैसेकि - ' तुझ महात्मा, गुरु ( परमात्मा ) को ( के लिए ) नमस्कार हो । ' यह नियम है- " यल्लिङ्ग, यद् वचनं या च विभक्ति-विशेष्ये स्यात् । तल्लिङ्गः, तद् वचनं सा च विभक्तिविशेषणे देया " अर्थात् विशेष्यको जो लिङ्ग, जो वचन, तथा जो विभक्ति हो; उसके जितने भी विशेषरण हों; उनमें भी वही लिंग, वही वचन, वही विभक्ति होती है; इस नियम के अनुसार चतुर्थ्यन्त विशेष्य के जितने भी विशेषरण हों; चाहे वे सर्वनाम हों वा गुणवाचक हों, उन सभीको चतुर्थी विभक्ति होगी । श्रव स्वामीजी बतावें कि यहां क्या अनुपपत्ति है? " मन्त्र तथा श्लोकोंमें प्राये चतुथ्यंन्त पदों में चतुर्थी विभक्ति का होना निष्फल है " स्वा.रा.का यह वाक्य वैयाकरणों द्वारा सुवर्ण पदक के योग्य है? आपकी संस्कृत में भी बड़ी अशुद्धियां रहा करती हैं; हमारे पास उनके पत्र पड़े हैं । प्रथमाका छात्र भी उनसे अशुद्धियां पकड़ सकता है, चले हैं. ये व्याकरणसे वेदकी मीमांसा करने । * एकपदत्व में कई युक्तियां * 03 उन्हें यह याद रखना चाहिये कि - व्याकरण में ' तस्मै । नमः ' यह अन्वादेशका प्रसिद्ध उदाहरण है । इसका अर्थ है ' उस तुझको नमस्कार हो ' यहां दोनों ही पद चतुर्थ्यन्त हैं । इस प्रकार ' दशाकृतिकृते कृष्णाय तुभ्यं नमः ' यहां ' कृष्णा ' तथा ' तुभ्यम् ' ' दशाकुंतिकृते ' सभी पदों में चतुर्थी आई है; प्रकार ' देवाय ते ( तुभ्यं नमोस्तु ' प्रादि बहुतसे प्रयोग ि सकते हैं; इसी तरह ' नमः ते हरसे ' इत्यादिमें " ते " चतुर्थ्यन है । तब ' नमस्ते ' की एक पदता निराकृत हो गई । जो कि वादी लिखते हैं " यदि विद्युते गुरवे प्रादिमें श्रा हुई चतुर्थीका यह अर्थ किया जाय कि गुरुके लिए, विद्युत लिए, तब तो ' नमस्ते ' में प्राई हुई चतुर्थी विभक्ति " हो " क कोई अर्थ नहीं रहता " । इसका प्रत्युत्तर पूर्व दिखाया जा चुक है कि वादीके दिये मन्त्रों में कहीं तो " ते " सम्बन्धवाचक होते से षष्ठ्यन्त है; कहीं चतुर्थ्यन्त होनेसे उसे प्रभिमुख कर ' तुम गुरुके लिए, तुझ अग्नि के लिए, तुझ बिजली के लिए नमस्कार हो ' यह अर्थ होता है । उस अर्थ में न कोई व्याकरण सम्ब धिनी अनुपपत्ति है; न कोई भाषा सम्बन्धिनी श्रनुपपत्ति है । तब बलात् वेद एवं वेदांगसे विरुद्ध ' नमस्ते ' को एक · बनाना सम्प्रदायिक दृष्टिके अतिरिक्त अन्य क्या अर्थ रखत है? विशेष्यके चतुर्थ्यन्त होनेपर उसके सभी विशेषरणों में में चतुर्थी अवश्य होती ही है- इसमें अनुपपत्ति क्या है? इस मीमांसासे प्रांगेका स्वा. रामे. जीका यह वाक्य कि. " यदि यह कहो कि - ' नमः स्वस्ति - स्वाहा ' इस सूत्र के प्राधा CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 47

सनातन धर्मालोक १-२, पृष्ठ 47 का मूल पृष्ठ
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II * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * पर यह चतुर्थी विभक्ति हुई है; तो हम यह पूछेंगे कि इस चतुर्थी विभक्तिका अर्थ क्या होगा? यदि ' लिए ' अर्थं करोगे; पार्थ तो उक्त दोष ( कौनसे दोष? ) आएँगे । यदि कहो कि -इ अन्यार्थ करेंगे, तब हम यह पूछेंगे कि इसमें चतुर्थी - विभक्ति करनेका फल क्या है? यदि कहो कि चतुर्थी विभक्ति निरर्थक है; तब तो वेद पर बड़ा भारी दोष प्राएगा; क्योंकि उसकी तो एक मात्रा भी निरर्थक नहीं है । " खण्डित हो गया । क्योंकि-संस्कृत भाषामें विशेष्यके विशेषरण जितने भी होते हैं; उनमें विभक्ति सभी में विशेष्यके अनुसार ही होती जाती है । पर हिन्दी भाषा में यह प्रकार होता है कि वहां विभक्ति का अर्थ ' को, ने, के लिए, से, का, आदि, विशेषरणोंके साथ न तभ लगाकर विशेष्यके साथ लगा दिया जाता है, उसका सम्बन्ध सब विशेषणों से भी लग जाता है । इससे संस्कृत में विशेषरणों कार में विशेष्यकी विभक्ति लगाना व्यर्थ नहीं हो जाता । इसके कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं-पर ' सश्रात्मानं सर्वज्ञ मन्यते ' यहां पर ' आत्मानं विशेष्य खत है, ' सर्वज्ञं ' विधेय विशेषरण है, दोनोंमें समान विभक्ति है । मैं यहां पर विभक्ति द्वितीया है । हिन्दी भाषामें द्वितीयाका अर्थ ' को ' होता है, पर ' हिन्दी ' में ' वह अपने आपको, सर्वज्ञको मानता है ' ऐसा अर्थ नहीं करना पड़ता, अर्थात् विशेषरण-कि विशेष्य दोनोंके साथ ' को ' न लगाकर केवल विशेष्यके साथ धान ही उसे लगा देने से दोनोंसे उसका सम्बन्ध हो जाता है, फलतः CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. * ' नमस्ते ' एक पद नहीं # ७५ वहां पर ' वह ग्रपने आपको सर्वज्ञ मानता है ' ऐसा ही श्रर्थ लिखना पड़ता है, पर हिन्दी भाषा में ' सर्वज्ञ ' विशेषरण के साथ ' को ' को न देखकर संस्कृतमें भी उसमें द्वितीया न देकर वहां पर ' स आत्मानं सर्वज्ञो मन्यते ' ऐसा लिख देना व्याकररणान-भिज्ञता हो जाती है, जैसे कि- स्वा ० रामेश्वरानन्दजीने मेरे पास भेजे हुए पत्र में मुझे लिखा था कि कि भवान् श्रात्मानं सर्वज्ञो मन्यते? ' वह्नपत्र अभी तक भी मेरे पास विद्यमान है । यह हुम्रा द्वितीया विभक्तिका उदाहरण । अब एक चतुर्थी का उदाहररण भी देख लेना चाहिए | ' देवाय तुभ्यं ( ते ) नमः ' यहां पर ' तुभ्यं ' ( ते ) यह सर्वनाम विशेषरण है, ' देवाय ' यह विशेष्य है, ' नमः ' के योग में चतुर्थी ' नमः स्वस्ति ' इस सूत्र से प्रसिद्ध ही है, ' उसके योग में ' देवाय ' विशेष्य में चतुर्थी होने से उसके विशेषरण ' तुभ्यं ' में भी चतुर्थी हो ही जाती है । हिन्दी-भाषा में इस वाक्यका ' तेरे लिए देवके लिए नमः ' ऐसा अर्थ न करके, पृथक् पृथक् ‘ लिए ' अर्थ न लगाकर ' तुझ देवके लिए नमस्कार ' इस प्रकार ' विशेष्य ' के साथ ही चतुर्थी - विभक्तिका अर्थ ' के लिए ' लगा दिया जाता है । ऐसा करने से दोनोंके साथ वह ' लिए ' अर्थ लग जाता है, पर ' तुझ देवके लिए नमस्कार ' इस हिन्दी - वाक्यमें ' तुझ ' के साथ ' लिए ' न देखकर उसके संस्कृतवाक्य ' देवाय तुभ्यं ( ते ) नमः ' में सर्वनाम विशे-षर में चतुर्थी - विभक्ति व्यर्थ नहीं हो जाती है । यह लौकिक An उदाहरण eGangotri है Initiative । इसी प्रकार ' तेभ्यो वो नमः तेभ्यो वः स्वाहा '

पृष्ठ 48

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७६ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * ( अथर्व ० ३।२६।१ ) यह वैदिक उदाहरण भी समझ लेना चाहिए । इसी प्रकार ' नमस्ते विद्युते ' इस संस्कृत वैदिक वाक्यका हिन्दी में ' तेरे लिए विद्युत् के लिए नमस्कार ' ऐसा अर्थ न करके ' तुझ विद्युत् के लिए नमस्कार ' ऐसा अर्थ किया जाता है । इस हिन्दी वाक्य में ' विद्युत् ' शब्द के साथ ' के लिए ' अर्थ देखकर संस्कृत में ' विद्युते ' इस प्रकार ' चतुर्थी ' दे दी जाय, उसके सर्व-' नाम विशेषरण ' तुझ ' में ' के लिए ' यह अर्थ साक्षात न देखकर संस्कृत में उसे चतुर्थी न दी जाय; प्रथवा ' संस्कृत में दी हुई ' विद्युते नमः ' में ' हो ' की चतुर्थी ' निरर्थक ' मान ली जाय; तब इसमें उस संस्कृत वाक्य प्रयोक्ताका दोष न मानकर उसमें निरर्थकता मानने वालेकी व्याकरणानभिज्ञताका ही दोष मानना पड़ेगा । नहीं तो फिर ' जातायै उत ते नमः ' ( प्र ० १1१०1१ ) इत्यादि वेदमंत्रोंमें ' जातायै ' में चतुर्थी होने पर ' तुझ उत्पन्न हुई के लिए नमस्कार ' इस अर्थ में ' ते ' को चतुर्थी ' आसीनाय उत ते नमः ' ( अ ० ११।४।७ ) ' तुझ बैठे हुएके लिए नमस्कार ' इस अर्थ में ' ग्रासीनाय ' इस चतुर्थीको विद्यमानता में ' ते ' इस सर्वनामकी चतुर्थी भी निरर्थक हो जायगी । यदि इस ' ते ' की चतुर्थी निरर्थक नहीं है, तो ' नमस्ते ' अस्तु विद्युते ' ( यजु ० ३६१२१ ) ' विद्युते ते - तुभ्यं नमः ' ' तुझ विद्युत् के लिए नमस्कार ' यहां पर भी ' ते ' की चतुर्थी निरर्थक नहीं है । जब निरर्थक नहीं है; तो उस निरर्थकता के बचाव के लिए ही ' नमस्ते ' को एक पद मानना स्वयं निरर्थक हो * कई युक्ति प्रमारण * जायगा; क्योंकि वही अर्थ ' नमः ' से ही निकल जाने से स्वयं गौरव रूप एवं निरर्थक सिद्ध हो जायगा । इस प्रकार ' नमस्ते ' को बेदमें एक - पद बताने की कल्पना करना वेद है निरर्थकताको स्वयम् आह्वान देना है । इसे एक पद मान पर वहां अपेक्षित युष्मदादि सर्वनाम न रहनेसे न्यूनपद दोष भी उपस्थित हो जायगा, यह सब पाठकोंने स्पष्टतया जान लिया होगा । इनमें क्या स्वा ० रामे. उन विशेषरणों वा सर्वनामों क वही विभक्ति व्यर्थं समझ लेंगे! ' तुझ समझदार लड़के के लिये क्या यह उचित है? " इस वाक्यकी संस्कृत ' प्रबुद्धाय तुझ्या ( ते ) बालकाय किमिदमुचितम् ' यह आप न बनाकर कुछ संस्कृत बनाएँगे? क्या यहां विशेष्य में चतुर्थी होनेपर ' तुम इस सर्वनाम विशेषरण में स्वामीजी कोई अन्य विभक्ति देंगे! यदि ऐसा करेंगे तो वेदांग - व्याकररणसे विरुद्ध ही करेंगे । ह लिए ही तो मेरे पास लाये हुए उनके पत्र में ' कि भवान् स सर्वज्ञो मन्यते ' यह वाग्र्य अशुद्ध है, " सर्वज्ञ " यहां द्वितीय होगी, प्रथमा नहीं । वेद भी तो व्याकरणके उक्त नियम ( विशेषरणों में विशेष नुसारी विभक्ति देने ) को मानता है । देखिये- ' तस्मै ज्येष्ठा ब्रह्मणे नमः ' ( अथर्व ० १०।७।३२-३३-३४-३६ ) इस मन्त्र विशेष्य ब्राह्मरणको चतुर्थी है तो उसके विशेषण ' ज्येष्ठायां तथा उसके सर्वनाम - विशेषरण ' तस्मै ' को भी चतुर्थी है । वाक्यका अर्थ है — ' उस ज्येष्ठ ब्रह्मके लिए नमस्कार । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat An eGangotri Initiative

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७८ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * क्या वादी यहां पर ' तस्मै ' इस सर्वनाम विशेषरणकी चतुर्थी को निरर्थक समझेंगे? तब तो ' जातायै उत ते नमः ' ( प्रथनं ० १०।१०।१ ) यहां पर ' जातायै; ते ' में अन्यतरपदमें चतुर्थी व्यर्थ होगी । इसी प्रकार ' श्रासीनाय उत ते नमः ' ( अथर्व ० ११।४।७ ) में ' श्रासीनाय ' इस चतुर्थ्यन्त के साथ चतुर्थ्यन्त ' ते ' व्यर्थ हो जायगा । तब तो ' तस्मै ते काम! नम इत् कृणोमि ' ( ऋ ० ६२६ ) में चतुर्थ्यन्त ' तस्मै ' के साथ ' ते ' यह चतुर्थी व्यर्थ होगी । ' तुभ्यं... अग्ने!... विप्राय ' ( ऋ ० ३।२१।३ ) में ' विप्राय ' होने पर ' तुभ्यं ' यह चतुर्थी व्यर्थ होगी । अन्य मन्त्र देखिये- ' पन्थां कृणोमि तुभ्यं सहपत्न्यै वधु! " ( अथर्व ० १४ | १ | ५८ ) यहां पर वधूके ' सहपत्न्यै ' इस विशेषरण में भी चतुर्थी दी गई है, फिर उसके सर्वनाम ' तुभ्यं ' को भी । तो क्या पूर्वपक्षी महाशय ' तुभ्यं ' की चतु र्थीको व्यर्थ समझेंगे? इसी प्रकार दो तीन मन्त्र वादी अन्य भी देखें । ' तुभ्यं स्तोका घृतश्चुतोऽग्ने! विप्राय सन्त्य ' ( ऋ ० ३।२१।३ ) यहांपर अग्निको ' त ुभ्यं विप्राय ' कहा गया है । दोनोंमें चतुर्थी है । ' तुभ्यं विप्रा इन्द्राय ' ( ऋ ० ३।३०।२० ) ' मरुत्वते तुभ्यं राता हवींषि ' ( ऋ. ३।३५७ ) इन मन्त्रोंमें इन्द्रको चतुर्थी देकर उसके सर्वनाम को भी चतुर्थी दी गई है; तो क्या वादी इन चतु-थियों को निरर्थक समझेंगे? यदि नहीं; तब वे ' नमस्ते गुरवे ' ' में ' हो ' की चतुर्थीको किस प्रकार निरर्थक समझते हैं, जिससे डरकर नमस्तेको सभी श्रार्ष - ग्रन्थोंके विरुद्ध बलात् एक पद वा श्रव्यय बनाते हैं? और ऐसा व्याकररण उन्होंने कौन सा -CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. * क्या नमस्ते एक पद है? 98 देखा है, जिसमें उन्हें नमस्ते एक पद दिखाई दिया है? ' तस्मै यमाय नमो अस्तु मृत्यवे ( श्र. ६।२८।३ । ) इस मन्त्र ' मै मृत्यवे यमाय स्तु ' इस अन्वय में इन चतुर्थियोंको बेद-भक्त श्रीरामे व्यर्थ समझते हैं? इसी प्रकार ' तस्मै रुद्राय नमो अस्तु अग्नये ' ( ०७।६२।१ ) यहां भी क्या वादी श्रग्नये और रुद्राय में चतुर्थी देखकर ' तस्मै ' इस सर्वनामको चतुर्थीको व्यर्थ समझते हैं? इसी तरह ' तस्मै ते नमो अस्तु देवि! ' ( श्र ० १।१३।४ ) ( सर्वस्मै ते इदं नमः ' ( अ ० ११६८ ) ' प्रासीनाय उत ते नमः ' ( श्र ० ११।६।७ ) ' पराचीनाय ते नमः प्रतीचीनाय ते नमः ' ( अ ० ११।४।८ ) क्या इन मन्त्रों में चतुर्थ्यन्त पदोंके साथ ' ते ' इस सर्वनाममें चतुर्थीको व्यर्थ समझकर वादी वेदोंके पदोंको निरर्थक मानते हैं? यदि इन सर्वनामोंमें चतुर्थी को वादी व्यर्थ नहीं समभते; तब ' नमो नमस्ते गुरवे महात्मने ' इत्यादिमें ' ते ' इस सर्वनाम की चतुर्थीको व्यर्थ कैसे समझते हैं; जिससे डरकर वादी नमस्ते को अपनी कपोल - कल्पनासे एकपद वा अव्यय बनाना चाहते हैं । इस प्रकारके मन्त्र बहुत संख्या में उपस्थित किये जा सकते हैं, पर स्थान नहीं । श्राग्रह रहित प्रवृत्ति वालोंके लिए इतने प्रमाण पर्याप्त हैं; दुराग्रहियोंके लिए तो ऐसे सैकड़ों भी प्रमारण कुछ नहीं । फलतः वादीका एतद्विषयक पक्ष गिर गया है यह विद्वान् पाठकोंने देख ही लिया होगा । आागेके प्रश्नोत्तरोंमें वादीने ' नमस्ते ' को एक पद कहना पूर्वपक्षीके द्वारा अपना हठ सिद्ध करना कहलवाया है; यह ठीक An eGangotri Initiative

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50 * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * ही है; आप अवश्य ही इस विषय में दुराग्रही हैं; आपने जो उवट - महीधर के वाक्योंसे " नमस्ते " को एकपद बताया है; वह भी आपकी भूल है । उवट महीधर आदिने ' नमस्ते ' को एक-पद रूप में कहीं भी व्यवहृत नहीं किया । ' हे महावीर! त्वं नोस्माकं पितासि, सर्वथा नमस्तेस्तु ' यहांपर महावीरको अभिमुख करके सम्बोधित किया है; तब उसके परामर्श के लिये • युष्मद् श्रादि सर्वनामका प्रयोग श्रावश्यक है अतएव वहां " नसः ते अस्तु " इस प्रकार ते ( तुभ्यं ) यह सर्वनाम व्यव-हृत किया है । नहीं तो प्राप ' हे महावीर, तुझे नमस्कार हो ' इस ' तुझें ' शब्दका स्थानापन्न कौन सा पद मानेंगे; यदि ' ते ' को पृथक् - पद न मानेंगे? और फिर ' नमः'ते ' में ' विसर्जनीयस्य सः ' से विसर्गों को स होता है; तब क्या संन्धि हो जानेसे स्वामी जी दो पदोंको भी एक पद मान लेंगे? क्या शमस्ते, तमस्ते, दमस्ते, यमस्तेको वादी एक पद मानेंगे? इसी प्रकार ' हे धर्म! सर्वथा नमः ते अस्त ' यह उवटका वाक्य भी समझ लेना चाहिए । क्योंकि धर्म ( त ेज ) को कहते हैं । सम्बोधन से अभिमुख करके उसके प्राभिमुख्यके लिए ' ते ' यह सर्वनाम अपेक्षित होता है । तो ' नमः - ते ' में सकारकी सन्धि हो जानेपर वादीने इसे एकपद कैसे मान लिया? क्या सन्धियुक्त पदोंको वादी एक पद मानते हैं? क्या यशस्ते,, यज्ञस्ते, व्ययस्ते एक - पद हैं? स्पष्ट है कि — उवटम - हीधरादि ने भी ' नमस्ते ' एक पद नहीं माना । ' ' हे महावीर! श्रापको सब श्रोर से ' नमस्ते ' यह प्रदरवाचक शब्द प्रयुक्त हो ' यह * ' नमस्ते ' एक पद नहीं # श्रीमहीधर arrest अर्थ वादीने किया है । उन्हें बताना चाहिये कि यदि वे महीधरके वाक्य में ' नमस्ते ' को एक पा मानते हैं, तो उन्होंने ' प्रापको नमस्ते ' यह ' आपको ' तथा 'पा आबर - वाचक शब्द ं महीधरके किस शब्द के अर्थ में रखा यदि यह ' ते ' का अर्थ नहीं है । और फिर ' नमस्ते ' यह श्रादर वाचक शब्द ' ऐसा लम्बा अर्थ महीधर के वाक्य में स्थित पदका है? स्पष्ट है कि यह वादीका पक्ष निराधार है । इसी प्रकार ' नमस्ते प्रारण! क्रन्दते, ' नमस्ते स्तनयित्नवे ( अथर्व ११।४।२ ) इत्यादि मन्त्रोंमें भी ' नमः, ते ' यह भिन भिन्न पद हैं । अर्थ इस प्रकार है-- हे प्रारणे! क्रन्दनशील तु नमस्कार, गर्जते हुए तुझे नमस्कार । ' नमस्ते प्रारण! तिष्ठते श्रासीनाय उत ते नमः ' ( श्र ० ११२४/७ ) हे प्रारण! खड़े होते हुए तुझे नमस्कार बैठे हुए तुझे नमस्कार; इत्यादिमें में ' नमः- तते ' भिन्न - भिन्न पद हैं । इसमें ' श्रासीनाय उत ते नमः यह इस मन्त्रका अन्तिम पाद ज्ञापक है, नहीं तो वादी अनुसार, यहां चतुर्थ्यन्त ' आसीनाय ' के होने पर ' ते ' में चतुर्द व्यर्थ है । बल्कि यहां वादी से प्रष्टव्य है कि ' नमस्ते प्रारण क्रन्दते । में यदि वादी के मत में ' नमस्ते ' एक पद है, तो, उस ' नमस्ते के योग में ' क्रन्दते ' में चतुर्थी किस पाणिनि - सूत्र से है? कहें कि -- ' नमः स्वस्ति ' ( पा ० २ | ३ | १६ ) इस वेदाङ्गके से; तो वादी के अनुसार तो मन्त्रमें ' नमः ' पद ही नहीं । स ० [ ०६ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative