सनातन धर्मालोक १-२ — पृष्ठ 51–60
सनातन धर्मालोक १-२ · पृष्ठ 51–60
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तान ८२ G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * क - पर किन्तु ' नमस्ते ' पद है । पाणिनि - सूत्र में ' नमस्ते स्वस्ति ' ऐसा पाठ ही नहीं, तब चतुर्थी कैसे हुई? यदि किसी अन्य सूत्र से हुई; तो ' नमः ' में भी उसीसे हो जाती; तो ' नमः - स्वस्ति-नाद स्वाहा ' सूत्रका निर्मारण ही व्यर्थ था । यदि ' नमस्ते ' एक पद है; तो यह कृदन्त प्रयोग है, या तद्धितान्त? इसमें क्या प्रमारण है? वादिप्रतिवादिमान्य नवे पाणिनि - कात्यायन- पतञ्जलिने अपने वेदांग - व्याकरण में भिन इसकी एकपदताकी सिद्धि कहां की है? हमारे मतमें यह दो तु पद हैं । उक्त मन्त्रों में ' नमः ' पद होनेसे उसके योग में प्रारण के परामर्शक सर्वनाम ' हो ' ( तुभ्यं ) में तथा उसके विशेषरंग होते ' क्रन्दते ' में उक्त सूत्रसे उपपद - विभक्ति चतुर्थी हो गई । इस प्रकार हमारा पक्ष समूल सिद्ध हुआ कि - ' नमस्ते ' में ' नमः - ' ते ' नमः यह दो पद हैं । उसमें ' ते ' यह युष्मद् के अन्य एकवचन त्वं, ' त्वाम् त्वया, तुभ्यं ( ते ), स्वत्, तब त्वयि की तरह प्रतिष्ठा चतुर का करनेवाला होनेसे प्रयोक्तव्य नहीं । अव यह बताया जायगा कि स्वा. द. के मत में तथा सभी इन शास्त्रों में ' नमस्ते ' कन्द दो पद ही माने गये हैं; उसका एक पदत्व शशशृङ्ग है । मस्ते ( ४ ) ' नमस्ते ' का एक पद होना शशशृङ्ग ( निष्कर्ष ) केवहीं ( १ ) ' नमस्ते ' का प्रचार स्वा. दयानन्दजीसे किया बताया जाता है, पर स्वामीजी ने भी उसे कहीं एक पद नहीं माना है, किन्तु दो पद ही माना है । स्वामीजीने यजुर्वेद-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. * नमस्ते एक पद नहीं ८३ संहिता का पूर्ण भाष्य किया है, ऋग्वेद संहिताका पूर्ण । जहां कहीं भी वेदमन्त्रमें ' नमस्ते ' आया है, वहां स्वामीजीने ' नमः, ते ' इस प्रकार विच्छिन्न करके ' तुझे नमस्कार ' इस प्रकार अर्थ किया है, तव स्पष्ट है कि उनके मतमें ये दो पद हैं । अब उनके अन्य भी प्रमारग उपस्थित किये जाते हैं । ( २ ) स्वामीजी ने ' संस्कार विधि ' विवाहप्रकरण में लिखा हे — ' नमस्ते ' इस वाक्य से परस्पर नमस्कार कर ' ( पृ ० १३३ ) ' नमस्ते यह वेदोक्त वाक्य ' ( सं ० वि ० विवाह ० पू ० १७५ की टिप्पणी ) । यहां पर श्रीस्वामीजीने ' नमस्ते ' यह ' वाक्य ' माना है । वाक्य पदोच्चय - पद - समूहको कहते हैं । ' नमस्ते ' ' को एक - पद मानने पर वह पदसमूह नहीं रहता । न्यूनसे न्यून पद मानने पर ही वह ' वाक्य ' बना रह सकता है । एक पद मानने पर वह ' वाक्य ' कैसे हो सकता है? ( ३ ) अन्य प्रमारण यह है कि - ' नमो ज्येष्ठाय च ' ( यजुः १६।३२ ) मन्त्रके अर्थको बताते हुए स्वा ० द ० जीने लिखा - इस वाक्यका उच्चारण करके । ' श्रवोचाम नमो अस्मै ' ( ऋ ० ११११४।११ ) इस मन्त्र के अर्थ में भी स्वा ० द ० जीने ' नमस्ते ' ऐसे वाक्यको कहे ' यह लिखा है । इन मन्त्रोंके अर्थ में भी स्वामीजीने ' नमस्ते ' यह ' वाक्य ' माना है, " नमस्ते ' यह पद " इस प्रकार ' एक - पद ' नहीं माना । इसमें अन्य विशेषता यह है कि- दोनों मन्त्रों में ' नमः ' यह पद है ' नमस्ते ' ' नहीं । तब स्वामीजीने उसके अर्थ में ' नमस्ते ' यह वाक्य कैसे लिखा? इससे स्पष्ट है कि वे ' नमः ' इस पदको श्रभिवाद-An eGangotri Initiative
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८४ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * नार्थक मानकर सम्मुखस्थितको सम्बोधित वा अभिमुख करने के लिए उसके साथ ' ते ' यह सर्वनाम शब्द भी जोड़ना चाहते थे । तब उनके मत में ' नमस्ते ' में दो पद होनेसे, उसके लिए उनसे प्रयुक्त ' वाक्य ' शब्दकी सार्थकता हुई । ( ४ ) ' नमस्ते ' में दो पद इष्ट होनेका स्वा ० द ० जीका अन्य प्रमाण यह है कि - ' प्रार्योद्देश्यरत्नमाला ' प्रादिमें उन्होंने ' नमस्ते ' का अर्थ ' मैं तेरा मान्य करता हूँ ' इत्यादि लिखा है । स्पष्ट है कि इसमें का ' तेरा ' शब्द ' ते ' का ही अर्थ है और ' मान्य करना ' यह ' नमः ' का अर्थ है । इस प्रकार भी ' नमस्ते ' में दो पद सिद्ध हुए । जब ऐसा है, तब ' नमस्ते ' को एकपद-रूपमें प्रयुक्त करना वा उसे एक पद सिद्ध करने की करना स्वामीजीसे विरुद्धता है, अथवा यह कहना चाहिये कि- श्रवैदिकता है । ( ५ ) वेदकी रक्षार्थ पदानुक्रमणिकायें तथा पदपाठ • बनाये जाते हैं । पदपाठ तो बहुत प्राचीन समयकी परम्परा से चला आ रहा है, इसमें कहीं भी ' नमस्ते ' यह एक पद नहीं मिलता । स्वामीजीका भाष्य इस पर देखा जा सकता है । ( ६ ) श्रार्यसमाजके श्रद्धेय स्वामी विश्वेश्वरानन्दजी एवं स्वा ० नित्यानन्दजी ने चार वेदसंहिताओंोंकी पदानुक्रमणिकाएं बनाई हैं, उनमें भी कहीं ' नमस्ते ' यह पद ही नहीं मिलता । इससे स्पष्ट है कि वेदमें ' नमस्ते ' कहीं भी एक - पद रूपमें नहीं प्राया । एक ही मन्त्रमें ठहरे हुए ' नमस्ते ' में का ' नमः ' * ' नमस्त ' एक पद नही # ६२ शब्द ' न ' अक्षर के क्रममें और ' ते ' पद ' त ' अक्षरके क्रम में आया है । इससे वादीका ' नमस्ते ' को एक पद माननेका पक्ष सर्वथा ही निरस्त हो जाता है । ( ७ ) वेदको रक्षाके लिए पढपाठके अतिरिक्त क्रम, घन् जटा, माला, शिखा, लेखा, ध्वज, दण्ड, रथ ये नौ, कुल द पाठ आये हैं, पर इनमें कहीं भी ' नमस्ते ' को एक पद नहीं माना गया । इससे स्पष्ट है कि वेदमें ' नमस्ते ' कहीं भी एक पद रूप में इष्ट नहीं । ( ८ ) फिर वेद के ज्ञानार्थ छः वेदाङ्ग भी बनाये गये है पर उनमें भी कहीं ' नमस्ते ' को एक पद नहीं माना गया । वेदाङ्गों में पदोंके ज्ञानार्थ व्याकरण सभी में मुख्य है — ' मुख व्याकरणं स्मृतम् ' यह बात सर्वसम्मत है । पर उस व्याकर में भी कहीं ' नमस्ते ' एक पद रूपमें व्युत्पादित नहीं किया गया । उसमें ' तेमयावेकवचनस्य ' ( ८।१।२२ ) इस सूत्र से ष तथा चतुर्थीके एकवचनमें ' तव ' तथा ' तुभ्यं ' को ' हो ' किय जाता है । श्रव्ययोंमें ' नमः ' पढ़ा गया है । कारकों में ' नमः ' । योग में चतुर्थी विभक्ति की गई है, तब वेदाङ्गके अनुसार वेदा भी ' नमस्ते ' पदद्वयात्मक ही सिद्ध हुआ । ' नमस्ते ' पद भी स्मृत नहीं किया गया -- जिससे उसके योग में भी कि विशिष्ट विभक्तिका विधान हो । शाकटायन, उज्ज्वल का श्रादियोंने अपने उणादियों में, पाणिनिने अपने कृदन्तों । तद्धितोंमें ' नमस्ते ' इस पदको कहीं भी निष्पन्न नहीं किया किसी गणपाठ में भी इसे एक पदरूपमें निर्दिष्ट नहीं कि CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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कम ८६ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * पक्ष गया । किसी अव्ययकी वा निपातोंकी श्रनुक्रमणिकामें भी ' नमस्ते ' को एक पदरूपमें स्मृत नहीं किया गया । स्वा ० द ० घन, जीने अपने ' अव्ययार्थभाग ' में ' नमः ' को तो लिखा है--दस ' नमो नतौ ' । पर ' नमस्ते ' को अव्ययों में कहीं नहीं लिखा । नहीं इससे भी स्पष्ट है कि -- व्याकररणमें भी ' नमस्ते ' एक पद एक. नहीं । उसके किसी सूत्र वा उदाहरणमें भी उसे एक पदरूपमें नहीं माना वा स्मृत किया गया । ( e ) अब वेदाङ्ग ' निरुक्त ' को भी देख लीजिये । यह भी गया । व्याकरणका पूर्तिकर्ता है । यह ' सर्वारिण नामानि श्राख्यात-- जानि ' इस सिद्धान्तका मानने वाला है । इससे ' नमस्ते ' यह कर रूढि शब्द तो रहा नहीं । शेष रही प्राख्यातसे प्रत्यय देकर किय निष्पत्ति, सो ' गणम् ' धातुसे श्रसुन् प्रत्यय बनाकर ' नमस्, तो पर्फ बनाया जाता है, पर कहीं ' अस्ते ' प्रत्यय नहीं माना वा स्मृत किय किया गया, जिससे ' नमस्ते ' एक पद सिद्ध हो जावे । ' निरुक्त-के मूल निघण्टुमें ' नमः ' शब्द तो आया है पर ' नमस्ते ' नहीं । वेद किसी कोषमें भी ' नमस्ते ' एक पद नहीं । इससे स्पष्ट है कि-कई ' नमस्ते ' दो पद हैं । किसं ( १० ) अब वेदभाष्योंको लीजिये । वेदके भाष्यकार बलदा श्री सायणाचार्य सुप्रसिद्ध ही हैं । -1 अन्य भी बेङ्कटमाधव, तों उवट, महीधर, स्कन्दस्वामी, भवदेव, हरदत्त, श्रात्मानन्द, किया । रावण श्रादि वेदोंके अंशतः भाष्यकार प्रसिद्ध हैं, पर वेदमें कि श्राये ' नमस्ते ' को इनमें किसीने भी एक पदकी तरह व्याख्यात नहीं किया । प्रर्वाचीन भाष्यकारोंमें स्वा ० दयानन्दजी CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. * नमस्ते एक पद नहीं ८७ सुप्रसिद्ध हैं - वादी के सम्प्रदाय के वे प्राचार्य वा ऋषि कहे जाते हैं, पर उन्होंने भी वेदमन्त्रोंमें आये हुए ' नमस्ते ' का कहीं भी एक पदकी तरह व्याख्यान नहीं किया । सर्वत्र ' नमः, ते तुभ्यम् ' ऐसी व्याख्या की है । प्राज - कल के श्रासमाजके वेदभाष्यकार श्रीराजारामशास्त्री, श्रीक्षेमकररण - त्रिवेदी, श्रीजयदेव विद्यालङ्कार, श्रीपाद दामोदर सातवलेकर श्रादियों में भी किसीने ' नमस्ते ' को कहीं भी एक पदकी तरह व्यायत नहीं किया । तब उनसे विरुद्ध वादी का पक्ष ठीक कैसे माना जावे? ( ११ ) अब वेदके अन्तरङ्गकी भी परीक्षा कर लेनी चाहिये । मन्त्रों पर स्वर भी दिये गये हैं, वे भी व्यर्थ नहीं हैं । वे भी वेदसे इष्ट पदको बताया करते हैं । ' नमस्ते ' को दो पद मानने पर तो स्वरसञ्चार ठीक लग जाता है । ' नमस् ' असुन् - प्रत्ययान्त ( उ ० ४।१८६ ) है । ' नित् ' होनेसे इसे ( पा ० ६।१।१६७ ) प्राद्युदात्त स्वर होगा । शेषको अनुदात्त ( पा ० ६।१।१५८ ) होगा - ' नमः ' । फिर सन्धिमें उस अतु-दत्तको स्वरित ( पा ० ८।४।६६ ) होकर ' नमः ' ऐसा बनेगा । ' ते ' अनुदात्त ( ८1१1१८ ) है, उसको स्वरितपूर्व होनेसे ( पा ० १२/३६ ) प्रचय होगा । प्रचयका कोई चिन्ह नहीं होता । यदि उसके सामने कोई उदात्त वा स्वरित था जावे, तो उसे अनुदात्ततर ( पा ० १२०४० ) हो जाता है । ' नमस्ते ' को एक पद मानने पर स्वरसंचार- विधायक कोई सूत्र नहीं मिलता । यदि इसे प्रातिपदिक मानकर अन्तो-An eGangotri Initiative
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८८ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * दात्त माना जावे तो ऐसी सिद्धि वैदिक - स्वरसे विरुद्ध होगी । यदि उसे निपात मानकर प्राद्युदात्त किया जावे तो यह भो ठीक नहीं । क्योंकि — इसकी निपातता ही प्रसिद्ध है । किसी ने भी ' नमस्ते ' को इसी रूपमें निपात वा श्रव्यय नहीं माना । भित्तिके ही प्रसिद्ध होनेसे उस पर चित्र कैसे बन सकता है? ( १२ ) यदि वेदको ' नमस्ते ' एक पद ही इष्ट होता, तो वेद में उस ( नमस्ते ) के आगे कोई प्रत्यय वा समासयुक्त शब्द वहीं आता । पर वेदमें ' नमस् ' के आगे तो प्रत्यय वा समास-युक्त शब्द आते हैं, ' नमस्ते ' के प्राग ' नहीं जैसे कि - ' नमस्यः ' ऋ ( ० २।११३ ) ' नमस्यन्ति ' ( ११३६।१६ ) ' नमस्यन्तः ' ( १ | ११५।३ ) ' नमस्युः ' ( ८।२७।११ ) ' नमस्यामः ' ( ३ | १७ | ४ ) ' नमस्वी ' ( ११३६।७ ) नमस्वत् ' ( १११८५३ ) ' नमस्विनः ' ( ७ | १४ | १ ) ' अस्मदुक्त:... नमस्वान् ' ( ४।४१।१ ) एक स्थलों में ' नमः ' के आगे प्रत्यय श्राये हैं । नमोभिः ' ( ऋ ० १।२४११४ ) ' नमसा ' ( ११५७१३ ) यहां पर ' नमः ' के आगे विभक्ति आई है । ' नमोवाके ' अथर्व ० ( १३३६ ५ ) ' नम- उक्ति: ' ( ऋ ० ३ । १४१२ ) ' नमः -वृक्तिः ' ( १०।१३१।२ ) ' नमःवृधः ' ( ३ | ४३।३ ) ' नमस्कार ' ( प्रथर्व ० ४ | ३६ | ६ ) ' नमस्कृत्य ' अ ० ७।१०७।१ ) इत्यादिमें नमस् ' के आगे समासयुक्त शब्द भी श्राया है, पर ' नमस्ते ' के श्रागे न कोई प्रत्यय न कोई विभक्ति, न कोई समासयुक्त शब्द प्राया है । तब तो ' नमस्ते ' पदका ही * ' नमस्ते ' एक पद नहीं
प्रत्यन्ताभावं सिद्ध हुआ ।
( १३ ) इसके अतिरिक्त वेदमें ' नम - उक्ति विधेम ' ( ऋ ० १ ॥
।१८६।१ ) ' नम उक्त जुषस्व ' ( ऋ ० ३।१४।२ ) ' नम उक्तिम् ब्रहमदिक्षि ( ऋ ० ५।४३।६ ) ' नम उक्तिभिः ( ऋ ० २।४।६ ), ' नम इत्कृणोमि ' ( श्र ० ६ २।१६ ) ' नमो भरन्तः ( ऋ ० १।१।७ ) ' नम एवास्तु ' ( अथर्व ० १ १३३३ ) ' अवोचाम नमो अस्मै ' ( ऋ ० १। ११४ | ११ ) ' प्रकरं नमः ' ( घ ० १४ | २ | ४६ ) ' नमः कुरु ' ( अ ० १४।२ । २० ) ' इदं पितृभ्यो नमो अस्तु ' ( ऋ ० १०।१५।२ ) ' नमः पुरा ते... ब्रवाम ' ( अ ० २२८ ) ' यजाम ( पूजयामः ) इद् नमसा ( नमः - शब्देन ) वृद्धमिन्द्रम् ' ( ऋ ० ३।३२।७ ) [ यहां नमः शब्द से वृद्ध का पूजन कहा है, छोटे का नहीं ] ' नमः इन्द्राय वोचत ' ( ऋ ० २१२११२ ) [ यहां पर ' नमः ' का कहना कहा है; ' नमस्ते ' का नहीं । ] ' उप बुथे नमसा ( नमः शब्देन ) दैव्यं जनम् ' [ यहां ' नमः ' का विधान है । ' नमस्ते ' का नहीं । ] इस प्रकार इन स्थलों में ' नमः ' का कथन तो प्राया है ' नमस्ते ' का नहीं । ' नमसा - नव्यः ' ( ऋ ० १।६२।१ ) ' नमसा सपर्यन्ति । ( १८४ | १२ ) ' नमसा विधेम ' ( ११११४।२ ) ' नमसा हमे मि ( १।१७१०१ ) यहां पर ' नमः ' शब्दसे पूजा मानी गई है । ' नमस्ते ' से नहीं । ' नमस्तेभ्यः ' ( यजुः १६६५ ) ' नमो ' व -( श्र ० १८।४।८५ ) ' तेभ्यो वो नमः ' ( अ ० ३।२६।१ ) ' नम एभ्यः ' ( श्र ० ३।२७।१ ) ' नमो वाम् ' ( गोपथब्राह्मस १।२।५ ) ' नमो वाम् ' ( अथर्व ० ११ २ ।१ ) इत्यादि CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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८६ www. ६० * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * $ 1 मन्त्रों में द्विवचन बहुवचन में ' नमस्ते ' न श्राकर ' नमः ' ही नम श्राया है, सर्वनाम ' वाम्, व: ' प्रादि भिन्न - भिन्न आये हैं । ' नमोस्तुते ' ( अ ० ६।१३।१ ) इत्यादिमें ' नमः - ते ' के मध्यमें ' अस्तु ' का व्यवधान प्राया है; इन सब बातोंसे स्पष्ट है कि वाम वेदके मत में ' नमस्ते ' यह दो भिन्न - भिन्न पद हैं, एक पद नहीं, और वेदको भिन्न - भिन्न अवसर पर भिन्न भिन्न सर्व-स्तु नाम अपेक्षित हैं; ' ते ' अनिवार्य नहीं । 18 ) ( १४ ) ' नमस्ते ' को एक पद सिद्ध करनेके लिए वादीने वेदमन्त्रोंमें जहां गुरणवाची शब्द था, प्रथवा स्वस्वामिभाव-वाला सम्बन्धी शब्द ' हरः, शोचिः, ( नमस्ते - प्रदीप पृ ० ५ ) चक्षु: ( पृ ० ६ ) मन्यु ( पृ ० ११ ) इषु ( पृ ० १३ ), सेना ( पृ ० बुदे १७ ) मूल, भेषज ( पृ ० ८ ) इत्यादि था; वहां पर उसे गुरिण. है शब्द बना दिया है, अपवा ' स्व ' को ' स्वामी ' बना दिया है । नथन दूसरे के साथ ' ते ' को नमस्ते ' से सम्बद्ध कर डाला है । ऐसा असत्य - व्यवहार किये बिना ' नमस्ते ' एक पद नहीं बन न्ति ' सकता था । इसी के फलस्वरूप वादीने कहीं पर मन्त्रके कई मि पूर्वाक्षर, कहीं अग्रिम अक्षर छिपा लिये हैं; कहीं ' अस्यते ' है इत्यादि एक पदको पदद्वय बनाकर विच्छिन्न कर दिया है । व. कहीं मन्त्र के उत्तरार्धको छिपा दिया है कि- ' नमस्ते ' बहु-. वचनमें भी सिद्ध हो जावे । कहीं सम्बुद्धि - पदका षष्ठ्यन्त अर्थ कर दिया है । वेद सम्बुद्धिपद मन्त्र में कहीं पूर्वार्ध में कहीं उत्तरार्ध में कहीं दोनों स्थलों में होता है; उसका सम्बन्ध सारे मन्त्रसे होता है । पर CC - 0. Ankur Joshi * नमस्ते एक पद नहीं ६१ वादी उत्तरार्ध में विद्यमान सम्बुद्धि - पदको सारे मन्त्र के साथ न जोड़कर, पूर्वार्धको उस सम्बुद्धि - पदसे स्वतन्त्र कर देते हैं । ' नमः, नमस्ते ' इनका पृथक् - पृथक् अपने - अपने चतुर्थ्यन्त पदोंके साथ अन्वय वेदाभीष्ट होने पर भी उन चतुर्थ्यन्त पदों का एक स्थानमें अर्थ करके वहां ' नमः, नमस्ते ' को इकट्ठा रख दिया करते हैं और उनका ' पुनः पुनःनमस्ते हो ' यह अर्थ कर दिया करते हैं । जहां - जहाँ वादीने ' नमस्ते ' देखा है; वहाँ पर ' तुझे नमः ' यह अर्थ न करके अपनी कपोल - कल्पनासे ' तुझे ' श्रध्याहृत करके ' तुझे नमस्ते ' यह सत्कार वाचक पद हो ' इस प्रकार मन्त्र में अविद्यमान भी ' यह सत्कारवाचक पद ' का स्वय प्रक्षेप कर दिया है; और मन्त्रमें ' तुझें ' अर्थ बताने वाले पद का अभाव बताकर वेद में न्यूनपद दोष सूचित कर दिया है । इस विषय में वादी ने किसी छल वा असत्य - व्यवहारसे सङ्कोच नहीं किया है । इस प्रकार सिद्ध हो गया कि ' नमस्ते ' का एकपदत्व ' शश - शृङ्ग ' है । श्रीशेरसिंह जी ' नमस्तेकी प्राचीनता ' ( १६ पृष्ठ ) में ' नमः - नमस्ते ' को एकार्थवाची मानने वालेको ' हठी ' कहते हैं । वादी ने ' नमस्ते प्रदीप ' के २१ पृष्ठ में पूर्वपक्षी द्वारा स्वयं कहलवाया है कि- नमस्ते ' को आज तक किसी ने भी एक - पद नहीं माना, केवल आप ही ( स्वा ० रामेश्वरानन्दजी ) ही यह हठ करते हैं ' । प्रतः ' नमस्ते'को एक पक्ष मानना निर्मूल, अवैदिक एवं हठमात्र है । विद्वानोंको ऐसे दुष्प्रचारों Collection Gujarat. An eGangotri Initiative 5
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२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) औ को रोकने में तत्पर रहना चाहिए ' अन्यथा संस्कृतभाषा विरूप वा विकृत होने की आशंका है । ( ५ ) क्या नमस्ते अव्यय है? ' सत्यार्थ - प्रकाश, ' के ग्रन्थसाहिब - संस्करण के पू ० ३६ की टिप्पणी में स्वा ० वेदानन्दजी लिखते हैं- ' नमस्ते अव्यय एक पद भी है, जैसे- ' अघोरेभ्योऽय घोरेभ्यो घोराघोरतरेभ्यश्च । सर्वतः सर्वसर्वेभ्यो नमस्ते रुद्ररूपिभ्यः ( रसेन्द्र सारसंग्रह, रसशोधन- संस्करण ) अर्थात् अघोर, घोर, घोरतर, अघोरतर सब ओर से सरकनेवाले रुद्ररूपी रोगहेतुत्रोंको ' नमस्ते ' । यदि यह एक पद न होता; तो ' नमस्ते ' न होकर यहां ' नमो s स्तु ' होता । इसी प्रकार स्वा ० रामेश्वरानन्दजीने ' नमस्ते रुद्ररूपेभ्यः ( १६।१६ ) यह नारायणोपनिषद् का प्रमाण देकर उक्त पक्ष सिद्ध करनेकी चेष्टा की है । समीक्षा - प्रार्थसमाजियों में यह प्रवृत्ति देखी जाती है कि अपने पक्षका विघात होता हो; तो वेदको भी तोड़ - मरोड़ कर रख देते हैं; और अपना पक्ष बनता दीखे; तो एक अप्रसिद्ध वा अप्रामाणिक पुस्तकको भी प्रमाणित कर लिया करते हैं । यहां भी यही बात है । यहां स्वामीजीने बहुवचन में श्रापाततः ' नमस्ते ' देखकर बहुवचनकी कल्पना की है । वस्तुतः यहाँ बहुवचन में ' नमस्ते ' नहीं है, किन्तु एकवचन में है, अतः यहां एकपद न होकर दो पद ही हैं । यह यहां उनकी अपनी भूल रही है । यहां पर उन्होंने ' सर्वतः सर्वसर्वेभ्यो ' यह पाठ गलत दिया है, यहां ' सर्व सर्वेभ्यः ' यह पाठ नहीं, किन्तु * नमस्ते एक पद नहीं # ' शवं सर्वेभ्यः ' यह पाठ है । इस देशमें ' स, श ' की बड़ी फैली हुई है; सो यहां ‘ शर्व'के स्थान में ' सर्व ' पाठ बन गया है । ' रुद्ररूपिभ्यः ' पाठ भी नहीं है, किन्तु ' रुद्ररूपेभ्यः ' यह पाठ है । शुद्ध पाठ यह हैं- ' अघोरेभ्योऽथ सर्वतः शर्व! सर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु ' रुद्राष्टाध्यायी ' के शान्त्यध्याय ( तैत्तिरीयारण्यक ( १०।४५ ) में भी ( १६ ) में भी है । यहां पर ' शर्व सम्बोधनान्त हैं, और एकवचनं हैं शर्व! रुद्र! ते तव श्रघोरेभ्यः, रूपेभ्यो नमोस्तु ' अर्थात् हे महादेव रूपोंको नमस्कार हो । सो यहां प्रतिफलित हुआ, तब यहां एक पद घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः । रुद्र! रूपेभ्यः ' यह पर १०1८ ) में भी है, त है, यही नारायणोपनिष ! ' तथा ' रुद्र ' ये दो । अब अर्थ हुआ है कि घोरेभ्यः घोरघोरतरेभ्यः ! तेरे घोर अघोर प्र एकवचनमें ही यह प्रयो अव्यय कैसे हो सकता है । यहां तो ' ते तव रूपेभ्यो नमोस्तु ' यह अर्थ है । श्रथवा ' शर्व! ' पाठ न मानकर यहां ' सर्व ' भी पाठ मा लिया जाय; वह भी तो सम्बुद्धिपद है, और महादेवार्थक देखिये अमरकोषकी सुधा - व्याख्या- ' षवं गतौ ( भ्वा. प. से. ) इत्यतः ' पर्व हिंसायाम् ' ( स्वा. प. से. ) इत्यतो वा बघ भेदात् पचाद्यचि ( ३।१।१३४ ) सर्वः श्रपि । ' सर्वस्तु शा भगवान् शम्भुः कालञ्जरः शिव ' इति नामविधानात् ' ( ११ ३०-८ ) सो यहां ' सर्व! ' के सम्बोधन होने से हे सर्व! शम्भो ते तव रुद्ररूपेभ्यः भीषरणरूपेभ्यो नमोऽस्तु ' यहां एकवत्र में ही ' नमस्ते ' होनेसे ' दो पद ' हो गये । इस प्रमाणसे इस CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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www. ६४ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * ना है । श्रव्ययता - एकपदता प्रसिद्ध हो गई । प्रतिपक्षीने ' रुद्ररूपी रोग हेतुनोंको ' यहां ' रोगहेतुनोंको ' यह विशेष्य बनाया है; वह मन्त्र रेभ्यः । में नहीं है । ' रुद्ररूपेभ्यः ' ही पाठ है और वही विशेष्य है; और यहां श्रीमहादेवका वर्णन है । फलतः वादीका एतद्विषयक तद पक्ष खण्डित हो गया । नारायणोपनिषद् में भी १६ वीं कण्डिका निय में ' शर्वाय नमः, शिवाय नमः, शिवलिङ्गाय नमः ' और पवीं हो में ' रुद्राय नमः ' इस प्रकार महादेवका प्रकरण चालू है । तब कि ' नमस्ते रुद्ररूपेभ्यः ' का अर्थ हुआ कि - हे महादेव! ते तव रुद्ररूपेभ्यो नमः - तेरे रुद्र - रूपोंको नमस्कार । यहां भी बहुवचन में ' नमस्ते ' न होकर ' नमः ' ही सिद्ध हुआ । ' ते ' तो षष्ठ्यन्त प्रयो होनेसे ' नमः ' से कुछ भी सम्बन्ध नहीं रखता । अतः स्पष्ट है ना है कि वेदादि शास्त्रों में कहीं भी बहुवचनमें ' नमस्ते ' न होनेसे वह एकपद व्यय नहीं । मा ( ख ) इसी प्रकार जो लोग ' नमस्ते यातुधानेभ्यो नमस्ते र्थक || भेषजेभ्यः ' ' नमस्ते लाङ्गलेभ्यः ' ' नमस्ते अस्तु पश्यत ' ' नमस्ते प.से घोषिणीभ्यो नमस्ते केशिनीभ्यः, ' नमस्ते देवसेनाभ्यः ', इन मन्त्रों में बहुवचन में ' नमस्ते ' बताकर इसे एकपद अव्यय सिद्ध सम. किया करते हैं, इनका भी प्रत्युत्तर हम पूर्व दे चुके हैं कुछ आगे देने वाले हैं । कई लोग ' नमस्ते सते ते जगत्कारणाय, नमस्ते नम्मे चिते सर्व लोकाश्रयाय । नमोऽद्वैततत्त्वाय मुक्तिप्रदाय, नमो कव ब्रह्मणे व्यापिने शाश्वताय, इस स्तोत्र द्वारा ' नमस्ते ' की एक-पदता बताते हैं यह भी उनके अज्ञान का कारण है । यदि इसमें ' नमस्ते ' एक पद होता; तो उत्तरार्ध में ' नमः ' पद न CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. * ' नमस्ते ' एक पद नहीं २५ होता; ' नमस्ते ' ही होता; पर नहीं है, अतः वादियों का पक्ष गलत है । यहां योजना इस प्रकार है- ' नमः ते ( तुभ्यं ) सत्ते तुझ सत् को नमस्कार हो, जगत्कारणाय ते तुभ्यं नमः -तुझ जगत्कारण को नमस्कार हो । चिते ते [ तुभ्यं ] नमः-तुझ चित् स्वरूप को नमस्कार हो । इस प्रकार वादियों का पक्ष कट गया । परमात्मा को अभिमुख करके उसे ' ते ' [ तुभ्यं ] कहा जा रहा है, सो परमात्माको तो सभी भाषाएं युष्मद् का एक वचन देती हैं; तब इसमें किसी भी प्रकार का दोष नहीं आता । ' नमस्ते ' के विषय में उसके पक्षपातियोंसे यह प्रष्टव्य है । कि यह एक पद है, या दो पद हैं? इसमें परिवर्तन हो सकता है वा नहीं? यदि किसीको प्रादरार्थ बहुवचन देना हो; जैसे कि इस विषय में प्रमारण आगे दिये जा रहे हैं तो उसमें ' नमस्ते ' लिखा जावेगा, या ' नमो वः '? यदि ' नमस्ते ' तो यह वेद- विरुद्ध है, ' वहां बहुवचन में ' नमो वः ' भाया है ' नमो वः पितरः, पितरो नमो वः ' ( यजु ० २१३२ ] यदि ' नमो वः ', तो इसमें परिवर्तन सिद्ध होगया, ' नमस्ते ' की अपरिवर्तनीयता खण्डित हो गई । फिर आप नमः श्रीमते, नमो भवद्द्भ्यः ' ऐसा क्यों नहीं कहते वा लिखते? प्राप बड़े को संस्कृतमें पत्रव्यवहारके समय क्या युष्मद् - शब्दके एक-वचन त्वं त्वां तुभ्यं, तव, आदि देते हैं? यदि नहीं, तो उसे ' नमस्ते ' क्यों लिखते हैं? वेद में ' नमः, वन्दे, नमस्कारः ' भी माया है, उसका प्रयोग क्यों नहीं करते । An eGangotri Initiative
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६६ G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * ' नमस्ते ' यदि दो पद हैं, उसमें ' नमस्कार वाचक ' नमस् ' है, ' ते ' नहीं, तब ते ' में आग्रह क्यों? क्या ' ते ' का परिवर्तन पूर्वानुसार नहीं हो सकता? यदि वेदमें ' नमो भवद्भ्यः ' नहीं आता; अतः उसे नहीं लिखते तो वेद में ' परमेश्वर ' शब्द भी नहीं आता; उसे क्यों लिखते हो? ( ६ ) सम्मानमें बहुवचन अब हम माननीय महोदयों को बहुवचन भी दिया जाता है; इस विषय के कुछ प्रमारण उद्धृत करते हैं । यह बात व्याकरण - सिद्ध भी है, साहित्यप्रयुक्त भी है, आर्ष- साहित्य में भी है, वादिजन - प्रयुक्त भी है, वादियों के स्वामीसे भी प्रयुक्त है व्यावहारिक भी है । १. पं ० वरदराजने अपने गुरु श्री भट्टोदीक्षित के लिए मध्यसिद्धान्तकौमुदी प्रारम्भमें बहुवचन दिया है- ' नत्वा वरदराजः श्रीगुरून् भट्टोजिदीक्षितान्, २. श्रीविश्वनाथकं विराज ने जो १८ भाषाओं के पण्डित थे - अपनी पुस्तक साहित्यदर्पण के द्वितीय परिच्छेद में प्रभिधामूल- व्यञ्जनाके उदाहरण में अपने पिताको ' यथा मम तातपादानां श्रीचन्द्रशेखर सांधिविग्र हि-कारणाम् ' यहां बहुवचन दिया है । उसके पिता बहुत नहीं थे; अतः यह बहुवचन पिताके सम्मानको बता रहा है । ३ श्रीमम्मटभट्टने अपने काव्यप्रकाशके चतुर्थ - उल्लास में रसका सिद्धान्तपक्ष दिखलाते हुए श्रीश्रभिनवगुप्तका -' श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तपादाः ' इस प्रकार बहुवचनसे उल्लेख किया है । ४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावलीकार · श्रीविश्वनाथ CC - 0. Ankur Joshi Collection सम्मान म बहुवचन ६७ न्याय पञ्चाननने अपने ' मांसतत्त्वविवेक ' में ' कुल्लूक भट्टास्तु तत्र मांसपदं प्रतिषिद्धमांसपरमिति व्याचक्र: ' इस प्रकार श्री. कुल्लूकभट्टको बहुवचनसे सम्मानित किया है । ५. सांख्यदर्शन के भाष्यकार श्रीविज्ञानभिक्षुने 119 सूत्र के भाष्य में ' योगभाष्ये व्यासदेवैरुक्तम् ' यहांपर व्यासजीको बहुवचन दिया है । ६. महाकविभवभूतिप्ररणीत - उत्तररामचरित में ' वाष्पवर्षैरण वो ' ( ६।२ ९ ) लवने श्रीरामको ' वः ' कहकर बहुवचन दिया है । इस प्रकार वहीं ' मृष्यन्तु इदानीं लवस्य बालिशतां तातपादाः । ' और ' प्रागतेषु वसिष्ठ मिश्रेषु ' ( ४ र्थ अङ्क ) में ये बहुवचन ' दिये हैं । ७. शाकुन्तल - नाटक में नटी सूत्रधारको ' आर्यमिश्र. राज्ञप्तम् ' यहां बहुवचन देती है, इस प्रकार महाकवि कालि दासने सम्मान में बहुवचन सिद्ध किया है । ८. महाकवि श्री. बाणभट्टसे बनाये हुए ' हर्षचरित ' के २ यउच्छास में ' धीमद्भि पहरणीयः कालातिपातः ' यहां कृष्णदूत - मेखलकके द्वारा श्रीबाणभट्टको ' धीमद्भिः पद द्वारा बहुवचन दिलाया गया । है । इस प्रकार ३ योच्छ्वास में राजा पुष्पभूतिने ' श्रासतांच भवन्त एवात्र ' यहां भैरवाचार्यको सम्मान में बहुवचन दिया है । ब कुछ प्रार्ष - पुस्तकों के प्रमारण भी देखिये - ९. श्रष्टा ध्यायी ( ७ ३४६, ८।४।५२ सूत्र ) में ' प्राचार्याणाम् ' पदसे गुरुको बहुवचन दिया है, जैसे कि प्रसिद्ध है- ' एकत्वं न प्रयुञ्जीत गुरौ आत्मनि चेश्वरे ( समृद्धे, स्वामिनि वा ) । पदमञ्जरीके द्वितीय- भाग ८२१ पृष्ठ में श्री हरदत्त स ० ध ०७ Gujarat. An eGangotri Initiative
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हद * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * ' प्राचार्याणां ' के बहुवचनकेलिए कहा है- ' प्राचार्यस्य पाणि-नये आचार्यः, स इह प्राचार्यः, गुरुत्वाद् बहुवचनम् ' । १० ' इसी कारण का शिका ( १२२०५६ ) में ' युष्मदि गुरौ एकेषाम् ' इस वार्तिकका ' यूयं मे गुरवः ' यह गुरुमें बहुवचन उदाहृत किया गया है । ११. अष्टा ० ( ४।१।१६३ ) सूत्रके महाभाष्य में ' वृद्धस्य च पूजायाम् ' वार्तिकके उदाहरणमें ' तत्रभवन्तो गार्ग्यायणाः ' यहां पूजामें बहुवचन दिया है । १२ महाभाष्य पस्प-शान्हिक में ' ते तत्रभवन्तो यद्वा नः, तद्वा न इति प्रयोक्तव्ये यर्वारणस्तर्वाणः इति प्रयुञ्जते; याज्ञे कर्मणि पुनर्नापभाषन्ते, यहां पर एक ऋषिको सत्कार में बहुवचन दिया है । १३ ' सर्वानुक्रमरणी ' में ' नमोऽत्रिभ्यः ' ( ५३२४ ) पर वेदार्थदीपिका में श्रीषड्गुरुशिष्यने लिखा है- ' अ त्रिशब्दात् पूजायां बहुवचनम् । १४ ' अथ ऋग्वेदाम्नाये शाकलके ऋषि-दैवतच्छदांस्यनुक्रमिष्यामो यथोपदेशम् ' [ सर्वा. ११ ] यहां पर षड्गुरुशिष्यने लिखा है, ' ननु एकोपि शौनकाचार्य -शिष्यो भगवान् - कात्यायनः कथं बहुवचनम्? उच्यते-व्याख्येयार्थ - बहुत्वेन बहुमानेन चात्मनः । व्याख्यात्रात्मनि-प्रथारोप्य बहुत्वं तु प्रयुज्यते ' यहां पर अपने लिए बहुवचन देनेके कारण में ' एकत्वं न प्रयुञ्जीत गुरौ आत्मनि ' यह पद्य दिया जा चुका है । स्वा ० द ने भी अपने लिए बहुवचन दिया है । ' जिनका नाम दयानन्द सरस्वती है उन्होंने इस वेद-भाष्य को रचा है [ ऋ ० भा ० भू ० पू ० २ ] १५. ' इक्ष्वाकूरणां ' [ वाल्मी. ३।४७।४ ] इसकी टीकामें गोविन्दराजने लिखा है-CC - 0. Ankur Joshi Collection G सम्मान में बहुवचन ६ ' इक्ष्वाकुवंशस्य रामस्य पूजायां बहुवचनम् ' १६. निर्जिता तव पुत्रकै: ' [ वाल्मी. ११६८८७ ] ' पुत्रकैः ' इस बहुवचन पर रामाभिराम टीकामें लिखा है- ' पुत्रकः - तव पुत्रेण रामेणे-त्यर्थः ' जामातृ - बुद्धया, महाबलत्वेन, ईश्वरबुद्ध्या च पूज्यत्वेन बहुवचन - प्रयोगः ' । १७. ' ऋति सवर्खे ऋ वा वार्तिकपर तत्वबोधिनीकार श्रीज्ञानेन्द्रसरस्वतीने ' भाष्यकारैरेतद्-वार्तिकद्वयस्य प्रत्याख्यातत्वातु ' यहां भाष्यकारको बहुवचन दिया है । १८. ' प्रचोदयन्तां पावमानी... व्रजत ' [ अथर्व. १६७१ । १ ] यहां पर गायत्रीको बहुवचन देनेके लिए सर्व - वेद भाष्य-कार श्रीसायणाचार्यने कहा है- ' अत्र पूजार्थ बहु-वचनम् ' । १६. वायवस्थ ' [ शु. यजुः १११ ] इस पर श्री-उवटाचार्यने भाष्य में लिखा है- ' वत्सं शाखया उपस्पृशति... पूजार्थं ' वा ' बहुवचनम् ' । २०. ' होता यक्षदिडाभि: ' [ राधा ७३ ] इस तैत्तिरीयमन्त्रके भाष्यमें श्रीसायरणने लिखा है-' बहुवचनं पूजार्थम् ' । २१. युष्माभिः स्तुतयो ' [ १२ अध्याय ] दुर्गासप्तशती के इस बहुवचन के लिए श्रीनागोजी भट्टने लिखा है- ' बहुवचनं पूजायाम् ' । २२. मुद्राराक्षस नाटक में विराधगुप्त राक्षस [ सुबुद्धि - शर्मा ] को " पुनरपि नन्दराज्य-प्रत्यानयनार्थं सुरङ्गामभिगतेषु युष्मासु ' [ २ य अङ्क ] में सम्मानार्थ बहुवचन दिया है ' इस प्रकार छठे में ' ' अमात्या राक्षसपादाः ' में भी । २३. ' रसगंगाधर ' में पण्डित-: Pujerat. Ane ve ' प्रानन्दवर्धनाचार्या स्तु प्राप्तश्री रेव '
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१०० * श्री सनातनधर्मालोक ( १-२ ) * इत्याहु: [ पृ ० २४७ ] यहां भी बहुवचन दिया है । २४. उत्तररामचरितमें, ' आर्यपुत्र! युष्माभिरपि तत्र गन्तव्यम् ' यहां सीताजीने श्रीरामको बहुवचन दिया है । वनदेवता - वासन्तीने श्रात्रेयीको ' यथेच्छाभोग्यं वः [ २१ ] यहां उसे बहुवचन दिया है, इस पर प्राचीन टीकाकार वीरराघवने लिखा है । ' पूजायां बहुवचनम् ' । २५. इस प्रकार सम्मानार्थ में बहुवचनके उदाहरण सैंकडों दिये जा सकते हैं, पर हम उन्हें छोड़कर प्रार्य-समाजियोंके दादागुरु स्वा ० द ० जी के देते हैं, उनके अनुयायी उन्हें ' वैदिकमहर्षि ' मानते हैं, उनसे बढ़कर किसीको भी प्रमारण नहीं मानते । ' श्रार्यधर्मेन्द्र - जीवन ' की भूमिका [ EE पृ ० ] मे मा ० श्रात्माराम अमृतसरीने लिखा है- ' दयानन्द मनु - गौतम व्यासादिके समान ऋषि - श्रेणी के पुरुष थे । जिस प्रकार ये प्राप्त थे, उसी प्रकार दयानन्द प्राप्त थे । ऋषि दयानन्द वेदोंके सर्वविद्यामय मूलरूपी सिद्धान्तको योगदृष्टि निर्भ्रान्त जानते थे ' [ पृ ० २ ] । [ ख ] ' प्रादिम - सत्यार्थप्रकाश और आर्यसमाज के सिद्धान्त ' में श्रार्यसमाजके प्रमुख स्वा ० श्रद्धानन्दजीने लिखा है- ' निस्सन्देह इस युगका श्राचार्य दयानन्द हो है । इसलिए उसका प्रत्येक लेख और प्रत्येक आचरण एक विशेष गौरव रखता है । उसके किसी लेख और किसो भो व्यवहारहको उपेक्षाको दृष्टिसे नहीं देखा जा सकता ' । जब ऐसा है, तब स्वामीके लेखमें ही सम्मानार्थ बहुवचन मिलजावे, तो उनके अनुयायियों को वह बात वैदिक माननी * सम्मान म बहुवचन १०१ पड़ ेगी । श्रब वे स्वामीके से उद्धरण देखें । ( अ ) स्वा.द.ने अपने गुरु स्वा. विरजानन्दको बहुत स्थानों में बहुवचन दिया! हैं - संस्कार विधि के अन्त में देखिये- ' श्रीयुत विरजानन्दसरस्वतीस्वामिनां शिष्येण ( श्रा ) केवल यहीं नहीं, अपने प्रसिद्ध पुस्तक ' सत्यार्थप्रकाश ' के अन्त में भी ' परमविदुषां ' श्री विरजानन्दसरस्वतीस्वामिनां शिष्येण । ( इ ) इस प्रकार ' श्रार्याभिविनय ' के प्रान्त में ( ई ) अपने यजुर्वेदसंस्कृत. भाष्यके चतुर्थाध्यायके अन्त में भी श्रीयुतमहाविदुषां विरजा-नन्द सरस्वती - स्वामिनां शिष्येण ' । इसे प्रकार ५, ६, ७,६ ६, १० - श्रादि श्रध्यायोंके अन्त में भी । ( उ ) पारिभाषिक ' है श्रन्त ( पृ ० ५६ ) में । ( ऊ ) श्रीविरजानन्दसरस्वती - स्वामिभि सुशिक्षितेन ( सामासिक पृ ० ६३ ) में । ( ऋ ) स्वामीने केवल बहुवचन देकर अपने गुरुको सम्मानित ही नहीं किया; कि बहुवचन को श्रादरार्थक माना भी है । पञ्चमहायज्ञविधिः ' वनस्पतिभ्यो नमः ' के बहुवचनमें परमेश्वर अर्थ करते ह स्वामीने मूसल - ऊखल द्वारा परमात्माको ग्रास देकर जहाँ मूर्ति पूजा की है, वहां यह भी लिखा है - ' बहुवचनमत्र आदरार्थः ( शताब्दीसं ० पृ ० ८८६ ) ( ॠ ) आर्याभिविनयके प्रथमप्रका में ' तन्न इन्द्रों की व्याख्यामें ' यूयं पात ' के बहुवचन पर स्वा लिखते हैं — ' आदरार्थं बहुवचनम् ( ३६ पृ ० ) ( लु ) ४१ पृष्ठमें ' नेह भद्रं ' मन्त्रकी व्याख्या करते हुए ' वः ऊतव के बहुवचन पर स्वामी लिखते हैं- ' बहुवचनमादरार्थम् इससे स्वामीके मतमें श्रादर के लिए एकको बहुवचन देना वैदि CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative