सनातन धर्मालोक १-२ — पृष्ठ 61–70

सनातन धर्मालोक १-२ · पृष्ठ 61–70

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१०२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) *, सिद्ध होता हैं । तब फिर बहुवचन में ' सब सभासदोंको ' नमस्ते ' नमस्ते - प्राचीनता ( पृ ० ३२ ) के अनुसार लिखते हुए स्वा ० द ० वेदसे विरुद्ध सिद्ध हुए; क्योंकि - वेदमें बहुवचनमें ' नमो वः वितरः ( यजु ० २।३२ ) यह श्राया है । ( ए ) इस प्रकार स्वा.द ० नेपाणिनिको ( ऋ ० भू ० भा ० पृ ० ८७ में ) ( ऐ ) ' यास्काचार्य ' को ( १४६ पृष्ठमें ) ( ओ ) मैक्समूलरको ( ७५ पृ ० ) बहुवचन दिया है । ( श्री ) श्रीसत्यव्रतसामश्रमीने निरुक्त्तालोचन / ( १६६ पृष्ठ में ) प्रस्मद्गुरुचरणास्तु अत्रैवमुपादिशन् ' ( निरुक्ता-लोचन पृ ० १६६ ) यहां गुरुको बहुवचन दिया है । ( श्रं ) श्रीधर्मदेवजीने ' श्री ' ( ४ | १ ) पत्रिका में श्रीदीनानाथ -शास्त्रिणां यह बहुवचन लिखा है । ( प्रः ) श्रीब्रह्मदत्तजी . जिज्ञासु हमें अपने पत्र में बहुवचन देते हैं; जब ऐसा है, तो वहां ' नमस्ते ' कैसे लिखा जा सकता है, क्योंकि यहां ' ते मया-वेकवचनस्य ' ( पा ० ८।१।२२ ) ' ते ' एकवचनके लिए होता है । वह तो ' नमो वः पितरः ' ( अथर्व ० १८२४१८५ ) इस निर्देशसे वेद- विरुद्ध सिद्ध है । इसलिए यह विद्वान् हमें ' प्रणाम, नमो s स्तु श्रादि लिखते हैं- ' नमस्ते ' नहीं । तब ' नमस्ते ' में परिवर्तन सिद्ध हो गया, इस अवसर पर भी ' नमस्ते ' देने वाले श्रवैदिक सिद्ध हो गये; क्योंकि - नमस्कार सम्मानितको कहना लिखना पड़ता है, और वहां बहुवचन इष्ट होता है, सम्मान में श्राजकल किसीको भी युष्मद्का एकवचन किसी भी भाषा में नहीं दिया जाता । तब ' नमस्ते ' वाद अवैदिक सिद्ध हम्रा । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. G ' नमस्ते ' प्रतिविधान # १०३ ( ७ ) ' नमस्ते विधान ' का प्रतिविधान आजकल श्रार्यसमाजकी कृपासे ' नमस्ते ' शब्दका अंग्रेजी शिक्षितों में, बहुत प्रचार है । इस प्रचारको शुद्ध सिद्ध करनेकेलिए श्रार्यसमाजियोंमें बहुत ' ट्रैक्ट ' बन चुके हैं, उनमें श्रीदेवानन्द संन्यासीसे बनाया हुआ एक ' नमस्ते-विधान ' ट्रैक्ट भी है । इस में नमस्कार प्राशीर्वाद उभय - पक्षमें ' नमस्ते ' के प्रयोग के लिए वेद, महाभारत, रामायण, पुराण-श्रादिके बहुत प्रमारण देकर अपने पक्षको सिद्ध करनेकी स्वामीने असफल चेष्टा की है । परन्तु उभयपक्षसे ' नमस्ते ' का प्रयोग शास्त्रविरुद्ध है । उक्त ट्रैक्टकी ग्रालोचना करनेसे ' नमस्ते ' पर भी विचार हो जायगा तथा उक्त ट्रैक्ट प्रमारणों पर श्रालोचना भी हो जायगी । पाठक इस प्रावश्यक विषयकी ओर अवश्य ध्यान देंगे - यह आशा है । ' नमस्ते - विधान ' बनाते हुए उसके प्रणेताने किसी धर्म-शास्त्र से यह विधि नहीं दिखलाई कि प्रणाम एवं आशीर्वाद के अवसरपर ' नमस्ते ' ही कहना चाहिए, उससे भिन्न कोई शब्द नहीं । यह भी उसमें सिद्ध नहीं किया गया कि ' नमस्ते ' में परिवर्तन क्यों नहीं हो सकता? तव विधि न होनेसे ' नमस्ते - विधान ' यह नाम ही निराधार है । उसके अन्त में " नमो ज्येष्ठाय च कनिष्ठाय च नमः पूर्वजाय चापरजाय च " ( १६०३२ ) वह यजुर्वेद वा ० सं ० का प्रमाण दिया गया है । इस मन्त्र में ' नमो ज्येष्ठाय ' इत्यादि तो कहा है, परन्तु ' नमस्ते इति ज्येष्ठाय नमस्ते. इति कनिष्ठाय च वाच्यम् ' An eGangotri Initiative

पृष्ठ 62

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१०४ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) इसप्रकार ' नमस्ते की विधि नहीं की गयी है, तब इस पुस्तकका नाम ' नमस्ते -विधान ' ठीक नहीं । व्यवहार में भी ' नमस्ते ' न कहकर ' नमः ' ऐसा कहना चाहिए । तब उक्त मन्त्र के अनुवादके अवसर में " बूढ़े बालक, बड़े - छोटे बराबर-शिशु, नीच - उच्च, सब परस्परमें नमस्ते का व्यवहार करें " यह लिखना प्राग्रहवाद तथा साम्प्रदायिक दृष्टिकोण है, क्योंकि मन्त्रमें ' नमः ' है, ' नमस्ते ' नहीं । फिर लेखकसे दिये गये महाभारत श्रादिके प्रमाणों में भी उक्त मन्त्रानुसार छोटे-बड़े दोनों ओर से ' नमस्ते ' नहीं मिलता, तब ' नमस्ते ' वाद प्रसिद्ध हो गया । उक्त मन्त्रका वास्तविक उत्तर हम इस निबन्धके अन्त में देंगे । पहले वादीसे प्रश्न है कि ' नमस्ते ' ये दो पद हैं या एक पद? यदि एक पद है, तो इसमें वैदिक वा शास्त्रीय क्या प्रमाण है? तब वेदमें बहुवचनमें ' नमो व पितरः ' ( यजुः २३२ ) यह पाठ क्यों मिलता है! एक पद होने से यहां पर ' नमस्ते पितरः ' यह पाठ क्यों नहीं रखा गया! वेदादिमें ' नमोस्तु ' ( यजुः १६।८ ) श्राया हैं, एकपद होनेसे वहां ' नमस्तेस्तु ' ऐसा क्यों नहीं पढ़ा गया! यदि यह एक अखण्ड पद है, तो ' नमोऽस्तु ते ' ( प्र ० ६ १३ | १ ) इत्यादि में ' अस्तु ' का व्यवधान क्यों आया है? इससे स्पष्ट है कि वेदादिके अनुसार यह एक पद नहीं है । फिर प्रश्न यह है कि ' नमस्ते '. यह संस्कृतभाषाका शब्द है, अथवा स्वेच्छाभाषा का? यदि स्वेच्छाभाषाका, तो ' नमस्ते ' शब्द श्रवैदिक एवं अशास्त्रीय नमस्तका प्रतिविधान १०५ तथा स्वेच्छाकल्पित सिद्ध हुआ । तब उसमें हमारा विवाद नहीं, निर्मूल शब्द में भला क्या विवाद । यदि यह संस्कृतभाषा । का है, तो एक पद नहीं हो सकता, वैसा होना संस्कृतभाषा । के विरुद्ध है । संस्कृत में यह कहीं एकपदरूपसे प्रवृत्त नहीं । अन्य यह प्रश्न है कि ' नमस्ते ' यह प्राचीन एवं वैदिक शब्द है या अर्वाचीन अवैदिक? यदि वैदिक एवं प्राचीन है तो एकपदरूप में, प्रणाम - प्राशीर्वाद में और समानता में इसका प्रयोग वेद, रामायण, महाभारत आदि से दिखलाइये और वैसी श्राज्ञा धर्मशास्त्रोंसे दिखलाइये । वेद में भी जहां ' ' नमस्ते ' श्राया है । वहां पदपाठ में ' नमः, ते ' इस प्रकार दो पदोंके रूपमें श्राया है, इसी प्रकार पद सूचियोंमें । तब इसकी एक - पदता अशुद्ध सिद्ध हुई । यदि ' नमस्ते ' प्रर्वाचीन है, तो वह श्रवैदिक तथा शास्त्रीय एव अनैतिहासिक सिद्ध हुआ । यदि ' नमस्ते ' में ' नमः— हो ' इसप्रकार दो पद हैं, तो इन दो पदों का यौगपद्य ( एक साथ होना ) अनिवार्य कैसे है? क्या केवल ' नमः ' शब्द से कार्य नहीं हो सकता? यहां नमस्कारवाचक शब्द ' नमः ' है, ' ते ' पद नहीं, तो ' ते ' शब्द साथ रखनेका वादीलोग क्यों हठ करते हैं? ' नमस्ते ' को अपरि वर्तनीय कैसे मानते हैं? ' नमः ' शब्द को ही प्रयोगका विषय सिद्ध क्यों नहीं करते? इस पदद्वय को श्रापलोग एकपदको तरह क्यों व्यवहृत करते हैं? यदि कहें कि ' नमस्ते ' झ पदद्वय में ही अभिवादन -अर्थ की शक्ति है, अन्यत्र नहीं, तो फि जहां वेदादि शास्त्रोंमें ' नमोस्तु ' ( यजुः १६६४ ) ' नमः ' ( यह CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat An eGangotri Initiative

पृष्ठ 63

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१०६ श्री सनातनधर्मालोक ( १-२ ) १६।२२ ) ' नमो नमः ' ( यजुः १६।२५ ) ' नमो वः ' ( यजुः २३२ ) इत्यादि शब्द आते हैं, क्या वहां अभिबादन प्रतीतः नहीं होता? ( ख ) अन्य यह प्रश्न है कि ' नमस्ते ' में ' ते ' का ' तुझे ' श्रर्थ है या नहीं? यदि ' तुझे ' यही अर्थ है, तो ' नमस्तेस्तु गमिष्यामि ' का वादी को ५ वें पृष्ठमें ' आप को नमः करता हूँ " यह अर्थ लिखना चाहिए था, बल्कि ' आपको ' भी नहीं, किन्तु ' तुझे ' | ' आप को नमस्ते करता हूं ' यह वादीका वाक्य ' नमस्ते ' को उनके मत में एकपद बतला रहा है । इस प्रकार ६ ठे पृष्ठ में ' नमस्ते राजन्! वरुणास्तु ' इस मन्त्रके श्रर्थावसरमें ' हे श्रेष्ठ राजन्, तुम्हें नमस्ते हो ' यह वादी का उल्लेख भी पूर्व की भांति अशुद्ध सिद्ध हो गया । इस प्रकार उक्त ट्रैक्ट के ३ रे पृष्ठमें ' हम आप को नमस्ते करते हैं ' यह वाक्य भी शुद्ध हुआ, क्योंकि ' नमस्ते ' एक पद नहीं और जहां ' नमस्ते ' आया है, वहां वादी को ' तुझे नमस्कार हो ' यह अर्थ करना चाहिए, वे ' नमस्ते हो ' इसी रूपमें अर्थ क्यों लिखते. गये हैं? इसलिए ' नमस्तेवाद ' प्राग्रहवाद हुआ । ' तुम्हें नमस्ते ' यह तो पुनरुक्ति है औौर एकवचनसे विरुद्ध अर्थ है । ( ग ) यह भी बतलाया जावे कि मान्यके प्रति क्या कभी-युष्मद् - शब्दके एकवचनका संस्कृतभाषा तथा हिन्दी, अंग्रेजी तथा उर्दू में प्रयोग करते हैं? यहां उन्हें असत्य - व्यवहार नहीं करना चाहिए । अंग्रेजी में भी कभी Thou, Thy, ‘ दाऊ, बाई ' after प्रयोग किया है? यदि नहीं, तो क्यों? यदि CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्तेका प्रतिविधान १०७ कहो कि इससे मान्य का अपमान है, तब तो वैसा ' नमस्ते ' में भी जानना चाहिए, यहां ' ते ' शब्द भी युष्मद् का एकवचन है । ( घ ) अन्य यह प्रश्न है कि गुरु आदि माननीयोंके लिए बहुवचनका प्रयोग भी किया जा सकता है या नहीं? यदि नहीं, तब बतलाइये कि वादीके तथाकथित महावने ' सत्यार्थ-प्रकाश ', ' संस्कारविधि ' आदि अपने ग्रन्थोंके अन्त में अपने गुरु श्रीविरजानन्दजीको जो बहुवचन दिया है ' ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका ' के ८७ पृष्ठमें श्रीपाणिनिको, १४६ तथा २१६ पृष्ठ में श्रीयास्कको, ७४-७५ पृष्ठमें मोक्षमूलर ( मैक्समूलर ) को बहुवचन दिया है, तब क्या यह अवैदिक है? यदि वैदिक है तो वादियोंके स्वामीजीके वेदविरुद्ध लिखनेवाला सिद्ध हो जाने से उनसे श्राविष्कृत ' नमस्तेवाद ' भी श्रवैदिक सिद्ध हो गया । स्वा. द. जी तो एकके लिए श्रादर - प्रथमें बहुवचन देना वेदसम्मत मानते हैं | देखिये उनके ' प्रार्याभिविनय ' के प्रथम प्रकाश में – ' तन्न इन्द्रो ' इस मन्त्रकी ३६ वें पृष्ठमें व्याख्या करते हुए स्वामीजीने ' यूयं पात ' इस वेदमन्त्रांश में इन्द्रके लिए दिये ' यूयम् ' इस बहुवचनान्त पदके लिए लिखा है — ' आद-रार्थं बहुवचनम् । " इस प्रकार ४१ पृष्ठमें वहीं ' नेह भद्रं मन्त्रको व्याख्या करते हुए स्वामीजीने ' व ऊतयः इस प्रश " के लिए लिखा है - " बहुवचनमादरार्थम् । " इसी प्रकार अपनी ' पञ्चमहायज्ञविधि ' में वनस्पति शब्दको परमेश्वरार्थ सिद्ध करते हुए आपके स्वामीजी ने ' वनस्पतिभ्यो नमः ' के बहुवचन के लिए लिखा है- ' बहुवचनमत्र आदरार्थम् ' । तब एकको Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 64

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१०८ G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) बहुवचन देना भी ' वैदिक ' सिद्ध हुआ । इससे मान्यको एक-वचन देना उनके मतमें अनादरार्थक भी हो गया । यदि मान्यको बहुवचन देना वादियोंके मतमें भी ठीक सिद्ध हुआ, तब वहां क्या वादी ' मान्याः! श्रीमन्तः! नमस्ते ' ऐसा प्रयोग देंगे, या ' मान्याः नमो वः ' यदि बहुवचनमें भी ' नमस्ते ' लिखेंगे, क्योंकि ' ते ' यह एकवचन है, ' ते ८१२२ ) । इसलिए वेदमें ' नमो २।३२ ) इस प्रकार बहुवचनमें ' है, ' नमस्ते पितरः ' नहीं लिखा ' माननीयाः! नमो वः ' यह लिखेंगे, कहना चाहिए ' यह आप का पक्ष कट ऐसा प्रयोग करेंगे? तो श्रशुद्ध हो जायगा, मयावेकवचनस्य ' ( पा ० वः पितरः । ' ( यजुः नमो वः ' यह लिखा गया । यदि आप तो ' सदा ' नमस्ते ' ही जायगा । ' ते ' प्रनित्य है । कभी ' तस्मै, भवते, वः ' इत्यादि प्रयोग भी देने पड़ते हैं । कभी केवल ' नमः ' लिखा जाता है, जैसे कि ' नमः कर्पादने ' ( यजुः १६४२ ९ ), ' नमः शम्भवाय ' ( यजुः १६ ४१ ) इत्यादि । -सब ' ते ' के अनित्य होने से ' नमः ' शब्द से उसकी अनिवार्यता सिद्ध न होने से ' नमस्ते ' का खण्डन हो गया । ( ङ ) अन्य यह प्रश्न है कि मान्य के लिए ' युष्मद् ' शब्द का प्रयोग उचित है या ' भवत् ' शब्द का? यदि कहा जाय कि ' भवत् ' शब्द का, तब ' नमो भवते ' कहना चाहिए, ' नमस्ते ' नहीं, क्योंकि ' ते ' शब्द ' युष्मद् ' शब्द से निष्पन्न है । यदि कहा जाय कि ' भवत् ' शब्द का प्रयोग प्रवैदिक है, युष्मद शब्द का प्रयोग उचित है, तो फिर उत्तर दीजिये कि वादी CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्त का प्रतिविधान G १०८ मान्य कोसभी भाषाओं में ' त्वं, त्वया, तव, तू, तूने, तेरा इत्यादि का प्रयोग क्यों नहीं करते? इधर वादियों के स्वामीजीने संस्कारविधि ' के ९ ६ पशु शिष्य द्वारा श्राचार्य को ' अमुकगोत्रोत्पन्नोऽहं भो! भवन्तम. भिवादये ' यहां तथा ४२ वें पृष्ठ में पत्नी द्वारा पतिको ' अ भो! भवन्तमभिवादयामि ' इस प्रकार वैदिक संस्कारों ' भवत् ' शब्द का प्रयोग कराया है । क्या वादियोंके स्वामीजी अवैदिक हैं? यदि ऐसा है, तो वादी के स्वामीजी वेदविरुद्ध सिद्धान्तों के लेखक भी सिद्ध हो गये । तब उनके सिद्धान भी वैदिक सिद्ध हुए । व ( च ) अन्य यह प्रष्टव्य है कि प्राचीनकाल में मान्य के क लिए युष्मद् शब्द की सब विभक्तियोंके एकवचन प्रयुतं २ किये जाते थे या केवल ' तुभ्यं ' स्थानिक ' ते ' का ही प्रयोग उत्त था? अन्य युष्मद् के एकवचनोंका व्यवहार क्या नहीं था! है । यदि युष्मद् शब्दकी सब विभक्तियोंके एकवचन प्रचलित की स्थ थे, केवल ' ते ' नहीं, तब वादी मान्य को त्वं, त्वाम् त्वया दिव इत्यादि क्यों नहीं लिखते? जिस कारण से सब भाषाओं में मान्य को ' तुभ्यं, त्वत्, त्वयि ' इत्यादि वे नहीं लिखते उ काररण ही ' नमस्ते ' में ' ते ' का प्रयोग भी ठीक नहीं । ही [ छ ] अन्य यह पूछना है कि वादी ' नमस्तुभ्यम् ' पर्द तब नहीं लिखते? क्या ' तुभ्यं ते ' में कोई भेद है? वा १४ ' नमस्तेस्तु ' अथवा ' नमोस्तु ते ' क्यों नहीं कहते, क्या इस का कोई अर्थभेद है? ' नमो भवते ' क्यों नहीं कहते - लिखते Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 65

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* श्री सनातनधर्मालोक. ( १-२ ). * २०१ www. अथवा ' नमः श्रीमन्! ' क्यों नहीं कहते? क्या ऐसा कहने से II किसी की मानहानि होती है? यदि ऐसा करने पर भिन्न-भिन्नता हो जाती है, तो क्या ' महाभारत ' श्रादिमें ' नमस्ते ' से भिन्न शब्द नहीं दिखाई पड़ते, जो वादीके दिये प्रमाणों में भी सुलभ हैं? तब फिर वादियों का ' नमस्ते ' में ही आग्रहः ' क्यों? क्या यह साम्प्रदायिक दृष्टि नहीं? र [ ज ] उक्त ट्रैक्टमें लेखक ने ' नमस्ते ' घटित जो प्रमारण वर्ण या गुणसे छोटेके द्वारा वर्ग या गुण में बड़ दिखलाये हैं, उनका उत्तर देना तो व्यर्थ है, क्योंकि श्रायु, वर्णं या विद्या में छोटा वर्ण, विद्या, श्रायुसे बड़े को ' नमः ' तो कहता ही है, इस विषय में तो हमारा भी विरोध नहीं । जैसा कि २१३५ पद्य में नन्दनने कहा है ' वर्णज्यैष्ठयं मान्यतानिमि तमित्याह ' ' ज्यायांसमभिवादयन् [ २।१२२ ] यह मनुने कहा अवशिष्ट विवाद है ' ते ' में, उसका उत्तर यह है कि उन बलि स्थलों में केवल ' ते ' का ही प्रयोग नहीं है, किन्तु की सब विभक्तियों के एकवचन का प्रयोग ' युष्मद् स्वय हैं, यह वादी से दिये हुए पद्योंके साथवाले पूर्वोत्तर - पद्यों में देखा जा सकता है । परन्तु वादी मान्य के लिए ' त्वं त्वां त्वया, त्वत्, तव, afr. तुभ्यम् ' आदि का प्रयोग नहीं लिखते, किन्तु ही प्रयोग करते हैं, उसका भी केवल ' ते ' का तब वे इसमें कारण ' नमस्तेमें ही, अन्यत्र नहीं, बतायें । इससे वादीके १-२-३-५-८-१३ १४-१५-१७-१८-१६-२१-२२-२४-२६ का उत्तर तो स्वतः ही हो गया, क्योंकि संख्यावाले प्रमारणों वहां क्रमशः दूत CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. * ' नमस्ते ' का प्रतिविधान * -१११ धृतराष्ट्र को १, सञ्जय महाराज को २, सञ्जय धृतराष्ट्र को, ३, अर्जुन युधिष्ठिर को ५, देवयानी अपने जनक शुक्राचार्य सञ्जय धृतराष्ट्र को १३, अर्जुन श्रीकृष्ण को ८, द्रोणाचार्य को १५, कीट व्यास को १४, युधिष्ठिर को १७, युधिष्ठिर भीष्म को १८, विश्वामित्र वसिष्ठ को १६, गार्गी -याज्ञवल्क्य जैनक याज्ञवल्क्य को २२, उपासक वरुणदेव को २१, को २४, सावित्री अपने पति ब्रह्मा को २६ नमस्कार करती है । इनमें आपके अनुसार धृतराष्ट्र न दूत को १, महाराज ने सञ्जय को २-३, युधिष्ठिर ने अर्जुन को ५, श्रीकृष्णले अर्जुनको १४, द्रोणाचार्यने युधिष्ठिरको १५, भीष्म ने युधिष्ठिरको १८, वसिष्ठ ने विश्वामित्रको १६, याज्ञवल्क्यने जनक को २२ नमस्कार नहीं किया, तब वादी का पक्ष भी खण्डित हो गया । शेष वादी के ४, ६, ७, ६, १०, ११, १२, १६, २०, २३, ' २५, २७ संख्या वाले प्रमारणोंका उत्तर दिया जाता है । ' आलोक ' पाठक सावधानता से देखें । ( ४ ) यहां वाढी लिखते हैं कि " सञ्जयोऽहं नरव्याघ्र! नमस्ते भरतर्षभ! ' ( महा ० उद्योगपर्व ३१८ ) सञ्जयने वापस जाते समय धृतराष्ट्रको नमस्ते की । इससे सिद्ध है उच्चजाति ब्राह्मण भी क्षत्रियोंको नमस्ते करता था । " खेद है कि अपना पक्ष सिद्ध करनेके लिए वादी असत्य बोलकर साधारण जनता को ठगते । यदि सञ्जय ब्राह्मरण होता और वह क्षत्रिय घृतराष्ट्र को नमस्कार करता, तो वादी की पक्षसिद्धि थी, परन्तु अब नहीं, क्योंकि सञ्जय ब्राह्मरण An eGangotri Initiative

पृष्ठ 66

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११२ G श्रीसनातनधर्मा लोक ( १-२ ) * नहीं, किन्तु सूत था । सूत वर्णसङ्कर होता है शूद्रकोटिका माना जाता है, तभी वह धृतराष्ट्र का करता था । तब क्षत्रियवर्गकी अपेक्षा निकृष्ट अपने से उच्च वर्णवाले क्षत्रियको नमस्कार कर ' ते ' का उत्तर पहले दिया जा चुका है । इधर सञ्जयको नमस्कार नहीं किया, श्रतः वादी के विरोध भी है ॥ वर्णसङ्कर रथ चलाया होनेसे सूत सकता है । धृतराष्ट्र ने सिद्धान्तका सञ्जय गावल्गरणनामक सूतका पुत्र था । इसीलिए " कांनु वाचं सञ्जय! मे शृणोषि कस्तल्लब्ध्वा जातु युध्येत सूत । ".. ( उद्योगपर्व २६।१ ) यहां युधिष्ठिरने सञ्जय को ' सूत ' कहा है, इसी तरह " यत्ते वाक्यं धृतराष्ट्रानुशिष्टं गावल्गणे! ब्रूहि तत् सूतपुत्र । " ( उद्योग ० २५।१ ) यहां पर उसे ' सूतपुत्र ' कहा गया है । संजयो मुनिकल्पस्तु जज्ञसूतो - गावल्गरणात्, ( महा. ११६३।६७ ) इसी प्रकार उद्योगपर्व के २२१३८ पद्य में, भीष्मपर्व के ८३ । ३ पद्य में भी उसे ' सूत ' कहा गया है । सूत के क्षत्रिय से निकृष्ट होने के ही कारण क्षत्रिया द्रौपदीने करणको सूतपुत्र की प्रसिद्ध होने मात्र से ही स्वयंवर में लक्ष्य-वेध करनेका निषेध कर दिया था । देखिये ' महाभारत ' श्रादिपर्व ( १८६।२३ ) । इस प्रकार वादीका प्रमाण प्रत्युक्त 7 हो गया । ( ६ ) यहां पर वादी लिखता है कि ' कुरु कार्यारिग राजर्षे! नमस्ते पुरुषर्षभ । " ( प्राश्रमवासपर्व १०1५० ) ब्राह्मणों ने -वृतराष्ट्र से कहा ' है पुरुषोंमें श्रेष्ठ राजन्! श्राप श्रपने कार्यो.. CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्तेका प्रतिविधान को करो, हम प्रापको श्राक्षेप्ताने असत्य व्यवहार जो नमस्कार किया गया है, ने नहीं, यह उस प्रकरण में ब्राह्मरणने उन क्षत्रियोंका ही दिया है, अपनी घोर से क्षत्रिय अपने किसी नेता के लिए श्राते हैं, हम उन का कविता में कर दिया करते ११३ नमस्ते कहते हैं । " यहां पर भी किया है । यहां पर धृतराष्ट्रको वह क्षत्रियोंने किया है, ब्राह्मणों देखा जा सकता है । साम्ब नामक जो वक्तव्य था, उसे केवल सुना कुछ नहीं कहा । हमारे पास कई । लिए ' अभिनन्दनपत्र ' बनवानेके । अभिप्राय जानकर उस वक्तव्यको हैं । उस वक्तव्यके साथ, हमारा क्या सम्बन्ध? हम तो केवल उनकी प्रोरसे योजना करने वाले या सुनानेवाले हैं इस प्रकार वादी प्रत्युक्त हो गया । शेष ' ते ' के विषय में पहले उत्तर दिया जा चुका है । ' आप को नमस्ते ' यह वादीका वाक्य पुनरुक्तिदोषग्रस्त है पा ' नमस्ते'को एकपद बता रहा है, तब दोनों प्रोरसे श्रद्ध हुआ यह हम बतला आाये हैं । · ( ७ ) वादी लिखता है कि " शिवेन पाण्डवान् पाहि नमस्ते भरतर्षभ! " ( महा ० शल्यपर्व ० ६३।५१ ) श्रीकृष्णने धृतराष्ट्रको ' नमस्ते ' की । " यह कहकर वह टिप्परंणी चढ़ाता है - " हमारे सनातनधर्मी भाई श्रीकृष्णको भगवान्क अवतार मानते हैं, किन्तु श्रीकृष्णने धृतराष्ट्रको नमस्ते की । इससे सिद्ध है कि पूर्वकालमें ' नमस्ते ' का ही प्रचार था । " यहां पर ' नमस्ते का ही ' यह ' ही ' शब्द ' महाभारत ' स ० ध ०८ Gujarat An eGangotri Initiative

पृष्ठ 67

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११४ श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) विरुद्ध हैं । ' महाभारत ' में ज्येष्ठको नमस्कार, कनिष्ठको भो श्राशीर्वाद, समानों से प्रालिङ्गन या कुशल प्रश्न वरित किया गया है । इस विषय के बहुतसे प्रमाण हमने सङ्कलित कर रखे हैं । यहां विस्तारभयसे उद्धृत नहीं किये जा सकते । मक केवल एक - दो प्रमारण उद्धृत किये जाते हैं । पाठक देखें -सुना " एवं सर्वान् कुरून् वृद्धान् अभिवाद्य यतव्रताः । समालिङ्ग्य समानान् ' वं वाश्चाप्यभिवादिताः " ( १।१४७।३ ) यहां पर श्रार्यसमाजिक विद्वान् श्रीसातवलेकरका प्रर्थ देखिये- " अनन्तर व्रतशील, पाण्डव भीष्म, कृपादि वृद्धोंके पांव छूने लगे । नारा इस प्रकार अपने से बड़े सब कौरवोंको प्रणाम किया । करने. अपने जोड़ियोंको गले से लगाया । आगे बालकोंका प्रणाम या । लेकर । " यहां पर समानोंका प्रापसमें नमस्कार नहीं कहा । ज्येष्ठोंका कनिष्ठों को नमस्कार नहीं कहा गया, किन्तु ज्येष्ठों को ही यहां कनिष्ठोंने प्रणाम किया है । इसी प्रकार पशुद ' महाभारत ' का एक अन्य पद्य भी देखिये -- " प्रभिवाद्या वे मद्वचनेन वृद्धाः, तथेतरेषां कुशलं वदेथा. " ( उद्योगपर्व पाहि ३०1८ ) यहां पर भी बड़ोंको अभिवादन तथा छोटों को ने कुशलप्रश्न ही किया गया है । महाभारतकी उपजीव्य ढ़ाता ' मनुस्मृति ' में भी ( २।१२२ - १२५ ) ज्येष्ठ को ' अभिवादये न्य देवदत्तोऽहं भो: ' इस प्रकार प्रणाम और कनिष्ठ के प्रति की । ' आयुष्मान् भव सौम्य! ' इस प्रकार प्राशीर्वाद तथा समानों को ( २।१२७ पद्य में ) कुशलादि प्रश्न प्रादिष्ट किया गया है । वादीके स्वामीजीने भी ' सन्धिविषय ' के संज्ञाप्रकरण ३ पृष्ठ में लिखा है- " जो पूर्व अभिवादन-* ' नमस्ते ' का प्रतिविधान * ११५ नमस्कार किया जाता है, उसका जो उत्तर देनेवाले की थोर से वाक्य होता है, उसको प्रत्यभिवाद कहते हैं- ' प्रभिवादये देवदत्तोऽहं भोः! श्रायुष्मानेवि देवदत्त ३ इति । ' यहां भी श्रभिवादनप्रत्यभिवादन के समान प्रदिष्ट न होने से दोनों तरफ से ' नमस्ते ' का होना कट गया । अब प्रकरण पर ग्राइये । श्रीकृष्णके विषय में यह जानना चाहिए कि यद्यपि श्रीकृष्ण महाभारतको भगवान् के अवतार इष्ट हैं, तथापि वे क्षत्रियजाति में श्रवतीर्ण हुए थे । तब उन्हें लौकिक - मर्यादा भी पूर्ण करनी थी । धृतराष्ट्र श्रीकृष्णकी अपेक्षा श्रायु में वृद्ध थे, जैसा कि श्रीकृष्ण ने स्वयं धृतराष्ट्र से कहा है- " न तेऽस्त्यविदितं किञ्चिद् वृद्धस्य तब भारत! " ( शल्यपर्व ६३ । ४० ) । तब श्रीकृष्णका धृतराष्ट्रको नमस्कार करना ठीक ही था । तभी तो प्राक्षिप्त-पद्यसे पूर्व पद्य में श्रीकृष्ण द्वारा धृतराष्ट्रके चरणस्पर्शपूर्वक अभिवादन आया है | देखिये- ' पूर्व चाभिगतं तत्र सो ( कृष्णो ) -ऽपश्यद् ऋषिसत्तमम् ( व्यासम् ) । पादौ प्रपीड्य कृष्णस्य ( कृष्णद्वैपायनस्य ) राज्ञश्चापि ( घृतराष्ट्रस्य ) जनार्दनः ( श्रीकृष्णः ) । प्रभ्यवादयदव्यग्र गान्धारीं चापि केशवः " ( शल्यपर्ण ६३।३६-३७ ) कृष्णोऽहमस्मीति निपीड्य पादौ युधिष्ठिरस्य ' [ १।१ ९ ३।२० ] यहां श्रीकृष्णकी अपने से बड़े युधिष्ठिर को भी चरण - वन्दना कही गयी है । तब क्या वादी बड़े होकर छोटे शिष्य, पुत्र आदि के चरणोंका स्पर्श करते हैं? स्वा.द.ने विवाह - संस्कारविधिके प्रारम्भ में स्त्रीको पतिके CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 68

सनातन धर्मालोक १-२, पृष्ठ 68 का मूल पृष्ठ
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११६ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * चररणोंका स्पर्श करवाया है- पादप्रक्षालन भी ( पृ ० १३३ ) पर क्या पतिको स्त्रीके चरणोंका स्पर्श कराया गया है? यदि नहीं तो स्पष्ट है कि यह प्ररणाम धृतराष्ट्रके वृद्ध होने के कारण है । ' ते ' का उत्तर पहले दिया ही जा चुका है । ( ६ ) " यथा तथा तेऽस्तु नमश्च तेऽस्तु " ( महा ० सभा ० ६३ प्र ० ) यह पद्य देकर वादी लिखता है कि " चाचा विदुर ने अपने भतीजे दुर्योधनको नमस्ते कहा । " यहां यह जानना चाहिए कि यहां पर ' नमः ' शब्द शिष्टाचारार्थक नहीं है, नहीं तो श्राता हुआ ही विदुर दुर्योधनको नमस्कार करता । परन्तु उसने वैसा नहीं किया । न ही यहां साक्षात् ' नमस्ते ' शब्द है । श्रापका ' नमस्ते ' शब्द में ही श्राग्रह है, उससे थोड़े भी भिन्न शब्द में आपलोगों का अभिनिवेश नहीं । नहीं तो आपलोग ' नमश्च तेस्तु ' का प्रयोग क्यों नहीं करते? यदि ' नमस्ते ' एक पद है, तो ' महाभारत ' में यहां ' च ' का व्यवधान क्यों दिया गया है? इससे वादीका पक्ष सर्वथा खण्डित होता है । इधर यहां वादीको यह भी जानना चाहिए कि विदुर दासीपुत्र थे । एतदर्थं ' महाभारत ' में कहा है- " शूद्र योनावहं जातो नातो वक्तुमिहोत्सहे " ( उद्योगपर्व ० ४११५ ) ' होम शापेन धर्मोपि शूद्रयोनौ प्रजायत । विद्वान् विदुररूपेण ' ( १।६३ । ६-११४ ) वह विदुर दुर्योधनको अपेक्षा निकृष्ट - वर्णं थे । क्या लोग श्रायु में बड़े ' भङ्गी ' प्रादिको चाचा - बाबा प्रादि नहीं कहते? फिर वह हमें नमस्कार करता है, हम उसे नमस्कार नहीं करते । जैसा कि ' मनुस्मृति ' में कहा है- ' ब्राह्मणं दश--CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्ते का प्रतिविधान ११० व तु शत्र तु भूमिपम् । पितापुत्रौ विजानीयात् ब्राह्मणस्तु तयोः पिता ” ( २।१३५ ) यहां उत्तम वर्णवाले ब्राह्मणके द वर्ष तथा उससे होन - वर्णवाले क्षत्रियके सौ वर्ष होनेपर भी ब्राह्मणको पिता तथ क्षत्रियको पुत्र कहा गया है । वैसे ही यहां पर भी समझना चाहिए । इस प्रकार विदुरने श्रपने उत्कृष्ट वर्णवाले तथा राजा दुर्योधनको यदि नमस्कार भी कहा है, तो भी हमारे पक्षकी कोई क्षति नहीं । ( १० ) " श्रेष्ठो राजन्! वरिष्ठोऽसि नमस्ते भरतर्षभ! ( सभापर्व अ ० ६४ ) पर यह लिखकर वादी लिखता है-" शकुनिने युधिष्ठिरको नमस्ते कहा । " परन्तु यहां तो प्राक्षे. ताका पक्ष ही खण्डित होता है । श्रेष्ठः वरिष्ठश्च प्रसि, प्रत एव ते नमः ' अर्थात् तु श्रेष्ठ तथा वरिष्ठ है, इससे तुझे नमः हो । इससे सिद्ध होता है कि अपनी अपेक्षा वर्ण, विद्यावा आयु से श्रेष्ठ को नमस्कार होता है, निकृष्टको नहीं: इसलिए ' महाभारत ' में अन्यत्र भी कहा है- " श्रहं हि पूर्वो वयस भवद्भ्यः तेनाभिवादं भवतां न प्रयुञ्जे । यो विद्यया, तपसा जन्मना वा वृद्धः स पूज्यो भवति द्विजानाम् " ( १ । ८ । २ ॥ प्रर्थात् ' मैं आप लोगों से प्रायुमें बड़ा हूं, इसलिए मैंने प्राप लोगों को नमस्कार नहीं किया । जो विद्या, तपस्या अथवा आयु में बड़ा है, द्विजों में वही नमस्कारयोग्य होता है । कितना स्पष्ट वचन है? यदि कहा जावे कि शकुनि युधिष्ठिर का मामा था, अतः पूज्य है, इस पर जानना चाहिये किन्या युधिष्ठिरका नहीं, किन्तु दुर्योधनका मामा था, जैसेकि सहदेव Gujarat An eGangotri Initiative

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* श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * ११८ शकुनिको कहा था - ' दुर्योधनः कुलाङ्गारः हि शिष्टस्त्वं चास्य मातुलः ' ( शल्पपर्व २८।५२ ) युधिष्ठिर बड़े थे दुर्योधन छोटा पस्तु था, तब युधिष्ठिरकी अपेक्षा शकुनि गुणों और आयुसे बड़ा नहीं था । तब सब जगह ' नमस्ते ' कहते हुए वादीका पक्ष कट गया í । ' ते ' का उत्तर तो पहले प्रा चुका है । ( ११ ) " वयं च देशातिथयो गच्छ भद्रे! नमोऽस्तु ते " ( महा ० वनपर्व ० श्र ० ७५ ) यहां पर वादी लिखता है -" राजा नलने दासी को नमस्ते कहा है । " यहां वादीका न! " श्रसत्य - व्यवहार है । हमारे पास प्रार्यसमाजी श्रीपाद है- सातवलेकरजी द्वारा प्रकाशित ' महाभारत ' है । उसमें तो " वयं नाक्ष च देशातिथयो गच्छ भद्रे! यथासुखम् " ( ३३७५।२६ ) यह प्रत पाठ है । इस प्रकार लक्ष्मरणदास - प्यारेलाल ( लाहौर ) से नमः प्रकाशित महाभारत में भी यही पाठ है । इस प्रकार गणपत वा कृष्णाजी मुम्बईसे मुद्रित नीलकण्ठकी टीकावाले में भी ऐसा लए ही पाठ है । तब ' यथासुखम् ' के स्थान पर ' नमोऽस्तु ते ' यह यस पाठ असार्वत्रिक तथा असम्बद्ध होने से प्रमादपतित है । इधर पसा उसमें भी आप का प्रिय ' नमस्ते ' साक्षात् नहीं है ' अस्तु ' का बीच में व्यवधान है । तव भवदभिमत इसकी आप खण्डता, अपरिवर्तनीयता तथा इस रूप में अनिवार्यता कट थवा गयो । है । ( १२ ) वादी लिखता है - ' देवदूत! नमस्तेऽस्तु गच्छ तात! यथासुखम् ” ( महाभा ० वनपर्व ० २६० ( २६१ ) ।४२ ) -देव CC - 0. Ankur Joshi * नमस्तेका प्रतिविधान ११६ महात्मा वेदव्यासने दूतको नमस्ते कहा । " यह प्राक्ष ेप भी असत्य है । यहां मुद्गल मुनिने देवदूतको नमस्कार किया है । वह साधारण दूत नहीं, किन्तु देवदूत था । देवता मनुष्य की अपेक्षा उच्चयोनि होते हैं । तब मनुष्य द्वारा देवताओंको नमन ठीक ही है । श्रीव्यासजी ने यह नमस्कार नहीं किया । लेखक यहां प्रसत्य बोल रहे हैं । श्रापाततः न देखकर वे सम्यक्तया प्रकरण को देखें । यदि व्यासजी देवदूतको भी नमस्कार करते, तो भी पूर्व कहे प्रकार से हमारे सिद्धान्तकी हानि नहीं थी । ' ते ' का उत्तर दिया जा चुका है । इधर सब भाषाएं देवताओंके लिए ' युष्मद् ' शब्दके एकवचनका प्रयोग करती हैं और जब वादी ' नमस्तेऽस्तु ' का प्रयोग नहीं करता तब वैसा उद्धरण ही व्यर्थ है । ( १६ ) वादी लिखता है कि " नमोऽस्तु ते शाङ्गं गदासि-पाणे! " ( भीष्मपर्व ० ५६।६६ ) भीष्मने कृष्णको नमस्ते कहा । " यहां उनसे प्रष्टव्य है प्रयोग करते हैं? यदि नहीं, किया? वे तो ' नमस्ते ' मात्र परिवर्तन तथा व्यवधान नहीं अपरिवर्तनीयता, अनिवार्यता नहीं तो ' नमोऽस्तु ' यही उन्हें यह स्वीकृत है? भीष्मने कि क्या वादी ' नमोऽस्तु ते ' का तब यह प्रमारण उद्धृत क्यों मानते हैं, उसके एक अक्षर में भी चाहते । इससे ' नमस्ते ' शब्द की तथा एकपदता निरस्त हो गयी । कहना चाहिए? क्या वादी को यहां श्रीकृष्णको भगवान्का अवतार मानकर नमस्कार किया है । सम्पूर्ण पद्य इस प्रकार है - " उवाच भीष्मस्तमनन्तपौरुषं एह्येहि देवेश! जगन्निवास! Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 70

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१२० G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * नमोऽस्तु ते माधव! चक्रपाणे! " ( ६ ५ ९ ।६६ ) । भगवान के लिए युष्मद् का एकवचन सभी भाषानों में प्रयुक्त होता है । अंग्रेजी भाषा में भी परमात्मा के लिए Thou ' दाऊ ' का प्रयोग हुआ करता है । तब यह विवाद क्यों? ( १६ ) " नमस्तेऽस्तु गमिष्यामि " ( वाल्मी. १५२।१७ ) इस पर वादी लिखता है - " विश्वामित्रने वसिष्ठको कहा, हे महाराज " प्रापको नमस्ते करता हूँ पूर्वकाल में ऋषि-लोग आपस में नमस्ते शब्द ही कहते कहलाते थे । " यहां पर ' आपको नमस्ते करता हूँ ' इस स्थलमें कहा हुआ ' आपको ' यह श्लोक - स्थित किस पद का अनुवाद है? यदि ऋषिलोग प्रापस में ' नमस्ते ' ' शब्द कहते थे, तो वसिष्ठ ने विश्वामित्र को ' नमस्ते ' कहां कहा है- यह भी वादीको दिखलाना पड़ेगा? इधर यहां ' नमस्तेस्तु ' शब्द है, क्या वादी उसका व्यवहार करते हैं? यदि नहीं, तो उस का उद्धरण व्यर्थ है । ( २० ) " नमस्ते राक्षसोत्तम " ( वाल्मी ० ३।४।३ ) सोता ने राक्षस को नमस्ते कहा ' - यह वादीकी टिप्परगी है । यहां यह जानना चाहिए कि राक्षसयोनि देवयोनि के अन्तर्गत मानी जाती है । जैसा कि ' अमरकोष ' में - " विद्याधरोऽप्सरोयक्षरक्षो-गन्धर्वकिन्नराः । पिशाचो गुह्यकः सिद्धो भूतोऽमी देवयोनयः " ( १।१।११ ) । इसी प्रकार ' सुश्रुतसंहिता ' के उत्तरतन्त्र [ ६०१७ ] में भी कहा है । इसीलिए ' सुश्रुत ' में भूत, प्रेत आदि को नमस्कार किप्रा गया है । तब मनुष्य योनिकी अपेक्षा राक्षसयोति के भी उच्चयोनि होनेसे उसको नमस्कार CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्ते का प्रतिविधान * करने पर हमारे सिद्धान्तका भङ्ग नहीं । शेष ' ते ' के विषय में जानना चाहिए कि परमात्मा, देवता तथा ऋषियोंके लिए सभी भाषाएं ' युष्मद् ' एकवचनका प्रयोग करती ही है! इनके लिए कोई विवाद नहीं । ( २३ ) आगे वादी लिखता है कि - " तिस्रो रात्रीयंदवा सीमेननन् ब्रह्मन्! श्रतिथिर्नमस्यः । नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन्! स्वस्ति मे s स्तु ' ( कठोपनिषत् २६ ) यमाचार्यने श्रपने शिष नचिकेताको नमस्ते की । " यहां बादी जनता को ठग रहा है । यहां तो स्पष्ट कहा है कि ' हे ब्राह्मरण, अतिथि नमस्कार योग्य होता है । तुम तीन रात मेरे घर विना खाये रहे, इस कारण श्रतिथि हो, तब तुझे नमस्कार हो । नमस्कार यहां अपराधकी क्षमा करानेके लिए है । जैसेकि शांखायन गृह्यसूत्र में कहा है- ' तृणान्यपि उञ्छतो नित्यमग्निहोत्रं च जुह्वतः । सर्वं सुकृतमादत्ते ब्राह्मणोर्नाचतो वसन् ' [ २।१७।५२४ ] यही मनुस्मृति में कहा है- ( ३३१०० ) हितोपदेश में ग्रन्थान्तरका पा उद्धृत किया गया है - ' बालो वा यदि वा वृद्धो युवा वा गृह मागतः । तस्य पूजा विधातव्या सर्वस्याभ्यागतो गुरु ( मित्रलाभ ६२ ) उत्तमस्यापि वर्गस्य नीचोपि गृहमागतः । पूजनीयो यथायोग्यं सर्वदेवमयोतिथि:, [ १६५ ] इस उपनिषद् में यमको -कहीं गुरु नहीं कहा गया. नचिकेताको कहीं शिष्य नहीं कहा गया । यम सूर्यके फु क्षत्रियवर्ग थे । इसीलिए उपनिषद् में उन्हें वैवस्वत ( १1१1७ विवस्वान् ( सूर्य ) का पुत्र - कहा गया है । सूर्यवंशीय क्षत्रि Gujarat An eGangotri Initiative