सनातन धर्मालोक १-२ — पृष्ठ 71–80

सनातन धर्मालोक १-२ · पृष्ठ 71–80

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* श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * १२२ वपय प्रसिद्ध हैं ही । ' शतपथब्राह्मणं ' में भी " तच्छ्रेयोरूप मत्य-सृजत् तत् क्षत्रं यान्येतानि देवत्रा क्षत्राणि इन्द्रो यमो मृत्युः ” हैं? ( १४।४।२।२३ ) यहां यमको क्षत्रिय कहा गया है । अन्य यह भी ध्यान देना चाहिए कि एक ब्राह्मण अन्य ब्राह्मणको दवा- ' ब्राह्मण! ' यह सम्बोधन भी नहीं देता, किन्तु ब्राह्मण क्षत्रिय आदि ही ब्राह्मण को वैसा सम्बोधन देता है । यमने यहां नचिकेताको ' ब्रह्मन्! ' कहा है, यह नहीं भूलना चाहिए । 7 है । ' ब्रह्मन्! ' का अर्थ है ' ब्राह्मण! ' जैसा कि ' महाभाष्य ' में कहा २ है - " समानार्थी एतौ ब्रह्मन्शब्दो ब्राह्मणशब्दश्च श्रतश्च समानार्थी । एवं ह्याह — कुतो नु चरसि ब्रह्मन्! कुतो नु यहा चरसि ब्राह्मरण! ' इति । तत्र द्वयोः शब्दयोः समानार्थयोरेकेन विग्रहः " ( ५।११७ ) । क्षत्रिय यम ब्रह्मविद्या के अभिज्ञ थे । तब तद्विषयक प्रश्न नचिकेताने भी पूछे थे । इससे गुरुशिष्यभाव नहीं हो जाता । गृह बहुतसी छान्दोग्य, बृहदारण्यक प्रादि उपनिषदों में यह वर्णन गरु नाता है कि ब्राह्मण ब्रह्मविद्या के ज्ञानके लिए तदभिज्ञ क्षत्रियोंके पास, जिन्होंने उस विद्या में नवीन प्रन्वेषरण कर रखे थे, जाते थे । जैसा कि " यथेयं न प्राक् त्वत्तः पुरा विद्या ब्राह्मणान् गच्छति । तस्मादु सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव प्रशासन-मभूत् " ( ५।३।७ ) । वे क्षत्रिय ब्राह्मणों को उच्चवर्णका होने $ 10 से नमस्कार भी करते थे । जैसा कि ' छान्दोग्योपनिषद् ' में -" सह गौतम राज्ञोऽर्धमैयाय । तस्मै ह प्राप्ताय अहञ्चिकार ( ननाम ) " ( ५३०६ ), " तेभ्यो ह॒ प्राप्तेभ्यः पृथग् श्रहरिण -CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. * नमस्तेका प्रतिविधान १२३ कारयांचकार ' ( ५: ११,५ ) उक्त स्कूलोंमें उन ब्राह्मण - क्षत्रियोंका कहीं गुरुशिष्यभाव नहीं कहा गया । इसलिए अश्वपति - राजाने ब्राह्मणों को वैश्वानर - विद्या के प्रतिपादनके अवसर में, विना ही उनका उपनयन किये, वह विद्या कही । जैसा कि ' छान्दोग्य - उप-निषद् ' में - ' तान् ( ब्राह्मणान् ) ह अनुपनीयैव ( ग्रन्तेवासिनोऽ कृत्वैव राजा अश्वपतिः ) एतदुवाच ' ( ५।११।७ ) ' वेदान्तदर्शन'-के ११३।३६ सूत्रकी ' कल्पतरुपरिमल ' टीका में इस विषय में कहा गया है - ' ननु समीपप्रापणनिषेधे कथं विद्योपदेशलाभः? ( उ ० ) नैष दोषः, शिष्यभावतत्कार्यशुश्रूषाद्यनुमतिपूर्वकं वैध-मुपनयनं निषिध्यते, न तु समीपप्रापरणमात्रं लौकिकमपि । " इस प्रकार अनुपनयनका यह भाव हुया कि उपनयन हो जाने पर उपनेता तथा उपनेयमें आचार्य - शिष्यभाव हो जाया करता है, जैसा कि ' सम्माननोत्सञ्जनाऽऽचार्यकररप " ( पा ० १।३।३६ ) इस सूत्र के ' प्राचार्यकररण ' प्रतीकको लेकर ' सिद्धान्तकौमुदी ' में श्रीभट्टो जिदीक्षितने आत्मनेपदप्रक्रिया में कहा है- “ मारण वकमुप-नयते, विधिना श्रात्मसमीपं प्रापयतीत्यर्थः । उपनयनपूर्वकरण अध्यापनेन हि उपनेतरि प्राचार्यत्वं क्रियते । " परन्तु यहां राजा अश्वपतिके ब्राह्मणकी अपेक्षा हीनवर्ण ( क्षत्रिय ) होने से गुरुशिष्यभाव नहीं हुआ । तब अश्वपतिने ब्राह्मणोंसे जिज्ञा-सित विषय उनको, बिना ही गुरुशिष्यभावके, बता दिया, जैसा कि ' बृहदारण्यक ' में प्राया है- " स होवाच गार्ग्यः ( ब्राह्मणः ) उप त्वा ( प्रजातशत्रु क्षत्रियम् ) प्रायानि इति " An eGangotri Initiative.

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१२४ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * ( २1११४ ) ( ब्राह्मण गार्ग्यने क्षत्रिय प्रजातशत्रु से मैं विद्याध्ययन के लिए तेरा अन्तेवासी अर्थात् शिष्य होता हूँ ) । परन्तु क्षत्रिय प्रजातशत्रुने उत्तर दिया कि " स होवाच अजातशत्रुः - प्रतिलोमं चैतद् यद् ब्राह्मणः क्षत्रियमुपेयात् " ( ब्राह्मणका क्षत्रियका शिष्य नहीं हो सकता ) ( २।१।१५ ) । जहां इस प्रकरणसे गुरणकर्मकृत वर्णव्यवस्था खण्डित हो रही है, वहां यह भी सिद्ध हो रहा है कि यमने हीनवर्ण वाले होनेसे अपने से उच्चवर्णवाले नचिकेतांका उपनयन कहीं नहीं किया । अतः उनका आपस में उपनिषत्को प्राचार्य -शिष्यभाव भी इष्ट नहीं है । तभी तो यमने ब्राह्मरण नचिकेता-को नमस्कार किया, अपने लिए स्वस्तिका आशीर्वाद मांगा । क्या श्रार्यसमाजी गुरु अपने शिष्यसे स्वस्तिकी प्रार्थना मांगते हैं? संस्कार - चन्द्रिकाके संस्कार काण्ड में अभिवादन-प्रकरणमें कहा है- ' नाभिवाद्यास्तु विप्रेरण क्षत्रियाद्याः कदा-चन । ज्ञानकर्मगुणोपेता यद्यप्येते बहुश्रुताः । अभिवाद्यो नमस्का-र्यो शिरसा वन्द्य एव च । ब्राह्मरणः क्षत्रियाद्यैस्तु श्रीकामः सादरं सदा ( शातातपः ) प्रतएव क्षत्रियाद्यभिवादने प्रायश्चित्तम-प्याह स एव शातातपः- क्षत्रं वैश्यं वाभिवाद्य प्रायश्चित्तं कथं भवेदित्यादि । ' शेष रहा ' ते ' का कथन, सो श्रायु तथा अनुभव में छोटे होने के कारण था । इधर यहां ' नमस्तेऽस्तु ' कहा गया है, आप लोग वैसा प्रयोग नहीं करते । यदि नहीं करते, तो वैसा उद्धरण ढूंढना व्यर्थ है । इधर नचिकेताने यमको नमस्कार नहीं किया, अतः यह स्थल वादीके पक्षको सर्वथा * ' नमस्त ' का प्रतिविधान १२५ काटनेवाला बन गया । उक्त स्थल में विद्वान् भी क्षत्रियको ब्राह्मण नहीं माना गया, उस विद्या के ज्ञाता ब्राह्मणको शूद्र नहीं माना गया, किन्तु ब्राह्मण ही माना गया है । इस प्रकार वर्णव्यवस्था भी जन्म से ही सिद्ध हो रही है तथा यह भी सिद्ध हो रहा है कि हीनवर्णं उच्चवर्गकी अपेक्षा अवस्था वा योग्यता में उच्च होता हुआ भी आयु वा योग्यतासे न्यून भी उच्चवर्णंको नमस्कार करे और उससे आशीर्वाद मांगे, नमस्कार नहीं । इसलिए २।१३५ मनुस्मृति के पद्यकी व्याख्या में श्री मेधातिथिने कहा है- " चिरवृद्धेनापि क्षत्रियेण स्वल्पवर्षोपि ब्राह्मरणः प्रत्युत्थाय अभिवाद्य इति प्रकरणार्थ: " । इस प्रकार प्रतिपक्षी यहाँ परास्त हो गये । वह इस प्रमाण को बड़े सरंम्भ से देते हैं; पर पाठकोंने देखा होगा कि यह प्रमारण उनके पक्षका विघातक है । ( २४ ) ' नमस्ते राजन्! वरुणास्तु ' ( प्रथर्व ० १1१०1२ ) यहां पर वादी अपनी टिप्पणी चढ़ाता है -- " हे श्रेष्ठ राजन्! तुम्हें नमस्ते हो । " यहां उन से प्रष्टव्य है कि ' तुम्हें ' यह मन्त्र के किस पद का अर्थ है? यदि ' ते ' पदका, तो ' नमस्ते हो ' यह कैसे लिखा? ' तुम्हें नमः हो ' यह क्यों नहीं लिखा? वास्तव में यहां राजाको नमस्कार नहीं, किन्तु ' यासां ( अप ) राजा चरुणो याति मध्ये सत्यानृते प्रचपश्यन् जनानाम् । ( ऋ ० ७१४६।३ ) इस मन्त्र के अनुसार जलके राजा वरुणदेव के मन्युको नमस्कार किया गया है । क्योंकि मन्त्र में हो ' मन्यवे ' लिखा है, यहां ' ते ' का अर्थ ' तव ' है ' तुभ्य ' नहीं । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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१२६ * श्री सनातनधर्मालोक ( १-२ ) * तवादका अर्थ अशुद्ध सिद्ध हुआ । देवताओंके लिए तो ' युष्मद् ' का एकवचन प्रयुक्त होता ही है, और नमस्कार भी; इससे हमारे पक्षकी कोई हानि नहीं । ( २५ ) वादी लिखता है कि " नमस्ते भगवन्! रुद्र! भास्करामिततेजसे " ( शिवपुराण वायुसंहिता ७।१।१२।४१ ) ब्रह्माजीने अपने पुत्र रुद्र को नमस्ते की " यह लिखकर वादी • टिप्पणी चढ़ाते हैं- " सनातनधर्मी - भाइयो! आपके ऋषि, देवता अपने पुत्रको नमस्ते कहते हैं । " इसपर वे उत्तर सुनें - ' शिवपुराण ' दूसरे देवताओंकी अपेक्षा शिवका महत्त्व बतलाता है, यह वादी भी जानते होंगे । वहांवर रुद्रका ब्रह्मासे अधिक प्रभाव तथा अधिक सामर्थ्य दिखलाया गया है । ब्रह्माको वहां रुद्रकी अपेक्षा गौण बतलाया गया है । रुद्र भगवान् का अवतार तथा महात् देव हैं, तब वहां ब्रह्माजी-ने भगवान् के अवतार होने एवं महा - देव होनेसे ही रुद्रको नमस्कार किया है, पुत्र होने से नहीं । इसीलिए वहीं - " रुद्रमाह पितामहः ” ( १।२२।१६ ), " नमस्ते देवदेवेश! मा स्राक्षीरोदृशीः प्रजाः " ( १।१२।१७ ) ब्रह्माजीने रुद्रको ' देव देवेश ' कहा है । तब देवदेवेशको नमस्कार उचित ही है । श्रीकृष्ण वसुदेव-देवकी के पुत्र थे, श्रीराम कौशल्या के पुत्र थे । परन्तु ये दोनों विष्णुके श्रवतार तथा देवदेव थे, इसलिए जन्मसमय में माता- पिताने इन्हें नमस्कार किया है । जैसे कि ' अध्यात्म-रामायण ' में कौशल्या रामको जन्मसमय में कहती हैं " देवदेव! नमस्तेस्तु " ( ३।२० ) । श्रीमद्भागवत ' ( १० स्कन्ध, CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्तेका प्रतिविधान १२० ३ प्र ० में देवकी - वसुदेव ने उत्पन्न हुए श्रीकृष्णको स्तुति की है । ब्राह्मणलोग क्षत्रिय श्रीराम तथा श्रीकृष्णको जो नम-स्कार करते हैं, सो क्षत्रिय होने से नहीं, किन्तु भगवान्‌के अवतार वा देवदेव होने से ही । पहले किसी समय में पिता-लोग अपनी कन्याको श्राशीर्वाद दिया करते थे और कन्या पिता को नमस्कार किया करती थी, देखो - ' नैषव चरित्र ' चतुर्थ सर्ग अन्तमें और ग्रभिज्ञानशाकुन्तलमें । परन्तु श्रव कन्याएँ पिताको नमस्कार नहीं करतीं, पिता भी उनको आशी-र्वाद नहीं देता । इसमें कारण यह है कि आजकल कन्याओं को देवीका अंश माना जाता है । तब उसे ही नमस्कार किया जाता है । उसका नमस्करण पुत्री होनेसे नहीं, किन्तु देवीके श्रवतार माननेसे ही किया जाता है । इस प्रकार रुद्रको नमस्कार करने के विषयमें भी जानना चाहिए, क्योंकि किसी पुराण आदिमें सर्वसाधारण पुत्र आदिको पिता श्रादिने कहीं भी नमस्कार नहीं किया । ' शिवपुराण ' में " एवं घोरमहा-रूपो ब्रह्मपुत्रो महेश्वरः । विज्ञानं ब्रह्मणे दत्त्वा सर्गे सह करोति च " ( १।१२।१२ ) । इस प्रकार महेश्वरने ब्रह्माको ज्ञान दिया है । तब वहां ' पुत्र ' शब्द लाक्षणिक ही है, वास्तविक पिता - पुत्रभाव नहीं है यह जानना चाहिए । ज्ञान प्रदको धर्मपिता माना जाता है, जैसे कि- मनुस्मृतिमें-' स्वधर्मस्य च शासिता वालोऽपि विप्रो वृद्धस्य पिता भवति धर्मतः । ( २।१५०।१५१ ) प्रज्ञो भवति वै बालः, पिता भवति Gujarat. An eGangotri Initiative

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१२८ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * मन्त्र ( ज्ञान ) दः ( १५३ ) तब वादीका यहां भी पतन हो गया । ( २६-२७ ) यहां पर वादी लिखता है - " यद्येष ते स्थिरो भावस्तिष्ठ देव! नमोस्तु ते ' ( पद्मपुराण सृष्टिखण्ड १७० अ ० ) सावित्रीने ब्रह्मासे नमस्ते कहा, जिसके उत्तर में ' न चापराधं भूयोन्यं करिष्ये तव सुव्रते! पादयोः पतितस्तेहं क्षम देवि! नमोस्तुते ' ( पद्म ० सृष्टि ० १७३१५० ) ब्रह्माने अपनी पत्नी सावित्री के चरणों में गिरकर नमस्ते की । यहां नमस्ते के उत्तर में दूसरी श्रोरसे नमस्तेका प्रयोग मिलता है । " यहां वादी से प्रष्टव्य है कि यहां पर तो ' नमोस्तुते ' है, तो क्या आप ' नमोस्तुते ' का प्रयोग करते हैं? आपलोग तो ' नमस्तें ' को एकपद मानते हैं, तब प्रखण्ड - पद में ' अस्तु ' का व्यवधान कैसा? यदि ' नमोस्तु ते ' का प्रयोग आप लोग नहीं करते, तो आप का यह उद्धररण व्यर्थ है, क्योंकि आपका केवल ' नमस्ते ' में श्राग्रह है, उससे भिन्न शब्दके प्रयोगको श्राप नहीं मानते । यदि मानते हैं, तो फिर ' नमस्ते ' की अन्त्येष्टि हो गयी । अन्य यह भी बताइये कि आपलोग पत्नी-के चरणों में गिरना क्या शिष्टाचार मानते हैं तथा गिरते हैं? स्वा. द. जोने संस्कारविधि में ( विवाहप्र. ) लिखा है— ' स्त्री पति के चरण - स्पर्श, पादप्रक्षालन, प्रासन - दान करें ' ( पृ. १३३ ) यहां स्त्रीद्वारा पतिका चररण - स्पर्श कहा है; पतिद्वारा पत्नीका चरण - स्पर्श नहीं कहा । वास्तवमें यहां पांवपर गिरना वा नमस्कार शिष्टाचार के विचारसे नहीं किया गया है, किन्तु यहां अन्य रहस्य है । कविलोग अपने ग्रन्थों में कभी नायक - नायिका * नमस्तेका प्रतिविधान १२८ के मान वा क्रोधका वर्णन करते हैं । नायक नायिका का अपराध — अन्य स्त्रीको देखना आदि कभी है, जिससे वह नायिका मानावलम्बन कर नायकसे करता बैठती है, उससे बोलती नहीं । तब नायक उसे जिस स किसी प्रकार से प्रसन्न करना चाहता है । कभी उसके पैरों गिरता है या प्रणाम ( झुकना ) करता है | वह भी मानिनी कभी पादप्रहार भी करती है, नायक भी रसभङ्गके भ . इसे सह लेता है । इसके उदाहरण ' काव्यप्रकाश ' श्रादिरों सुलभ हैं, जैसाकि “ प्रगतिपरे दयिते प्रसीद मुग्धे! ( ४ उल्लास, रसनिरूपण ), कि चरणानतिव्यतिकरध्या गोपाय्यते ” ( वहीं ) । “ नायिका पादप्रहारादिना नायकको वनमनुचितं रसभङ्गकारणं च " ( ७ उल्लास, रसदोषों अन्त में ) इत्यादि । परन्तु यह शिष्टाचार नहीं होता, कि कामियोंका ' प्राइवेट ' व्यवहार होता है । वह धर्मशाल सम्मत नहीं होता, क्योंकि तब परस्पर नमस्कार- श्राशीर्वा.. का अवसर हो कैसे हो? वहां तो जिस किसी प्रकारले नायिकाको प्रसन्न करना पड़ता है । जैसाकि ' वाल्मीकि रामायण में श्रीरामने सीतासे कहा है- " अपि ते चरहे मूर्ध्ना स्पृशाम्येष प्रसीद में ' ( २।१२।१५ ) । इसपर श्री. रामाभिराम - टीका में कहा है- " धर्मशास्त्रतः श्रत्यनुचित मपि कामशास्त्रमर्यादया त्वत्प्रीत्यर्थमिति शेषः । " इससे व्यवहार धर्मशास्त्र से विरुद्ध सिद्ध हुआ । श्रीमद्भागवत कहा है – ' न गर्हयन्ति ह्यर्थेषु यविष्ठाऽङ्घघभिवादनम् । स ० ध ० ६ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 75

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श्रीमनातनधर्मालोक ( १-२ ) * १३० न ब्रह्मन्! वयोज्यैष्ठ्यस्य कारणम् ( ६।७।३३ ) कर छन्दोभ्योऽन्यत्र अर्थात् लोक में काम पड़नेपर छोटेके पांव पर पड़कर झुकना भो निन्दित नहीं होता । इस प्रकार कहीं पुराणों में देव-देवियों में भी साहित्यिक व्यवहार लोककी तरह दिखलाया जाता है । परन्तु वह धर्म्मशास्त्रसम्मत न होनेसे अनुकरणीय निमी नहीं होता । यहां हम ' पद्मपुराण ' का वही प्रकरण दिखलाते हैं, जिस से हमारे मतकी पुष्टि होती है । जैसेकि ब्रह्माने देवताओंके कहने से एक यज्ञ किया था । यज्ञमें पत्नीकी श्रावश्यकता होती है, क्योंकि वहां ऐसी विधि है, परन्तु ब्रह्माकी पत्नी सावित्री वहां निकट में नहीं थी । तब इन्द्र, विष्णु श्रादिके कथनसे ब्रह्माने पत्नी के स्थान में एक गोपकन्याको बैठाया । देखिये- " ब्रह्मपार्श्वे स्थिता तत्र किन्तु वै गोपकन्यका । ( प्रद्म-7 र्वात.. पुराण सृष्टिखण्ड १७।१२२ ) मौनीभूता तु शृण्वाना सर्वेषां वदतां खे गिरः । अध्वर्युरणा समाहूता नागता वरवरिंगनी ( १२३ ) ॥ शक्रेण चाहृताभीरा दत्ता सा विष्णुना स्वयम् । अनुमोदिता च रुद्रेण पित्रादता स्वयं तथा ' ( १२४ ) । ' उस समय ब्रह्मा की पत्नी सावित्री भी यज्ञस्थानमें पहुँची । उसे देखकर सब च देव घबरा गये । उसने ब्रह्माको आड़े हाथों लिया कि मेरी विद्यमानता में तुमने स्त्रीके स्थानपर एक गोषकन्या को कैसे रखा? – “ सावित्रीभागतां दृष्ट्वा भीतस्तत्र पुरन्दरः । अधो-नम् । मुखः स्थितो ब्रह्मा किमेषा मां वदिष्यति ' ( १७११६ ) । वास्तव में यह पत्नीका क्रोधावसर था भी ठीक । " उवाच: CC - 0. Ankur Joshi Collection G नमस्तेका प्रतिविधान *. १३१ देवी ब्रह्माणं सदोमध्ये तु मौनिनम् । किमेतद् युज्यते देव! कर्तुमेतद् विचेष्टितम्? ॥ ( १३४ ) मां परित्यज्य यत् कामात् कृतवानसि किल्विषम् । न तुल्या पादरजसा दमेषा या शिरःकृता ' ( १३५ ) ॥ भवता रूपलोभेन कृतं लोकविगर्हितम् । पुत्रेषु न कृता लज्जा पत्रिषु च न ते प्रभो! ( १३७ ) ॥ कामकारकृतं मन्ये एतत् कर्म विगहतम् । पितामहोसि देवानामृषीणां प्रपितामहः । ( १३८ ) कथं न ते त्रपा जाता ग्रात्मनः पश्य-तस्तनुम् । लोकमध्ये कृतं हास्यमहं चापकृत्ता प्रभो! ( १३ ९ ) यद्येष ते स्थिरो भावस्तिष्ठ देव! नमोस्तु ते । श्रहं कथं सखीनां तु दर्शयिष्यामि वं मुखम् ( १७, १४० ) ॥ भर्त्रा मे विघृता पत्नी कथमेतद् अहं वदे । " सावित्रीके इस वाक्य में ' नमोस्तु ' है । यह वाक्य शिष्टाचार वाचक नहीं किन्तु क्रोध-व्यञ्जक है । जैसे- ' राम - राम ' इस शब्दसे अपने इष्टवेदका कीर्तन किया जाता है, पर ' राम - राम! यह तुमने क्या कर डाला? ' यहां जैसे ' राम - राम ' शब्द इष्टदेव के नामसदृश होता हु भी ' प्राश्चर्य ' वा खेद अर्थमें है शिष्टाचार में नहीं, वैसे यह भी ' नमोस्तु ' यह शब्द क्रोधव्यञ्जक है, यद्यपि पत्नी द्वारा पतिको प्ररणाम करनेसे हमारे पक्षको क्षति नहीं । अब यह स्पष्ट हो गया कि उस समय सावित्री क्रुद्ध थी । तज ब्रह्मा सावित्रीको उस गोपकन्याके बैठानेकी वस्तुस्थिति समझाते हैं- " ऋत्विग्भि-रुदितश्चाहं दीक्षाकालादनन्तरम् ।१४१ | पत्नीं विना न होमोऽत्र शीघ्र पत्नी मिहानय । शक्रेणैषा समानीता दत्तेयं मम विष्णुना । ( १७।१४२ ) गृहीता च मया सुभ्रु! क्षमस्वैतद् Gujarat An eGangotri Initiative

पृष्ठ 76

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१३२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * मया कृतम् । न चापरावं भूयोऽहं करिष्ये तव सुव्रते! पादयोः पतितस्तेऽहं क्षमस्वेह नमोस्तु ते " ( १७११४३ ) । प्रागे सावित्री ने इन्द्र, विष्णु आदि देवताओंको क्रोधवश शाप दिया । इससे स्पष्ट है कि यहां पर ' नमस्ते ' के प्रत्युत्तर में ' नमस्ते ' नहीं । यहां पर ' नमस्ते ' यह साक्षात् शब्द भी नहीं, यह यहांपर शिष्टाचारवाचक भी नहीं । ब्रह्माने तो अपनी पत्नीकी अविद्यमानतामें यज्ञमें अन्य - प्रपनेसे अविवाहिता स्त्रीको बैठा दिया, इससे हुए सावित्रीके क्रोधको हटानेके लिए ब्रह्मा उसके प्रागे के । तब यहां साधारण शिष्टाचार - व्यवहार न होने से इससे वादीकी कोई भी इष्टसिद्धि नहीं । ' न्यायदर्शन ' के ( ४।१।६२ सूत्रके ) वात्स्यायन भाष्य में इतिहास - पुरारका प्रधान विषय ' लोकवृत्त ' बतलाया है, लोक-व्यवहारकी व्यवस्थापना उसका मुख्य विषय नहीं वतलाया । लोकव्यवहारकी व्यवस्था तो धर्मशास्त्रोंका ही प्रधान विषय बतलाया गया है, इतिहास - पुराणका नहीं । तब पुराणेतिहास-वरित लोकवृत्त धर्मशास्त्रसे विरुद्ध होनेपर बाधित हो जाता है । इसीलिए ' व्यासस्मृति ' में कहा है- " श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोधो यत्र दृश्यते । तत्र श्रौतं प्रमाणं तु द्वयोर्द्वधे स्मृतिर्वरा " ( ११४ ) अर्थात् - स्मृति तथा पुराणके विरोध में स्मृतिवचन ही आदरणीय होता है । शिष्टाचार या प्रोत्सगिक प्रचारमें कहीं पुत्र वा पत्नी या शिष्य के प्रति नमस्कार किया जाना न तो दिखलाया गया है, न श्रादिष्ट ही किया गया है । नहीं तो वादी को वह सार्वत्रिक व्यवहार रामायण - पुराण महाभारत * नमस्ते का प्रतिविधान * १३३ | श्रादिसे दिखलाना चाहिए । क्वाचित्क - व्यवहारसे सार्वत्रिकता नहीं हुआ करती । वादी ने अन्य प्रमाणोंसे छोटे - बड़ोंका परस्परमै नमस्कार नहीं दिख लाया । भय आदिके अवसरपर अथवा दूसरेके क्रोधको हटानेके लिए उसको चाटुकारिता ( खुशामद ) भी करनी पड़ जाती है । चोरके भी पैरोंपर गिरकर कभी अपना जीवन मांगना पड़ता है । पुलिसमैन के अपमान से बचाव के लिए उसके मुसलमान होने पर भी कभी उसे हाथ जोड़ने पड़ जाते हैं अथवा झुककर उसकी खुशामद करनी पड़ जाती है । पर वह न तो शिष्टाचार माना जाता है, न औत्सर्गिक व्यवहार हीं । क्या ' नमस्ते ' वादी पूर्व कहे अनुसार अपनी पत्नीके stant हटाने के लिए ही उसे ' नमस्ते ' कहते हैं? यदि नहीं, तो उक्त उद्धरणसे उनकी इष्टसिद्धि कुछ भी नहीं । इधर यहीं ' नमस्ते ' के उत्तरमें वह ' नमस्ते ' नहीं; जैसा कि वादीलोग एक दूसरे से मिलते ही करने लग पड़ते हैं । ( क ) आगे वादीने ' नमस्ते ' के ' ते'को ज्येष्ठोंके प्रति प्रयोग करने में रामायण, महाभारत आदिसे प्रमाण दिये है । पर उनका उल्लेख व्यर्थ है । हम रामायण, महाभारत प्राि से बड़े को त्वं, त्वां त्वया, तव, ' इत्यादिको भी प्रयुक्त हु दिखला सकते हैं; परन्तु आपलोग बड़ेको ' त्वं, त्वया, तुम् afi ' आदि क्यों नहीं कहते? ' नमस्ते ' के अतिरिक्त ' ते ' भी प्रयोग बड़ेके लिए क्यों नहीं करते? हिन्दीमें भी मान्य लिए ' तू, तेरा, तुझे ' आदिका प्रयोग क्यों नहीं करते? CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 77

सनातन धर्मालोक १-२, पृष्ठ 77 का मूल पृष्ठ
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१३४ * श्री सनातनधर्मालांक ( १-२ ) * वास्तव में बड़ेको ' तू ' कहना इतिहासमें भले ही प्राता हो, पर धर्मशारूसे विरुद्ध है, जैसे कि ' महाभारत ' में स्वयं धर्मशासन कहा है- " न जातु त्वमिति ब्रूयाद् ग्रापन्नोपि मह-तरम् । वङ्कारो वा वध वेति विद्वत्सु न विशिष्यते । श्रवराणां विन समानानां शियाणां व समाचरेत् " ( अनुशासनपर्व १६२।५३ ) प्रर्थात् बड़े को तुं ' न कहे, छोटोंको या शियोंको या समानोंको ' तू ' कहे । बल्कि ' तू ' कहना बड़ोंके मारनेके समान होता है । जाते देखिए ' महाभारत ' - " त्वम् इत्युक्तो हि निहतो गुरुर्भवति पर भारत! ” ( कपर्व ६६८३ ), " अवधेन वधः प्रोक्तो यद् गुरुत्वमिति प्रभुः " ( ६८६ ) | केवल यह साधारण रूप से नहीं कहा गया किन्तु ' श्रथर्वाङ्गिरसी ह्येषा श्रुतीनामुत्तमा श्रुति: ( ७०1८५ ) इस व्यवहारको अथर्ववेदकी श्रुति के अनुकूल कहा है । तब यह वैदिक सिद्ध हुआ । तव श्रीकृष्णने अर्जुन को कहा- ' त्वमित्युक्त्वाथ राजान मेवं कश्मलमा विशः । हत्वा तु नृपतिं पार्थं! करिष्यः किमुत्तरम् ' ' ( कर्ण - पर्व ७१५ ) यहां सातवलेकरने अर्थ लिखा है- ' उन धर्मात्माको केवल है: ' तुम ' ( ' तू '? ) कहने से मलिन हो रहे हो; जिन बड़े भाईको ‘ तुम ’ कह कर तुम्हारी यह दशा हो रही है उनके मारनेसे तुम्हारी: क्या दशा होती । ' इससे बड़ेकेलिए ' त्वं ' का व्यवहार अनुचितः सिद्ध हुआ । याज्ञवल्क्यस्मृति ' में प्रायश्चित्ताध्याय में प्रायश्चित्त - प्रकररणमें. इसका प्रायश्चित्त भी कहा है - गुरुं हुँकृत्य त्वंकृत्य विप्रं निर्जित्य वादतः । बद्ध्वा वा वाससा क्षिप्रं प्रसाद्योपवसेद् दिनम् " ( २ ९ १ पद्य ) इसीप्रकार ' पराशरस्मृति ' ( १११५३ ) शङ्ख-CC - 0. Ankur Joshi Collection * ' नमस्ते ' का प्रतिविधान १३५ स्मृति ' ( १७१६० ) में भी कहा है । ' त्व ' यह ' युष्मद् ' शब्द की. सभी विभक्तियों के एकवचनका उपलक्षरण है, यह ' याज्ञ-वल्क्यस्मृति ' के उक्त पद्य की मिताक्षरा में कहा है । वृहत्पराशर-स्मृति में भी कहा है- ' त्वंकारं तु गुरोरुक्त्वा हुंकारं तु गरीयसः । प्रसाद्यैतौ श्रनश्नंस्तु स्नात्वा शुध्येद् द्विजोत्तमः ' । ( ६।२७४ ) वादिप्रतित्र. दि स्मृतिमें लिखा है- ' हुंकारं ब्राह्मणस्योक्त्वा त्वकार च गरीयसः । स्नात्वानश्नन्नहः शेषमभिवाद्य प्रसादयेत् ( ११/२०३ ) यहां मेधातिथिने लिखा है- " गरीयसः त्वंकारमुक्त्वा त्वमेवमात्थ त्वया इदं कृतम् - इति एकवचनान्तयुष्मच्छदो-च्चारणे प्रायश्चितमेतत् । प्रथमादिविभक्तिनं विवक्षिता । तथा च समाचारो गुरौ - ' युष्मासु ' इत्यादि बहुवचनं प्रयोक्त-व्यम् । " यहां बड़े के लिए एकदचनान्त युष्मद् - शब्द के प्रयोगकी स्पष्ट निन्दा की है । आर्यसमाजके श्रीतुलसीराम स्वामीने भी यही अर्थ किया है— " ब्राह्मरणको ' हुम ' ऐसा कह कर और विद्यादिमें बड़ेको ' तू ' ऐसा कह करके भूखा रह. दिन भर हाथ जोड़ कर अभिवादन से प्रसन्न करना । " यहां श्रार्यसमाजी श्रीगङ्गाप्रसाद उपाध्याय एम ० ए ० लिखते हैं: - " अपने से बड़े को ' तू ' कह कर पुकारनेके दोषका प्रायश्चित्त यह है कि- स्नान करके उपवास करे, और दिन भर उससे प्ररणाम करके प्रसन्न करने का यत्न करे । " मनुस्मृति मान्य के लिए ' भवत् ' शब्दके प्रयोग को श्रादिष्ट करती है । जैसेकि ' अवाच्यो दीक्षितो नाम्ना प्रवीया-Gujarat. An eGangotri Initiative

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१३६ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * नपि यो भवेत् । भोभवत् - पूर्वकं त्वेनमभिभाषेत धर्मवित् ' ( २।१२८ ) । इसमें श्रीगङ्गाप्रसाद उपाध्यायने लिखा है— " यदि कोई पुरुष दीक्षित हो चुका हो तो उसका आदर करे, नाम न ले और ' भो भवान् ' ऐसा कहे; चाहे वह प्रायु में छोटा ही क्यों न हो । " यहीं श्रीतुलसीरामने लिखा है-" यदि दीक्षित कनिष्ठ भी हो, तथापि उसका नाम लेकर न बोले; जो कुछ बोलना हो तो ' भो दीक्षित! वा श्राप ( भवान् ) कह कर बोले । " इससे सिद्ध होता है कि बड़ेका श्रादर करे । उसके लिए ' भवत् ' शब्दका प्रयोग करे । यह है भी ठीक । ' तू ' से दूसरेको मुखातिब ( श्रभिमुख ) किया जाता है; अतः उसे मध्यम- पुरुषकी क्रिया दी जाती है । पर बड़ेको मुखातिब नहीं किया जाता, किन्तु उसे ' भवान् ' ' श्रीमान् ' आदि कहा जाता है । बड़ा होनेके कारण मुखातिब न करनेसे ही उसे मध्यम-पुरुषकी प्रत्यक्ष क्रिया न देकर प्रथम पुरुषकी परोक्ष क्रिया दी जाती है | अतः बड़ेको ' तू ' कहकर मुखातिब करना उसे छोटा बनाना है । ' ज्यायांसमभिवादयन् ' ( मनु २।१२२ ) यहां अभिवादन भी बड़े को ही सिद्ध होता है, छोटेको नहीं । इतिहास में, लोकवृत्त में यदि इससे विरुद्धता दिखलाई पड़े, तो वह ग्राह्य नहीं होती । लोक में कभी शास्त्रविरुद्ध व्यवहार भी चल पड़ते हैं, पर वे ग्राह्य नहीं हो जाते । इसीलिए ' महाभारत ' शान्तिपर्व में कहा है- " कारणाद धर्म-मन्विष्येद् न लोकाचरितं चरेत् " ( २६२।५३ ) ' न लोकवृत्तं * नमस्तेका प्रतिविधान * १३७ वर्तेत ( मनु ४ । ११ ) ' न विरुद्धेन कर्मणा ' ( ४।१५ ) ऐसे । कड़ों ही इतिहासों वा श्राचररणों को एक विधिवाक्य निरा. कृत कर सकता है; चाहे वे आचरण उसी ही पुस्तक में लिखे क्य न हों? तब हमें धर्मशास्त्रसम्मत धर्म ही इस विषय में ढूंढना चाहिए । ' लोकमें यह प्रचलित है ' यह सोचकर उसका श्रा. चरण नहीं करना चाहिए । तब इतिहास के श्राचरण से धर्मं शास्त्रका वचन किसी प्रकार बाधित नहीं हो जाता । इधर ' न्यायदर्शन ' ( ४ | १ | ६२ ) के कथनानुसार लोकव्यवहारको व्यवस्था धर्मशास्त्राधीन होती है, इतिहासके अधीन नहीं हुआ करती । आर्यसमाजका वेद है स्वामि- दयानन्दकृत वेदभाष्य ॥ आर्यसमाजकी स्मृति है ' सत्यार्थप्रकाश '! श्रार्यसमाजका पुराऐ. तिहास है स्वामी दयानन्दका जीवनचरित्र | तब क्या स्वामि दयानन्दजीके जीवनचरित्र में वर्णित उनके हुक्कापान, नसवार सूंघना इत्यादि विरुद्धाचरणोंका श्रार्यसमाजी अनुकरण करते हैं? यदि नहीं, तो यहाँ भी वैसे जान लेना चाहिए । इस प्रकार वादीको उत्तर मिल गया । ( ख ) आगे वादीने ' नमस्ते ' का शब्दार्थ ' तेरा आदर करता हूँ ' यह माना है । तो क्या वादी हिन्दीमें किसी मान्यको ' तेरा ' यह प्रयोग देते हैं? यदि नहीं, तो ' नमस्ते ' में से भी ' ते'क afart कर देना चाहिए । मान्यके लिए ' नमः ' शब्दक प्रयोग करें । फिर ' ते ' में आग्रह कैसा? वास्तवमें यह उनकी साम्प्रदायिक दृष्टि है, तभी तो इतना आग्रह करते हैं । जो लिखते हैं कि " यह आदर- मान, बिना किसी भेद - भाव के प्रत्ये CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

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१३८ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) का किया जाना चाहिए " तो नमस्कार प्रकाशन करनेके लिए . चरणोंपर भी गिरना पड़ता है । तब क्या आर्यसमाजी गुरु, शिष्यकी भी चरणवन्दना करते हैं? क्या श्रार्यसमाजी पिता, अपने पुत्रके भी चरणों को पकड़ते हैं? यदि नहीं, तब ज्येष्ठ-कनिष्ठमें व्यवहार - भेद स्वतः सिद्ध हो गया । तब ' उसीसे मं. सामाजिक सङ्गन और प्रेम बना रहता है यह उनकी बात घर कट गयी । इसीलिए प्राचीनकालमें ज्येष्ठ, कनिष्ठ, समानोंसे मिलने के समय व्यवहारभेद भी किया जाता था । उदाहरण - स्वरूप या पहले महाभारतादिके प्रमारण हम दे चुके हैं । श्रीबाणभट्टकृत ' श्रीहर्षचरित्र ' के तृतीयोच्छ्वासके आरम्भमें जब श्रीबाणभट्ट बन्धुके पास पहुँचे, तब वहां जो प्रचार हुआ, वह उन्होंके ER शब्दों में देखिए- ' क्रमेण कांश्चिद् ( ज्येष्ठान् ) श्रभिवादयमानः कैश्चिद ( कनिष्ठैः ) अभिवाद्यमानः कैश्चित् ( वृद्धैः ) शिरसि चुम्ब्यमानः, कांश्चित् ( शिशून् ) मूर्ध्नि समाजिघ्रन्, कैश्चिद् ( समानैः ) श्रालिङ्गन्यमानः, कांश्चिद् ( समानान् ) प्रालिङ्गन्, रता अन्यैः ( ज्येष्ठैः ) आशिषाऽनुगृह्यमाणः, परान् ( कनिष्ठान् रा श्राशिषा ) अनुगृह्णन्, बहुबन्धुमध्यवर्ती परं मुमुदे । " यहां पर ग ' नमस्ते ' शब्द भी नहीं है और व्यवहार - भेद भी है, तब नमस्तेवाद भी दूषित सिद्ध हुन । 7 ( ग ) अन्तमें वादी एक वेद - मन्त्र अर्पण करते हैं - ' नमो ज्ये-ष्ठाय च कनिष्ठाय च नमः पूर्वजाय च प्रपरजाय च । नमो मध्य-माय चापरजाय च नमो जघन्याय च बुध्न्याय च ' ( यजुः CC - 0. Ankur Joshi Collection G ' नमस्ते ' का प्रतिविधान G १३६ १६।३२ ) और यहां पर वे टिप्पणी करते हैं- " वूढ़े - बालक, बड़े - छोटे, बरावर - शिशु, नीच उच्च सब परस्परमें नमस्तेका व्यवहार करें । " यहां भी वादीकी कपोलकल्पना है । उक्त मन्त्रका यह अर्थ नहीं है । इधर उक्त मन्त्र में ' नमस्ते ' शब्द ही नहीं; तव उक्त शब्द कहांसे निकाला गया? ' नमस्ते ' इन दो पदोंके मध्य या व्यवधान में जब ग्रापलोग थोड़ा - सा भी भेद या थोड़ा-सा भी परिवर्तन नहीं चाहते; तव उसके सिद्ध करनेके लिए उससे भिन्न - पद वाला प्रमाण देनेसे आपका पक्ष पुष्ट नहीं हो सकता; बल्कि खण्डित हो जाता है । उक्त मन्त्रमें यह भी नहीं लिखा गया कि ज्येष्ठ कनिष्ठको नमस्कार करे, बड़ा छोटे को नमस्कार करे । यदि ज्येष्ठ द्वारा कनिष्ठको नमस्कार करना वेदको अभीष्ट होता; तो प्राचीन साहित्य में कनिष्ठ-द्वारा ज्येष्ठकी तरह, ज्येष्ठके द्वारा कनिष्ठ भी नमस्कृत किया जाता; पर ऐसा प्रमाण नहीं मिलता । श्रतः वेदमन्त्रका वादिसम्मत अर्थ भी ठीक नहीं । वेदमन्त्रोंके अर्थ स्वेच्छानुसार नहीं हुआ करते; किन्तु देवतावाद के अनुसार ही होते हैं । यजुर्वेद के १६ वें अध्याय में १६ वें मन्त्रतक एकरुद्र देवता है; १७ मन्त्र से ४६ मन्त्र तक रुद्र देवता हैं । एकरुद्र में एक रुद्र की स्तुति है, बहुद्धवाले मन्त्रों में रुद्र के २४० संख्यावाले रुद्ररूप - गरणों की बहुवचनरूप में और पृथक् - पृथक् रूपमें स्तुति है । एक - एक मन्त्र में आठ-श्राठ रुद्रके गरणोंको नमस्कार किया गया है । ' नमो गरणेभ्यो Gujarat. An eGangotri Initiative ११.

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१४० # श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * गणपतिभ्यश्च वो नमो नमो विरूपेभ्यो विश्वरूपेभ्यश्च वो नमो नमः ” ( यजुः १६।२५ ) यहां पर रुद्रके गरण तरह - तरह के रूपवाले तथा बहुवचन में दिखलाये गये हैं । उनमें शान्तरूपों को दोनों ओर से तथा घोररूपोंको एक ओर से नमस्कार कहा गया है । बहुवचनमें ' गणेभ्यो नमस्ते ' न कहकर ' नमो वः ' वेदने बतलाया है; जिससे ' नमस्ते ' इसकी वादियोंसे अभीष्ट अपरिवर्तनीयता, अनिवार्यता तथा सार्वत्रिकता वेद ने स्वयं काट दी है । आगे वेदने उन गरणोंके विविधरूप दिखलाएं हैं । कहीं वेगरण कुत्तेके रूपवाले, कहीं कुत्तेके स्वामीके रूपवाले, कहीं चोरोंके स्वामीके रूपवाले कहे गये हैं, यह १६ वें अध्याय में स्पष्ट है, उनको नमस्कार भी किया गया है । जैसेकि ' नमः श्वभ्यः श्वपतिभ्यश्च वो नमो नमो ' ( यजुः १६२८ ) किरात वेषधारी रुद्रके अनुचर इवा तथा श्वपति थे । ' तस्करारणां पतये नमो नमः ' ( यजुः १६।२१ ) रुद्र किरात - वेषता में उसका तस्करपतित्व स्पष्ट है । इस प्रकार वे ही रुद्रके गरण जो बड़े हैं, जो उनसे छोटे हैं, जो परिमाणमें बड़े हैं, या जो छोटे हैं, जो मध्यम हैं, जो उत्तम हैं, जो प्रधम हैं, जो वामन हैं, जो लम्बे हैं, जो सेनापति हैं, रथी तथा तक्षा हैं, उनका उस अध्यायके आगे के मन्त्रों में वर्णन किया गया है । रुद्रदेवके गरण होनेसे उनको नमस्कार भी किया गया है । जैसे कि - ' नमो ज्येष्ठाय च कनिष्ठाय च ' ( यजुः १६।३२ ) यही वादीका दिया हुआ * नमस्ते का प्रतिविधान * १४१ / मन्त्र है । इसी प्रकार ' नमो महदुद्भ्यो अर्भकेभ्यश्च वो नमो । नमः ' ( यजुः १६।२७ ) नमो ह्रस्वाय च वामनाय च ( यजुः १६।३० ) में भी जान लेना चाहिये । तब के रुद्रके गण श्रापसमें छोटे - बड़े होते हुए भी हमारी अपेक्षा योनिको प्रधानता होनेसे श्रेष्ठ हैं, इसलिए नमस्करणीय हैं । जैसे कि मान लीजिये - श्रार्यसमाज में बड़े स्वामी दयानन्दजी थे, तथा छोटे स्वामी तुलसीराम थे । वे चाहे आपसमें बड़े तथा छोटे हैं, तथापि वादी उन दोनों से छोटा है, तब वादी को कि- ज्येष्ठ तथा कनिष्ठ स्वामीको नमस्कार करता हूँ । अब बताइये - इस में हमारे पक्षको हानि क्या है? यही श्र arath दिये मन्त्र का है । तब वादीका अभीष्ट खण्डित ह गया । हमारे पक्षकी कुछ भी क्षति न हुई । यह अर्थ हुप्रा रुद्रके गरणोंके पक्ष में । रुद्रके पक्ष में भी उक्त मन्त्रका अर्थ जान लेना चाहिए । रुद्रपक्ष में उसके ज्येष्ठता ' महिमा ' नामक सिद्धि का उद्देश्य करके तथा कनिष्ठता

उसकी ' अणिमा ' नामक सिद्धिका विचार करके होती है ।

क्योंकि वह ' अणोरणीयान् महतो महीयान् ' ( श्वेताश्वः ॥

२० ) होनेसे ज्येष्ठभी है कनिष्ठ भी है । इसलिए वायुपुरा ' शस्तुति ' में ' नमो ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय ' ( २४१६२ ) कहा है । ' शिवसहस्रनाम ' में ' कनिष्ठाय नमोनमः मध्यमाय ' ( ४८ ) पूर्व इसलिए है कि सृष्टि श्रादिमें प्रकट होता है- हिरण्यगर्न वे समवर्तताग्रे ' ( यजुः वा ० सं ० १३।४ ) । अपरज इसलिए है ॥ व प्रलय में कालाग्निरूपसे प्रकट होता है । ' वः ' यह बहुवच CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative