सनातन धर्मालोक १-२ — पृष्ठ 81–90

सनातन धर्मालोक १-२ · पृष्ठ 81–90

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* श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * १४२ रुद्रके श्रादरार्थ है । इस प्रकार आगे भी जान लेना चाहिए । तब इससे वादीकी अर्थ - सिद्धि कैसे हो सकती है? वेदमें स्वेच्छानुसार अर्थ नहीं हुआ करते, किन्तु देवतावादका ही अनुसरण करके अर्थ हुआ करते हैं - यह बात वादीको नहीं भूलनी चाहिए । तब उनका पक्ष भी प्रसिद्ध हो गया । तभी तो उन्होंने जो २६ प्रमारण उद्धृत किये हैं, उनमें इतरेतरके प्रति ' नमस्ते ' नहीं की गई है । तब ' बाल - वृद्ध एक - दूसरे को नमस्ते करें - यह पक्ष भी उनका प्रसिद्ध हो गया । ( घ ) प्रागे वादीने ' जय श्रीराम, जय श्रीकृष्ण, नमो नारायण, एतदादिक शब्द आक्षेपयोग्य माने हैं, तथा प्राचीन-हो ग्रन्थोंमें इनका प्रभाव माना है, तथा उन्हें कपोल कल्पित माना है, परन्तु उन्हें यह जानना चाहिए कि एतदादिक शब्द प्रणाम-श्राशीर्वादवाचक नहीं, किन्तु अपने इष्टदेवके कीर्तनवाचक हैं । परस्पर सम्मेलन के समय प्रणाम आशीर्वाद ही आवश्यक नहीं होता, किन्तु तब कुशलप्रश्न या इष्टदेवका कीर्तन एवं स्मरण है । भी हुआ करता है । जैसे कि -- ' सततं कीर्तयन्तो माम् ( श्रीकृष्णम् ) ' ( | १४ ) इससे सब इष्टदेवोंका कीर्तन हो सकता ए है, क्योंकि कृष्ण यहां उपलक्षणार्थ है । ' मामनुस्मर युध्य च ' ग्रो ( गीता ८१७ ) यहां ' जयश्रीकृष्ण ' इत्यादिसे श्रीकृष्णका स्मरण तथा युद्ध अर्थात् व्यापक अर्थ में कार्यक्षेत्रमें प्राना बताया है । वेदमें नामस्मरणकी भी आज्ञा है, जैसे- ' सदा ते नाम, स्वयशो वक्म ' ( ऋ ० ७।२२।५ ) इत्यादि । यहां स्थान नहीं है कि हम उन मन्त्रोंको उद्धृत करें । सबका इष्टदेव रुचिवैलक्षण्यसे भिन्न - भिन्न भी हुआ करता CC - 0. Ankur Joshi * नमस्तेका प्रतिविधान १४३ है । जैसे कि वर्णमाला के एक होने पर भी कोई संस्कृत, कोई अंग्रेजी, कोई उर्दू, दूसरा वङ्गाली, कोई गुजराती, दूसरा श्रन्ध्रकी वर्णमालाको अपनी रुच्यनुसार सेवित करता है । इसलिए श्रीकृष्णादिके भक्त अपने इष्टदेव -श्रीकृष्ण श्रादिका नाम लेते हैं, देशभक्त ' वन्दे मातरम् ' या ' जय भारत ' या ' जय हिन्द ' कहते हैं । राष्ट्रभाषाके भक्त ' जय राष्ट्रभाषाकी ', धार्मिक लोग ' जय धर्मकी ' कहते हैं । इनमें कई शब्द हिन्दी भाषा भी होते हैं । ' मत्था टेकना ' यह ' नमः ' शब्दका देश-भाषा में अनुवाद है । यदि श्रीकृष्ण श्रादि परमात्मा नाम वेदादिमें नहीं हैं, अतएव श्रवैदिक होनेसे त्यक्तव्य हैं, तब स्वा ० दयानन्दसे ‘ सत्यार्थप्रकाश ' के प्रथम समुल्लास में कहे गये परमात्मा के ' सच्चिदानन्द, भौम, शनैश्चर, केतु ' ये नाम वेदादि में कहां हैं? फिर तो वेदमें न होनेसे ' संन्यासी, गुरुकुल ' प्रादि शब्दों को भी अवैदिक होने से छोड़िये । यदि वादी ' जय श्रीकृष्ण ' आदि शब्दोंको प्राचीन ग्रन्थोंमें व्यवहृत नहीं मानते, इसीलिए अव्यवहार्य मानते हैं, तब ' नमस्ते ' यह जो आपके अनुसार एक पद है अथवा रूढ है, तथा प्रणाम एवं आशीर्वादमें और समानोंके साथ ' नमस्ते ' इस श्रखण्डरूपमें आपसे व्यवहृत है, ऐसा ' नमस्ते ' शब्द प्राचीन ग्रन्थोंमें कहीं नहीं पाया जाता । यदि ' नमस्ते ' एक पद होता, तो वेदाद्रि प्राचीन ग्रन्थोंमें ' नमो वः पितरः ' ( अथर्व ० १८१४८५ ) यहां पर भी ' नमस्ते पितरः ' होता । अखण्ड - पद होने पर ' नमोस्तुते ( महा ० सभा ० ६३ अ ०, वनपर्व ० ७५।२६, भीष्म पर्व ( ५८ । Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 82

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१४४ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * ६६ ) पद्मपुराण ० सृष्टि ० १७ । १५० ) इत्यादि वादोके ही दिये प्रमाणों में ' अस्तु ' आदि पदोंका व्यवधान न होना चाहिए था, और ' नमो ज्येष्ठाय च ' ( यजुः १६।३२ ) इस वादीके दिये मन्त्र में ' ते ' से रहितम् नमः ' कभी न रखा जाता, और वादीने जो २६ प्रमारण दिये हैं, वहां दूसरी ओरसे भी ' नमस्ते ' कहा जाता, समानों में भी परस्पर ' नमस्ते ' होता, पर वेदादिमें इस प्रकार कहीं नहीं । तब यदि ' जय श्रीकृष्ण ' आदि शब्द अर्वाचीन होनेसे हेय हैं, तब वादियोंका ' रूड ' तथा प्ररणामाशी-र्वादिमें समान, समानोंमें भी समान, यह ' नमस्ते ' शब्द भी अर्वाचीन होनेसे त्यक्तव्य है । यदि आजकल व्यवहृत होनेसे ' नमस्ते शब्द माननीय है; तत्र ' जय श्रीकृष्ण ' आदि भी बहुत व्यवहृत होनेसे श्राप मानिये । " अथवा यदि ' नमो वः पितरो रसाय ' ( यजुः २।३२ ) इत्यादि वेदके अनुसार ' नमस्ते ' इसे दो पद मानकर बहुवचन-में ' नमो वः ' इस प्रकार श्राप परिवर्तन कर देंगे, तो फिर आप का परिवर्तनीय ' नमस्ते - वाद ' कट गया, क्योंकि अपरिवर्तनीय होने से उसकी अखण्डता नष्ट हो गई । ( ङ ) यदि ' जय श्रीकृष्ण ' आदि शब्द वादीके अनुसार साम्प्रदायिकता के सूचक हैं, तब ' नमस्ते ' शब्द भी प्रार्यसमाज सम्प्रदायका ' ट्रेडमार्क ' होनेसे साम्प्रदायिक ही है । नहीं तो वेदमें तो ' नमः ' ( यजुः १६।२२ ), ' नमोस्तु ' ( यजु १६।८ ), ' नमो वः ' ( अथर्व ० १८।४।८५ ) ' नमामि ' ( अ ० ३२८५ ), ' वन्दे ' ( यजुः १२/४२ ), ' नमस्कारः ' ( अथर्व ० ४१३६६ ), * नमस्ते का प्रतिविधान * १४५ ' अभिवादये ' ( अथर्व ० ६ | ६ | ४ ) इत्यादि शब्द भी प्रयुक्त किये । जाते हैं, प्रार्थसमाज इनका प्रयोग क्यों नहीं करता? ' नमस्ते '. में क्यों थोड़ा भी परिवर्तन नहीं चाहता? तब यह स्पष्ट सा. प्रदायिकता है | बल्कि ' नमस्ते ' के प्रयोगसे बहुत स्थलों अशुद्धि भी हो जाती है, जैसे कि ' मम भवद्भ्यो नमस्ते ' ‘ मान्यवराः! ' नमस्ते ' इत्यादि । इधर प्राशीर्वादमें ' नमस्ते'का प्रयोग कहीं नहीं होता । तब ' नमस्तेवाद ' दूषित सिद्ध हुना । इधर गुरु - शिष्य, पिता - पुत्र, पति - पत्नीका समान व्यवहार नहीं होता । शिष्य यदि गुरुके पैरोंमें गिरता है, तो गुरु शिष्य के पैरोंमें नहीं पड़ता । गुरु यदि शिष्यको श्राशीर्वाद देता है । तो शिष्य गुरुको आशीर्वाद नहीं देता । इस तरह जब व्यक हारभेद है, तब ' नमस्ते ' इसका कथन भी ठीक नहीं, क्योंकि समानपद से व्यवहारभेद प्रतीत नहीं होता । यदि शिष्य - द्वारा कहे ' नमः ' का नमस्कार तथा गुरु - द्वारा कहे ' नमः ' का ' यथा. योग्य सत्कार ' अर्थ मानें, तो भी ठीक नहीं, क्योंकि उद्दि तथा प्रतिनिर्दिष्ट शब्द में थोड़ा भी अर्थ - भेद नहीं होता । नहीं-तो फिर ' उदये सविता रक्तस्ताम्म्र एवास्तमेति च ' में भग्नप्रक्रम दोष नहीं होना चाहिए । तब उद्दिष्ट प्रतिनिर्दिष्ट ' नमस्ते ' पदकी समानता में थोड़ा भी प्रर्थभेद नहीं हो सकता । श्रतः ' नमस्ते ' यह दूषित सिद्ध हुम्रा, इष्टदेव - सङ्कीर्तन विषयमें हो परस्पर भेद नहीं होता, क्योंकि वहां प्रणाम आशीर्वाद नहीं होता । हां तब हाथ जोड़ने तथा ' आशीर्वाद के संके स ० ध ० १० CC - 0. Ankur Joshi Collection Garat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 83

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" १४६ G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * भेद तो किया ही जाता है । परन्तु ' नमः ' शब्द प्रणाम - सूचक होता है, श्राशी: सूचक नहीं । तब दोनों श्रोरसे उसका प्रयोग श्रशुद्ध है । अतः ' नमस्तेवाद ' भी दूषित सिद्ध हुआ! ' अवो-चाम नमो स्मै ' ( ऋ ० १।११४ | ११ ) यहां दयानन्द भाष्य में ' इस मान करने योग्य सभाध्यक्ष के लिए नमः - नमस्ते ' ऐसे वाक्य को ‘ प्रवोचाम ' कहें ' ' नमो ज्येष्ठाय च कनिष्ठाय ' ( यजुः १६ । I ३२ ) परस्पर मिलते समय सत्कार करना हो तब ' नमस्ते ' ER इसका उच्चारण करके छोटे - बड़ोंका निरन्तर सत्कार करें ' प्य यह कहते हुए स्वा ० दयानन्द जीका मत भी निराकृत हो गया; इन मन्त्रों में " नमः: " कहा है, ' नमस्ते ' नहीं । यव. ( ८ ) ' नमस्ते - व्याख्याका निरीक्षण । II ( १ ) ' मान्य लोगों को नमस्कार बालक लोग करें ' ( पृ ० था. २८ पं. ६ ) ' जहां किसीके पास जाय; वहां उसको पहले ही नमस्कार करें ' ( पृ ० ३४ पं ० ८ ) यह स्वा. द. जीके प्रादिम-सत्यार्थप्रकाशके वाक्य हैं । ' यजुः ' १६६२ के भाष्य में स्वामीजी क्रम ने पितरों अथवा गुरुजनोंको भूमिपर घुटने टेककर नमस्कार करना लिखा है ' ( सविता. १२1१ में एक श्रार्यसमाजी ) -इससे स्पष्ट है कि स्वा. द. जीने सन् १८७५ तक ' नमस्ते ' का श्राविष्कार नहीं किया था । वे संन्यासी होनेके नाते सबको श्राशीर्वाद देते हुए प्रायः अपने पत्र - व्यवहार में ' आनन्दित रहो ' लिखा करते थे, ' नमस्ते ' नहीं । फिर अन्तकाल में उन्हें ' नमस्ते " की सूझ हुई । सुन्शी - इन्द्रमणिने इसमें स्थित ' ते ' की उन्हें बुराई बताई । इसपर निरुत्तर होकर भी उन्होंने कोई विशेष CC - 0. Ankur Joshi Collection G नमस्ते व्याख्या निरीक्षण १४७ निर्णय नहीं किया, पर चेलोंको यह शब्द वैदिक प्रतीत हुग्रा; और उन्होंने इसका प्रचार प्रारम्भ कर दिया । स्वा ० द ० जीके स.प्र., सं.वि., वेदभाष्य श्रादिमें भी ' नमस्ते ' का प्रक्षेप कर दिया । अंग्रेजी पढ़े - लिखोंने जोकि सर्विसमें थे, और संस्कृतानभिज्ञ थे, इसे अपनाया । जनताको उन सर्वेण्टोंसे प्रतिसमय काम पड़ता था । इस ' नमस्ते ' के कहनेसे वे प्रसन्न होकर उनका काम शीघ्र कर देते थे; तब जनतामें भी यह चल निकला । जब सनातनधर्मी विद्वानोंने, अशुद्धता आजानेसे इसका विरोध किया, तो आर्य - समाजियोंने इसकी सिद्धिकेलिए कई निवन्ध लिखे । हमने सभीका उत्तर लिख रखा है । इस पुष्पमें इस विषय के कई निबन्ध दिये जा चुके हैं । शेष अन्य पुष्पोंमें देंगे । इस विषय की एक छोटीसी पुस्तक ' नमस्तेकी व्याख्या ' हमें मिली है, जिसके लेखक काङ्गड़ी गुरुकलके दर्शनाध्यापक श्रीसुखदेव विद्यावाचस्पति हैं । इन्हींका अन्धानुसरण बिना उन का नाम लिये किसी श्री राजेन्द्र - नामक आर्यसमाजीने ' भारतीय संस्कृति के तीन प्रतीक ' में किया है; जब हमने उस की अशुद्धताएं दिखलाई; तब उस महाशयने उन दोषों को ' आर्य ' पत्रमें स्वीकृत किया । अस्तु । हम यहां ' उक्त नमस्ते-व्याख्या ' का निरीक्षण करते हैं; जिससे ' आलोक'- पाठकों को ' नमस्ते ' के विषयमें दिये जानेवाले प्रमाणों की निस्सारता प्रतीत हो जाए । हम लेखकका ' वादी ' अथवा ' प्रतिपक्षी ' नामसे निर्देश करेंगे । Gurat. An eGangotri Initiative

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१४८ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * ( २ ) आरम्भ में लेखकने एकता के लिए उपाय बताते हुए अनेकताको निन्दा की है । वे लिखते हैं- ' कोई कहता है ' नमस्ते ', तो दूसरा चिल्लाता है [ वादीने कैसे अच्छे शब्दका प्रयोग किया है । ] ' जय गोपालकी ' । एकने कहा सोताराम, तो दूसरा भन्नाके बोलता है [ यहां भी वही असभ्यता की गई है ] ' राधेश्याम ', और लगे दोनों लड़ने । एकने किया ' राम-राम ', तो दूसरेने उत्तर दिया- ' जय श्रीकृष्ण ' । कुछ समझ में नहीं आता कि कौन ठीक कहता है । ( पृ ० २ ) यहां यह जानना चाहिये कि जो लोग ' जयश्रीकृष्ण ' आवि बोलते हैं, वह परमात्माके नाम होनेसे ही । उनके मत में यह नाम परमात्मा हैं । परमात्मा के नामका कहना भी वेदने ही प्रदिष्ट किया है, ' जैसे कि - ' रुद्र! यत् ते ऋिवि परं नाम ' ( यजुर्वेद सं. १०।२० ) यहां स्वा. दयानन्दजीने अर्थ किया है-' आपका जो दुःखोंसे छुडानेका हेतु उत्तम नाम है ' । अथर्ववेद सं. में भी कहा है ' - ' नामानि ते शतक्रतो! विश्वाभिर्गीभिरीमहे ' ( २०१६।३ ) यहां ' नामानि ' में बहुवचन है शतक्रतु इन्द्र कहते हैं, और ' इन्द्रो वै सर्वे देवा: ' ( शत. १३ | २ | ७ | ४ ) इन्द्रसे सब देवताओंका ग्रहण हो जाता है । उक्त मन्त्रका अर्थ आर्य-समाजके विद्वान् श्रीराजाराम शास्त्री इसप्रकार करते हैं-' हे शतक्रतो इन्द्र! हम सारी स्तुतियोंके साथ तेरे नामोंको बुलाते हैं ' । इस प्रकार अन्य भी बहुतसे मन्त्र हैं; उन्हें हम नाम - कीर्तन विषयमें लिखेंगे । इस प्रकार जब परमात्माके नाम बहुत हैं, और उनका सभी वाणियोंसे कीर्तन वैदिक है; * नमस्त व्याख्या निरीक्षण १४१ तब यहां श्राक्षेपकी क्या बात है? वादियोंके मतमें भी बेदमे परमात्माके इन्द्र, मित्र, वरुण, अर्यमा, श्रग्नि, यम श्रादि बहुतरे नाम हैं, बल्कि स्वामी दयानन्द के मत में तो शनैश्चर, राहू केतु, मङ्गल, बुध आदि भी परमात्मा के नाम हैं । तब यदि कोई अपनी रुचि के अनुकूल परमात्माका कोई नाम लेता है, दूसरा दूसरे नामको; तब इसमें प्रक्षेप क्या? स्वा. दयानन्दने तो परमात्माक १०० नाम स.प्र. में लिख डाले हैं । शेष है परस्पर । कलह; सो वह तो अज्ञानियों में ही हुआ करता है । क्या एक ' नमस्ते ' ही के कहने वालोंके, परस्पर कलह, पार्टीबाजियां वा दल बन्दियां नहीं हुआ करतीं? यदि कहा जाने कि- कृष्ण, राम आदि वैदिक नाम नहीं है, तो क्या सर्वत्र वैदिक - नाम - स्थापन आवश्यक है? यदि ऐसा है; तो ' गुरुकुल ' शब्दका तथा ' संन्यासी ' शब्दका बहिष्कार कीजिये; क्योंकि वह वेदमें नहीं । वादीके स्वामीजीने सच्चिदानन्द, सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, दयालु, परमेश्वर, गणेश, शनैश्चर आदि नाम जो परमात्माके ( स.प्र. १ म समु. ) लिखे हैं; तब सत्यार्थप्रकाशसे उन्हें बहिष्कृत कर दीजिये । राम - कृष्ण आदि नाम भी वेदमें सुलभ हैं । नाम - कीर्तन वैदिक . ही है; उसमें प्रक्षेप क्या? कहा जाता है कि- ' क्या महाराजा रामचन्द्रजी अपने पिता दशरथको भी सत्कार करते समय ' राम - राम ' ही करते थे, और राजा दशरथ भी अपने बेटेको ' राम - राम ' कहकर है । उत्तर देते थे? ' ( पृ ० २-३ ) इसपर वादीको भी कहना चाहि CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 85

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G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * १५० कि श्रीराम दशरथको और दशरथ श्रीरामको उभयपक्षसे ' नमस्ते ' कहा करते थे क्या? यदि इसमें कोई प्रमारण हो तो दिया जाय! । नमस्कार तो हाथ जोड़नेसे भी होता है, जैसे कि गेदमें कहा है - ' उत्तानहस्तो नमसा दिवासेत् ' ( ऋ ०६।१६।४६ ) यहां श्रीसायरणने लिखा है- ' उत्तानहस्तः कृताञ्जलिपुटः सन् नमसा - नमस्कारेण श्रविवासेत् परिचरेत् ' । ' उत्तानहस्तो.... बवन्दा ' ( ऋ. ६।६३।३ ) यहां भी श्रीसायरणाचार्य लिखते हैं-उत्तानहस्तः कृताञ्जलिः ववन्द- स्तौति ' । प्रथवा पांग छूनेसे भी नमस्कार हो जाया करता है- ' श्रीमनुने कहा है- ' व्यत्य-स्तपाणिना कार्यमुपसंग्रहरणं गुरोः । सव्येन सव्यः स्प्रष्टव्यः दक्षिणेन च दक्षिणः । ( २:७२ ) स्वा ० दयानन्दजीकी संस्कार-निधिमें भी लिखा है- ' स्त्री पतिके चरणस्पर्श, पादप्रक्षालन, श्रासनदान करे ' ( विवाह ० पृ ० १३३ ) । और श्राशीर्वाद भी हाथ के इशारेसे, बिना भी किसी शब्द- विशेष को बोले हो सकता है । इस प्रकार राधा और कृष्णका भी वादी परस्पर ' नमस्ते ' शब्दका प्रयोग दिखलावे । ( राधाके विषय में हमारा निबन्ध छठे पुष्पमें द्रष्टव्य है - जिसमें वादीका - ' राधाके बारे में सुना गया है कि वह श्रीकृष्णकी विवाहिता पत्नी नहीं थी -यह प्राक्षेप परिहृत किया गया है ) यदि वादी वैसा प्रमाण नहीं दिखला सकता; तब उसका पक्ष भी प्रसिद्ध हो गया । जोकि वादीका कथन है कि- ' मिलें परस्पर सम्मान करने लिए, या आशीर्वाद लेनेके लिए, और बोलें किसी स्त्री और पुरुषका नाम, यह कैसी अप्रासङ्गिक बात है, इसका CC - 0. Ankur Joshi Collection * ' नमस्ते ' व्याख्या निरीक्षण G १५१ उत्तर वादीने ही स्वयं पूर्वपक्षीके द्वारा दिलवाया है कि ' राम और कृष्ण विष्णु के अवतार थे, श्रुतः वे साक्षात् पर-मात्मा थे, परस्पर मिलते समय यदि परमात्माका नाम लिया जाय; तो उसमें दोष क्या है? फिर इसका प्रत्युत्तर वादी लिखता है कि- ' परमात्मा श्रवतार लेता ही नहीं । पर यह गलत है, इस विषयमें ' श्रीसनातनधमीलोक ' का चतुर्थ पुष्प देखना चाहिए । वादी भले ही अवतार न मानता हो, पर जो उक्त नाम कहते हैं, तो परमात्माका अवतार मानते हैं, और उसीका नाम-कीर्तन ' जय श्रीराम ' श्रादि शब्दसे लेते है; फिर इसमें दोष ही क्या रहा? । वादी अवतार न भी मानें; पर राम और कृष्ण परमात्माके नाम तो मान हो सकते हैं - ' रमन्ते योगिनो-ऽस्मिन् कर्षति भक्तान् ' तब भी कोई दोष न रहा; क्योंकि-नाम - वचन भी वैदिक है । जोकि कहा जाता है- ' मान भी लिया जाय कि - पर-मात्मा अवतार लेता है, उस पुरुष बने परमात्माका नाम लेना श्रापके मतमें बुरा नहीं, अच्छा है, तो ठीक रहा । ऐसे पर-मात्माका नाम हर स्थानपर बिना प्रसंगके भी ले लिया करो? । ' यह पूर्वपक्षका प्रत्युत्तर बहुत निर्बल है, इसमें कुछ भी दम नहीं । श्रापसके मिलनेमें हमारी स्थिति एवं पालन करनेवाले भगवान्‌का आदिमें नाम लेकर फिर प्राकरणिक बात चलाना अप्रासंगिक कैसे हो? पुस्तकके प्रारम्भ में भगवान्‌का नाम - कीर्तन करके उसके बाद हो तो प्रासंगिक-Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 86

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१५२ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * लेखन प्रारम्भ करना पड़ता है । वेद तो कहता है- ' सदा ते नाम स्वयशो विवक्मि ' ( ऋ. ७।२२।५ ) इस मन्त्र में स्थित ' सदा ' शब्द भगवान् के नामकी वादीसे उपक्षिप्त प्रप्रासंगिकता को काट देता है, भगवान् के नामका सदा ही प्रसंग है, क्या पता - कब प्रांखें मुंद जाएं? ' जयश्रीकृष्ण ' के वाच्य भग-वान् कृष्ण स्वयं ही उक्त वेदवाक्यका अनुवाद देते हैं - ' सततं कीर्तयन्तो माम्, ( गीता १।१४ ) ' मामनु स्मर युध्य च ' ( ८७ ) मेरा स्मरण भी करो, और संसारी व्यवहार रूप युद्ध भी करो । तब जो कहा जाता है कि ' परमात्माका नाम लेनेसे शायद पाप तो न हो; पर व्यवहार तो नहीं चलेगा । एक मालिक को पानीकी प्यास लगी हो, और वह नौकर से कहता है-' राम - राम ' । इस स्थान पर प्रापके कथनानुसार सम्भवतः ' राम - राम ' कहना पाप तो नहीं; पर इतना कहने मात्रसे तो मालिक प्यासा मरेगा, भूखा पति ' राधाकृष्ण ' कहता हुआ भूखा मरेगा ' ( पृ ० ४ ) यह कथन ' मामनुस्मर युध्य च ' इस भगवद् वचनसे ही कट गया । इस वादीके वचनको उससे प्रमाणित वेद भी अच्छी तरह काटता है । देखिये- ' इन्द्रं परेऽवरे मध्य-मास इन्द्रं यान्तोवसितास इन्द्रम् । इन्द्रं क्षियन्त उत युध्यमाना इन्द्रं नरो वाजयन्तो हवन्ते ' ( ऋ. ४।२५।८ ) अर्थात् - छोटे, बड़े और मध्यम इन्द्र ( परमेश्वर ) को बुलाते हैं । रास्ते में जाते - नाते, उठते - बैठते, निवास करते हुए भी उसे ही बुलाते हैं । लड़ते हुए, वा खाना - योना चाहते हुए भी उसी ऐश्वर्य-शाली अपने इष्टदेवको बुलाते वा स्मररण करते - कराते हैं । नमस्ते - व्याख्या निरीक्षण १५३ ' इन्द्रं वयमनुराधं हवामहे ' ( अथर्व ० १६।१५।२ ) राधा. सहित इन्द्र- ऐश्वर्यशाली कृष्णको हम बुलाते हैं । तब क्या वादीके कथनानुसार उस समय ' नमस्ते ' कहने मात्र से दोनोंकी भूख - प्यास मिट जावेगी? क्या उस समय ' पानी लानो ' । । इस कथनका कोई निषेध करता है? जोकि कहा जाता है कि- ' छोटा अपने बड़ेका सत्कार । करने गया, और कहने लगा- राम राम । बड़ेने भी श्राशी. र्वादमें दोहरा दिया- राम - राम । तो इससे क्या सत्कार और आशीर्वाद सूचित हो गये? कदापि नहीं । इन शब्दों सत्कार एवं श्राशीर्वादकी भूख नहीं बुझती ' ( पृ ० ४-५ ) यह कहते हुए वादीने अपने पक्ष ( दोनों ओरसे ' नमस्ते ' शब्द कहना ) पर भी कुल्हाड़ी चलाई है । इस अपने किये प्रक्षेपका उत्तर वादीने स्वयं भी दिया है- ' थोड़ीसी भी बुद्धि का यदि प्रयोग किया जाय तो यह उलझन भी आसानीसे सुलझ सकती है । प्रकररण, समय तथा स्थानादिको देखकर यह बात बड़ी आसानीसे पहचानी जा सकती है । ' ( पृ ० १० ) वादी स्वयं जानता है कि छोटा राम - राम कहता हुआ बड़े श्रागे ' हाथ जोड़ता है, और बड़ा वैसा कहता हुआ हाथके इशारेसे आशीर्वाद देता है । तात्पर्य यह है कि - नमस्कार-श्राशीर्वाद तो संकेतोंसे जाने जाते हैं, साथ ही अपने इष्टदेवके कीर्तनार्थ राम - राम, वन्दे मातरम्, जय हिन्द, जयश्रीकृष्ण आदि भी कह दिया जाता है— इसमें दोष क्या? दोनों हाथ जोड़नेसे नमस्कारकी भूख दूर होती है, दाहिना हाथ ऊरा CC - 0. Ankur Joshi Collection Gurat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 87

सनातन धर्मालोक १-२, पृष्ठ 87 का मूल पृष्ठ
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३ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * १५४ करने से आशीर्वाद की भूख दूर हो जाती है । II ऊपर दिया गया दोष तो दोनों नमस्ते- वादियोंमें घटता है । उसमें पता नहीं लगता कि आशीर्वाद देनेवाला इनमें कौन है, और नमस्कार करने वाला कौन; क्योंकि दोनों ही एक ही शब्दका प्रयोग करते हैं - नमस्ते नमस्ते! यदि आप भी दोनोंका छोटा - बड़ापन जानकर अथवा हाथ जोड़ने वा एक हाथ के इशारेसे जान जाते हैं कि यह नमस्कर्ता है; और यह आशीर्वाददाता; तब ' राम - राम ' श्रादि शब्द - प्रयोग में भी जान लेना चाहिये । आश्चर्य है कि- वादी अपने पक्ष में तो दोष देखता नहीं;. परन्तु दूसरे पर वही दोष दे देता है यह क्या बात? क् ' पर- उपदेश कुशल बहुतेरे ' वाली बात है;! वादीके पक्ष में यह एक महान् दोष पड़ता है कि - प्राशीर्वादकी भूख ' नमः ' शब्दसे नहीं बुझती, क्योंकि - ' नमः ' शब्द नमस्कार एवं अभि-कर वादन अर्थवाला है, आशीर्वादार्थक नहीं । इसमें वे अपने स्वामीकी साक्षी भी सुन लें - ' नमस्ते ' इस वेदोक्त वाक्यसे परस्पर नमस्कार कर ' ( सं ० वि ० पृ ० १३३ ) ' नमस्ते ' यह वेदोक्त वाक्य अभिवादन के लिए..... है । इसी वाक्यसे -परस्पर वन्दन करें " ( सं ० वि ० पृ ० १७५ की टिप्पणी ) । वेदने भी ऐसा ही माना है - ' वन्दध्यै नमोभिः ' ऋ ( ० ११२७१ ) यहां पर ' नमः ' से ' वन्दना ' मानी है । ' वदि ' धातु ' अभि-वादनस्तुत्यो: ' अभिवादन अर्थ में प्रसिद्ध है । तब आशीर्वाद की भूखको ' नमः शब्द कैसे मिटा सकता है? छोटे - बड़े का CC - 0. Ankur Joshi Collection G नमस्ते व्याख्या निरीक्षण * १५५ परस्पर नमस्कार नहीं होता, किन्तु नमस्कार और आशीर्वाद ही होता है । जोकि वादीका कहना है- " वेदोंमें तो क्या, आप सारे प्राचीन संस्कृत - साहित्यको भी पढ़ जाइये, कहीं एक - दूसरेके साथ राम - राम या राधा - कृष्ण श्रादि शब्दों का प्रयोग नहीं है " इस पर वे याद रखें - जबकि - ' सततं कीर्तयन्तो माम् ( श्रीकृष्णम् ) ' ( गीता | १४ ) ' सदा ते नाम स्वयशो विवक्मि ' ( ऋ ० सं ० ७।२२।५ ) इत्यादि रूपसे सदा ही भगवान् के नाम का कीर्तन सभी शास्त्र कहते हैं, तब सभी स्थान उसका उल्लेख स्पष्ट न होने पर भी उसका प्रयोग सिद्ध हो ही जाता है । वेदमें भी बीज - रूपसे श्यामरंग वाले राम आदिका वर्णन श्राता है - यह दिङ्मात्र ' श्रीसनातनधर्मालोक ' पञ्चम पुष्पमें देखें । तब उनकी नित्यशक्ति सीता और राधा भी स्वतः गृहीत हो जाएगी । ' इन्द्रं वयमनुराधं हवामहे ' ( अ ० १६।१५।२ ) यहां पर राधा से अनुगत इन्द्र ( ऐश्वर्ययुक्त श्रीकृष्ण ) का आह्वान संकेतित किया गया है । सार्वदिक व्य-वहार जहां - तहां स्पष्टरूपसे नहीं मिला करता । विधिसे उसकी कर्तव्यता सिद्ध हो जानेसे लिया जाता है । कहा जाता है- ' शब्द सभी वेद, पुराण, इतिहास ही शब्दकी आज्ञा देते हैं, करना चाहता है - ( प्रश्न ) Gujerat. An eGangotri Initiative उसकी कृतताका भी अनुमान कर ऐसा कहो जो वेद प्रतिपादित हो, तथा स्मृति आदि ग्रन्थ एक और श्रार्य - समाज इसी शब्दका प्रचार वह शब्द क्या है? ( उत्तर ) वेदादि

पृष्ठ 88

सनातन धर्मालोक १-२, पृष्ठ 88 का मूल पृष्ठ
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१५६ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * सत्यशास्त्र तथा पुराणादि ग्रन्थ सभी एक स्वरसे यही कहते हैं कि - परस्पर ' नमस्ते ' शब्दका प्रयोग होना चाहिए ' । यह बात निष्प्रमाण है, किसी भी वेद वा स्मृति-पुराणादिमें कहीं भी आदेश नहीं दिया गया कि - परस्परमें ' नमस्ते ' शब्द ही कहना चाहिए । वादीने भी वेद वा इतिहास का कोई प्रमाण नहीं दिया, और न वैसा प्रसारण दिखलाया जा सकता है - जहां परस्पर ' नमस्ते ' शब्द कहने की प्राज्ञा हो; न ही कहीं परस्पर ' नमस्ते ' किया ही जाता है । न प्राचीन-कालमें कभी किया ही गया है । न ' नमस्ते ' से भिन्न शब्द कभी नहीं कहना चाहिए ' यह कहीं कहा गया है । ' नमस्ते'-दिखलाने में वादी याज्ञवल्क्य - गार्गी, यम और नचिकेता, श्रीकृष्ण और प्रर्जुन, राम और सीता पृथिवी और वराह, केतकी - महादेव, इस प्रकार उदाहरण दिखलाते हुए भी उभयपक्ष से ' नमस्ते ' नहीं दिखला सका; इससे उसका " परस्पर नमस्ते ' कहना " ही प्रसिद्ध हो गया । ' शर्म मे मच्छ, नमस्तेऽस्तु, ' ( यजुः ४१६ ) ' नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन्! स्वस्ति मेऽस्तु ' ( कठोपनिषद् ११६ ) इत्यादिमें जिसे नमस्कार किया गया है, उससे नमस्कार न मांगकर शर्म वा स्वस्ति ( कल्याण ) का आशीर्वाद मांगा गया है, तब परस्पर दोनों प्रोरसे ' नमः ' शब्दका प्रयोग खण्डित हो गया । ( १ ) छोटे - बड़े, पूर्वज एवं अपरज तथा नीच तथा मध्यम आदि सबके लिए ' नमस्ते ' शब्दका प्रयोग दिखलाते हुए वादीने ( पृ ० १४ में ) ' नमो ज्येष्ठाय च कनिष्ठाय च नमः पूर्ण-* ' नमस्ते ' व्याख्या निरीक्षण १५० जायापरजाय च नमो मध्यमाय चाप्रगल्भाय च नमाजघ न्याय बुध्न्याय च ' ( यजुः १६।३२ ) यह मन्त्र दिखलाया पर इस मन्त्र में तो ' नमस्ते ' शब्द ही नहीं सुन पड़ता; है, किन्तु ' नमः ' शब्द ही । तब बाबी ' नमः ' शव्दका तो प्रचार को ' नमस्ते ' शब्दको वह वेदसे आदिष्ट कैसे कहता है? क्या वादी । यह स्वीकार करनेके लिए तैयार है? वस्तुतः उक्त मन्त्रका वादीसे विवक्षित अर्थ हो ठीक नहीं - इसपर हम ' नमस्ते विधान के प्रतिविधान ' में विवेचना है । चुके हैं । संक्षेपमें यहां यह जानना चाहिए कि यहां ज्येष और कनिष्ठ दोनों आपस में नमस्कार नहीं कर रहे हैं, किन्तु एक ही नमस्कर्ता, अपने से बड़े परन्तु आपसमें छोटे - बड़े दोनोंको नमस्कार कर रहा हैं । वस्तुतः यहां ज्येष्ठ - कनिष्ठ-शब्दका भी वादीसे विवक्षित अर्थ ठीक नहीं; यदि ज्येष्ठ कनिष्ठका अर्थ छोटा - बड़ा है, तो आगे ' पूर्वजाय च अपरजाय च ' में पुनरुक्ति जा पड़ती है । इस कारण यहां छोटे - बड़े का अर्थ न होकर अणोरणीयान् ' महतो महीयान् ' इस अर्थ में महा-देवको ही ज्येष्ठ - कनिष्ठ शब्दसे कहकर नमस्कृत किया गया है । इसलिए वायु पुराण में ' नमो ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय ' ( २४।९ २ ) श्रादि कहा गया है । वेदमें ' उत्तानहस्तो नमसा विवासेत् ' ( ऋ ०६।१६।४६ ) इस मन्त्रमें बद्धाञ्जलि होकर ' नमः शब्द ' कहना कहा गया । है । ' यजाम ( पूजयामः ) इद् नमसा ( नमः शब्देन ) वृद्धमिन्द्रर ) ( ऋ ० ३।३२।७ ) यहां ' नमः ' का प्रयोग अपने से बड़ेको दिस CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 89

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२१० १५८ * श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) + उध. लाया गया है; तब छोटेके प्रति उसके वृद्ध न होनेसे ' नमः'का प्रयोग भी खण्डित हो गया; क्योंकि उसके आगे हाथ नहीं जोड़ े जाते । अतः उस ( छोटे ) को ' नमः ' कहना भी वेदशास्त्र-विरुद्ध ही प्रतिफलित हुआ । ( २ ) वादी कहता है- ' नमस्तक्षभ्यो रथकारेभ्यश्च वो नमो नमः ' ( यजुः १६।१७ ) यहां तो तरखान, राजमिस्त्री, रथकार, कुम्हार, चाण्डाल, तथा कुत्तोंके शिक्षक प्रादि सबके लिए ' नमस्ते ' का प्रयोग है अर्थात् इनके लिए अन्नादि भोग्य-सामग्रीका विधान है ' ( पृ ० १४-१५ ) । पर इस मन्त्रमें जब ' नमस्ते ' शब्द ही नहीं हैं; तब वादी का पक्ष ही प्रसिद्ध हो गया । यहां पर ' नमो वः ' है; क्या वादी लोग उसका प्रयोग करते हैं? यदि नहीं; तो वे वेदसे विरुद्ध भी सिद्ध हो गये । यदि ' नमो वः ' का प्रयोग करते हैं; जाय । तो ' नमस्ते ' शब्दका ही प्रयोग सदा करना चाहिए " यह वादी का पक्ष ही खण्डित होगया । यदि उक्त मन्त्रमें बढ़ई आदिको नहा गया नमस्कार प्रासङ्गिक होनेसे यहां नमस्कार अर्थ न होकर वादीके तथा उसके स्वामी के अनुसार भी उन्हें भोग्य सामग्री देनेका विधान वैदिक है; तो इन्हें नमस्कार करना तो वादी के मत में भी निषिद्ध सिद्ध हो गया । हम उन्हें अन्नदानका निषेध नहीं करते, किन्तु नमस्कारका ही निषेध करते हैं । गया ( ३ ) वादी श्रागे कहता है- ' नमो वञ्चते, परिवञ्चते, स्तायूनां देख पतये नमो नमः ' ( यजुः १६ । २१ ) इस मन्त्रमें छली, कपटी, चोरोंके सरदार, हिंसक, लुटेरे तथा गठकतरे आादि सभी के CC - 0. Ankur Joshi Collection * नमस्ते व्याख्या निरीक्षण १५६ लिए ' नमस्ते ' शब्दका प्रयोग है अर्थात् उन्हें नमः वज्रसे मारनेका विधान है ' ( पृ ० १५ ) यहां भी जब ' नमस्ते ' शब्द सुनाई नहीं पड़ता, तो दर्शनाध्यापक महाशयने वेद में प्रक्षेप कर दिया - यह स्पष्ट हो रहा है, जब वे यहां चोरोंको वज्रसे मारनेका विधान बताते हैं; तो वहां शिष्टाचार वाचक ' नमस्ते ' शब्द कहाँ सिद्ध हुग्रा? क्या वादी लोग घर में प्राये चोरको ' नमस्ते ' करके उसका स्वागत किया करते हैं? यदि नहीं; तब उन्हींका पक्ष उन्हींसे कट गया । जोकि वादीका कहना है कि- ' यजुर्वेद के १६ वें अध्यायके हमने तीन ही मन्त्र केवल दिखावेमात्रके लिये लिखे हैं; यह तो सारा अध्याय नमस्ते शब्दसे भरा पड़ा है ( पृ ० १५ ) पर इन तीन मन्त्रों में भी ' नमस्ते ' शब्द नहीं दीखता, ' नमः ' को ' नमस्ते ' पढ़ते हुए वादीकी प्रांखें कलुषित मालूम पड़ती हैं । तब वादीका पक्ष भी कट गया; यहां तो ' नमः ' शब्द ही सिद्ध होता है, उसीका वे प्रचार करें । अभिवादनार्थक भी ' नमः ' ही शब्द है, ' ते ' शब्द प्रभिवादनार्थक नहीं । श्रवशिष्ट है सर्व-नाम; उसमें स्वतन्त्रता है जो रखा जावे ' तत्रभवत् ' प्रादि श्रथवा ' श्रीमत् ' का प्रयोग | यह भी वादीका कथन गलत है कि-यह सारा अध्याय ही ' नमस्ते ' शब्दसे भरा हुआ है । इस सम्पूर्ण ही व्यायमें ' नमः ' शब्द है ' नमस्ते ' शब्द नहीं । केवल ' नमस्ते रुद्र! मन्यवे ' ( १६।१ ) ' नमस्ते श्रायुधाय ' ( १६१४ ) 1 इन दो ही मन्त्रों में ' नमस्ते ' देखा जाता है, इसमें भी ' ते ' शब्द ' नमः ' से कुछ भी सम्बन्ध नहीं रखता; किन्तु वहां ' ते - तव Gujarat. An eGangotri Initiative

पृष्ठ 90

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१६० G श्रीसनातनधर्मालोक ( १-२ ) * मन्यवे, ते तव आयुधाय ' से सम्बन्ध है; यहां भी ' नमः ' शब्द ही सिद्ध हुआ, ' नमस्ते ' नहीं; तब यह वादीका कथन जहां असत्य है, वहां उसके पक्षका खण्डक भी है । आगे वादी इस रुद्राध्यायमें ' रुद्रको नमस्कार ' सिद्ध करने वाले सनातनधर्मियों पर प्रक्षेप करता है - ' हमारे पौराणिक भाई कहते हैं कि- ' यह तो स्वाध्याय है, इसमें परमात्मा के प्रति नमस्ते है यथा- ' नमस्ते रुद्र! मन्यवे ' ( यजुः १६।१ ); मैं अपने उन पौराणिक भाइयोंसे पूछता हूँ कि -यदि वस्तुतः इस अध्याय में सर्वत्र रुद्र ( परमात्मा ) को ही नमस्ते है, तब तो इस अध्यायमें चोर, लुटेरे, डाकू, कुत्ते, शूद्र तथा चाण्डालादि सभी प्राणी परमात्माके ही रूप हो गए, जिनको भिन्न - भिन्न अभिप्राय से ' नमस्ते ' किया गया है, तब तो भाई! जब तुम्हारे घरमें चोर, लुटेरे, कसाई या चाण्डाल घुस आवें; तव तुम उनकी अर्ध आदि देकर पूजा किया करों ' ( पृ ० १६ ) यह वादीका कथन व्यर्थ है । किरातरूपधारी भगवान् रुद्रने तत्कालानुरूप गरणोंके साथ वैसा घोर रूप धारण किया-• कराया था । इससे उन रूपोंके धारण करने वाले रुद्रको नमस्कार है, उसके उन घोर रूपोंको नमस्कार है, जैसेकि - ' रुद्रा ष्टाध्यायीमें कहा है- ' अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोर - घोरतरेभ्यः । सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेस्तु रुद्ररूपेम्य: ' ( १०1८ ) ( तैत्तिरी-याण्यकके दशमप्रपाठक के ४५ वें अनुवाकमें ) यहां उसके अघोररूप सात्त्विक होनेसे शान्त हैं, और घोर राजस होनेसे नमस्ते - व्याख्या - निरीक्षण १६ | उग्र हैं, और घोर घोरतररूप तामस होनेसे भयङ्कर संकेतित किये गये हैं । सो वहां किरातरूपधारी उस रुद्रके उन घोर घोरतर रूपोंको नमस्कार है, आधुनिक चोर - डाकुको. । नमः । कार नहीं । मत्स्य कूर्म और वाराहादिरूपधारी परमात्माको नमस्कार करना हो तो आजकल के वाराह कच्छप आदिको नमस्कार कोई भी नहीं करता । तब वादीका यह तथा अंतिम प्राक्षेप निरस्त होगया । आगे ( ४ ) ' नमस्ते हरसे, ( ४ ) नमस्ते यातुधानेभ्यः । ( ६ ) नमस्ते राजन्! वरुण! ( ७ ) नमस्ते नग्न! ओजसे, इन वादिप्रदत्त मन्त्रों में परमात्मा के रूपोंको नमस्कार है, क्यों कि वहां श्रग्निके तेज, मृत्यु, वरुण और अग्निको नमस्कार किया गया है । यह परमात्माकी अग्नि आदि मूर्तियोंकी पूजा है । इनके लिए ते ( तुभ्यम् ) का प्रयोग होता ही है । तब यह उद्धरण व्यर्थ हैं । ( ६ ) ' नमस्ते यातुधानेभ्यः ' इस मन्त्रके विषय में हम गत- निबन्ध में पर्याप्त स्पष्टता कर ही चुके हैं । ( ८ ) पूर्वपक्ष - नमो महद्भयो नमो अर्भकेभ्यो नमो युवभ्यो नम प्रशिनेभ्यः । ( ऋ ० १।२७।१३ ) यहां पर कमश: बड़े - छोटे, जवान तथा बूढ़े सबके लिए नमस्ते किया गया है । समीक्षा- यहां दिन - दहाड़े आंखोंमें धूल झोंकी जाती है । इस मन्त्र में ' नमस्ते ' है कहां? यहांपर इस प्रकारके परिमार वाले देवताओं को नमस्कार किया गया है, सर्वसाधारणको नहीं । यहां वादीने इस मन्त्रके उत्तरार्धको छिपा दिया है । स ० [ ध ० ११ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat An eGangotri Initiative