सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 101–110
सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 101–110
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) १६४ है । ' छन्द ' का एक शब्द ' निष्टक्य ' है, जिसे श्रीपाणिनिने छान्दस ३।१।१२३ सूत्रमें सिद्ध किया है । ' स्नास्वी ' एक छान्दस शब्द है, जिसे श्रीपाणिनिने छान्दस ( ७ । १ । ४६ ) सूत्र में प्रयुक्त किया है । वैदि निघण्टुमें ' आष्ठा ' ( १।६ ) दिशाका, ' शोकी ' ( १।७ ) रात्रिका, ‘ जातरूपं ’ ( १।२ ) सोनेका, ‘ बलिशान: ’ ( १० ) मेघका, ' बेकुरा ' ( १।११ ) वाक्का, ‘ सर्णीक्रम्, स्वृतीक्रम् ' ( १।१२ ) यह उदकका नाम है । एतदादिक चैदिक शब्द इन वर्तमान चार ऋ ० शाकल, य ० वाजसनेयी, सा ० कौथुम, श्र ० शौनक संहिताओं में नहीं मिलते । कई इनसे भिन्न वेद-संहिताओं में मिलते हैं, कई लुप्त वेद संहिताथोंमें होंगे, तब क्या के श्राजकी चार वेद - संहिताएँ अपूर्ण हैं; जो कि उनमें उक्त वैदिक शब्द तथा स्वा ० दयानन्दाभिमत ' मास्म कमण्डलू ' शूद्राय दद्यात् ' ( स्त्रैण-वाद्धित ४।१।७-१ में उद्घृत ) आदि कई वेदमन्त्र भी नहीं मिलते । अथवा यदि ' छन्द ' शाखाओंको कहते हैं, और छान्दस शब्द मूल वेदके शब्दोंका कुछ हेर - फेर करके बनाये गये हैं, तो पाणिन्यादि प्रोक्तं छान्दस शब्दों के मूल शब्द इन वर्तमान चार संहिताओं से दिखलाने चाहियें । यदि ये मूल वैदिक शब्दोंके हेर - फेरसे बने हैं, तो मानुष हो जानेसे पाणिनिं श्रादिने इनके लिए ' भाषायां ' शब्द न देकर ' छन्द ' वा ' निगम ' श्रादि शब्द ' क्यों रखे? ' स्वा ० दयानन्दजीने ' सत्यार्थप्रकाश ' के द्वितीय पृष्ठमें लिखा है ---‘ देखिये वेदोंमें ऐसे प्रकरणोंमें ‘ थोम् ' श्रादि परमेश्वरके नाम हैं ' यहाँ पर स्वामीजीने ' वेदोंमें ' बहुवचन देकर चारों वेदोंमें ' ओम् ' की सत्ता CC - 0. Ankur Joshi श्रीपतञ्जलि एवं ' शन्नोदेवीरभिष्टये ' १६५ मानी हैं, इस प्रकार मङ्गलं शनैश्चर श्रादि शब्दोंकी भी सत्ता मानी । पर श्रार्यसमाजी स्वा ० विश्वेश्वरानन्दजीकी चारों वेद संहिताओं-की अनुक्रमणिकाओं में यजुर्वेद संहिताकी ही सूची ( २१४३, २०१५--१७ ) में ' ओम् ' शब्द मिलता है, अन्य संहिताओं में नहीं । मंगल, ' शनैश्वर यादि भी चारोंमें किसी वादिसम्मत वेद संहितामें नहीं मिलते । ' वैदिक सन्ध्या ' में स्वामीजी से उद्धृत ' तैत्तिरीयारण्यक ' का सप्तव्या-हृति मंत्र तथा अन्य दो ओं ' भूः पुनातु ' और श्र ' वाक् - चाक् ' यह मंत्र क्या इन संहिताओं में मिलते हैं? तब क्या इससे स्वामीजीकी बात . शुद्ध है? नहीं! वेद केवल इन चार संहिताओं में विश्रान्त नहीं, • किन्तु सभी ११३१ संहिता, ब्राह्मण, उपनिषद्, श्रारण्यकादिमें विश्रान्त हैं - यह इससे सूचित होता है । उनमें ' घोम् ' का वर्णन वा व्याख्यान मिल ही जाता है । धन्य, चेदके नामसे कहे मन्त्र भी मिल जाते हैं । हम अनुसन्धाताओंको प्रेरणा करते हैं कि वे स्वा ० दयानन्दजीके वेदाङ्गप्रकाशके १४ भागों तथा अन्य निबन्धों ( प्राचीन संस्करणों ) में ' वेद ' के नामसे जो उद्धरण दिये गये हैं, जैसे सन्धिविषयके पृष्ठ १ में ' आमन्त्रिते छन्दसि ' ( ३७ ) वार्तिकका अर्थ यह लिखा है- ' श्रामन्त्रित परे हो तो पूर्वको प्लुत हो वेदविषय में । जैसे ' अम्ना ३ इ पत्नी वः ' । इस प्रकार १२६ वार्तिकमें भी उन्होंने ' छन्दसि ' का अर्थ ' वेदस्य प्रयोग ' लिखा है । इस प्रकार १४८, १११, २०२ आदि सूत्र वार्तिकोंमें एवम् अन्य स्थानोंमें भी, उनको तथा महाभाष्य, उणादि, निघण्टु, काशिका, · Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१६६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) सिद्धान्तकौमुदी, न्यास, निरुक्त आदि पुस्तकोंमें उद्धृत किये हुए वेदके शब्दों वा मन्त्रप्रतीकोंको इन चार ( शाः घा ० कौ ० शौ ० ) संहिताओंमें हूँढना चाहिये, पर उनके इनमें न मिलनेसे स्पष्ट विदित हो जायगा. कि इन्हीं चार संहिताओंमें चार वेद समाप्त नहीं किन्तु -' एकशतमध्वर्यु ' शाखाः, सहस्रवर्त्मा सामवेदः, एकविंशतिघा बाह-च्यम्, नवघा आथर्वणो वेदः ' इन्हीं ११३१ संहिताओं में तथा ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषदादिमें— चारों वेद विश्रान्त हैं, इसी बात को प्रस्फुट सिद्ध करनेके लिए ही वादिप्रतिवादिमान्य श्रीपतञ्जलिने श्रादिमें ' पैप्पलाद अथर्ववेद संहिता ' काही धारम्भिक मन्त्र ' शं नो देवीरभिष्टये ' दिया हैं । इसी वैदिक सिद्धान्तके माननेसे ही सभी वेद - सम्बन्धिनी श्रव्यवस्थाएँ मिटेंगी । परमेशान ब्रह्मणस्पति ऐसा वैदिक ज्ञान सभी अधिकारियोंको दें, जिससे चेदविषयमें फैला हुआ श्रज्ञान मिटे । इस निबन्धमें श्रीभगवद्दत्तजी एवं श्रीब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु तथा श्रीब्रह्म मुनिजीके आक्षेपों पर भी प्रायः विचार कर लिया गया है । जैसे मन्त्रभागकी संहिताएँ सभी वेद हैं, वैसे ब्राह्मण - भाग भी वेद हैं; इस विषय में निबन्ध किसी अन्य पुष्पमें उदृष्टत किया जाएगा । CC - 0. Ankur Joshi Collection १६० युधि पला ( ६ ) वेदादिशास्त्रों में जन्मना वर्ण - व्यवस्था क्षत्रिय व्यव हिन्दु - धर्म तथा हिन्दु - शब्दकी व्याख्या करके, हिन्दु धर्मके: ' क्षत्र धर्मग्रन्थ वेदके विषयमें ग्राजके मतकी भूल दिखलाकर, कुछ बेस स्वंरूप - निरूपण करके अब हिन्दु धर्म - सनातन धर्मके आधार स्तम स्वरूप वर्ण - व्यवस्थाका निरूपण किया जाता है । सनातनधर्मका प्राधा ' यद्य स्तम्भ वर्ण - व्यवस्था एवं श्राश्रम व्यवस्था है । आज सनातन सम्यग प्रच्छन्नविरोधी उसी वर्णव्यवस्था पर अाक्रमण कर रहे हैं कि वामा भङ्ग हो जाने पर सनातनधर्मके अन्य सिद्धान्त भी गिर जाएंगे । वाले के फलस्वरूप वे वर्ण - व्यवस्थाको जन्मसे न मानकर गुणकर्मसे प्रचा नन्म स करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि केवल कर्म से वर्णको व्यवस्थित वर्ण - व्यवस्थाका नाश ही होगा — इसका विशदीकरण हम अन्य मु वह अ करेंगे । वे बताते हैं कि शास्त्रों में ब्राह्मण - प्रशंसापरक वचन बेस कवीर हुए भ गुणकर्म से बने हुए ब्राह्मणोंके लिए हैं; परन्तु उन्हें जानना चाहिये ॥ तन्तुव वेदादिशास्त्रोंके सिद्धान्तमें वर्णोंकी व्यवस्था जन्मसे हैं, गुणकर्म से नहीं कृताश्म गुणकर्मसे तो उस - उस वर्णकी स्वरूप - रक्षा वा यांदर - सम्मान होता दिया । जैसे कि - ' निरुक्त ' में कहा है- ' जानपदी विद्यातः पुरुषि भवति ।..भूयोविद्यः प्रशस्यो भवति ' ( १।१६।१० ) वर्णपरिवर्तन नई बन जा देखिये- उन्नति तो ठीक अच्छे गुणकर्म वाले भी भगवान् श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर त्रिष । त्रहे; ब्राह्मण नहीं बने । ' घृणी ( दयालुः ) ब्राह्मणरूपोसि कथं को साधार विशेषत जायथाः ' ( महाभारत - वनपर्व ३१।२० ) यह भीमसेनकी युधिष्ठिरके उक्ति है | ' ब्रह्मवर्चसी... पाण्डुनन्दनः ' ( उद्योगपर्व ( ३८ ) यह मा Gujarat. An eGangotri Initiative
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१६८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) युधिष्ठिरके लिए कह रहे हैं । यहां ब्राह्मण होनेकी योग्यतामें भी और ' युद्धे चाप्यपलायनम् ' ( गीता १८ । ४३ ) क्षत्रियधर्मविरुद्ध युद्धस्थलसे पलायन करने पर भी ( देखो - कर्णपर्व १३३८, ४६।२६ ). युधिष्ठिरको वस्था क्षत्रिय कहना शास्त्रके मत तथा उस समयके लोकमतमें जन्मसे वर्णं-व्यवस्थाको बताता है । इसी कारण भीष्म ने युधिष्ठिरको कहा था-धर्मके ' क्षत्रधर्मरतः पार्थ! पितृन् देवश्च तर्पय ' ( महा ० १३ ११ ) । छ इस प्रकार श्रीकृष्ण भगवान् के विषयमें भी जानना चाहिये । जैसे धार - स्वाम ‘ यद्ययं ( कृष्णः ) जगतः कर्ता यदैनं मूर्ख! मन्यसे । कस्माच ब्राह्मणं का आर सम्यग् श्रात्मानमवगच्छति ' ( सभापर्व ४२ | ६ ) यह वचन शिशुपालने नानकी युधिष्ठिरको कहा था कि- कृष्ण अपने आपको ब्राह्मण क्यों नहीं कहते कि इसे वा मानते? इससे स्पष्ट है कि — श्रीकृष्णने ब्राह्मणयोग्य गुणकर्मों एंगे । वाले होते हुए भी अपने श्रापको ब्राह्मण कभी नहीं कहा; क्योंकि - वे प्रचा तन्म से क्षत्रिय थे । दुष्कर्मा राक्षस भी रावण ब्राह्मण ही रहा क्योंकि थत का, वह ब्राह्मण - पुत्र ही था । श्राजकल के समयमें पुरुषोंसे महात्मा माने. अन्य हुए भी गान्धिजी वैश्य ही रहे, ब्राह्मण वर्ण में परिणत नहीं किये गये । चंचन चाहिये कबीर आदि अच्छे गुणकर्म वाले होते हुए भी सत्शूद्र के अन्तर्गत कर्म से तन्तुवाय ही माने गये, ब्राह्मण नहीं । यह ठीक भी है- ' छायामात्रमेणी-होता कृताश्मसु मणेस्तस्याश्मवैवोचिता ' चिन्तामणि पत्थरोंको भी मणि कर दिया करती है; फिर भी स्वयं वह पत्थर ही रहती है वा कही जाती पुरुषविशे है । यदि वह भी मणि बन जाय; वा कही जाय तो वह साधारण मणि वर्तन नई बन जाय, उसे कोई जाने ही नहीं । यदि कोई क्षत्रिय - वैश्य श्रत्यन्त उन्नति पा जाय; तो उसका सम्मान ब्राह्मणसे भी बढ़ जाता है — यह डर क्षत्रिय तो ठीक है । यदि वह ब्राह्मण बना दिया जायगा तो वह भी ब्राह्मणोंमें कथं साधारण हो जाएगा उसकी फिर कोई भी विशेषता नहीं रह सकती । के विशेषता उसकी उसी क्षत्रिय - वैश्यादि श्रपने वर्ण में रहनेसे ही होगी । धिष्ठिर यह धमा CC - 0. Anker Joshi वेदादिशास्त्रोंमें जन्मना वर्ण - व्यवस्था १६६ ' कल्याण ' परिवारके श्रीजयदयालजी गोयनका श्रीहनुमान्प्रसादजी पोहार आदि अपने वैश्य वर्णकी स्थितिमें भी प्रतिष्ठा पा रहे हैं । फलतः वर्णव्यवस्था जन्मसे ही है, गुणकर्मसे तो इस लोकमें लोकसम्मान और अग्रिम जन्ममें वर्णपरिवर्तन हुआ करता है । यदि वह वह वर्ण अपने नियत गुणकर्मोंसे युक्त हो; तब तो सुवर्णमं सुगन्ध का योग होता है | परधर्म तो भयावह ही माना गया है- ' श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ' ( भगवद्गीता ३।३५ ) हम इस विषय में कि वर्णव्यवस्था जन्मसे ही हुआ करती है कि - ' आलोक ' पाठकोंकी सेवामें वेदादि-शास्त्रोंका मत उपस्थित करते है । Collection Gujarat. ( १ ) इस विषयमें सबसे पूर्व ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् ' यह वेदमन्त्र जन्मसे वर्णव्यवस्था सिद्ध करनेमें उद्धरणयोग्य है; पर उसमें बहुवतव्य होनेसे उसे अग्रिम निबन्धके लिए रखकर ' सूचीकटाह ' न्यायसे पहले श्रन्य मन्त्रोंका उद्धरण दिया जाता है । ( २ ) ' श्रोम् - या ब्रह्मन्! ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम् श्रा राष्ट्र राजन्यः शूर इषच्योतिष्याधी महारथो जायताम् । दोग्ध्री धेनुर्वोढानड्वान् प्राशुः सप्तिः - ( यजुर्वेद वा ० सं ० २२ २२ ) यहाँ ब्राह्मणके लिए ब्रह्म-वर्चसकी और क्षत्रियके लिए शूरत्व यादिकी प्रार्थना थाई है । यदि वेदको वर्णव्यवस्था गुणकर्मसे इष्ट होती; तो ब्राह्मणके लिए ब्रह्मवर्चसको प्रार्थना उसमें न होती; क्योंकि तब वेदके मतमें ब्रह्मवर्चसयुक्तका हो नाम ब्राह्मण होता; ब्राह्मणके लिए ब्रह्मवर्चसकी प्रार्थना वा श्राशीः व्यर्थ होती । यह प्रार्थना ही यहां ब्राह्मणको जन्मजात सिद्ध कर रही है । ' ब्राह्मोऽजातो ' ( पा ० ६ | ४ | १७१ ) इस वेदाङ्गके सूत्र से अपत्य एवं जाति में ' ब्राह्मण ' शब्द होता है । अब अर्थ हुआ कि हे ब्रह्मन्! ब्राह्मण. An eGangotri Initiative
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१७. श्रीसनातनधर्मालीकः ( ४ ) ब्रह्मवर्चसी होवे, अथवा ब्रह्मन् ब्राह्मणमें ( सप्तम्या लुक् ) ब्रह्मवर्चसी, ब्राह्मण उत्पन्न होवे | इस प्रकार शूरतादि गुण वाले जिस किसीके भी ( गुणकर्मसे वर्णव्यवस्था मानने वालोंके अनुसार ) क्षत्रिय होने पर वेदमें ' राजन्यः शूरो जायताम् ' यह प्रार्थना व्यर्थ होती; क्योंकि - शूर-स्वादि गुण होनेसे तो उसकी पदवी वादीके मतमें क्षत्रिय हुई, फिर उसीके लिए ' शूर हो ' यह प्रार्थना कैसी? इससे सिद्ध है कि - वेद ब्राह्मण, क्षत्रियादिको जन्मसे मानता है, उसके लिए ब्रह्मवर्चस एवं शूरतादिको प्रार्थना कराता है । ' महाभाष्य ' में ' राजन्य ' शब्दके विषयमें कहा है- ' राज्ञोऽपत्ये जातिग्रहणं कर्तव्यम् राजन्यो नाम जातिः ' ( ४ | १ | १३७ ) यहां पर श्रीकैयटने कहा है- " राज ' शब्दः क्षत्रियशब्द- पर्यायः तेन क्षत्रियजातौ प्रतिपिपादयिषितायां ' राजन्य'-शब्द प्रयोगः ” । इस प्रकार ' मीमांसादर्शन ' ( २३।३ सूत्रके शाबरभाष्य ) में भी कहा है- ' क्षत्रियस्य राजसूयविधानाद्. राजा राजसूयेन यजेतेति । ननूक्तम्- ' यौगिको राजशब्द इति? एतदप्ययुक्तम् - यतो जातिवचन इति ।... त्रिये तु प्रत्यक्षं ( राजशब्दं ) प्रयुब्जानान् उपलभामहे,... तस्माज्ञातिवचनो राजशब्दः ' । उक्त मन्त्र में राजन्यशब्द होनेसे जन्म से चर्ण इष्ट है, नहीं तो शूर के शूर होने को प्रार्थना व्यर्थं होती । उक्त संहितामन्त्र पर ब्राह्मण भी है- ' ब्राह्मण एव ब्रह्मवर्चसं दधाति, तस्मात् पुरा ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जज्ञे ' ( शतपथ १३ | १६ | १ ) ' तद्धि एव ब्राह्मणेन एष्टव्यं यद् ब्रह्मवर्चसी स्यादिति ' ( शत ० १ | ६ | ३ | १६ ) ' राजन्य एव शौर्य महिमानं दधाति, तस्मात् पुरा राजन्यः शूर इपव्यो-तिव्याधी महात्यो जज्ञे ' ( शत ० १३ | १ | ६ | २ ' ' तस्मात् पुरा धेनुदग्धी जज्ञे ( ३ ) पुराऽनड्वान् वोढा जज्ञे ( ४ ) ' तस्मात् पुराऽश्वः सर्ता जज्ञे ' ( १३/१/६/२ ) इत्यादि । यहाँ पर ब्राह्मणका ब्रह्मवर्चसवाला होना, क्षत्रियका शूर आदि होना कहा है, ब्रह्मवर्चस वालेका ब्राह्मण होना और शूरका क्षत्रिय होना नहीं कहा, यह सूक्ष्म विचार कर लेना चाहिये । CC - 0. Ankur Joshi Collection वेदादिशास्त्रों में जन्मना वर्ण - व्यवस्था १७२ उक्त मन्त्र में ' ब्राह्मण ' का ' ब्रह्मवर्चसी ' और क्षत्रियके ' विधेय विशेषण हैं. इसलिए उन्हें विशेष्यसे पीछे डाला शु ' । यदि ' गया है तो यहां ‘ अविसृष्टविधेयांश ' दोष हो जाता । इससे स्पष्ट है कि वाचक ह वर्णव्यवस्था जन्मसे है । यदि यहां पर ' हे परमात्मन्! हमारे स्पष्टता ब्रह्मवर्चस वाले ब्राह्मण उत्पन्न हों और शूर क्षत्रिय पैदा हो ' यह भी मानी जावे, तथापि यदि जन्मना वर्णव्यवस्था न मानी बा ( ४ ) उनके यह विशेषण व्यर्थ हो जावें । यदि यहां पर ' ब्रह्मयचंस यात्र ब्राह्मण होता है; शूर ही क्षत्रिय होता है ' यह विपरीत श्रर्य किया वशा ' ( चह तो ठीक नहीं । पहले तो यह अर्थ यहां हो ही नहीं दूसरे सौ क्योंकि वैसे शब्द नहीं हैं । यदि विलष्ट कल्पनासे यहां वह अर्थ यह मत प्रकार माना भी जाय, तो ' दोग्ध्री धेनुः, वोढाऽनड्वान्, श्राशुः ब्राह्मणक ' जयिताम् ' यहां पर भी वही दोष प्राप्त होगा । तब तो जो दो श्रविद्वान ‘ दूध देने वाली हो वह ‘ धेनु ' हो जावेगी, तब तो ' आदि भी ' धेनु ' ( गाय ) हो जाएंगी । वोढा ( भार -मजदूर भी ' अनड्वान् ' ( बैल ) हो जायेंगे । शीघ्र भी सप्ति ( घोड़े ) हो जाएंगे, परन्तु यह टीक नहीं -मन्त्र से जन्मसे - वर्णव्यवस्था वेदको इष्ट है । ( ३ ) अन्य वेदमन्त्र यह है- ' विद्वांसं ब्राह्मणं से बकरी, भेद,.. व्यवस्था उठाने वाले है चलने वाले! । इस कारण पुण्यं लो एवं क्षत्रिय ( श्रच्छा ) । ( श्रथर्ववेद शोः चत्रिय सर * १३।३।१ ) यहां पर ब्राह्मणका विशेषण ' विद्वान ' दिया गया है । चीन के भी इससे श्रविद्वान् भी ब्राह्मण सिद्ध हो गया । नहीं तो यदि विद्य सिद्ध हुई केवल ब्राह्मण माना जावे, तो उसका ' विद्वान् ' विशेषण पुनरु ' व्यर्थ है । ' गुणवतो ब्राह्मणान् भोजयेत् ' ( मानवगृह्यसूत्र १1१६ । ): ( ६ ) ' पर ब्राह्मणका ' गुणवान् ' ' विशेषण देनेसे निर्गुण भी ब्राह्मण । ( ऋ ० शा होगा नहीं तो गुणकर्मसे ब्राह्मण होने पर उसका गुणवान् शि चतुष्टयका व्यर्थ है । क्योंकि विशेषणकी सार्थकता व्यभिचारमें ही हुआ है Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोक: ' ४ ) १४२ है श्रव्यभिचारमें नहीं, ' सम्भवन्यभिचाराभ्यां स्याद् विशेषणमर्थवत् ' गया है यदि ' ब्राह्मण ' शब्द विद्वान वा गुणवान्का ही वाचक होता, तो उक्त विशेषण कभी भी न दिये हमारे स्पष्टता अन्यत्र डॉ यह ( ४ ) इस नीज, याचेयुर्ब्राह्मण हासवा ' ( अथर्व ० वयं किया की जावेगी । विषय में अन्य वेदमन्त्र भी द्रष्टव्य गोपतिं वशाम् । श्रथैनं देवा शौ ० सं ० १२।४।२२ ) इसमें यह नाम अथवा पर्याय-जाते । उक्त न्यायकी है — ' यद् अन्ये तं ब्रुवन् एवं ह विदुषो बताया गया है कि-दूसरे सौ ब्राह्मण भी गायके स्वामीले गाय मांगें, परन्तु देवताओंका नहीं यह मत है कि वह गाय उन दूसरे ब्राह्मणोंकी नहीं, किन्तु वह अर्थ ब्राह्मणकी है । ' श्रन्ये ' ' विदुषः ' इन विशेषणोंसे ब्राह्मण विद्वान् तथा " श्राशुः विद्वान् भी सिद्ध होते हैं । तब अविद्वान्के भी ब्राह्मण सिद्ध हो 7 जो जाने से वेदके मतमें वर्णव्यस्था जन्मसे सिद्ध हुई । गुणकर्मसे वर्ण-व्यवस्था होने पर ' विद्वान ' ब्राह्मण कभी भी न होता । ने वाले ( ५ ) इसी प्रकार ' यत्र ब्रह्म च क्षत्रं च सम्यञ्चौ चरतः सह । तं स कारण ' पुण्यं लोकं प्रज्ञेषम् ' ( यजुः वा ० सं ०: ०२५ ) यहां पर वेदने ब्राहाण एवं क्षत्रियके थपने - अपने कर्मानुष्ठानमें निरत होने पर देशको पुण्य ( अच्छा माना है | यहां यह अर्थ निकल रहा है कि जहां पर ब्राह्मण-. वेदत्रय समीचीन ( अच्छे ) नहीं; वह देश श्रच्छा नहीं । यहां पर श्रसमी-जया है । चीन के भी ब्राह्मण क्षत्रिय बतानेसे बेदके मतमें जन्मना वर्ण - व्यवस्था दि विद्य सिद्ध हुई । कर्मणा होने पर ब्राह्मण श्रसमीचीन कभी न होता । य पुनरुक १ | १६ ||... ( ६ ) ' चत्वारि वाक्परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः ’ ० शा ० सं ० १ | १६४ । ४५ ) यहां पर ' मनीषी ' ब्राह्मणोंको ही वाणी-विशे तुष्टका ज्ञान बताकर श्रमनीषी ( अविद्वान् ) ब्राह्मण हुआ CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. वेदादिशास्त्रों में जन्मना वर्ण - व्यवस्था १७३ दिये गये, तब वेदको वर्णव्यवस्था जन्मसे दृष्ट हुई । इस प्रकार ' एक सद्विप्रा: ' ( अथर्ववेद ६ कारढके अन्तमें ) यहां ' सद्विप्राः ' शब्दसे ' असद्विप्र ' भी सिद्ध होगये । इस प्रकार ' वेदतत्त्वार्थविदुषे ब्राह्मणा-श्रोपपादयेत् ' ( मनु ० ३६६ ) इस विशेषणसे वेदतत्त्वार्थका विद्वान् ब्राह्मण भी सूचित किया गया है । इसीलिए ' भस्मीभूतेषु विप्रेषु ' ( ३/१७ ) यहां पर ' भस्मीभूत विप्र ' भी माना गया है । इसी प्रकार ' विद्यातपः- समृद्धेषु हुतं विप्रमुखाग्निपु ' ( मनु ० ३१८ ) यहां पर ढक् ' विशेषणसे विद्या- तपःसमृद्धिरहित ब्राह्मण भी सूचित किया गया है; नहीं तो ' सम्भव - व्यभिचाराभ्यां स्याद् विशेषणमर्थवत् ' इस न्यायसे वैसे विशेषणकी श्रावश्यकता नहीं थी । इसी कारण ' ब्राह्मणे चाननूचाने ' · ( मनु ० २।२४२ ) यहां पर अननूचान ( वेदाऽपाठी ) ब्राह्मण भी स्पष्ट स्वीकृत किया गया है । इससे यह मथितार्थं निकला कि - वेदादि-शास्त्रोंको ब्राह्मणादि वर्ण जन्मसे इष्ट है । विशेष कर्मोंमें वह जन्म--ब्राह्मण भी विद्वान् इष्ट है । इससे जन्मसे ब्राह्मण परन्तु विद्वान्का ग्रहण वेदादिको इष्ट नहीं । ( ७ ) राजा भोजकी यह घोषणा प्रसिद्ध है कि - ' विप्रोषि यो भवे-स पुरांद् बहिरस्तुं मे । कुम्भकारोपि यो विद्वान् स तिष्ठतु पुरे मम ' कई गुणकर्मसे वर्ण - व्यवस्था मानने वाले ब्राह्मण इस वचनसे बहुत प्रसन्न होते हैं कि - राजा भोजने मूर्ख ब्राह्मणको देश निकाला देने तथा विद्वान् कुम्हारको देश में रखनेकी घोषणा की थी और बड़े गर्वसे वे इस पद्यको उद्घृत करते हैं, पर इसीसे जन्मसे वर्ण - व्यवस्था सिद्ध होती है-यह वे नहीं विचारते | यहां पर श्रविद्वान्को भी ब्राह्मण माना गया है, विद्वानको भी कुम्हार ( शूद्र ) माना गया है । तभी तो ' कवयामि वयामि यामि ' कहने वाला विद्वान् जुलाहा भी राजा भोजेके राज्यमें शुद्ध ही रहा । हम यह कभी नहीं कहते कि ब्राह्मण निरक्षर ही रहें । हम तो कहते हैं कि - निरक्षर ब्राह्मण भी ब्राह्मण और साक्षर ब्राह्मण भी An eGangotri Initiative
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१७४ श्रीसनातनधर्मालांक: ( 8, ब्राह्मण । वर्ण - विचारसे दोनों ब्राह्मण हैं, उनमें एक ब्राहाण, और ' दूसरा शुद्ध नहीं । परन्तु साक्षर ब्राह्मण उत्तम ब्राह्मण है और निरक्षर ब्राह्मण साधारण वा निम्न ब्राह्मण है । इससे स्पष्ट है कि - वेदादिमें जहाँ ब्राह्मण कह । है, वहाँ जन्म ब्राह्मण ही दृष्ट है; हां, उस जन्म - ब्राहाणको उत्तम ब्राह्मण बनना चाहिये नहीं तो लोकदृष्टिमें उसका सम्मान न्यून होगा | यहां पर जन्म से त्राह्मण परन्तु विद्वान् वेदादिको ब्राह्मण इष्ट नहीं; यह स्पष्ट है | ( ८ ) ' महाभाष्य ' में ' तपः श्रुतं च योनिश्चेत्येतद् ब्राह्मण्यकारकम् । तपः श्रुताभ्यां यो हीनो जाति- ब्राह्मण एव सः ' ( २२६ ) यह पद्य उद्धृत किया गया है । यहाँ पर ब्राह्मणत्वमें तपस्या, अध्ययन तथा योनि I ( ब्राह्मणसे ब्राह्मणीमें जन्म ) यह तीन कारण बताये गये हैं । तपस्या arn अध्ययनसे हीन होने पर ब्राह्मणको शुद्ध नहीं कहा गया, किन्तु ' जाति -त्राह्मण ' कहा गया है । अब यहाँ विचारणीय यह है कि-ब्राह्मणत्वके तीन कारणोंमें मुख्य कारण कौनसा है? इस पर उत्तर यह है कि- तपस्या और अध्ययन तो ब्राह्मणमें भी सम्भव है; श्रतः ये दो कारण मुख्य वा अनिवार्य कारण सिद्ध न हुए; परन्तु ' योनि ' ( ब्राह्मण माता - पितासे जन्म ) श्रब्राह्मणमें असम्भव हैं, तब ब्राह्मणत्वका मुख्य कारण ' योनि ' ( ब्राह्मण माता - पिता से जन्म ) ही सिद्ध हुआ । तब तपस्या और श्रुत ( अध्ययन ) ब्राह्मणत्वके अलङ्कारक — अथवा यों कहना चाहिये कि- उत्कर्षमात्राधायक हुए, स्वरूपाधायक नहीं । जैसे कि-मनुजीने भी कहा है कि- ' विद्यातपोभ्यां भूतात्मा शुध्यति ' ( * १०६ ) यहाँ पर विद्या और तपस्याको श्रात्माका संस्कारक - श्रलङ्कारक कहा है | स्वरूपाधायक कारण योनि ( ब्राह्मणीमें ब्राह्मणसे जन्म ) ही सिद्ध हुधा । लक्षणमें स्वरूप ही दिखलाना पड़ता है, उत्कर्षापकर्ष नहीं । रत्नके लक्षण में ' कीटानुवेधादि - रहितत्वं ' नहीं कहना पड़ता, वह तो वेदादिशास्त्रोंमें जन्मना वर्ण - व्यवस्था १७६ उत्कर्षापकर्षम सहायक हो सकता है, स्वरूप निर्माणमें नहीं ही महाभाष्य में ' त्रीणि यस्यावदातानि योनिर्विद्या च कर्म । इस तो श्रात शिवे! विजानीहि ब्राह्मणाग्र्यस्य लक्षणम् ' ( ४ । १ । ४८ ) च । स्वीकार योनिसे ब्राह्मणत्व और विद्या एवं कर्म से ब्राह्मण की अग्रयता इस ( श्र ( 8 बताई है । इस प्रकार वर्ण - व्यवस्था जन्मसे सिद्ध हुई और लोक ब्राह्मणे गुणकर्मसे सिद्ध था । तब वेदादिमें कहा हुआ ' ब्राह्मण ' शब्द वेदको जाति परक ही सिद्ध हुआ । तभी वेद ( यजु ० २२ २२ ) ब्राह्मणके दर्शन ' ( ब्रह्मचर्चसकी प्रार्थना कराता है । प्रार्थना श्रप्राप्त वस्तुके लिए ही है रहितं ) क है, प्राप्त वस्तु के लिए नहीं । वेद किसी अन्य वर्णवाले को गई है । गुरु ब्राह्मण नहीं कहता । यदि वेदको गुणकर्मसे वर्ण - व्यवस्था इष्ट! ( ) १ तो वह ब्राह्मणके लिए ब्रह्मवर्चसकी प्रार्थना कदापि न कराता, क्योंकि बहिष्कु तब जो भी कोई पुरुष ब्रह्मवर्चससे ब्राह्मण हो जाता, फिर ब्राह्मणके श्रवस्थित ब्रह्मवर्चसकी प्रार्थना व्यर्थ थी । अतः यहां वेदको जन्मना वर्ण - व्यक काट दि इष्ट है यह हम पूर्व स्पष्ट कर चुके हैं । सकता । किया ग इसी कारण वेदमें ' ब्रह्म ( ब्राह्मणः ) असृज्यत ( सृष्ट: ). ( यः र राष्ट्रादस्म सं ० १४।२८ ) ' क्षत्रमसृज्यत ' ( १४।२६ ) ' शूद्राऽयों असृज्येताम् ' ( १४३ ) पद्यकाम यहां पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रकी सृष्टिमूलक उत्पत्ति कही । ब्राह्मणक है । चार वर्णोंके इस प्रकार उत्पत्तिमूलक सिद्ध होनेसे ' वर्ण व्यक सकता जन्म से सिद्ध हुई + ' महाभार योग्य हो ( १ ) ' गुरु ं वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम् । श्रातात्रि यहाँ भी मायान्तं हन्यादेवाविचारयन् ' ( मनु ० ८ ३५० ) इस प्रसिद्ध स सिद्ध पद्यको - जिसे कोई भी प्रक्षिप्त नहीं मानता - यहां पर ब्राह्म हुई ' विशेषण ' बहुश्रुत ' है । इससे ' अल्पश्रुत ' ब्राह्मण भी होता है- ( 9 सूचित होता है । इसके अतिरिक्त इस पच में श्राततायी ( क्रूरकर्मा ) । अन्य म भी ब्राह्मण स्वीकृत किया गया है । यदि वर्ण - व्यवस्था गुणकर्मसे पैतृमयम CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) १७६ श्राततायीको ब्राह्मण न कहा जाता; परन्तु श्राततायीको भी ब्राह्मणं करनेसे वर्ण - व्यवस्था जन्मंसे सिद्ध हुई । स्वीकार इस ( १० ) इसी प्रकार ' नाऽब्राह्मणे गुरौ शिष्यो वासमात्यन्तिकं वसेत् । ( श्रेण ब्राह्मणे चाननूचाने कांङ्ङ्क्षन् गतिमनुत्तमाम् ' ( मनु ० २।२४२ ) यहां पर - लोका वेदज्ञको भी श्रब्राह्मण, तथा वेदानभिज्ञको भी ब्राह्मण बताकर, ' न्याय-शब्द दर्शन ' ( १।२।१३ सूत्रके वात्स्यायनभाष्य में व्रात्य उपनयन - वेदाध्ययन-हाणके रहित ) को भी ब्राह्मण स्वीकृत करके जन्मना वर्ण - व्यवस्था सिद्ध की लिए ही गई है । को गुरु इष्ट ' ( ११ ) ' न जातु ब्राह्मणं हन्यात् सर्वपापेष्वपि स्थितम् । राष्ट्रानं ता, क्योंकि यहिष्कुर्यात् समग्रधनमक्षुतम् ८ ३८० ) इस मनुपद्यसे सब पार्यो में.. श्रवस्थित ब्राह्मणकों भी ब्राह्मण बताकर गुणकर्मणा वर्ण - व्यवस्था पत्तको एके वर्ण - व्य काट दिया गया है । इस पद्यको प्रक्षिप्त भी स्वीकृत नहीं किया जा सकता । यह मनुका पद्य प्राचीन नाटक ' मृच्छकटिक ' में भी स्मृत किया गया है, जैसे कि - ' श्रयं हि पातकी विप्रो न वध्यो मनुरब्रवीत् । ( यह राष्ट्रादस्मात्तु निर्वास्यो विभवैरक्षतैः सह ' ( ६३६ ) वेदमें भी उक्त मनु-मू ' ( ११३ पद्यका मूल कहा है— ' न ब्राह्मणो हिंसितव्यः ' ( अथर्व ० ५ १ ८ २६ ) यह पति कही । ब्राह्मणकी हिंसाका निषेध ब्राह्मणके हिंसायोग्य होने पर ही चरितार्थ हो वर्णय सकता है — ' प्राप्तौ सत्यां हि निषेधो भवति ' ।! इसका उदाहरण ' महाभारत ' में द्रौपदीके पुत्रोंको मारने वाला योग्य होने पर भी उक्त वेद तथा मनुवचन के श्रातता यहाँ भी श्राततायी के ब्राह्मण सिद्ध हो जानेसे प्रसिद्ध सिद्ध हुई । रा श्रश्वत्थामा है जो हिंसा-अनुसार नहीं मारा गया । वर्ण - व्यवस्था जन्म से ही ता है ( १२ ) वर्ण - व्यवस्था वेदको जन्मसे इष्ट है - इस विषय में एक क्रूरकमी ) । अन्य मन्त्र भी देख लेना चाहिये - ' ब्राह्मणमद्य दिदेयं पितृमन्तं कर्म से पैतृमत्यम् ( यजुः वा ० सं ० ७४६ ) मैं पितृमान् - प्रशस्त पिता वाले CC - 0. Ankur Joshi वेदादिशास्त्रों में जन्मना वर्ण - व्यवस्था १७७ ब्राह्मणको प्राप्त करू'यह मन्त्रका अर्थ है । यहां प्रशंसा श्रथमें मतुप् प्रत्यय है | इससे वेद मतमें भी उत्तम पिता वाले ब्राह्मणको प्रार्थना होने से वर्ण - व्यवस्था जन्मना सिद्ध हुई । गुणकर्मसे वर्ण व्यवस्था में तो पिताकी उत्तमताका विचार व्यर्थ है । यदि पिताकी उत्तमतासे पुत्रकी उत्तमता है, ( जैसा कि श्रीमनुजीने कहा है — ' अश्रोत्रियः पिता यस्य पुत्रः स्याद् वेदपारगः । अश्रोत्रियो वा पुत्रः स्यात् पिता स्याद् वेदपारगः ' ( ३।१३६ ) ज्यायांसमनयोविद्याद् यस्य स्यात् श्रोत्रियः पिता । मन्त्रसम्पूजनार्थं तु सत्कार मितरोऽर्हति ' ( १३७ ) यहां पर पिता में उत्त मंतासे पुत्रकी उत्तमता बताई गई है, अश्रोत्रिय भी पिताको शुद्ध नहीं कहा गया, असमान गुणकर्म वाले पिता - पुत्रके होने पर भी पुत्रका ' परिवर्तन नहीं कहा गया । ) तो पिताके ब्राह्मण होनेसे पुत्र भी ब्राह्मण सिद्ध हुआ । इसीलिए ' महाभारत ' में ' कुले जाताः सर्वधर्मोपपन्नाः । स्वाध्यायिनो ब्राह्मणाः ' ( उद्योगपर्यं ३० | ७ ) कुलजात ही ब्राह्मण कहे गये हैं । ' हारीतस्मृति ' में भी कहा गया है— ' ब्राह्मण्यां ब्राह्मणेनैव ह्युत्पन्नो ब्राह्मणः स्मृतः ' ( १।१५ ) श्रशनस स्मृतिमें भी कहा है— " शूद्रादेव तु शूद्रायां जात: शूद्र इति स्मृतः ' ( ४८ ) । मनुस्मृतिमें भी ' कहा है- ' सर्ववर्णेषु तुल्यासु पत्नीध्वक्षतयोनिषु । श्रानुलोम्येन सम्भूता जात्या ज्ञेयास्त एव ते ' ( १०११ ) । यहां पर ब्राह्मण माता - पितासे उत्पन्नको ही ब्राह्मण कहकर वर्ण - व्यवस्था जन्मसे सिद्ध कर दी गई है । ( १२ ) ' यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः । ब्रह्मराजन्याभ्य 15 शूद्राय चार्याय च ' ( शुक्लयजुः वा ० सं ० २६/२ ) इस मन्त्रसे जो Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१७ = श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ). लोग शूद्रादिको वेदका अधिकार देते हैं; [ यद्यपि यह अर्थ ठीक नहीं, इसकी मीमांसा हम ' श्रीसनातनधर्मालोकः * तृतीय पुष्पमें सम्यक्तया कर चुके हैं, पाठकगण उसे उसीमें देखें ] उनके अनुसार परमात्माको वर्ण-व्यवस्था जन्मसे श्रभिमत है, गुणकर्मसे नहीं । इसमें विस्तार तो पाठकगण तृतीय पुष्पमें देखें । दिङ्मात्र यहां भी लिख देते हैं । — उक्त अर्थकर्ता पूर्णज्ञानीको ब्राह्मण मानते हैं, मानते हैं । यहां प्रष्टव्य यह है कि परमात्माने जिस वेद पढ़ाया था — वह ब्राह्मण या शूद्र जन्मसे या वा गुणकर्मसे, तो पूर्ण ज्ञानी ब्राह्मणको परमात्माने वेद वेद पढ़ाने से सिद्ध हुआ कि वह ब्राह्मण पूर्ण ज्ञानी अज्ञानी वा साधारण ज्ञानी था । यदि वह अज्ञानी था; तब वह गुणकर्मानुसार ब्राह्मण कैसे हुआ? वह सिद्ध हुआ । यदि यहां शूद्ध गुणकर्मसे था, अर्थात् जो पढ़नेसे सर्वथा मूर्खको शुद्ध ब्राह्मण वा शुद्रको गुणकर्मसे? यदि कैसे पढ़ाया? उसे नहीं था; किन्तु वा अपूर्ण ज्ञानी जन्म से ही ब्राह्मण भी कुछ ज्ञान प्राप्त न कर सके वह शुद्ध है— तो परमात्माने शूद्रको वेद पढ़ाया ही कैसे? वैसे को तो पढ़ाना ही व्यर्थ है । पढ़ाया हुआ भी तो वह शुद्ध ही रहा । चारों वर्णोंको तुल्यतासे वेद पढ़ाया गया. तथापि सभी ब्राह्मण न बने, वैसेके वैसे जन्मसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और श्रन्त्यज ही रहे । तब या तो वादीके ईश्वरके पढ़ानेको शैली ही अच्छी इस तृतीय पुष्पको पाठक हमसे मंगा सकते हैं । मूल्य ३ ) । " वेदादिशास्त्रोंमें जन्मना वर्ण - व्यवस्था नहीं थी; जो कि उसके पढ़ानेसे सभी ब्राह्मण न यन सक ईश्वरने जान - बूझकर सभीको समतासे नहीं पढ़ाया । किं व्यवस्था जन्मसे ही इष्ट थी, तभी श्रपर्ण भी वह पढ़ाता था और शूद्धको बसा नहीं शूद्र ही रहा । यदि वह उसे पढाता; तो वा उसे विद्या वाले जन्म वाह -पढ़ाता था जिससे वह वह गुणकर्मानुसार: ग्र रहता । इस प्रकार व व्यवस्था परमात्माको जन्म से अभिमत हुई । यदि वर्ण गुणकर्मानुसार होता, तो पढ़ानेसे पूर्व वे किस न थे - यह वह न जान सकता । परन्तु उक्त वेदमन्त्रमें वेदाध्ययनसे । ही उन्हें ब्राह्मण, शूद्रादि कहा है, तब वर्ण - व्यवस्था इस वेदमन्त्र V सं ० १ जन्मसे ही सिद्ध हुई । 1 ' अब हम ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् ' मन्त्रसे: व्यवस्थ जन्मना वर्ण - व्यवस्था सिद्ध होती है — यह और ग बताते हैं । भी । • तनधर्मी परमा तव त्रा वाले य शब्द है? उक्त म ऊरू, उच्येते मन्त्र ह तथापि CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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सके वा - उसे ( ७ ) ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( क ) नन्म - माहार से वह सार गृह भिमत है किस व ध्ययनसे । [ जन्मना वर्णैव्यवस्था ( १ ) ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् बाहू ऊरू ( मध्यं ) तदस्य यद् वैश्यः पद्म या ( यजुः वा ० सं ० ३१।११, अथर्व ० शौ ० सं ० ] राजन्यः कृतः । शूद्रो अजायत ' १६६६, ऋ ० शा ० / सं ० १०।१०।१२ ) यह प्रसिद्ध मन्त्र है । इसी मन्त्रको जन्सना वर्ण-.. दमन्त्र व्यवस्था मानने वाले सनातनधर्मी भी अपनी पक्षपुष्टिकेलिए देते हैं, मन्त्र से औरं गुणकर्मणा वर्णव्यवस्था मानने वाले श्रार्यसमाजी एवं सुधारक भी । तब इस मन्त्रके अर्थमें विवाद स्वाभाविक ही है । उसमें सना-· तनधर्मी इस मन्त्रका अर्थ इस प्रकार करते हैं कि- सृष्टिकी श्रादिमें परमात्माने अपने मुख आदि श्रङ्गोंसे ब्राह्मण आदिको उत्पादित किया, तव ब्राह्मणत्व यादिकी व्यवस्था जन्मसे सिद्ध हुई । परन्तु दूसरे पक्ष वाले यह नहीं मानते । वे कहते हैं कि- “ मन्त्र में स्थित मुख श्रादि शब्द प्रथमान्त हैं, तब उनसे पञ्चमी विभक्तिका अर्थ कैसे हो सकता है? और वैसा अर्थ जहां असम्भव है, वहाँ प्रकरण - विरुद्ध भी है । उक्त मन्त्रसे पूर्व मन्त्रमें प्रश्न है कि उस विराट् पुरुषके र्मुख, बाहु, ऊरू, पाद कौन से हैं - ' मुखं किमस्यासीत्, किं बाहू, किमूरू पादौ-' उच्येते ' ( यजुः ३१।१० ) । उसके उत्तर में ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' यह मन्त्र है । यहां यद्यपि ब्राह्मण श्रादिका मुख होना भी असम्भव है; तथापि वे मुखादिरूप है — यह श्राशय है । तब उक्त मन्त्रमें मुखादिका पञ्चमका अर्थ करना निर्मूल है । " CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( क ) १८१ ( २ ) यद्यपि इस मन्त्रके अर्थमें इस प्रकार बिरुद्ध सत मिलते हैं, तथापि एक ऐसा मार्ग भी है जिससे उक्त मन्त्र समन्वयको प्राप्त हो जावे । वह यह है कि उक्त मन्त्रमें ' मुखं, याहू, करू ' यह पद प्रथमान्त हैं, ' पद्धयाम् ' यह उपसंहारका पद पञ्चम्यन्त्र है । तब विभूतिव्यत्यय दोनों स्थान करना पड़ेगा । यदि सनातनधर्मी उपसंहारके ' पद यां ' पदको पञ्चम्यन्तता के अनुरोधसे मुख, बाहु, ऊरु पदको पञ्चम्यन्त करते हैं, तो बादी भी ' पद्म याम् ' इस पञ्चम्यन्त पदको प्रयमान्ततामें विपरि-यमित करते हैं । तब यदि विभक्तिव्यत्यय एक स्थानमें दूषण है, तो दूसरे स्थलमें भी दूषण है । यदि समन्वयकी दृष्टिसे दोनों विमकियोंकी योजना स्वीकृत कर ली जावे, जैसा कि उक्त मन्त्र स्वयं ही संकेतित कर रहा है तब सम्पूर्ण विवाद शान्त हो जावे । वेद यहां स्वयं सूचित कर रहा है कि - पहले उपसंहारके पञ्चमीः विभक्तिवाले पदके अनुरोधसे और उससे उत्पत्तिपरक श्रर्थं अनुरोधसे उपसंहारके पढ़को दोनों ही अर्थ वेदाभीष्ट हैं । सर्वया निर्मूलताकी आशङ्का पक्षको सिद्ध करते हैं, उनके अपने पक्ष को सिद्ध करते हैं । चारों पदोंको पञ्चम्पन्त बनाना चाहिये करना चाहिये । फिर पहले तीन पदों... भी प्रथमान्त बनाकर अर्थ करना चाहिये, परन्तु जो श्राग्रही लोग पञ्चम्यन्त में करते हैं, उनके सामने भी हम अपने इस अभीष्ट प्रथमा विभक्तिके योजनापक्षसे भी पहले पञ्चम्यन्त अर्यमें प्रमाण एवम् उप-पत्तियों देखनी चाहिये - जिससे वादियोंके सब आक्षेप परिहृत होंगे । ( ३ ) ‘ ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद् वैश्यः पभ्द्याँ शूद्रो अजायत ' ( यजुः ३१ | ११ ) इस मन्त्रमें ' पभ्द्यां शूद्र श्रजायतः । यह उपसंहारवाक्य पञ्चम्यन्त है; उसके श्रागेके वाक्य ' चन्द्रमा मनसो जातः, चक्षोः सूर्यो अजायत । श्रोत्राद् वायुश्चं प्राणश्च, मुखाद् अग्निरजायत ' ( यजुः ३१।१२ ) ' नाभ्या श्रासीद् श्रन्तरित An eGangotri Initiative
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१८२ श्रीसनातनधर्माल्लोकः ( ४ ) शोणों द्यौः समवर्तत । पद्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात् तथा लोकान् अकल्पयन् * ( ३१।१३ ) यह मन्त्र भी पञ्चम्यन्त हैं, इससे स्पष्ट है कि-‘ ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' में भी पञ्चमीका ही अर्थ है; और प्रकरणवश भी परमात्माके उन - उन श्रङ्गसे ब्राह्मणादिकी उत्पत्ति बताई गई है । मीमांसाका सन्दिग्धार्थं - निरूपणाधिकरण न्याय भी यही बताता है कि-उपसंहारके वाक्यके अनुरोधसे पूर्व वाक्योंकी भी योजना वा व्यवस्था करनी चाहिये । इस प्रकार जब यहां परमात्मासे उत्पादित सृष्टिका ही इस सुतके मन्त्रोंमें प्रकरण है; तब वादिगणसम्मत वर्ण व्यवस्थाका गन्ध यहां कैसे हो सकता है? इसके अतिरिक्त यहां परमात्माकै अङ्गीका भी स्पष्ट वर्णन है, तब उसके साकार सिद्ध होनेसे भी वांदियोंके पक्षकी हानि ही है । उक्त मन्त्रमें ब्राह्मण आदि वर्णोंकी उत्पत्ति - मूलकता दिखलाई गई है, गुणकर्म - मूलकता नहीं - इस बातकों हम पूर्वोत्तर - प्रसङ्गकी सङ्गतिसें तथा ' इतिहास - पुराणाभ्यां वेदार्थमुप हयेत् । विंमैत्यल्पश्रुताद् * कई महाशय इस स्थलमें ' अकल्पयन् ' पद देखकर वर्णों की कल्पना श्रर्थं मानते हैं, उत्पत्ति नहीं; पर यह ठीक नहीं । यहाँ ' कृ सामर्थ्ये ' भ्वा ० आ ० वे ० ) धातु है, उसका एतदादि स्थान में ' कृतवन्तः उत्पादितवन्तः यही अर्थ प्रकरणानुगृहीत है, जैसे- ' पतिंवरा क्लृप्त ( कृत ) विवाहवेषा ' ( रघुवंश ६।१० ) इत्यादिमें । सुधारकोंके दादागुरु स्वां ० ८० जीने भी उत्पत्तिका ही अर्थ किया है । ' सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्व-मकल्पयत् ' ( ऋ ० १०।१६०१३ ) यहां भी ' अकल्पयत् ' का अर्थ ' उत्पन्न किया ' यही वेदको इष्ट है । ' लोकान् श्रकल्पयन् ' ( यजुः ३१।१३ ) यहां ' अकल्पयन् ' यह क्रिया है । इससे पूर्व ' समवर्तत, आसीत्, श्रज्ञायत ' इत्यादि क्रियाएँ हैं । इससे उत्पत्तिका अर्थ यहां वेदको इष्ट हैं; तब वाटीका कथन ठीक नहीं । CC - 0. Ankur Joshi Collection ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( क ) १८४ वेदो मामयं प्रहरिष्यति ' ( महाभा ० श्रादिपर्व ११२६७ स्मृति, पुराण, इतिहास श्रादिकी साक्षीसे दिखलाते हैं- ) इस सा मनुव जातियां ( ४ ) ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् ' यह मन्त्र वेदके पुरुषसूक्तका वृत्तों में प यह तो प्रसिद्ध ही है । उसी सूक्तके ' सहस्रशीर्षा ' ( ३१।१ ) इस जन्तुओं मन्त्र में पुरुष ( परमात्मा ) को प्रस्तुत करके पहले उसका सारी को वैश्य, श ब्यापक होना कहा है, फिर ‘ श्रत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ' ( ३३ | १ ) सामान्य उसे सृष्टिकी अपेक्षा महत्तर ( बड़ा ) दिखलाकर ' ततो विराट ( ११ सम · ( ३१।५ ) इस मंन्त्रमें उस पुरुष ( परमात्मा ) से विराट् ( ब्रह्मास ) । ' ब्राह्मणो उत्पत्ति दिखलाई गई है । इस प्रकार उक्त सूक्त में सृष्टिको उपि ही बता चर्णन ही प्रकृत ( चालू ) है | आगे भी भूमि और शरीरकी ( ५ ) तथा ग्राम्य पशुओंोंकी उत्पत्ति ( ६ ), ऋग्वेद आदि वेदोंकी उत्पति और अश्वादिकी सृष्टि ( 7 ) बताई गई है । फिर उसी पुरुष ( परमार मुखमा के मनसे चन्द्रमा, थांखसे सूर्य, मुखसे अग्नि ( १२ ) आदि देवताओं मुख उत्पत्ति बताई गई है । इसमें पुरुष सूक्तस्थ जातः ( १२ ) श्रजायत ( सकता ' जज्ञिरे ( ७ ) इत्यादि क्रियाओंकी साक्षी प्रत्यक्ष है; और फिर यह दे इस प्रकृ एवं वेदादिकी सृष्टि मानवके द्वारा भी नहीं मानी जा सकती, अन्य भान्ति ( कार्य ) व वैद भी पौरुषेय हो जाएं और सूर्य आदि देवताओंकी सृष्टि भी मान घृतं हो जाय – पर यह अनिष्ट एवम् असम्भव है, अत: यहां ' पुरुष ': मानकर ' मानव ' इष्ट नहीं, किन्तु वह परम पुरुष ( परमात्मा ) ही इष्ट है, बां ० १४ देवता एवं वेदादिकी भान्ति पुरुष सूक्तके ' ब्राह्मणोस्य मुखमास वैसे ही ' मन्त्रमें वर्णित ब्राह्मणादिकी उत्पत्ति भी उसी परमपुरुष से इए उससे उ मानव के द्वारा नहीं । जैसे कि स्वा ० दयानन्दजी द्वारा भी इस बाद भाष्य में • उनके प्रसिद्ध ग्रन्थ ' सत्यार्थ प्रकाश ' में स्वीकार किया गया है- ' च ' दर्शयति ' ( प्रश्न ) जातिभेद ईश्वरकृत है या मनुष्यकृत? ( उत्तर ) ईस चतुर्वेदश । ( प्र ० ) कौनसा ईश्वरकृत और Gujarat. An eGangotri.Initiative