सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 91–100
सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 91–100
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Pyy श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ' रेवती ) ६ ' श्राख्याविक ', पृष्ठ ३६१ में स्वामीजीने इसी सूत्र के ' ऋषि ' शब्दके लिए ' लिखा है- ' ऋषिवंद. ' । रेवती रेक ना चाहिये, भाष्यकारने जगत् के सभी पदार्थोंको चेतनसिद्ध करनेके लिये ३।१।७ स्पष्ट है । सूत्र के भाष्य में वेदका एक प्रमाण दिया है - ' ऋषिः ( वेद इति कैयटः ) ठक संदेश पठति - शृणोत ग्रावाणः श्रीपाणिनिको भी ' तप्तनपूतनयनाश्च ' ( ७।१।४५ ) इस वैदिक सूत्रमें यही प्रयोग इष्ट है । ' भीमांसादर्शन ' के मन्त्रभाग प्रामाण्याधिकरण में ' चेतनेऽर्थबन्धनात् ' ( १ | २ | ३५ ) सूत्रके कर ' योनि भाष्यमें भी यही मन्त्र उद्धृत किया गया है; परंतु यह शुक्ल यजुर्वेदमं वेदमन्त्र नहीं मिलता । उसकी ' बाजसनेयी संहिता ' में ' श्रोता ग्रावाणः ' 1 माया ( ६।२६ ) मिला है, ' शृणोत ' इत्यादि नहीं । यद्यपि ' शृणोत, श्रोता ' दिये? आदि में श्रर्थमेव यो नहीं, पर शब्दभेद तो है । शब्दभेद ही तो संहिताः इससे स भेद है । अर्थ रूप से दोनों ही वेद हैं । ' श्रृणोत ग्राबाणः ' ग्रह कृष्ण-ड हैं, के यजुर्वेद तैत्तिरीय संहिता ( १।३।१३ | १ ) में है; तब यह भी वेदज्ञ नहीं । भाष्यकारके मतसें वेद ( ऋषि ) सिद्ध हुआ । इसकी वेदत्वसिद्धि से. संहिताएं चारों वेद सिद्ध हुई । तो नहीं उदाहस शाखाओं के वेदत्व में ब्राह्मणभागकी साक्षी । यह निवन ( १५ ) ब्राह्मणभाग भी ' तस्याद् एतद् ऋषिणा श्रभ्यनूक्तम् ' कह संहिताएँ । कर ' ऋषि ' शब्द से मन्त्रभागको स्मरण करता है, यह भी वेदज्ञ विद्वानों भीभा से तिरोहित नहीं । श्रव उसका भी एक प्रमाण देखना चाहिये । ' शतपथ ब्राह्मण ' में थाया है - ' तस्माद् एतद् ऋषिणा श्रभ्यनूक्तम् -रखने व हैं । ' दध्यङ् ह यन्मधु +++ इत्यादि । ( १४/११/२५ ) यहाँ पर ब्राह्मणने ते ऋग्वेद शाकल संहिता ' ( १ / ११६११२ ) के इस मन्त्रको ' ऋषि ' ( मन्त्र-सन्धिि' भागात्मक वेद वन माना है । इसी प्रकार ' शतपथ ' ने अन्यत्र ' ऋषि कहा है- ' तदाहुः - मनो देवा मनुष्यस्य श्राजानन्ति इति । मनसा नादि की CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. श्रीपतञ्जलि एवं ' शन्नोदेवीरभिष्टये ' १४५ सङ्कल्पयति, तत् प्राणमभिपद्यते, प्राणो वातं, बातो देवेभ्य श्राचष्टे यथा पुरुषस्य मनः ' ( ३ | ४ | २ | ६ ) यहां पर ' देवता लोग मनुष्यका मन जान जाते हैं ' ऐसा कहा है । इस विषय में ब्राह्मणभाग, मन्त्रभागकी साक्षी पूर्णकी भान्ति ' ऋषि ' शब्दसे दिखलाता है | जैसे कि - तस्माद् एतद् ऋषिणा ग्रभ्यनूक्तम् ' मनसा संकल्पयति, तद् वातमभिगच्छति । वातो देवेभ्य श्राचष्टे यथा पुरुष! ते मनः ' ( शत ० ३२४ | २ | ७ ) यह पूर्ण मन्त्र जो शतपथने उद्धृत किया है, देखना चाहिये कि यह किस वेद संहिताका है? ' ऋषि ' शब्द दोनों स्थलोंमें समानार्थक है - यह तो स्पष्ट ही है । यदि ' मनसा संकल्पयति, तद् देवाँ श्रपि गच्छति ' ( १२ | ४ | ३१ ) इस ' शौनक श्रथर्ववेद संहिता ' का मन्त्र ही शतपथको इष्ट माना जावे; तो यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि दोनोंमें महान् अन्तर है । ' शतपथ ' में पाठ है - ' तद् वातमभिगच्छति ', पर ' शौनकसंहिता ' में पाठ है- ' तद् देवाँ अपि गच्छति ' । ' ब्राह्मण ' में जो उत्तरार्धं है, संहिता में वह है ही नहीं । वहाँ तो ' ततो ह ब्रह्माणो वशामुप-यन्ति याचितुम् ' यह उत्तरार्ध है । श्रतः स्पष्ट है कि शतपथको यहाँ किसी अन्य वेद संहिता का पूर्ण मन्त्र इष्ट है, वह मन्त्र पूर्ण प्रतीत हो भी रहा है । जिस संहितानें वह पूर्ण मन्त्र मिलेगा, वह ब्राह्मणके मतमें वेद ( ऋषि ) होगा । उस शाकल, वाजसनेय, कौथुम, शौनक-' हितासे मित्र संहिताकी वेदत्व सिद्धि होने पर सभी ११३१ संहिताएँ वेद सिद्ध होंगी । यदि ऐसा न माना जावे, तो ' शतपथ ' के मतमें उस मन्त्रसे होन, वादिसम्मत अथर्ववेद संहिता ' मानुष ' हो जायगी कि किसी मनुष्यने उसका पाठ परिवर्तन कर दिया । यदि वादिगण ऐसा नहीं मानते; वो फिर उन्हें सारी संहिताएँ वेद माननी पड़ेंगी । हमारा यह पक्ष मानने पर कोई अव्यवस्था न रहेगी । उससे सभी An eGangotri Initiative
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१४६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ११३१ संहिताएं चार वेद हो जाएँगी, जैसा कि श्रार्षमत है । उन संहिताथोंमें किसी भी संहिताका स्वकुलशाखाववश अथवा ' स्वस्य च प्रियमात्मनः ' ( मेनु ० २।१२ ) के अनुसार वेदके नामसे उद्धरण दिया जा सकता है | शाखाओं के वेदत्व में निरुक्तकारकी साक्षी ( १६ ) इसी प्रकारका ' निरुक्त ' का भी एक उदाहरण देख लेना चाहिये, क्योंकि पाणिनि, कात्यायन, पतन्जलि, शतपथप्रवक्ता श्रीयाज्ञ-वल्क्य तथा निरुक्तप्रणेता श्रीयास्क यादि वेदस्वरूपज्ञ तथा वादि-प्रतिवादि - सम्मत हैं । मन्त्रभागकी निरर्थकता - सार्थकता प्रकरणमें, मन्त्रभागको एक मन्त्र श्राया है - ' श्रोषधे! त्रायस्वैनम् ' ( free ( १।११६ ) यही मन्त्र ' मीमांसादर्शन ' ( १/२/३५: श्रादिमें भी उद्घृत किया गया है, पर शुक्लयजुर्वेद काण्वसंहिता ( ४: २, ५५४, ६।२० ) में ' श्रोषधे! त्रायस्व ' के साथ ' एनम् ' नहीं आया । इसी भान्ति शुक्ल-यजुर्वेद वाजसनेय संहिता ( ४११, ११४२, ६।१५ ) में भी ' काएव ' की ' वरह ' त्रायस्व ' के आगे ' एनं ' पाठ नहीं है । यदि चादिप्रतिवादि सम्प्रतिपन्न श्रीयास्क केवल वाजसनेयी संहिता. को ही ' यजुर्वेद ' मानने वाले हैं और मन्त्रभागको नियतानुपूर्वीक, तथा नियतपद - प्रयोगपरिपाटीक मानने वाले हैं; तो उन्होंने ' नायस्थ ' के ' आगे ' एनं ' डालकर क्यों वेद संहिताको ' मानुषी ' कर दिया? श्रथवा दूसरेके किये हुए परिवर्धनको कैसे मन्त्रभाग मान लिया? _ वस्तुतः बात यह है कि यह श्रीवास्कने स्वयं परिवर्धन नहीं दिया, किन्तु उन्होंने इसे ' कृष्णयजुर्वेद संहिता ' का ही प्रमाण माना है और उसे ' मन्त्रभाग ' स्वीकृत किया है; अन्यथा वे एतदादिक मन्त्रोंको ' वेद ' बताकर ' मन्त्रभाग ' को अनर्थकता हटा देते; पर श्रीयास्कने CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीपतन्जलि एवं ' शन्नोदेवीरभिष्टये ' १४ ऐसा न करके उन्हें ‘ मंन्त्रभाग ' स्वीकृत करके उनके दोषोंका किया है । अतः स्पष्ट है कि वे भी ११३१ संहिताको उद १ । मानते हैं । समय - समय पर स्वकुलसंहिता के मन्त्र भी चार १ उद्धृत जा करते हैं । अन्य संहिताओंोंकी भी ' ऋचा ' मानते हैं । उ ‘ त्रायस्व ' के आगे ‘ एनं ' कृष्णयजुर्वेद काठक संहिता ' ( २ तथा मैत्रायणी कृ ० यजुर्वेद सं ० ( ११२२, १२ १०, १२ ११०, ३।६६- ११ तथा तैत्तिरीय यजुर्वेद सं ० ( १/२/१/१, १३२ । १ ) आदिमें आया है सि * श्रीयास्क उसे बड़े स्पष्ट रूपसे ' वेद ' मान रहे हैं - यह प्रत्यक्ष है । '. कोई ऋचा उद्धृत करते हुए श्रीयास्क ' शाकल्य ' सहिता ' । वर्तमान " प्रचलित ऋग्वेद संहिता ) की वैसा ऋचा होते हुए भी उस ' ऋ को, उद्धृत न करके ‘ मैत्रायणी ' श्रादि संहिताओंकी ऋचा भी " कर दिया करते हैं । श्रीयास्कको ' वेद ' भाष्यकर्ता वादी - प्रतिवाद में दोनों ही श्राप्त मानते हैं! एक - दो उदाहरण विद्वान् पाठकगण इसे प भी देख लें । प चे ' वनस्पति ' का निगम देते हुए श्रीयास्क कहते हैं— ' तस्यैषा प्रण भवति ' ( ८ | २०११ ) यहां पर ' अपरा ' शब्द से श्रीयास्कको प्रधान स्तुति वाली‘ऋक् ' इष्ट है । वह ऋक् श्रीयास्कने इस प्रकार लिखी है-" वनस्पते! रशनया नियूय पिष्टतमया वयुनानि विद्वान् । वहा देव दिधिषो हवींषि च दातारममृतेषु वोचः । पर यही ऋचा ' शाच क ऋग्वेद संहिता ' में इस प्रकार आई है- ' वनस्पते रशनया निया उ देवानां पाथ उपवंक्षि विद्वान् । स्वदाति देवः कृणवद् हवींषि श्र द्यावापृच्विी हवं मे ' ( १० / ७०।१० ) । पाठकोंने देख लिया होगा कि इनमें परस्पर कितना अन्तर सं श्रथ यदि ' यथैवर्चानूक्तमेव श्रनुम्र याद होतारं विश्वदेदसम् ' ( शतः पद Gujarat. An eGangotri Initiative
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१४८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) १/४/१/३३ ) इस कण्डिक के अनुसार ' ऋचा ' ( शा ० ऋ ० सं ० १४४/७ ) को ही श्रीभगवद्दत्तजी श्रादिके अनुसार मूल ' वेद ' कहा जाबे, तो यास्कल्लिखित ‘ ऋचा ’ ' ऋचा ' ( मूलवेद ) न रहेगी । यदि उसे ही ' ऋचा ' माना जावे; तो ऋ ० शा ० सं ० की ऋचा ' ऋक् ' ( मूलवेद ) न रहेगी । यदि दोनों को ही मूलवेद माना जावे; तो सभी ११३१ संहिताओंको ‘ चार वेद ' मानना पड़ेगा । यह हमारा ही पक्ष सिद्ध होगा । यही निरुक्त- प्रदर्शित ' ऋचा ' कुछ थोडेसे भेदसे कृष्णयजुर्वेद मैत्रायणी संहिता ( ४।१३।६५ ) में मिलती है । ' निरुक्त ' में ' दिधिषो ’ पाठ है और मैत्रायणी में ' दधिपो ' पाठ है । यदि इतने ही भेदसे मैत्रायणीके मन्त्रको ‘ ऋक् ' न कहा जावे; तो शा ० ऋ ० सं ० ( १०।१८८ ) में ' दिधिषोः ' पाठ है, और शौ ० अथर्व ० सं ० में ' दधिषोः ' ( १८।३।२ ) पाठ है, तो इनमें अन्य्तरको ' ऋकू ' अथवा ' मूलबेद ' न मानना पड़ेगा । पर यह वादियोंको भी अनिष्ट है; अतः स्पष्ट है कि सब ११३१ संहिता वेद हैं । ( १७ ) निरुक्तकार वेदज्ञ थे, वेदके स्वरूपको जानने वाले थे, यह यात वादि - प्रतिवादि - सम्मत है । उनकी प्रवृत्ति यह भी बताती है कि चं भी अपनी कुल परम्पराकी संहिताके मुकाबिलेमें दूसरी संहिताको कभी - कभी मानुषी जैसी समझने लग जाते हैं । इस विषयका उनका उदाहरण भी पाठकगण देखें । वे लिखते हैं कि - ' वने न वायो न्यधायि चाकन् ' वायः – वेः पुत्रः ' यह कहकर वे शाकल ऋग्वेद संहिता ' जिसे श्राज ऋग्वेद कहा जाता है- की त्रुटि दिखलाते हैं— ' वा इति य इति च चकार शाकल्यः ' ( ३२८३ ) अर्थात् शाकल्यने अपनी संहिता में ' वाय ' इस एक पदको ' वा ' ' यः ' इस प्रकार काटकर दो पद बना दिये – यह कहकर वे उसका खण्डन करते हैं— ' उदात्तं CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीपतन्जलि एवं ' शन्नोदेवीरभिष्टये ' १४६ स्वमाख्यातमभविष्यत् श्रसुसमाप्तश्च श्रर्थः ( ६२८३ ) इससे स्पष्ट है कि वे उस ' ऋग्वेद संहिता ' को मूलवेद मानते थे, जिसमें ' वायः ' एक पद था । श्रव श्राजकलकी शाकल्य ऋग्वेदसंहिता देखनी चाहिये, जिसे आजकल वेद तथा अपौरुषेय माना जाता है । अजमेर वैदिकयन्त्रालय की छपी हुई ' ऋग्वेदसंहिता ' ( पुराने संस्करण ) के ५६० पृष्ठमें १८।२६।१ स्थल में उक्त मन्त्र है, उसमें ' वा ' ' यः ' इस प्रकार भिन्न - भिन्न दो पद हैं, तब वादियों अभिमत के अनुसार यह संहिता शाकल्यकी कृति और पौरुषेय माननी पड़ेगी । ' यदस्य पूर्वमपरं तदस्य... श्रहेरिव सर्पणं शाकलस्य न विजानन्ति ' ( ऐत ० प्रा ० १४५ ) इसके अर्थ में श्रीयुधिष्ठिरजी मीमांसकने ‘ संस्कृत ध्याकरण शास्त्रका इतिहास ' के १२४ पृष्ठमें ' शाकल शाखाके श्रादि और अन्त के समान होनेसे उसकी अहि - गति मानी है । श्रर्थात् शाकल शाखाके प्रथम मण्डलमें १६१ सूक्त और अन्तिम दशम मण्डलमें भी १६१ सुक्त है ' । ' वेदसर्वस्व ' प्रथमभागके ३४ पृष्ठमें स्वा ० हरिप्रसादजीने भी ऐसा ही माना है । ' अहि ' का अर्थ उन्होंने ' सूर्य ' किया है । इससे वर्तमान ' ऋग्वेद संहिता ' स्पष्ट हो ' शाकल ' सिद्ध होती है । क्योंकि अष्टकों वाली संहितामें यह बात नहीं मिलती, उसमें प्रथम अष्टकमें २६३ वर्ग हैं, पर अन्तिममें २४६ । इसी ( शाकल ) संहिताको सूचीमें ( धार्यसमाजी ) श्रीस्वामी विश्वेश्वरा-नन्दजी श्रीनित्यानन्दजीने मी ' वाय: ' इस प्रकार एक पद कहीं भी नहीं दिया । वहाँ पर इसी मन्त्रका ' वा ' सूचीके ३७१ पृष्ठमें है, और इसीका. ' यः ' उस सूचीके ३२१ पृष्ठमें है । इसी प्रकार इसी वैदिक यन्त्रालयकी छपी ' अथर्ववेद संहिता ' में भी ' वा, यः ' ( अथर्व ० २०१७६।१ ) यह दो पद पृथक - पृथक हैं । इससे वादियोंके अनुसार सर्वथा सुस्पष्ट होगा कि · निरुक्तानुसार श्राजकल वाली शाकल ऋग्वेदसंहिता तथा शौनक Gujarat. An eGangotri Initiative
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१५० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) अथर्ववेदसंहिता दोनों पौरुषेय संहिता है, ' वेद ' नहीं । किसी भी भाष्यकारने ' वा ' और ' यः ' यह पृथक् - पृथक् पद उपन्यस्त करके भी ध उनका तदनुसार नहीं किया, किन्तु अर्थ ' वायः ' इस एक पदके अनुसार किया है । तब क्या इन दो पद रखने वाली ये दोनों संहिताएँ पौरुषेय हैं? बेद नहीं हैं? यदि ऐसा नहीं, और यह दोनों शौनक और शाकलसंहिताएँ वेद हैं, तो वेदविद्वान् यास्ककी इष्ट संहिता ' वेद'न रहेगी । यदि दोनों संहिताएँ वेद रहेंगी, तो फिर हमारा ही वह पक्ष श्राकर उपस्थित होगा कि सभी संहिताएँ वेद हैं, पर अपने कुल वा सम्प्रदाय की संहिताको मुख्य रखना पड़ता है । उसमें अनन्यनिष्ठता के लिए किसी एक देवता के स्तावक पुराणमें दूसरे देवोंकी निन्दाकी तरह उससे भिन्न संहिताओंको निन्दार्थवादसे ' मानुष ' भी कह वा मान लिया जाता है, पर वस्तुतः सभी शाखामूलक पाठभेद अपौरुषेय है । जैसे कि-' महाभारत ' में कहा – शाखामेदाश्च ये केचिद् याश्च शाखासु गीतयः । स्वरवर्णसमुच्चाराः सर्वोस्तान् विद्धि मत् ( भगवत् ) कृतान् ' ( शान्तिपर्व ३४२।१००-१०१ ( १७ ) यह भगवान्की उक्ति है । भगवान कृ अपौरुषेयं ही मानी जाती है, जैसे कि - ' तस्माद् यज्ञात् ( विष्णोः ). सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ' ( वाज ० यजुः सं ० ३१।७ ) यहाँ पर ‘ जज्ञिरे ' का अर्थ ‘ उत्पन्नाः ' होने पर भी ऋग्वेदादिको ' अपौरुपेय ही माना जाता निरुक्तकारके श्रन्य भी ‘ एक एव रुद्रोवतस्थे, न द्वितीयः ' ( १।१५।७ ) अग्नये समिध्यमानाय · अनुब्रू हि ' ( १११११८ ) इत्यादि मन्त्रभांगके नामसे दिये हुए बहुतसे उद्धरण हैं, जो वर्तमान चार शाकल, वाजसनेय, कौथुम, शौनक संहिताओंमें न मिलकर अन्य संहिताओंमें मिलते हैं, यहाँ उनके बतानेका स्थान नहीं । निरुक्तानुसार इन्हें ही वेदमन्त्र. मानना पड़ेगा, पर याजका मत इन चारों संहिताथोंसे भिन्न संहिताओं श्रीपतजलि एवं ' शन्नो देवीरभिष्टये ' १५२ में मिले मन्त्रोंको वेदमन्त्र माननेको तैयार नहीं; फिर भी वह ( पतञ्जलि, शतपथ - प्रवक्ता याज्ञवल्क्य यादिको प्राप्त मानता है यास , वक्तव्यम साम्प्रदायिक श्राग्रह है । पूर्वमीम इति वेदोंकी वर्णानुपूर्वी नित्य च प्रोच्य [ सौश ( ८ ) महाभाष्यकारने किसी संहिताके पाठको पौरुषेय वा यत्र च पाठको अपौरुषेय न मानकर; अपने वैयक्तिक मतके अनुसार अथवा ' कृते प्र कहना अधिक उपयुक्त होगा कि वार्तिककार के अनुसार तटस्थ र जनीयता ४ | ३ | १०१ सूत्र के भाष्य में सभी वेद संहिताओं की वर्णानुपूर्वीको स परस्पर समानता होनेसे, समानता न होनेके कारण अनित्य ( समार [ 9 कह दिया है । इसी असमानता- इसी वर्णानुपूर्वीकी श्रनित्यताका न नित्यानि ही उन्होंने ' संहिता ' माना है । उसमें शाकल संहिता, वाजसने वेदानाम संहिता, कौथुम संहिता, शौनक संहिताएँ भी जिनको श्राजकल वर्णानुपूर्व तदुभेदा ( श्रार्यसमाजादि ) सम्प्रदाय केवल यही चार वेद मानते हैं- ये ( संहिता ) सन्निविष्ट हैं । अर्थात् भाष्यकारके मत में इन वर्तमान चार के असमानत कम् [ इ संहिताओंकी श्रानुपूर्वी भी अन्य संहिताओं की अपेक्षासे नित्य है । पैप्पलाद आदि नाम तो भाष्यकारने अन्य सभी वेद संहिताओं वर्तमान इस उपलक्षणार्थ ही रखे हैं, श्रन्यथा यही भाष्यकार निर्दिष्ट काठक, काला ' छन्द ' स्व पक, मौदक, पैप्पलाद ही अनित्य वर्णानुपूर्वी वाली तथा शाखाएँ है * जायेंगी, अन्य मैत्रायणी, काण्व, तैत्तिरीय, कपिष्ठलकठ, जैमिनि राणायनीय, वाष्कल आदि संहिताएँ नित्य वर्णानुपूर्वी वाली मन्त्रभागस आम्नाय हो जाएँगी, पर वादियों को भी यह अनिष्ट होगा । भाष्यकार लिखा है । तो वहाँ छन्दो ( वेद ) मात्रकी वर्णानुपूर्वीको अनित्य ' बतलाया है । कि वहाँका उद्धरण यह है— स्वामीजी CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१५२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) १५ वह यात ( पूर्वपक्षः ) ' छन्दोर्थं ( वेदकृते ) तर्हि इदं [ ' तेन प्रोक्तम् इति सूत्रं ] है, वक्तव्यम्, नहिं छन्दांसि [ बेदाः ] क्रियन्ते, नित्यानि छन्दांसि [ वेदाः, पूर्वमीमांसानुसारम् ] इति । ( उत्तरपतः ) छन्दोर्ये [ बेदकृते ' तेन मोकम् ’ इति सूत्रम् ] इति चेत्, तुल्यमेतद्भवति, ग्रामे ग्रामे काठकं कालापकं च प्रोच्यते; तत्र अदर्शनात्, न च तत्र [ नित्यच्छन्दःसु प्रोक्त- ] प्रत्ययो [ सौशर्मणी काठक संहिता. सौशर्मणी शाकल संहिता इत्येवं ] दृश्यते । ना कि यन्त्र च [ प्रोक्तप्रत्ययो ] दृश्यते, ग्रन्थः स भवति, तत्र [ ग्रन्यस्य कृतत्वात् ] श्रथवा ' कृते ग्रन्थे ' इत्येव सिद्धम् [ न तत्र ' तेन प्रोक्तम् ' इत्यधिकारस्य प्रयो-[ स्थ जनीयता ] | को सम ( असमार [ पूर्वपक्ष: ] ' ननु चोक्तम्- ' नहि छन्दांसि [ वेदाः ] क्रियन्ते नित्यानि छन्दांसि [ वेदाः ] इति? [ उत्तरपक्षः ] यद्यपि [ छन्दसाम्-नाका वैदानाम् ] अर्थो नित्यः, या तु असौ [ सर्वेषां छन्दसाम् - वेदानाम् ] वाजसने वर्णानुपूर्वी, सा [ सर्वेषां छन्दसां वेदानाम् ] अनित्या [ असमाना ] । अंकल तदभेदाच [ तस्याः सर्वेषां छन्दसां वेदानाम् श्रानुपूर्व्या श्रनित्यत्वाद्-( संहिता ) श्रसमानत्वाच्च ] एतद् भवति - काठकम्, कालापक, मौदकम्, पैप्पलाद-चार के कम् [ इत्याद् ि ] इति । ’ व है । इस सन्दर्भ में छन्द - वेदकी सभी ११३१ संहिताएँ इष्ट हैं; जिनमें हिताओ वर्तमान शाकल, वाजसनेय आदि चारों संहिताएँ भी अन्तर्गत है । क, काला ' छन्द ' स्वा ० दयानन्दजी भी वेद - संहिताको कहते हैं यह कहा ना खाएँ * स्वामी दयानन्दजी ने ली एव मन्त्रभागस्य मूलवेदस्य ग्रहणं नाप्यका हैं । लिखा है कि ' छन्द मूलवेदका स्वामीजी की भूल नहीं मानेंगे अपने अष्टाध्यायी भाष्य में ' छन्दः ' शब्देन भवति ( २/३/६२ ) पृष्ठ ३१० प्रथम भाग में नाम है । आशा है श्रीजिज्ञासुनी श्यादि यहां । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. श्रीपतञ्जलि एवं ' शन्नोदेवीरभिष्टये ' १५३ चुका है । श्रतः यहाँ पर श्रीनागेशभट्टने भी वेदानुपूर्वी श्रनित्या- इत्यर्थः । ' ' यद्यपि श्रथ नित्यः ' से महाभाष्यकारने संहिताओं ) का अर्थं निध्य ( समान ) ही ' शृणोत प्रावाणः ' यह तैत्तिरीययजुर्वेद संहिता है; पर वाजसनेयी यजुर्वेद संहितामें ' शृणोत ' ग्रावाणः ' ( ६।२६ ) यह पाठ आया है । यही मतमें वर्णानुपूर्वीकी अनित्यता है, और यही ' कहा है -- ' तुल्यमेतत्-उन छन्दों ( सभी वेद-माना है । जैसे कि-| १ | ३ | १३ | १ ) में श्राया पाठ न श्राकर ' श्रोता असमानता ही वार्तिकके असमानता ' ही ' संहिता ' है, अन्यथा ऋग्वेद यादि ' संहिताओं ' से अतिरिक्त कहीं भी मिलते होते, पर कहीं नहीं मिलते । पर अर्थ ' श्रोता, शृणोत ' दोनोंका समान है— जैसे कि वायुपुराणमें कहा है- ' सर्वास्ता हि चतुष्पादाः सर्वाश्चै-कार्यवाचकाः । पाठान्तरे पृथग्भूता वेदशाखा यथा तथा ( ६११११ ) यही अर्थकी नित्यता है । अतः भाष्यकारने कह दिया- ' छन्दसाम् धर्मो नित्यः, परं छन्दसां व्रर्णानुपूर्वी श्रनित्या ' । इससे भाष्यकारने सूचित कर दिया है कि - वेदत्व शब्द और अर्थ दोनोंमें है, जैसे कि प्रकृत सूत्रके उद्योतमें श्रीनागेशभट्टने भी लिखा है - " यद्यपि श्रथ नित्यः ' इति - श्रनेन वेदस्वं शब्दार्थोभयवृत्ति - इति ध्वनितम् " । पर ' वेदके शब्द श्रन्योन्य सभी संहिताओं में असमान होनेसे अनित्य और वेदके शब्दोंका अर्थ सभी संहिताओं में समान होनेसे नित्य है । फलतः यहाँ ' नित्य ' शब्द ' समान ' अर्थ और ' अनित्य ' शब्द ' असमान ' अर्थ रखता है; अर्थात् सभी वेद संहिताओं में वर्णानुपूर्वी असमान है, पर अर्थ सभीमें समान है । यह बात इन ' ऋग्वेद संहिता ' श्रादि नामसे प्रसिद्ध चारों संहिताओंके समान मन्त्रों में भी देखी जा सकती है । जैसे पुरुषसूक्तके कई मन्त्र ही ले लीजिये -' सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिं विश्वतो वृत्वाऽ-An eGangotri Initiative
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१५४ श्रीसनातनधर्मालोकः ' ४ ) त्यतिष्ठद् दशाङ्गुलम् ' ऋ ० सं ० १० १६० १ ) अब इसी ऋग्वेद ( शा ० ) संहिता के मन्त्रको वर्णानुपूर्वी अन्य वेद संहिताओंमें भी देखिये । “ स भूमि सर्वतस्पृत्वाध्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ' ' ३१११ ) यह यजुर्वेद ( वाज ० ) संहिताका मन्त्र है । अब सामवेद ( कौ ० ) संहिता में ही इस मन्त्रको लीजिये – ' सहस्रशीर्षाः पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमि सर्वतो धृत्वात्यतिष्ठद् दशाङ्गुलम् ' । श्रारण्यकपर्व ६।४।३ ) । अबः इसीको अथर्ववेद ( शौ ० ) संहितामें देख लीजिये ---- ' सहस्रबाहुः पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिं विश्वतो वृत्त्राऽत्यतिष्ठद् दशाङ्गुलम् ' ( १६।६।१ । इस प्रकार ' छन्दांसि जज्ञिरे तस्मात् ' ( ऋ ० सं ० १०६०/६ ) ‘ छन्दो ह जज्ञिरे तस्माद् ' ( अ ० सं ० १६ ६ १३ ) । ' त्रिपादूर्ध्व उदैत्... पुरुषः... ततो विष्वङ ्मव्यक्रामत् ' ( ऋ ० सं ०४ ) ' त्रिभिः पद्भिर्घामरोहत्... तथा व्यक्रामद् विष्वत् ' ( अथ ० २ ) । ' एतावानस्य महिमातो ' ( ऋ ० ३ ) तावन्तोऽस्य महिमानः ततो ' ( श्र ० ३ | ' उतामृतत्वस्येशानो ( ऋ ० २ ) ' उतत्सृतत्वस्येश्वरो ' ( श्र ० ४ ) । ऊरू तदस्य यद् वैश्यः ' ( ऋ ०१२ ) ‘ मध्यं तदस्य यद् वैश्यः ' ( अ ० ६ ) । ' कौ बाहू का ऊरूपादा ' ( ऋ ०११ ) ' किं बाहू किंमूरुपादाः ' ( अ ० ५। ' विराडग्रे समभवत् ' ( श्र ० ३. ततो विरालजायत ' ( ऋ ० ५ ) इत्यादि । इनमें शब्द भिन्न - भिन्न है, पर अर्थ समान है, यही भिन्न - भिन्न-शब्दता ही भिन्न - भिन्न संहिता है । अब इन मन्त्रोंमें किसीको मूल, किसीको पहिले की शाखा नहीं कहा जावेगा, किन्तु ये मन्त्र अपनी-अपनी संहिताके स्वतन्त्र समझे जाएँगे । यही बात सभी वेदसंहिताओं ( तैत्तिरीय, काएव श्रादि ) के लिए लागू है - यह भाष्यकारका अभि-प्राय है । CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीपतन्जलि एवं ' शन्नोदेवीरभिष्टये ' १५६ आम्नायकी वर्णानुपूर्वी नियत वस्तुत है, ' नित्या ( ११ ) अब शेष प्रश्न वादियोंका यह है कि- ' स्वरो नियत ग्राम विषये ते ते अस्यवाम - शब्दस्य; वर्णानुपूर्वी खल्वपि आम्नाये नियता श्रस्यवामशब्द ' वचनमें भी ( ५ | २ | १ | ११ ) यहाँ भाष्यकारने श्राम्नाय ( वेद ) की वर्णानुक्षा पर ' भी नि ( नित्य ) बताई है - भाष्यकार के इस वचनकी सङ्गति कैसे लगेगी । " शब्दों के सा तो परस्पर विरुद्धता होगी कि — एक स्थान पर उन्होंने वेदकी व ठीक ज्ञात ह - पूर्वी अनित्य बता दी, दूसरे स्थान पर नित्य, यह तो ' उन्मा - ' देश: होगा ' । ध्येयम् ' मध्येयम् न इस पर प्रष्टव्य यह है कि – छन्द और श्राम्नाय शब्द श्राश्रस्य वामी ' पर्यायवाचक वा समान हैं, वा भिन्न - भिन्न ( असमान ) हैं? यदि ए'श्रास्नाय ' हैं तो दोनोंकी वर्णानुपूर्वी भी समान होगी । यह नहीं कियताना पड -की वर्णानुपूर्वी तो हो अनित्य और ' आम्नाय ' की वर्णानुपूर्वीही कि कर भाप यदि काठकादि संहिताओं को ही ' छन्द ' माना जात्रे; तो ' यत्र है । अब बता " पवमानः छन्दस्यां वाचं ब्रदन् ' ( ऋ ० सं ० ६ ११३६ ) ' छन्य सेदसंहिता ह ( साम ० पूर्वा ० ३ ३ ३ ) इत्यादि स्थानों में जो छान्दस वाणीका बो अन्य वि - कहा है, इसे क्या काठकादि संहिताओं का पढ़ना माना जावेगा! ' | धर्थ ' नित्य' ' प्रकार ' छन्दाँ सि जज्ञिरे ' ( वा ० य ० ३५॥७, ८० शौ ० १६६ ॥ - में भी जानना चाहिये । नित्य ' नहीं नेयतानुपूव्य यदि काठकादि संहिता ' श्राम्नाय ' नहीं; तो भाष्यकारने ' गोक ` णाद् वुञ् ' ( १।३।१२६ ) सूत्रमें कद, पैप्पलाद श्रादिको ' थाम्नाय ' पितापुन्नौ, में ही वुन् किया है; तो यहाँ भी श्रीपतञ्जलिका परस्पर विरोध लैपरीत नहीं ' उन्मत्त प्रलाप ' होगा । यदि ऐसा नहीं, किन्तु श्रीपतञ्जलिता सकता है, विषयमें सावधान रहने वाले हैं, तो वंदनुसार काठक, पैप्पलाद हा ' नित्य ': - मायकारके मत में श्राम्नायसे भिन्न कैसे? Gujarat. An eGangotri Initiative 1
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१५६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) वस्तुतः इस भाष्यकारके वचनमें ' नियता ' का अर्थ ' निश्चिता ' तो है, ' नित्या ' नहीं । जैसे – ' एतस्मिँश्च श्रतिमहति शब्दस्य प्रयोग-नियत श्राम विषये ते ते शब्दास्तत्र तत्र नियत - विषया दृश्यन्ते ' इस भाष्यकारके यवामशब्द बच्चन में भी ' नियत ' का अर्थ ' निश्चित ' है, ' नित्य ' नहीं; वैसे ही यहाँ पर भी ' निश्चित ' अर्थ है ' नित्य ' नहीं । इसके साथके भाष्यकारके लगेगी । शब्दोंके साथ भी मिलान करना चाहिये, फिर ' नियत ' का अर्थ ठीक--ठीक ज्ञात हो जायगा । उक्त शब्दों के साथ ही भाष्यकार के यह शब्द हूँ - ' देशः खल्वपि आम्नाये नियतः - ' श्मशाने नाध्येयम्, चतुष्पथे उन्मत्त या' नाध्येयम् ' इति । कालः खल्वपि आम्नाये नियतः - ' नामावास्याया-मध्येयम्, न चतुर्दश्याम् ' इति । पदैकदेशः खल्वपि आम्नाये दृश्यते सब्द भावस्य वामीयम् ' इति । यह ' श्मशाने नाध्येयम् ' इत्यादि वचन किस यदि ' श्रास्नाय ' ( वेद ) के हैं? यह वादियों ( श्रार्यसमाजियों ) को कि- क्ष्यताना पड़ेगा । पदैकदेश भी ' आम्नाय ' में दीखता हैं- यह कड़कर भाष्यकारने ' अस्यवामीय ' यह पदांश श्राम्नायमें माना उद्धृत तो ' यत्र है । अब बताना चाहिये कि इन चारों वर्तमान संहिताओं में कौनसी ' छन्य ' सेदसंहिता है, जिसमें ' अस्यवासीय ' यह शब्द आया है? सीका बो अन्य विचारणीय यह है कि इन स्थलोंमें क्या ' नियत ' शब्दका नावेगा! | १६,६ ' अर्थ ' नित्य ' है? नहीं नहीं, यहाँ भी ' नियत ' का अर्थ ' निश्चित ' हैं, -नित्य ' नहीं । लोकमें भी ' लौकिकेष्वपि एतद् [ नियतवाचोयुक् गो यानुपूर्व्या भवन्ति ] ( १११६१४ ) इस यास्कके वचनके अनुसार नास्नाव ' पितापुत्रौ, इन्द्राग्नी ' अादिकी श्रानुपूर्वी भी ' नियत ' रहती है, विरोध लैपरीव नहीं होती । इस लौकिक श्रानुपूर्वीको भी ' निश्चित ' तो कहा अनिता सकता है, ' नित्य ' नहीं । नहीं तो लौकिक पदोंमें भी ' नियत ' का -पलाद दार्थ ' नित्य ' करना पड़ेगा । CC - 0. Ankur i Joshi Collection Gujarat. श्रीपतन्जलि एवं ' शन्नोदेवीरभिष्टये ' १५७ ' नित्य ' का अर्थ भी ' अनित्य ' कुछ क्षण के लिए बादियोंके अनुसार ' नियत ' का अर्थ ' नित्य ' भी माना जाए; ( यद्यपि वह यहाँ पूर्वापरप्रकरण - स्वारस्यवश भाष्यकारको इष्ट नहीं ) तब भी भाष्यकार के पूर्वोक्त अनित्यता प्रतिपादक वाक्यसे कोई विरोध नहीं पढ़ता; क्योंकि- भाष्यकार ' अथवा नेदमेव ' नित्य ' लक्षणम् - ध्रुवं कूटस्थमविचालि अनपायोपजनविकारि यत् तन्नित्यम्, तदपि नित्यम्, यस्मिन् तत्वं ( तद्भावो न विहन्यते ' यह ' नित्य ' का लक्षण मानते हैं । 1 अन्य स्थलमें भी ' अयं खलु ' नित्य ' शब्दो नावश्यं कूटस्थेषु श्रवि-' चालिपु भावेषु वर्तते, किं तहिं? श्राभीक्ष्णयेपि वर्तते । तद् यथा-' नित्यप्रहसितः, नित्यत्रजल्पित: ' । महाभाष्यकारने यह ' नित्य ' का लक्षण किया है; अर्थात् - उन्होंने ' नित्य ' का अर्थ ' अनित्य ' भी बड़े धड़ल्ले से ' माना है; तो यहाँ ' नियता ' का ' नित्या ' अर्थ कर देने पर भी पूर्वकी तरह ' अनित्या ' ही अर्थ है । प्रलय- पर्यन्तको नियतता श्रभिमत होनेसे ' चहाँ इतनी ' नित्यता ' इष्ट है, जैसे कि - श्रीनागेशभट्टने भी यहाँ भाष्य-! · का हृदय दिया है कि — ' सा श्रानुपूर्वी तत्तत्कल्पसमाप्तिपर्यन्तं नियता-‘ इत्यर्थः ' । न्यायभाष्यकार श्रीवात्स्यायन मुनिने भी २।१।६८ में ' अतीत, ' श्रतागत - सम्प्रदाय।भ्यासप्रयोगाऽविच्छेद ' से ही वेदकी ' नित्यता ' मानी है, शब्दोंकी नित्यतासे वेदकी निव्यता नहीं मानी । नियतता होनेसे ही वेदवाक्य वा अपौरुषेयता मानने पर श्रीयास्कसे उदाहृत नियतापूर्वीक ' पितापुत्र ' यादि लौकिक शब्द भी वैदिक शब्द वा अपौरुषेय वन जाएँगे, पर यह वादीको भी अनिष्ट है । An eGangotri Initiative
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१५८ श्रीसनातनधर्मालांक: ( ४, श्रास्यवामीयकी आनुपूर्वी ( २० ) इसके अतिरिक्त भाष्यस्य इस ' ग्राम्नाय ' पदका अर्थ भी ' वेदसम्प्रदाय ' है । इसका अर्थ यह हुधा कि- अपने अपने आम्नाय ( वेद - सम्प्रदाय ) में स्वर तथा वर्णानुपूर्वी प्रलयकाल तक वही रहती है, ' बदली नहीं जाती । यदि यहाँ पर यह अर्थ न मानकर " वेदमें ' अस्य -वाम ' को स्वर वर्णानुपूर्वी नित्य हुआ करती है " - यह अर्थ माना जावे, तो असङ्गति पड़ेगी । ' अस्य वामस्य प ' ( ऋ ० सं ० १।१६४।१ ) ' अस्य वामस्य नि ' ( १११६४७ ) इसी अपने वेदके सुक्तमें ही स्वरका भेद होगया है । ' स्प ' पर एक स्थान ' स्वरित ' है, दूसरे ' स्य ' पर अनुदात्त है । अब वर्णानुपूर्वी भी श्रस्यवामीय सूक्तकी देख लीजिये । ऋ ० ६० में ' सप्त स्वसारो अभिसंनचन्ते ' ( १।१६४१३ है, पर अ ० सं ० में ' अभिसं-नवन्त ' ( १।६,३ ) यह ' ए ' और ' थ ' मात्राका ही भेद होगया है । ' अचिकि-त्वाञ्चिकितुषः ' ( ऋ ० सं ० १/१६४/६ ) ' अचिकित्वाश्चि- ' ( ०६६/७ ) यह सन्धिभेद है । इसी मन्त्रमें ' त्रिने ' ( ऋ ० ) ' विद्वनों ' ( ० ) यह शब्दभेद है । इसी प्रकार ' सनेमि तस्मिन्नार्पिताः ' ( ऋ ०१४ ) ' सनेमि " यस्मिन्नातस्थुः ' ( अ ० १४ ) यहाँ सर्वनाम तथा क्रियाका वेद है । ' यं स शिङ्ङ्क्ते ' इस ‘ श्रस्यवामीय ' के प्रसिद्ध मन्त्र में ऋ ० सं ० १।१६४ / २६ में ' म ' एकवचन है, और प्रथर्ववेद संहिता ( ६/१०/७ ) में ' मर्त्यान् ' बहुवचन है - यह वचनभेद है । इसी प्रकार इस सूक्त में मन्त्रोंकी थानुपूर्वीमें भी परस्पर भारी भेद है— ' इह ब्रवीतु ' यह मन्त्र ऋ ० सं ० ( १/१६४ ) में सातवाँ है; पर प्रथ ० सं ० ( हार ) में पाँचवां है । ऋ ० शा ॰ सं ॰ में ‘ ह्रस्यवाम ' एक सूक्त है; पर थ ० शौ ० सं ० में दो सूक्त हैं । अन्य बहुतसे भेद्र स्थानाभाववश हम नहीं दे रहे । यदि सार CC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीपतञ्जलि एवं ' शन्नोदेवीरभिष्टये ' १६० ' स्वामी ' सूक्तकी वर्णानुपूर्वी श्राम्नायमें नियत इष्टनहीं; उन्हीं केवल ' अस्यवाम ' इस पदांशकी धानुपूर्वी नियत इष्ट है; तो '. अन्य संहिता में भी यही की यही है; तब अन्य संहिताओं वर्तमान- चार संहिताओंका आपस में कोई भेद सिद्ध न हुआ भाष्य । तथाप बस, इसी वर्णानुपूर्वीको भाष्यकारने छन्द ( वेद ) की सभी श्रमाव में - उनमें वर्तमान चारों संहिताएँ भी अन्तर्गत हैं - इत्याद एक-प्रति असमान होनेसे ही ' अनित्य ' बताया है, और ' श्राम्नाय दिखल अपने - अपने वेदसम्प्रदाय में - अपनी - अपनी वेदसंहिताओंमें, वर्णानुपूर्वीको ' नियत ' – निश्चित बताया है कि उसे परिवि १ और किया जाता, उसे वैसे का वैसा रखा जाता है, वैसे का वैसा उष्टत है । यदि उक्त भाष्य - सन्दर्भका यह अर्थ वा यह श्राशय न माना पड़ा है । नहीं ह तो ऋग्वेद शाकलसंहिताके जो मन्त्र भिन्न - भिन्न वाजसनेय - यजुर्वेद य शौनकी अथर्ववेदसंहिताओंमें लिये गये हैं- जिनका वुछ न - बुद्द पर श्र मन्त्रप्रत पूर्वीभेद रहता है- उनके पढ़नेकी आवश्यकता नहीं रहेगी, पर दायमें ऐसा न करके उसको भी पढ़ा जाता है; नहीं तो ७०-७५६ एक के रहनमर को छोड़कर शेष कौथुम सामवेदसंहिताके मन्त्र ही छोड़ने पड़ेंगे; कं सम्भवत वे शाकल ऋग्वेदसंहिताके हैं, अथवा यदि वे सामवेद कौथुम ' अभिज हैं, तो ऋग्वेद शाकलसंहितासे निकालने पड़ेंगे । इस प्रकार के अपनी . से लिये गये अन्य वेदसंहिता- स्थित मन्त्रोंको भी निकालना पड़े पाटलिप फिर वेद पुस्तकें भी हलकी हो जाएँगी, उनका मूल्य भी बहुत अथर्ववे हो जायगा । लिपिमें अपनी पर ऐसा नहीं किया जाता, उसे अपनी - अपनी वेद - संहिता सङ्गत ह मन्त्र कहना पड़ता हैं, यही बात पैप्पलाद - श्रथर्ववेद संहिता, वा तीन गो यव सं ० यादि सभी संहिताथोंके लिये लागू है । यज्ञों आदि शब्दसे Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातन धर्मालोकः ( ४ ) १६० नहीं; उन्हीं कुल वा सम्प्रदायकी चार संहिताओंको ही मुख्यतया लेना पंढ़ता वो है, उन्हींका क्रम, उन्हींकी सारी थानुपूर्वी रखी जाती है । यदि संहिताश्रों! भाष्यकारको ‘ आम्नाय ' शब्द से केवल वर्तमान चार संहिताएँ था । तथा पूर्ण वेद इष्ट हैं; तो ' श्मशाने नाध्येयम्, चतुष्पथे नाध्येयम्, न श्रमावास्यायामध्येयम्, न चतुर्दश्याम्, ' ' अस्यवामीयम् ' ( ५ | २ | १ | ११ ) सभी इत्यादि भाष्यकार प्रोक्त आम्नाय वाक्य इन वर्तमान चार संहिताओं में एक दू दिखलाने होंगे, पर इनमें नहीं मिलतें, किन्तु भिन्न संहिता वा ब्राह्मणों नायक में; तब स्वयं हमारा पक्ष मानना पड़ेगा कि भाष्यकार सभी संहिताओं में, और ब्राह्मणों को वेद ' ' मानते हैं, समय पर अपनी कुल संहिताको परिवर्तित उत करते हैं, उनके वेदविषयक सिद्धान्तमें कोई परस्पर विरोध.... सा पड़ा नहीं है । न माना यही कारण है किं- भाष्यकार वैदिक शब्दोंके प्रतिपादनके अवसर नय - यजुर्वे पर अपने कुल वा सम्प्रदायकी पैप्पलाद - अथर्ववेद संहिताके प्रथम-न - बुद्द मन्त्रप्रतीक ' शं नो देवी ' को देने का लोभ न संवरण कर सके । इसमें परवे एक प्रमाण यह भी सम्भव है कि- महाभाष्यकार काश्मीरके गोनर्ददेश ७०-७५३ के रहनेवाले होनेसे ' गोनर्दीय ' कहलाते हैं । ' उस देश में उस समय पड़ेंगे; सम्भवतः श्रथर्ववेद - पैप्पलादसंहिता प्रचलित रही हो । तभी तो कौथुम सी ' अभिजानासि देवदत्त! कश्मीरान् गमिष्यामः ' ( ३।२।११४ ) में उन्होंने कार मे अपनी जन्मभूमि काश्मीरका स्मरण किया है, क्योंकि फिर वे गलना पट्टे पाटलिपुत्र वा सुघ्न ( श्रागरा ) में रहने लग गये थे; श्रौर यह पैप्पलाद-भी बहुत अथर्ववेदसंहिता ' डाक्टर बूलरको काश्मीरके ही पुस्तकालयमें शारदा-लिपिमें मिली । इस कारण काश्मीरी श्रीपतञ्जलिने भी श्रादिमें वही श्रपनी कुलशाखा ' पैप्पलाद - श्रथर्ववेदसंहिता ' ली हो - यह बात भी द - संहिता सङ्गत हो जाती है । ' राजतरङ्गिणी'- जो काश्मीरका इतिहास है- में ता, वा तीन गोनर्द राजाओंका निरूपण है । कैयट, राजशेखर श्रादि ' गोनर्दीय ' श्रादिमें शब्दसे भाष्यकारको ही लेते हैं । श्रस्तु: — CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. श्रीपतञ्जलि एवं ' शन्नोदेवीरभिष्टये ' १६१ ११३१ संहिता चार वेद ( २१ ) पैप्पलादी अथर्ववेदसंहिता श्रीपतञ्जलिकी कुलसंहिता होने पर भी उनका सिद्धान्त यही रहा कि - ' चत्वारो वेदाः, एकशतम-' ध्व शाखाः सहस्रवर्मा ( शास्त्रः ) सामवेद:, एकविंशतिधा बाह्र च्यम्, नववा श्रथर्वणो वेदः ' इति । अर्थात् यह सभी ११३१ संहिता चार वेद हैं । इसी प्रकार सब लोग अपनी चार वेदसंहिता स्त्रस्वकुल - परम्परा-प्राप्त अथवा स्वगुरुसम्प्रदायप्राप्त ही मुख्यतया प्रयुक्त करें; श्रथच अनन्यनिष्ठाके लिए उन्हें ही अपौरुषेय मानें; पर शेष ११२७ संहिताओं को भी सभी, अपनी चार संहिताओंकी तरह वेद मानें, उनका भी यथावत् सम्मान करें; यह हमें प्राप्त, वेदविद्वान्, महाभाष्यकार श्री-पतन्जलिने अपनी कुलसंहिता ' थर्ववेद- पैप्पलादसंहिता ' का श्रादिम मन्त्र प्रयुक्त करके. श्रवशिष्ट संहिताओं को भी वेद कहकर, सम्मानपूर्वक उनका उद्धरण करके शिक्षा दी हैं कि - ' तुम लोग भी शैव - वैष्णवों यदि भान्ति अपने - अपने सम्प्रदायमें ही दृढ निष्टामें रहो; पर भेद-भाव तथा कलह - सृष्टि मत करो । यह पारस्परिक विवाद अविवेक - मूलक हैं; यह झगड़े वस्तुस्थितिकी अनभिज्ञतावश ही हैं । तभी श्रीपतञ्जलि ' मूल वेदसंहिता चार तथा शेष ११२७ शाखा है ' यह कहीं न कह-लिखकर सभी संहिताओंको शाखा कहा है; अर्थात् चारों वेदोंकी सभी संहिता ११३१ ही मानी हैं । इनमें किसीको उच्च, किसी को नीच,. किसीको मूल, किसीको शाखा यादि नहीं कहा । इनमें किसीमें भी विषमदृष्टि नहीं रखी । वे जानते हो हैं कि- शाखाएँ ही मिलकर शाखी कहाता है । शांखी शाखाधोंसे कहीं स्वतन्त्र नहीं मिलता । यदि भाष्यकार आजकल के अनुसार वर्तमान चार शा ० वा ० कौ ० शौ संहिताथोंको ही चार वेद मानते; शेष ११२७ को उन्हीं चारोंका व्याख्यान और उन्हें अवेद मानते तो वे भी वैसा अपना अभिमत An eGangotri Initiative 1
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१६२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) लिखते, किन्तु उन्होंने ऐसा कहीं भी न लिखकर सभी ११३१ संहितात्रों को ही प्रदिशेषरूपमें चार वेद माना । उक्त अपने वाक्यमें उन्होंने. कहीं भी वर्तमान चार संहिताओंके लिए कुछ भी विशेषता वा विलक्ष-णता नहीं की; ग्रतः उनका एतद्विषयक वेद - स्वरूप सुस्पष्ट है कि-१ ९ ३ ९ संहिताओं तथा तत्संगृहीत उतने ही ब्राह्मणोंको वे वेद मानते थे । इसमें प्रमाण - स्वरूप इन सबके उद्धरण वे वेदके नामसे हो समय-समय पर देते हैं, यह प्रत्यक्ष ही है । जैसे कि -पस्पशाह्निक में – ' वेदे खल्वपि – पयोव्रतो ब्राह्मणो ' इत्यादि । ' श्राचारे पुनऋषि ( वेदो ) -नियमं वेदयते — तेऽसुरा हेलयः ' इत्यादि । ' वेदेपि याज्ञिकाः संज्ञां कुर्वन्ति स्स्यो यूपश्चषालः ' ( १ | १ | ३ | १ ) । ' वेदे खल्वपि - ' ‘ वसन्ते ब्राह्मणोग्निष्टो-मादिभिः क्रतुभिर्यजेतेति ' ( ६।१।८४ ) इत्यादि बहुत उद्धरण उनके प्रत्यक्ष, हैं जो भिन्न - भिन्न संहिता वा ब्राह्मणोंके हैं । श्रतः वेदविषयमें उनके. वाक्योंका कोई परस्पर विरोध नहीं । ' वेदकी सीमा वर्तमान चार संहिताएँ हैं ' - यह प्रार्यसमाजसे मुख्य-तया प्रचलित मत ठीक है भी नहीं । इसमें पाठक स्वयं भी विचार करने का कष्ट करें । श्रीपाणिनिने लौकिक महाव्याकरण -- समुद्रकी सिद्दि श्रध्यायीमें परिमित सूत्रोंसे की है । यदि वेद यही वर्तमान चार संहितामात्र होते; तब इनके नियमोंकी व्यवस्थापनामें श्रीपाणिनिको क्या कठिनाई थी! तब उन्होंने वैदिक - सिद्धि के लिए बहुत स्थलोंमें व्यत्यय क्यों स्वीकृत किये? क्यों बहुतसे ' बहुलं छन्दसि ' ' छन्दस्युभयथा ' ' वा छन्दसि ' आदि सूत्र बनाये? ' छन्दसि दृष्टानुविधिः ' ' सर्वे विधयः इन्दसि विकल्प्यन्ते ' आदि वेदको अनन्तता बताने वाली परिभाषाएँ क्यों बनाई गई? इससे स्पष्ट सिद्ध है कि - ११३१ संहिताएँ, उतने ही ब्राह्मण, उतनी ही उपनिषदें, उतने ही श्रारण्यक - इस प्रकार वेद अनन्त है - जिसके पारको प्राप्त न होकर धन्तमें थककर श्रीपाणिनिमें व्यत्यय तथा बहुलताका श्राश्रय लिया । इससे स्पष्ट है कि - - वैदकी ICC - 0. Ankur Joshi Collection श्रीपतन्जलि एवं ' शन्नोदेवीरभिष्टये ' १६४ सीमा यही वर्तमान चार पोथियों ही नहीं हैं; किन्तुं मन्त्रग्राहाणाया सम्पूर्ण समुदाय ही वेद है । सम्पूर्ण हिन्दुधर्म की सिद्धि इसी ३ । १ । साहित्यसे होती है । केवल इन चार पोथियोंसे धर्मके सभी सम्म जिसे सिद्धि नहीं हो सकती । ' निघ ' शाखासंख्या में वैषम्य ( १२ ( २२ ) अब एक प्रश्न यह शेष रह जाता है कि- ' कोई ' स ११३१ संहिता कहता है, कोई ११३७ । कोई इनसे न्यून, कोई इससे दिव अधिक । इस मतभेदमें किसकी बात मानी जाय? " इस पर उत्तर प कौ है कि यह भिन्न विषय है । जब संहितामात्र वेद ठीक - ठीक माना संहित जाय, यह उसके बादुके विचारका प्रश्न है । सभीके कथनों पर विश्लेषर... करने पर यह बात भी निर्णीत हो सकती है । इस निबन्धमें हमने आज वादि - प्रतिवादिमान्य महाभाष्यकारको ही लिया है उन्हींकी सम्मत ११३१ संहिताएँ ही ली हैं । यह प्रतिवादी यदि स्वीकार करलें, तो फिर उक्त सकता है । नवीन प्रेरणा ( २३ ) यह अभिप्राय प्रदर्शित करके एक अन्य , अतः हमने भी यहाँ तथा उनका पक्ष वादी- ताद्धि प्रश्न भी हल हो अथच शब्द शब्द यदि बात कहकर हा अपना यह निबंध उपसंहृत करते हैं । स्वा ० दयानन्द्रजीको भी वाह पाणि वेदभक्त मानते हैं । उनको भी प्रवृत्ति इस विषय में देखनी चाहिये ॥ द वे निघण्टुको ऋग्वेदियोंका ' वैदिक ' कोष मानते हैं, श्रीयास्क उसे ' समाम्नाय ' कहते हैं, स्वामीजी श्रष्टाध्यायी श्रादिके ' छन्द ' को ' वेद ' कहते हैं - यह पूर्व कहा जा चुका है । एक अन्य भी प्रमाण उनका ' देखि देखें । उणादिकोषमें भी उन्होंने ' छन्दसीणः ' ( १/२ ) का अर्थ लिखा पर स्व है — ' वेदे द्दण्धातोरुय् ' इस प्रकार उनके मत में ' छन्द ' का अर्थ ' वैद ' Gujarat. An eGangotri Initiative