सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 111–120
सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 111–120
पृष्ठ 111
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१८४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ). - इस सा मनुष्यकृत? ( उ ० ) मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष, जलजन्तु श्रादि जातियां परमेश्वरकृत हैं । जैसे पशुश्रोंमें गौ, श्रश्व, हस्ती श्रादि जातियां वसूक्तका वृक्षोंमें पीपल, वट, श्राघ्र आदि, पक्षियोंमें हंस, काक, वकादि, जल-इस जन्तुओंमें मत्स्य मकरादि जातिभेद हैं, वैसे मनुष्योंमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, सारी वैश्य, शूद्र, अन्त्यज जातिभेद ईश्वरकृत हैं; परन्तु मनुष्य में ब्राह्मणादिको ३११ ) सामान्य जातिमें नहीं, किन्तु सामान्यविशेषात्मक जातिमें गिनते हैं ' विराडजा ( ११ समुल्लास २४१-२४२ पृ ० ) । फलतः देवता एवं वेदादिकी भान्ति ब्रह्माण्ड ' ब्राह्मणोस्य मुख ' में ब्राह्मणादिकी उत्पत्ति भी परमात्माके मुखादिसे ) । की उत्पति ही बताई गई है । की ( १ ) क ( ५ ) ( प्रश्न ) पुरुषसूक्तके पूर्व- प्रदर्शित मन्त्रोंकी भान्ति ' ब्राह्मणोस्य उत्पत्ति ( मुखमासीद् ’ में ‘ मुख ' श्रादिमें पञ्चमी तो नहीं है, फिर ‘ परमात्माके ( परमान मुख आदि ब्राह्मणादिकी उत्पत्तिका अर्थ यहाँ माना ही कैसे जा द देवबा सकता है? ' ( उत्तर ) ‘ ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( ३१।११ ) पुरुषसूक्तके अजायत ( इस प्रकृत मन्त्रमें तो जन्य - जनक कार्य - कारण ) का ' श्रायुघृतम् ' की र यह देश भान्ति श्रभेद से उपचार दिखलाया गया है । ' घृत ( कारण ) से थायु ती ( कार्य ) की उत्पत्ति होती है ' ऐसा कहना अपेक्षित होने पर भी ' आयु-भी मानई घृतम् ' ( घी आयु है ) ऐसा शुद्धा लक्षणासे कार्य कारणका श्रभेद i ' ' मानकर कहा जाता है । इस प्रकार ' श्रात्मा वै पुत्र - नामासि ' ( शतपथ ष्ट है वा ० १४ | ६ | ४ | २६ ) यहां पिता - पुत्र के अभेदसे ऐसा वचन कहा गया है, मुत्रमार्ग वैसे ही ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् ' में भी कार्य - कारणको अभेदसे कहना इए उससे उसकी उत्पत्ति बतलाता है । इस विषय में ' ब्रह्मसूत्र ' के अपने 7 इस बा भाष्य में श्रीमध्वाचार्य स्वामीने भी कई शब्द लिखे हैं । वे यह हैं— है— ' च ' शब्देन सकलवेदंतन्त्रपुराणादिषु विष्णुपरत्वं पुरुषसूक्तस्य दर्शयति । तथा च ब्राह्म – ' यथैव पौरुषं सूक्तं नित्यं विष्णुपरायणम् ' । उत्तर ) ईसचतुर्वेदशिखायां च - ' सहस्रशीर्षा पुरुषः ' इति । एष व अचिन्त्यः र CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat , ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( क ) परः परमी हरिरादिरनादिरनन्तशीर्षोऽनन्ताचोऽनन्तबाहुरनन्तगुगोऽनन्त-रूप इति । बृहत्संहितायां च - ' यथा हि पौरुषं सूक्तं विष्णोरेवाभिघा-यक्रम् ' इत्यादि । ' यस्माद् यज्जायते चाङ्गाल्लोकवेदादिकं हरेः । तन्नाम-वाच्यमङ्ग तद् यथा ब्रह्मादिकं मुखम् ' इति नारदीयवचनाद नामेदो-' क्तिविरोधः ' ( १।२।२६ ) यहां पर श्राचार्यने पुरुषसूक्तको विष्णुपरक मान-कर उसमें विष्णु का कथन उत्पादकरूपसे माना है - इससे हमारे पक्षी ही पुष्टि हुई । ( ६ ) इस विषय में श्रीमद्भागवतपुराणका भी उक्त विषयकपद्य तथा उसकी टीकाएँ भी द्रष्टव्य हैं जिससे उक्त पक्ष पर प्रकाश पढ़ता है । ' पुरुषस्य मुखं ब्रह्म, क्षत्रमेतस्य बाहवः । ऊर्वोर्वैश्यो भगवतः पद्म यां शूद्रोऽम्य-जायत ' ( २ || ३७ ) इस पद्यकी व्याख्या करते हुए श्रीश्रीधरस्वामीने कहा है - ' वर्णानां तत: ( परमात्मतः ) उत्पत्तिं दर्शयति - पुरुषस्येति । ब्रह्म-ब्राह्मणः, मुखमिति कार्यकारणयोरभेदविवक्षया उक्तम् ' । यहां यह बात स्पष्ट कर दी गई है कि- ' मुखात् ' के स्थान ' मुखम् ' कार्य - कारणके श्रभेदको उद्दिष्ट करके कहा गया है, अर्थ वही पञ्चमीका रहेगा । ' दोपनी ' व्याख्यामें भी कहा गया है- ' पुरुषस्य मुखम् ' इत्यादिना ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् ' इत्येव ऋचोर्थः । श्रर्थात् श्रीमद्भागवतकां उक्त पद्य उक्त वेदमन्त्रका अनुवाद ही है I । श्रीव्यासजीने उक्त पद्यमें दो पद ' मुखम्, बाहवः ' प्रथमान्त रखे हैं, और दो पद ' ऊर्वोः पद्म याम् ' यह पञ्चमी श्रर्थवाले रखे हैं— उसका आशय यही है कि उक्त मन्त्रका अर्थ पञ्चमी विभक्ति करो । इस कारण उक्त पथकी ' पदरत्नावली ' टीकामें भी कहा है - ' पञ्चम्यर्थे प्रमाणान्तरान्वेषणप्रयासो न कर्तव्यः, अत्रैव दर्शनाद् इति भावेनाह - ऊर्वोः पद्म याम् ' । श्रर्थात् उक्त पद्यमें ही ' पद्भ ्याम् ' आदिमें पञ्चमी विभक्ति स्पष्ट रखी गई है, अतः संर्वपदोंमें प्रथम के स्थान भी पञ्चमीका अर्थ करो और पन्चमी अर्थ में अन्य . An eGangotri Initiative
पृष्ठ 112
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१८६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) प्रमाण ढूढनेकी आवश्यकता भी नहीं; क्योंकि दो स्थलों पर स्वयं पञ्चमी रखी गई है । यद्यपि एक स्थल पर सप्तमी है; तथापि श्रर्थ वही उत्पत्तिका है; क्योंकि - ' पञ्चम्यामजातौ ' ( पा ० ३२ ह ८ ) ' सप्तम्यां जनेर्डः ' ( पा ० ३।२१६७ ) इन सूत्रोंके ज्ञापकसे जन्धातुके योग में सप्तमी-पञ्चमी दोनों हुआ करती हैं, जैसे ' सरसि जायते इति सरोजम् ' यहां उत्पत्ति अर्थके योग में सप्तमी हैं, और ' संस्काराजात इति संस्कारज: ' ' यहां पञ्चमी है इससे ‘ ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् ' मन्त्रमें भी मुखम्, बाहू, ऊरू ' इन प्रथमान्त पदोंमें भी पञ्चमी विभक्तिका अर्थ ही प्रमाणोपेत है । ( ७ ) अथवा उक्त मन्त्रमें इस प्रकार योजना है — ' ब्राह्मणः श्रंस्य परमात्मनः ' मुखम् — मुखाद्, यासीद् - उत्पन्नः ' । ' मुखाद् ' में ' मुखम् ' ' सुपां सुलुक् ' ( पा ० ७।१।३६ ) इस सूत्र से ' ङसि ' के स्थान पर ' सु ' होनेसे हुआ है, नपुंसकलिङ्ग होनेसे ' सु ' को ' थम् ' हो गया । इस प्रकार उक्त मन्त्रके प्रश्न मन्त्रकी भी यही व्यवस्था है- ' मुखं किम-स्यासीत् ’ ( यजुः ३१।१० ) ' मुखात् किमस्यासीत् '? सिद्धि पूर्वकी तरह होगी । इस अर्थमें कारण है सृष्टि ( उत्पत्ति ) का प्रकरण । इस कारण चादियोंके स्वामी दयानन्दजीने भो उक्त मन्त्रमें पञ्चमीका अर्य किया है — यह श्रागे कहा जावेगा । ( ख ) अथवा ' मुख किमस्यासीत्, किं बाहू, किमूरू, कि पादौ यह प्रश्न: है, उसका उत्तर है- ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् ' इत्यादि । श्रर्थात् उस परमात्माका मुख क्या था? इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है-जिससे ब्राह्मण उत्पन्न हुआ, वही परमात्माका मुख था ' । इस प्रकार आगे भी योजना कर लेनी चाहिये । इस तरह उत्तर में कार्य के परिचय से कारणका परिचय कराया गया । CC - 0. Ankur Joshi Collection ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् । क ) १८८ ( ग ) अथवा सृष्टि प्रकरण कृत होनेसे ' अस्य, मुखम [ ' सुपां सुलु ' ( पा ० ७ ११३६ ) इससे पञ्चमीका लुक ] उपसंहा किमुत्पन्नम्? बाहू - बाहुभ्यां किमासीत् किमुत्पन्नम्? जरू, पट वक्ताका ऊरुभ्यां पादाभ्यां च, किमासीत् किमुत्पन्नम्? ' ऐसा अर्थ होगा, नहीं है । उ “ किं बाहू ' यह प्रश्न ही न होता, ' कौ बाहू ' होता, ' किमूह पाये जातिशव ‘ होता, ' कौ ऊरू पाद ' यह प्रश्न होता । परन्तु ऐसा नहीं है, फिर इन सृष्टि प्रकरण होनेसे यही अर्थं प्राकरणिक है, इस कारण यहाँ दा - विभक्तिव्यत्यय भी दोषयुक्त नहीं है, क्योंकि वादीको भी तो ' पहर यह श्राग · मनायत ' ' मनसो जातः, चचोरजायत, श्रोत्राद्, मुखाद् श्रजायत ' ( 5 ) पञ्चमीके स्थान पर प्रथमाका व्यत्यय करना पड़ता है— तब वह उच्चता - नी उपालम्भ कैसे दे सकता है? ऊरू, चर ( घ ) अथवा ‘ मुखं किसू ' का अर्थ है कि ' कारण मुखका शूद्रादिये ' क्या है? ' इस प्रकार इस सृष्टि प्रकरण में कार्य - कारणके श्रभेदोप इस प्रकार - इस शैली से प्रश्न है; तात्पर्य वही पंचमीका ग्राकर बैठता है । साथ ही ( ङ ) इस प्रकार ' बाहू राजन्यः कृतः यहां भी ' ग्रस्य ' इस प नोचताकी वृत्ति है । ' स्य - विराट पुरुषस्य बाहु: - बाहुभ्याम् [ यहाँ पर ‘ सुलुक् ’ सूत्रसे ‘ भ्याम् ' के स्थान पर ' सु ' हुआ है, ' रोरि ' ( पा ० ८३॥ स्वयम्भुवः - से. ' र ' का लोप होकर दूलोपदीर्घ ( पा ० ६ ३ १११ ) हुआ । क्षत्रिय मे “ भ्याम् ' के.स्थानमें पूर्वसवर्णदीर्घ ( ७ ११३६ ) हुआ, जैसे घीवी, हुए करू । वैसे सिद्ध ' सुष्टुती ' वैसे ही ' बाहू ' बाहुभ्यामूके स्थान पर हुआ । श्रथवा यहाँ । इसके श्रुत भी ' श्रायुष्ट तम् ' की भान्ति कार्य कारणभाव में प्रभेद हुआ । ] राइन “ क्षत्रियः, कृतः - उत्पन्नः । अस्य - परमात्मनः, ऊरू - ऊरुभ्यां वैश्यः ह हुआ । वैश से उत्पन्न ' जनितः, यहां पर भी ' कृतः ' की द्वितीयपाद से अनुवृत्ति है । ( श्रधम ) रि ' विभक्तिका व्यत्यय ' व्यत्ययो बहुलम् ' ( पा ० ३ १/८२ ) सूत्रसे हु ' अथवा ' श्रायुट ' तम् ' की भान्ति जन्य - जनकका श्रभेद - उपचार । जिसे अधमता सि सुधार प्रथमा हुई । Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 113
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१८८ श्रीसनातनधर्मालीकः ( ४ ) मुखम् - मुरु ( च ) ' पर्द्ध यां शूद्रो अजायत ' यह तो स्पष्ट ही पंचम्यन्तं है — इस उपसंहारवाले पदके अनुसार पूर्व पदोंमें भी पंचमी करनी पड़ी, क्योंकि-ऊरू पर्द वक्ताका सिद्धान्त श्रथवा श्रभिप्राय उसके उपसंहारसे ही व्यक्त होता होगा, नहीं है । उक्त मन्त्रमें ब्राह्मण श्रादि शब्द लिङ्ग एवं वचनको श्रविवत्तासे रूपा जातिशब्द हैं, तब उनसे ब्राह्मणी श्रादिका ग्रहण भी हो जाता है । नहीं है । फिर इन ब्राह्मण - ब्राह्मणी प्रादिसे उत्पन्न बालक - बालिकाएँ भी ' सकृ-यहाँ दाख्यातनिग्रह्या ' इस महाभाष्यके वचनसे उस - उस जातिवाले हुए-तो ' पर यह थागे स्पष्ट किया जायगा । जायत ' ( ८ ) एक ही पुरुष ( परमात्मा ) से उत्पन्न हुए भी ब्राह्मणादियोंकी तब यह उच्चता - नीचता पूर्व जन्मके कर्मके कारण, उत्पत्ति के द्वारभूत मुख, बाहु, ऊरू, चरण आदि अङ्गोंकी उपाधिके कारणसे होती है । तब ब्राह्मण-मुखका शूद्रादियोंकी आपस में उच्चता - नीचता भी जन्म से ही सिद्ध होती है । श्रमेदोपण इस प्रकार उत्पत्तिस्थानके कारण वर्णोंकी उत्कृष्टता - अपकृष्टता व्यवहारकै है.। साथ ही साथ वर्णोंकी व्यवस्था भी जन्मलें ही सिद्ध हुई । उच्चता- ' ' इस प नीचताको जन्ममूलकत्तामें उपपत्ति मनुजीके निम्न शब्दोंमें द्रष्टव्य है-यहाँ पर ' ऊर्ध्व नाभेर्मेध्यतरः पुरुषः परिकीर्तितः । तस्मान्मेध्यतमं स्वस्य मुखमुक्तं मा ०८ स्वयम्भुवः ' ( १।१२ ) यहाँ नाभिसे ऊपर के श्रृङ्गोंसे उत्पन्न ब्राह्मण और हुआ । क्षत्रिय मेध्यतम एवं मेध्यतर सिद्ध हुए । इस प्रकार नाभिसें नीचे ठहरे * * धीती, में हुए ऊरू एवं पादके अमेध्यतर, श्रमेध्यतम होनेसे उनसे उत्पन्न वर्ण भी अथवा यहां वैसे सिद्ध हुए । तब वर्णों में उत्कृष्टता - अपकृष्टता उत्पत्तिमूलक सिद्ध हुई । 11 ] रा इसके अतिरिक्त ब्राह्मण प्रथम उत्पन्न होनेसें ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ सिद्ध + वैश्यः दृ हुआ । वैश्य ' मध्यं तदस्य यद् वैश्यः ' ( अथर्व ० १६ ६ ६ ) मध्य ( कमर ) है । यहां से से उत्पन्न होनेसे मध्यम हुआ । शूद्र पादज - अवरज होनेसे अवर सूत्रसे हु ( प्रथम ) सिद्ध हुआ । इस प्रकार वर्णोंमें उत्तमता, ' मध्यमता एवम् उपचार श्रधमता सिद्ध होने से वेदको भी इनका साम्प्रवाद इष्ट सिद्ध न हुआ, जिसे सुधारक लोग वैदिक कहने का साहस करते हैं । CC - 0. Ankur Joshi ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत ' ( क ) १८६ 2 ( E ) उक्त मन्त्रमें अपादान ( पञ्चमी ) अर्थ एवम् उत्पत्ति अर्थ ( जिसे हमने किया है ) निर्मूल भी नहीं है - इस बातको सिद्ध करने के लिए हम प्राचीन प्रमाण भी उपस्थित करते हैं । ' आलोक ' के विद्वान पाठकगण इसमें अवधान दें । ( क ) स्वा ० दयानन्दजीसे भी मान्य श्रीभास्कराचार्य प्रणीत " सद्धान्तशिरोमणि ' के गोलाध्यायमें ' भुवनकोशनिरूपण ' में प्रलय के वर्णन में कहा है- ' ब्राह्म लयं ब्रह्मदिनान्तकाले भूतानि यद् ब्रह्मतनुं ' विशन्ति ' ( ६३ ) यहां पर श्रीभास्कराचार्यका अपना ही भाष्य दृष्टव्य है - जिससे चारों वर्णोंकी परमात्माके श्रङ्गोंसे उत्पत्तिमें उपपत्ति भी दिखलाई गई है । उसमें कहा गया है — ' यो ब्रह्मदिनान्ते चतुर्युग--सहस्रावसाने लोकन्नयस्य संहारः, स ब्राह्मो लय उच्यते । तत्र अक्षीण-पुण्यपापा एव लोकाः कालवशेन ब्रह्मशरीरं प्रविशन्ति । तत्र मुखं ब्राह्मणाः [ प्रविशन्ति ], बाह्वन्तरं क्षत्रियाः, ऊरुद्वयं वैश्याः, पादद्वयं शूद्राः । ततो निशावसाने पुनब्रह्मणः सृष्टिं चिन्तयतो मुखादिस्थानेभ्यः कर्मपुटान्तरत्वाद् ब्राह्मणादयस्तत एव निस्सरन्ति ' । यहां पर बहुत ' ही सुन्दर उपपत्ति दी गई है । उसका भाव यह हैं कि प्रलय में प्राणी -मरकर अपने यथास्थित कर्मों के अनुसार ब्रह्माके शरीर में प्रविष्ट हो जाते हैं । तब सृष्टि करनेके समय उत्तम कर्मोंसे मुखसे उत्पन्न हुए ब्राह्मण कहाते हैं, बाहु श्रादिसे उत्पन्न क्षत्रियादि हुआ करते हैं । इससे मुत्र ' आदिसे वर्णोंकी उत्पत्ति समूल सिद्ध हुई । ( ख ) स्वा ० द ० से मान्य प्रशस्तपादभाष्य में भी कहा गया है-" सच महेश्वरेण विनियुक्तो ब्रह्मा... मुखबाहूरुपादतः चतुसे [ ब्राह्मणादीन ] वर्णान् श्रृत्यानि च उच्चावचानि भूतानि सृष्ट्वा ' ( द्रव्यग्रन्थ ) यहाँ भी ब्राह्मणादियोंकी ब्रह्मा मुख श्रादिसे उत्पत्ति कही है । Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 114
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१६० श्रीसनातनधर्मालांक: ( ग ) कृष्णयजुर्वेद में भी यही स्वीकृत किया गया है— ' प्रजापतिर-कामयत- प्रजायेय इति । स मुखतस्त्रिवृतं निरमिमीत.... ब्राह्मणो मनुष्याणां... तस्मात् ते मुख्याः, मुखतो हि असृज्यन्तं... अश्वश्व शूद्रश्च । तस्मात् शूद्रो यज्ञेऽनवक्लृप्तः, नहि देवता धन्वसृज्यत, तस्मात् पादावुपजीवतः, पत्तो हि श्रसृज्येताम् ' ( तै ० सं ० ७ | १ | ४ | १ ) मीमांसा -दर्शनके ११४।२४ सूत्रके शाबरभाष्यमें भी यही श्रुति उष्टत की गई है । इस प्रकार यहाँ भी पञ्चमी अर्थकी स्फुटता ही है । इस प्रकार शुक्लयजुर्वेद में भी यही अर्थ है । ( घ ) ' यस्माद् एते [ ब्राह्मणाः ] मुख्याः, तस्मात् मुखतो हि असृ-ज्यन्त ' यह वचन स्वा ० द ० जीने ' शतपथब्राह्मण ' के नाम से ' स ० प्र ० ' के ४ थं समुल्लास १२ पृष्ठमें उद्धृत किया है— इससे भी पञ्चम्यर्थी स्पष्टता है, पर अर्थ करनेके अवसर पर स्वामीने अपनी कपोल - कल्पना कर दी है ॥ ङ ) इस प्रकार ‘ ताण्ड्यमहाब्राह्मण ' में भी कहा है - ' स मुखत-स्त्रिवृतमसृजत, तं गायत्रीछन्दोऽन्वसृज्यत, अग्निर्देवता, ब्राह्मणो मनुष्यः, तस्मान्मुखं ब्राह्मणो मनुष्याणाम्, गायत्री छन्दसाम्, अग्निर्देवतानाम् । तस्माद् ब्राह्मणो मुखेन वीर्ये करोति, मुखतो हि सृष्ट: ' ( ६।११६ ) ' स उरस्त एव बाहुभ्यां पञ्चदशमसृजत, राजन्यो मनुष्यः, इन्द्रो देवता, तस्माद् बाहुवीर्यः, बाहुभ्यां हि सृष्टः ( ६८ ) । स मध्यत एक प्रजननात् सप्तदशमसृजत, वैश्यो मनुष्यः, विश्वेदेवा देवताः, तस्माद् वैश्योऽद्यमानो न क्षीयते, प्रजननादि सृष्टः । तस्माद् ब्राह्मणस्य राज-न्यस्य च श्राद्योऽधरो हि सृष्टः [ यहां पर श्रीसायणने लिखा है-‘ यस्माद् श्रधरः पश्चाद्भावी निसृष्टः सृष्टः तस्मात् ] ६।११६, स पक्त एव ( पादात् ) प्रतिष्टाया एकविंशमसृजत, न काचन देवता, शूद्रो मनुष्यः । तस्मात् शूद्रोऽयज्ञियः, विदेवो हि नहि तं काचन देवताऽन्वसृज्यत, ' ब्राह्मणोश्य मुखमासीत् ' ( क ) १६ तस्मात् पादावनेज्यान्नातिवर्धते, पत्तो हि सृष्ट: ( ६ | १ | १० ) ' तारयवाह्मणने भी स्पष्ट शब्दोंसे उन - उन वर्णोंकी उन वहां उत्पत्ति मानी है । यहां पर श्रङ्ग - वाचक धारा ही - उन । शब्द विभक्ति वाले हैं । ( च ) ' वैखानसधर्मसूत्र ' में भी कहा है - ' ब्राह्मण - क्षत्रिय { श्र मुख- चाहूरु - पादेषु जाताश्चत्वारो वर्णाः यस्माद् ' ब्राह्मणोस्य - वैश्वा धर्म इत्यादिश्रुतिः ' ( १ | १ | २ ) क्या अब भी कोई वादी ' ब्राह्मणास्य मुखमा सीत् ' का पंचमीले विरुद्ध अर्थ कल्पित कर सकता है? । मुख् मुखत ( छ ) प्रसिद्ध स्मृति, स्वा ० दयानन्दजीके ' सत्यार्थ! पादय प्रकाश स एकादशसमुल्लासके चारम्भिक वचनके. एवं यास्कादिके वचन के अनुस स्पृष्ट सृष्टिकी श्रादिमें बनी हुई ' मनुस्मृति ' में भी इस विषय में स्पष्ट है — ' लोकानां तु विवृद्ध्यर्थं मुखबाहूरुपादतः । ब्राह्मणं, क्षत्रिय, वै ( ३२ शूद्र ं च निरवर्तयत् ' ( ११३१ ) यहां पर श्रीमेधातिथिने भाष्य किया है- करती ' यथाक्रमं मुखाद् ब्राह्मणम्, बाहुभ्यां राजन्यम्, ऊरुभ्यां वैश्यम् पादत इति । तसिरपादाने । कारणात् कार्यं निष्कृप्यते इति श्रपाये ( विश्लेषे ' सति श्रपादानत्वम् । ग्राद्य कंचिद् ब्राह्मणं स्व कहा ' वयवेभ्यो दैव्या शक्त्या निर्मितवान् ' । यहां पर कितने स्पष्ट स श्रीमेधातिथिने पंचमी अर्थकी पुष्टि की है । श्रीकुल्लूकभट्टने भी स पद्यकी व्याख्या इसी प्रकार लिखी हैं- ' दैव्या च शक्त्या मुखादिमं भुज-' ब्राह्मणादि - निर्माणं ब्रह्मणो न विशङ्कनीयम्, श्रुतिसिद्धत्वात् । तथा ' सह है - य " श्रुति: - ' ब्राह्मणस्य मुखमासीद् ' इत्यादि " । पादत ( ज, ' तं [ ब्राह्मणं ] हि स्वयम्भूः स्वाद् स्यात् ( मुखात् ) तपल दिवा प्त्वाऽऽदितोऽसृजत् ' ( मनुस्मृति १।६४ ) ' आदितोऽसृजत् ' और ' आसाद् इस्य यसृजत् ' कहनेसे ब्राह्मणोंकी ज्येष्ठता और श्रेष्ठता सिद्ध हुई । श्र हैं । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 115
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१६२ श्रीसनातनधर्मालीकः ४ ) माता - पितासे जो श्रादिमं जन्म प्राप्त कराता है; वही ज्येष्ठ, श्रेष्ठ एवं पूज्य माना जाता है, इस प्रकार ब्राह्मण भी विराट् द्वारा प्रथम उत्पन्न होनेसे अन्य वर्णोंसे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है । ‘ मुखबाहूरुपजानां ' ( १1८७ ) यहाँ भी वही बात है । ' उत्तमाङ्गोद्भवाद् ' ( मुखोत्पन्नत्वाद् ) ज्यैष्ठयाद् ( श्रादित उत्पन्नत्वाद् ) ब्रह्मणश्चैव धारणात् । सर्वस्यैवास्य सर्गस्य धर्मतो ब्राह्मणः प्रभुः ' ( मनु ० १११३ ) यहां भी वही बात कही गई है । ( झ ) ' हारीतस्मृति ' में भी कहा है – ' यज्ञसिद्ध्यर्थंमनघान् ब्राह्मणान् मुखतोऽसृजन् । ' असृजन् क्षत्रियान् बाह्वोर्वैश्यान प्यूरुदेशतः । शूङ्खश्च पादयोः सृष्ट्वा तेषां चैवानुपूर्वशः । ११२-१३ ) यहां भी पंचमी अर्थक्री स्पष्टता है; क्योंकि – ' जनिकतु ': प्रकृति: ' ( पा ० १ | ४ | ३० ) जनन अर्थ चाली धातुके योग में पंचमी प्रसिद्ध ही है, और ' सप्तम्यां जनेर्डः ' ( ३/२/१७ ) इस सूत्र के लिङ्गसे जननार्थक धातुके योगमें सप्तमी भी हुआ करती है; इसलिए हारीतवचनमें पंचमी एवं सप्तमी दोनों ली गई हैं ।. ( न ) ' याज्ञवल्क्यस्मृति ' के प्रायश्चित्ताध्याय यतिधर्मं प्रकरण में भी कहा है – ' सहस्रात्मा मया यो व श्रादिदेव उदाहृतः । मुखबाहूरुपज्जाः स्युस्तस्य वर्णा यथाक्रमम् ' । ( १२६ पद्य ) यहां पर मिताक्षराने लिखा है – ' सकलजगद्हेतुतया श्रादिदेवो मया युष्माकमुदाहृतः, तस्य वदन-भुज- सक्थि चरणजाता यथाक्रममग्रजन्मादयश्चत्वारो वर्णाः ' यहां पर ' सहस्रात्मा ' कहने से ' सहस्रशीर्षा ' इस सूक्तके उक्त मन्त्रका यह अर्थ है - यह सूचित किया गया है । इसलिए इसके अग्रिम पद्योंमें ' पृथिबी पादतस्तस्य मुखात् शिखी ' ( १२७ मनसश्चन्द्रमा जातश्चक्षुपश्च दिवाकरः ' ( १२८ ) उक्त मन्त्रके साथ वाले ' चन्द्रमा मनसो ' जातः ' इत्यादि मन्त्रोंका ही अर्थ श्रीयाज्ञवल्क्यने निरूपित किया है - यह स्पष्ट है । तब उक्त मन्त्रंके उक्त पदका पंचमीका अर्थ करना समूल ही है । ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( क ) ( ट ) अब ' आलोक ' पाठकगण बृहत्पराशरस्मृति ' में भी दृष्टि डालें ' ब्रह्मा वै ब्राह्मणान् अस्याः ( पृथिव्याः ) प्रभून् श्रसृजदास्य ( मुख ) तः । सद् ( पृथिवी ) रक्षणाय बाहुभ्यामसृजत् क्षत्रियानपि ( ३/१४६ ) पाशुपा-या शनोत्पच्यै, उरुभ्यां च तथा विशः । द्विजदास्याय पण्या पट्ट्यां शूद्रमकल्पयत् ( १५० ) यहां भी पंचमी अर्थकी स्पष्टता है । ' ( i ) इसी प्रकार ' वाल्मीकि रामायण ' में भी कहा है- ' मुखतो ब्राह्मणा'जाता उरसः क्षत्रियास्तथा । ऊरुभ्यां जज्ञिरे वैश्याः, पद्यां हा इति श्रुतिः ' अरण्यकाण्ड १४ | ३० ) यहां पर श्रीवाल्मीकिने उक्त अर्थका श्रुति ( वेद ) में सद्भाव बताया | तब उक्त वेदमन्त्र इसी वाला है- यह सिद्ध हो गया । यहां ' रस ' का अर्थ है " बाहुमध्यात् ' । कहीं ' बाहुभ्यां ' पाठ भी हैं । ( ड ) वादिप्रतिवादिमान्य ' महाभारत ' में भी बहुत स्थलोंमें ऐसा ही कहा है- ' मुखतः सोऽसृजद् विप्रान् ( ब्राह्मणान् ) बाहुभ्यां क्षत्रियस्तथा । वैश्यश्चाप्यूरुतो राजन्! शूद्रान् वै पादनस्तथा ' ( भीष्म-पर्व ६७ | १८-१६ ) ब्राह्मणो मुखतः सृष्टो ब्रह्मणो राजसत्तम! बाहुभ्यां क्षत्रियः सृष्टः, ऊरुभ्यां वैश्य एव च । वर्णचतुर्थः सम्भूतः पद्यां शूही विनिर्मितः ' ( शांन्तिपर्व ७२ / ४-५ ) । इसी प्रकार ' ततः कृष्णो महाभागः पुनरेव युधिष्ठिर! ब्राह्मणानां शतं श्रेष्ठं मुखादेवासृजत् प्रभुः । ( शांति-२०७।३१ ) ' बाहुभ्यां क्षत्रियशतं वैश्यानामूरुतः शतम् । पद्यां शूद्र-एवं चैव केशवो ' भरतर्षभः ' ( ३२ ) स एवं चतुरो वर्णान् समुत्पाद्य -महातपाः । श्रध्यक्षं सर्वभूतानां धातारमकरोत् स्वयम् ' ( ३३ ) यहां भी वही पूर्वोक्त अर्थ स्पष्ट है । ( ढ. श्रीस्वामी शङ्कराचार्यने ' अथ श्रभ्यमन्यत् स मुखाच योनेई-स्वाम्यां च श्रग्निमसृजत ' ( १।४।६ ) इस ' गृहदारण्यक ' की कण्डिकाकी CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 116
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१६५ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) व्याख्या करते हुए लिखा है — ' श्रथ इति शब्दद्वयमभिनयप्रदर्शनार्थम् । श्रनेन प्रकारेण मुखे हस्तौ प्रक्षिप्य अभ्यमन्यत् श्राभिमुख्येन मन्यनम-करोत् । स मुखं हस्ताभ्यां मथित्वा मुखाच्च योने हस्ताभ्यां च योनिम्या-मपि ब्राह्मणजातेरनुग्रहकर्तारमग्निमसृजत् सृष्टवान् । तथा ब्राह्मणोपि मुखादेव जज्ञे प्रजापतेः 1 । तस्माद् एकपोनित्वाज्ज्येष्ठेनेव अनुजोनुगृह्यते श्रग्निना ब्राह्मणः । तस्माद ब्राह्मणोग्निदेवत्यो मुखवीर्यश्च - इति श्रुति-स्मृतिसिद्धम् । तथा बलाश्रयाभ्यां बाहुभ्यां बलभिदादिकं क्षत्रियजाति-नियन्तारं क्षत्रियं च । तस्माद् ऐन्द्र ं तत्र बाहुवीर्ये च इति श्रुतौ स्मृती. च अवगतम् । तथा उरुत ईहा चेष्टा तदाश्रयाद् वस्वादिलक्षणं विशो. नियन्तार विशं च । तस्मात् कृप्यादिपरो यस्वादिदैवत्यश्च वैश्यः । तथा पूषणं पृथ्वीदेवतं शूद्र ं च पद्भ्यां परिचरणक्षममसृजत- इति श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धेः ' । यहां पर श्राचार्येन सीमातीत स्पष्टता कर दी है । ( ण ) ' वायुपुराण ' में भी कहा है- ' वक्त्राद् यस्य ब्राह्मणाः सम्प्र-स्तास्तद्व्वद्भस्तः क्षत्रियाः, पूर्वभागः । वैश्याश्चोर्वार्थिस्य पद्भ्यां च शूहाः, सर्वे वर्णा गात्रतः सम्प्रसूताः ' ( ६।७७ ) यहां भी वही कहा गया है । ( त ) प्रसिद्ध ' श्रीमद्भागवत पुराण में भी कहा है- ' मुखतोड़वर्तव ब्रह्म पुरुषस्य कुरूद्वह! बाहुम्योऽवर्तत क्षत्रं क्षत्रियस्तदनुव्रतः । विशोऽव-र्तन्त तस्योत्रर्लो [ वृत्तिकरीविंभोः । पद्भ्यां भगवतो जज्ञे. शुश्रूषाकर्म-सिद्धये । ताभ्यां जातः पुरा शूद्रो ' ( ३।६।३०-३३ ) । ' वायुपुराण ' में अन्यत्र भी कहा हैं — ‘ मिथुनानां सहस्र ं तु ( ब्राह्मणान् ) सोसृजद् वै मुखात्तदा. सहस्रमन्यद् ( चत्रियान्, वक्षस्तो मिथुनानां ससर्ज ह । सृष्ट्वा सहस्र-मन्यत्तु ( वैश्यःन् ) द्वन्द्वानामूरुतः पुनः । पद्यां सहस्रमन्यन्तु ( शूद्धान् ) मिथुनानां ससर्ज ह ' ( ८३७-४० । श्रीमद्भगवतमें अन्यत्र भी कहा है-' सुखबाहूरुपादेभ्यः पुरुषस्याश्रभैः सह । चत्वारो जज्ञिरे वर्षा गुणैर्वि-प्रादयः पृथक् ' ( ११।५।२ ) ' गुणै: पृथक ' का अर्थ है ' भिन्न - भिन्न गुण-ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( क ) धारी ' | ' विप्रक्षत्रिय विट्शूद्रा मुखबाहूरुपादजा: ' ( भाग ० अर्थं पूर्वकी भान्ति है । ( थ ) ' ब्रह्मवैवर्तपुराण ' में भी कहा है- ' बभूवु १६६ १६५ ( ११।१७।१३ ) ( सर्ग द्वारा चतुथ हाणो वक्त्राद् संहिता श्रन्या ब्राह्मणजातयः । ' ( १० । १४ ) ब्रह्मणो बाहुदेशाच्चैवान्याः सत्रियः जातयः । १५ । ऊरुदेशाच्च वैश्याश्च पादतः शूद्रजातयः । तासां सर ( " जान बभूवुर्वर्णसङ्कराः ' ( ब्रह्मखंड १०१.१६ ) । मुखात् ( ब्राह्मणा ( द ) ‘ भविष्यपुराण ' ब्राह्मपर्वमें भी कहा है- ' लोकस्येह विवृद्ध्यर्थं वसोद मुख - चाह्वरुपादतः । ब्रह्मक्षन्नं तथा चॊोभौ वैश्य शूद्रौ नृपोत्तम! ' ( २/२ ) “ तस्मान्मुखाद् द्विजो जात इतीयं वैदिकी श्रुतिः ' ( २।१२६ ) ' वैदिकी श्रुतिः ' कहने से स्पष्ट है कि - उक्त वेदमन्त्रका सभी को यही पञ्चमी- वास्तु व विभक्तिवाला अर्थ इष्ट है । ( ध ) इस प्रकार ‘ सूतसंहिता ' में भी कहा है- ' शिरोभागाद् ब्राह्मण- ( १ ब्राह्मण्योः, बाहुतः क्षत्रिया- तत्रिययोः, वैश्यशूद्धावपि वैश्यशूद्राभ्यां भयसे ह . सहैव ऊरुपद्भ्याम् ' । इस वेद की उप ( न ) ‘ त्रिष्णुपुराण ' प्रथमांशमें भी कहा है- ' सत्याभिधायिनः पूर्व सिद्ध हुई सिसृक्षोघ्रह्मणो जगत् । श्रजायन्त द्विजश्रेष्ठ! सरवोद्रिक्ता मुखात् प्रजाः मुख श्रा ( ब्राह्मणाः ) । वक्षसो रजसोद्विक्ता: क्षत्रियाः ) तथाऽन्या ब्रह्मणोऽभवन् । सभी सम रजसा तमसा चैव समुद्रिक्तास्तथोरुतः ( वैश्याः ) । पद्भ्यामन्याः प्रजाः उस सम ( शूङ्गान् ) ब्रह्मा ससर्ज द्विजसत्तम! तम: - प्रधानास्ताः सर्वाश्चातुर्वएर्यमिदं सृष्टि भि ततः ', ६।२१ ) ' श्रीमद्भागवत ' श्रष्टम स्कन्धमें भी कहा है— ' विप्रो हो; चाहे मुखाद् ब्रह्म च यस्य गुह्यंौं ं , राजन्य श्रासीद् भुजयोर्बलं च । ऊर्वो विडो हुई हो । जॉऽघ्रिरवेदशूद्रौ, प्रसीदतां नः स महाविभूति: ' ( २/११ ) । आदि स CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 117
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) १६६ १६५ ( प ) ‘ मनूनां सर्गमकरोद् मुखबाहूरुपादतः । चतुर्णी ब्राह्मणादीनां १७११३ ) ( सर्गद्वारं जगत्पतिः । द्विजयुग्मं, क्षेत्रयुग्मं, वैश्ययुग्मं तथैव च । मिथुनं .. च चतुर्थस्य ( शूद्रस्य ) एतन्मनुचतुष्टयम् ' ( ' तस्वत्रय ' स्थित ' विष्वक्सेन-वक्त्राद् संहिता ' में । : क्षत्रिय-( क ) ' मार्कण्डेयपुराण ' में भी कहा है- ' मिथुनानां सहस्र ं तु सहर मुखात् सोऽयासृजन्मुने! जातास्ते ह्युपपद्यन्ते सरवोदिताः सचेतसः ’ ( ब्राह्मणाः ) ( ४६।३ ) सहस्रमन्यद्, वक्षस्तो मिथुनानां ससर्ज ह । ते सर्वे वृद्ध्यर्थं रजसोद्रिकाः शुष्मिण ( बलवन्त ) श्चाप्यमर्षिणः ( क्षन्निया:) ( ४ ) सस-( २/१२ ) न्यत् सहस्र ं तु द्वन्द्वानामूरुतः पुनः । रजस्तमोभ्यामुद्रिका ईहाशी-., ' वैदिकी पन्चमी लास्तु वे स्मृताः वैश्याः ) ( ५ ) पद्भ्यां सहस्रमन्यश्च मिथुनानां ससर्ज ह । -उद्रिकास्वमसा सर्वे निःश्रीका ह्यल्पचेतसः ' [ शूद्राः ] ( ४६.६ ) । ब्राह्मण- ( १० ) यही आशय अन्य बहुतसे ग्रन्थोंमें पाया जाता है, विस्तार-भवसे हम उसे उद्धृत नहीं करते । इस प्रकार ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् ' इस वेदमन्त्रका बहुत ग्रन्थोंकी साक्षीसे मुख श्रादि द्वारा ब्राह्मण श्रादि-की उत्पत्तिका अर्थ समूल सिद्ध हुआ, इससे वर्णव्यवस्था भी जन्म से यिनः पूर्व सिद्ध हुई । प्रारम्भिक सृष्टिमें असम्भवका प्रश्न ही व्यर्थ है कि-तू प्रजाः मुख श्रादिसे ब्राह्मणादिको सृष्टि कैसे सम्भव हो सकती है? संसारके ऽभवन् । सभी सम्प्रदायने आरम्भिक सृष्टिमें असम्भवको श्रश्रय दिया ही है । राः प्रजाः उस समय सभीने श्रमैथुनसे उत्पत्ति मानी ही है; चाहे उनके अनुसार र्चर्यमिदं सृष्टि भिन्न - भिन्न प्रकारसे हुई हो, किसीके मतमें श्रङ्गोंसे उत्पत्ति हुई – विप्रो हो; चाहे मट्टीसे हुई हो. अथवा संकल्प से होगई हो; वा वचनमात्रसे विडो हुई हो । स्वा ० द ० जीने भी ' सत्यार्थप्रकाश ' में लिखा है- ' परन्तु आदि सृष्टि मैथुनी नहीं होती ' ( श्रष्टम १३८ पृष्ठ ) । CC - 0. Ankur Joshi ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( क ) १६७ इस प्रकार जब यह सिद्ध हो गया कि चारों वर्ण परमारमा के भिन्न-भिन्न श्रङ्गसे उत्पन्न हुए; तब यह भी सिद्ध हो गया कि वर्ण - व्यवस्था का मूलाधार जन्म ही है । प्रलयके समयमें जीव अपने - अपने गुणकर्म वासना आदिको अन्तर्हित करके ब्रह्ममें विलीन हो जाया करते हैं, और प्रजापति उनके गत जन्मके गुणकर्मके अनुसार उनके लिए उपयुक्त सुख श्रादि श्रङ्गाँसे ब्राह्मणादि वर्णरूपमें उत्पत्ति करता है । ऐसा नहीं है किं - परमात्मा जीवको उत्पन्न करके उनके इस जन्मके गुणकर्मके आधारसे उनको उस - उस वर्ण में करता हो । तब ' ब्राह्मणोस्य मुखमा-सीद् ' मन्त्रसे गुणकर्मसे वर्ण - व्यवस्थाका सिद्धान्तं खण्डित ही हो जाता है । Collection Gujarat. ( ११ ) अब हम इस विषय में वेदभाष्यकारोंके उक्त मन्त्रार्थकी भी उष्टत करते हैं । ( श्र ) थथर्ववेदके उक्त मन्त्रमें सायणमाध्य इस प्रकार है-‘ ब्राह्मण - जातिविशिष्टः पुरुषः श्रस्य मुखाद् उत्पन्न इत्यर्थः ।... मध्यभागाद् वैश्य उत्पन्न इत्यर्थः । पद्भ्यां पादाभ्यां शुद्धः श्रजायत- उत्पन्नः । इत्यं च मुखादिभ्यो ब्राह्मणादीनामुत्पत्ति तैत्तिरीयाः समामनन्ति - ' स मुखत-त्रिवृतं निरमिमीत ' इत्यादि ' ( श्र ० १६ ६ ६ ) । ( था ) उक्त मन्त्रके भाष्य में श्रीउवटने लिखा है - ' तदास्योत्पन्न-स्वादिति ' । यहीं श्रीमहीधरने भी लिखा है- ' ब्राह्मणः - ब्राह्मणजाति-विशिष्टः पुरुषोस्य मुखमासीद् - मुखादुत्पच इत्यर्थः ।.उ.रुभ्यामुत्पा-. दितः । तथास्य पद्भ्यां शूद्रत्वजातिमान् पुरुषोऽजायत – उत्पन्नः । An eGangotri Initiative
पृष्ठ 118
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१६८ श्रीसनातनधर्माल्लोकः ( ४ ) ( इ ) ‘ तैत्तिरीयारण्यक ' में सायणभाष्य इस प्रकार है - ‘ यत्पुरुषं व्यदधुः - प्रश्नोत्तर - रूपेण ब्राह्मणादिसृष्टिं वक्तुमत्र ब्रह्मवादिनां प्रश्ना उच्यन्ते । प्रजापतेः प्राणरूपा देवा यद् यदा पुरुषं - विरारूपं व्यदधुः-संकल्पेन उत्पादितवन्तः, तदानीं कतिधा, कतिभिः प्रकारै विविधं कल्पित--वन्त: 1 एष सामान्यरूपः प्रश्नः । मुखं किम् - इत्यादयो विशेषप्रश्नाः ' ( ३।१२।१ ) ' ब्राह्मणोस्य योऽयं ब्राह्मणत्वजातिविशिष्टः पुरुषः, प्रजापतेमुखमासीत् मुखाद् उत्पन्नः - इत्यर्थः । योऽयं राजन्यः – क्षत्रिय-जातिः, स बाहुत्वेन निष्पादितः -- बाहुभ्यामुत्पादितः इत्यर्थः । तत्-तदानीं यौ प्रजापतेरूरू तद्रूपो वैश्यः सम्पन्नः - उरुभ्यामुत्पन्न इत्यर्थः । ” तथा पद्भ्यां शूद्र उत्पन्नः । इयं च मुखादिभ्यो ब्राह्मणादीनामुत्पत्तिः सप्तमकाण्डे ‘ स मुखतस्त्रिवृतं निरमिमीत ' इत्यादौ विस्पष्टमाम्नाता । अतः प्रश्नोत्तरे उमे अपि तत्परत्वेनैव योजनीये ' 1 चन्द्रमा मनसो – ' यथा दध्याज्यादिद्रव्याणि गवादिपशव ऋगादिवेदा ब्राह्मणादिमनुष्याश्च तस्मादुत्पन्नाः, एवं चन्द्रादयो देवा श्रपि तस्मादेव उत्पन्ना: ' । ' नाभ्या श्रासीत् -- यथा देवास्तस्मादुत्पन्नाः, तथा लोकानपि अन्तरिक्षादीन् प्रजापतेर्नाभ्याद्यवयवेभ्योऽकल्पयन् उत्पादितवन्तः ' । इस प्रकार बहुतोंकी साक्षी होनेसे उत्पत्ति अर्थ सिद्ध होने से पंचमी विभक्तिका ही अर्थ सिद्ध हुआ; और ब्राह्मणादि वर्णोंकी व्यवस्था जन्मसे ही सिद्ध हुई । मुख त्रादिसे जन्म भी पूर्वजन्मके कर्मों से होता है; तब उन्हीं ब्राह्मणादिके पुत्र भी ' सकृदास्यातनिर्याह्या ' ( ४ ॥ २।६३ ) इस महाभाष्यके वचनसे ब्राह्मण जाति वाले सिद्ध हुए । इस मन्त्रमें गुण-कर्मोंका गन्ध भी नहीं है । CC - 0. Ankur Joshi Collection ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( क ) १६६ 700 ( ई ) वादियोंके श्राचार्य स्वा ० द ० जीने भी ' ऋग्वेदादिभाष वास्तवि | भूमिका ' के सृष्टिविद्याविषयमें ' मुखं किमस्यासीत् किं बाहू, वि.मूरुपादा हुधा । उच्येते ' इस प्रश्नमन्त्रमें भी पञ्चमीका और उत्पत्तिका ही अर्थ म जैसा कि है । जैसे कि – ' मुखं किम्? अस्य पुरुषस्य मुखं मुख्यगुणेभ्यः ( १ ) लिखा किमुत्पन्नमासीत्? किं वाहू बलवीर्यादिगुणैः ( १ ) किमुत्पन्नमासीत्? ' सन्देह किमूरू - व्यापारादिगुणैः ( १ ) किमुत्पन्नमासीत्? पादा उच्येते - पा विभक्ति श्रर्थान्मूर्खत्वादिनीचगुणैः किमुत्पन्न ं वर्तते? ( पृ ० १२६ ) इस प्रश्न- अन्य श्र मन्त्रमें स्वा ० दयानन्दजीने स्वयं पञ्चमीका अर्थ तथा वर्णों की उत्पि व्यक्ति मानी है । इस प्रकार इसके उत्तरमन्त्रमें स्वामीने वही अर्थ किया है । करते हैं जैसेकि - ब्राह्मणोऽस्य श्रस्य पुरुषस्य मुखं ये दिद्यादयो मुख्यगुणाः, के. योगं तेभ्यो ब्राह्मण उत्पन्नो भवति । बाहू - क्षत्रियस्तेन कृत... उत्पन्नो भवति । विषम हो ऊरू.. तेभ्यो वणिगजन उत्पन्नो भवति । पद्भ्यां जडवुद्धित्वादि-नहीं । गुणेभ्यः शूद्रः... श्रजापत जायते इति वेद्यम् ' ( ऋ ० भा ० भू ० पृ ० १२७ ) प्रयोग में यहां स्वामीने जब परमात्मा के मुख आदि को पञ्चम्यन्त माना है । अपने नि और वर्णोंकी उनसे उत्पत्ति स्वीकृत की है; तब वादी, वैसा अर्थ करते ' बालुका हुए हमें उपालम्भ दे सकनेके अधिकारी कैसे हैं? यह तो उनके अपने श्राचार्यने उन्हींका खण्डन कर दिया । गुण- कल्पना तो स्वामीने ( १२ मन्त्रमे श्रविद्यमान होने पर भी स्वयं ही कल्पित की हैं, अतः वह ठीक आदि, मु नहीं । वह ' स्वामी के कथन द्वारा भी ठीक नहीं; क्योंकि — द्रव्यके द्वारा होनी चा तो गुणकी उत्पत्ति होती है, परन्तु गुणोंसे द्रव्यकी उत्पत्ति कभी नही पुरुषों की होती । विद्यादि गुण हैं और ब्राह्मण आदि द्रव्य । तय विद्यार उत्पत्तिद्व गुणसे द्रव्य ब्राह्मणकी उत्पत्ति कैसे हो सकती है? यह बात स्वा ० १० पुरुषोंका! जीने भी ‘ संत्यार्थप्रकाश ' में स्वयं स्वीकृत की है- " गुणसे द्रव्य कभी नहीं नहीं वन सकता: जैसे रूपसे अग्नि और रसंसे जलं नहीं बन सकता श्रादिसे व ( १३ समु ० ३०० पृष्ठ ) । इस प्रकार बहुतों की साक्षी होनेसे सकृदाख्य Gujarat. An eGangotri Initiative
पृष्ठ 119
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
700 श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) १६६ दिभाष्य- वास्तविकता होनेसे उक्त मन्त्रमें पञ्चमी विभक्ति और उत्पति अर्थ सिद्ध - मूरुपादा हुआ । इससे ‘ पद्द्भ्याम् ' में चतुर्थीकी कल्पना करते हुए श्री धर्मदेवी र्थ किया जैसा कि - ' भारतीय समाजशास्त्र ' ( प्रथम संस्करण ) के १६ पृष्ठमें उन्होंने भ्यः लिखा ' है ' पदुद्भ्यां शूद्रो श्रजायत ' इस चतुर्थ चरणके विषयमें कुछ मासीत् ( १ ) ' सन्देह हो सकता है, उसकी निवृत्तिके लिए ' पद्भ्यां ' यहां चतुर्थी पादी? विभक्ति माननी उचित है— पैरोंके कामके लिए शुद्र बनाया गया तथा श्रन्य अर्थ करते हुए श्रीभगवदाचार्यजी आदि प्रत्युक्त हो गये । यह प्रश्न- व्यक्ति अपने अशुद्ध पक्षको सिद्ध करनेके लिए ही इस प्रकारके परिवर्तन उत्पत्ति किया है । करते हैं । यहां पर ' जनिकतुः प्रकृतिः ' ( पा ० १४ ३० ) से ' ' अजायत ' योग ' पंचमी ' हुई है यागेके मन्त्रोंमें भी । ' पद्द्भ्यां शूद्रों श्रजायत '.. न्यगुणाः भवति । में ' पुष्येभ्यो याति ' की चतुर्थीका प्रयोग दिखलाकर ' चतुर्थी ' की कल्पना विपम होनेसे निर्मूल है, क्योंकि उक्त उदाहरण में जन्धातुका प्रयोग नहीं । फिर यही लोग ' चन्द्रमा मनसो जात: ' इस पूर्वके समान ५०१२७ ) अयोगमें ' चतुर्थी ' की कल्पना न करके पष्ठीका श्रर्य करते हैं । यह सब माना है । अपने निर्मूल पक्षको सिद्ध करनेके निमूल प्रयत्न हैं । इससे, उनका पक्ष अर्थ करते ' वालुकाभित्ति ' सिद्ध हो जाता हैं । नके अपने स्वामी ( १२ ) जो कि स्वा ० दयानन्दजीने शङ्का की हैं कि - ' यदि ब्राह्मण-वह ठीक आदि, मुख श्रादिसे उत्पन्न हुए; तो उनकी श्राकृति भी वैसे गोल श्रादि व्यके द्वारा होनी चाहिये थी ' यह ठीक नहीं । ऐसा होने पर तो योनि से उत्पन्न कभी नही पुरुषों की आकृति भी क्या योनि के समान होनी चाहिये? जैसा: योनि विद्याद उत्पत्तिद्वार है वैसे मुख भी । अथवा रज बीर्य द्वारा उत्पन्न होने वाले स्वा ० १० पुरुपका श्राकार भी तरल वा अस्थि - केशादिसे रहित होना चाहिये? कभी नहीं यदि नहीं; तब यहां भी वही उत्तर जान लेना चाहिये न सकती श्रादिसे उत्पन्न और ब्राह्मणादि । तब मुख से थीं । नामसे कहे हुए उन वर्णोंक सन्तान मी ' ' सकृदाख्यातनिग्रह्या ' ( एकस्यां व्यक्तौ मुखबाहूरुपादोत्पत्त्याब्राह्मणत्व-CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( क ) २०१ क्षत्रियत्ववैश्यत्वशुद्धत्वे उपदिष्टे तदपस्यतत्सहोदरादिषुतदुपदेशं विनापि तस्य सुग्रहत्वम् – एक व्यक्तिमें मुख धादिकी उत्पत्ति होनेसे ब्राह्मणत्व आदि कहने पर उसके सन्तान एवं भाई यादियोंमें बिना भी कहे वही ब्राह्मणत्व आदि जाति गृहीत होती है ) इस महामाष्यत्रोक्त जातिलचणसे, तथा ' आत्मा वै पुत्रनामासि ' ( शतपथ ० १४ | ३ | ४ | २६ ) ' सर्ववर्णेषु तुल्यासु पत्नीष्वक्षतयोनिषु । श्रानुलोम्येन सम्भूता जात्या ज्ञेयास्त एव ते ' ( मनु ० १०१५ ) इत्यादि प्रमाणोंसे उस - उस जाति वा वर्षा वाले. होते हैं । इसलिए ' वैखानसधर्मप्रश्न ' में कहा गया है । ' ब्रह्मणो मुखाद् उद्भूता ब्राह्मणा ब्राह्मययश्च तेषां गोत्रोत्पन्वाद् ब्राह्मण्यामसगोत्रायां विधिना समन्त्रकं गृहीतायां जातो ब्राह्मणः शुद्धो भवेत् ' ( ३ | ११ | ३ ) तस्माद् अधो बाहुभ्यामुत्पन्नात् क्षत्रियात् चत्रिया विधिवज्जातः क्षत्रियः शुद्धः ( १ ) श्रधस्ताद् ऊरुभ्यामुत्पचाद् वैश्याद् वैश्यायां तथा वैश्यः शुद्धः ( ८ ) श्रथ पद्भ्यामुत्पन्नात् शूद्रात् शूद्रायां न्यायेन शूद्रः शुद्धः ' ( ३।१२।१ ) तेषामेव सङ्करेण उत्पन्नाः सर्वेऽनुलो-माद्याः [ सङ्कराः ] ' ( ३।१२।३ ) । इससे " जो मुखादि श्रङ्गोंसे ब्राह्मणादि उत्पन्न होते; तो उपादान कारण (? ) के सदृश ब्राह्मणादिकी प्राकृति अवश्य होती । जैसे मुखका आकार गोलमोल है, वैसे ही उनके शरीर भी गोलमाल मुखाकृति के समान होना चाहिये... ऐसा नहीं होता । और जो कोई तुमसे प्रश्न करेगा कि – जो - जो मुखादि से उत्पन्न हुए थे, उनकी ब्राह्मणादि संज्ञा हो, परन्तु तुम्हारी नहीं, क्योंकि— जैसे और सब लोग गर्भाशयसे उत्पन्न होते हैं. वैसे तुम भी होते हो, An eGangotri Initiative
पृष्ठ 120
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२४२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) तुम मुखादिसे उत्पन्न न होकर ब्राह्मणादि संज्ञाका अभिमान करते हो, इसलिए तुम्हारा कहा अर्थ व्यर्थ है " ( स ० प्र ० ४ पृ ० ५३ ) यह कहते हुए स्वा ० द ० जीका खण्डन हो गया । क्योंकि — मुख उपादान कारण नहीं, किन्तु उत्पत्ति - द्वार है । मुखादिसे उत्पन्न ब्राह्मणादिकी सन्तानों का ब्राह्मणत्वादि ‘ सकृदाख्यातनिर्माह्या ' इस महाभाष्यके तथा पूर्व कहे हुए मनु ( १०।१ ) याज्ञवल्क्य ( श्राचा ० १० ) वैखानसं ( ३।११।३-५-८ ) आदिके वचनों से होता है — यह हम पूर्व स्पष्ट कर चुके हैं । हम पूर्व कह चुके हैं कि - समन्वयकी दृष्टिसे ' ब्राह्मणोस्य मुख • मासीद् ' इस मन्त्रका पञ्चमी अर्थ भी वेदको सम्मत है, प्रथमा अर्थ भो । उसमें पंचमीका अर्थं तो हम सप्रमाण दिखला ही चुके हैं-जिससे हमारे पक्ष जन्मना ' वर्ण - व्यवस्था ' की सिद्धि हुई, पर वादी लोग अपने पक्षके खण्डनके डरसे उस अर्थको स्वीकृत नहीं करना चाहते; वे प्रथमान्त अर्थ में विशेष परिश्रम करते हैं, कदाचित् वे उससे अपने पक्ष ' गुणकर्मणा वर्ण व्यवस्था ' की सिद्धि समझते हैं, परन्तु प्रथमाका अर्थ भी हमारे ही पक्षका साधक है — यह हम श्रीशालग्रामजी शास्त्रीके शब्दोंको अपने क्रमसे अवलम्बित करके दिखलाते हैं, ‘ श्रीसनातनधर्मालोक ' के विद्वान् पाठक इधर ध्यान दें । CC - 0. Ankur Joshi Collection 20 % ज्ञानहीन समाजक ( ८ ) ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( ख ) श्रादिकी उसीकेप [ जन्मना वर्णव्यवस्था ] का ज्ञान ( १ ) उक्त मन्त्रका ‘ यस्य ब्रह्म ( ब्राह्मणं ) मुखमाहुः ' ( अथर्व ० 10/2 रव ११ ) इत्यादि मन्त्रकी साक्षीले ' ब्राह्मण इस परमात्माका मुख है, पि यदि ' बाहु है, ऊरू वैश्य हैं, पाँव शूद्र हैं - यह अर्थ भी माना जावे; य कहाँ हैं । हमारे पक्षकी कोई हानि नहीं; क्योंकि – मुख - बाहु, ऊरू या पाद हैं? मुख बाहु - मुख, ऊरु, पाद घौर ऊरुभ्मुख, बाहु या पाद और पाद शरीरमें बाहु, ऊरु जैसे नहीं हो सकते; वैसे ब्राह्मण- आदि भी ब्राह्मणदि - सुत हाँसे भ रहते हैं; ' अन्य जातिवाले नहीं माने जाते- यह हम स्पष्ट क रिक्त किस दिखलाते हैं । पुरुष अप है, परन्त ( २ ) यदि समाजको विराट् पुरुष ( परमात्मा ) के रूपमें माना जा टक तो ब्राह्मण उसका मुख रहेगा, क्षत्रिय बाहुस्वरूप रहेगा, वंश्य को सुनना स स्वरूप ( ' मध्यं तदस्य यद् वैश्यः ' अथर्व ० १३।६।६ ) और शूद्र पाद- हो जाये स्थानीय रहेगा । वैदिक सिद्धान्तमें एक विशेषता है, वह जैसे सम भी समा " घटता है वैसे व्यष्टिमें भी | वह जैसे जातिमें घटता है; वैसे ही यसियाक भी । जैसे ब्रह्माण्डमें समन्वित होता है, वैसे ही पिण्डमें भी । ए सारा शरी · स्थल पर उसका समन्वय विस्तीर्ण है, दूसरे स्थल में संक्षिप्त । ब्राह्मण, पर समाज ' क्षत्रिय, वैश्य, शूद्ध जैसे भारतमें दीखते हैं, वैसे ही एक शरीरमें हो ' विद्यमान हैं । अब यहां उसका समन्वय देखना चाहिये । र इसका उ मुख और ब्राह्मणकी समानता देखिये । यह ज्ञानभाग है । ब्राह उसका श · सम्पूर्ण ज्ञानका श्रधिष्ठाता तथा लोभपरिग्रहसे रहित हो । यदि ब्राह्मण हुए, विकृ Gujarat. An eGangotri Initiative