सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 21–30
सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 21–30
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8 श्रीसनातनधर्मालिकि: ( ४ ) यह हम पहले ही कह चुके हैं कि ऋग्वेदादि संहिता श्रादिसे ' अलग नहीं मिलते । ऋग्वेद कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ नहीं; ऋग्वेद की संहि ताएं ही मिलकर वा भिन्न - भिन्न होकर ऋग्वेद हैं, अर्थात् ऋग्वेद की २१ संहिता कोई भी संहिता ऋग्वेद है । श्राज कल उसकी संहि-ताथों में एक शाकल संहिता ही मिलती है, अत: वह ऋग्वेद की संहिता होने से ऋग्वेद है । यजुर्वेद कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ नहीं मिलता; उसको संहिताएं ही यजुर्वेद हैं! यजुर्वेद के दो भाग हैं- एक कृष्ण, दूसरा शुक्ल । संहिता और ब्राह्मणके मिले - जुले होनेसे दुर्ज्ञेयतावश कृष्ण होता है, और दूसरा ब्राह्मणसे भिन्न शुद्ध होने से शुक्ल कहलाता है । कुछ थोड़े से ब्राह्मण इसमें भी हैं, जो विख्यात हैं । कृष्ण यजुर्वेद की ८६ संहिता हैं, उनमें श्राजकल १ तैत्तिरीय संहिता, २ काठकसंहिता, ३ मैत्रायणी ४ ' कठकंपिष्ठले संहिता —— यह चार संहिता मिलती हैं । शुक्ल यजुर्वेद की १५ संहिताएं हैं । उनमें आजकलं १ कारव संहिता, २ वाजसनेयी संहिता मिलती है । इस प्रकार यजुर्वेदकी सभी १०१ संहिताओं में छः संहिताएं ' मिलती हैं । यह सभी यजुर्वेदको संहिताएं होनेसे यजु-वेंद्र हैं । संहिता एवं ब्राह्मणोंसे पृथक कोई भी वेद भूमण्डल में नहीं ' मिलैता — यह पहले संकेत दिया ही जा चुका है । . इस प्रकार सामवेद भी कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ नहीं मिलता; उसकी संहिताएं ही समिवेद है । सामवेदकी एक सहस्र संहिताओं में 8 कौम संहिता, २. जैमिनीय संहिता - यह दो संहिता पूर्ण और राणा-नीय संहिता अंशतः मिलती हैं । सामवेद की संहिता होने से यह साम-वेद हैं | इस प्रकार श्रयवचेद्र भी कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ कहीं से नहीं मिर्त्तता; अथर्ववेदको संहिताएं ही अथर्ववेद हैं । उसकी ह संहिताओं में शौनकी संहिता, २ पैप्पलाद संहिता, यह दो संहिता मिलती है 1 । वेद संहिता होने से यह अथर्ववेद है । सबको कुल पर संक्षिप्त संज्ञावनधर्म स्परासे प्रचलितः चारों वेद्रोंकी एक - एक ही संहिता हुआ करती है; जिस कुलको वह नहीं मिलती; वह प्राप्त संहिताको हो स्वीकृत करता है । इस प्रकार यह ११३१. संहिताएं ही चारों वेदोंका मन्त्र भाग है । संहिता और शाखा एक ही बात है, इन्हें चरण भी कहा जाता है । वेदका दूसरा भाग है ब्राह्मण भाग । यह भी उतना ही हुआ करता है । जितनी संहिता, उतने ही ब्राह्मण । ब्राह्मण भाग संहिताका विनि-योग एवम् श्रर्थ रूप होता है । शब्द और अयंका सम्बन्ध नित्य हुआ करता है । इसलिए ११३१ संहिताओंके ब्राह्मण भी उतने ही होते है । ऋग्येदके श्राजकल ऐतरेय, कौशीतकी, शाङ्खायन आदि ब्राह्मण मिलते हैं । ऋग्वेदकी शाकल्य संहिताका ब्राह्मण नहीं मिलता । ऐतरेय ब्राह्मण तो ऋ ० की आश्वलायन संहिताका मिलता है; परन्तु वह संहिता उपलब्ध नहीं । शाङ्खायनीय संहिता तो नहीं मिलती; पर उसका ‘ शाङ्खायन ब्राह्मण ' मिलता है । यजुर्वेदकी वाजसनेयी सहिता का शतपथ ब्राह्मण और कारक संहिताका शतपथ ब्राह्मण भी मिलता हैं । कृष्णयजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिताका तैत्तिरीय ब्राह्मण भी प्राप्त है; अन्य यजुर्वेद सद्दिवाओंके ब्राह्मण उपलब्ध नहीं । सामवेदेकी कौथुमी संहिताका ' ताण्ड्य महाब्राह्मण ' मिलता है, जैमिनीयसंहिता का जैमिनिब्राह्मण भी मिलता है । इस प्रकार षडविंश तथा दैवत ब्राह्मण भी मिलते हैं, पर यह गवेषणीय है कि वे सामवेद्र की किस - किस संहिता के हैं । अन्य संहिता तथा ब्राह्मण उपल-ब्ध नहीं । वेद का अन्य भाग होता है उपनिषद् और आरण्यक । उसमें सन्भारा की भी कई उपनिषवें तथा आरण्यक होते हैं, ब्राह्मणभागके भी । तब ११३१- मन्त्रोपनिषद् और - ११३ ब्राह्मणोपनिषद् होते हैं । इस CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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८ श्रीमानधर्माजीक ४ ) प्रकार ११३१ मन्त्रारण्यक होते हैं और ११३१ ब्राह्मणरण्यक होते हैं । इनमें आजकल ११२ उपनिषदें मिलती हैं, तथा कुछ धारण्यक मिलते हैं; पर थोड़ोंके अतिरिक्त इसका पता नहीं चलता कि वे वेद की किस - किस संहिता वा किस - किस ब्राह्मणके हैं । ईशोपनिषद् यजुर्वेद की का संहिता भी मिलती है, वाजसनेयी संहिताकी भी । साम-वेदको कौथुमीसंहिता का प्रारण्यक उसके साथही पाया जाता है । तैत्ति-रीय संहिताका तैत्तिरीयारण्यक भी मिलता है । एतदादिक वर्णन ' सक्षिप्त वेद वेदाङ्गपरिचय ' नामक भिन्न निबन्धमें देंगे । यह सारा साहित्य वेद है । वेदका विषय यज्ञ है । सनातन और सब रहस्य इस सम्पूर्ण बेदमें वर्णित हैं । है । बेदके तीन कापड हैं -१ कर्मकाण्ड, २ ज्ञान काण्ड । कर्मकाण्ड प्रायः ब्राह्मणभागमें प्रायः मन्त्र - संहिताभाग में है, ज्ञानकाण्ड प्रायः भाग में है । इति वेदाः! ( २ ) उपवेदः — जैसे वेद चार प्रकारका है, धर्मके सब नियम वेद भगवद् - वाणी उपासनाकाण्ड, ३ है, उपासनाकाण्ड धारयंत्रक - उपनिषद् वैसे उपवेद भी चार प्रकारका है- धायुर्वेद, २ धनुर्वेद, ३ गान्धर्ववेद, अर्थवेद अथवा स्थापत्यवेद । उसमें १ धायुर्वेद अथर्ववेदसे सम्बन्ध रखता है, कई लोग इसे ऋग्वेद का उपवेद मानते हैं २ धनुर्वेद यजुर्वेदका उपवेद कहा जाता है । ३ सामवेदका उपवेद गान्धर्ववेद है । ऋग्वेदका उपवेद अर्थवेद है, कई लोग इसे अथर्ववेदका उपवेद कहते हैं 1 । १ आयुर्वेद में शारीरिक व्याधियोंका दूर करना, शारीरशास्त्र, दैवोपचार, औषधोपचार, प्रणादिच्छेदन, श्रोषधिका सूचीवेध ( इन्जेक्शन ) द्वारा अथवा तबले यादिके द्वारा भीतर प्रवेश कराना इसमें वर्णित किया गया है । इस आयुर्वेदमें निघण्टु तथा धन्वन्तरि श्रादि द्वारा प्रकटित सुश्रुत, चरक, भेद, हारीत, वाग्भट ' यादियों की संहिताए हैं । संक्षिप्त सनातनधर्म ( अ २ धनुर्वेद में युद्ध विद्याका विषय, थाण - विद्या तथा अनेक प्रकारके आप शस्त्रास्त्र वर्णित हैं, इसके श्राविष्कारक विश्वामित्र आदि ऋषि हैं । इसकी भी संहिताएँ हैं, जो कि मिलती नहीं । ३ गान्धर्ववेद में अनेक हैं । तरह के स्वर, गान श्रादिका वर्णन है । नारद यादियोंने इनकी वृहद संहिताओं को प्रकट किया है । ४ अर्थवेद वा स्थापत्य वेदमें अनेक भी प्रकारके यान वा विमान श्रादियोंका, भूगर्भ आदि विद्यार्थीका, तथा होते राजनीति आदि साधनों का, वास्तुविद्या तथा वस्त्र - वयनादिका वर्णन है । इसकी भी विश्वकर्मा, त्वष्टा, मय श्रादिने संहिताएँ प्रकट की हैं । सिद्धि इसीमें राजनीति के प्रतिपादक अर्थनीति शास्त्रों का अन्तर्भाव है । इति उपवेदाः । अन्त ( ५ ) वेदाङ्ग — वेदके छः अङ्ग होते हैं । इनके बिना बेद का प्रस्त ज्ञान नहीं हो सकता । इसलिए पहले वेदाङ्ग पढ़ने पड़ते हैं । १ शिक्षा, पंचप २ कल्प, ३ व्याकरण, ४ निरुक्त, १ छन्द ६ ज्योतिष यह वेद के छः यज्ञ हैं । १ शिक्षाॠग्वेदी पाणिनीय शिक्षा, २ कृष्ण -व्यासशिक्षा, शुक्लयजुर्वेदकी याज्ञवल्क्य श्रादिकी शिक्षा, की गौतमी थादि शिक्षाएँ, श्रथर्ववेद की मांण्डूकी शिक्षा इनमें वेदके वर्णोच्चारण आदिका प्रकार सिखलाया पाणिनि, याज्ञवल्क्य आदि इनके आविष्कारक हैं । इसमें यह है कि किस - किस संहिताकी कौन - कौन सी शिक्षा है । २ कल्प इसमें वेदकी भिन्न - भिन्न संहिताओंके मन्त्रों योग, तथा यज्ञविधियाँ एवम् धनुष्ठान - विशेष बनाये गये निर्णच यजुर्वेदकी इनके सामवेद नहीं आदि हैं । गया है । अन्वेष्टव्य श्रादि का far- वैदिक हैं । इनमें फलित नक्षत्रकल्प, वेदकल्प, संहिताकल्प, श्राङ्गिरसकल्प, शान्तिकल्पयादि ग्रन्थ हैं । इसके अतिरिक्त इसमें श्राश्वलायन, शाहखायन ( ऋग्वेद ) G पारस्कर ( शुक्लयजुर्वेद ) श्रापस्तम्ब, मानव, हिरण्यकेशी, बोधायन CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ( कृष्णयजुर्वेद ) जैमिनि, वैखानस, गोभिल ( सामवेद ) कौशिक ( अथर्ववेद ) ब्राह्यायण श्रग्निवेश, भारद्वाज आदि गृह्यसूत्र, बोधायन, श्रापस्तम्ब, सत्याषाढ़, आश्वलायन, आदि श्रौतसूत्र अन्तभूत हो जाते हैं । यह भिन्न - भिन्न संहिता के मन्त्रोंका विनियोग तथा कर्तव्यता बताते हैं । इसमें उन उन संहिताओंके मन्त्रोंके देवता ऋषि आदि ज्ञानमें वृहदेवता, यार्षानुक्रमणी, छन्दोनुक्रमणी, सर्वानुक्रमणी आदि ग्रन्थ भी सहायक होते हैं । यह भिन्न - भिन्न संहिताओंके भिन्न - भिन्न होते हैं | ३ व्याकरण – व्याकरणमें वैदिक और लौकिक शब्दोंकी सिद्धि और स्वर - परिचय बताये गये हैं । इनमें पाणिनीय व्याकरण प्रसिद्ध हैं । प्रत्येक शाखाका व्याकरण प्रातिशाख्य नाम से प्रसिद्ध है इसीमें श्रन्तभूत होता है । अन्य ऐन्द्र, शाकल्य, स्कोटायन श्रादिके व्याकरण ग्रस्त हो गये हैं । अष्टाध्यायी, धातुपाठ, लिङ्गानुशासन, उणादि पंचपादी, दशपादी लौकिक और वैदिक व्याकरणके परिचायक हैं । ४ निरूक्त - इसमें वैदिक शब्द संग्रहकोष रूप निघण्टुके निर्णचन तथा निगम और भाष्य निरूपित किये गये हैं । यास्क आदि इनके प्रवक्ता हैं । शाकपूणि श्रादियों के निरुक्त इस समय उपलब्ध नहीं । यह निरुक्त भी भिन्न - भिन्न संहिताओं के भिन्न - भिन्न होते हैं । ५ छन्द — इसमें वैदिक एवं लौकिक छन्द बताये गये है । पिङ्गल श्रादि श्राचार्योंने अपने ग्रन्थों में इनका निरूपण किया है । वृत्तरत्नाकर आदिमें लौकिक छन्द बताये जाते हैं । I ( ६ ) ज्यौतिष — इसमें गणित एवं फलित विषय होता है । वैदिक यज्ञोंके काल आदिके प्रतिपादनार्थं इसका उपयोग होता है । फलित. गणितका ही फल हुआ करता है । गणितसे ग्रहोंका राशि श्रादियों में घूमना, तथा राशि परिवर्तन के समय को पता लगता है । • संक्षिप्त सनातनधर्म फलितके द्वारा ग्रहोंका हमारे शरीर में प्रभाव जाना जाता है । सूर्य श्रादि इस शास्त्र के प्रणेता हैं और मय श्रादि वक्ता हैं । इनमें सूर्य-सिद्धान्त, सिद्धान्त शिरोमणि श्रादि गणितके और मृगुसंहिता श्रादि ग्रन्थ फलित के प्रसिद्ध हैं । इति षडङ्गानि । ( ७ ) वेद के उपाङ्ग - उपाङ्ग भी वेदार्थके ज्ञानमें सहायक हुआ करते हैं । वेदके उपाङ्ग – ( १ ) पुराण, २ ) न्याय, ( ३ ) भीमांसा, ( ४ ) धर्म - शास्त्र, यह चार हैं ।, ( 1 ) पुराणसे पुराण, उपपुराण, तथा श्रपपुराण तन्त्रग्रन्थ और रामायण एवं महाभारत -यह इतिहास गृहीत होते हैं । ( २ ) न्याय - शब्द से न्याय, वैशेषिक, साङ्ख्य, योगदर्शन-- यह दर्शन तथा ( ३ ) मीमांसा शब्द से पूर्वमीमांसा मीमांसादर्शन, उसमें भी कर्ममीमांसा तथा दैवतमीमांसा, उत्तरमीमांसा से वेदान्तदर्शन – यह छः दर्शन गृहीत होते हैं । ( ४ ) धर्म - शास्त्र शब्दले धर्मसुत्र तथा स्मृतियाँ गृहीत होती हैं । ( ८ ) पुराण ( क ) जिनमें ऋषि - मुनियोंने वेदके कठिन विषय गाथा, इतिहास आदिके द्वारा बहुत सरल कर दिये हैं, वे पुराण होते हैं । पुराणों के प्रवक्ता श्रीमान् व्यास हैं । पुराणों का ज्ञान तो अनादि है । पुराण अठारह होते हैं - ( १ ) ब्रह्मपुराण ( ' ब्रह्मा वक्ता मरीचि श्रोता ) ( २ ) पद्मपुराण ( ' हिररामय पद्मपर रहने वाले स्वयम्भू वक्ता हैं, श्रोता ब्रह्मा हैं ) ( ३ ) विष्णुपुराण ( पराशर वक्ता हैं ) । ( ४ ) शिव पुराण ( बायु पुराण- शिव वक्ता और वायु श्रोता. हैं ) ( २, लिङ्गपुराण ( मद्देश्वर वक्ता हैं ) ( ६ ) गरुडपुराण ( विष्णु वक्ता और गरुढ श्रोता हैं ) । ( ७ ) नारद पुराण ' सनक आदि वक्ता हैं, नारद श्रोता हैं ) । ( ८ ) भागवतपुराण ( श्रीमद्भागवत में विष्णु वक्ता हैं और ब्रह्मा श्रोता हैं, देवी भागवत में ब्रह्मा चत्रता है ) । ( १ ) अग्नि पुराण ( अग्नि वक्ता CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१ · २ १० ( ४ ) हैं, बसिष्ट ओता हैं ) ( १० ) स्कन्दपुराण ( परमुख वक्ता हैं ) । ( ११ ) भविष्य पुराण ( ब्रह्मा वक्ता हैं, मनु श्रोता हैं ) | ( १२ ) ब्रह्म-चैवर्त पुराण ( सावणि वक्ता हैं, नारद श्रोता हैं ) । ( १३ ) मार्कण्डेय पुराण ( मार्कण्डेय वक्ता है, जैमिनि श्रोता हैं । ( १४ ) वामनपुराण ( ब्रह्मा वक्ता, पुलस्य श्रोता और पुलस्त्य वक्ता, नारद श्रोता हैं ) ( १५ ) वाराह पुराण ( विष्णु वक्ता और पृथिवो श्रोत्री ( १६ ) मत्स्य पुराण ( मत्स्य वक्ता और मनु श्रोता ) । ( १७ ) कूर्मपुराण ( कूर्म वक्ता हैं ) । १८ ) ब्रह्माण्डपुराण ( ब्रह्मा वक्ता ) ( श्रीमद्भागवत १२ / ७ / २३-२४ ) । पुराण वेदके सूत्रोंकी व्याख्या हैं । जिस प्रकार सूत्रकी व्याख्या में उदाहरण और प्रत्युदाहरण हुआ करते हैं, वैसे पुराणोंमें भी वैदिक सिद्धान्त सूत्रोंके उदाहरण धौर प्रत्युदाहरण होते हैं । पुराण शिक्षाके भागडार हैं । इनमें कर्म, भक्ति, ज्ञान, नीति, उपदेश, इतिहास, चिकित्सा, लोक - परलोक रहस्य, सगुण - निर्गुण उपासना, अवतार, जीवब्रह्मतत्व, राजवंश, सृष्टि - स्थिति - प्रलय यादि वैदिक सिद्धान्त स्पष्ट किये गये हैं । इन्होंसे आजतक हिन्दु जाति अपने धर्ममें स्थिर रही है । पुराण न होते, तो धाज कोई वेदका नाम भी न जानता । सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, वंशानुचरित, मन्वन्तर थादियोंका वर्णन करना इनका विषय है । उनमें ईश्वर के स्वरूपका निरूपण मूर्तिपूजा, ईश्वरावतार, स्त्रियोंका पतिव्रत धर्म, नित्यकर्म आदि धर्मका विषय, मानसिक सृष्टि, मैथुनिक सृष्टि, कामसे अपने बच्चावका उद्यम, स्त्रियोंकी मोहकता से धपना बचाव करना, स्त्रियोंके विषयमें किसी देवता तकका भी विश्वास न कर ढालना, धात्म संयम- इत्यादि वर्णित किया गया है । देदके कठिन विषय कहीं श्रालङ्कारिक भाषामें, कहीं सरस कथात्रों वा गाथाओं के द्वारा कहे गये हैं । पुराय में समाधि भाषा, लौकिक भाषा, और परकीया भाषा यह तीन भाषाएं यत्र - तत्र उपयुक्त की गई हैं । इनमें समाधिभाषा वह है जहाँ कठिन ज्ञानकी भाषाके द्वारा निरूपण संधिप्स सनातनधर्म परन्तु दोष क हो, लौकिक भाषा प्रसिद्ध इतिहासके द्वारा निरूपित की जाती है । और परकीया भाषा गाथा रूपक आदिके द्वारा वेदार्थके वर्णनमें जी जाती है । इन भाषाओं के ज्ञानके बिना पुराण सर्वसाधारण के ज्ञान में भारत उपस्थित नहीं हो सकते । ( ख ) उपपुराण - उपपुराण भी थठारह होते हैं । पुराण, ( सनत्कुमार से प्रणीत ) । २. नरसिंह पुराण, ३. ४. शिव - धर्म पुराण ( नन्दीश कृत ) ५ दुर्वास: पुराण, पुराण ७. कपिल पुराण, ८. वामन पुराण, ६. श्रौशनस ब्रह्माण्ड पुराण, ११. वरुण पुराण, १२ कालिका पुराण, त्रेतायुग बाद उन १. आदि जन्म स स्कन्द पुराण ६ नारदीय बनाया पुराण, १० वैशम्पाय १३. महे एक ला श्वर पुराण, १४. साम्यपुराण, १५ सौर पुराण, १६. पाराशर पुराण, द्वारा व्य १७. मारीच पुराण, १८. भास्कर पुराण । ( ग ) औपपुराण - औपपुराण भी अठारह होते हैं: -१ सम २-२. योग मारपुराण, २ बृहन्नारदीयपुराण, ३ आदित्यपुराण, ४: मानवपुराण, ६ वेदान ५ नन्दिकेश्वरपुराण, ६ कौर्मपुराण, ७ भागवतपुराण, ८ वसिष्ठपुराण, चुका है ६ भार्गवपुराण, १० मुद्गल पुराण ११ कल्कि पुराण, १२ देवीपुरा, कपिल १३ महाभागवत पुराण, १४ बृहद्धर्म पुराण, १२ परानन्द पुराण, २. ' योग १६ पशुपति पुराण, १७ वन्हि पुराण, १८ हरिवंश पुराण, ( वृहद्विवेक श्रीवेदव / ३ ३७–३८: -३६ ) । विषय है. ( घ ) तन्त्रग्रन्थ -- पुराणों में ही तम् ग्रन्थोंका भी अन्तर्भावः हो दर्शनमें जाता है । तन्त्रशास्त्रमें भी वेदोक्त विषय विभिन्न - विभिन्न श्रधि- वात्स्यापर कर्मकाण्ड कारियों के लिये बताये गए हैं उनमें श्राचार, उपासना, ज्ञान, मन्त्र, ॐ लय आदि योग, आयुर्वेदके गुप्त योग, भूत विद्या, रसायन आदि चार्य है । श्री सभ विद्याएँ और ज्यौतिषके रहस्य स्पष्ट किये गये हैं । तन्त्रके परोद रूपसे कहे हुए कई तत्त्व श्रतिशयित गूढ़ हैं । वे उनकी परिभाषाओं ' के ज्ञानके बिना ग्रीड़ा, जुगुप्सा, अमंगल अश्लीलमय से प्रतीत होते हैं,. CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१२ श्रीसनातनधर्मालोकी ( ४ ) परन्तु उनकी परिभाषा जानने पर तथा सद्गुरु की दोष काफूर हो जाया करता है । नाती है । ( ङ ) इतिहास - पुराण से पुराण - इतिहास में जी ज्ञान में भारत भी गृहीत हो जाते हैं । उसमें रामायण त्रेतायुगमें श्री रामराज्याभिषेकले पहले युद्ध काण्ड बाद उत्तर काण्ड बनाया । परोक्ष रूपसे तो उन्होंने - आदि जन्म से भी कई सहस्र वर्ष पूर्व कर डाली थी । -पुराण ( च ) ' महाभारत ' श्रीवेद व्यासजीने संगति करने पर वह रूपमें रामायण, महा श्रीवाल्मीकि मुनिने तक बनाया; उसके उक्त रचना हाम् नारदीय बनाया और अठारह पर्व बनाये एक लाख श्लोकोंमें । जो उसके सुनानेमें प्रकरणवश १० वैशम्पायन और सौतिने कई अधिक पद्य कहें, उनकी कई सहस्रकी संख्या . मद्दे- एक लाखसे अतिरिक्त है । इसमें सनातन धर्मके सब विषय इतिहास पुराण द्वारा व्याख्यात कर दिये गये हैं । सनत्कु २-३ छः दर्शन --न्याय - मीमांसा शब्द से एक साङ्ख्यदर्शन २. योग दर्शन, ३. वैशेषिकदर्शन, ४. न्याय दर्शन, ५. मीमांसा दर्शन पुरा ६. वेदान्त दर्शन – यह छः दर्शन गृहीत होते हैं — यह कहा जा पुराण चुका है । उनमें? साङ्ख्यदर्शन में प्रकृति - पुरुषका विषय है, श्री पुरा, कपिल मुनि कर्ता हैं, भाष्य उसमें श्री विज्ञानभिक्षुका पुराण, २. ' योगदर्शन ' – में योगका विषय है, श्रीपतञ्जलि मुनि कर्ता है । विवेक श्री वेदव्यास उसमें भाष्यकर्ता हैं । ३ वैशेषिक दर्शनमें निःश्रेयस हैं, का विषय है, श्री कणादमुनि प्रणेता हैं, प्रशस्त प्रादका भाष्य है । ४. न्याय--वि दर्शनमें तच्च ज्ञानका विषय है, श्री गोतम मुनि प्रणेता है, श्री श्रधि वात्स्यापनका उसपर भ्राप्य है । ५० सीमांसा दर्शनमें वैदिक याज्ञिक मन्त्र, कर्मकाण्ड विषय है, श्री जैमिनि मुनि कर्ता हैं, साध्य उसमें श्री - शबरा नं आदि चार्य का है । --- वेदान्तदर्शनमें जीव बाकी एकताका विषय । परोप है । श्री बादरायण कुर्ता हैं, मुख्य उसमें श्रीशङ्कराचार्य स्वामीका तथा भाषार्थी होते हैं, संक्षिप्त सनातनधर्म १३ स्वा ० रामानुजाचार्य श्रीमध्वाचार्य श्रीवल्लभाचार्य श्रादियोंका मिलता है । भी ( ४ ) धर्मशास्त्र — इसमें ( क ) धर्मसूत्र ( ख ) तथा स्मृतियाँग्रन्ते-भूत होते हैं । ( क ) धर्मसूत्र - १. गौतम धर्मसूत्र, २. वसिष्ठ धर्मसूत्र स्तम्ब धर्मसूत्र, ४. हारीत धर्मसूत्र, २. बोधायन, ३. आप-धर्मसूत्र इत्यादि । इस प्रकार ' मानव धर्मसूत्र ' भी कहीं होगा । ' ( ख ) स्मृतियाँ - जितनी व दसंहिताएँ श्रौतसूत्र हैं, उतने ही गृह्यसूत्रं, तथा धर्मसूत्र और उतनी ही स्मृतियाँ हैं । धर्मस्य सूत्रणं संक्षेपः यह धर्मसूत्रका निर्णचन है । वेदार्थके स्मरणका नाम है । उसमें १. मनुस्मृति ‘ २. वृद्धमनु, ३. गिरः स्मृति, ४. श्रत्रिस्म स्मृति *. आपस्तम्बस्म ति, ६. ओशनसम्म ति, ७. कात्यायनस्मति ति गोभिल ( प्रजापति ) स्मृति, ६. यमस्मति, १०. बृहद्यमस्मति ८. लघु विष्णु स्मृति, १.२. वृहद्विष्णुस्मति, ११. १३ नारदस्मति, १४, शातातपस्म वि, १५. लघुशातावमस्मति ९ ६. बृद्धशातातपस्मति १७, लघुहारीत स्म ति, १८. वृद्धहारीतस्मृति, १३. लघ्वाश्वलायनस्मति, २० शङ्खस्मृति, २१. लिखितस्म ति २२ शङ्खलिखित स्ममृति, २३. याज्ञवल्क्यस्म ति, २४ व्यासस्मति, २१ संवर्तस्मति, २६. अत्रिसंहिता, २७ दुतस्मा॒मृति, २८ देवलस्म -ति, २३ बृहस्पतिस्म ति, ३० लघुशङ्खस्म - ति, ३१. पराशरस्म - ति, ३२ बृहत्पराशरस्म ति, इत्यादिक स्मतियाँ आजकल मिलती हैं । संहिताओं की बहुलतासे उन्हें करके बनाई साईरस तियाँ भी बहुत हाँ यह सम्भव है । इस अनुसृत बाहुल्य में भिन्न भिन्न देशकालमें गायन कारण नहीं । स्मृतियों में आचार संस्कार. वर्णधर्म, वर्णसङ्करधर्म, स्त्रीधर्म, पुरुषधर्म, राजधर्ग, प्रायश्चित्तादि विधियाँ, एतदादि विषय आये हैं । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) इन स्मृतियोंसे धर्म एवम् अधर्मकी तथा लोकव्यवहारकी व्यवस्था होती है । वेद और स्मृतिके विरोध में जैसे वद अधिक माननीय ' हैं बैसे ही स्मृति और पुराणके विरोध में स्मृति अधिक माननीय है, क्योंकि पुराण प्रधानतासे लोकवृत्त ही प्रतिपादन करते हैं । लोक व्यवहार की व्यवस्थापना करना उनका प्रधान विषय नहीं । गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र तथा स्मृतियों यह धर्मशास्त्र में अन्तभूत माने जाते हैं । स्मतियोंमें भी मनुस्म ति याज्ञवल्क्यस्मति तथा पराशरस्मृति अधिक मान्य है । इति वेदस्य उपाङ्गानि । वह सनातन धर्म का साहित्य है । वोदके अङ्ग तथा उपाङ्ग व दोक्त सनातन धर्मके व्याख्यान रूप हैं — इनमें कहे हुए धर्म ही सनातन धर्मके सिद्धान्त हैं । ( ७ ) सनातनधर्म के सिद्धान्त —१ मन्त्रभाग और २ ब्राह्म-भाग -- यह दोनों मिलकर वेद कहाता है । उसमें मन्त्रभाग ११३१ सहितारूप है । ब्राह्मणभाग ब्राह्मण, श्रारण्यक धौर उपनिषद्रूप है । यह सब बेद है । शेष पूर्व वर्णित साहित्य उसका व्याख्यान रूप है । उस वेद के स्थूल सिद्धान्त यह है-१ ईश्वर निराकार एवं साकार स्वरूप; २ ईश्वर का अवतार, ३ देवता, ऋषि तथा पितर मनुष्यसे भिन्न योनिविशेष | ४ देव पूजा एवं मूर्तिपूजा, १ उपासना, ६ भूतप्रेत आदिकी योनियाँ, ७ तीर्थ यात्रा, पञ्चमहायज्ञानुष्ठान, १ त्रिकालसन्ध्या आदि नित्यकर्म, १० गो-पूजन, ११ मृतक पितृ श्राद्ध, १२ सोलह संस्कार, १३ जन्मसे वर्णे व्यवस्था, १४ वर्णं धर्म - थाश्रम धर्म, १५ लोक - परलोक, १६ ग्रहपूजा, १७ नक्षत्रादिविचार, १८ यज्ञ, ११ द्वैताद्वैतवाद, २० वेदमें द्विज पुरुष का अधिकार, ॐ २१ कन्पार्थीका ऋतु कालसे पूर्व विवाह ग्रहणा-* इस विषयमें कि — ' स्त्रीशुद्धोंका वेदमें अधिकार है या नहीं-' श्रीसनातनधर्मालोक ' का तृतीय पुष्प मंगाव मूल्य ' ३ ) १६ संक्षिप्त सनातनधर्म १५ निषेध, दिका शौच, २३ स्त्रियोंकी यावरण - प्रथा, २४ पतिव्रत धर्म, २५ रखने व विधवाविवाह का अभाव, २६ नियोग कलिवर्ज्य २७ चन्दनादिका -सन, ४ अनुलेपन, २८ स्पर्शास्पर्श, २६ अन्त्यज श्रादियोंकी अस्पृश्यता, २० ४७ शि .वैध शुद्धि, ३१ युग व्यवस्था, ३२ एकादशी आदि व्रत, ३३ सवर्णा- रखना शिखा विवाह, ३४ शिष्टाचार, ३५ पापके प्रायश्चित्त ३६ लोक - लोकान्तर, ३७ धर्म - कर्म - भेद, ३८ व्रत - उपवास, ३६ हिन्दुत्वकी प्रतिष्ठा और समय स हिन्दुस्थानकी रक्षा, ४० राजभक्ति, ४१ विविध आचार - विचार | करना, का कर इन सबका सर्वाङ्गीण वर्णन हमने ' श्रीसनातनधर्मालोक ' महा- आत्माक ग्रन्थमें किया है । पहले यहां पर कई थाचार विचारों का नाम निर्देश करके – क्योंकि - ' श्राचारः परमो धर्मः ' मनु ० १।१०८ ) फिर पूर्व सिद्धान्तोंमें कइयोंका संक्षिप्त वर्णन किया जायगा, और कई श्राचारों का भी । कई श्रकथित विषय भी कहे जायँगे । ( ८ ) सनातनधर्मके आचार - विचार-- १ ब्राह्ममुहूर्त में उठना, २ भूमि वन्दन, ३ भूमिमें पादस्थापननिषेध, ४ मलत्याग और मृत्तिकासे हस्तशुद्धि, १ कुल्ला करना, ६ दन्तधावन, स्नान, सन्ध्या, ६ देवमन्दिर में जाना, १० मूर्तिपूजा, ११ चरणामृत - ग्रहण, १२ चन्दन तिलक, ३ भस्म धारण, १४ मार्जन, १ ९ अभिषेक, १६ प्राणायाम १७ सूर्योपस्थान, १८ जप, १३ मालाकी मणियाँ १०८ । २० मंत्र और सिद्धियाँ, २१ जपन १०८ वार, २२ परिक्रमा, २३ शङ्खनाद, २४ तुलसी पूजनं, २५ तुलसीके चानेका निषेध, २६ पञ्चगव्यका उपयोग २७ गोमूत्र में गङ्गानिवास, २८ गोवरमें लक्ष्मीका निवास, २६ सोलह संस्कार, ३० अपने नामको गुप्त रखना, ३१ पर्ण में गर्भ का निषेध, ३२ व्रत और उपवास, ३३ श्राहार - शुद्धि ३४ भोजनसे पहले ग्रासका रखना, अग्नि में डालना, काकबलि ३५ दूकानोंके थन्न खानेका निषेध, ३६ घृतपक्वकी शुद्धता, ३७ ग्रहण में भोजनका CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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१६ श्रीसनातनधमलिकः ( ४ ) १५ निषेध, ३८ स्पर्शास्पर्श, ३६ तीर्थ, ४० परलोक, ४१ उत्तर में शिर रखने का निषेध ४२ पीपल की पूजा, ४३ खड़ाऊं पहरना; ४४ कुशी-२५ -सन. ४५ व्याघ्र मृगादिके चर्म, ४६ रातमें सिरहाने जलका रखना, दिका ४७ शिशुओं के गले में रक्षा आदि पहिराना, ४८ कुत्रों पर दीपक का , ३० रखना ४६ पर्व में मृतक श्राद्ध का विधान, ५० वृक्षोंकी चेतनता, ५१ वर्णा- शिखा रखना, १२ द्विजको यज्ञोपवीत पहनना ५३ दैनिक होम, ५४ डान्तर समय समय पर बढ़े - बड़े यज्ञ, १५ मेखला - कौपीन श्रादिका धारण र करना, १६ अपने - अपने वर्णधर्म का पालन, ५७ यथाधिकार संस्कारों का करना, २८ धर्मसहित श्राचारोंके पालनसे शरीर, मन तथा महा- आमाकी उन्नति इत्यादि । निर्देश पूर्व चारों हूर्त में और न हण, , १६ ८/२० नाद, व्यका चास, गर्भ जनसे अन्न नका CC - 0. Ankur Joshi सनातन धर्मके सिद्धान्तोंका संक्षेप ( १ - २ ) ईश्वरका रूप और अवतार — परमात्मा के निराकार और साकार दो रूप हैं । निराकार रूपमें वह सर्वव्यापक है । साकार ब्रह्माके रूप में वह ब्रह्मलोकमें, विष्णुरूपमें stars ' लोक में, महादेव रूपमें रुद्रलोकमें वा कैलास पर्वत में विराजमान है । जैसे श्रग्नि वा बिजुली निराकार रूपमें सर्गव्यापक हैं और सा-कार रूपमें सांसारिक कार्य करते हैं; वैसे ही ईश्वर प्रलयावस्था में ' निराकार और सृष्टि रचना और पालनमें साकारावस्थामें होता है । उस परमेश्वरका स्थान विशेषमें विशेषरूपसे प्रकट होना ही व तार है | जब धर्म की बड़ी भारी हानि होती है, तथा श्रधर्मका श्रभ्यु-स्थान होता है; उससे देवता, गाय, ब्राह्मण, ऋषि, मुनियोंसे होह वा उनकी निन्दा प्रवृत्त होती है; वा अन्य कोई विशिष्ट कारण बनता है, तब दुष्टोंके नाशार्थ और सत्पुरुष वा भक्तोंके संरक्षणार्थं परमात्मा का विशेष स्थानमें विशेष माता - पिताके द्वारा विशेष प्राकटस्य स्वरूप ' अवतार हो जाता है । तब वह अवतार धर्म की मर्यादाको पुन: स्था-' पित करता है । जैसे अनि सर्वव्यापक है, किन्तु संघर्षसे एक स्थान में ' प्रकट हो जाता है, इससे उसकी निराकाररूपताकी सर्वव्यापकतामें कोई बाधा नहीं पड़ती; वैसे ही सर्वव्यापक परमात्मा धर्मात्मा और पापा-माओंके संघर्ष प्रकट होजाता है, वैसे ही सर्वव्यापकभी रहता है । निराकार आत्माभी यद्यपि शरीर ग्रहण करता है, तथापि अपनी इच्छासे नहीं; किन्तु बन्धन से शरीरको प्राप्त करता है, जैसे अपराधी कैदी किसी कर्मवश जेल खाने में डाला जाता है, पर परमात्मा अपनी इच्छा -से भक्तोंपर कृपा करनेके लिए श्रावतार लेता हैं । जैसे कि राजा कैदियों Collect Gujarat. An eGangotri Initiative
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१८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) के हितके लिए तथा उनके उपदेशार्थ जेलखानेमें अपनी इच्छानुसार जाता है । ईश्वरके अवतार तो असंख्य होते हैं, पर उसमें २४ प्रसिद्ध हैं और १० बहुत प्रसिद्ध हैं । १ मत्स्य, २ कच्छप. ३ वराह, ४ नृसिंह वामन, ६ परशुराम, ७ श्रीरामचन्द्र, ८ श्रीकृष्णचन्द्र, ६ बुद्ध, १० कल्की ( यह अवतार आगे होगा । ) यह दश अवतार बहुत प्रसिद्ध हैं । बुद्धने जो वेदोंका खण्डन किया, उसमें उसकी नीति थो । बेदके अन-धिकारी शुद्ध आदियोंने भी तब ब्राह्मणोंके वेषको धारण कर वेदोक कर्मकलाप करना शुरू कर दिया था, और वेदके नामसे अनर्गल हिंसा शुरू कर दी थी । उनसे वेदोंके आकर्षणार्थ ' स्वजातिदुरतिक्रमा ' " जातिका स्वभाव कभी जा नहीं सकता उनकी वेदसे घृणा कराने के लिए नीति अपना ली थी । इनके साथ अन्य अवतार ११ नारायण, १२ हंस, ५३ हयग्रीव, १४ नारद, १२ नर १६ दत्तात्रेय, १७ यज्ञ, १८ ऋषभ, १३ पृथु, २० कपिल, २१ धन्वन्तरि, २२ मोहनी, २३ वेदव्यास, २४ शङ्करा-चार्य यह भी अवतार हैं । अवतार तीन प्रकारके होते हैं । १ पूर्णा-वतार, २ कलाववार, ३ छायावतार | श्रीकृष्ण और श्रीराम पूर्णावतार हैं । श्रीकृष्ण चन्द्रवंशके होनेसे सोलह कला के थे इसलिए पूर्ण थे । सोलह कलाका चन्द्र पूर्ण हुआ करता है । श्रीराम सूर्यवंशके होने से बारह कलाके थे; इसलिए पूर्ण थे । द्वादशात्मा सूर्य पूर्ण हुआ करता है । मत्स्य, कूर्म, वराह, वामन, नृसिंह, परशुराम, बुद्ध, कल्की. कलावतार हैं । नारायण, हंस, हयग्रीव, नारद, नर, दत्तात्रेय, यज्ञ, ऋषभ, पृथु धन्वन्तरि, मोहिनी, व्यास, कपिल, यह छायावतार हैं । पूर्णावतार होने पर भगवान्की पूर्ण शक्ति प्रकट होती है; अवशिष्ट थवतारोंमें उसकी थोड़ी शक्ति प्रादुभूत होती है, कलावतार छाया-दवार अवतार भी कहे जाते हैं । २. सनातन धर्म के सिद्धांतों का संक्षेप १६ कर ( ३ ) देव, ऋषि, पितर सनातन धर्म में देवपूजा, ऋषि पूजा प्रा तथा पितृपूजा सब कार्यों में व्याप्त है । उसमें कारण यह है कि नह लेत यह तीनों ब्रह्माण्ढके कामके सञ्चालनमें परमात्मा द्वारा नियुक्त हुए योनिविंशेष हैं । ब्रह्माण्डके सब कार्य तीन भाग में विभक्त हैं; कर उसमें एक है ज्ञानका विस्वार, दूसरा कर्म में प्रवृत्त करना और कर्म- वश फल देना, तीसरा ब्रह्माण्डकी स्थूल व्यवस्था में सामञ्जस्य करना । भी उसमें ऋषि लोग सृष्टिकी श्रादिमें अवतीर्ण होकर लुप्त वेदराशिका श्रङ्ग पुनरुद्धार फरके, फिर वेदके विशद करने वाले धर्मशास्त्रोंको बना गय कर जगत् में ज्ञानका विस्तार करते हैं | देव लोग जगत् के सब कामों जा को प्रचलित करते हैं । देवोंके प्रत्यर्थी असुर भी होते हैं जो उनके कार्यों में अन्तराय किया करते हैं । नित्य पितर वसु, रुद्र, यादित्य प्रक ऋतुयोंको यथासमय करना, ऋतुके अनुसार जल यरसाना, कृषिके उत्पादन में सहायता देनी, देशसे दुर्भिक्ष हटाना, इस प्रकार देशके भी स्वास्थ्य - स्थापन रूप कार्यको क्रिया करते हैं । यह तीनों ही देव - विशेष को हैं । जब इन में ऋषियोंका तर्पण तथा स्वाध्याय आदिसे, देवोंका यज्ञ ही श्रादिसे तथा नित्य पितरोंका नित्य हवन श्राद्ध तर्पण - श्रादिसे मंन पूजन करने पर यह सब जगत् के सहायक सिद्ध होते हैं । नित्य पितरों भी की सहायता से ही हमारे मृतक पितर भी हमसे प्रति श्रमावास्याको ' ही दिये हुए श्राद्धको खाते हैं । निस्य पितर भी जो कार्य ब्रह्माण्डका चिि किया करते हैं; नैमित्तिक पितर भी वही हमारे वंशका करते हैं, श्रतः वृदि उनका मासिक एवं वार्षिक श्राद्धादि भी श्रावश्यक है. 1 जात ( ४ ) देवपूजा एवं मूर्तिपूजा- - - जिस पुरुषके पास जो ७. राज कमि वस्तु नहीं होती, वह उसे चाहता है । पुरुष चाहता है कि मैं यड़ी श्रायु प्राप्त करू, अभिलषित धनको प्राप्त करूं, बड़ी शक्तिको प्राप्त CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२० श्रीसनातन धर्मालोकः ( ४ ) करू ं , अपनी शक्ति के अनुसार उन उन वस्तुयोंको, वह पुरुषार्थसे पूजा प्राप्त कर भी लेता है, परन्तु उसका उनपर सर्वात्मता से स्वामित्व नहीं हो जाया करता, तब वह अपनी अपेक्षा महत्तर शक्तिका आश्रय कि लेता है; यह महाशक्ति परमात्मा है । वह परमात्माकी उपासना युक्त करना चाहता है; परन्तु परमात्माके निराकार रूपकी उपासना उसके हैं; वशकी बात नहीं होती; और अङगी की उपासना, विना श्रङ्ग के हो कर्म- भी नहीं सकती, अतः उस परमात्माकी पान्च शक्तियोंमें, पांच प्रमुख नां । श्रङ्गों उपासना की जाती है । वे पांच श्रङ्ग विष्णु, शिव, शक्ति, शिका गणेश, सूर्य हैं, उनकी उपासनासे उस शङ्गी परमात्मा की उपासना हो यना जाती है । कामों उनके जैसे जड प्रकृतिके प्रवर्तक भगवान् चेतन हैं, जो कि समस्त दिव्य प्रकृतिमें तीनों गुणोंका भ्रमण करवा कर संसारके उत्पत्ति, स्थिति, पिके को करते हैं, वैसे ही प्रकृत्तिके पृथक पृथक विभागों के प्रवर्तनार्थं शके भी परमात्माकी श्रोरसे उसीकी बहुत सी चेतन शक्तियाँ हैं, उन्हीं शेष ' को ' देव ' नाम से कहा जाता है । ससारमें देखा जाता है कि कोई भी जड वस्तु स्वयं कुछ भी नहीं कर सकती; किसी चेतनके द्वारा वी बह चेष्टा करती है । जड मेज़ स्वयं चेष्टा नहीं कर सकती, चेतन यज्ञदि मनुष्यादिद्वारा हिलानेसे ही हिलती है । इसी प्रकार जढ पुस्तक श्रादि श्री गमनागमन नहीं कर सकते, किन्तु चेतन पुरुषके द्वारा ही, वैसे को ' ही प्रकृति में भी जड जल, वायु आदि स्वयं प्रगति नहीं कर सकते, चे डका चिति शक्ति द्वारा चलाने पर ही विभिन्न - दिशाओंसे श्राते हैं, और अतः वृष्टि आदि होती है । इनकी प्रवर्तक चेतन शक्तियाँ ही ' देवता ' कही जाती है । जैसे किसी राज्य को चलाने के लिए राज्य के अधिपति . राजाकी ही शक्तिको लेकर राजप्रतिनिधिः वाइसराय, गवर्नर, कमिश्नर, जज, सिपाही आदि राज्य का प्रबन्ध करते हैं, वैसे ही इस गुप्त सनातनधर्म के सिद्धांतों का संक्षेप २१ ब्रह्माण्डके चलानेके लिए ब्रह्माण्ड - पति श्रीभगवान्की ही शक्ति स्व-रूप सभी देवता द्यु लोकमें रहते हुए भी इस पृथिवीका भी प्रवन्ध किया करते हैं । सय ३३ कोटि देवता हैं, उनमें ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र आदि मुख्य देव हैं । इनमें दण्डाधिपति यमराज हैं. जलाधिपति वरुण हैं, कोषाध्यक्ष कुँबेर हैं, हवाके अध्यक्ष वायुदेव हैं, जलाने के अध्यक्ष अग्नि हैं, चिकित्सक अश्विनीकुमार हैं । ब्रह्माण्ड के ऊपरके सात लोकोंमें देवताओंका अधिकार हुआ करता है, नीचेके सात लोकों में असुरोंका अधिकार होता है । देवताओंके यज्ञ भी परमात्माकी पूजाके श्रङ्ग हैं, परन्तु उनमें वैदिक अनुष्ठानोंकी कठिनता से साधारण लोगोंकी स्वर वर्ण दोष के कारण हानिकी श्राशङ्का रहती है, तब सुगम देवपूजायज्ञ वेदने मूर्तिपूजारूप में श्रादिष्ट किया । वेदमन्त्रोंले धातु, मट्टी, पत्थर श्रादि मूर्तियों में भी वेद के इङ्गितसे देव - देवको प्रतिष्ठापित किया जाता है, श्रथवा उसकी शक्ति किसी देवको प्रतिष्ठापित किया जाता पूजाका लक्ष्य भी वही देव वा देवदेव हुआ करता है, इस कारण । उस पुरुषकी उससे इष्टसिद्धि भी हो जाती है । मूर्तिको श्राधार बनाकर पूजनसे चित्त स्थिर भी हो जाता है । देव मन्दिरोंमें प्रतिमामें देव-दर्शन के अतिरिक्त अन्य भी चिरायुष्य बलप्राप्ति श्रादि लाभ हुआ करते हैं । उसमें घरकी अपेक्षा दिव्य शक्तिके सञ्चारकी अधिकता से अनेक प्रकारकी शक्तियाँ प्रादुर्भूत होती हैं । धूप - दीप श्रादि सुगन्धित द्रव्योंके सम्बन्धसे घण्टा श्रादि के तुमुल शब्द आदिले हमारे शरीर को कीटाणु दूषित नहीं कर सकते, इससे स्वस्थ शरीरकी हमारी मानसिक वृत्तियों में भी विशिष्ट प्रभाव पढ़ा करता है. चित्त शान्त हो जाता है, और श्रात्माकी उन्नति हो जाया करती है । इस प्रकार ईश्वर के अवतारोंकी भी मूर्ति पूजा की जाती है । मूर्तिका ईश्वररूप देखना उत्तम है, मूर्तिमें ईश्वरका ज्ञान मध्यम कोटि CC - 0. Ankur Joshi Collection! Gujarat. An eGangotri Initiative {
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२२ श्रीसनतनघलोकः ( ४ ) है और मूर्तिसे ईश्वर का स्मरण साधारण कोटि है । ईश्वर के चेतन होने से और उसके मूर्ति में व्यापक होनेसे मूर्ति जोकि चेतन नहीं मालूम होती उसका कारण स्थूल इन्द्रिय भादि विकारोंसे उसका संयोग न होना ही है । ( ५ ) उपासना | -ध्यान, पूजा, पाठ, नामजप, भक्ति आदि द्वारा अपने इष्ट की समीपता करनेका नाम उपासना है । मनुष्य आदि द्वारा मनसे इष्टदेवको अपने निकट करता है, पूजादि के ध्यान इष्टको अपने शरीरके निकट करता है, स्तोत्रपाठादि द्वारा द्वारा वाणीके निकट करता है, इससे इष्टदेव उसपर कृपा करता है, उसे शक्ति, भक्ति एवं ज्ञान देता है, उसे पाप से दूर रखता है । अन्तमें अपने आपमें मिला लेता है । उपासना का फल भी यही होता है । sar: पुरुषको अपने अधिकारानुसार स्वनियमित उपासना नियमसे करनी चाहिये । भक्ति और धनयनिष्ठा यह उपासनाका प्राण है । अाजकल चारों श्रोरसे आध्यात्मिक रोगले पोड़ित पुरुषोंका श्रा-नाद सुनाई पड़ता है, उसमें कारण कई प्रकारके अर्वाचीन सम्प्रदायों की अवैध उपासना ही है । भाजके सम्प्रदाय, बिना योग्यताकी परीक्षाके प्रत्येक को समान उपासना बताते हैं । शुद्ध हो वा ब्राह्मण, स्त्री हो या पुरुष, सभीको एक ही उपासना- लाठी से होंका जाता है । जो डाक्टर विविध रोगियों के आँख, कान, वा पेटके शूल में प्लग, हैजा, निमोनिया श्रादि विविध रोगोंमें एक ही ' कुनाइन मिक्सचर ' दवाई को पिलाता है, वह बीमारों को कैसे स्वस्थ कर सकता है? यही दशा है भाज अर्वाचीन सम्प्रदाय वालोंकी | पर सनातनधर्म तो योग्यतानुसार महायज्ञ, यज्ञ, जप, पाठ, मूर्तिपूजन, ध्यान, योग, व्रतो-पवास, कृच्छ्रचान्द्रायण यादि व्रतों, विविध तपस्याओं तथा स्वस्व-वर्णाश्रमकर्मों द्वारा परमात्माकी पजाके लिये प्रेरणा करता है । CC - 0. Ankur Joshi Collection २४ सनातन धर्मके सिद्धांतोंका संक्षेप २३ श्रात्म उसमें भी देश, काल, पात्र श्रादिका विचार करता है । गरीब पुरुष कराई ' कौड़ीके ' व्ययंसे भी उसी द्वारको प्राप्त होता है, जिसे लाख रुपयोंका वस्तुम are करके धनी प्राप्त करता है । विशिष्ट पात्रको वेदके पारायण द्वारा या सर्व वह परमात्माकी उपासना बताता है, दूसरे पात्रको वह नामकीर्तन- संवाद मात्रका आदेश देता है । भक्ति भी यह धर्म श्रवण, कीर्तन, स्मरण पादसेवन, मूर्ति - अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य आत्मनिवेदन यह नौ भेद बताता है, जिसकी जिसमें शक्ति हो जिसमें प्रियता हो, २० वह उसे ही स्वीकार करे । परमात्माके निराकार स्वरूपकी उपासना श्रादि बहुत कठिन होती है, अतः यह धर्म उसकी विष्णु, शिव, शक्ति, गणेश, पक्षी सूर्य इन पांच सगुण रूपोंमें यथाधिकार उपासना बताता है | श्रथवा पशु राम कृष्ण आदि अवतारोंकी भी उपासना की जा सकती है । पत्थर जीव आदि पीठों में तत्तदेवको प्रतिष्ठापित करके की जाने वाली पूजा मूर्ति- या क पूजा होती है, षोडशोपचार वा शक्तिमें पञ्चोपचार पूजन किया जाता है । है | श्रासन, प्राणायाम, मुद्रा आदि योगक्रियायोंसे उस समय चिन्तकी ८४ स्थिरता तथा सूर्य से विशिष्ट शक्ति प्राप्त होती है । कुकम यह उपासना प्रथम कोटिको होती हैं । मध्यम उपासना है ऋषि, तर स देवताओं तथा पितरोंकी पूजा । इसमें लक्ष्मी, सरस्वती आदि देवियों शुद्धसे की, इन्द्रादि देवोंकी पूजा की जा सकती है । यह सकाम पूजा होती करता है । भूत, प्रेत यादिकी उपासना श्रधम कोटिकी होती है । उससे ( द ) भूत - प्रेत आदिकी योनियाँ - जैसे देव, श्रसुर, ऋषि यक्ष श्र - तथा पितर योनिविशेष हैं वैसे ही भूत, प्र ेत, पिशाच आदि भी योनि- करता प्रत विशेष हैं । यदि मनुष्य मृत्यु के समय मोह, धन लोभ आदि किसी भावमें मुग्ध होकर मूर्छित की तरह प्राणोंको छोड़ दें, अथवा यन्दूर नहीं नुसार द तोप, तलवार, परमाणुअस्त्र, विजुली गिरना, घरका गिरना – श्वादि द्वारा जिसकी श्रतकिंत मृत्यु होती है, श्रथवा जिसने श्रावेशमें थाकर Gujarat. An eGangotri Initiative