सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 121–130
सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 121–130
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२०४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ज्ञानहीन श्रीर लोभी होगा; तो वह न केवल अपना प्रत्युत सम्पूर्ण समाजका अनिष्ट करेगा । अब मुखको देखिये । वह हाथ, पेट, पां श्रादिकी अपेक्षा आकारमें तो छोटा है; परन्तु ज्ञानके संम्पूर्ण साधन = ) उसीके पास हैं, श्रन्यके नहीं । ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं, इन्हींसे सब प्रकार-का ज्ञान होता है । वे इन्द्रियाँ हैं- दो आंखें, दो कान, नाक, जीभ और aji | 10 % यदि हम किसी वस्तुको देखना चाहें, तो उसका साधन ( चांखें ) है जावे; वर्षा कहाँ हैं? इसका उत्तर है किं - मुखमें । सुनने का साधन ( कान ) कहाँ हूँ? मुखमें । भाषणकी शक्ति कहाँ है? मुखमें । त्वचा यद्यपि पाद श्री शरीर में है, शीत, उष्ण, मृदुता, कठोरता श्रादिका ज्ञानं यद्यपि दूसरे पाद सुरु हाँसे भी हो सकता है; तथापि ज्ञानके सम्पूर्ण साधन मुखसे प्रति-ह्मणादिहीरिक्त किसी में नहीं हैं । इसलिए मुखको ही ब्राह्मण कहा गया है । स्पष्ट पुरुष अपने श्रङ्गोंको विविध श्रवसरोंमें विभिन्न वस्त्र - श्राभूषणोंसे ढकता है, परन्तु ज्ञानकी खान मुख ( ब्राह्मण ) को अनावृत ही रखता है । यदि माढक जावें; तब दर्शन न हो सके । कान बन्द कर दिये जायें; तो वं कष्टि सुनना समाप्त हो जावे । मुँह बन्द कर दिया जाए, तो भाषण बन्द शुद्ध पाद हो जावे । नाक बन्द कर दिया जावे; तो नाकके साथ ही साथ प्राणवायु. से समष्टि भी समाप्त हो जावे । बाहर जाने के समय यदि मुखको भी कपड़ोंसे ही व्य सर्वया ढक दिया जावे; तो न केवल मुखका ही अनिष्ट हो, बल्कि— भी । एक सारा शरीर गढ़में जा पड़े. वैसे ही ब्राह्मणके ज्ञानहीन वा लोभी होने । चाहार पर समाज अधोगतिको प्राप्त हो जावे । शरीरमें और देखिये कि — श्रापके शरीर में भोजन कौन प्राप्त कराता है? ' • इसका उत्तर भी यही है कि – मुख । भोजनकी परीक्षा करना और है । वाय उसका शरीरोपयोगी बनाना किसका काम हैं? मुखका । बासी, जले नदि ब्राह्मस हुए, विकृत, श्रहितकर भोजनकी कौन परीक्षा करता है? वही मुख CC - 0. Ankur Joshi ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( ख ) श्रहित वस्तुको थूक देना, और हितकर भोजनको. चबाकर उसे शरीरोप-योगी बनाना किसका काम है? मुखका । यदि मुख बिना बड़े - बड़े टुकड़े भीतर निगलता जावे ही चबाये पहला ही प्रास हृदयमें, तो उसका फल क्या होगा? सभी बाहर निकल पहुँचकर रुक जाए? पहले खाया हुआ भी पड़े । मुखका भी कर्तव्य है कि वह अपने में भोजन भीतर ही भेज दे । जो कुछ दांतोंमें भी बच जाए, उसे या तिनके से बाहर कर दे; नहीं तो दाँतोंमें पीड़ा होगी काम है कि बाहरसे श्राती हुई और अपने समाज में वस्तुओंमें अच्छी तरह ध्यान दे । श्रहितकर पदार्थोंको दे | हितकर वस्तुको अपने समाजमें स्थापित न करे, भी कुल्ले आदि । ब्राह्मणका यह प्राप्त होती हुई अन्दर न घुसने अन्दर प्रविष्ट हज़म करने योग्य बनाकर करावे; और बाहरी ज्ञानमें अपनी मुहर लगावे, पर यह ज्ञान - विभागका कार्य राजशक्तिकी सहायताके पिण्ड ( शरीर ) में हार्थोकी ब्रह्माण्ड बिना नहीं हो सकता । सहायता, में राज्यशक्तिकी सहायता श्रावश्यक है, परन्तु राज्यशक्ति भी वही हो, जो अपनी भुजाकी तरह अपने समाजका ही न हो; बाहरकी वा अपने धर्मसे भिन्न, या भिन्न स्थानकी न हो । उस अपनो तथा श्रपने धर्मवाली सरकारके बिना, बाहरसे थाई हुई, श्रनिष्टकारिणी विशृङ्खलताका श्रवरोधनहीं हो सकता । श्रस्तु । मुखका कार्य तो यह है कि - हितकर वस्तुको शरीरोपयुक्त करके भौवर भेजे । यदि मुखमें, लोभ पैदा हो जाय; और वह अपनी खाई वस्तुको अपनेमें ही रख छोड़े, गलेके नीचे न उतारे; उसका फल क्या होगा? केवल मुखका नहीं, बल्कि सारे शरीरका अनिष्ट होगा । यदि मुखसे हित - अहित श्रादिके परीक्षणकी शक्ति नष्ट हो जावे, तब भी. Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२०६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) यही परिणाम होगा । ब्राह्मणसे यदि ज्ञान चला जाये, उसमें लोभ पना घर कर ले; तब भी समाजकी यही अवस्था होगी । मख ही पढ़ाता है और मुख ही पढ़ता है, मुखका भाग मस्तिष्क ही समझता है और याद करता - रखता है । यदि मुख न रहे, तो पठन - पाठन लुप्त हो जावे । यदि मुख न हो तो शरीरकी पहिचान भी कठिन हो जावे । इसलिए शरीरके नाशार्थ पहले मुखको ही काटा जाता है । आज लोग इस मुखको काटना चाहते हैं, परन्तु इससे समाजका शरीर स्वयम् उच्छित्र हो जायगा, मर जायगा । उस शरीरकी पहिचान भी कठिन हो जायगी -- यह वे नहीं जानते । यही कारण है कि उक्त वेदमन्त्रमें मुखको ब्राह्मण कहा गया है । ( ३ ) परन्तु यह भी सम्भव है कि मुख और श्रखेिं होने पर भी कारणवश आँख कानी हो जाय, दृष्टिमें ' मोतियाबिन्द ' का आवरणं हो जावे, या अन्धापन हो जावे, अथवा उसमें आँखका मल भी रहे । कान होने पर भी एकमें, वा दोनोंमें बहिरापन हो जावे, कानमें मल भी रह सकता है । जिह्वा होने पर भी रोगादिके कारण उससे रमा-स्वादके ग्रहणकी शक्ति हट जावे या गूंगापन हो जावे या मौनिता हो जावे । उसकी नाक होती हुई जुकाम आदिसे ठीक - ठीक सूंघ न सके, उसमें नाकका मल भी हो सकता है, उसके मस्तिष्क में त्रुटि होनेसे ज्ञानकी शिथिलता सम्भव हो सकती है । मुखसे अपशब्द भी निकल सकता है, अज्ञानमूलक बातें भी निकल सकती हैं । ऐसा होने पर मुख कदाचित् निन्दित तो माना जावे; तथापि वह रहेगा मुख ही, सारे शरीरके ऊपर ही रहेगा । वह न कभी बाहु, न कमर, न पांव हो सकता है । ऐसा अर्थ लेने पर भी वर्ण - व्यवस्था जन्मसे ही सिद्ध होगी । शास्त्र - ज्ञानरहित भी, वक्तृता शक्तिसे रहित भी ब्राह्मण, निन्दित ब्राह्मण ही रहेगा, शुद्ध श्रादि कभी नहीं हो सकता! CC - 0. Ankur Joshi Collection ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( ख ) २०८ ( 8 ) अब बाहुओंको देखिये –यह क्षत्रिय कहे गये हैं, यह वीरमान वस्तुश्र है । यदि शिरमें लगुडप्रहार हो रहा हो, तब उसे रोकने में कौन पोषण होता है? उसका उत्तर है - बाहु, हाथ । यदि चरणोंमें कांटा आगे हो. तथ कांटेको कौन निकालता है? हाथ । यदि कमर से धोती चुमा य रही हो, तब उसे कौन ठीक करता है? वही हाथ । यदि वि इधर उ लाठी चलानी हो, तब कौन उद्यत होता है? बाहु | कोई शत्रु पर शरीरक जांघसे, ' वा पांचसे लाठी नहीं मारता । इस प्रकार सारे. मुखसे, वा उदर में
शरीरको हो ।
रक्षाका भार बाहुओंके ऊपर है । इसी तरह ब्राह्मण, वैश्य, एवं शुक ॥
बताका भार भी क्षेत्रिय पर है? व्यायाम, मुद्गर घादियोंका घर कमरकी श्राधार भो ' बाहु है । यदि भुजाएँ व्यायामको छोड़कर दुर्बल हो जाएं सकता तो उतन तो सिर पर दूसरोंका जूता भी पड़ेगा । क्षत्रियकी दुर्बलताका पर ब्राह्मण से लेकर शूद्र तकको भोगना पड़ता हैं.! श्रावरण लोभ ( i ) सिर वा मुख ब्राह्मण है, बाहु वा छाती क्षत्रिय है — यह तो श्रावरण हो गया । इससे निचला भाग पेट, कमर, वा जांघें वैश्य हैं । ' करु ( ६ ) तदस्य यद् वैश्यः ' ( यजुः वा ० सं ० ३ ९ ।११ ) ' मध्यं तदस्य यद् वैखः ' । सम्पूर्ण ( अथर्व ० १६ । ६ । ६ ) यह संग्रह भाग है । शरीरोपयोगी सब वस्तुएं । व्यर्थ हैं पेटमें जमा होती हैं, समाजोपयोगी सब वस्तुएं वैश्यों में संगृहीत होती शरीरको हैं । यांखने उत्तम भोजन देखा, हाथने उसे उठाया, मुखने उसे चबाण चल पड़त ' गले से नीचे उतारा । अब वह कहाँ जमा हुआ? इसका उत्तर है पेटमें श्रीर छः मध्य में । सब शरीरके पालन - पोषणकी सामग्रीका केन्द्र क्या है? वहां कोटा चुभ उदर । यदि उदर खाली हो, तो थोंखें व्याकुल हो जावें, शिरों निकालता चक्कर आने लगें, बाहुमें शक्ति न रहे? जांघ और पांव फिसत के अंशक जाएं । वैश्यों के दारिद्र्य में समस्त समाज नीचे गिरता है । पेटका काम है । इस है बाहरसे श्राई सामग्रीको संस्कृत तथा परिवर्तित करके सम्पूर्ण शुद्धि कर शरीरके पालन - पोषण योग्य बनाये । I वैश्यका काम है बाहरसे आई हुई । परमखक Guarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालीकः ( ४ ) २०४ २०८ परिवर्तित परिवर्धित करके उसके सारभागले सारे वीरभान वस्तुको समाजका कौन पोषण करके अधिक अवशिष्ट वस्तुका उत्सर्ग ( दान ) करदे । आ डांटा चुमा यदि उदरका भाग अपने पास प्राप्त धनको केवल अपने में ही रखे, चोती गिर इधर उधर न पहुंचावे तो बद्धकोष्ठता होनेसे उसके साथ ही साथ सम्पूर्ण शत्रु पर शरीरका मरण हो जावे । इसके अतिरिक्त यदि भोजनादिकी राशि मुखसे, व उदर न जमा की जाय, किन्तु अन्य अङ्गोंमें, तब भी उन्हींकी हानि शरीरको हो । इस प्रकार वैश्यको मध्य ( कमर ) मानकर भी घटा लेना चाहिये । वं शूद्धको कमरकी निर्बलतामें पुरुष उठने योग्य भी नहीं रहता, न कुछ कर का प्रधान सकता है । 1. एक अन्य की बात है । यदि सारा शरीर नंगा हो जावे, हो जाएं तो उतनी हानि नहीं है, परन्तु कमर में कुछ श्रावरण श्रावश्यक है । जो I श्रावरण पुरुषकै मुखमें दूषण है. वही उसकी कमर में भूषण है । जो लोभ ब्राह्मणका दूषण है, वही वैश्यवृत्तिका श्रावश्यक अङ्ग है । कमरसे श्रावरणके हटने पर निर्लज्जताका श्रकाण्डताण्डव हो जाता है । - यह बो ( ६ ) श्रव उससे नीचे उतरिये । पांव शूद्र है, यह सेवाभाग हैं । यदु वैखः सम्पूर्ण शरीरका भार पांवों पर आश्रित है । इनके बिना ऊपरके श्रृङ्ग वस्तुएं । व्यर्थ है । पांच यदि दृढ नहीं हैं, तो शरीरका पतन अनिवार्य है । जब मीत होती शरीरको कहीं जाना हो, तो पांव अपने ऊपर सारे शरीरको उठाकर झट. से चबाया चल पड़ते हैं । पांव यह कभी नहीं कहते कि - छः महीने हम चलेंगे है पेट, और छः महीने सारे शरीरके भारको उठाकर सिर चले । पांवमें कभी है? वहीं कांटा चुभ जाए; यदि हाथ उसे न निकाल सके, तो उसे सुख भी i, निकालता है; पर अपने दान्तोंसे । फिर दान्तोंमें भी प्राप्त पांवकी धूलि फिस के अंशको वह थूकसे बाहर कर देता है और जलसे अपनी शुद्धि करता टका काम है । इस प्रकार हाथ भी यदि कभी पांचको छूता है; तो जलसे अपनी स शुद्धि करता है । पांवोंकी कभी वु मार्ग में गमन की आशा हो सकती है; थाई हुई पर मुखका मस्तिष्क भाग हानि सोचकर उसे उधर से हटवा देता है । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( ख ) ick पांवमें स्वयं ज्ञान नहीं हुआ करता; इस कारण मस्तिष्क भाग उसे जैसे चलाना चाह; वह वैसे चले, अपनी इच्छानुसार नहीं, नहीं तो स्वयं भी गिरेगा; सारे शरीरको भी गिराएगा । पांव में सर्दी - गर्मी द्वारा शरीरमें हानि प्राप्तिको श्राशङ्का भी रहती है; तब हाथ उसे जूना तथा जुराब आदि द्वारा ढक देता है । शरीर पर बाहरसे थाया हुआ कोई कीड़ा यादि दिखाई पड़े; और उससे खुजली हो जाए, तो हाथ अपने नखोंसे उस खुजली को दूर कर देता है, परन्तु यदि नख ही बहुत बढ़ जाएं, तो उनको भी चाकूसे सीमित रूप से काटना पड़ता है । ( ७ ) यह है वेदप्रोक्त वर्णधर्मका संक्षिप्त चित्र । वर्णाश्रमधर्म ही इस सिन्धुदेश ( भारतवर्षं ) की विशेषता है । वैदिककाल ( सृष्टिभ्यारम्भ ) से हीं ब्राह्मण श्रादि वर्ण थे— और उनके धर्म - कर्म भी निर्धारित -यह उक्त वैदमन्त्रले स्पष्ट हो रहा है । यह भी सिद्ध हो रहा है कि -मुख, बाहु, ऊरु श्रादि श्रङ्ग जन्मसे उत्पन्न और परस्पर - सापेक्ष रहा करते हैं, कृत्रिम अङ्ग परस्पर - निरपेक्ष रहा करते हैं; उस अङ्गका कार्य भी नहीं कर सकते । एक - दूसरेके बिना यह सब व्यर्थ हैं । इस प्रकार ब्राह्मणादि भी परस्पर सापेक्ष तथा जन्मजात हुधा करते हैं । समाज में सभी अङ्गों की आवश्यकता हुआ करती है । अपने - अपने स्थानोंमें सभी श्रपेक्षित हुआ करते हैं, एकके भी बिना कार्य निर्वाह नहीं हो सकता । एक के स्थान में दूसरा नहीं रखा जा सकता । शूद्धको क्षत्रिय बनाना, वैश्यका ग्राहारण बनाना, ब्राह्मणात्रि का शुद्ध यादि बनाना उक्त वेदमन्त्रको इष्ट. नहीं, उसमें सुख प्रादिका सादृश्य हो प्रमाण है । सभी श्रङ्गांके कर्म, उनके वस्त्राभूषणादि अलग अलग हैं । उनकी अपने - अपने स्थानमें स्थिति होने पर ही प्रतिष्ठा एवं मर्यादा है: उनके इधर - उधर करने पर किसी की प्रतिष्ठा बढ़ नहीं सकती, हों, कर्ममें उच्छृङ्खलता और लोकोपहास अवश्य हो सकता है । जूता पहननेसे पांचोंमें श्रप्रतिष्ठा -जानकर यदि पावोंमें पगड़ी बांध दी जाय, कमरकी प्रतिष्ठा के लिए--An eGangotri Initiative
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२१० श्री सनातनधर्मालोकः ( ४ ) वैश्योंको ब्राह्मण बनानेके लिए उसको मुख की तरह नंगा कर दिया जाय, पांव के जूते शिरकी पगड़ीके स्थान रख दिये जायें- इस श्राकृति से यदि कोई बाहर जावे, तो कैसी दशा हो? इसके अतिरिक्त अङ्गका परिवर्तन. बिना काटनेके नहीं हो सकता, तः उनके परिवर्तनका यत्न उनके काटने के लिए ही है । ब्राह्मणों का अत्याचार उद्द्घष्ट करके वर्णाश्रम धर्म पर श्राप करने वालोंको इस मन्त्रसे शिक्षा लेनी चाहिये । श्रङ्ग पूर्वजन्मकर्मत्रश उत्पतिमूलक ही हैं, ऐहिक कर्ममूलक नहीं । ऐहिक कर्मों से उनकी पुष्टि - त्रिपुष्टि ही होती है, उत्पत्ति नहीं | इन अङ्गोंके कर्म नियमित हैं, पर वे अपने कर्मोंस पतित भी हो सकते हैं । तब वे कर्मपतित अङ्ग निन्दास्पद तो हो सकते हैं, पर वे उस अङ्गसे भिन्न अङ्ग नहीं हो जाते । मुख उरु. पैर, बाहु — मुख, ऊरु पैर, उरु - मुख, बाहु, पैर और - पैर बाहु -, सुख, बाहु, करु नहीं हो जाते । ' ब्राह्मण ज्ञानभाग होनेसे मुख है । ज्ञानका पद उच्च हुआ करता है; इसलिए ईश्वरने मुखको सारे शरीरके ऊपर विराजमान और पैरोंको सबसे नीचे । सेवकका सबसे बनाया है, अत्याचार है, तो पात्रोको नीचे स्थान है । यदि यह ऊँचा और सिरको नीचा करके व्यवहार चलाइये | जलमें लारा शरीर डूब जाए; पर सिर ऊपर रहे; तब तो कुछ भी हानि नहीं, परन्तु शिरके डूबने पर यवशिष्ट ऊपर ठहरा हुआ भी व्यर्थ है । सोनेके समय भी सारा शरीर रखना पड़ता हैं, उसे तकिया देना पड़ता सिरको कुछ ऊपर ही हैं, तकिया न मिले सके तो भुजा ही उसका तकिया बनती है । आरोग्य भी इसी में है । यह ईश्वरीय नियम है । एक ही शरीरके थङ्ग होने पर भी सब श्रङ्गोका कार्य उपयोगिता भिन्न - भिन्न है । अपने - अपने कार्यमें लगे और हुए की कोई CC - 0. Ankur Joshi Collection ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( ख ) २१२ प्रतिष्ठा नहीं । एक - दूसरेके कार्य करने की अनधिकार चेष्टासे जीवन सर्वनाश सम्भावित है । सांपकी पूँछने भी सिरका स्थान सक्छ था - कितनी ठोकरें खाई थीं । जैसे पैर रसुख नहीं हो सकता ग्रहण ि उपस्थ उन , बसे ह यह श्रादिको ब्राह्मण बनाना भी उक्त वेदमन्त्रसे विरुद्ध है । कोई भी इसके अतिरिक्त मुख सुन्दर भी हो सकता हैं, बीभत्स भी जातियों क मस्तिष्क प्रबल भी हो सकता है, निर्बल भी । बाहु पनि वा उसका द समाजके हो सकती हैं, निर्बल और कृश भी हो सकती हैं । कटिप्रदेश निवेश हैं, साथ या जांघें बहुत स्थूल होनेसे गमनमें अयोग्य भी सिद्ध हो सकती हैं । प्रबन्ध भ पांव सुन्दर भी हो सकता हैं, धूल - धूसरित एवं मलिन भी और हो जाय, चलने योग्य भी । तथापि इनकी संज्ञामें परिवर्तन नहीं हुआ करता । शुद्धिकर ब्राह्मणत्वके लिए तीन वस्तुएँ श्रावश्यक होती हैं, तपस्या, शास्त इस ज्ञान और योनि ( जन्म ब्राह्मण पितासे जन्म ब्राह्मणी मातासे उत्पत्ति ) शरीर वैसे समा में यह हम गत निबन्धमें महाभाष्यके प्रमाणसे बता चुके हैं । जो माप एक के तपस्या एवं शास्त्रसे हीन है, वह जाति ब्राह्मण है । यह ब्राह्म बड़ी निन्दा है । तपस्या और शास्त्रसे युक्त ब्राह्मण प्रशंसित होता है । इस की चेष्टा प्रकार त्पस्या एवं श्रुतके भाव प्रभावसे ब्राह्मणकी स्तुति निन्दा है । शरीर के ह तब वास्तविक उसका स्वरूपभूत कारण अवशिष्ट हुआ योनि वर्षात् पर भी ज ब्राह्मण माता - पितासे जन्म । इस प्रकार जन्मसे वर्ण - व्यवस्था और गुणकर्मसे उसकी प्रतिष्ठा सिद्ध हुई । मुख, बा यह यह ( ८ ) उक्त मन्त्रका यह भाव नहीं कि वैदिककालमें उक्त चा करके भ वर्णोंसे अतिरिक्त कोई जाति वा उपजाति नहीं थी; अथवा उस सम्म कार्य करे विराट् - पुरुषके मुख, बाहु, ऊरू चरण से श्रतिरिक्त अन्य श्रङ्गये है । जैसे नहीं । नहीं, तब भी अन्य अनेक जातियाँ थीं, जिनका संकेत यजु उसे मुख वा ० सं ० के तीसवें अध्यायमें है । केवल पूर्वके चार थङ्गोंसे प्राणीका शक्ति नह Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) २१२ असम्भव है | मल - मूत्र त्यागके लिये शरीर में अस्पृश्य अङ्ग गुद, से सब जीवन श्रादिकी भी अनिवार्य रूप से श्रावश्यकता हुआ ही करती है । ग्रहण किय उपस्थ यह उन चार अङ्गॉसे सङ्कीर्ण होनेसे अस्पृश्य है । जैसे शरीरमें अस्दृश्य , वैसे धद्रोंकी श्रावश्यकता भी हुआ करती है, वैसे ही समाज भी कोई भी प्राणी इन श्रृङ्गोंके बिना जीवित नहीं रह सकता, वैसे अस्पृश्य नी । उसका जातियांके बिना समाज भी स्थिर नहीं रह सकता । यह जातियाँ भी वाढ समाजके श्रावश्यक और अनिवार्य और सुख दियोंके ही सङ्कर देश निर्देश हैं, साथ ही कोमल तथा असहिष्णु भी हैं । इनकी समुचित रक्षाका सकती है । प्रबन्ध भी समाजका धर्म है । इनका अपनेसे जिस प्रकार विच्छेद न भी ओर हो जाय, वैसा प्रयत्न करना चाहिये । तथापि इनके स्पर्शमें तो चंपनी करता । शुद्धि कर लेनी चाहिये । इस प्रकार वेदमें एक ही मन्त्रमें सब कुछ कह दिया है । जैसे , शास्त्र शरीरमें सब अङ्गांकी सीमा, मर्यादा, अधिकार और कार्य विभक्त हैं, से उत्पत्ति ) वैसे समाज में भी होना चाहिये । एक के स्थान में अन्य के रखनेसे, वा जो मा एक के दूसरा बना देने से एक के योग्य कार्य को दूसरे को सौंप देने से बड़ी श्रयवस्था और उच्छृङ्खलता अनिवार्य है । वैश्योंको ब्राह्मण बनाने है । इस की चेष्टा वैसे हैं, जैसे पेट वा कमरको सिर बनाने का उद्योग करना । निन्दा है । शरीर के दृष्टान्त से ही यह स्पष्ट है । इस प्रकार उक्त मन्त्रका अर्थ करने निर्यात पर भी जन्मसे ही वर्ण - व्यवस्था सिद्ध होती हैं, कर्म से नहीं; क्योंकि-स्था सुख, बाहु, ऊरु, पाद जन्मसे ही उत्पन्न होते हैं । जन्ममूलक ही उनका यह - यह नाम हुआ करता है. कर्मसे यह नामकरण नहीं । जन्म से शुरू उक्त चा करके भस्मता तक उनका यही नाम हुआ करता है, चाहे मुख मुखवाला उस समय कार्य करे या न करे । ये हो जैसे वाल्यमें जन्मके समय मुख निरक्षर शब्द करता हैं, फिर भी य प्राणीक उसे मुख ही कहा जाता हैं, तव आंखों में अक्षर आदि पहिचानने की -. शक्ति नहीं होती, जी उसका कर्म है, फिर भी उसको नाम नेत्र हुआ CC - 0. Ankur Joshi ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ( ख ) २१३ करता है | इस प्रकार वृद्धावस्था में भी और यौवनमें रोग - विशेष होने पर भी जानना चाहिये | इसी तरह बाल्यावस्था, बाहुमें रक्षणकी शक्ति नहीं होती, बुढ़ापे में भी नहीं होती । जवानी.. मी रोगादिवश वा दुबलेपनसे वैसी शक्ति नहीं होती, फिर भी उसका नाम बाहु वही रहता है | इस प्रकार ऊरु वा कमर और पांव मी जन्म संम्रयमें अपनी शक्तिको धारण नहीं करते, इस प्रकार बुढ़ापेमें भी । जवानी में भी रोगा-दिवश वा दुर्बलतावश उनमें अपना - अपना कर्म नहीं होता, तथापि उनका नाम यथापूर्व ऊरु और पाद ही हुआ करता है । इस प्रकार निरक्षर भी ब्राह्मण, बालक और वृद्धके मुख की तरह ब्राह्मण ही रहता है । जैसे बालकको काममें नहीं लाया जाता और वृद्धको कामसे रिटायर कर दिया जाता है, वैसे ही निरक्षर भी ब्राह्मणको चाहे श्राद्ध, दान-ग्रहणादि कार्य में न लाया जाय, तथापि उसे मानना ब्राह्मणाद ही पड़ेगा । दानग्रहणादि कार्य में विद्वान् जन्म ब्राह्मणको ही लाया जावेगा, विद्वान् भी क्षत्रियादिको नहीं । जैसे कार्यसे रिटायर किये गये हुए भी वृद्धकी रक्षा की जाती हैं, कार्यसे अपरिचित वा कार्यमें न लाये गये भी बालकका संरक्षण ही किया जाता है, वैसे ही निरक्षर भी ब्राह्मणको श्राद्धादिमें न बुलाने पर भी उसका निर्वाह - योग्य वृत्तिदानसे संरक्षण करना ही चाहिये । क्योंकि यह उसके पूर्व जन्मके कर्मों का संमान है जिससे वह इस जन्ममें ब्राह्मण वंशमें उत्पन्न हुना । जैसे नेत्र यादिसे युक्त मुखके शिथिल होने पर भी उसके स्थानमें सबल भी बाहु वा ऊरु वा पादको श्राश्रित नहीं किया जाता, किन्तु नेत्रादिकी शुद्धि ही को जाती है, मुख श्रादिकी चिकित्सा ही की जाती है, अथवा उसका प्रतिनिधि अन्य नेत्र आदि उपयुक्त किया जाता है, वैसे ही उस साधा-रण ब्राह्मणादिकी भी गुरु आदि द्वारा योग्यता करानी चाहिये, अथवा उसके साक्षर पुत्रको नियुक्त करना चाहिये, योग्यतावाले भी क्षत्रिय- '. वैश्य आदिको नहीं - यह अवश्य स्मर्तव्य है । Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२१४. श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ). यह मुख, बाहु. ऊरु, पाद शैशवसे धागे छोटो प्रकृतिसे बड़ी प्राकृतिकों तथा पर्याप्त शक्तिको भी क्रमले धारण करते हैं. दुबलेपनको वा स्वाकार वा शक्तिको भी धारण करते हैं, तथापि नाम उनका वही रहता है, इस प्रकार ब्राह्मण निरन्तर भी चंन्त तं ब्राह्मण ही रहता है । क्षेत्रिय रक्षण में संलग्न भी जन्म से मरण तक क्षेत्रिय ही रहता है । वैश्य और शूद कृषि एवं सेवा श्रादिमें न लगे हुए भी वही रहते हैं, इस प्रकार वर्ण व्यवस्था भी जन्मसे सिद्ध होती है । परन्तु जैसे सब अङ्गोंके अपने - अपने कर्ममें लगने पर शरीरकी सुव्यवस्था रहती है; वैसे ही ब्राह्मणादिके भी अपने - अपने कर्ममें लगने पर ही संसार में सुव्यवस्था होती है । एक - दूसरेकी वृत्ति वा कर्मकी छोना-झपटी करने पर भी अव्यवस्था होती है, स्ववर्ण - कर्म - त्यागमें भी । ' जन्मसे वर्ण - व्यवस्था मानने वाला भी सनातनधर्म उन उन वर्णोंको स्वस्व - कर्मपरित्यागमें कभी प्रोत्साहन नहीं देता, प्रत्युत बैंसोंकी निन्दा करता है । ( १ ) इस प्रकार स्पष्ट है कि - शरीरके यह चारों ज्ञान - विभाग, वीर - विभाग, संग्रह विभाग, सेवा विभाग, अपने - अपने नियत कर्मोंकी: करते हैं, एक - दूसरे से ईर्ष्या नहीं करते | यह इस प्रकार से मिले हुए हैं कि - दर्शक इनको पृथक नहीं समझता । इनमें प्रेमकी भी परा-काष्ठा है । चलने के समय पांच नंगा हो जावे, उसमें कांटा चुभ जावे; तब मुख चिल्लाता है कि हाय! मैं मर गया । शत्रु सिर पर लाठी मारने लगे, तब दोनों हाथ सिरको बचानेके लिए ट तैयार हो जाते हैं, स्वयं प्रहार सह लेते हैं; परन्तु सिरको बचाते हैं । जैसे हाथ सिर की रक्षा करते हैं. वैसे ही पेट वा पांव पर चढ़ते हुए दुष्ट जीवोंको भी • दूर करते हैं । पांवमें यदि कांटा चुभ जावे तो हाथ झट पांचके पास पहुँचते हैं । जब तक वह कांटा नाखून द्वारा वा सुई द्वारा न निकले; ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ख ( ) २१६ तब तक वीरभाग प्रयत्नको समाप्त नहीं करता । भुजा श्राती हुई, विपत्तियों का दूर करना, बुद्धिमत्तासे उनके, उदर, पांच । चार दूर करनेका सोचना- इसको सिरका मस्तिष्क भाग ही सदा करता है टपार भाग योग्य स्थानमें रस पहुंचाता है । एक पुरुष बाहिर जाना । पेट यया । गमनका अन्य साधन नहीं है, तो पांच - शिर, बाहु, कमर चाहता आदिये वा उठाकर फट चल पड़ते हैं । इनके खाने - पीने श्रादिसे उत्पन्न भाग मल - मूत्र भागको इन्हीं मुख, ऊरु यदि अङ्गोंकी सङ्करतासे बने हुए उन्नत अङ्ग बाहर ढाल आते हैं— जिससे उक्त शुद्ध श्रङ्ग सुरक्षित रहें । अत धन अपने हैं । शुद्ध अङ्ग भी इन सङ्कर श्रृङ्गको स्पर्श न करते हुए भी, श्र ही आ श्रावश्यकतावश स्पर्श करते हुए भी जलसे अपनी शुद्धि करके इनसे भी रक्षा करते हैं, इनको कभी नंगे नहीं रहने देते । पर रखते इनको चार भ अपने शरीर के पृष्ठमें हैं, जैसे अन्त्यजोंको नगरसे बाहर ही उनकी आरोग्यतार्थ रखा जाता है । श्रथवा श्रागे रखते हुए भी उन्हें श्रावृत सम्बन् कि. रखते हैं । उनके छूने पर अपनी शुद्धि करते हैं । उनके इन सब श्रङ्गों में यह विवाद कभी नहीं होता कि तो हम ही मुख बनेंगे; खीर खाएंगे । भुजा भी कभी श्राग्रह नहीं करते कि- फ हम अपना कार्य छोड़ देंगे और सिर पर चढ़कर बैठ जायेंगे । पांव भी अयों से समाजी श्राग्रह नहीं करते कि - हम सब अङ्गोंके भार उठाने का कार्य छोड़ देने, निवेश अब मुखका कार्य देखना, सुनना तथा मधुरान खाना हम करेंगे । किन्तु किया वे अपनी रक्षाकी नियुक्ति उनकी देख - रेख में छोड़ देते हैं और समय पर श्रीबुद्धद कुछ आराम मांगते हैं । अस्पृश्य ( अछूत ) ङ्ग मल निकालन उपसंहृत शुद्धि प्राप्त किये हुए भी यह श्राग्रह नहीं करते कि – अब तो हम शुद्ध हो गये, अत्र हमें हाथ भी छुवे, मुंह भी अवश्य छुवे । न वे वैसा श्राग्रह करते हैं, न शुद्ध अङ्ग विना अत्यन्त आवश्यकता के उनको निबन्ध म छूते ही हैं । जन्म, CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२१६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) यही वर्ण - व्यवस्थाका विज्ञान है । जैसे शरीरमें सुख यादि प चार भी हैं; पांचवां सङ्कीर्ण अपानश्रादि अस्पृश्य नका उपाय भाग भी है, वैसे ही हिन्दु जातिके समाजमें भी ब्राह्मण-पेट यया- त्रिय - वैश्य - शूद्र यह चार असङ्कीर्ण - वर्णभाग और पांचवां सङ्कीर्ण चाहता है, वर्षा अन्त्यज समाज़ है । जैसे यह शरीर के चार श्रादिशे भाग तथा पञ्चम अपान आदि अपने - अपने कर्मों को करते हुए शरीरको उत्पन्न हुए उन्नत करते हैं, वैसे ही ब्राह्मण आदि चार वर्ण तथा पञ्चम श्रवर्ण भी बने अत अपने - अपने नियत कर्मों को करते हुए हिन्दु जातिको उन्नत कर सकते है । धन हैं । जैसे शरीर के इन चारों अङ्गों में श्रापसमें प्रेमकी पराकाष्ठा है; वैसे 7, श्रयश ही ब्राह्मणादि वर्णोंमें भी श्रापसमें प्रेम आवश्यक है । जैसे शरीरके चार भाग पृथक् - पृथक् होते हुए भी शरीरकी संघटनासे एक बने हुए इनको हैं, वैसे ब्राह्मणादि चारों वर्ण पृथक् - पृथक् होते हुए भी हिन्दुत्वके उनी सम्बन्धसे एकताको ही प्राप्त हुए हुए हैं । जो लोग धाक्षेप करते हैं धानूर कि- शूद्र ब्राह्मण हो सकता है, वैश्य क्षत्रिय हो सकता है, विज्ञान उनके मतकी पुष्टि नहीं करता । तब वह ग्राह्य भी कैसे हो सकता है? तोहर रते कि- फलतः ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् ' मन्त्रके इन दोनों प्रकारके ही पांच भ अर्षो से सनातनधर्म के पक्षकी ही पुष्टि है । सनातनधर्मों तथा श्रार्य-छोड़ देंगे समाजी दोनोंका ही इस मन्त्र द्वारा अपने पक्षकी सिद्धिमें विशेष अभि-गे । किन्तु निवेश रहता है, इसलिए हमने भी इस मन्त्रका विशेष विशदीकरण समय पर किया है । अन्तमें हम इस विषय में श्रार्यसमाजी विद्वान् निकालना श्रीबुद्धदेवजी विद्यालङ्कारके अर्थ की थालोचना करते हुए इस निबन्धको उपसंहृत करते हैं । तो हम नवे वैसा ( १० ) ' ब्राह्मणोस्य मुखमासी ' में पूर्व अर्थ बढ़ाते हुए हमने गत के उप निबन्ध में ब्राह्मणका मुखसे जन्म, क्षत्रियका बाहुसे जन्म, ऊरसे वैश्यका जन्म, श्रौर पांचसे शूद्रका जन्म बहुत प्रमाणोंसे सिद्ध किया है— इस CC - 0. Ankur Joshi ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( ख ) २५७ विषय पर श्रीबुद्धदेवजीने ' सार्वदेशिक ' ( सितम्बर सन् १६४६ पृष्ठ ३६३-२१६ ) में लिखा है-( क ) प्रथम ब्राह्मण तो मुख श्रथवा भुजासे उत्पन्न होनेसे श्रेष्ठ हुए, परन्तु उसके पश्चात् उनके सन्तान तो मुखं श्रथवा भुजासे उत्पन्न हुए नहीं; तब वे ब्राह्मण, क्षत्रिय कैसे कहलाये? ( ख ) बात तो सच यह है कि- ब्राह्मणका जन्म अर्थात् प्रादुर्भाव आज भी मुखसे होता है । हजार मनुष्य सभामें चुपचाप बैठे हों, कौन ब्राह्मण है, कौन मूर्ख – यह पता नहीं लगता, परन्तु चलती है, तब ब्राह्मणोंके वचनोंको सुनकर सब उसका हैं । यही ब्राह्मणका ' मुखसे प्रादुर्भाव ' है । ( ग ) इसी प्रकार भीरु तथा क्षत्रिय इकट्ठे बैठे हों नहीं लगता कि कौन भीरु है, कौन क्षत्रिय? परन्तु भुजबलसे क्षत्रियका प्रादुर्भाव हो जाता है । ' इस पर उत्तर हम निम्न पंक्तियोंमें देते हैं।— जब शास्त्रचर्चा लोहा मान लेते , तो कुछ पता संकट पड़ने पर Collection Gujarat. ( क ) मालूम होता है कि - इस प्रश्नको श्रीबुद्धदेवजी एक बड़ी भारी बात मान बैठे हैं कि- ' सृष्टिकी यादिमें तो परमात्मा के मुखसे उत्पन्न ब्राह्मण तथा भुजासे उत्पन्न क्षत्रिय कहलाये, परन्तु उनके सन्तान तो मुख - भुज श्रादिसे उत्पन्न न होनेसे ब्राह्मण, पत्रिय कैसे कहलाये? " स्वा ० दयानन्दजीने भी अपने स ० प्र ० में इस प्रश्नको महत्त्व दिया है । हम इसका उत्तर देते हैं । जब आप दोनों गुरु - चेलोंने ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' में पञ्चमी अर्थ मान लिया और परमात्माके मुख आदिसे ब्राह्मण आदिकी उत्पत्ति भी मान ली, सृष्टिप्रकरण भी मान लिया; तब आगे कोई कठिन बात नहीं रही । उक्त मन्त्रमें ' ब्राह्मण ' शब्द तथा ' राजन्य ' शब्द ' ब्रह्म हि ब्राह्मणः, क्षत्रं राजन्यः ' ( शतपथ १।१।१।११ ) An eGangotri Initiative
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२१८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) इस वचनके अनुसार स्वार्थ - वाचक हैं, तब ' परमात्मा के मुखमें क्या ब्राह्मण - ब्राह्मणीका जोड़ा बैठा था ' यह आपका उपहास उपपन्न नहीं हो सकता । अब शेष रहा यह प्रश्न कि उन ब्राह्मणों क्षत्रियोंके सन्तान पर-मात्मा के मुख - भुजासे उत्पत्तिके बिना ब्राह्मण - क्षत्रिय कैसे हुए ' इस विषय में श्रीबुद्धदेवजी वेदाङ्ग व्याकरणको देखें । वहां ' ब्रह्मणोऽपत्यं ब्राह्मणः ' यह अपत्य प्रत्ययार्थक प्रण होगा । इसमें प्रमाण - ' ब्राह्मी जातो ' ( पा ० ६१४/१७१ ) अथवा – ' ब्राह्मणस्यापत्यं ब्राह्मणः ' यह अपत्यार्थक ( पा ० ४।१।१२ ) अण् प्रत्यय भी हो सकता है । इसी प्रकार ' राज्ञो -ऽपत्यं राजन्यः ' ' राजश्वशुराद् यत् ' ( पा ० ४ | १ | १३७ ) ' राज्ञोऽपत्यंग्रहां " जातावेव कर्तव्यम् ' ( वा ० ) ' तत्त्रस्य अपत्यं क्षस्त्रियः ' ' क्षत्त्राद् घः ' ( पा ० ४ | १ | १३८ ) इससे अपत्य अर्थ में ' यत् ' प्रत्यय वा ' घ ' प्रत्यय करने पर ' राजन्य ' वा ' क्षत्रिय ' कहलाता है । अथवा ‘ राजन्यस्यापत्यं राजन्यः ' ' तस्यापत्यम् ' ( पा ० ४।१।१२ ) से ऋण प्रत्यय होने पर भी ' राजन्य ' बनता हैं, इससे ब्राह्मण और क्षत्रियोंके सन्तान भी ब्राह्मण, क्षत्रिय सिद्ध हो गये । यदि विद्यालङ्कारजी कहें कि - ब्राह्मण, राजन्यके सन्तान ब्राह्मण, क्षत्रिय शब्दवाच्य तो सिद्ध होगये - यह ठीक है, पर वे ब्राह्मण, राजन्य जाति वाले तो न हुए, इस पर हम कहेंगे कि - यह भी सुन लीजिये । वेदाङ्ग व्याकरणके ‘ जातेरस्त्रीविषयात् ' ( पा ० ४ १/६३ ) सूत्रके ' सकृदा-ख्यातनिग्रह्या ' यह ब्राह्मणादि जाति के लक्षण बताने वाला वार्तिक या है । उसका अर्थ यह है कि - ' सकृद् एकस्यां व्यक्तौ कथनात्: ( मुख-भुजाद्य त्पच्या ब्राह्मणोऽयम्, क्षत्रियोऽयम्, इत्युपदिष्टे ) तद् व्यक्त्यन्तरे ( तदपत्यसहोदरादौ ) तदुपदेशं विनापि सा जातिर्भवति ' यह महाभाष्यका आशय है अर्थात् एक बार यह सिद्ध हो जाने पर कि यह ब्राह्मण हैवा ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ' ख ) २५० क्षत्रिय है—– फिर उसके सन्तान आदिकों भी वही माना जाता है ६ यह दूसरा जातिलक्षण है । तब जब परमात्माके मुख से ब्राहाण किसी क " हुए, तब उनका ब्राह्मण यह वेदोक्त नाम होनेसे उनके सन्तान - होगा-- श्रादिको भी उक्त वेदाङ्गोक्त जातिलक्षणानुसार उसी जातिका सहोदा जाता है । इसी प्रकार बाहुज क्षत्रिय, ऊरुज वैश्य, तथा पादन का शूद्रहं - सन्ततियों में भी उसी क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इस जन्मसिद्ध जाहिर छिपा व्यवहार ' सकृदाख्यातनिग्रह्या ' इस वेदाङ्गके कथन से हुथा करता है • अर्थ हो यह बात वेदको भी सम्मत है । यह हम गत निबन्ध में सिद्ध क परास्त हैं । और ' ब्राह्मोऽजातौ ' सूत्रमें ब्राह्मणको ' राज्ञोऽपत्यं ग्रहणं नाना ॥ हुआ । - इस वार्तिकमें राजन्यको जातिवाचक ही माना हैं । हो गया था ब्राह्मण " बड़ी भारी युक्तिका वेद - वेदाङ्ग द्वारा समाधान । सभामें होनेसे प ( ख ) व यापकी कही ब्राह्मणके मुखसे जन्मकी विवेचना पर मं ' सुनिये | आपके अनुसार सभामें जो क्षत्रिय वैश्य बैठे होंगे, वे शास - चर्चा में आपके अनुसार कुछ भी बोल नहीं सकेंगे तब कदाचित् प्रा क्य प्रतियोगि ' क्षत्रिय तथा वैश्यका ब्राह्मण - इतनी विद्या पढना न मानते होंगे । कई - आप शूद्रको वेदविद्या पढ़ाना मानते हैं, कहां आपने क्षत्रिय, वैसी शास्त्रचच भी शास्त्र पढ़ाने वेदानुसार बन्द करवा दिये । जनक, श्रजातशत्र र थाप प • क्षत्रियोंका उपनिषदोंमें निरूपण थाया है, उन्होंने वहां ब्राह्मणको शास्त्रचच ब्रह्मविद्या सिखलाई । पर यदि आपका किया उक्त मन्त्रका अर्थ के उसका म है, तो उपनिषद्को मुखसे जन्म वाले क्षत्रियोंको ब्राह्मण कहना हि श्रापका " था, और मुखसे जन्म - रहित ब्रह्मविद्यानभिज्ञ ब्राह्मणोंको शूद्र कहर उत्पन्न कर चाहिये था, पर जब उसने वैसा नहीं कहा, उपदेष्टा भी क्षत्रियको मुखसे उत ही कहा है, अनभिज्ञ भी ब्राह्मणोंको ब्राह्मण ही कहा है, तय श्री क्या उसे ‘ देवजीका अर्थं जहां मनगढन्त सिद्ध हो गया, वहां वर्ण - व्यवस्था होंगे? नेवा - गुणकर्मसे न वनकर जन्मसे ही सिद्ध हुई । CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२५० श्री सनातनधर्मालोकः ( ४ ) I जाता है श्रीदेवी के अनुसार कई आदमी बैठे हों, कोई पुरुष मुखसे हाय किसीको गाली देता जाय, तो वह उनके ' वैदिक ' मतके अनुसार ब्राह्मण तान- सहोदा होगा क्योंकि उसकी उस समय मुखसे उत्पत्ति हो रही है । जो चुप विका ये हैं, वे मुखसे उत्पन्न न होनेसे शूद्र होंगे । इस अपने बनावटी दज शूद हा अर्थमें आपने मन्त्रमें स्थित ‘ अस्य ' पद ( ' ब्राह्मणोस्य मुख ' ) को कहाँ जाति छिपा दिया? सृष्टि - उत्पत्तिके प्रकरण में परमात्मासे भिन तो सर्वनामका करता है- - हो नहीं सकता । और फिर जो वक्ता न हो, लेखसे ही आपको सिद्ध कर परास्त करदे, वह तो ब्राह्मण न हुआ, क्योंकि वह मुखसे उत्पन्न नहीं - बाज़ार हुआ । यदि आप शास्त्रचर्चा में परास्त होकर चुप हो जाएं, तब श्राप या ब्राह्मण रहेंगे या अ॒ब्रह्म॒ण — इसका निर्णय भी कर लीजिये । जो विद्वान् सभामें चुप किये बैठे हैं, वे आपके अनुसार मुखसे उत्पन्न न हो " रहें होनेसे क्या शुद्ध हैं? चना पर 7 वे शास हाचित् का क्या ' मूर्ख ' भो कोई ' वर्ण ' हैं, जिसे आपने ' ब्राह्मणवर्ण ' की ' होंगे । कई प्रतियोगितामें रखा है? रातको शयन के समय आप अपनी स्त्रीकेसाथ नय शास्त्रचर्चा तो करते न होंगे, तब थाप ब्राह्मण भी न रहते होंगे । तब तशी थाप अपनी ब्राह्मण स्त्रीका परिवर्तन भी करेंगे या नहीं? श्रथवा ह्राणाँको शास्त्रचर्चा में श्रापकी पत्नी आपसे पराजित हो जाय, प्रत्युत्तर देनेमें उसका मुख बन्द हो जाय, तब थाप तो ब्राह्मण होंगे, वह शूद्रा । तब कहना च श्रापका उसके साथ संयोग क्या शास्त्रीय होगा? शूद्र कह उत्पन्न करने वाला न होगा? इधर श्रापका जन्मा त्रियको मुखसे उत्पन्न तो होगा नहीं, वह ब्राह्मण भी न तब श्रीद क्या उसे अपने स्वामीके अनुसार किसी शूद्रको यवस्था होगे? श्रथवा रोनेसे ही उसकी उत्पत्ति भी मुखसे रोने वाले लड़के ब्राह्मण होंगे । क्या वह वर्णसङ्कर पुत्र यापकी तरह होगा । तब थाप देनेके लिए तैयार मानें, तो सभी CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( ख ) २२१ ( ग ) अब श्रापका क्षत्रियका ' बाहुसे जन्म ' परीक्षित किया जाता है । आपके हिसाब से युद्ध में कर्ण, द्रोणाचाय यादि के मुकाबले में भाग जाने वाले युधिष्टिर तो अब क्षत्रिय न रहे, द्रोणाचार्य श्रादि चत्रिय हो गये, क्योंकि उनकी भुजबलसे उत्पत्ति हुई । पर ' महाभारत ' में द्रोणाचार्यको ब्राह्मण तथा युधिष्ठिरको क्षत्रिय बताया गया है । यह क्यों? क्या यह बात आपके उक्त अर्थकी अशुद्धता की परिचायक महीं? क्या ' भीरु ' भी कोई वर्ण है, जिसे आपने क्षत्रियकी प्रतियोगिता में रखा है? आप भीरुको कौनसा वर्षा देंगे? यह भी बताएँ किं-भीष्मकों शास्त्रज्ञ होनेसे ( देखिये उसका श्रादर्श ' शान्तिपर्व ' तथा ' अनुशासनपर्व ' में ) तथा भुजबलसे युक्त होनेसे ( देखिये उसका ' आदर्श ' भीष्मपर्व ' में ) क्या ब्राह्मण - क्षत्रियका सङ्कर मान लेंगे? फिर तो वुश्ती खेलने वालोंको क्षत्रिय कह देंगे । आप जब गुरुकुलमें भुजबल दिखलाया करते थे, भुजबलसे मुद्गर घुमाते थे, श्राप तब क्षत्रिय तथा विद्याध्ययन- व्यापृत होनेसे ब्राह्मण - इस प्रकार वर्णसङ्कर थे? तब जो क्षत्रिय भुजबल न होने से क्षत्रिय न रहेंगे, उनका कौनसा चर्ण होगा '? स्त्रियाँ स्वभावतः श्रवला होती हैं, क्योंकि वे शुक्रको गौणता तथा रजकी अधिकतासे उत्पन्न होती हैं । रज शुक्रधातुकी थपेक्षा बहुत निर्बल होता है, तब स्त्रियों तो क्षत्रिय सर्वथा होंगी नहीं, तब क्षत्रिय वेचारे तो अविवाहित ही रहे । स्त्रियाँ मुखसे गालिप्रदान-दक्ष होती हैं, तब मुखसे उत्पत्तिके कारण वे आपके मतमें ब्राह्मणी हो जायेंगी । वैश्य स्त्रियाँ क्या व्यापार करने जाएंगी? परन्तु उन गज-गामिनियोंके ऊरु शीघ्र न चल सकेंगे, तब वे वैश्य भी न होंगी, तब वैश्य भी श्रविबाहित ही रहेंगे । शास्त्रानुसार सेवा में संलग्न स्त्रियोंको क्या श्राप शूद्र मानेंगे? तब तो स्त्रीमात्र शूद्र हो जाएंगी, तब श्राप उन्हें वेदाधिकार ही कैसे दे सकेंगे? फिर तो ' जन्मना जायते शूद्धः ' An eGangotri Initiative
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२२२ श्रीसनातनधर्माल्लोकः ( ४ ) यह धार्यसमाजियोंका अभीष्ट वचन भी शुद्ध हो जायगा, क्योंकि-उत्पन्न होते हुए सभी सेवा नहीं कर रहे होते, किन्तु माता - पिता द्वारा सेवा करा रहे होते हैं । लंगदे शूद्र पुरुषोंको तो आप पैर से उत्पत्ति न होनेसे धवर्ण ही मान लेंगे । श्रीबुद्धदेवजी केवल ब्राह्मण, क्षत्रियकी मुख, बाहुसे उत्पत्ति बत-लाकर चुप हो गये । न तो थागे उन्होंने वैश्यको ऊरुसे उत्पादित किया, न शूद्रको पैरोंसे उत्पन्न कराया । कदाचित् यहां उनकी तर्कशक्ति कुण्ठित हो गई हो? कदाचित् इस विचारसे कि हैदराबाद श्रादि. नगरोंमें ऊरुके बल वा पैरके बलसे जाने वाले श्राप ऊरु वा पांचसे जन्म हो जाने के कारण वैश्य वा शूद्र न बन जाएं! महाशय! बनावटी., । अर्थ करनेमें ऐसे दोष स्वतः उपस्थित हो ही जाया करते हैं । आप इन कृत्रिमताओंको बन्द कीजिये । वर्णको कर्मसे व्यवस्थित करना श्रव्य-वस्थाओं को उत्पन्न करना है, जन्मसे व्यवस्थापित करनेमें ही अव्यव स्थाएं दूर हो सकती हैं । हम इसको श्री पं ० गङ्गाप्रसादजी शास्त्रीके. शब्दोंसे लिखते हैं । ( ११ ) श्रार्यसमाजसे प्रश्न है कि-( क ) जब मनुष्य शूद्रके कर्म करनेसे शूद्र है, उसको यज्ञ करना,. तथा वेदपठनादिका अधिकार है या नहीं? यदि है तो वह ब्राह्मण हो गया, या शूद्र ही रहा? यदि शूद्र; तो कर्मसे ब्राह्मण बनता है— यह श्रापका सिद्धान्त कहां गया? यदि ब्राह्मण बन गया, तो यह अधिकार ब्राह्मणको मिले, शूद्धको कहां मिला? शूद्ध तो अधिकारोंसे चित ही रहा । ( ख ) श्रार्यसमाजी विद्वान् श्रीश्रार्यमुनिने मी ० द ० ६।१।२५ में शूद्रको यज्ञाधिकारका निषेध ही किया है । इसके अतिरिक्त प्रत्येक शूद CC - 0. Ankur Joshi Collection ' ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( ख ) २२४ । अपने कर्म सेवा शिल्पादिका त्याग नहीं कर सकता, तब हम व अधिकार वेदाध्ययनादि प्राप्त नहीं हो सकेंगे । ग शूद्र भी वेद पढ़े - यह हो नहीं सकता समाजिक सिद्धान्तमें मूर्खका नाम शूद्र है । इस प्रकार , कारण तो शूद्रको वेदसे अवश्य ही दञ्चित रहना पड़ेगा याचं ' मन्त्रसे शूद्रको वेदाध्ययन कैसे प्राप्त होगा? उसे दिले क्या रह ज क्योंकि धर्म में ले सामयमा धर्मात । फिर अपने पर वर लिखा ( घ ) यदि शूद्र नाम मूर्खका ही है, तो क्यों कोई अपना नाम क रखावेगा? कोई मूर्ख भी अपने लिए मूर्ख शब्द नहीं सह सका: इस प्रकार एक वर्णका भाव ही जावेगा और आर्यसमाज में शूद्र अपमानित रहा । ब्राह्मण ( छ ) यदि सब शूद्र अपने कर्मोंको छोड़कर ब्राह्मण बनने चल दिये तो शिल्पके नाशसे देशका नाश अवश्यम्भावी है । श्राद्ध शुद्धकर्म दोष, क्षत्रियो कल वैश्य बने, समय पर कुछ क्षत्रिय और ब्राह्मण बनने के कर्म सिंमाशंका ऐसी दशा में उस मनुष्यका क्या वर्ण बनेगा - यहां तो ' इतो भ्रष्टत मानना नष्टः ' वाली कहावत होगी । कर्मसे वर्ण मानना श्रव्यवस्था और कमी च · श्राह्नान करना है । ठीक ह ( १२ ) सनातनधर्मानुसार जन्मसे वर्ण मानना एक महत्त्वकी बलु है | यदि समस्त क्षत्रिय ब्राह्मण बननेकी उनमें अपने कर्म राष्ट्ररक्ष श्रीवश्यक परित्र्याग कर दें, तो राष्ट्र नष्ट - भ्रष्ट होकर चकनाचूर हो जावे । ऐई ईन वस्त दयामें उस राष्ट्रनाशका उत्तरदायी कौन होगा? यदि क्षत्रियोंसे वा करती ह तलब किया जाये, तो कर नहीं सकते, क्योंकि वे कहेंगे कि हम इसके प ब्राह्मण बनने चल दिये थे । इसी प्रकार यदि शूद्र या वैश्यसे हि और वाणिज्यके न! शका उत्तर मांगा जावे, तो वे भी कह सकते हैं । उस सम Gujarat. An eGangotri Initiative