सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 131–140
सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 131–140
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२२४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) हम तो ब्राह्मण या क्षत्रिय बननेमें लगे थे- हमें शिल्प और वाणिज्यकी उसे दि क्या पंड़ी? सचमुच, कर्मसे वर्ण मानने पर उनका कोई भी दोष नहीं रह जावा, प्रत्युत वे पुरस्कारके भागी हो जाने चाहिएँ, परन्तु सनातन-योंकि धर्म में ऐसा नहीं है । गीता में कहा है- ' श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः पर-नामर्थ्यांमा ले धर्मात् स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ' ( ३।३५ ) फिर श्रपने साधारण वर्णं धर्मका निर्वाह करते हुए मर जाना अच्छा, परन्तु पर वर्ण के उत्तम भी धर्मका स्वीकार करना अच्छा नहीं । श्रत्रिस्मृतिमें लिखा है – ' ये व्यपेताः स्वधर्माच्च परधर्मे व्यवस्थिताः । तेषां शास्ति-ना नाम गृह करी राजा स्वर्गे लोके महीयते ' ( १७ ) जो अपने वर्ण के धर्म से बिरुद्ध सहसा श्राचरण करके दूसरे बके कर्म करते हैं, उनको दण्ड देने वाला राजा समाजम स्वर्गका अधिकारी होता है | यही कारण था कि - क्षेत्रियधर्म छोड़कर ब्राह्मणधर्म करने चल दिये अर्जुनका श्रीकृष्णभगवान्ने निग्रह किया था । चल दि कर्मानुसार वर्ण मानने पर न तो आज राष्ट्रकों परतन्त्रताको प्रश्न कर्म छोड़ क्षत्रियों से पूछ सकते हैं, और न वाणिज्यके नाशका वैश्यसे, न शिल्प-कर्माका शूद्रों से ही कुछ पूछा जा सकता है । इस प्रकार कर्मसे वर्ण तो भ्रष्ट मानना उच्छृङ्खलताका साम्राज्य खड़ा करना है, उसमें समाज - स्थिति व्यवस्था कमी चल ही नहीं सकती; अनएव वर्णव्यवस्था जन्मसे ही मानी जानी ठीक है - इसीसे राष्ट्ररक्षा अच्छी प्रकार हो सकती है । हवकी ( १३ वर्णविभाग एक ईश्वरीय नियम हैं । प्रत्येक मनुष्यको अपनी राष्ट्रवाच श्रावश्यकताएँ पूर्ण करने के लिए वस्तु समूहकी श्रावश्यकता पड़ती है. जावे । ऐसे ईन वस्तुओंको बना कर सेवा करने बालेकी श्रावश्यकता भी हुआ त्रियोंसे करती है । वह सेवा समयके हेर फेरसे कहीं नष्ट न हो जावे, श्रतः - हम है इसके पालनार्थं एक ऐसा समूह हो - जो उसे शिल्पको श्रपना जन्म-विश्यसे हि सिंद अधिकार समझता चला जावे; श्रौर उससे उसकी वृत्ति भी चले | सकते हैं उसे समूहको ही वेद में शूद्र कहा है, यही समूह समाजको प्रतिष्ठित CC - 0. Ankur Joshi ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( ख ) २२५ करने वाला वा धारक है, इसलिए इसे विराट् ( ब्रह्ममय जगत् ) का चरण कहा है, चरण शरीरका धारक होता है । यह सेवक है । शिल्पसे बनी वस्तुओंकी इधर - उधर जगत्में वाणिज्यसे फैलाने वालेकी भी श्रावश्यकता होती है— छतः वैश्य वर्णकी रचना ही है । वह वैश्यसंज्ञक समूह भी ऐसा होना चाहिये जो वाणिज्यको अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझे । वेदमें उसे विराटका कर इसलिए कहा है । कि — इबर - उधर घूमनेका साधन जैसे ऊरु हैं, वैसे ही इधर - उधर घूम-कर वाणिज्य करनेका अधिकारी वैश्य ही हैं । यह कोषाध्यक्ष है । इन दोनोंकी दुष्टोंसे रक्षा करनेका जन्म सिद्ध अधिकारी क्षत्रिय है-" जिसको विराटकी भुजा कहा है । मुजा शरीरकी रक्क है. चत्रिय भी वैसे ही जगत्का रहक है । यह राजा है । चत्रियकों ही राज्यकर्ममें क्यों नियुक्त किया गया; अन्य वर्गोंको क्यों नहीं? इसमें भी रहस्य हैं । सत्वगुणमें क्रियाशक्ति न होनेसे सस्वप्रधान ब्राह्मण वं राजा बनने का अधिकारी नहीं । तमोगुणमें प्रमादी अधिकता से समःप्रधान गृह भी उसमें अधिकारी नहीं । वैश्यवर्णन क्रियामूलक रजोगुण होने पर भी उसकी प्रवृत्ति कुछ तमोगुणकी ओर होती है; अतः वह भी राज्यका अधिकारी नहीं | क्षत्रिय वर्ण तो क्रियाशक्तिमूलक रजोगुण से युक्त भी हैं, उसकी सच्चगुणकी ओर प्रवृत्ति भी होती है । रजोगुणके कारण उसमें क्रियाशक्ति, युद्धशक्ति, शत्रुदमनादि शक्तियों की प्रचुरता रहती हैं, सच्चगुणके कारण धर्मभाव के भी साथ होनेसे धर्मानुसार प्रजापालन तथा राजकार्य सञ्चालन होता है, यही सोचकर राजतन्त्रके सञ्चालनका भार क्षत्रियव में नियुक्त किया जाता था । तथापि वह शासन भी निरंकुश न होकर धर्मतन्त्र - शासनाधीन था । घमंतन्त्रकी व्यवस्थाका भार सर्वश्रेष्ठ, ज्ञान - विज्ञानयुक्त और दूरदर्शी ब्राह्मण वर्णके अधिकारमें Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) था । वही योग्य राजाको निर्वाचित करता था । धर्मतन्त्रावहेलक राजा को वेनकी तरह नष्ट कर दिया जाता था - जिससे धर्मतन्त्र तथा राज-तन्त्र के सामञ्जस्यसे प्रज्ञा पर सुशासन होता था । उपदेश द्वारा इन तीनों वर्णोंको ठीक - ठीक व्यवस्थामें रखनेका अधिकारी ब्राह्मण है, यह संकेत दिया हो जा चुका है । इसके उपदेशके बिना तीनों वर्णोंके विकृत हो जानेकी आशङ्का रहती है— श्रतएव इसको समाजका कण्ट्रोलर ' मुख ' कहा है । यह सब जन्मसे मरण तकं अपनी - अपनी ड्यूटी पर सावधान रहें - अतः इन वर्णोंको भी जन्मसे ही नियमित किया गया है । जन्मसिद्ध वर्णसे ही उसकी ड्यूटी पूरी न करने पर जवाब - तलब, किया जा सकता है, कर्म सिद्ध वर्ण वालेसे नहीं । वस्तुतः कर्म - वर्ण कभी एक रूपमें नहीं रह सकता, अतः उससे जवाब - तलब भी नहीं किया जा सकता । यदि किया भी जाये, तो वह बहाना कर सकता है । कि मैं तो अमुक वर्ण बननेका प्रयत्न कर रहा था । ' स्वतन्त्रः कर्ता ' । श्रतः उसे कोई दण्ड भी नहीं दिया जा सकता । पर जन्मजात वर्ण उसमें कोई बहानेबाजी नहीं कर सकता । अपने वर्ण - कर्मसे प्रेम भी जन्मजात वर्गका ही हो सकता है, कर्मजात वर्णका नहीं । इनमें मुख, बाहु, क्ररु, पाद तथा अस्पृश्याङ्ग स्थानीयता रखकर जो परस्पर वैषम्य किया गया है- यह हाथके पाँच अंगुलियोंके वैषम्य की तरह जहाँ नैसर्गिक है, वहाँ समाज - हितकारक भी है । सभी समान रख दिये जाते; तो कौन किसकी आज्ञा मानता? श्रतः शुडका कर्म सेवा होनेसे सेवकका दर्जा सबसे कम रखा गया । इससे ऊपर धनकी शक्ति ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( ख ) वैश्यको रखा गया । पर वह भी धनके मद में चूर होकर बिगढ़ न के और सेवक भी सेवा वा शिल्पके नशेमें चूर न हो जावे श्रतः , उन दोनों के ऊपर राज्यशक्ति, शासनशक्ति क्षत्रियको रखा गया , वह भी दोनों वर्णोंका शासक होनेसे अपने आपको ही ' कतु मकतु ' मन्यथा न समझ लें और कुमार्गों पांव न रख दे तो सेचनशक्ति कर्तुं शह । ,, धनशहि उसक शासनशक्ति इन सबसे ऊँची धर्मशक्ति ब्राह्मण रखा गया । इसी वर्ण. दास व्यवस्थासे भारतवर्षं सृष्टिकी श्रादिसे सदा के लिए अमर हो गया । इस उसक जन्मना वर्णव्यबस्थाका नाश भारतवर्षका नाश है, अपने देशको विदेश किया बनाना है । स्वदेश - प्रेमियोंको इस जन्मना वर्णव्यवस्थाके आये हुए कव्रिपय दोषोंका सुधार करके यह फिर पूर्वकी भान्ति संव ब्याजसे वर्णव्यवस्थाका संहार जाना है । फिर इसे शुद्ध कर लेना चाहिये - जिससे नाम देशका शिरोमणि वन सके । सुधारके वण-कर देना तो अपने देशको विनाशाभिमुख नाम हैं । भी नावम धर स्थित का स्यात लोगो जब CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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( ६ ) गुणकर्म से वर्ण - व्यवस्था पर विचार [ हमारा एक निबन्ध वर्ण - व्यवस्था के विषयमें संस्कृत पत्र ' सूर्योदय ' ( आषाढ़ ११६५ से कार्तिक १६६६ तक ) ( काशी ) में निकला था । उसके एक लेखकी केवल दो - तीन पंक्तियोंकी थालोचना डा ० भगदान्-दासजीने ' आज ' पत्र ( १६ मार्गशीर्ष सं ० १६६६ के अङ्क ) में की थी; उसका प्रत्युत्तर हमने ‘ सूर्योदय ' में दिया था । उसको यहां उष्टत किया जाता है । इससे जन्मना वर्ण - व्यवस्था पर प्रकाश पड़ेगा ] ( १ ) डाक्टर महाशयका सन्दर्भ यह है - " काशीसे ' सूर्योदय ' नामकी मासिक पत्रिका संस्कृत भाषामें निकलती है । उसमें ' जन्मना वर्ण - व्यवस्था ' निबन्ध ' पं ० दीनानाथ शास्त्री सारस्वत मुलतान ' के नामसे छपा देख पड़ा । उक्त सज्जन निश्चयेन बहुत विद्वान् जान पड़ते हैं । लेखमें विविध ग्रन्थोंके वाक्योंका उद्धरण उन्होंने किया है । श्राशय भी उनका अच्छा ही होगा, पर निबन्धकी दूसरी ही पंक्ति में ' ब्राह्मणो नावमन्तव्यः सदसद् वा समाचरन् ' ( १।११०।१३ ) यह महाभारतका, और घाठवीं पंक्ति में ' मनुस्मृति ' से ' न जातु ब्राह्मणं हन्यात् सर्वपापेष्वपि स्थितम् ' ( मनु ० ८ । ३८० ) यह श्लोक उद्धृत किया है । ' मनुस्मृति ' का जैसा आदर मेरे हृदय में है, और उसके पीछे ' महाभारत ' का, वैसा स्यात् और किसी एक ग्रन्थका नहीं है । " डाक्टर महाशयका दोनों पुस्तकों पर श्रादर कथनमात्र ही है । इन लोगोंके हृदयमें ‘ महाभारत ' वा ' मनुस्मृति ' का तभी तक याद ररहता है, जब तक कि इनसे स्वीकृत सिद्धांतका उनमें भङ्ग नहीं पढ़ता | जब इनका CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्ण व्यवस्था पर विचार २२६ । वह तथाकथित सिद्धान्त मनुके वाक्योंसे खण्डित होने लगता है, तब कहां मनु तथा कहां महाभारतकार? as यह लोग उस वचनको धूर्तका वचन तथा स्वामीष्ट वचनको मनु आदिका वचन मानने लग जाते हैं । इसका उदाहरण भी देख लीजिये । ' त्रिंशद्वषों वदेद कम्यां हृद्यां द्वादशवार्षिकीम् । व्यष्टवर्षोऽष्टवर्षा वा ( २४ ) यह मनुजीका पद्य प्रसिद्ध है, सर्वत्र इसी रूपमें उद्धृत किया जाता है, परन्तु मनुके सम्मा-नकर्ता (? ) यही ढाक्टर - महाशय वहां मनुको मूर्खता जानकर ' द्वादश ( १२ ) वार्षिकीम् ' के स्थान ' द्विदश ( २० ) वार्षिकीम् ' इसी पाठको ठीक मानते हैं । ' भ्रष्ट ( ८ ) वर्षी वा ' में ' श्रष्टि ( १६ ) वर्षी वा इस पाठको ठीक मानते हैं । यह है ऐसे महाशयोंकी लीला! यदि मनुको द्वादश-वर्षा कन्याका विवाह इष्ट न होता, किन्तु ' द्विदश ( २० ) वार्षिकीम् का इष्ट होता, तो क्या मनु ' हृद्यां विंशतिवार्षिकीम् ' इस स्पष्ट पाठको नहीं लिख सकते थे; जिसमें कोई छन्दोभङ्ग वा अस्पष्टता भी नहीं थी । ' अष्टवर्षी ' के स्थान ' अष्टि ( १६ ) वर्षो वा ' यह पाठ मनुका बताते हुए डाक्टर महाशयने कभी सोचा कि -मनुजीने कभी कहीं संख्यामें एक-देशी ( छन्दोजातीय ) प्रयोग करके श्रप्रतीत दोष किया है? इससे स्पष्ट है कि इनकी कपोल - कल्पना तो इनके मतमें मनुकी हो जाती है, पर मनुकी रचना इनके मतमें धूर्तका वचन हो जाता है 1 । इस प्रकार यदि इन्हें ' महाभारत ' में श्रद्धा है, तो उसके श्रादिपर्व २८ अध्यायमें माताने भूखे गरुड़को कहा था कि - श्रमुक स्थानमें निषादोंको जाकर खा लो, पर निषादाचार ब्राह्मणोंको न खाना । तब गरुडने कहा – निषादोंके आचार वाले निषादसदृश - वेषधारी ब्राह्मणोंको मैं कैसे जानूंगा? माताने उत्तर दिया- ' यस्ते कण्ठमनुप्राप्तो निगीर्णं बडिशं यथा । दहेदङ्गारवन् पुत्र! तं विद्या ब्राह्मणर्षभम् । विप्रस्त्वया Gujarat. An eGangotri Initiative
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२३० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) न हन्तव्यः संक्रुद्धेनापि सर्वदा ' ( १।२८।११ ) अर्थात् तुम्हारे गलेमें श्राने पर जिससे तुम्हें जलन मालूम पड़े, उसे ब्राह्मण समझना । ' तस्य कण्ठमनुप्राप्तो ब्राह्मणः सह भार्यया । दहन् दीप्त इवाङ्गारस्तमुवाचान्त-रिक्षगः ( गरुड़ः ) ( २६।१ ) द्विजोत्तम! विनिर्गच्छ तूर्णमास्वादयावृतात् । नहि मे ब्राह्मणो बध्यः पापेष्वपि रतः सदा ' ( २६२ ) वैसा ही हुआ । इससे महाभारतकारको वर्ण - व्यवस्था जन्मसे इष्ट है - यह प्रत्यक्ष है । इस प्रकार पूर्वोक्त मनुपद्यमें डाक्टरजी ३० २०, २४-१६ वर्षके स्त्री - पुरुषोंका विवाह चाहते हैं; परन्तु यह नहीं विचारते कि इस अन्तरमें दोनोंके समान गुणकर्म कभी भी नहीं हो सकते । पुरुष तो पढ़े ३० वा २४ वर्ष, स्त्री उनके मतमें २० वा १६ वर्ष पढ़े; तो क्या.. दोनोंकी समान विद्या, वा समान कर्मक्षमता हो सकती है? यदि नहीं, तो दोनोंकी समान वर्णता कभी हो सकती है? समान वर्ण न होनेसे ' गुरुणानुमतः स्नात्वा समावृत्तो यथाविधि । उद्वहेत द्विजो भार्यौ सवर्णी लक्षणात्विताम् ' ( मनु ० ३।४ ) इस सवर्णाविवाहको बताने वाला मनुका यह पद्य भी निर्विषय हो जायगा यह डाक्टर महाशयने कभी सोचा है? परन्तु सभी इस मनुके पद्यको माननीय मानते हैं; तब क्या इससे यह सिद्ध नहीं हो रहा कि —– मनुको जन्मले ही वर्ण - व्यवस्था इष्ट है, गुण-कर्म से नहीं । परन्तु यह लोग कभी सूक्ष्म विचार करते ही नहीं । श्रापाततः विचारमें लगे हुए यह लोग जब अपना सिद्धान्त जहां स्पष्ट टूटता हुआ देखते हैं; वहां इन्हें प्रसमीचीनता, वा प्रक्षिप्तता, वा परि-वर्तितता सूमने लग जाती है । जहां किसी एकदेशी वा क्वाचित्क वचनमें इन्हें अपनी अनुकूलता प्रतीत होती है, वहां यह सार्वदेशिकता वां सार्वत्रिकता, वा अप्रक्षिप्तता, वा युक्तता, वा वैदिकता कहने लग जाते है - यह है इनका मनु श्रादिमें श्रद्धाका रहस्य । CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्ण - व्यवस्था पर विचार २३२ धागे वही लिखते हैं- " पर यह भी मुझे निश्चय है 1 के वर्तमान रूपमें कितने ही श्लोक प्रक्षिप्त हैं, कितने परिवर्तित मनुस्मृति मुनिः । ही प्राचीन परम उपयोगी श्लोक लुप्त कर दिये गये हैं " हैं, कितने वैरिदं प हुए डाक्टरजी कोई प्रमाण नहीं देते । जहां उनके सिद्धान्तका पर यह कहने । मुनिः ’ । खण्डन है, क्या वहीं प्रक्षिप्तता होती है? जहां उनके सिद्धान्तले स्पष्ट | निरन्तर है, वहीं परिवर्तन है क्या? जहां उनके सिद्धान्तका भेद | वेदव्यास श्रादिने नहीं किया, वे ही क्या परमोपयोगी प्रदर्शन मनु | ही बना पद्य थे? ऐसे दृष्टिकोण!. धन्य हो, पक्षपात! तुम समृद्ध हो । कार्यों से ( २ ) श्रागे कहते हैं— “ महाभारतका तो कहना ही क्या है, श्रस्सी पचासी सहस्र श्लोकोंसे एक लाख दस बारह सहस्र तक लोकोंकी योग्य लिखित और अब मुद्रित प्रतियाँ मिलती हैं " यहाँ प्रष्टव्य है कि- यह संग डाक्टरजी कितनी संख्याके महाभारतको वास्तविक मानते हैं? क्या साधार ८० सहस्र पद्य चालेको, वा एक लाख दस - बारह हजार श्लोकों वाले गान्धि महाभारतको? यदि पहली बात मानते हैं, तो उनके पास महाभारतका दिया थ अपना क्या प्रमाण है कि उसके ८० हजार पद्य हैं, और उसमें भी धनुत्सा प्रक्षिप्तता मानते हैं या नहीं? यदि दूसरी बात मानते हैं, तो उसमें उ विश्वास क्यों? यदि कहा जावे कि - ' एकं शतसहस्र ं तु मानुषेषु सुनाया प्रतिष्ठितम् ' ( १।१०७ ) श्रस्मिंस्तु मानुषे लोके वैशम्पायन उक्तवान् । डाक्टर शिष्यो ध्यासस्य धर्मात्मा सर्ववेदविदां वरः | १ | १ | १०८ ) यहां एक लेखको लाख संख्या बताई गई है, तव एक लाख से ऊपरकी १०-१२ हजार मी म बनाये संख्या प्रक्षिप्त है ' इस पर कथन यह है कि यहां पूर्वापर न सोचकर आप जैसे पुरुष भ्रममें पड़ जाते है | वहाँके 1 उसकी यहां स्पष्ट कहा है किं श्रीव्यासने महाभारत मनुष्यलोकके लिए कोई भी एक लाख श्लोकोंका कहा है । ' त्रिभिर्वर्षेः सदोत्थायी कृष्णद्वैपायनो Gujarat. An eGangotri Initiative लाना
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) २३२ - महाभारतमाख्यानं कृतवानिदमुत्तमम् ' ( ११२६ ३२ ) ' त्रिभिर्व-मनुस्मृति सुनिः । - हैं, कितने वैरिदं पूर्णे कृष्णद्वैपायनः प्रभुः । श्रखिलं भारतं चेदं चकार भगवान् यह ' ( स्वर्गारोहणपर्व १४८ ) यहां पर ' श्रीवेदव्यासने तीन वर्षों तक कहने निरन्तर मुनिः परिश्रम करके महाभारत पूर्ण किया ' यह सिद्ध होता है | तो का स्पष्ट वेदव्यास जैसा बड़ा श्रनथक विद्वान् तीन वर्षोंमें केवल २४००० श्लोक तसे भेद र्शन ही बना सके, ( जैसा कि कई कहते हैं ), एक लाख श्लोक नहीं — यह ष्टिकोण मनु श्राश्चर्य की बात है । आज कल के ही लेखक जिन्हें संसारी विविध ! कायसे श्रवकाश नहीं मिलता; वे ही तीन वर्षोंमें पर्याप्त लिख डालते हैं, तब जिसे एतदादिक कार्योंसे भिन्न कोई कार्य ही न हो, वे महान् योग्य मुनि व्यास केवल २४००० ही अनुष्टुप् श्लोक बना सकें— ' यह संगत नहीं । एक लाख अनुष्टुपके पद्य बना लेना उनके लिए - साधारण बात है । श्राज़कलके श्रीसम्प्रदाय के श्रीभगवदाचार्यजीने ? क्या गान्धिभक्त वजाजजीके प्रोत्साहनसे गान्धिमहाभारतको बनाना शुरू कर को वाले दिया था, ५०-६० हजार श्लोक बना भी चुके थे । पर फिर बजाजजीका भारतका अनुत्साह देखकर रुक गये । समें भी उसी एक लाख श्लोकोंके महाभारतको व्यासशिष्य वैशम्पायनने भी उसमें सुनाया । उसी वैशम्पायनसे सुनाये हुएंको सौतिने भी सुनाया । इसमें मानुषेषु डाक्टरी सावधानतासे विचारों कि यदि मैं आपके ही किसी संस्कृत-कवान् । लेखको उद्धृत करू ं , तो श्रादि में उसकी भूमिका तथा अन्तमें उपसंहार हां एक भी मुझे दिखलाना पड़ेगा । तब वही आपका लेख उतना भी सुमसे हजार बनाये भूमिका, उपसंहार श्रादिसे कुछ बढ़ जावेगा ॥ ऐसा होने पर भी लोकर वहांके हमारे भूमिका- उपसंहार यादिको कोई प्रक्षिप्त न मानकर उसे उसकी पूर्वापर स्फुटता के लिए साधनमात्र मानेगा । इस प्रकार फिर कोई उसी श्रापके लेखको हमारी भूमिका आदिसे युक्त उद्धृत करे; उसे लिए भी अपने लोगोंको ज्ञात करानेके लिए अपने शब्दोंसे पूर्वापर दिख-पायनो लाना पड़ेगा । इसमें कोई प्रक्षिप्तता नहीं मान लेतह d - o. Ankur Joshi Collection वर्ण - व्यवस्था पर विचार २३३ . यही बात ' महाभारत ' की है । एक लाल श्लोकोंका महाभारत. श्रीव्यासका बनाया है यह पूर्व कहा ही जा चुका है । उसके पूर्वापर की दिखलानेके लिए कभी वैशम्पायन भी अपने पद्योंसे कहता है - हे मुनियो! उस इस श्रीव्यासजीसे बनाये हुए, बहुत गुणोंसे युक्त महा-भारतको सुनो ' इत्यादि । एक लाख श्लोकोंके इस पुस्तक में प्रत्येक श्रध्यायके आदि - अन्तमें प्रसंगकी संगति वा उपक्रम - उपसंहारके प्रति-पादनार्थ एक - एक श्लोक भी कहा जावे, फिर वाचक जनमेजय धादि श्रोता किये हुए किसी प्रश्नका समाधान भी करे, इस प्रकार प्रश्नोत्तर के श्लोकोंकी वृद्धिसे उसके एक लाख श्लोकोंसे श्लोकसंख्या कई सौ
श्लोकोंकी संख्या में स्वतः ही बढ़ जावेगी । फिर तीसरा सौति फिर
उसी वैशम्पायनसे सुनाये हुए वैशम्पायनके पूर्वापर प्रसंग - निर्देशक पद्यों सहित महाभारतको मुनियाँको सुनावे, तत्र सौतिको भी कहना पड़ेगा कि इस प्रकार वैशम्पायनने जनमेजयको सुनाया । जनमेजयने तब अमुक प्रश्न किया, वैशम्पायनने उसका यह उत्तर दिया- इत्यादि । तब फिर मुनियों का सौतिसे भी कोई प्रश्न हो; तो उसे भी उसको ग्रन्थमें श्लोकबद्ध करना पड़ेगा, अपना उत्तर भी; तब इस प्रकारके महाग्रन्थमें मूल श्लोक - संख्यासे वृद्धि होना स्वाभाविक ही है, इसमें प्रक्षिप्तताका प्रश्न ही नहीं उठता । इस प्रकारके पद्योंको यदि पृथक कर दिया जावे, तो शेष मूल - संख्या ही वच जावेगी । इस प्रकार कोई कथावाचक उसी महाभारतको सुनावे, तो जितना समय उसका उसकी समाप्तिमें लग सकता है, फिर उसके व्याख्यानमें, उसकी स्पष्टतार्थ श्रन्य प्रमाण देनेमें उस नियत समयसे अधिक समय लगेगा - वह स्वाभाविक है । पर वहां कोई यह नहीं कहता कि यह सुनाता तो है महाभारत, पर बीचमें अपने प्राचिप्त वचन भी कहता जाता है । बल्कि सभी जान जाते हैं कि यह ग्रन्थकी स्पष्टतार्थ ही Gujarat. An eGangotri Initiative
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२३४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) भिन्न वचन कह रहा है, प्रक्षिप्तता नहीं कर रहा । यही बात एक लाख से अधिक लोकों वाले महाभारतकी उपलब्धिमें जाननी चाहिये । न्यून
श्लोक होने पर तो उसके पाठका कारणवश विलोप हो जाना स्पष्ट है,
जैसे ११३१ वेदकी संहिताओं में श्राजकल दस - बारहके लगभग संहिताएँ मिलती हैं । क्या डाक्टरजी तथा अन्य थाक्षेपकर्ता वादी इधर ध्यान देंगे? हम यह भी नहीं कहते कि - महाभारत श्रादिमें प्रक्षिप्तता सर्वथा नहीं है । नहीं - नहीं । उसमें प्रक्षिप्तता सम्भव है । जबकि अच्छी तरह सुरक्षित किये हुए वेदों में भी कई श्रापके सहवर्गी प्रक्षिप्तता वा पाठभेद मानते हैं, तो यहाँ ही क्या असम्भव है? पर जहाँ पर आपका अर्वा-चीन सिद्धान्त टूटता हो, वहीं प्रक्षिप्तता हो, जहां हमारे सिद्धान्तका भङ्ग जैसा प्रतीत होता हो, वहीं श्रापके अनुसार उपयोगिता हो, यह आपका मत मान्य नहीं हो सकता । इस प्रकार तो हम भी कह सकेंगे कि-जो पद्य आपने उपयोगी समझ रखे हैं, वे प्रक्षिप्त वा एकदेशी हैं, हमारे पक्ष के साधक श्लोक ग्रन्थकर्ता के हैं । ( ३ ) यदि ढाक्टरजी कहें कि - ' इस तरह तो आपका मत भी ठीक नहीं, वस्तुतः ग्रन्थकर्ताका हृदय या मुख्याभिप्राय वा पूर्वापर एक-रण, वा उत्तरपक्ष तथा उपक्रम - उपसंहार आदि ही प्रक्षिप्त वा श्रप्रक्षिप्त सिद्ध करनेमें कसौटी बन सकता है ', तब हम भी कहेंगे कि - श्राप यदि मनुके बाद महाभारतको ही आदरणीय मानते हैं, तब महाभारतकारका हृदय या मुख्य अभिप्राय, या उत्तरपक्ष जन्मसे ही वर्ण - व्यवस्थामें है, गुणकर्मसे वर्ण - व्यवस्थामें नहीं । गुणकर्मसे तो कर्ता को प्रतिष्ठाका तारतम्य ही इष्ट है, वर्ण - परिवर्तन वा वर्णोंकी व्यवस्था नहीं । श्राप लोग महाभारतके पात्र कौरव पाण्डवोंके जीवन तथा को मुख्य कथावस्तु मानते हैं, शेष भागको उपाख्यान कहते युद्ध- हैं । CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्ण - व्यवस्था पर विचार उपाख्यानोंको सम्भवतः श्राप लोग वेदव्यासकृत सीति द्वारा बनाया मानते हैं, तो आप लोग जिन अपने पक्षकी पुष्ट्यर्थ उपस्थित किया करते हैं, वे नहीं होते, किन्तु उपाख्यानों में से । तो वे आपके कैसे हो सकते हैं? मुख्य कथावस्तु तो श्रीव्यासकी २३६ नहीं मानते, कि महाभारतके श्रोत्रों तो उसका मुख्य कथावस्तु पुत्रोंको ही अनुसार श्रीन्या धध्याय ) है- यह सर्वसम्मत उसने उत्त है, उससे जन्मना वर्ण - व्यवस्था सिद्ध होती है, अतः वह श्रीवेदव्याः इससे भी सम्मत हुई, और आपसे श्रभिमत उपाख्यानों में प्रोक्त तथाकथित भान्ति मा गुरु ' दुरात्मनः कर्मणा वर्ण - व्यवस्था अवैयासिक सिद्ध हुई । तो आप श्रवैयासिक व ( १२।१० ) को तो मानें प्रमाण, और वैयासिक मुख्य कथाको देखें नहीं, यही का ब्रह्मन्! रो श्रापकी महाभारतकारमें श्रद्धा है? रहा है । कर्माणं ( क ) इसको यॉ समझिये कि— क्षत्रियकर्मको स्वीकृत किये हुए गुणका वर द्रोणाचार्य वा कृपाचार्यको महाभारत ब्राह्मण ही कहता है, क्षत्रिय नहीं यम् । वाह वे जन्म से ब्राह्मण होने से ही ब्राह्मण कहे गये हैं । श्रश्वत्थामामें बो श्रीव्यासजी ब्राह्मणोचित गुण थे और न ब्राह्मणोचित उसके कर्म थे । उसने ि ( १६/१८ ) कर्म ही स्वीकृत कर रखे थे । तभी युधिष्ठिरने उस पर आक्षेप किया द्रौणिना ' ( कि- ' ब्राह्मणेन तपः कार्ये दानमध्ययनं तथा । क्षत्रियेण धनुर्नागं इस प्रकार क भवान् ब्राह्मणत्र वः ' ( कर्णपर्व ५५ ३३ ) तुम ब्राह्मण होकर क्षत्रियो प्रत्युत धनुषको उठाया करते हो । स्वयं श्रश्वत्थामाने भी कहा था- सोल ' नहीं, किन्त जातः कुले श्रेष्ठे ब्राह्मणानां सुपूजिते! मन्दभाग्यतयाऽस्म्येतं क्षत्र और श्रापक नुष्ठितः ' ( सौप्तिकपर्व ३।२१ ) ' क्षत्रधर्मे विदित्वाहं यदि ब्राह्मखन् १६१३२ ) श्रितः | प्रकुर्यां सुमहत् कर्म न मे तत् साधु सम्मतम् ' ( २२ ) श्रीव्या भारतका उ ने भी श्रश्वत्थामाको कहा था - ब्राह्मणस्य ' सतश्चैव यस्मात् ते बृ ' कुर्यात् ' ( मीदृशम् ।..--.. श्रसंशयस्ते तद्भावि क्षत्रधर्मस्त्वयाश्रित: ' ( सोश सकते हैं? १६।१७-१८ ) । Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालीकः ( ४ ) २३६ निते, किन ( ख ) यदि अश्वत्थामाके गुणोंकी या कर्मोंकी थालोचना की जावे, के तो उसका स्वभाव ही इतना क्रूर था कि उसने सोते हुए द्रौपदीके व्यावसु पुत्रोंको ही मार दिया, अपने मामा कृपाचार्य से ( महा ० सौप्तिकपर्व ५ श्रीव्यासो अध्याय ) समझाने पर भी न रुका । पाण्डवोंको निवेश करने के लिए उसने उत्तराके गर्भ पर अस्त्र भी फेंक दिया ( सौप्तिकपर्व १२।३२ ) । सर्वसम इससे भी निर्दय कर्म अन्य क्या हो सकता है? धृष्टद्युम्नको भी पशुकी श्रीवेदणार भान्ति मारा । महाभारत सौप्तिकपर्व में अश्वत्थामा के गुणकर्म देखिये— कथित ' दुरात्मनः ' ( १२७ ), ' सतां मार्गे जातु न स्थाता ' ( १२/३ ) • दुष्टात्मा न्यासिक व ( १२/१० ), संरम्भी, दुरात्मा, चपलः ( १२।४१ ) क्रोधी, ' कृतं पापमिदं , यही ब्रह्मन्! रोषाविष्टेन चेतसा ' ( १५।१८ ) यह अश्वत्थामा अपने लिए कह रहा है । ' त्यां तु कापुरुषं पापं विदुः सर्वे मनीषिणः । असकृत् पाप-कर्माणं वालजीवितघातकम् ' ( १६।३ ) यह श्रीकृष्णजीने श्रश्वत्थामाके किये हुए गुणका वर्णन किया है । ' यस्माद् श्रनादृत्य कृतं त्वयाऽस्मान् कर्म दारु- ' क्षत्रिय नहीं यम् । ब्राह्मणस्य सतश्चैव यस्मात्ते वृत्तमीदृशम् ' ( १६ । १० ) यहाँ मातो श्रीव्यासजीने उसे दारुणकर्मा ब्राह्मण कहा है । ' क्षत्रधर्मस्त्वयाश्रितः ' सने ि ( १६।१८ ) यहाँ उसे क्षत्रियधर्मा कहा है । ' पापेन तुद्र ेणाकृतकर्मणा । चिप किया । द्रौणिना ' ( १७।२ ) यहाँ युधिष्ठिरने अश्वत्थामाकी पापिष्ठता कही है । धनुर्नाम्यं इस प्रकारके पापीको महाभारतने ( सौप्तिक ० १५/३५ ) ब्राह्मण कहा र है । प्रत्युत श्रसत्कर्मके श्राचरण वाले भी उसे राजा युधिष्ठिरने मरवाया ना - ' सोलि नहीं, किन्तु ' राष्ट्रादेनं बहिष्कुर्यात् ( ८२८० ) इस महाभारतकी सम्मत क्षत्रधर्म और आपकी श्रसम्मत मनुकी उक्तिका ही पालन किया ( सौप्तिकपर्व - ब्राह्मखन १६३२ ) क्या अब भी डाक्टरजी ' कर्मणा वर्ण - व्यवस्था ' को महा-श्रीव्यास ते भारतका उत्तरपक्ष तथा ' जन्मना वर्ण - व्यवस्था ' को तथा ' राष्ट्रादेनं वहि-( सौहिक ' कुर्यात् ' ( ८३८० ) इस मनुपद्यको प्रक्षिप्त कहने का साहस कर सकते हैं? CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. वर्ण व्यवस्था पर विचार २३७ ( ग ) अन्य भी देखिये - पाण्डव महाभारतके मुख्य पात्र हैं । उसमें युधिष्ठिरके गुणकर्म देखिये । क्या उसके ब्राह्मणोंवाले शम - दम श्रादि गुणकर्म नहीं थे? जिसके लिए उसे भीमसेनने भी कहा था-' घृणी ( दयालुः ) ब्राह्मणरूपोसि कथं चत्रेषु जायथाः ( वनपर्व ३२० ) ' ब्रह्मवर्चसी... पाण्डवनन्दनः ' ( उद्योगपर्व ५३८ ) यह धृतराष्ट्रने युधि-ठिके लिए कहा था । परन्तु भीमसेन तो बात - बात में थोड़ी - सी भी प्रतिकूलता में क्रुद हो जाता था; उसके गुणकर्म जगत्प्रसिद्ध हैं, फिर भो भिन्न - भिन्न गुणकर्म वाले भी दोनोंको महाभारतकारने क्षत्रियकी सन्तान होनेसे जन्म से ही क्षत्रिय माना है, क्या यहाँ जन्मसे वर्ण - व्यवस्था उत्तर-पक्ष नहीं? यदि गुणकर्म ही वर्ण - निर्णायक होते, तो दोनों का वर्ण भिन्न - भिन्न होना चाहिये था, पर ऐसा नहीं है । बल्कि -- ' युद्धे चा-प्यपलायनम् ' ( गीता १८ | ४३ ) इस शास्त्रसे विरुद्ध कर्णादिके युद्ध में भागते हुए भी युधिष्ठिरको क्षत्रिय ही माना गया है । देखिये उसका भागना - ' एवं पार्थोभ्युपायात् स निहतः पार्ष्णिसारथिः । श्रशक्नुवन् प्रमुखतः स्थातु ं कर्णस्य दुर्मनाः ' ( कर्णपर्व ४३ ४६-५० ) इस प्रकार भागने पर कर्णने कहा था- ' कथं नाम कुले जातः क्षत्रधर्मे व्यवस्थितः । प्रजह्यात् समरं भीतः प्राणान् रक्षन् महाहवे । न भवान् क्षत्रधर्मेषु. कुशलोस्तीति मे मतिः । ब्राह्मे वले भवान् युक्तः स्वाध्याये यज्ञकर्मणि । मा स्म युध्यस्व कौन्तेय! मा स्म वीरान् समासदः ' ( कर्णपर्व ४६ | २४-१५-१६ ) ततोऽपायाद् द्रुतं राजन्! व्रीडन्निव नरेश्वरः ' ( ४६६० ) यहाँ पर युधिष्ठिरको ब्राह्मणधर्मा कहने पर भी महाभारतने उसे ब्राह्मण नहीं माना, न उसका किसी ब्राह्मण - कन्यासे विवाह हुआ । इस तरह अश्वत्थामासे युद्ध करते हुए भी युधिष्ठिर उसके आगे से भी भाग गये । जैसे कि ' सच्छाद्यमानस्तु तदा द्रोणपुत्रेण मारिष! पार्योप-यातः शीघ्र ं वै विहाय महतीं चमूम् ' ( कर्णपर्व ५५ ३७ ) इस प्रकार अन्यत्र ( ६२/३१ ) भी । An eGangotri Initiative
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२३८ श्रीसनातनधर्मालांक: ( ४, ( घ ) भगवान् श्रीकृष्णको ही देखिये, जो महाभारतके श्राराध्यदेव हैं, वादि - प्रतिवादिमान्य भगवद्गीताके उपदेष्टा हैं । महाभारत उन्हें परमात्माका अवतार मानता है, गीता भी उन्हें उत्तम गुणकर्मवाला मानती है । क्या डाक्टरजी उनमें ब्राह्मण विरुद्ध गुणकर्म बता सकते हैं? फिर भी महाभारतने उन्हें ब्राह्मण नहीं माना, किन्तु क्षत्रियपुत्र होनेसे क्षत्रिय कहा । श्रीकृष्णके पिता वसुदेवजीको ही देख लीजिये । किसने उनके क्षत्रिय - योग्य कर्म सुने हैं, तथापि उन्हें क्षत्रिय कहा गया है । तब क्या डाक्टरजी महाभारत में सिद्धान्तितं ' जन्मना वर्ण - व्यवस्था ' को प्रक्षिप्त कह सकते हैं? जब महाभारतको यह सिद्धान्त मान्य है, तब उसके अन्तर्गत गोताको भी वही सिद्धान्त मान्य है, नहीं तो गीता रथ - चालक श्रीकृष्णको सूतजातिवाला वा गीतोपदेशकको ब्राह्मण कहती, पर ऐसा नहीं । वह तो उन्हें ' वृष्णीनां वासुदेवोस्मि ' ( १०।३७ ) वसुदेवका पुत्र और वृष्णि ( क्षत्रिय ) वंशका कहती है । ( ङ ) और देखिये- महाभारतीय धर्मव्याधमें ब्राह्मणोचित गुण तथा कर्म थे । व्याघ भी वह हिंसारहित कर्मवाला था । कौशिक नामक ब्राह्मणने तो उसे ब्राह्मणसदृश कही भी था, तथापि वह रहा शूद्र ही । ब्राह्मणत्व के लिए उसने इस शरीर की समाप्तिकी प्रतीक्षा की, दूसरे जन्ममें ही वह ब्राह्मण हुना । -( च ) इस प्रकार कर्णका वृत्त भी डाक्टरजी जानते ही हैं कि वह क्षत्रिय - कर्मा भी, वास्तवमें क्षत्रिय भी सुत- पिताकी सन्तानमात्रता की प्रसिद्धिसे सूत ही माना गया । क्या यहाँ स्पष्ट नहीं कि - महाभारतको जन्मसे ही वर्ण - व्यवस्था उत्तरपत्त इष्ट है? CC - 0. Ankur Joshi Collection ' वर्ण - व्यवस्था पर विचार २३६ २४ ( छ ) इस प्रकार आदिपर्व ( २६ अध्याय ) में निजधर्म कर्मले निपादाचार ब्राह्मणको भी ब्राह्मण माना गया । तभी उसके हीन पर निगलने । उस समय गरुड़ के गलेमें दाह दिखलाया गया है । इससे म ० जन्मंसे वर्ण - व्यवस्था ही सम्मत सिद्ध है । इससे स्पष्ट है कि- भा ० को तो भारतके ' कर्मणा वर्ण - व्यवस्थाभास ' प्रदर्शक क्वाचित्क वचन महा के प्रशंसार्थवादमात्र हैं । श्रर्थवाद में शब्दार्थ में ध्यान नहीं केवल कर्म । देना पड़ता तब किन्तु उसका तात्पर्य ही देखना पड़ता है ॥ ( १६ ( ज ) महाभारत वर्ण - व्यवस्थाको जन्मसे मानता है, और गुणकर्मसे सह तो स्तुति - निन्दा हो मानता है । जैसे कि - उसीमें लिखा है – प्रज्ञा- ' श्रेय पतिः प्रजाः सृष्ट्वा कर्म तासु विधाय च । वर्णे वर्णे समाधत्ते दुग गुणभाग्गुणम्'- ( सौप्तिकपर्व ३।१८ ) ब्राह्मणे वेदमग्र्यं तु ये ठेव सिद्ध उत्तमम् । दाक्ष्यं वैश्ये ' च, शूद्र े च सर्ववर्णानुकूलताम् ' ( ३।११ ) ' श्रदान्तो ब्राह्मणोऽसाधुनिस्तेजाः क्षत्रियोऽधमः । श्रदत्तो निन्द्यते वैश्यः, शूद्रश्च प्रतिकूलवान् ' ( ३।२० ) यहाँ पर अपने वर्णकै गुणकर्मसे वण प्रति ब्राह्मण. आदियों को निन्दित तथा साधु माना गया है । उससे उन्हें अन्य वर्णका होजाना नहीं कहा है । ब्राह्मण श्रादिको वेद श्रादि श्रग्र्य वा उत्तम बताया है, अन्य वर्ण में हो जाना नहीं कहा । श्राशा है यस डाक्टरजी महाभारत के इस हृदय पर ध्यान देंगे । उस सक ( झ ) श्रापके लेखानुसार ' अध्यात्ममयी ' महाभारतकी शिरोमणि सह भगवद्गीताका मुख्य प्रतिपाद्यका आधार भी ' जन्मना दर्ण - व्यवस्था ' हम ही है । जब जुन युद्ध से हटने लगा और भिक्षावृत्तिसे जीवन - निर्वाह सब " करने को तैयार हो गया; तब भगवान् कृष्णने उसे कहा था कि - ऐसा निय करनेसे तुम्हें पाप होगा । यदि वर्ण - व्यवस्था कर्मानुसार होती; तो गुण जुनको युद्ध से हटने से पाप क्यों होता? जब तक वह युद्ध करता; उस तब तक क्षत्रिय कहा जाता । भिक्षा श्रादि शान्तवृत्ति स्वीकार करने श्रव्य Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) २४० पर वह ब्राह्मण कहा जाता । जन्मना वर्ण - व्यवस्थामें तो कोई वृत्ति उसी जाति वाले व्यक्तिविशेष के लिए उचित हो सकती है, और उ वृत्तिका त्याग उसके लिए पाप हो सकता है । कर्मणा वर्ण - व्यवस्था में तो दूसरे वर्णके कर्म लेने पर किसीकी निन्दाकी श्रावश्यकता नहीं रहती, क्योंकि तब सबको सब कर्मोंके अनुष्ठान में स्वतन्त्रता होती है, परन्तु तब निन्दा करनेसे, तथा ' स्वे- स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धि लभते नरः ' ( १८ | ४५ ) श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ' ( १८/४७ ) सहजं कर्म कौन्तेय! सद्रोपमपि न त्यजेत् ' ( १८४८ ) ' स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ' ( ३ | ३१ ) इस प्रकार महाभारतान्तर्गत भगव-' द्गीताके द्वारा निषेध करनेसे उसमें जन्मसे ही वर्ण - व्यवस्था में तात्पर्य सिद्ध हुआ । ( ४ ) यह है ' महाभारत ' का हृदय, यदि उसीसे हमने जन्मना वर्णं - व्यवस्था सुचक पद्य उद्धृत किया है, तो उसमें इस विषय में प्रतिता कैसे हो सकती है? अथवा महाभारतको छोड़िये - स्थूल-बुद्धिसे भी यही जाना जाता है कि - गुणकर्मसे जाति वा वर्णंका निर्णय सम्भव है । किसी मनुष्य में ब्राह्मणोचित गुण हो सकते हैं, परन्तु उसके कर्म क्षत्रियके हो सकते हैं, तब उसके वर्णका कैसा निर्णय हो सकता है? क्या हम कह सकते हैं कि- श्रमुक पुरुषके गुण ब्राह्मण-सदृश हैं या क्षत्रिय सदृश हैं? वैश्य सदृश हैं वा शूद्र - सदृश हैं? यदि हम इस विषय में अपनी सम्मति देनेका साहस करें, तो क्या इसमें सबका ऐकमत्य हो सकता है? यदि नहीं, तब गुणोंके द्वारा वर्ण-निर्णय क्या बहुमत से किया जायगा? इसके अतिरिक्त एक ही मनुष्य के गुण वा कर्म समय - समय पर बदल भी सकते हैं । इस दशामें क्या उसका वर्णं पुनः पुनः बदला जायगा? इस प्रकार होने पर क्या घोर श्रव्यवस्था नहीं था पड़ेगी? CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्ण - व्यवस्था पर विचार २४१ वस्तुतः कर्मसे वर्ण - व्यवस्था असम्भव ही है । समान माता-पितासे उत्पन्न हुए - हुए भी बालकोंके गुणकर्ममें श्राकाश - पातालका श्रन्तर भी देखा गया है । एक ही मनुष्य सारा दिन कभी ब्राह्मणके सदृश, कभी शूद्रके सदृश कर्म करता है, तब उसके वर्णका निश्चय कैसे हो? ऐसा होने पर शूद्र वा नीच कौन होना चाहेगा? खान-पानकी व्यवस्था, विवाह श्रादिमें, दायभागके विभाग श्रादिमें बहुतसी रुकावटें या पड़ेंगी । फलतः कर्मणा वर्ण - व्यवस्था वर्ण - विप्लव है । इस प्रकारकी वर्ण - व्यवस्था में बड़ी बाधाएँ उपस्थित हो जायेंगी । ( ५ ) इस प्रकार जन्मसे ही वर्ण - व्यवस्था मानने वाले उसी महा-भारतमें यदि ' ब्राह्मणो नावमन्तव्यः सद् श्रसद् वा समाचरन् ' यह पद्य मिलता है; तो उसमें प्रतितता कैसी? इससे महाभारत ब्राह्मणके लिए सदाचारका निषेध वा श्रसदाचरणका प्रोत्साहन नहीं करता, श्रपितु दोनों ही श्रवस्थाओंमें उसको ब्राह्मण बताकर, कर्मणा वर्ण - व्यवस्थाके सिद्धान्तको खण्डित करके, श्रपने परम उद्देश्य जन्मना वर्ण - व्यवस्थाके सिद्धान्तको स्पष्ट करता है । तब यहां प्रक्षिप्तताका अवकाश ही कैसा? यह पद्य ग्रन्थकारके हृदयसे दिरुद्ध कैसे हो सकता है? शेष प्रश्न है कि- श्रसदाचारी भी ब्राह्मणके लिए ' नावमन्तव्यः ' ( उसका अपमान मत करो ) कैसे कहा? इस पर उत्तर यह है कि-यह अन्य कुछ नहीं; केवल जन्मसे स्वयं इष्ट वर्ण - व्यवस्थाके मूलभूत पूर्वजन्मके गुणकर्मों का यह सम्मान है । स्वयं उत्तम माने हुए जन्म-ब्राह्मणका यह अन्य वर्णकी अपेक्षा दण्डादिविधानमें तारतम्यमात्र है । वस्तुतः ही यहां असंदाचरणकी विधि नहीं है । यह डाक्टरजी समझ लें । इसका पूर्वार्ध यह स्पष्ट कर रहा है- ' दुर्बला श्रपि विप्रा हि बली-यांसः स्वतेजसा ' ( श्रादिपर्व १६०।१३ ) । केवल महाभारतमें यहीं Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोकः ४ ) २४२ नहीं, किन्तु दूसरे स्थानमें भी कहा है- ' दुर्वेदा वा सुवेदा वा प्राकृताः । ब्राह्मणा नावमन्तव्या भस्मच्छन्ना इवाग्नयः ' ( वनपर्व संस्कृतास्तथा ) यथा श्मशाने दीप्तौजाः पावको नैव दुष्यति । एवं विद्वान् २००।८८ वा ब्राह्मणो दैवतं महत् ' ( २००/८६ ) यहां भी अविद्वान् अविद्वान् गया है । इससे अधिक स्पष्ट तो इस श्लोक में कहा है— ब्राह्मण कहा ब्राह्मणो देवः पात्रं वै पावनं महत् । विद्वान् भूयस्तरो देवः ' श्रविद्वान् ' ( अनुशासनपर्व १५२ / २० ) इस प्रकारके बहुतसे श्लोक, पूर्णसागरसन्निभः
श्लोक क्या, अध्यायके अध्याय भी महाभारतनुं भरे हुए हैं जो प्राकर-णिक हैं; क्या सब जगह प्रक्षिप्तता ही है? वस्तुतः ' प्रक्षिप्तता ' कहना
अपने पकी निर्बलता बताना है । ( ६ ) अब मनुस्मृतिका श्लोक भी देखिये- ' न जातु ब्राह्मणं हन्यात् सर्वपापेष्वपि स्थितम् । राष्ट्रादेनं बहिष्कुर्यात् समग्रधनमत्ततम् ' ( ८/३८० ) इससे तथा महाभारतके पूर्व लोकसे हमने जन्मना वर्ण - व्यवस्थाका मण्डन तथा कर्मसे वर्ण - व्यवस्थाका खण्डन किया था । पर डाक्टर इसमें निरुत्तर होकर अपने पतके बचाव के लिए इन भगवानूदासजीने प्रक्षिप्ततार्थं प्रयत्न करके अपने पक्षको शिथिल सिद्ध कर दिया है लोकोंकी । हमने तो इसका ' राष्ट्रादेनं बहिष्कुर्यात् ' यह उत्तरार्ध लिखा था, पर डा ० जी ने उसे छोड़ दिया, कदाचित् इससे उन्होंने आगे अपने लेखका खण्डन देख लिया हो । डाक्टर महाशय! मनुजीने ' न ब्राह्मणो हिंसितव्यः ' ( अथर्व ० . १८२६, १/१६८ ) इत्यादिक वेदमन्त्रोंके अनुकूल ब्राह्मणकी हिंसा-निषिद्ध की थी; परन्तु उसे सर्वथा दण्डसे छोड़ा भी नहीं गया, राष्ट्रसे बाहर कर देनेका दण्ड उसे भी दिया गया है । यह अन्य वर्णोंकी अपेक्षा दण्डमें तारतम्य तो है, दढ़े पापमें पृष्ठ Ank का का सर्व on Gujarat. An eGang वर्ण - व्यवस्था पर विचार २४४ भाव नहीं है, वा पापार्थ प्रोत्साहन नहीं है । राष्ट्रसे निकाल ऐसा एक बड़ेके लिए छोटा दण्ड नहीं है । जबकि मनुस्मृति जब ब्राह्मणको प्रक्षिप्त वा वर्णों की अपेक्षा बड़ा मानती है, तब इससे स्पष्ट है कि उसके दण्डका तारतम्य भी रखना चाहिये । पर मनुजी इससे ब्राह्म ( 5) सब पापोंके करनेकी विधि नहीं बताते; बल्कि सर्व पाप उक्त सज्जन उसे ब्राह्मण कहकर और उसे अन्य वर्णोंकी अपेक्षा लघु दण्ड है किया था, जन्मसे वर्ण - व्यवस्था बताते हैं । उत म रहा है, ( ७ ) जब मनुजीने ' सर्ववर्णेषु तुल्यासु पत्नीष्वक्षतयोनिषु । अपराध में लोम्येन सम्भूता जात्या ज्ञेयास्त एव ते ' ( १०/२ ) इस पद्य में TM तवा विषय में क पद्योंमें अपना उत्तरपक्ष जन्मसे वर्ण - व्यवस्थाका स्थिर किंया है, किन्तु जो उन्हीं मनुजीका वर्ण - व्यवस्थाका साधक यह ( २ ३८० ) श्लोक ( दि कोई सह समर्थन महाभारतकारने श्रश्वत्थामा अपराधके दएडके श्रवसर । ' सहलद्व किया है ) प्रक्षिप्त कैसे हो सकता है? वा ग्रन्थकार के श्रमि से विरुद्ध कैसे हो सकता है? इसी प्रकारका मनुजीका यह श्लोक देखिये –‘एवं यद्यप्यनिष्टेषु वर्तन्ते सर्वकर्मसु 1 सर्वथा ब्राह्मणाः परिचय यह दि परमं दैवतं हि तत् ' ( ६।३१६ ) इस प्रकारके अन्य भी श्लोक हैं । इस विधि ( ख ) अन्य देखिये - मनुजी ब्राह्मणके, क्षत्रियके, वैश्यके इ व्यवस्था ' अध्ययन, तथा यज्ञकर्म तो समान कहते हैं; परन्तु उनकी वृत्तिमें के इनसें ' जन्म भेद बताते हैं । यदि कर्मसे वर्ण - व्यवस्था मनुजीका सिद्धान्त हो दिया है । तो तीनोंके समान कर्मविभागमें वे वर्ण तीन क्यों मानते हैं? सके हमसे लिख वर्ण पहले ( जन्म ) से बताते हैं; पीछे उनके लिए कर्म बताते हैं, राह है? क्यों डाक्टरजी मनुजीके अभिप्रायसे विरुद्ध पहले कर्मोंको मानते हैं, श्राश्रय लि वर्णों को मानते हैं । इससे स्पष्ट है कि - मनुजीके मत में कर्मसे स व्यवस्था नहीं; किन्तु वह जन्मसे ही है । जहां कर्मसे वर्ण - भ प्रतीत होती है; यहां पूर्वजन्मके कर्म इष्ट होते हैं — इस जन्मके हैं पुत्र हों, उ