सनातन धर्मालोक ४ — पृष्ठ 141–150
सनातन धर्मालोक ४ · पृष्ठ 141–150
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) २४४ निकाल ऐसा है, तो हमसे उद्धृत, मनुजीके उत्तरपक्षका पोषक श्लोक हायको दे प्रक्षिप्त जब वा परिवर्तित कैसे हो सकता है? उसके ( 5 ) जो कि — डा ० भ ० दा ० जी बताते हैं कि – “ जो श्लोकार्थं सज्जनने उद्धत किये हैं [ हमने मनुजीका पौना श्लोक उद्धृत उक्त किया था, आधा नहीं । इसमें डाक्टरजीका कर्म श्रसत्यका है । हमसे दण्ड उद्धृत मनुके पद्यका तीसरा पाद श्री भ ० दा ० के सारे पक्षको ही काट रहा है, क्योंकि मनुजीने ब्राह्मणके लिए कुछ दण्डविधान कहा ही है, निषु श्रपराधमें उसे दरडले सर्वथा उन्मुक्त भी नहीं किया गया । ] उनके में । विषयमें क्या लिखूं । सिर नीचा करके चुप रहना ही अच्छा होता, ता किन्तु जो प्रसंग चला है, वह इतना लिखनेको विवश करता है कि— " " कंया है, डोक ( दि कोई सहृदयका सद्वाह्मण उनको अपनी जिह्वा पर नहीं लाएगा । जो ' सदसद् वा समाचरन् ' होगा, ' सर्वपापेष्ववस्थित ' होगा, वही उचित श्रवसर दसे बचने के लिए ऐसा कहेगा । " अभिप्राय ह छोक.. यह लिखकर डा ० भ ० दा ० जीने अपनी सर्वतोमुखीन दृष्टिका हायाः पूत परिचय दिया है । हमने उक्त पद्योंको ' ब्राह्मणको पाप करना चाहिये ' कहैं । इस विधिके लिए नहीं दिया । हमने तो " इन श्लोकोंसे ' कर्मणा वर्ण-वैश्य के द व्यवस्था ' का सिद्धान्त मनुजीको तथा व्यासजीको इष्ट नहीं, किन्तु उन्हें वृत्ति में के इनसे ' जन्मना वर्ण - व्यवस्था ' ही इष्ट है " इस बातको बतानेके लिए द्धान्त हो दिया है । यह डाक्टरजीने देखकर भी क्यों नहीं देखा? किसलिए हैं? सके हमसे लिखे तीसरे पादको छिपाया? क्या यह उनका सत्य व्यवहार बातें हैं, ' है? क्यों उन्होंने प्रकरणको छोड़कर अप्राकरणिकता वा अन्य सरणिका श्रय लिया? कमसे वर्ण - ध्य तथापि डाक्टरजीको यहां यह जानना चाहिये कि एक पुरुषके चार जन्मके पुत्र हों, उन चारोंने सत्यवचनरूप अपराध किया हो, समान भी अप-CC - 0. Ankur Joshi वर्ण - व्यवस्था पर विचार २४५ राधमें ' प्रजावत्सल ' पिता यथाधिकार दण्डमें तारतम्य करता है । वह अपने बड़े लड़केको उस श्रसत्य व्यवहारके अपराधसे वैसा दण्ड नहीं देता, जैसा छोटे पुत्रको । छोटेके गाल पर वह थप्पड़ मारता है, पर बड़ेसे वैसा व्यवहार नहीं करता, किन्तु उसे इतना ही कहता है कि— ' मुझे तुमसे ऐसी श्राशा नहीं थी ' । ' दूसरेको कुछ डांटकर इतना ही कहता है - ' दुष्ट! फिर ऐसा न करना ' । तीसरेका कान मरोड़ लेता है । चौथेको असत्य व्यवहारके लिए चपेट मारता है वा छड़ीसे मारता है । इस प्रकार विद्यालयोंमें भी दण्डका तारतम्य देखा जा सकता है । इस तारतम्यको यदि कोई धर्मशास्त्रकार कहे, तो क्या डाक्टरजी यही कहेंगे कि इस पिताने बड़े पुत्रको छोटे पुत्र वाला दण्ड न देकर बड़ेको असत्य व्यवहार के लिए प्रोत्साहन दिया है! नहीं - नहीं, ऐसा नहीं । ऐसा कोई निष्पक्ष विचारक नहीं मान सकता । बीरबलने एक बार चोरीके अपराधमें पकड़े हुए चार पुरुषोंको उनका पद देखकर दण्डविधान कर दिया । उसमें पहलेको कहा कि-मुझे तुमसे तो ऐसे दुष्कर्मकी प्राशा नहीं थी । दूसरेको कठोर शब्दोंसे डांटा । तीसरेको बेत मरवाया । चौथेका मुंह काला करके उसे गधे पर चढ़ाकर नगर में घुमवाया । फिर उसने उनका परिणाम जाननेके लिए जासूसोंको छोड़ा । पता लगा कि- पहलेने तो इससे अपनी बेइज्ज़ती समझकर आत्महत्या करली । दूसरा भी इस प्रकारके काममें फिर शामिल न होनेकी प्रतिज्ञा करके उससे हट गया । तीसरा भी फिर वैसे अपराधमें पकड़ा नहीं गया, पर चौथा फिर वैसे अपराधमें पकड़ा गया । तो क्या डाक्टरजी यही कहेंगे कि- पहले- दूसरेका भी काला सुह करके उन्हें भी गधे पर चढ़ाकर घुमाना चाहिये था, नहीं, कभी " नहीं | जैसे साहित्य में ' क्वचिद् दोषस्तु समता मार्गाऽभेदस्वरूपिणी ’ समता गुण भी रचनाका दोष माना गया है, वैसे ब्राह्मण तथा शूद्धनें Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२४६ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) समान दण्ड भी दोषाधायक ही है । यह डाक्टरजीको दूरदर्शिता से सोचना चाहिये । ( ६ ) मनुस्मृतिमें ऐसा ब्राह्मण श्रादियोंमें व्यवहार - तारतम्य सर्वत्र देखा गया है । कचहरीके प्रश्नका ही तारतम्य देखिये – ' ब्रूहीति ब्राह्मणं पृच्छेत्, सत्यं ब्र ूहीति पार्थिवम् । गोबीजकाञ्चनै वैश्यं शूद सर्वैस्तु पातकैः ' ( मा ) यहां आर्यसमाजी श्रीतुलसीराम स्वामीसे किया अर्थं देखिये- ' कहो ' ऐसा ब्राह्मणसे पूछे और ' सच बोल ' ऐसा क्षत्रिय से पूछे, और ' गाय, बीज, सुवर्णके चुरानेका पातक तुमको होगा झूठ बोलोगे तो ' ऐसा कहकर वैश्योंसे पूछे, ' सब पातक तुमको लगेंगे, जो झूठ बोलोगे तो ऐसा कहकर शूद्रसे पूछे ' । देखिये- ब्राह्मण-का दूसरोंकी अपेक्षां मनुजीने प्रश्नमें भी तारतम्य बताकर कितना सम्मान रखा है? और देखिये – ' शतं ब्राह्मणमाक्रुश्य तत्रियो दण्डमर्हति । वैश्योध्यर्धशतं द्वे वा शूद्रस्तु वधमर्हति ' ( ८२६७ ) ' पञ्चाशद् ब्राह्मणो दण्ढ्य: क्षत्रियस्याभिशंसने ( श्रादेपे ) । वैश्ये स्याद् अर्धपञ्चाशत्, शुद्ध द्वादशको दमः ' ( ८२६८ ) यहाँ कुल्लूकने कहा है- ' ब्राह्मणः क्षत्रियस्य उक्तरूपाक्षेपे कृते पञ्चाशत् पणान् दण्ड्यः । वैश्ये, शूद्रं च यथोक्ताक्रोशे कृते पञ्चविंशतिर्द्वादश पणाः क्रमेण ब्राह्मणस्य दण्डः स्यात् ' । मनुजीने यहां ब्राह्मण श्रादियोंके दण्डविधानमें कैसा तारतम्य किया है? पूर्व-लोकमें ब्राह्मणको दण्ड क्षत्रिय श्रादिकी अपेक्षा न्यून मात्रामें दिया गया है । उसे दण्डसे सर्वथा छोड़ा भी नहीं गया । ( १० ) डा ० भगवानदासजी कहते हैं- ' कोई सहृदयका. सद्-ब्राह्मण उन दो लोकोंको अपनी जिह्वा पर नहीं लावेगा । जो ' सर्वपापे-ध्ववस्थित ' होगा, वही उचित दण्डसे बचनेके लिए ऐसा कहेगा ' परन्तु डा ० जो यह नहीं सोचते कि यह पद्य न तो हमने कहा है, न ही किसी अन्य ब्राह्मणने; किन्तु आपके शब्दोंमें ' प्रजावत्सल ' वेदमूलक CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्ण - व्यवस्था पर विचार २४८ २४० धिकार दडविधि बनाने वाले, प्रजापति मनुने कहा है, और सुपुर्त उसका उसे अनूदित किया है । पूर्व दृष्टान्तकी भांति इसमें भी कोई धनचित्र नहीं, जिससे प्रक्षिप्तताकी शङ्काको अवकाश मिले । ज्येष्ठ पुत्र होनेश । प्रकार ब्राह्मणको कनिष्ठ पुत्रकी तरह शारीरिक दण्ड न देकर राष्ट्रसे बहिष्का समर्थन रूप दण्ड ही मनुजीने दिया है । केवल उसीने नहीं, बल्कि - ' गोतार प्राहारा ' धर्मसूत्र ' में भी ' कहा है- ' राजा सर्वस्य ईप्टे ब्राह्मणवर्जम् ' ( १ | २ | करेषु व १११ ) | तब वहाँ प्रक्षिप्तता कैसे हो सकती है? वा उसके लिए पापा कहने क ज्ञाविधानरूपता कैसे हुई? हमने तो उक्त श्लोक मनुजीके इस हृदयूक्रे प्रकाशनार्थ उद नहीं ल किया था कि - डाक्टरज़ीसे भी आदरणीय मनुजीको ' कर्मणा वर्ग:। लिखकर व्यवस्था हृष्ट नहीं; किन्तु ' जन्मना ' हो इष्ट है, परन्तु डा ० जीने इसका कश्चित् उत्तर क्यों नहीं दिया? इसमें वे क्या अनुपपत्ति देखते हैं जिससे वे ( कर्मणा शिर नीचा करना वा चुप रहनेका संकेत करते हैं, वा प्रक्षिप्तताकी श से डा ० करते हैं । मनुने उसके लिए राष्ट्र निर्वासनका दण्ड दिया हो है, यह साथ उसके लिए छोटा दण्ड भी नहीं है । इसलिए इसमें कोई श्रनुपपनि छठे पृष्ठ चा प्रक्षिप्तता, वा मनु - भिन्न प्रणीतता भी नहीं । इसको मक्षिप्त की है ' इ प्राचीन नाटक ' मृच्छकटिक ' भी साक्षी देता है । उसमें कहा है- ' और ' जो हि पातकी विप्रो न वध्यो मनुरब्रवीत् । राष्ट्रादस्माचु निर्वास्यो बिहे ' कर्मणां रक्षतैः सह ’ ( ६।३१ ) । इसको ' न जातु ब्राह्मणं हन्यात् सर्वपापेष इस स्थितम् | राष्ट्रादेनं बहिष्कुर्यात् समग्रधनमदतम् ' ( ८३८० ) इस मधु नाम सम्म पद्यसे तुलना कीज़िये । इसी तरह का अन्य श्लोक भी मनुस्मृति मनुष्य ह देखिये — ‘ आगःसु ब्राह्मणस्यैत्र कार्यो मध्यम- साहसः । विवास्यो क्यों नही भवेद् राष्ट्रात् सद्रव्यः सपरिच्छदः ' ( ६।२४१ ) मनुस्मृति में प्रतिता भगवान्द मानने वाले श्रीतुलसीराम स्वामीने भी इसे प्रक्षिप्त नहीं माना । स्यर्थ विश उक्त मनुपद्यका प्राचीन नाटकसे स्मरण किया जानेसे, दूसरे साल दिया है । Gujarat. An eGangotri Initiative
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२४८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) और उसका अनुवाद करनेसे, इसके उदाहरणमें पापिष्ठ श्रश्वत्थामा ब्राह्मण सुरे को दैहिक - दरड न मिलनेसे उसकी प्रक्षिप्तता ही सिद्ध हुई । इस धनौजिय प्रसिद्ध राजनीतिके ग्रन्थ ' कौटलीय अर्थशास्त्र ' में भी इसका बहिष्का होने प्रकार समर्थन देखिये –'सर्वापराधेषु अदण्डनीयो ब्राह्मणः ' ( ४ | ८ | ३२ ), ‘ ब्राह्मणं पापकर्माणमुद्धृष्याङ्ककृतव्रणम् । कुर्यान्निर्विषयं राजा वासयेदा-' गोवार करेपु वा ' ( ४ | ८ | ३८ | अब क्या डाक्टरजीकी उक्त मेनुपद्यको प्रक्षिप्त ( AIL, की शक्ति है? लिए पापा- कहने ( ११ ) ' प्रत्युत कोई सहृदयका सद्ब्राह्मण उनको अपनी जिह्वापर उद नहीं लायेगा ' यह वाक्य उसी ' श्राज ' पत्रके ५ म पृष्ठ, २ य स्तम्भ में या वर्ण- लिखकर तथा अपने ' मानवधर्मसार ' के ४६ पृष्ठमें ' नहि सद्द्ब्राह्मणः बीने इस कश्चित्... ··· वक्तुमेवमिहार्हति ' लिखकर श्रीभगवानदासजीने अपना जिससे वे ( कर्मणा ' वर्ण - व्यवस्था ) सिद्धान्त भी काट दिया है । ' सद्ब्राह्मण ' शब्द बाकी शा से डा ० जीने ' असद्ब्राह्मण ' को भी मान लिया है; नहीं तो ' ब्राहाण ' के हो है, साथ ' सद् ' शब्दके देनेकी आवश्यकता नहीं थीं । इसीलिए उसो पत्रके श्रनुपपनि छठे पृष्ठके १ म स्तम्भमें डा ० जीने ' असब्राह्मण ' की घोर निन्दा भी प्रक्षिप्तगां । की है ' इस अपने वाक्य में ' श्रसद्वाह्मण ' शब्द स्पष्ट कह दिया है । -है- ' जं और ' जो ' सर्वपापेष्ववस्थित ' होगा ' इस अपने वाक्यमें डा ० जीने यो विभ ' कर्मणा वर्ण - व्यवस्था ' को चकनाचूर कर डाला है । सर्वपापेषी इसको यों समझिये - ' आज ' में प्रकाशित डा ० जीके लेख में लेखकका इस मनु नाम सम्पादकने लिला है -- ' श्रद्धेय भगवान्दास ' | यह भगवान्दासजी मनुस्मृति मनुष्य हैं, पर उक्त नामके साथ सम्पादक वा लेखकने ' मनुष्य ' विशेषण विवास्यो क्यों नहीं दिया? वहाँ यही उत्तर होगा कि इस लेखके लेखक डाक्टर = प्रतिमा भगवानूदास कभी ' श्रमनुष्य ' नहीं हो सकते । तथ क्यों ' मनुष्य ' यह नाम्यर्थं विशेषण दिया जाय? ' श्रद्धेय ' विशेषण तो सम्पादकने इसलिए सरे स्थान दिया है कि अन्य अग्रवाल वैश्यगणकी अपेक्षा डा ० जो श्रधिक सद्-वर्ण - व्यवस्था पर विचार २५६ गुणकर्म वाले हैं, अथवा अधिक संस्कृत विद्वान् हैं । सत्र वैश्य तो ऐसे नहीं । इस कारण अन्य वैश्योंके नामके साथ ' श्रद्धेय ' विशेषण न लगाकर सम्पादकने इन्होंके नामके साथ उक्त विशेषण दिया । इसीसे यह न्याय प्रसिद्ध है — ' सम्भव - व्यभिचाराभ्यां स्याद् विशेषणमर्थवत् ' श्रर्थात् विशेषण तब सार्थक हुया करता है, जब अपने विशेष्य में हो भी सके, और वैसे धन्य विशेष्यमें व्यभिचरित भी हो ( न हो सके ), परन्तु ' मनुष्य ' यह विशेषण सब विशेष्यभूत लेखकोंमें सम्भव होता हुआ भी किसीमें व्यभिचारको प्राप्त नहीं हो सकता, तब ' अव्यभिचारमें विशेषण नहीं हुआ करता ' यह सोचकर ' मनुष्य ' यह विशेषण मनुष्यों के नामके साथ नहीं दिया जाता । अब प्रकरण पर ग्राइये - कर्मणा वर्ण - व्यवस्थाके श्राग्रही डा ० जी सत्कर्मोसे हो ब्राह्मणत्व मानते हैं, श्रसद् गुणकर्मोंसे नहीं । इस प्रकार यदि ब्राह्मणत्वका सद्गुणकर्मों से सर्वथा श्रव्यभिचार है, तो ब्राह्मणके साथ ' मनुष्य ' विशेषणको व्यर्थताकी तरह ' सद् ' यह विशेषण भी अव्यभिचार होनेसे व्यर्थ है । इस कारण ' कर्मणा वर्णः ' मानने वालोंको तो ' ब्राह्मण ' शब्दके साथ ' सद् ' यह विशेषण भी व्यर्थ होनेसे प्रयुक्त नहीं करना चाहिये । परन्तु इस पक्षके डा ० जी ' सद्वाह्मण ' शब्द लिखकर दो ब्राह्मण सिद्ध कर रहे हैं कि ' सद्ब्राह्मण ' तो ' सर्वपापे-ध्ववस्थित ' न होना चाहेगा, परन्तु ' असद्ब्राह्मण ' तो ' सर्वपापेष्ववस्थित ' होना चाहेगा । यदि ऐसा है; तो ' सर्वपापेष्ववस्थित ' ब्राह्मणको भी डा ० जीने ' आज ' पत्रमें स्वयं ही कहे हुए ' असद्ब्राह्मण ' शब्द से CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२५० श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) ' ब्राह्मण ' मान लिया, तब ' कर्मणा वर्ण - व्यवस्था ' उनके सिद्धान्तका G सर्वथा खण्डन हो गया । भेद केवल यही रहा कि - डा ० जो असद् ब्राह्मणको भी शूद्र जैसा दण्ड दिलाया चाहते हैं, परन्तु ब्राह्मणको ज्येष्ठपुत्र मानने वाले मनुजी ' विश! एष वोऽमी! राजा सोमोस्माकं ब्राह्मणाना राजा ' ( यजुः वा ० सं ० १ ४० ) इस मन्त्रसे ब्राह्मण पर " राजशासनको वेद - विरुद्ध मानते हुए राजा द्वारा ब्राह्मणको शूङ्गादिकी तरह मारना पीटना दण्ड न दिलवाकर लोकव्यवस्थार्थ अपने शासन से बाहर कर देना ही दण्ड चाहते हैं । डा ० जी तो शायद उस ब्राह्मणको श्रब्राह्मणके तुल्य दण्ड इसलिए दिलाना चाहते हैं कि वे स्वयं ब्राह्मण, न हों, वा ब्राह्मणवत्सल न हों, वा ब्राह्मणको बड़ा मानने वाले न हों, या यथाधिकार दण्डका तारतम्य मानने वाले न हों, सभीको एक लाठी-से हांकना चाहते हों, पर मनु ब्रह्माके पुत्र होनेसे ब्राह्मणवत्सल थे, ब्राह्मणको ही वेदानुसार बड़े मानने वाले थे और यथाधिकार दण्डके तारतम्य मानने वाले थे, इस कारण उन्होंने अपनी स्मृतिमें ब्राह्मणादिके दण्डमें तारतम्य भी रखना ही था । श्रव डा ० जी ही कहें कि आपके लेख में लिखा ' असद् श्राह्मण ' शब्द प्रक्षिप्त है, या आपका अपना है? यदि ' प्रक्षिप्त ' है, तो इसमें क्या प्रमाण है, क्योंकि उस उल्लेखमें प्रकरणका व्याकोप वा कोई भी संगति नहीं दीखती । यदि ' असद्वाह्मण ' शब्द डा ० जी ने ही लिखा है, ' प्रक्षिप्त ' नहीं, तो उसी शब्दसे ही ' कर्मणा वर्ण: ' यह वर्ण - व्यवस्था पर विचार २५१ २५ रज़ीका सिद्धान्त * खण्डित हो गया, क्योंकि उनके हाँ । ' घुसतः कभी ब्राह्मण नहीं बन सकता । इस प्रकार उनका मत से प्रति ' सद् ब्राह्मण ' शब्द उनके मतसे विरुद्ध होने पर भी यदि उनके लिखा लेख ' उक्त में प्रक्षिप्त नहीं, तब ' पापयुक्त भी ब्राह्मण ( श्रसद् ब्राह्मण ) को भी ब्राह्मण दिख कहने वाला वैसा मानने वाले श्रीमनु और श्रीव्यासका वचन भी उनके अपन मतसे विरुद्ध होने पर भी प्रक्षिप्त नहीं । इसमें विश्वास भी करना सिद्ध पढ़ता है, नहीं तो मनुस्मृतिके ढा - जी से लिखे श्लोक ही शायद पक्षक मनुके न हों, किन्तु किसी ब्राह्मणद्वेषीने ही प्रक्षिप्त कर दिये * इसी प्रकार डा ० भ ० दा ० जीने स ० १६७७ में पौष माघी भी ' आज ' की कई संख्याओं में यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया था कि - ' काशी हिंदुविश्वविद्यालयके ' धर्मं - विज्ञान ' विभागका यह निश्चय कि — ' धर्म- अस शिक्षक के पद पर ब्राह्मणेतर व्यक्तिकी नियुक्ति नहीं होगी - यह श्रनुचित न्ताभ है; क्योंकि — वर्ण - व्यवस्था केवल कर्म से ही शास्त्र सम्मत है ' । इस उनके ' कम वाक्य से भी ' जन्मना वर्ण - व्यवस्था ' ही सिद्ध होती है । यदि वे ' कर्मणा न्ताभ वर्ण: ' मानते हैं, और जब वे विद्वत्तासे ही ब्राह्मण मानते हैं, तो ' ब्राह्मण भाव हिंदु विश्वविद्यालय धर्मविज्ञान विभागके अध्यापक न होवें ' इस विश्व श्रत्यन विद्यालय की घोषणाका विरोध क्यों करते हैं? जब करते हैं, इससे वे जबकि विद्वान् श्री जन्मके ब्राह्मण को ब्राह्मण सिद्धान्तित करते हैं, नहीं तो ' ब्राह्मणे- तथा तर जातिवाले भी ' हिंदुविश्वविद्यालय के अध्यापक हो सकते है ' इस श्री. संस्क भगवानदासजी के अभिप्रेत वाक्यका अन्य क्या अर्थ है? क्योंकि — अविद्वान् तो वहां स्वतः ही पढ़ा नहीं सकेंगे, तब स्वयं ही अविद्वान के अब्राह्मण होने नहीं से उनके मतमे उसका निषेध प्रतिफलित हो जाता है । तब उन्होंने अब्राह्मण भर्क्सव को भी धर्मशिक्षक के पद रखनेका आन्दोलन क्यों चलाया? इससे उनके होंगे, सिद्धान्तमें भी जन्मसे वर्ण - व्यवस्था सिद्ध हो गईं । यह उनका अपनेसे ही द्विजे ' स्वयं खण्डन हो गया! नावेद CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२५२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) हो । डा ० जीके पास उनकी प्रक्षिप्तताका क्या प्रमाण है? तब प्रक्षिप्तताके व्याजको हटाकर डाक्टरजी तथा तत्सदृश श्रन्य वादियोंको ' उक्त पद्यसे जन्मसे वर्ण - व्यवस्था नहीं निकल सकती ' यही सिद्ध कर दिखाना चाहिये । यदि डा ० जी ऐसा न करके प्रक्षिप्तताके बहानेसे अपने सिद्धान्तकी सरणिके कांटे इस श्लोकको हटाना चाहें, तो उनके सिद्धान्तकी सरणिका कण्टकाकीर्ण होना छिप न सकेगा, इससे उनके पक्षकी शिथिलता स्वयं ही सिद्ध हो जायगी । ( १२ ) फलतः ' कर्मणा वर्णः ' के सिद्धान्त में ' असद् ब्राह्मण ' शब्दका भी श्रत्यन्ताभाव होना चाहिये, ' सद् ब्राह्मण ' शब्दका भी । ' कर्मणा वर्णः ' सिद्धान्तमें ब्राह्मणके ' श्रसद् ' इस विशेषणका श्रत्यन्ताभाव असम्भव होनेसे होगा, और ' सद् ' इस ' ब्राह्मण ' के विशेषणका श्रव्य-न्ताभाव ' कर्मणा वर्णः ' सिद्धान्त में व्यर्थताके कारण होगा । इस प्रकार ' कर्मणा वर्णः ' सिद्धान्तमें ' श्रसत् - शूद्र ' और ' सत् - शूद्र ' का भी अत्य-न्ताभाव होना चाहिये । उक्त सिद्धान्त में ' सत् - शूद्र ' शब्दका श्रत्यन्ता-भाव सर्वथा व्यभिचारके कारण होगा, और ' असत् शूद्र ' शब्दका श्रत्यन्ताभाव सर्वथा श्रव्यभिचारमूलक व्यर्थता के कारण होगा । परन्तु जबकि ' ग्रसद् - ब्राहाण ' और ' सद् ब्राह्मण ' शब्दकी, तथा ' असत् - शूद्र ' तथा ' सत् - शूद्ध ' शब्दकी सत्ता डाक्टरजीके लेख में है, जैसे कि - ' भारतीय संस्कृति सम्मेलन देहलीके चतुर्थाधिवेशनके उनके भाषणके १५-१६ पृष्टमें उन्होंने लिखा है — ' सब ब्राह्मणों, सब क्षत्रियोंकी प्रशंसा प्राचीनों नहीं की है, प्रत्युत कुत्सितों [ ब्राह्मण - क्षत्रियों की घोर जुगुप्सा और भर्त्सना की है । यह दिखानेके लिए मनुके कुछ श्लोक यहां पर्याप्त होंगे, श्रन्थ बहुतसे मनु, महाभारत ग्रादिमें भरे हैं –'वैडालव्रतिके द्विजे ’ ( ४।१६१ ) ‘ हैतुकान् वकवृत्तींश्च ' ( ४।३० ) ' न वक्रघतिके विप्रे, नावेदविदि धर्मवित् ' ( ४।१६२ )... सद् - ब्राह्मण, सत् - क्षत्रियोंने भारतको CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्ण - व्यवस्था पर विचार २५३ बहुत ऊंचे उठाया, असद् ब्राह्मण और असत् - क्षत्रियोंने उतना ही नीचे गिराया ' यहां ढा ० जीने ' कुब्राह्मण कुक्षत्रियकी कुत्सा ' इस शीर्षक लिखा है । जबकि शास्त्रमें भी ऐसा लिखा है, जैसे कि - ' धर्मनिष्ठान् श्रुतवतो देव - ब्रह्म - समाहितान् । अर्चयित्वा भजेयास्त्वं गृहे गुणवतो ' द्विजान् ' ' ( महाभारत शान्तिपर्व ७११३ ) ( दुर्वाहारणं शिरःकम्पेन न सोपा-यनमपि ' ( वार्हस्पत्य अर्थशास्त्र ७० ) ' कुब्राह्मणः, सुब्राह्मणः, कुवृषलः, सुवृपलः, दुर्ब्राह्मणः, दुवॄ'पल: ' ( महाभाष्ये २।२।१८ ) यहां सुब्राह्मण, ' कु.ब्राह्मण शब्द श्राये हैं, तब इन शब्दोंकी सत्तासे ' कर्मणा वर्ण - व्यवस्था ' सिद्धान्तका ही खण्डन हो गया । केवल सुकर्मसे उन टन वर्णोंकी प्रतिष्ठा, तथा कुकर्मसे उन उन वर्णोंकी अप्रतिष्ठा ही सिद्ध हुई, वर्ण-परिवर्तन नहीं । इस जन्मके कर्म अपने - अपने कर्णमें उत्तम, मध्यम, श्रधम करने वाले होते हैं, उन - उन वर्णोंके उत्पादक नहीं । हां, इस जन्मके कर्म श्रग्रिम जन्ममें तदनुकूल वर्णको कर दिया करते हैं । . यदि सुकर्म तथा कुकर्मसे वर्ण - व्यवस्था हो तो क्षत्रिय - वैश्य वर्णकी पृथक् श्रावश्यकता ही नहीं रहती । तब केवल ब्राह्मण और शृद्ध ही हो सकते हैं । इन्हीं ब्राह्मण और शूद्रोंमें जो युद्धादि कार्य सम्भाल लें वही क्षत्रिय, जो धनादि कार्य करें, वे इन्हीं में वैश्य हो जाएंगे । तब क्षत्रिय और वैश्यके साथ सुकर्म तथा कुकर्मका सम्बन्ध ही अनुपपन्न हो जायगा, परन्तु शास्त्रोंमें जब चार वर्ण कहे गये हैं, तब जन्मसे ही इनका भेद है, कर्मसे नहीं । कर्मसे प्रतिष्ठामें तारतम्य होता है, वर्ण में परिवर्तन नहीं । क्या डा ० भगवानूदासजी तथा अन्य वादी यहां ध्यान देंगे? ' इससे " सज्जन विद्वान् विचार करें कि ऐसे श्लोकों पर आग्रह करनेसे श्रहङ्कार - तिरस्कार और परस्पर वैमनस्य बढ़ता है, अथवा सौमनस्य, और परस्पर वैमनस्य बढ़ता है, अथवां सौमनस्य और Gujarat. An eGangotri Initiative
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२५४ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) शान्ति, तुष्टि पुष्टि प्रीति ' डा ० जीका यह वाक्यं प्रत्युक्त हो गया । " मैं तो ऐसे श्लोकोंको प्रक्षिप्त ही मानता हूं ” ऐसा क्यों न कहें, क्योंकि — इससे आपका पक्ष बढता है । पर एक व्यक्ति वा पक्षपाती वादिसमाजके कथनमात्रसे इन प्रमाणोंकी प्रक्षिप्तता कैसे हो जावेगी? ( १३ ) " क्योंकि इनके विरोधी श्लोक विस्पष्ट और न्यायोचित ' मनु - महाभारत ' में मिलते हैं ' डा ० जीके सामने हमने महाभारत तथा मनुका उत्तरपक्ष तथा हृदय दिखला ही दिया है । इससे जन्मना वर्ण - व्यवस्थाके प्रतिपादक वचन तो इन दोनोंका सिद्धान्त - पक्ष ही हैं । कर्मणा वर्ण - व्यवस्था तो उन दोनोंने कहीं दिखलाई ही नहीं । जहां-कहीं उसका आभास दीखे, वहां कर्मका प्रशंसार्थवाद तथा कर्म न करने वालेका निन्दार्थवाद ही होता है, ऐसा जान लेने पर विरोध. स्वयं हट जाता है । जैसे ' मानवधर्मसार ' ( पृ ० ४६ ) में डा ० जीसे दिया गया हुआ — ' योनधीत्य द्विजो वेदमन्यन्न कुरुते श्रमम् । स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः ' ( २।१६८ ) यह मनुपद्य ही देख लीजिये यह स्पष्ट अर्थवाद है । नहीं तो पढ़ता वेद नहीं है एक पुरुष, पर उसका निरपराध भी, वेदपाठी भी सारा वंश ( पुत्र, पौत्रादि ) उससे शुद्ध कैसे हो सकता है? ऐसा होने पर तो बिना अपराध शूद्रत्व होने पर ' श्रकृताभ्यागम ' वेद पढ़ने पर भी शूद्रत्व होनेसे ' कृतहान ' दोष उपस्थित होता है । तब स्पष्ट है कि यह ' साहित्य सङ्गीतकला-विहीनः साक्षात् पशुः पुच्छविषांणहीनः ' ( भर्तृहरिः ) ' विद्याविहीनः पशुः ' ( भर्तृ'० ) आदि की तरह निन्दार्थवादात्मक गुणवाद है । जैसेकि - इस पर श्रीमेधातिथिने लिखा है- ' शूद्रत्वप्राप्तिवचनं निन्दातिशयः ' । इसलिए इससे उस ब्राह्मणका शूद्र हो जाना इष्ट नहीं, जैसे कि ---' शूद्रत्वाप्तिस्तु तत्रापि ' यह ' मानवधर्मसार में उक्त पद्यके धागे डा ० जीने लिखा है, किन्तु यहां ' शूद्रत्वं ' का अर्थ ' शुद्धसदृशता ' ' ही CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्ण - व्यवस्था पर विचार ७५५ २५६ है ॥ केवल हम ही नहीं कहते, वसिष्ठजी भी अपने धर्मसूत्रमें यही कहते हैं । जैसेकि - ' अश्रोत्रियाः [ अवेदपाठिनः ]... शूद्रसधर्माणे ईसा राष्ट्रह पद्य उक्त भवन्ति ( ३।१ ) मानवं चात्र श्लोकमुदाहरन्ति ( ३।१ ) ' योनधीत्य हिं वेदानध्य वेदं... सजीवन्नेव शूद्रत्वं ' ( वसिष्ठधर्मसूत्र ३।३ ) । प्तिस्तु कथम् ' ( बल्कि — ‘ जीवन्नेव शूद्रत्वं ' में ' जीवन् एव ' इस ' एव ' शब्दसे क्योंकि-देना ही सिद्ध कर रहा है कि - वर्ण - परिवर्तन मरणोत्तर होता है है,, ज जी नहीं ।, इसी अर्थकी सिद्धिके डरसे इस जीवनमें वर्ण: परिवर्तन हे होना ' द्विज, मानने वाले स्वा ० दयानन्दजीने स ० प्र ० में इस श्लोक के अर्थ करने न करावे समय ‘ जीवन्नेव ' पदका अर्थ ही छिपा लिया, नहीं लिखा । पर बैद तथा स विद्याको छोड़ देना ऐसा भारी पाप है कि वह जीते जी शूद्ध जैसा · हो जाता है । इसे सभी स्पष्ट ही अर्थवाद मानेंगे, यदि यह श्रवार जीके मनुका दि न होता, तो ‘ जीवन्नेव ' में ‘ एव ' शब्द न होता, प्रत्युत ' एव ' ' अनियने प्रयच्छेत् नियमः ' दोषयुक्त होता । यह इस प्रकारका अर्थवाद है, जैसेकि - निषेध सं ' वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो यत्र तत्राश्रमे वसन् । इहैव लोके तिष्ठन्स ब्रह्मभूवाव गया । कल्पते ' ( मनु ० १२।१०२ ) इस लोक में ब्रह्मभाव ( मुक्ति ) नहीं होता है, यहां किन्तु परलोकमें । यह इसी में स्थित ' एच ' शब्द से सिद्ध होता है । पर य यह वेद पढ़नेका प्रशंसार्थवाद है, पूर्व पद्य वेद न पढ़नेका निन्दार्थवाद ही देखा है । नहीं तो डा ० जीके अपने हीं लड़के वेदविद्या राहित्यसे शूद्र हो उनके जायेंगे | क्या डा ० जी तथा वे यह स्वीकार कर लेंगे? इसी प्रकार विना का डा ० जीसे दिया हुआ ' न तिष्ठति तु यः पूर्वी नोपास्ते यश्च पश्चिमाम् होता है । स शूद्रवद् वहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मण: ' ( मनु ० २।१०३ ) यह ( 9 %
श्लोक भी समाहित हो गया । इसमें ' शूद्रवत् ' है, ' वति ' प्रत्यय कहे; तो
तुल्यतामें होता है, वही हो जाने में नहीं । यदि डा ० जी कहें, कि । सकता ह
‘ तत्रापि दण्डो हि मनुना धृतः ' ( मानव ० ध ० सा ० पृ ० ४६ ); सो मनुदं स्वयं बा सर्वपापेष्वपि स्थितम् । राष्ट्रादेनं बहिष्कुर्यात् ' ( १८० ) यहां भी तो । चाहता ह Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) २५६ में दण्ड दिया है; तब इन दो पद्योंके दृष्टान्तसे डा ० जी इसका राष्ट्रहिष्कारका पद्यको प्रक्षिप्त कैसे कह सकते हैं? तब इससे ' नैतद् घोरतमं पापं सधर्माण उक्त यदि वेदानध्ययनं तु यत् । सर्वपापसमं नापि सन्ध्योपासनचर्जनम् । शूद्रत्वा-प्तिस्तु तत्रापि दण्डो हि मनुना धृतः । ब्राह्मण्यमवशिष्येत सर्वपापस्थितौ कथम् ' ( पृ ० ४६ ) डा ० जीके इस कथनका भी खण्डन हो गया । दसेल क्योंकि- मनुके उक्त पद्योंमें शूद्रसदृशता तो बताई गई है, पर शुद्धवर्ण है होना, ब्राह्मण वर्ण हटना नहीं बताया । ' द्विजकर्मणो बहिष्कार्यः ' कहा परिवर्तन है ' द्विजत्वाद् बहिष्कार्यः ' नहीं कहा । सो ऐसा ब्राह्मण यज्ञादि दूसरेको करनेक न करावे - यह श्राशय है । तब स्पष्ट सन्ध्या न करनेका निन्दार्थवाद पर वेद- तथा सन्ध्या करनेका प्रशंसार्थवाद होनेसे पूर्व पद्य ( सर्वपापेष्ववस्थितम् ):. यह जैसा मनुका अनभीष्ट सिद्ध न हुआ । इसी प्रकार ' मानवधर्मसार ' में डा ० दिये हुए ' ये वक्त्रतिनो विप्रा ये च मार्जारलिङ्गिनः । न वार्यपि ' ' अनियमे प्रयच्छेत् वान् ' इस मनुपद्यसे वक मार्जारवती चित्रको पानी देनेका जैसेकि - निषेध तो किया गया है, पर उसका विप्रत्व ( ब्राह्मणत्व ) नहीं छीना ब्रह्मभूवाव गया । इससे जहां डा ० जीका ' कर्मणा वर्ण: ' सिद्धान्त खण्डित होता हीं होन है, वहां उसे दिखलाया हुआ मनुपद्योंका परस्पर विरोध भी हट जाता होता है । है, पर बाबू भगवानदास श्रादि बादी एतदादि वचनोंको एक खसे नन्दार्थवाद ही देखा करते हैं, उन पर सर्वतोमुखी दृष्टि नहीं डालते । इस कारण शूद्र हो उनके दृष्टिकोण में अपने सिद्धान्तकी रक्षार्थ प्रक्षिप्तताघोषण।के बहानेके सी प्रकार बिना काम नहीं चलता, और उन्हें पुस्तकोंमें विरोध भी मालूम श्चिमाम् । होता है । ०३ ) यह ( १४ ) यदि कोई जन्मका ब्राह्मण एतदादिक श्लोकोंको प्रक्षिप्त ते ' प्रत्यव कहे; तो वह क्षम्य हो सकता है, उसके कथनका कुछ गौरव भी हो हें, कि सकता है, परन्तु यदि कोई क्षत्रिय वैश्य आदि जैसा कद्दे, तो लोग = सो म स्वयं जान जाते हैं कि यह कुछ विद्या पाकर स्वयं ब्राह्मण बनना हां भी हो । चाहता है, वा ब्राह्मणके समान मान पाना चाहता है, अथवा उनकी " ' CC - 0. Ankur Joshi वर्ण व्यवस्था - पर विचार २४७ प्रक्षिप्तताकी घोषणा करने वाला ब्राह्मण भी एक ऐसी संस्थाका होता है, और उससे जीवन प्राप्त कर रहा होता है वा उस संस्थाका कई कारणोंसे पक्षपाती होता है, जो संस्था गुणकर्मोंसे वर्ण अपनी इच्छानुसार मानती हो । इस कारण स्वार्थवश होनेसे उसकी प्रक्षिप्ततोद्घोषणाका कुछ भी मूल्य नहीं माना जाता । परन्तु अत्राह्मणोंको यह जानना चाहिये कि -१ -क्षत्रिय, वैश्यको भी ब्राह्मण- इतनी विद्या अपेक्षित होती है, यज्ञ तथा दान तो उन्हें ब्राह्मण से भी अधिक करने पड़ते हैं । बल्कि उपनिषद् ब्रह्मविद्याभिज्ञ क्षत्रिय तो ब्राह्मणोंसे भी अधिक विद्वान थे, दे ब्राह्मणको ब्रह्मविद्या पढ़ाते थे, इस प्रकार होने पर भी उन्हें न तो उपनिषद्ने ब्राह्मण बनाया, न कोई धर्मशास्त्र ब्राह्मण बनाता है, न ही ब्राह्मणसदृश मांनको वह पा सकनेका अधिकारी है । तभी तो समर्थ भी क्षत्रिय - वैश्यका प्रतिग्रह तथा श्राचार्यरूपसं अध्यापन तथा यज्ञ कराना धर्मशास्त्र निषिद्ध है । इसी कारण डा ० जीके भी मान्य मनुजीने कहा है - ' यो धर्मा निवर्तन्ते ब्राह्मणात् क्षत्रियं प्रति । श्रध्यापनं याजनं च तृतीयश्च प्रतिग्रहः ' ( १०।७७ ) वैश्यं प्रति तथैवैते निवर्तेरन्निति स्थितिः । न तौ प्रतिि तान् धर्मान् मनुराह प्रजापतिः ' १०७८ ) इससे भी अधिक मनुके हृदयकी स्पष्टता कैसी हो, जिसमें स्पष्ट्र ही जन्मसे वर्ण - व्यवस्था सूचित हो रही है । क्या डा ० जी सब स्थान प्रांतप्तता ही मानेंगे? उन्हें जानना चाहिये कि- ' प्राप्तौ सत्यां हि निषेवो भवति ' प्राप्ति होने पर ही निषेध होता है । प्राप्ति यही है कि - क्षत्रिय - वैश्यमें भी विद्यावश श्रध्यापनयाजन श्रादि की शक्ति है । इस प्रकार सामर्थ्य में भी उन्हें ब्राह्मण न कहकर उन्हें क्षत्रिय - वैश्य ही कहकर, उन्हें ब्राह्मणकर्म सर्वथा ही निषिद्ध करके मनुजी ने अपना हृदय स्पष्ट ही जन्मको वर्ण - व्यवस्थाका बता दिया । तब उनका ' सर्वपापेष्वपि स्थितम् ' वचन कैसे प्रक्षिप्त हो सकता है? क्षत्रिय Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२५८ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) आदिका अध्यापन आपत्तिकालमें ही मनुने सह्य माना है- ' श्रब्राह्मणाद् अध्ययनमापत्काले विधीयते ' ( २।२४१ ) । तभी उपनिषदोंके क्षत्रियान ब्राह्मणोंको ब्रह्मविद्या पढ़ानेके समय उनका उपनयन नहीं किया, जो कि श्राचार्यको अपेक्षित होता है; इससे उपनिषदात्मक वेदोंने भी अपना हृदय खोलकर रख दिया कि - वर्ण - व्यवस्था जन्मसे होती है, गुणकर्मसे नहीं । इस प्रकार उन्हीं मनुजीने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यको ही जन्मले द्विजत्वमें अधिकार दिया, जन्मसे ही, जन्मसे ही क्या, बल्कि गर्मसे ही ब्राह्मणका वें, क्षत्रियका ११ वें, वैश्यका १२ वे वर्षसे आचार्य-करण ( उपनयन । कहकर उनके विद्याकालमें भी कमी कर दी, जब क्षत्रिय, वैश्य, ब्राह्मणसे ३-४ वर्ष विद्या कम पढ़ेंगे; तत्र वे ब्राह्मण " बन सकेंगे? उन्हीं शास्त्रकारांने शूद्धको जन्मसे ही द्विजत्वमें अनधिकारी बता दिया, उसको सदाके लिये ' एकज ' रख दिया । आचार्यकरणसे उसे पृथक् रखकर उसे वेदविद्यासे भी पृथक् कर दिया । शूद्र तो वर्ण भी था, पर अन्य तो श्रवर्ण ही माने गये, और अपपात्र कर दिये गये । तब वे ब्राह्मण कैसे हो सकते हैं? क्या इससे भी अधिक स्पष्ट प्रमाण मनुजीका जन्मसे वर्ण - व्यवस्था - पक्षपाती होनेमें अपेक्षित हो सकता है? यदि यही पर्याप्त हैं, तो उसके ' जन्मना वर्ण व्यवस्थापक '
श्लोकको प्रक्षिप्त कैसे कहा जा सकता है? इससे स्पष्ट है कि - डा ०
जी का मनुमें चादर वाणी- विलासमात्र है, श्रादर इनका स्वार्थपूर्ण अपने मतमें ही होता है । अपने मतसे विरुद्ध मनुका पद्य इनके मत में प्रक्षिप्त हो जाता है, और यह लोग प्रक्षिप्तताके व्याजके बिना अपने मता निर्वाह नहीं कर सकते । प्रक्षिप्तताका यह व्याज ही इनके पक्षकी शिथिलताका प्रमाण है । मनुजी तो ' जप्येनैव तु संसिध्येद् ब्राह्मणो नात्र संशयः । कुर्याद् श्रन्यद्, न वा कुर्याद् मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ' ( २।८७ ) यहाँ पर साधारण जपकर्ता तथा अन्य कुछ भी न करनेवाले ब्राह्मणको वर्ण - व्यवस्था पर विचार २५६ २६० भी ब्राह्मण माना है । ' सावित्रीमात्रसारोपि वरं विप्रः सुयन्त्रितः लि नायन्त्रितस्त्रिवेदोपि सर्वाशी सर्वविक्रयी ' ( २।११८ ) यहाँ । यह साधारण गायत्री जपवालेको भी ब्राह्मण कहते हैं सर्वभचकको मो मनु बालम , भी स्फोटये ब्राह्मण न कहकर अवर ब्राह्मण ही कहते हैं । डाक्टर भगवानूदासजी तथा श्रार्यसमाज के श्रीतुलसीराम स्वामी श्रादि कर्मणा वर्ण माननेवाले दोषेण वर्णानां भी इन श्लोकोंको प्रक्षिप्त नहीं मानते । तब पूर्वोक्त श्लोक में भी मनुजी यही जन्मसे वर्ण - व्यवस्था इष्ट है, ब्राह्मणका पाप करना नहीं । पृथिव्या ( १२ ) श्रागे डा ० जी कहते है- ' भागवतमें पृथुके धाल्यान यह ' वात्सल्यं मनुवन्नृणाम् ' ऐसी उपमा कही है । न केवल एक जाति जीसे एक वर्णके, किन्तु सर्व मानवमात्र के आदि प्रजापति, ऐसे क्रूर वाप अपराध पापाचारके प्रोत्साहक कैसे लिख सकते हैं? " इसका उत्तर हम एक अपराध - पिताके चार पुत्रोंके दृष्टान्तसे दे चुके हैं । इसमें ब्रह्मणको पापा निर्वासन प्रोत्साहन नहीं है, किन्तु अग्रजन्माको अवर की अपेक्षा थोड़ा द राज्य में देना है, और कुछ नहीं । वह भी उनके पूर्वजन्मोंके सुकर्मो के सम्मानका लक्ष्य करके किया जाता हैं, जिनके कारण उनका इस जन्म में ब्राह्मण- दयानन्द वंश में जन्म हुआ । इससे उन्हें इस जन्ममें भी सुकर्म करनेके लिए हिंसित प्रोत्साहित किया जाता है; जिससे इस जन्म में भी उनका सम्मान हो, स्वा ० द और भविष्य जन्म भी उनका अच्छे वर्ण में हो । स्मृतियों में चाण्डाला किसी स वर्णन भी है, उनकी उत्पत्तिका प्रकार भी वर्णित है, तो क्या उठे या देखकर डा ० जी यही कहेंगे कि- ' यहाँ मनुजीने शुद्ध जातिवालोंको विचार ब्राह्मणी के ग्रहण के लिए प्रोत्साहित किया है, यतः यहाँ भी प्रतिष्ठा ' मनस्यन ' हूँ ' नहीं, ऐसा नहीं । ऐसा होने पर तो सारी मनुस्मृति ही प्रक्षिष्ठ नवि बनाई जा सकती है । तब तो मनुका सच्चा यादर (? होगा! इन्यात् ( १६ ) डा ० जी श्रागे कहते हैं— ' यदि ऐसे श्लोक प्रामाणिक और | बालाघ उचित माने जाएँ, तब तो मंहालाटको प्रवर्तमान भारतीय दण्ड विधान राज्यों के CC - 0. Ankur Joshi Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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श्रीसनातनधर्मालीकः ( ४ ) २५८ २६० यन्त्रितः लिखवा देना अत्युचित होगा कि - ' अँग्रेजो नावमन्तव्यः सदसद् भो । यह । न जातु हन्याद् श्रग्रेजं सर्वपापेष्वपि स्थितम् । जोहानं चकको मनु वा स्फोटयेद् समाचरन् वापि यकृद् वा भेदयेत् पदा । द्विजैकजानाम्, अँग्रे भी बन्दासजी दोषेण लिप्यते ॥ प्रत्यक्षं श्वेतवर्णोयं सर्ववर्णोत्तमोत्तमः । सर्वेषामेव मानने वाले वर्णानां अंग्रेजो न्यायतः प्रभुः । महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति । मनुजीको पृथिव्यामिन्द्रवच्चापि प्रसर्पति नभस्तले ' । 1 यद्यपि इस बात का प्रकृत विषयसे सम्बन्ध नहीं है, तथापि डा ० व्याल्यान जीसे प्रष्टव्य है कि - अँग्रेजी राज्यमें ऐसा दीखता था या नहीं? जिस जाति श्रपराधको काला आदमी करे, उसको गोरा भी करे, तो यदि उस कूर वाक्य, अपराधमें कालेको फाँसी दी जाती थी, तो गोरेकी उसीमें केवल देश- " हम एक निर्वासन होता था, उसमें कारण क्या? कारण यही कि — अँग्रेजी पाएका राज्यमें अँग्रेज अग्रजन्मा था, अतएव उसको वध - दण्ड न देकर राष्ट्रसे घोड़ा द ही बाहर किया जाता था । यही सुधारक लोग गांधीजीको, वा स्वामी सम्मानका प्रायः दयानन्दजीको शतशः दोषयुक्त होने पर भी वैसे वाग्वाणोंसे क्या हिंसित करते हैं, जैसे कि जन्म- ब्राह्मणको । दही भांग- तमाखू पीनेसे निके लिए स्वा ० द ० को वैसी निन्दा नहीं करते, जैसे कि - भांग - तमाखू पीनेवाले म्मान हो, किसी सनातनधर्मी की । यह प्रसङ्ग सर्वत्र ही होता है । क्या उसे यदि प्राच्य धर्मशास्त्रकार ' मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं ' यह विवालोंको विचार कर जैसे आचरण करें, वैसा ही लिखें, पर अँग्रेजी सभ्य प्रक्षिप्तता ‘ मनस्यन्यद्, वचस्यन्यत्., कर्मण्यन्यद् ' इस नीतिको अवलम्बन करके ही प्रविष्ठ जो न लिखें, उसे भी चाचरण कर लें, तब क्या इससे ‘ न जातु ब्राह्मणं हन्यात् सर्वपापेष्वपि स्थितम् । राष्ट्रादेनं वहिष्कुर्यात् ' यह कहने णिक धोर वाला धर्मशास्त्र अपराधी होगा? अथवा क्या हिन्दुराज्य तथा अँग्रेजी ड विधाननं राज्योंके नियमोंको समानरूपसे लिखनेकी व्याप्ति हो सकती हैं? CC - 0. Ankur Joshi -वस्था पर विचार २६१ ' महती देवता ह्यषा नररूपेण तिष्ठति ' इस पद्यको उपहास्य बना कर डा ० जो मनु पर चोट कर रहे हैं । यह है मनुके आदरका आदर्श । क्योंकि यह अंश ' मनुस्मृति ' का है; अब डा ० जी बतावे कि राजाक लिए लिखा यह मनुका पद्म क्या आपके मतने प्रक्षिप्त है कि आपने उसे उपहास्य बना लिया । यदि ऐसा है, तो ' नराणां च नरावियम् ' ( १०/२० अपनी प्रमाणित गोठाके इस वचनको क्या ' राजो विश्व-जनीनस्य यो देवो मर्त्यान् अति ' ( अ ० शौ ० सं ० २०१६२०१७ ) पूर्व पद्यके मूलभूत इस वेदवचनको नो डा ० वी प्रदिप्त मान लेगे! ऐसा हो तो श्राप धन्य हैं । श्रीमन्! जो आपको श्रसम्मत है, वह वेदानुकूल भी क्या प्रक्षिप्त है । यदि ऐसा है यह अपने बचावका अपने उत्तम उपाय बना रखा है! ( १० ) ' न जातु ब्राह्मणं हन्याद् ' ( ३८० ) यह ननुपद्म मोन ब्राह्मणो हिंसितव्यः ' ( त्रयव ० २१६ ) इस वेदमन्त्र के अनुकूल हो है । यहां ब्राह्मणकी हिंसाका निषेध है, निषेध, प्राप्ति होने पर होता है: प्रसि वैसी योग्यताएँ होती है, पर गुस्से वर्णव्यवस्था ब्राह्मणका गुरु-कर्म हिंसायोग्य नहीं । तद यहां वही ' सर्वपापेष्ववस्थित श्रादिका संकेत मिलता है - जो हिंसाकी योग्यताका आधायक है । परन्तु हिंसा की योग्यतामें भी उसका निषेध करनेसे वहां जन्मले व्यवस्था सिद्ध होती है, वहां मनुका टक्क पद्य वेदमूलक भी सिद्ध हो जाता है । इसी कारण मनुने इसकी स्पष्टता की है कि - ' न ब्राह्मणवचाद् भूयान् अघम विद्यते मुवि । तस्माद् अस्य व राजा मनसापि न चिन्तयेत् ( 1 ) यह ठीक है और वेदानुकूल है । त्रह्महा च एते पतन्ति ' ( वान्दो १ । १० । १ ) इस प्रकारके बहुतसे इसके मूल हैं । यर्व ० सं ० का २१८-१९ आदि सूक्त तो ब्राह्मणको तंग करने वालेके लिए बहुत प्रसिद्ध हैं । देखिये – उसके लिए वेदने कैसे दन्तवर्षण किया है - ' बुख प्रवृ Collection Gujarat. An eGangotri Initiative
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२६२ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ४ ) संवृश्न, दह, प्रदह, संदह, ब्रह्मज्यं देवि! श्रन्ये! श्रामूलाद् अनुसन्दह । यथा याद् यमसादनात् पापलोकान् परावतः ' ( अथर्व ० १२।११।१-२-३ ) इसका आर्यसमाजी श्रीराजारामजी शास्त्रीने यह अर्थ किया है- ' काट, काट डाल, टुकड़े - टुकड़े करदे, जला दे, जला डाल, जलाकर राख कर दे ब्राह्मणके सताने वालेको । हे न मारने योग्य देवि! जड से लेकर सारा जलाकर राख करदे । जैसेकि वह यमके घर [ लोक ] से दूरवर्ती पाप-लोकोंको जाए ' इल प्रकारके हम बहुतसे मन्त्र दे सकते हैं । वेदको ब्राह्मण जन्मसे इष्ट है — यह हम गत निबन्धमें सिद्ध कर चुके हैं । इस प्रकार ' ब्राह्मणो नावमन्तव्यः ' ( १।११०११३ ) यह महाभारतका पद्य भी ' तस्माद् ब्राह्मणेभ्यो वेद - विद्भ्यो दिवे - दिवे नमस्कुर्यात्, नाश्लीलं कीर्त-, एता एवं देवताः प्रीणाति ' ( तै ० श्रा ० २।१५ ) इस कृष्णयजुर्वेदकी " कडका अनुकूल है । ' नाश्लीलं कीर्तयेत् ' का अर्थ श्रीसायणने ऋ ० भाष्यके उपोद्घातमें लिखा है- ' न तु तस्मिन् [ ब्राह्मणे ] विद्यमानमपि दोषं - कीर्तयेत् ' । तब वेदानुकूलको प्रक्षिप्त कैसे माना जा सकता है? क्या डाक्टरजी तथा उन जैसे वादी ध्यान देंगे? · ' सो याद रखने की बात है - शास्त्रकी दुहाई - तिहाई देनेसे यह लाभ नहीं हुश्श्रा, प्रत्युत.. इत्यादि शास्त्र अथवा शास्त्रभास अथवा प्रक्षिप्त के विपरीत नवाविष्कृत उपज्ञात प्रकारोंसे ' यह भी डा ० जीका कथन वाग्विलासमात्र है । वस्तुतः जब शास्त्रोंका पूर्ण श्राचरण था; तभी सब प्रकारको शान्ति थी । जब श्राप लोगोंने ' यह प्रक्षिप्त है, यह गप्प है ' इत्यादि नये श्राविष्कारोंको प्रवृत्त करके जनताकी शास्त्रों श्रद्धा हटवाई, और जनताको अपनी छाया के नीचे खींचा; इधर लोगों की शास्त्रोंमें श्रविश्वास - प्रवर्तिका अंग्रेजी शिक्षा में जबसे रति हुई; तभीसे शान्ति भी बढ़ी है, जहां - तहाँ हानियां भी हुई हैं, स्वराज्य भी बहुत समय तक नष्ट रहा । श्रवशिष्ट स्वराज्य भी आप जैसे लोग शास्त्र CC - 0. Ankur Joshi Collection वर्ण - व्यवस्था पर विचार २६४ वचनोंको अन्यथा करके अन्तर्वर्णविवाह शास्त्रनिन्दित । बहुश्रुतम् को, कन्यायोंकी बड़ी वर्षकी श्रायुमें विवाह, देवमन्दिराम अन्त्यजप्रवेश मनुपद्यक विवाहोच्छेद श्रादि कुनियमोंको राजकीय शासनमें लाकर शास्त्रांका, स्थितम् ' ( अतिक्रमण कर रहे हैं: शास्त्रविश्वासी पूर्वोक्त कानूनाका उल्लंघन भी धैर्य रखने बाले अपने ही भाइयोंको दण्ड भी दिलवाते हैं । इधर श्राप ल करते व्यवस्थासे अपने शास्त्रोंको वैदेशिक दृष्टिकोणसे देखकर उनमें श्रापाततः विरोध दिखलाकर शास्त्रोंका प्रभाव भी कम करते जाते हैं, जिससे उच्च ( १८ प्रवृत्त होती है । जावे, तो श्चैव न ज “ हे भाई! थोड़ा विचारो ऐसे पापिष्ठ प्रक्षिप्त श्लोकोंका ही पत्र कृतघ्नश्च है कि इस प्रभागे देशमें भयंकर अनाचार, अत्याचार, दुराचार ( 931980 • प्रजापीड़न होने लगा " डा ० जीका यह कथन निष्प्रमाण ही है, विधि कोई भी न शास्त्रकी आज्ञाका त्याग ही इसमें कारण हैं । जब ' राष्ट्रांदनं बहिष्कुर्याद ' अपबाद मा यह दण्ड उस श्लोकमें भी लिखा है; तो उन पद्योंको पापिष्ठ कैसे कहा भवति ' इस जा सकता है? राष्ट्रसे बहिष्कार एक अग्रजन्माकी बड़ी अप्रतिष्ठा है इससे विरो कि- ' सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ' गीता २।३४ ) के धनु- । सार, उसकी मृत्यु से भी बढ़कर है । तब इससे भयंकर अनाचार इस प्र फैलेगा? उन्हीं शास्त्रों में जहां ब्राह्मण में कर्तव्यभार ' डाला गया है वा बालवृद्ध उनमें ही शूद्रको उससे बचाया गया है । शास्त्रमें सदा उत्सर्गमात्र विचारयन् ' है? ' परीवार ( केवल सामान्यशास्त्र ) नहीं होता, किन्तु उत्सर्ग भी तथा अपवाद मो विद्यमान दो होता है । कई अपराधों में ब्राह्मणोंको दण्ड सर्वथा ही नहीं होगा, ' निन्दा ' होत कइयोंमें ब्राह्मणोंको शुद्धसे भी अधिक दण्ड मिलता है । इसे उत्सा जन्ममें गधेक एवम् अपबादके व्यवस्थापक बहुश्रुत ही निर्णीत कर सकते हैं, श्राप: -गुरु वा व ततोद्रष्टाओं वा उत्सर्गमात्रद्रष्टायोंको जहां - तहाँ विरोध ही दीखेगा । हन्यात् ' ( ८ ) इसमें ऐकदेशिक ' दृष्टिकोण अपेक्षित नहीं होता, किन्तु सर्वमुखी न हो । मिले हुए गुर इसलिए जो डा ० जीने ' आज ' पत्रमें ' गुरु ' वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मणं व Gujarat. An eGangotri Initiative